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क्या योग विज्ञान है?क्यो महत्वपूर्ण हैं''योग'' ?- PART-01


क्या योग विज्ञान है?-

20 FACTS;-

1-योग के अतिरिक्त जीवन के परम सत्य तक पहुंचने का कोई उपाय नहीं है।

जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं है, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात है कि योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है।

2-योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है। लेकिन चाहे जीसस, चाहे मोहम्मद, चाहे पतंजलि, चाहे बुद्ध, चाहे महावीर, कोई भी व्यक्ति जो सत्य को उपलब्ध हुआ है, बिना योग से गुजरे हुए उपलब्ध नहीं होता।नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह

प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है।कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के 'विश्वासों' , किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है। विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, एक्सपेरिमेंट की अपेक्षा करता है।

3- विज्ञान मान्यता से शुरू नहीं होता; विज्ञान खोज से, अन्वेषण से शुरू होता है। वैसे ही योग भी मान्यता से शुरू नहीं होता; खोज, जिज्ञासा, अन्वेषण से शुरू होता है। इसलिए योग के लिए सिर्फ प्रयोग करने की शक्ति की आवश्यकता है, प्रयोग करने की सामर्थ्य की आवश्यकता है, खोज के साहस की जरूरत है; और कोई भी जरूरत नहीं है।विज्ञान कहता है, करो, देखो। विज्ञान के सत्य चूंकि वास्तविक सत्य हैं, इसलिए किन्हीं श्रद्धाओं की उन्हें कोई जरूरत नहीं होती है। दो और दो चार होते हैं, माने नहीं जाते।

4-योग का पहला सूत्र है कि जीवन ऊर्जा/शक्ति है, लाइफ इज़ एनर्जी। बहुत समय तक विज्ञान इस संबंध में राजी नहीं था और सोचता था: जगत पदार्थ है, मैटर है। लेकिन योग ने विज्ञान की खोजों से हजारों वर्ष पूर्व से यह घोषणा कर रखी थी कि पदार्थ एक असत्य है, एक झूठ है, एक इल्यूजन है, एक भ्रम है। भ्रम का मतलब यह नहीं है कि 'नहीं है'। भ्रम का मतलब.. जैसा दिखाई पड़ता है वैसा नहीं है और जैसा है वैसा दिखाई नहीं पड़ता है।

5-योग एक शुद्ध विज्ञान है। और जहाँ तक योग के संसार का सवाल है महर्षि पतंजलि का नाम महानतम है। वे एक दुर्लभ व्यक्ति हैं, उनकी तुलना का कोई भी नाम नहीं है। मानवता के इतिहास में पहली बार इस व्यक्ति ने धर्म को विज्ञानं की हैसियत तक पहुंचा दिया। उन्होंने धर्म को विज्ञानं का रूप दे दिया; शुद्ध नियम, किसी मान्यता की आवश्यकता नहीं।

पतंजलि बुद्ध पुरुषों के जगत में आइंस्टीन कि भांति है। वे एक घटना हैं। उनके पास एक तेज वैज्ञानिक मन के जैसी पहुँच है और वैसा ही मनोभाव है।

6-वे वस्तुत एक वैज्ञानिक हैं जो नियमों कि दृष्टि से सोचते हैं। और उन्होंने मानवता के परम नियमों का निष्कर्ष निकाल लिया है, मानव मन और वास्तविकता की अंतिम कार्य

संरचना का भी।वे बिलकुल एक गणित के सूत्र की तरह सटीक हैं। केवल वह जो बोल रहें हैं उसका पालन करो और परिणाम निश्चित घटित होगा। परिणाम अवश्यंभावी है-- यह ऐसा ही है जैसे दो और दो मिल कर चार बन जाते हैं; या जैसे तुम पानी को सौ डिग्री तक गर्म करो और वह भाप बन जाए। इसमें किसी मान्यता की आवश्यकता नहीं, तुम केवल इसे करते हो और समझ जाते हो। यह कर के समझने जैसा है।

7-जहाँ तक मान्यता का सवाल है योग के पास कुछ भी नहीं है; योग कुछ भी मानने को नहीं कहता।तथाकथित धर्मो को मान्यता की आवश्यकता होती है। एक धर्म और दूसरे धर्म के बीच और कोई भेद नहीं; भेद केवल मान्यताओं का है। एक मुसलमान के की कुछ मान्यताएं होतीं है, एक हिन्दू की कुछ और, एक क्रिश्चन की कुछ और। योग कहता है "अनुभव करो।" जैसे कि विज्ञानं कहता है " प्रयोग करो"। प्रयोग करना और अनुभव करना दोनों एक ही हैं; उनकी दिशाएं भिन्न हैं। प्रयोग का अर्थ है कि तुम कुछ बाहर कर सकते हो; अनुभव का अर्थ है कि तुम कुछ भीतर कर सकते हो। अनुभव एक भीतरी प्रयोग है।

8-विज्ञानं कहता है " विश्वास मत करो, जितना हो सके उतना संदेह करो," किन्तु साथ ही अविश्वास मत करो"- क्योंकि अविश्वास भी एक तरह का विशवास है। तुम ईश्वर में विश्वास कर सकते हो, तुम ईश्वर के न होने के सिद्धांत में भी विश्वास कर सकते हो। तुम जितने कट्टर मनोभाव से ईश्वर को स्वीकार कर सकते हो, तुम इसके बिलकुल विपरीत भी बोल सकते हो, कि ईश्वर नहीं है, उतनी ही कट्टरता से। आस्तिक और नास्तिक दोनों ही विश्वासी होतें हैं, और विश्वास विज्ञान का क्षेत्र नहीं है। विज्ञान का अर्थ है किसी बात को अनुभव करना, वह जो है; इसके लिए किसी विश्वास की आवश्यकता नहीं।"

9-वास्तव में, महर्षि पतंजलि ने योग का आविष्कार नहीं किया था; योग उस से कहीं ज़ियादा प्राचीन है। योग, पतंजलि से भी कई सदियों पूर्व उपस्थित था। उन्होंने उसकी खोज नहीं की, परन्तु वे दुर्लभ मेल वाले व्यक्तित्व की वजह से वे लगभग उसके खोजी और संस्थापक बन गए। उनसे पहले कई लोगों ने इस पर काम किया था और लगभग सभी-कुछ पता भी था, परन्तु परन्तु उनका व्यक्तित्व विपरीत का ऐसा जोड़ हैं, वे अपने भीतर ऐसे बेबूझ तत्वों को सम्मिलित करते हैं कि वे इसके संस्थापक बन गए । अब योग हमेशा के लिए पतंजलि से सम्बंधित रहेगा।

10-योग की भाषा में मनुष्य एक लघु ब्रह्मांड है। सूक्ष्म ढंग से मनुष्य एक छोटा सा ब्रह्मांड है, मनुष्य एक छोटे से अस्तित्व में सघन रूप से समाया हुआ है। यह जो ब्रह्मांड है, यह जो संपूर्ण अस्तित्व है, यह और कुछ नहीं मनुष्य का विस्तार ही है। यह योग की भाषा है : लघु ब्रह्मांड व संपूर्ण ब्रह्मांड । जो कुछ बाहर अस्तित्व रखता है, ठीक वही मनुष्य के भीतर भी अस्तित्व रखता है। 11-बाहर के सूर्य की भाँति मनुष्य के भीतर भी सूर्य छिपा हुआ है; बाहर के चाँद की ही भाँति मनुष्य के भीतर भी चाँद छिपा हुआ है। और पंतजलि अंतर्जगत के आंतरिक व्यक्तित्व का संपूर्ण भूगोल हमें दे देना चाहते हैं। इसलिए जब वे कहते हैं कि - ''सूर्य पर संयम संपन्न करने से सौर ज्ञान की उपलब्धि होती है।'' तो उनका संकेत उस सूर्य की ओर नहीं है जो बाहर है। उनका मतलब उस सूर्य से है जो हमारे भीतर है।

12-हमारे अंतस के सौर-तंत्र का केंद्र 'सूर्य ठीक प्रजनन-तंत्र की गहनता में छिपा हुआ है। इसीलिए कामवासना का केंद्र सूर्य होता है और उसमें एक प्रकार की ऊष्णता /Heat होती है। जब व्यक्ति कामवासना से थक जाता है तो तुरंत भीतर चंद्र ऊर्जा सक्रिय हो जाती है।अथार्त जब सूर्य छिप जाता है तब चंद्र का उदय होता है।सूर्य ऊर्जा का काम समाप्त होने पर चंद्र ऊर्जा का कार्य प्रारंभ होता है। 13-भीतर की सूर्य ऊर्जा काम-केंद्र है। उस सूर्य ऊर्जा पर संयम केंद्रित करने से, व्यक्ति भीतर के संपूर्ण सौर-तंत्र को जान ले सकता है। काम-केंद्र पर संयम करने से व्यक्ति काम के पार जाने में सक्षम हो जाता है..सभी रहस्यों को जान सकता है। लेकिन बाहर के सूर्य के साथ उसका कोई भी संबंध नहीं है।लेकिन अगर कोई व्यक्ति भीतर के सूर्य को जान लेता है तो उसके प्रतिबिंब से वह बाहर के सूर्य को भी जान सकता है।

14-सूर्य इस अस्तित्व के सौर-मंडल का काम-केंद्र है। इसी कारण जिसमें भी जीवन है, प्राण है, उसको सूर्य की रोशनी, सूर्य की गर्मी को आवश्यकता है। जैसे कि वृक्ष अधिक से अधिक ऊपर जाना चाहते हैं।किसी अन्य देश की अपेक्षा अफ्रीका में वृक्ष सबसे अधिक ऊँचे हैं। कारण अफ्रीका के जंगल इतने घने हैं और इस कारण वृक्षों में वापस में इतनी अधिक प्रतियोगिता है कि अगर वृक्ष ऊपर नहीं उठेगा तो सूर्य की किरणों तक पहुँच ही नहीं पाएगा, उसे सूर्य की रोशनी मिलेगी ही नहीं। और अगर सूर्य की रोशनी वृक्ष को नहीं मिलेगी तो वह मर जाएगा। जैसे सूर्य जीवन है; वैसे ही 'काम' भी जीवन है। इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य से ही है, और ठीक इसी तरह से - सभी प्रकार के जीवन का जन्म 'काम 'से ही होता है। 15-सूर्य लक्ष्य नहीं है, बल्कि केंद्र है। परम नहीं है, फिर भी केंद्र तो है। हमको उससे भी ऊपर उठना है, उससे भी आगे निकलना है।यह प्रारंभिक चरण है ;अंतिम चरण नहीं। यह ओमेगा नहीं है, अल्फा है(यूनानी वर्णमाला के पहले और आखिरी अक्षर-अल्फा-ओमेगा “शुरूआत और अंत।”जब पतंजलि हमें बताते हैं कि संयम को उपलब्ध कैसे होना; करुणा में, प्रेम में व मैत्री में कैसे उतरना; करुणावान कैसे होना, प्रेमपूर्ण होने की क्षमता कैसे अर्जित करनी; तब वे आंतरिक जगत में पहुँच जाते हैं। पतंजलि की पहुँच अंतर-अवस्था के पूरे वैज्ञानिक विवरण तक है। 16-इस पृथ्वी के लोगों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, सूर्य-व्यक्ति और चंद्र-व्यक्ति, या हम उन्हें यांग और यिन भी कह सकते हैं। सूर्य पुरुष का गुण है; स्त्री चंद्र का गुण है। सूर्य आक्रामक होता है, सूर्य सकारात्मक है; चंद्र ग्रहणशील होता है, निष्क्रिय होता है। सारे जगत के लोगों को सूर्य और चंद्र इन दो रूपों में विभक्त किया जा सकता है। और हम अपने शरीर को भी सूर्य और चंद्र में विभक्त कर सकते हैं; योग ने इसे इसी भाँति विभक्त किया है। 17-योग ने तो शरीर को इतने छोटे-छोटे रूपों में विभक्त किया है कि श्वास तक को भी बाँट दिया है। एक नासापुट में सूर्यगत श्वास है, तो दूसरे में चंद्रगता वास है जब व्यक्ति क्रोधित होता है, तब वह सूर्य के नासापुट से श्वास लेता है। और अगर शांत होना चाहता है तो उसे चंद्र नासापुट से श्वास लेनी होगी। योग में तो संपूर्ण शरीर को ही विभक्त कर दिया गया है : मन का एक हिस्सा पुरुष है, मन का दूसरा हिस्सा स्त्री है। और व्यक्ति को सूर्य से चंद्र की ओर बढ़ना है, और अंत में दोनों के भी पार जाना है, दोनों का अतिक्रमण करना है।

18-योग मात्र एक विज्ञान है। यह एक संयोगपूर्ण घटना ही है कि हिंदुओं ने योग को खोजा। लेकिन यह तो आंतरिक अस्तित्व का एक विशुद्ध गणित है।इसलिए एक मुसलमान भी योगी हो सकता है; ईसाई भी योगी हो सकता है। इसी तरह एक जैन, एक बौद्ध भी योगी हो सकता है।

महर्षि पतंजलि बड़े कठोर गणितज्ञ हैं,और गणित की भाषा में ही बात करते हैं।

19-वे संक्षिप्त होंगे और तुम्हें कुछ सूत्र देंगे। वे सूत्र संकेत मात्र हैं कि क्या करना है। वे ऐसा कुछ भी कहने का प्रयास नहीं करते, जिसे शब्दों में कहा न जा सके। वे असंभव के लिए प्रयत्न ही नहीं करते। वे तो बस नींव बना देंगे और यदि तुम उस नींव का आधार लेकर चल पड़े, तो उस शिखर पर पहुंच जाओगे जो अभी सबके परे है।योग मृत्यु तथा नव जीवन दोनो ही है।

तुम जैसे हो, उसे तो मरना होगा क्योकि जब तक पुराना मरेगा नही, नये का जन्म नहीं हो सकता।

20-नया तुम में ही तो छिपा है। तुम केवल उसके बीज हो। और बीज को गिरना ही होगा, धरती में पिघलने के लिए। बीज को तो मिटना ही होगा, केवल तभी तुम में से नया प्रकट होगा। तुम्हारी मृत्यु ही तुम्हारा नव जीवन बन पायेगी। योग दोनों है -मृत्यु भी और जन्म भी। जब तक तुम मरने को तैयार न होओ तब तक तुम्हारा नया जन्म नहीं हो सकता। यह केवल विश्वास को बदलने की बात नहीं है।योग तुम्हारे समग्र अस्तित्व से, तुम्हारी जड़ों से संबंधित है। वह दार्शनिक नहीं है।

योग का अर्थ ;-

03 FACTS;-

1-चित्त की वृत्तियों का रोकना/निरोध करना योग है |पतंजलि ने चित्त की क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, निरुद्ध और एकाग्र ये पाँच प्रकार की वृत्तियाँ मानी है, जिनका नाम उन्होंने 'चित्तभूमि' रखा है। उन्होंने कहा है कि आरंभ की तीन चित्तभूमियों में योग नहीं हो सकता, केवल अंतिम दो में हो सकता है।

2-इन दो भूमियों में संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात ये दो प्रकार के योग हो सकते हैं। जिस अवस्था में ध्येय का रूप प्रत्यक्ष रहता हो, उसे संप्रज्ञात कहते हैं। यह योग पाँँच प्रकार के क्लेशों का नाश करनेवाला है। असंप्रज्ञात उस अवस्था को कहते हैं, जिसमें किसी प्रकार की वृत्ति का उदय नहीं होता अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का भेद नहीं रह जाता, संस्कारमात्र बच रहता है। यही योग की चरम भूमि मानी जाती है और इसकी सिद्धि हो जाने पर मोक्ष प्राप्त होता है। चित्तभूमि या मानसिक अवस्था के पाँच रूप हैं ;-(1) क्षिप्त (2) मूढ़ (3) विक्षिप्त (4) एकाग्र (5) निरुद्ध।

The 5 states of mind in which Samadhi lies are:

Kshipta – Chaotic or most fickle state of mind.

2-Mudha – Dull or Lazy state of mind.

3-Vikshipta – Partially focused mind.

4-Ekagra – One-pointed mind.

5-Niruddha – Fully absorbed mind.

2-1. क्षिप्त अवस्था :-

मन की पहली अवस्था है- क्षिप्त अवस्था। क्षिप्त का अर्थ है-मन की चंचल स्थिति, चंचल अवस्था।इस स्तर में मन इन्द्रियों के रूप, रस, गन्ध, शब्द तथा स्पर्श विषयों की ओर बहुत अधिक आकर्षित रहता है।क्षिप्त अवस्था में चित्त एक विषय से दूसरे विषय पर दौड़ता रहता है ,चित्त को विविध विषयों में तीव्रता से चलाता है।उस अवस्था में, जो कार्य हानिकारक होते हैं, उन कार्यों को भी वह कर बैठता है ! इस अवस्था में रजो गुण की प्रधानता होती है ।

2-2. मूढ़ अवस्था; –

दूसरी अवस्था है-मूढ़ अवस्था।निद्रा , तन्द्रा , आलस्य , मूर्छा आदि अवस्थाओं में जीवात्मा को जब विशेष ज्ञान नहीं होता अथवा विशेष ज्ञान नहीं कर पाता उसको मूढ़ अवस्था कहते हैं ! इस अवस्था में सत्त्व एवं रजोगुण अप्रधान रहते हैं , तमोगुण प्रधान रहता है !

2-3-विक्षिप्तावस्था

विक्षिप्तावस्था में मन थोड़ी देर के लिए एक विषय में लगता है पर तुरन्त ही अन्य विषय की ओर चला जाता है।

2-4-एकाग्र अवस्था;-

जिस अवस्था में योगाभ्यासी विवेक, वैराग्य, और अभ्यास से अपने चित्त को योग के लिए अपेक्षित किसी एक विषय में अधिकारपूर्वक बहुत काल तक स्थिर कर लेता है , उसको एकाग्र कहते हैं !एकाग्र चित्त की आंशिक स्थिरता की अवस्था है जिसे योग नहीं कह सकते।इस अवस्था में मन दुर्गुणों को दूर करने में लिप्त रहता है तथा बहुत समय तक एक विषय में एकाग्रचित्त रह सकता है। एकाग्र अवस्था किसी वस्तु पर मानसिक केन्द्रीकरण की अवस्था है। यह योग की पहली सीढ़ी है।

2-5-निरुद्ध अवस्था;-

निरुद्ध अवस्था में चित्त की सभी वृत्तियों का (ध्येय विषय तक का भी) लोप हो जाता है और चित्त अपनी स्वाभाविक स्थिर, शान्त अवस्था में आ जाता है।इसी निरुद्व अवस्था को ‘असंप्रज्ञात समाधि’ या ‘असंप्रज्ञात योग’ कहते हैं। यही समाधि की अवस्था है।जब तक मनुष्य के चित्त में विकार भरा रहता है और उसकी बुद्धि दूषित रहती है, तब तक तत्त्वज्ञान नहीं हो सकता। जिस अवस्था में योगाभ्यासी सम्प्रज्ञात समाधि की ऊँची अवस्था को प्राप्त कर लेता है तो उसको उसमे भी दोष दिखाई देने लग जाते हैं ; उन दोषों के कारण परवैराग्य उत्पन्न होता है। उस अवस्था में चित्त की समस्त वृतियों का निरोध हो जाता है।इसको निरुद्ध अवस्था कहते हैं ।

3-स्वामी विवेकानंद के द्वारा अनुसार;-

“प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है।बाह्य एवं अन्तःप्रकृति को वशीभूत कर आत्मा के इस ब्रह्म भाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है।कर्म,उपासना,मनसंयम अथवा

ज्ञान,इनमे से एक या सभी उपयो का सहारा लेकर अपना ब्रह्म भाव व्यक्त करो और मुक्त

हो जाओ।बस यही धर्म का सर्वस्व है। मत,अनुष्ठान,शास्त्र,मंदिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया कलाप तो गौण अंग प्रत्यंग मात्र है।"

योग के भेद ;-

07 FACTS;-

साधकों के भेद से योग को निम्न श्रेणियों में विभक्त किया गया है ;–

1-राज योग अर्थात ध्यान योग ;–

पतंजलि योग दर्शन का मुख्य विषय राज योग अर्थात ध्यान योग है | पर अन्य सब प्रकार के योग इसके अंतर्गत हैं |

2-ज्ञान योग अर्थात सांख्य योग ;–

सारे ज्ञेय तत्त्व का ज्ञान इस योग दर्शन में अति उत्तमता से कराया गया है |

3-कर्मयोग अर्थात अनासक्ति निष्काम कर्मयोग

4-भक्ति योग; –

यह श्रद्धा , भक्ति का मुख्य अंग है , जप और मंत्र भी इसमें सम्मिलित है |

5-हठ योग ;-

हठ योग का सम्बन्ध शरीर और प्राण से है, जो योग के आठ अंगों – यम , नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि में से आसान और प्राणायाम के अंदर आ जाते हैं |हठ योग , राज योग का साधन मात्र ही है |‘ह’ का अर्थ सूर्य ( पिङ्गला नाड़ी अथवा प्राणवायु ) और ‘ठ’ का अर्थ चन्द्रमा ( इड़ा नाड़ी अथवा अपानवायु ) है , इनके योग को हठ योग कहते है |

6-लययोग और कुण्डलिनी योग – तो राज योग ही है |

7- मनोयोग – दृष्टि बंध ( Sightism ) , अंतरावेश ( Spiritualism ) , सम्मोहन ( Mesmerism ) और वशीकरण ( Hipnotism ) जो मनोयोग से पुकारे जाते है वे भी प्रत्याहार और धारणा के अंतर्गत है

राजयोग का क्या अर्थ है? -

04 FACTS;-

1-अलग-अलग सन्दर्भों में राजयोग के अलग-अलग अनेकों अर्थ हैं। ऐतिहासिक रूप में, योग की अन्तिम अवस्था समाधि' को ही 'राजयोग' कहते थे। किन्तु आधुनिक सन्दर्भ में, हिन्दुओं के छः दर्शनों में से एक का नाम 'राजयोग' (या केवल योग) है। महर्षि पतंजलि का योगसूत्र इसका मुख्य ग्रन्थ है।१९वीं शताब्दी में स्वामी विवेकानन्द ने 'राजयोग' का आधुनिक अर्थ में प्रयोग आरम्भ किया था।

2-राजयोग सभी योगों का राजा कहलाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग की कुछ न कुछ समामिग्री अवष्य मिल जाती है।राजयोग का विषय चित्तवृत्तियों का निरोध करना है। महर्षि पतंजलि ने समाहित चित्त वालों के लिए अभ्यास और वैराग्य तथा विक्षिप्त चित्त वालों के लिए क्रियायोग का सहारा लेकर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाया है। इन साधनों का उपयोग करके साधक के क्लेषों का नाश होता है, चित्तप्रसन्न होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है और विवेकख्याति प्राप्त होती है।भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को मन को वश में करने के दो उपाय बताये।(1) अभ्यास (2) वैराग्य

3-प्रत्येक व्यक्ति में अनन्त ज्ञान और शक्ति का आवास है। राजयोग उन्हें जाग्रत करने का मार्ग प्रदर्शित करता है-मनुष्य के मन को एकाग्र कर उसे समाधि नाम वाली पूर्ण एकाग्रता की अवस्था में पंहुचा देना। स्वभाव से ही मानव मन चंचल है। वह एक क्षण भी किसी वास्तु पर ठहर नहीं सकता। इस मन चंचलता को नष्ट कर उसे किसी प्रकार अपने काबू में लाना,किस प्रकार उसकी बिखरी हुई शक्तियो को समेटकर सर्वोच्च ध्येय में एकाग्र कर देना-यही राजयोग का विषय है। जो साधक प्राण का संयम कर,प्रत्याहार,धारणा द्वारा इस समाधि अवस्था की प्राप्ति करना चाहते हे। उनके लिए राजयोग बहुत उपयोगी ग्रन्थ है। 4-राजयोग के अन्तर्गत महिर्ष पतंजलि ने अष्टांग योग को इस प्रकार बताया है ....

1- यम

2-नियम

3-आसन

4-प्राणायाम

5-प्रत्याहार

6-धारणा

7-ध्यान

8-समाधि

NOTE;-

उपर्युक्त प्रथम पाँच 'योग के बहिरंग साधन' हैं। धारणा, ध्यान और समाधि ये तीन योग के अंतरंग साधन हैं। ध्येय विषय ईश्वर होने पर मुक्ति मिल जाती है। यह परमात्मा से संयोग प्राप्त करने का मनोवैज्ञानिक मार्ग है जिसमें मन की सभी शक्तियों को एकाग्र कर एक केन्द्र या ध्येय वस्तु की ओर लाया जाता है।

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योग क्यो महत्वपूर्ण हैं?-

17 FACTS;-

1-हम एक गहरी भ्रांति में जीते हैं ..आशा की भ्रांति में, किसी आने वाले कल की, भविष्य की भ्रांति में।वास्तव में, आदमी सत्य के साथ नहीं जी सकता; उसे चाहिए. सपने, भ्रांतियां । उसे कई तरह के झूठ चाहिए जीने के लिए।इस बात को बहुत गहरे में समझने की जरूरत है, क्योंकि इसे समझे बिना उस अन्वेषण में नहीं उतरा जा सकता जिसे योग कहते हैं।

2-और इसके लिए मन को गहराई से समझना होगा ..उस मन को जिसे झूठ की जरूरत है, जिसे भ्रांतियां चाहिए ,जो सत्य के साथ नहीं जी सकता और जिसे सपनों की बड़ी जरूरत है।तुम केवल रात में ही सपने

नहीं देखते; तुम जब जाग रहे हो तब भी लगातार सपने ही देखे चले जाते हो।

3-अब वैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य नींद के बिना तो जी सकता है, लेकिन सपनों के बिना नहीं जी सकता। पुराने समय में समझा जाता था कि नींद जीवन की बड़ी जरूरत है। लेकिन अब आधुनिक खोजें कहती हैं कि नींद सचमुच कोई बड़ी जरूरत नहीं है। नींद की जरूरत है, ताकि तुम सपने देख सको। यदि तुम्हें नींद में सपने न देखने दिया जाए, तो सुबह तुम अपने को ताजा और जीवंत नहीं पाओगे। तुम स्वयं को इतना थका हुआ पाओगे जैसे कि बिलकुल सो ही नहीं पाये।

4-रात कुछ समय होता है गहरी नींद का और कुछ समय होता है सपनों का। एक आवर्तन है, एक लय है। जैसे रात और दिन के आने जाने की एक लय है। आरम्भ में तुम गहरी नींद में उतर जाते हो, कोई चालीस या पैंतालीस मिनट के लिए। फिर स्‍वप्‍नवस्‍था प्रारम्भ होती है और तुम सपने देखने लगते हो। फिर स्‍वप्‍नहीन निद्रा आ जाती है, और उसके बाद फिर से सपनों का आना शुरू हो जाता है। सारी रात यह क्रम चलता है।

5-यदि तुम्हारी नींद में उस समय बाधा आये जब तुम स्‍वप्‍नरहित गहरी नींद में सो रहे हो, तो सुबह तुम ऐसा अनुभव नहीं करोगे कि कहीं कुछ खोया है। लेकिन नींद यदि उस समय टूटे जब तुम सपने देख रहे हो तब सुबह तुम स्वयं को बिलकुल थका हुआ और निढाल -सा पाओगे।

अब इन बातों को बाहर से भी जाना जा सकता है। यदि कोई सो रहा है तो तुम जान सकते हो कि वह सपने देख रहा है या नही। अगर वह सपने देख रहा है तो उसकी आंखे लगातार गतिमान हो रही होगी -मानो वह बंद आंखों से कुछ देख रहा है। जब वह स्वप्‍नरहित गहरी नींद में है तो उसकी आंखे गतिमान नहीं होंगी; ठहरी हुई होगी।

6-अनेकों शोधकर्ताओं ने प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य का मन सपनों पर ही पलता है।फिर यह सपनों की बात केवल रात के विषय में ही सच नहीं है; जब तुम जागे हुए होते हो तब भी मन में कुछ ऐसी ही प्रक्रिया चलती रहती है। दिन में भी तुम अनुभव कर सकते हो कि किसी समय मन में स्वप्न तैर रहे होते है और किसी समय स्वप्न हीं होते है।

दिन में जब सपने चल रहे है और अगर तुम कुछ कर रहे हो तो तुम अनुपस्थित से होओगे क्योंकि कही भीतर तुम व्यस्त हो।

7- मन दिन -रात इन्हीं अवस्थाओं के बीच डोलता रहता है ;गैर -स्वप्न से स्‍वप्‍न में, फिर स्‍वप्‍न से गैर -स्वप्न में। यह एक आंतरिक लय है।

वर्तमान तो लगभग हमेशा नरक जैसा है। तुम उसके साथ जी लेते हो तो उन आशाओ के सहारे ही, जिन्हें तुमने भविष्य में प्रक्षेपित कर रखा है। तुम आज जी लेते हो, आने वाले कल के भरोसे। तुम आशा किये चले जा रहे हो कि कल कुछ न कुछ घटित होगा कि कल किसी न किसी स्‍वर्ग के द्वार खुलेगे। वे आज तो हरगिज नहीं खुलते। और कल जब आता है तो वह कल की तरह नही आता; वह 'आज' की तरह आता है।

8-पर तब तक तुम्हारा मन फिर से कहीं और आगे बढ़ चुका होता है।तुम यथार्थ से तो एकात्म नहीं हो, वह जो कि पास है, वह जो यहां और अभी उपस्थित है। तुम कहीं और हो, आगे गतिमान ..आगे कूदते -फांदते!

उस कल को, उस भविष्य को ...कुछ लोग स्वर्ग कहते है,तो कुछ मोक्ष । लेकिन यह सदा भविष्य में है। कोई धन के बारे में सोच रहा है, पर वह धन भी भविष्य में ही मिलने वाला है। कोई स्वर्ग की आकांक्षा में खोया हुआ है, पर वह स्वर्ग मृत्यु के उपरांत ही आने वाला है। स्वर्ग है दूर, सुदूर किसी भविष्य में। जो नहीं है उसी के लिए तुम अपना वर्तमान खोते हो -यही है स्‍वप्‍न में जीने का अर्थ।

9-तुम अभी और यहीं नहीं हो सकते। इस क्षण में होना दु:साध्य प्रतीत

होता है।तुम अतीत में जी सकते हो, क्योंकि वह भी स्‍वप्‍नवत है : उन बातों की स्मृतिया, यादें, जो अब नहीं हैं। और या तुम भविष्य में जी सकते

हो, लेकिन वह भी एक प्रक्षेपण है। न तो अतीत अस्तित्वगत है और न भविष्य। है तो वर्तमान ही, लेकिन तुम कभी उसमें नहीं होते। यही है सपनों में जीने का अर्थ।

10-हमारे तथाकथित सत्य कुछ और नहीं, झूठ ही हैं -सुंदर झूठ.. वास्तविकता को देखने को कोई तैयार नहीं है।परन्तु यह मन योग

के पथ पर प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि योग सत्य को उद्घाटित करने की एक पद्धति है...एक विधि है ,स्‍वप्‍नविहीन मन तक पहुंचने की। योग विज्ञान है -अभी और यहां होने का।जिसका अर्थ है कि अब तुम तैयार हो कि न भविष्य की कल्पना करोगे ,न आशाएं बांधोगे।योग का अर्थ है.. सत्य का साक्षात्कार -जैसा वह है।

11-इसलिए योग के मार्ग में वही प्रवेश कर सकता है जो अपने मन से जैसा वह है, बिलकुल थक गया हो, निराश हो गया हो। यदि तुम अब भी आशा किये चले जा रहे हो कि तुम मन द्वारा कुछ न कुछ पा लोगे, तो योग का यह पथ तुम्हारे लिए नहीं है। समग्र पराजय का भाव चाहिए इस सत्य का रहस्योद्घाटन कि यह मन जो आशाओं को पक्के रखता है, यह मन जो प्रक्षेपण करता है, यह व्यर्थ है; यह निरर्थक है और यह कहीं नहीं ले जाता। यह मन तुम्हें सत्य से बचाता है,तुम्हारी आँख बंद कर देता है, तुम्हें मूर्च्छित करता है और कभी भी ''सत्य'' तुम्हें प्रगट हो सके इसका कोई मौका नहीं देता।

12-तुम्हारा मन एक नशा है। जो है ...मन उसके विरुद्ध है। इसलिए जब तक तुम अपने मन को, अपने अब तक के होने के ढंग को पूरी तरह व्यर्थ हुआ न जान लो; जब तक इस मन को तुम बेशर्त छोड़ न सको, तब तक तुम योग -मार्ग में प्रवेश नहीं कर सकते।कई व्यक्ति योग में उत्सुक होते

हैं, लेकिन बहुत कम लोग ही योग में प्रवेश कर पाते हैं। क्योंकि तुम्हारी रुचि भी मन के कारण ही बनती है। शायद तुम आशा बनाते हो कि अब योग के द्वारा तुम कुछ पा लोगे; कुछ पाने का प्रयोजन तो बना ही रहता है।

13-तुम सोचते हो कि शायद योग तुम्हें एक सम्पूर्ण योगी बना देगा; तुम आनंदपूर्ण अवस्था तक पहुंच जाओगे; तुम ब्रह्म में लीन हो जाओगे; शायद तुम्हें सच्चिदानंद—अस्तित्व, चैतन्य और परमानंद मिल जाये! और अगर यही बातें योग में रस लेने का, अभिरुचि बनाने का कारण है तो कभी भी तुम्हारा मिलन उस पथ से नहीं हो सकता, जिसे योग कहते हैं। इस मनोदशा में तो तुम इस मार्ग के पूर्णत: विरुद्ध हो; तो तुम बिलकुल ही विपरीत दिशा में चल रहे हो।

14-योग का अर्थ है कि अब कोई आशा न बची, अब कोई भविष्य न रहा, अब कोई इच्छा न बची। अब व्यक्ति तैयार है उसे जानने के लिए, जो है। अब कोई रुचि न रही इस बात में कि क्या हो सकता है, क्या होना चाहिए या कि क्या होना चाहिए था। जरा भी रस न रहा। अब केवल उसी में रस है ...जो है। क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें मुक्त कर सकता है, केवल वास्तविकता ही मुक्‍ति बन सकती है।

15-परिपूर्ण निराशा की जरूरत है। ऐसी निराशा को ही बुद्ध ने दुख कहा है। और अगर सचमुच ही तुम्हें दुख है, तो आशा मत बनाओ, क्योंकि तुम्हारी आशा दुख को और आगे बढ़ा देगी। तुम्हारी आशा एक नशा है जो तुम्‍हें और कहीं नहीं, केवल मृत्यु तक जाने में सहायक हो सकती है। तुम्हारी सारी आशाएं तुम्हें केवल मृत्यु में पहुंचा सकती है। वे तुम्हें वहीं ले ही जा रही हैं।

16-पूर्ण स्‍वप्‍न से आशा रहित हो जाओ। अगर कोई भविष्य नहीं बचता तो आशा भी नहीं बचती। बेशक यह कठिन है। सत्य का सामना करने के लिए बड़े साहस की जरूरत है। लेकिन देर—अबेर वह क्षण आता है। हर आदमी के जीवन में वह क्षण आता ही है, जब वह परिपूर्ण निराशा का अनुभव करता है। नितान्त अर्थहीनता का भाव घटित होता है उसके साथ। जब उसे बोध होता है कि वह जो कुछ कर रहा है, व्यर्थ है; जहां कहीं भी जा रहा है, कहीं पहुंच नहीं पा रहा है; कि सारा जीवन अर्थहीन है ...तब अनायास ही आशाएं गिर जाती हैं, भविष्य खो जाता है और तब पहली बार वह वर्तमान के साथ लयबद्ध होता है। तब पहली बार सत्य से आमना-सामना होता है।

17-जब तक तुम्हारे लिए यह क्षण न आये तब तक कितने ही योगासन किये चले जाओ लेकिन वह योग नहीं है। योग तो अंतस की ओर मुड़ना है। यह पूरी तरह विपरीत मुड़ना है। जब तुम भविष्य में गति नहीं कर रहे हो, जब तुम अतीत में नहीं भटक रहे हो, तब तुम अपने भीतर की ओर गतिमान होने लगते हो, क्योंकि तुम्हारा अस्तित्व अभी और यहीं है, वह भविष्य में नहीं है। तुम अभी और यहां उपस्थित हो - अब तुम यथार्थ में प्रविष्ट हो सकते हो। तब मन का इसी क्षण में उपस्थित रहना जरुरी है।