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क्या है भगवान श्री कृष्ण के 16,108 पत्नियां होने का रहस्य है?PART-02

प्रकृति रूप शरीर के नौ द्वार तथा नौ चक्र;-

04 FACTS;-

1-अस्तित्व में सभी कुछ जोड़ों में मौजूद है - स्त्री-पुरुष, दिन-रात, तर्क-भावना आदि। इस दोहरेपन को द्वैत भी कहा जाता है। हमारे अंदर इस द्वैत का अनुभव हमारी रीढ़ में बायीं और दायीं तरफ मौजूद नाड़ियों से पैदा होता है।त्रिदेव अर्धनारीश्वर है क्‍योंकि उनकी बायीं

तरफ इड़ा नाड़ी तथा दायीं तरफ पिंगला नाड़ी हैं जो पुरुष और स्त्री ऊर्जा के संश्लेष्ण का प्रतिनिधित्व करता है।इड़ा और पिंगला जीवन की बुनियादी द्वैतता की प्रतीक हैं।

2-अर्धनारीश्वर शब्द का अर्थ है ..

अर्ध – आधा, नारी – महिला, ईश्वर ..यानी की भगवान अपने आधे हिस्से मे स्त्री रूप मे है. इड़ा और पिंगला अर्थात स्त्रीऔर पुरुष ऊर्जा का संश्लेष्ण सभी सृजन का आधार है। इसलिए शिव और शक्ति एक साथ मिलकर इस ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं. अर्धनारी रूप से यह भी पता चलता है कि शक्ति का महिला सिद्धांत भगवान, शिव के पुरुष सिद्धांत से अविभाज्य है।

3-इस शरीर में नौ द्वार हैं, दो आँख, दो कान, दो नाभि का छिद्र, एक मुख इस प्रकार सिर में सात द्वार हुये (आठवाँ) गुद्दा द्वारा और नौवाँ मूत्र द्वार । सात द्वार देवताओं या दिव्य गुण युक्त, आत्माओं के ठहरने का स्थान है। इससे रहने वाले समस्त जड़ और चेतन देवता परस्पर एक दूसरे की भलाई के लिये अपने-अपने स्थान पर हर समय सतर्क व जागरुक हैं। अग्निदेव, नेत्र और जठराग्नि के रूप में; पवनदेव श्वाँस-प्रश्वाँस व दस प्राणों के रूप में; वरुण देव जिह्वा और रक्त आदि के रूप में रहते हैं। इसी प्रकार अन्य देव भी शरीर के भिन्न-2 स्थानों में निवास करते है।

4-चैतन्य देवों में आत्मा और परमात्मा का यही निवास स्थान है। ये समस्त देव इस शरीर में सद्भाव और सहयोग से प्रीतिपूर्वक वर्तते हैं। इनमें परस्पर प्रेम की गंगा बहती है, किसी को किसी से द्वेष नहीं, सबके काम बंटे हुये हैं। अपने-अपने कार्यों को सम्पादन करने में सभी सचेष्ट एवं दक्ष हैं।

क्या प्रकृति का अंतिम नवम द्वार(बिंदु चक्र) श्रीराधा (आत्मा का प्रतीक) हीं है?-

02 FACTS;-

1-नौ द्वार अर्थात नौ चक्र प्रकृति के है।तीन द्वार अधोमुखी तथा छह ऊर्ध्वमुखी हैं । मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा सत्य हैं। मृत्यु के समय हमारे कर्मों के फल केअनुसार ,किसी एक द्वार से हमारे प्राण निकलते हैं।

2-दशम/दसवाँ द्वार जिसे शून्य चक्र भी कहते हैं; परमात्मा का स्थान, ब्रह्मरंध्र है। योगी जन इसी से होकर प्राण त्यागते हैं मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी में होकर निकले और ऊर्ध्वगामी प्राप्त करे। योगशास्त्रों के अनुसार ब्रह्मसत्ता का मानव शरीर में प्रवेश सहस्रार स्थित इसी मार्ग से होता है। क्या रहस्य है आज्ञाचक्र में ?- 02 FACTS;- 1-114 चक्र में से .. 7 मुख्य चक्र, 21 माइनर चक्र और 86 सूक्ष्म (MICRO)चक्र है।114 चक्र में से दो चक्र हमारे भौतिक शरीर से बाहर रहते हैं। मुख्य 7 चक्र में से एक.. सहस्रार चक्र भौतिक शरीर से बाहर होता हैं। माइनर 21चक्र आंखें,नाक, कान,कन्धा,हाथ, घुटना ,पैर आदि में होते है। 2-सभी चक्र हर समय कार्यशील नहीं रहते हैं ; बाकी कुछ निष्क्रिय भी रहते है अर्थात उन चार चक्रो की गुप्त शक्तियाँ प्रकट नहीं होती हैं।छठवा आज्ञाचक्र को,युक्त त्रिवेणी कहते हैं। 108 कार्यशील रहते हैं बाकी चार इनके सक्रिय होने पर फलीभूत होने लगते हैं।कुंडलिनी जब चक्रों का भेदन करती है तो बाकी चार में शक्ति का संचार हो उठता है।

3-अष्ट प्रकृति अर्थात आठ चक्र ;जो पांच तत्वों 1. पृथ्वी, 2.जल , आप, 3. अग्नि, 4 वायु 5. आकाश तथा 6. मन, 7. बुद्धि, 8. अहंकार का प्रतीक है।आज्ञाचक्र में ऊर्जा के तीन स्तर है.. ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना या त्रिमूर्ति ब्रह्मा विष्णु और महेश की ऊर्जा।पहला तीन गुणों का प्रतीक है ,दूसरा उच्चतर शक्ति का प्रतीक है और तीसरी जो तीनो गुणों से परे जाती है।उन्हें विभिन्न नाम से जाना जाता है।जैसे... 3-1-आज्ञा चक्र/भृकुटि चक्र( मन का प्रतीक);- मेरुदण्ड(SPINAL CORD) पोला है । उससे अस्थि खण्डों के बीच में होता हुआ यह छिद्र नीचे से ऊपर तक चला गया है । इसी के भीतर सुषुम्ना नाड़ी विद्यमान है । मेरुदण्ड के उर्पयुक्त पाँच प्रदेश सुषुम्ना में अवस्थित पाँच चक्रों से सम्बन्धित हैं परन्तु छठे आज्ञा चक्र का स्थान मेरुदण्ड में नहीं आता । यह दोनों भवों के बीच होता है। 3-2-ललाट चक्र/कैलाश चक्र( बुद्धि का प्रतीक);- यह चक्र ललाट यानि माथे के बीच स्थित होता है।ललाट अथवा 'मस्तक' मानव शरीर में भौंहों के स्थान से लेकर सिर के केश तक तथा दाएँ कनपटी से लेकर बाएँ कनपटी तक के स्थान को कहा जाता है। यह पीनियल ग्रन्थि और तन्त्रिका तन्त्र को नियन्त्रित करता है। 3-3-रोहिणी चक्र( अहंकार का प्रतीक);-

रोहिणी चक्र के अंदर छिपा होता है ... नवम द्वार ;जहाँ पर शून्य चक्र तक पहुंचने का सरलतम मार्ग हैं ..जिसका नाम है बिन्दु चक्र । बिंदु विसर्ग को संक्षेप में ‘बिंदु’ कहा जाता है। बिन्दु का अर्थ ‘बूँद’ है। विर्ग माने ‘गिरना’। इस प्रकार बिंदु विसर्ग का तात्पर्य ‘बूँद का गिरना’ हुआ। यहाँ बिंदु का मतलब अमृत है। उच्चस्तरीय साधनाओं के दौरान जब मस्तिष्क से यह झरता है, तो ऐसी दिव्य मादकता का आभास होता है, जिसे साधारण नहीं, असाधारण कहना चाहिए। संपूर्ण मानव प्रगति काल के इतिहास में बिंदु की शक्ति अभी तक रहस्यात्मक ही बनी हुई है। इसे सृष्टि का मूल माना गया है।तंत्र में प्रत्येक बिन्दु शक्ति का केन्द्र है। यह शक्ति स्थायी चेतना के आधार की अभिव्यक्ति है। शास्त्रों में बिन्दु को वह आदिस्रोत माना गया है, जहाँ से सभी पदार्थों का प्रकटीकरण और अंततः जिसमें अभी का लय हो जाता है। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी आदि सभी उसी की निष्पत्तियाँ हैं। NOTE;-

02 POINTS;- 1-ललाट चक्र और रोहिणी चक्र( बिन्दु चक्र )की गुप्त शक्तियाँ प्रकट नहीं होती है बल्कि आज्ञाचक्र में ही छिपी रहती है ; इसीलिए आज्ञाचक्र को युक्त त्रिवेणी कहते हैं।आठवा रोहिणी चक्र ..तक प्रकृतिलय ही हैं।नवम द्वार ,बिन्दु चक्र आत्मा का का स्थान हैं ।इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव और शक्ति या श्रीकृष्ण एवं राधा का नाम देते हैं।यह सृजन से पहले की अवस्था हैं,अर्थात ब्रह्मा की ऊर्जा।श्रीराधा से मिलकर श्रीकृष्ण आत्माराम हो जाते हैं अर्थात इड़ा और पिंगला का मिलन और सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश। 2-दो चक्र हमारे भौतिक शरीर से बाहर रहते हैं।इसके अलावा सहस्रार चक्र हैं,जिसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं, तथा दूसरा हैं निर्वाण चक्र। क्या हैं सहस्रार चक्र?- 07 FACTS;- 1-सहस्रार चक्र ( आत्मा का प्रतीक) भौतिक शरीर से साढे 3 इंच ऊपर 1 हजार पंखुड़ियों का कमल है ,और अद्वैत, निर्गुण,निराकार ब्रह्म: का आसन हैं ।यह वास्तव में चक्र नहीं है बल्कि साक्षात तथा सम्पूर्ण परमात्मा और आत्मा है। 2-सहस्रार चक्र मस्तिष्क के ऊपर ब्रह्मरंध में अपस्थित 6 सेंटीमीटर व्यास के एक अध खुले हुए कमल के फूल के समान होता है। ऊपर से देखने पर इसमें कुल 972 पंखुड़ियां दिखाई देता है। इसमें नीचे 960 छोटी-छोटी पंखुड़ियां और उनके ऊपर मध्य में 12 सुनहरी पंखुड़ियां सुशोभित रहती हैं। 3-इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहते हैं। इसका चिन्ह खुला हुआ कमल का फूल है जो असीम आनन्द के केन्द्र होता है। इसमें इंद्रधनुष के सारे रंग दिखाई देते हैं लेकिन प्रमुख रंग बैंगनी होता है। इस चक्र में अ से क्ष तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। 4- पिट्यूट्री और पिनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इससे सम्बंधित है। यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाई आंख को नियंत्रित करता है।यह आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, एकीकरण,स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केन्द्र है।यह आत्मा का उच्चतम स्थान है। 5-सहस्रार का सम्बन्ध भी रीढ़ की हड्डी से सीधा नहीं है।इतने पर भी सूक्ष्म शरीर का सुषुम्ना मेरुदण्ड पाँच रीढ़ वाले और दो बिना रीढ़ वाले सभी सातों चक्रों को श्रृंखला में बाँधे हुए है।सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना में यह सातों चक्र जंजीर की कड़ियों की तरह परस्पर पूरी तरह सम्बन्ध हैं । सहस्रार चक्र मस्तिष्क के मध्य भाग में है । 6-शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है । वे धाराएँ मस्तिष्क के अगणित केन्द्रों की ओर दौड़ती हैं । इसमें से छोटी-छोटी चिनगारियाँ तरंगों के रूप में उड़ती रहती हैं।उनकी संख्या की सही गणना तो नहीं हो सकती, पर वे हैं हजारों । 7-इसलिए हजार या हजारों का उद्बोधक 'सहस्रार' शब्द प्रयोग में लाया जाता है।सहस्रार चक्र का नामकरण इसी आधार पर हुआ है सहस्र फन वाले शेषनाग की परिकल्पना का यही आधार है।यह संस्थान ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क साधने में अग्रणी है इसलिए उसे ब्रह्मरन्ध्र या ब्रह्मलोक भी कहते हैं।आज्ञाचक्र को सहस्रार का उत्पादन केन्द्र कह सकते हैं । क्या हैं निर्वाण चक्र?- 06 FACTS;- 1-सहस्रार चक्र के भीतर विद्यमान है निर्वाण चक्र जिसके भीतर निर्गुण, निराकार ब्रह्म: विराजमान है ।निर्वाण का सटीक अर्थ है- ज्ञान की प्राप्ति- जो मन (चित्त) की पहचान को खत्म करके मूल तथ्य से जुड़ाव पैदा करता है। सैद्धांतिक तौर पर निर्वाण एक ऐसे मन को कहा जाता है जो "न आ रहा है (भाव) और न जा रहा है (विभाव)" और उसने शाश्वतता की स्थिति को प्राप्त कर लिया है, जिससे "मुक्ति" (विमुक्ति) मिलती है। 2-निर्वाण शरीर (बाडीलेस बाडी)-सहस्रार सामान्य मृत्यु में केवल हमारा स्थूल शरीर ही नष्ट होता है।शेष छः शरीर बचे रहते हैं जिनसे जीवात्मा अपनी वासनानुसार अगला जन्म प्राप्त करती है किंतु महामृत्यु में सभी छः शरीर नष्ट हो जाते हैं फ़िर पुनरागमन संभव नहीं होता।इसे ही अलग-अलग पंथों में मोक्ष,निर्वाण,कैवल्य कहा जाता है।माना जाता है की मृत्यु के समय जिसका सहत्रार खुल गया उसकी मोक्ष हो जाती है |अंतिम क्रिया की कपाल क्रिया इसी केंद्र पर आधारित होती है .. 3-स्थिरता, शीतलता और शांति भी इसके अर्थ हैं। निर्वाण की प्राप्ति की तुलना अविद्या (अज्ञानता) के अंत से की जाती है। जिससे उस मन:स्थिति की इच्छा (चेतना) जागृत होती है जो जीवन चक्र (संसार) से मुक्ति दिलाती है। एक स्तर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति निर्वाण को मानसिक चेतना की तरह अनुभव करता है। 4-संसार मूलत: तृष्णा और अज्ञानता की उपज है । व्यक्ति बिना मृत्यु के भी निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है। जब निर्वाण प्राप्त कर चुके व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उस मृत्यु को मोक्ष कहते हैं, क्योंकि वह जीवन-मरण और पुनर्जन्म (संसार) के आखिरी जुड़ाव से पूर्ण रूप से छूट जाता है और उसका फिर से जन्म नहीं होता । 5-पुराण कथा के अनुसार राजा बलि का राज्य तीनों लोकों में था । भगवान् ने वामन रूप में उससे साढ़े तीन कदम भूमि की भीक्षा माँगी । बलि तैयार हो गये । तीन कदम में तीन लोक और आधे कदम में बलि का शरीर नाप कर विराट् ब्रह्म ने उस सबको अपना लिया। 6-हमारा शरीर साढ़े तीन हाथ लम्बा है ।चक्रों के जागरण में यदि उसे लघु से महान्-अण्ड से विभु कर लिया जाय तो उसकी साढ़े तीन हाथ की लम्बाई-साढ़े तीन एकड़ जमीन न रहकर लोक-लोकान्तरों तक विस्तृत हो सकती है और उस उपलब्धि की याचना करने के लिए भगवान् वामन रूप धारण करके हमारे दरवाजे पर हाथ पसारे हुए उपस्थित हो सकते हैं ।

श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा के रहस्य;-

09 FACTS;-

NOTE;-

प्रत्येक आत्मा श्रीकृष्ण हैं ।It is important not to be confused by gender. Gender references are necessary to facilitate the facts-format. If you are male – gender reference stands; if you are female – change the gender of your consorts/partners accordingly.Krishna’ is male half of your soul; 'Radha' is female half of your soul. They both exist `inside’ you. Since life-lessons will be taught by Krishna, not Radha; it is important to stay focused on the Krishna-aspect of serpentine energy. 1-Lord Vishnu divides himself into the male & female energies of Krishna & Radha respectively, into TWO divided energies of serpent (Kundalini Shakti). The energy that activates this serpent is `Love’ .

2-Radha embodies softer, passive energies; Krishna d’ opposite; Radha journey to top is quicker; Krishna’s journey more arduous.

3-Halves of serpent energy (Kundalini), travel through 16’100 secondary channels; 8 main channels; 2 primary channels; then merge into 1.

4- 16’100 secondary channels are easy traverse(पार करना); but 8 primary channels are sticky; their aim is to hold down/block the serpent (Kundalini).

5-Each of the primary 8 channels wants to hold the serpent (Kundalini) in itself; these are places where Kundalini will get “stuck”.

6-Each `wife’ depicts a specific love-energy that we can encounter in this world; often we may even be married/committed to 1 of 8.

7-Of Krishna’s 8 wives, 4 carry more importance than others, as they are stickier, trickier & more difficult to navigate.

8-Krishna & Radha will emerge as TWO twin DNA-like channels; after Krishna completes his successful journey through 16’100 + 8 channels.

9-Halves of serpent energy Kundalini (Radha & Krishna), travel through 16’100 secondary & 8 primary channels; 2 twin DNA-like channels; then merge into 1. श्री कृष्ण रासलीला काअर्थ ;- 05 FACTS;- 1-गुजरात राज्य का एक लोकप्रिय लोक नृत्य है डांडिया रास।इसकी शुरुआत श्रीकृष्ण की लीला और श्रीराधा तथा गोपियों के साथ उनके रास से मानी जाती है।‘रस शब्द से मतलब जूस या अर्क है, लेकिन वह जुनून को भी दर्शाता है। 2-गुजरात की अधिकांश लोक संस्कृति और लोकगीत हिन्दू धार्मिक साहित्य पुराण में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी किंवदंतियों की पुष्टि करती है।श्रीकृष्ण के सम्मान में किया जाने वाला रास नृत्य और रासलीला प्रसिद्ध लोकनृत्य गरबा के रूप में अब भी प्रचलित है। गरबी और गरबा;- 3-गरबा लोकनृत्य गरबी व गरबा इन दो प्रकार का है। जब पुरुष गोला बनाकर तथा खड़े होकर सामूहिक रूप से तालियां बजाकर गाते हुए नृत्य करते हैं तो उस नृत्य को गरबी कहा जाता है और जब स्त्रियां परंपरागत परिधान तथा आभूषण पहनकर नृत्य करती हैं, तो उसे गरबा कहा जाता है। कहा जाता है कि बाणासुर की पुत्री उषा ने माता पार्वती से सीखा हुआ लास्य नृत्य गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र की गोपियों को सिखाया था। 4-रासलीला के पात्रों में राधा-कृष्ण तथा गोपिकाएँ रहती है। बीच-बीच में हास्य का प्रसंग भी रहता है। विदूषक के रूप में ‘मनसुखा’ रहता है, जो विभिन्न गोपिकाओं के साथ प्रेम एंव हँसी की बातें करके श्रीकृष्ण के प्रति उनके अनुराग को व्यंजित करता है; 5- रासलीला में श्रीकृष्ण का गोपियों, सखियों के साथ अनुरागपूर्ण वृताकार नृत्य होता है। कभी श्रीकृष्ण गोपियों के कार्यों एवं चेष्टाओं का अनुकरण करते है और कभी गोपियाँ श्रीकृष्ण की रूप चेष्टादि का अनुकरण करती है और कभी श्रीराधा सखियों के, श्रीकृष्ण की रूपचेष्टाओं का अनुकरण करती है। यही लीला है। कभी श्रीकृष्ण गोपियों के हाथ में हाथ बाँधकर नाचते है इन लीलाओं की कथावस्तु प्रायः श्रीराधा-कृष्ण की प्रेम क्रीड़ाएँ होती है,जिनमें सूरदास आदि श्रीकृष्ण भक्त कवियों के भजन गाये जाते हैं। रासलीला का तात्विक अर्थ;- 07 FACTS;- 1-रासलीला में गोपियों, के साथ ,वृताकार नृत्य में श्रीकृष्ण मुख्य रूप से बीच की ,भीतरी परत में स्थिति वृत की ओर बढ़ते जाते हैं।16,100 गोपियों प्रतीकात्मक शक्ति वाहिनी नारिया (नाडिया/नसे )है जो श्रीकृष्णको सहयोग करती हैं। 8 नाडिया अष्ट प्रकृति का प्रतीक है जो श्रीकृष्ण को फँसाने का प्रयत्न करती हैं।श्री कृष्ण उनको सहयोग करते हुए,आगे बढ़ते जाते हैं । 2- श्रीराधा जो श्रीकृष्ण की आत्मा हैं, वृत के केंद्र में विराजमान रहती हैं तथा अपनी आत्मा में रमण करने के कारण ही श्रीकृष्ण आत्माराम हैं। जैसे ही श्री कृष्ण आगे बढ़ते हुए श्रीराधा के पास पहुंचते हैं तो यह ईड़ा और पिंगला का मिलन है ..सुष्म्ना की अवस्था है।श्रीराधा कृष्ण का नित्य मिलन ही श्री राधा का रहस्य है। यही बिन्दु चक्र है जहां दोनों अदृश्य हो जाते हैं ,अद्वैत, निर्गुण,निराकार ब्रह्म: के रूप में प्रवेश कर जाते हैं । 3- हमारे शरीर के मेरुदंड पर 16,108 नाड़ी हैं जिसमे सात चक्र अवस्थित हैं । इन सात उर्पयुक्त शक्तियों का उल्लेख साधना ग्रंथों में अलंकारिक रूप में हुआ है । उन्हें सात लोक, सात समुद्र, सात द्वीप, सात पर्वत, सात ऋषि आदि नामों से चित्रित किया गया है।सामान्य शक्ति धाराओं में प्रधान गिनी जाने वाली (१) गति (२) शब्द (३) ऊष्मा (४) प्रकाश (५) (Electric Fluid) संयोग (६) विद्युत (७) चुम्बक यह सात हैं । इन्हें सात चक्रों का प्रतीक ही मानना चाहिए । 4-चक्र' शक्ति संचरण के एक व्यवस्थित, सुनिश्चित क्रम को कहते हैं । वैज्ञानिक क्षेत्र में विद्युत, ध्वनि, प्रकाश सभी रूपों में शक्ति के संचार क्रम की व्याख्या चक्रों (साइकिल्स) के माध्यम से ही की जाती है । इन सभी रूपों में शक्ति का संचार, तरंगों के माध्यम से होता है । एक पूरी तरंग बनने के क्रम को एक चक्र (साइकिल) कहते हैं ।एक के बाद एक तरंग, एक के बाद एक चक्र (साइकिल) बनने का क्रम चलता रहता है और शक्ति का संचरण होता रहता है। 5-शक्ति की प्रकृति (नेचर) का निर्धारण इन्हीं चक्रों के क्रम के आधार पर किया जाता है । औद्यौगिक क्षेत्र में प्रयुक्त विद्युत के लिए अंतराष्ट्रीय नियम है कि वह 50 साइकिल्स प्रति सेकेन्ड के चक्र क्रम की होनी चाहिए । विद्युत की मोटरों एवं अन्य यंत्रों को उसी प्रकृति की बिजली के अनुरूप बनाया जाता है । इसीलिए उन पर हार्सपावर, वोल्टेज आदि के साथ 50 साइकिल्स भी लिखा रहता है । शक्ति संचरण के साथ 'चक्र' प्रक्रिया जुड़ी ही रहती है । वह चाहे स्थूल विद्युत शक्ति हो अथवा सूक्ष्म जैवीय विद्युत शक्ति । 6-नदी प्रवाह में कभी-कभी कहीं भँवर पड़ जाते हैं । उनकी शक्ति अद्भूत खो बैठती है । उनमें फँसकर नौकाएँ अपना संतुलन खो बैठती हैं और एक ही झटके में उल्टी डूबती दृष्टिगोचर होती हैं । सामान्य नदी प्रवाह की तुलना में इन भँवरों की प्रचण्डता सैकड़ों गुनी अधिक होती है । शरीरगत विद्युत प्रवाह को एक बहती हुई नदी के सदृश माना जा सकता है और उसमें जहाँ-तहाँ पाये जाने वाले चक्रों की 'भँवरों' से तुलना की जा सकती है । 7-सात चक्र ,सात भँवर के सदृश माना जा सकता है जो भगवान कृष्ण की सात अष्ट (देह) प्रकृति रूप सात पटरानियां है।उनकी शक्ति अद्भूत है परंतु श्री कृष्ण उनसे उलझते नहीं बल्कि उनको सहयोग करते हुए,आगे बढ़ते जाते हैं । प्रमुख पटरानी रुक्मिनणी अष्ट (देह) प्रकृतिरूप अंतिम भँवर हैं ,ललाट चक्र हैं; जो श्रीराधा रूप आत्मा ,अर्थात बिन्दु चक्र तक पहुंचने में सहयोग करती है ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

रासलीला विधि;-

03 FACTS;- 1-Raas Leela’ comprises a formation of concentric circles with women in inner circle & men in outer circle, facing each other. Number of circular rings will depend on number of person participating in the dance; men & women move in opposite directions. With every conclusive dance beat, you change partners; so in effect, every man dances with every woman & vice-versa. 2-Krishna starts his dance (Raas Leela) at periphery of ring of circles; dancing skillfully, he works his way through 16’100 Gopis (girls ) to reach the innermost circle of 8; here it becomes tricky & sticky;(मुश्किल एवं ख़राब स्थिति में होना ) 3-The girls are very watchful & don’t let him out of sight. Krishna can offend no-one; the lesson lies in Krishna’s cleverness; he has to please his inner-8, yet be alert enough to escape. 4-Waiting in the centre is Radha; here they (Radha & Krishna) dance till dawn oblivious to all else; then suddenly they disappear. The sudden disappearance of Radha & Krishna from centre of circle is their `Union/Merger’ into ONE. श्री कृष्ण और कुण्डलिनी का रहस्य ..दुनिया की भाषा में(In world parlance):-

22 FACTS;-

1-Kundalini Shakti (Soul Energy) is YOU yourself. 2-You (Kundalini Shakti/Soul Energy) have to successfully navigate 16’100 secondary & 8 primary channels before you reach your twin half 3-Here, 16’100 secondary channels = 16’100 people who will make a significant difference to your life, over many lifetimes. 4-Here, 8 primary channels = 8 significantly strong love-energies that you will have to successfully navigate over lifetimes. 5-You (Kundalini Shakti/Soul Energy) have to leave every channel `happy & satisfied’ before you can exit that channel (love-energy). 6-Number of lifetimes you take to navigate your 8 primary (depicted as sticky & tricky) channels, depends on your `awareness’. 7-Simply `being aware’ & `being able to recognize’ these 8 (esp. 4/8) means you have crashed through a huge barrier to enlightenment. 8-The real journey begins AFTER you meet your twin; many lifetimes with your twin will have to be dedicated to Earth-causes. 9-Once you have made significant difference to Mother Earth, along with your twin-soul, you can opt for MERGER. 10-Answer to recognizing & understanding your 8 primary channels – lies in understanding Lord Krishna’s 8 wives. In world parlance:- 11-Krishna’s “Ashta-bhaaryas”, 8 wives, are many times depicted in Indian Classical dance, as “Ashta-naikas” – 8 forms of love. 12-Amongst these primary 8 wives, energies of 4 are sticky & disruptive/हानिकारक; energies of 4 are sticky but non-disruptive. 13-Disruptive energies are advised against by astrologers, as they are not conducive(अनुकूल नहीं )to the typical Indian large family set-up. 14-Disruptive energies are not very sharing; they want their Krishna all to themselves; non-disruptive energies are easier to navigate (काबू पाना ). 15-In higher stages of soul evolution, most definitely, almost all 8 energies would have come your way, and you would have picked one. 16-Here, there’s nothing like `right choice’ or `wrong choice’. Every choice presents its challenges & takes you further in evolution. 17-It’s important to stay connected with every `energy’ that you recognize; if not as partner, then as friend, mentor, guide. Sometimes, souls in higher stages of evolution may consciously avoid, if they sense their inability to navigate well.Whatever choice a person makes, if they learn the `essence’ of an energy, they can navigate successfully without getting stuck. 18-Krishna’s twin-soul Radha is an amalgamation(मिश्रण) of the traits of all of Krishna’s 8 wives – but here, there is knowingness(सुझाव), understanding(समझ) and awareness/(जागरूकता) . Radha is not defined by the traits of 8-wives; she merely enacts them in Raas-Leela (her dance with Krishna) as a gentle reminder to mortal souls like us. 19-Objective is to teach the world various aspects of love; the ways in which love can bloom; & (as Krishna) how do you handle it, without killing it. In Krishna’s 8-wives, this experience is more detailed & is narrated from female-perspective; what `she’ (female half) feels about love. 20-The 8-wives of Krishna depict the 8 forms of love that you will come across in more advances stages of your human evolution. As you edge closer to your own `Radha/Krishna’, you will become `aware’ of the `types’ of love that have crossed/crossing your path. Invariably, they will be from amongst the 8 `types’ described as Krishna’s wives. 21-The quickest form of soul-evolution would be, to `recognize correctly’ all 8 forms of love that may have crossed your path. To understand & accept every `type’ of love; and take them through their ups & downs of life as: mentor, counselor, friend, philosopher, guide. 22-Allow them to feel your presence in their life. By doing so, you help them deal with their difficult karma. The more skillfully you `dance through this situation’ closer you will move to your `Radha/Krishna’i.e .your deity. ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

भगवान कृष्ण की अष्ट (देह) प्रकृति आठ पटरानियां अर्थात अष्ट ऊर्जा चक्र(their specific energies);-

प्रत्येक मनुष्य को जीवन में अष्ट ऊर्जाओ के प्रतीक; आठ प्रकार की प्रवृत्तियो वाले व्यक्तियो से सामना करना पड़ता है।ये परिवार के सदस्य ,मित्र,पति-पत्नी आदि लोग हो सकते है।इसके लिए उनसे उलझने के स्थान पर सामंजस्य बिठाना ही श्रेष्ठ होता है ।उच्च स्तरीय साधना में

प्रवेश करने वाले साधकों को भगवान कृष्ण की इसी विधि का प्रयोग करना

पड़ता है ... 1-श्रीरुक्मणी;-

03 POINTS;- 1-यूं तो तमाम प्रेम कहानियों में से सबसे पहले श्रीकृष्ण एवं राधाजी का नाम लिया जाता है, लेकिन श्रीकृष्ण की प्रमुख पटरानी के रूप में सबसे पहले रुक्मिनणी का नाम लिया जाता है। रुक्मिणी विदर्भ देश की राजकुमारी थीं जो कि मन ही मन भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थीं। 2-She tries to `channelize’ Krishna by being his friend, philosopher, guide & peacemaker. She is simple, pretty, modest, good listener; respects all of Krishna’s alliances, partnerships & relationships.

3-She enjoys playing role of counselor & peace-maker; Krishna uses her to counsel & maintain peace among his other wives. She is often depicted by Krishna’s side as his talking-companion; worshipped as main-consort in south-India. She is a highly recommended energy for worldly partnerships, as she offers most support to Krishna’s causes. Affirmation( प्रतिज्ञान)of Rukmini’s love: “Love is Peace” 2- सत्यभामा;-

03 POINTS;- 1-सत्यभामा राजा सत्राजित की पुत्री हैं। पौराणिक तथ्यों के अनुसार जब श्रीकृष्णो ने सत्रजित द्वारा लगाए गए प्रसेन की हत्या और स्यमंतक मणि को चुराने का आरोप गलत साबि‍त कर दिया और स्यमंतक मणि लौटा दिंया तब सत्राजिेत ने सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया। 2-She tries to `channelize’ Krishna with her tantrums(नखरे); if he doesn’t accede, she will leave. She is proud, arrogant, domineering, self-centered, opinionated; with her, Krishna must play a supportive role. She believes she has done Krishna a favour by offering him marriage; wants Krishna at her beck & call at all times.

3-Her energies can be navigated by modifying her tantrums in playfulness, yet not succumbing to them. Her energies can be navigated with flattery, as her pride succumbs easily to this. Affirmation of Satyabhaama’s love: “Love is Me”. 3- जाम्बवंती;--

03 POINTS;- 1-ऋक्षराज जाम्बवंत का नाम पुराणों में श्रीकृष्ण के संदर्भ से काफी बार सुना गया है, पटरानी जामवती उन्हीं की पुत्री थीं। कहते हैं कि स्यमंतक नामक एक मणि को लेकर श्रीकृष्णी तथा जामवंत के बीच युद्ध हुआ था।युद्ध के दौरान जब श्रीकृष्ण जामवंत पर भारी पड़ रहे थे तो कुछ ध्यान देने पर जामवंत ने जाना किे श्रीकृष्ण तो उनके आराध्य श्रीराम हैं और वह अपने ही आराध्य से युद्ध कैसे कर सकते हैं। इसके बाद जामवंत ने जामवती का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया। 2-She tries to `channelize’ Krishna with her beauty; believes beauty can reign in Krishna. She is vain, desires appreciation; confident about the power of her beauty; willing to share Krishna with others. She is exquisitely beautiful, well-groomed, well-adorned at all times; believes Krishna is attracted to her for her looks.

3-She makes special effort to showcase her beauty so she appears cut-above-others at all times. Her energies can be navigated offering her appreciation she rightfully deserves; offer her limelight along with responsibility. Her energies can be navigated by gently highlighting her inner beauty & allowing that to over-shadow her outer beauty. Affirmation of Jaambavati’s love: “Love is Beauty”. 4 -कालिंदी;-

04 POINTS;- 1-पौराणिक तथ्यों के अनुसार देवी कालिंदी ने श्रीकृष्ण को एक वरदान हेतु अपने पति के रूप में पाया था। कहते हैं कि उन्होंने कठोर तपस्या की थी जिसके पश्चात उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने सूर्य से कालिंदी का हाथ मांगा था। 2-She tries to `channelize’ Krishna with her games, nets, traps, lures; uses forbidden-love & guilt as weapons. She is sister of Yamuna; uses her sibling’s proximity to Krishna, to gain entry into his life; she lays the trap; yet appears the victim. The excitement of `trapping’ Krishna into being with her, is higher than excitement of being with Krishna.

3-She enjoys competition; creates competition; enjoys winning over competition; Krishna’s desirability with other women excites her. She enjoys catching Krishna with his guard down; lures Krishna into secret confessionals; feels empowered by others’ secrets.

4-Her energies in worldly living may mean alienation from loved ones to accommodate her; Krishna may be forced to make a `choice’. Her energies can be navigated by not empowering her negatively; by not succumbing to guilt; by `playfully’ seeing through her game. Her energies can be navigated by gently/lovingly holding your ground; Kaalindi will always need you more than you need her. Affirmation of Kaalindi’s love: “Love is a Contest”. 5-मित्रवृंदा:-

03 POINTS;- 1-भगवान श्रीकृष्णथ की तीसरी पटरानी मिूत्रवृंदा हैं जो कि उज्जैन की राजकुमारी थीं। कहते हैं कि वे अत्यंत खूबसूरत थीं जिन्हें श्रीकृष्ण ने स्वयंवर में भाग लेकर अपनी पत्नी बनाया था।

2-She tries to `channelize’ Krishna with her amiable, amicable, friendly, mischievous nature. She rarely takes offence to anything Krishna says or does; works hard to manage & harmonize Krishna’s relationships. She is Krishna’s closest confidante; her advice is usually selfless; is a perfect hostess to Krishna’s social circle.

3-She is closest confidante to Krishna’s wives also; they find her a safe haven to share their grievances. She is companionable, conversational & mischievous; usually lightens conflict with her naughtiness. Her energies can be navigated by offering her unconditional friendship; by giving her responsibility. Affirmation of Mitravrinda’s love: “Love is Friendship”. 6-रोहिणी;-

04 POINTS;- 1-पौराणिक कथा के अनुसार देवी रोहिणी गय देश के राजा ऋतुसुकृत की पुत्री थीं।रोहिणी के अलावा कुछ पौराणिक दस्तावेजों में इनका नाम भद्रा भी पाया गया है। लेकिन इनसे विवाह करने के लिए श्रीकृष्ण ने कोई संघर्ष नहीं किया था, अपितु रो‌हिणी ने स्वयं ही स्वयंवर के दौरान श्रीकृष्ण को अपना पति चुना था।

2-She tries to `channelize’ Krishna with her openness, her truths; her name itself means “blatant truth”. For her, love has to be an open book; diplomacy doesn’t cut ice with her; her conflicts center around Krishna’s cleverness. For her, whatever is open is truth; whatever is hidden is false; 3-she bares her soul & dares you to do the same. Krishna usually uses her to convey hard truths to his other wives, while he himself stays in the background. She is very blunt in her expression.

4-In worldly sense, it can create conflicts in social & family circles. Her energies can be navigated by not killing her true spirit; by appreciating her honesty; but at same time allowing her to see that truths which hurt people cannot help them much; channelize her truths into softer/gentler expressions. Her energies can be navigated by offering her a straight-forward & honest approach to love. Affirmation of Nagnajiti’s love: “Love is Truth” 7 -सत्या:-

04 POINTS;- 1-भगवान श्री कृष्ण की चौथी पटरानी का नाम सत्या है, इन्हें भी श्रीकृष्ण ने स्वयंवर में जीतकर अपनी पत्नी बनाया था। एक पौराणिक कथा के अनुसार सत्या काशी के राजा नग्नजिपत् की पुत्री थीं, जिनके विवाह की शर्त थी कि जो सात बैलों को एक साथ नाथेगा वही सत्या का पति होगा। श्रीकृष्ण ने स्वयंवर की इस शर्त को पूरा करके सत्या से विवाह किया था। 2-She tries to `channelize’ Krishna by blending into him; she is happy to be what Krishna wants her to be. She chooses not to have a defined personality; she believes individuality = division from Krishna. She is gentle, subservient, unassuming, selfless; she places herself last in priority; she believes this is love.

3-Hers is a motherly, nurturing, nourishing, forgiving; she serves not only Krishna but all of Krishna’s relationships dutifully. In a worldly sense, it is very easy to take advantage of Satya’s goodness; she’s usually the cornerstone that goes unnoticed. Her energies must be navigated with care & sensitivity; as her Krishna, it’s important to ensure she gets her due.

4-Her energies can be navigated by encouraging her to stand-up-for-herself; by encouraging self-development through interests & hobbies. Affirmation of Satya’s love: “Love is Submission”. 8-लक्ष्मणा :-

05 POINTS;- 1-लक्ष्मणा, जिन्होंने स्वयं अपने स्वयंवर