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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 22 वीं विधि (13-24 केंद्रित होने की) का विवेचन क्या है?


विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि;- 22-

13 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है: -

‘’अपने अवधान को ऐसी जगह रखो, जहां अतीत की किसी घटना को देख रहे हो और अपने शरीर को भी। रूप के वर्तमान लक्षण खो जायेगे, और तुम रूपांतरित हो जाओगे।‘’

2-यह विधि बहुत बुनियादी है और इसे बहुत प्रयोग में लाया गया है।इस विधि के अनेक प्रकार है ... प्रयोग का अपना ढंग तुम खुद खोज सकते हो। उदाहरण के लिए, रात में जब तुम सोने लगो, गहरी नींद में उतरने लगो तो पूरे दिन के अपने जीवन को याद करो। इस याद की दिशा उलटी होगी, यानी उसे सुबह से न शुरू कर वहां से शुरू करो जहां तुम हो। अभी तुम बिस्‍तर में पड़े हो तो बिस्‍तर में लेटने से शुरू कर पीछे लोटों। और इस प्रकार एक -एक कदम पीछे चलकर सुबह की उस पहली घटना पर पहु्ंचो जब तुम नींद से जागे थे अतीत स्‍मरण के इस क्रम में सतत याद रखो कि पूरी घटना से तुम पृथक हो, अछूते हो।

उदाहरण के लिए, पिछले पहर तुम्‍हारा किसी ने अपमान किया था; तुम अपने रूप को अपमानित होते देखो, लेकिन द्रष्‍टा बने रहो। तुम्‍हें उस घटना में फिर नहीं उलझना है, क्रोध नहीं करना है। अगर तुमने क्रोध किया तो तादात्‍म्‍य पैदा हो गया। तब ध्‍यान का बिंदु तुम्‍हारे हाथ से छूट गया।

3-तुम अपने अतीत को याद कर रहे हो। चाहे वह कोई भी घटना हो; तुम्‍हारा बचपन,: ' तुम्हारी माता का प्रेम, या पिता की मृत्‍यु, कुछ भी हो सकता है तो उसे देखो। लेकिन उससे Identify/एकात्‍म मत होओ। उसे ऐसे देखो जैसे वह किसी और के जीवन में घटा है या वह घटना पर्दे पर फिर घट रही हो, फिल्‍माई जा रही हो, और तुम उसे देख रहे हो ..उससे अलग, तटस्‍थ साक्षी की तरह।उस फिल्‍म में, कथा में ,तुम्‍हारा बीता हुआ रूप फिर से उभर जाएगा।यदि तुम अपनी बचपन की कोई घटना

स्‍मरण कर रहे हो, जैसे अपने चलने की पहली घटना.. तो तुम अपनी माता के साथ स्‍मृति के पर्दे पर प्रकट होओगे और तुम्‍हारा अतीत का रूप माता के साथ उभर आएगा। अन्‍यथा तुम उसे याद न कर सकोगे। अपने इस अतीत के रूप से भी तादात्‍म्‍य हटा लो। यदि कोई तुम्‍हें अपमानित कर रहा है तो क्रोध मत करो। वह अभी तुम्‍हें अपमानित नहीं कर रहा है बल्कि तुम्‍हारे पिछले पहर के रूप को अपमानित कर रहा है ;वह रूप अब नहीं है।पूरी घटना को ऐसे देखो मानो पूरी कथा से तुम्‍हारा कुछ लेना-देना नहीं है।तुम महज दृष्‍टा हो।

4-तुम तो एक बहती नदी की तरह हो जिसमें तुम्‍हारे रूप भी बह रहे है। बचपन में तुम्‍हारा एक रूप था, अब वह

नहीं रहा। वह जा चुका। नदी की भांति तुम निरंतर बदलते जा रहे हो।रात में ध्‍यान करते हुए जब दिन की घटनाओं को उलटे क्रम में, प्रतिक्रम में याद करो तो ध्‍यान रहे कि तुम साक्षी हो, कर्ता नहीं।इसलिए क्रोध मत करो। वैसे ही जब तुम्‍हारी कोई प्रशंसा करे तो आह्लादित मत होओ। फिल्‍म की तरह उसे भी उदासीन होकर देखो।Retrogression/प्रतिक्रमण बहुत उपयोगी है, खासकर उनके लिए जिन्‍हें अनिद्रा की तकलीफ हो।अगर तुम्‍हें ठीक से नींद नहीं आती ... अनिद्रा का रोग है तो यह प्रयोग तुम्‍हें बहुत सहयोगी होगा।क्‍योंकि यह मन को खोलने का, Knotless करने का उपाय है। इसलिए रात में फिर उन्‍हें

लौटकर देखो—प्रतिक्रम में।और इस प्रक्रिया में जब तुम सुबह बिस्‍तर से जागते की पहली घटना तक पहुंचोगे तो तुम्‍हारा मन फिर से उतना ही ताजा हो जाएगा। जितना ताजा बह सुबह था। और तब तुम्‍हें वैसी नींद आएगी जैसी छोटे बच्‍चे को आती है।

5-तुम इस विधि को अपने पूरे अतीत जीवन में जाने के लिए भी उपयोग कर सकते हो। महावीर ने प्रतिक्रमण की इस विधि का बहुत उपयोग किया।जब तुम पीछे लौटते हो तो मन की तहें उघड़ने लगती है।दिन भर में मन पर अनेक विचारों

और घटनाओं के संस्‍कार जब जाते है;तो मन उनसे बोझिल हो जाता है। अधूरे और अपूर्ण संस्‍कार मन में झूलते रहते है। क्‍योंकि उनके घटित होते समय उन्‍हें देखने का मौका नहीं मिला था।मनोविज्ञान मानव मन को तीन भागो में

विभाजित ˈकरता है ..1) चेतना (Consciousness ), 2)अवचेतन (Sub Consciousness ) और 3)तथा सोमैटिक दिमाग: Somatic Brain... relating to the body ।मनोविज्ञान के अनुसार सभी रोगों का कारण अतीत की घटनाओं का हैंगओवर है।बहुत व्यक्ति मानसिक रोग से ग्रसित है परंतु यदि किसी को बताया जाये कि तुम्‍हारा रोग मानसिक मालूम

होता है तो उससे बात बनने की बजाएं बिगड़ती है।यह सुनकर कि मेरा रोग मानसिक है; किसी भी व्‍यक्‍ति को बुरा लगता है। तब उसे लगता है कि अब कोई उपाय नहीं है और वह बहुत असहाय महसूस करता है।

6-प्रतिक्रमण (going backwards) एक चमत्‍कारिक विधि है। अगर तुम पीछे लौटकर अपने मन की गाँठें खोलों तो तुम धीरे-धीरे उस पहले क्षण को पकड़ सकते हो जब यह रोग शुरू हुआ था। उस क्षण को पकड़कर तुम पता चलेगा कि यह रोग अनेक मानसिक घटनाओं और कारणों से निर्मित हुआ है। प्रतिक्रमण से वे कारण फिर से प्रकट हो जाते है। तब तुम्‍हें कुछ करना नहीं है। सिर्फ उन मनोवैज्ञानिक कारणों को बोध में ले आना है। इस प्रतिक्रमण से अनेक रोगों की ग्रंथियां टूट जाती है और अंतत: रोग विदा हो जाता है। जिन ग्रंथियों को तुम जान लेते हो वे ग्रंथियां विसर्जित हो जाती है और उनसे बने रोग समाप्‍त हो जाते है।यह विधि Deep Exhale की विधि है। अगर तुम इसे रोज कर सको तो तुम्‍हें एक नया स्‍वास्‍थ और एक नई ताजगी का अनुभव होगा। और अगर हम अपने बच्‍चों को रोज इसका प्रयोग करना सिखा दें तो उन्‍हें उनका अतीत कभी बोझल नहीं बना सकेगा।वे सदा स्‍वच्‍छ और ताजा रहेंगे और वर्तमान में रहेंगे।

7-तुम इसे रोज कर सकते हो। पूरे दिन को इस तरह उलटे क्रम से पुन: खोलकर देख लेने से तुम्‍हें नई अंतर्दृष्टि प्राप्‍त होती है। तुम्‍हारा मन तो चाहेगा कि यादों को सिलसिला सुबह से शुरू करें। लेकिन उससे मन Knotless नहीं होता। उलटे पूरी चीज दुहरा कर और मजबूत हो जाती है। इसलिए सुबह से शुरू करना गलत होगा।ऐसे अनेक तथाकथित गुरु है जो

सिखाते है कि पूरे दिन का पुनरावलोकन करो और इस प्रक्रिया को सुबह से शुरू करो। लेकिन यह गलत और नुकसानदेह है। उससे मन मजबूत होगा और अतीत का जाल बड़ा और गहरा हो जाएगा। इसलिए सुबह से शाम 'की तरफ कभी मत चलो, सदा पीछे की और गति करो। और तभी तुम मन को पूरी तरह Knotless कर पाओगे... खाली और स्‍वच्‍छ कर पाओगे।

मन तो सुबह से शुरू करना चाहेगा। क्‍योंकि वह आसान है। मन उस क्रम को भलीभाँति जानता है। उसमें कोई अड़चन नहीं है। वह गलत है, वैसा मत करो। सजग हो जाओ और प्रतिक्रम से चलो।

8-इसमें मन को प्रशिक्षित करने के लिए अन्य उपाय भी काम में लाए जा सकते है। सौ से पीछे की तरफ/ Backwardsगिनना शुरू करो—निन्यानवे, अट्ठानवे, सत्तानवे...प्रतिक्रम से सौ से एक तक गिनो। इसमे भी अड़चन होगी। क्‍योंकि मन की आदत है एक से सौ कि और जाने की है। सौ से एक की और जाने की नहीं।लेकिन यह कठिन है; इसलिए अतीत से शुरू करो। इसी

क्रम में घटनाओं को पीछे लौटकर स्‍मरण करना है। किसी ने बीस साल पहले तुम्‍हें अपमानित किया था, उसमें तात्‍कालिकता का भाव अब कैसे होगा। वह आदमी मर चुका होगा और बात समाप्‍त हो गई है। यह अतीत से याद की हुई एक मुर्दा घटना है। उसके प्रति जागरूक होना आसान है।इससे पीछे लौटते हुए मन को फिर से खोलकर देखते हुए तुम साक्षी हो जाओगे और

वे घटनाएं मन के पर्दे पर घटित हो रही है।अगर इस ध्‍यान को रोज जारी रखो तो समय में पीछे लौटकर जीवन की सभी

घटनाओं को देखा जा सकता है,उनका गवाह हुआ जा सकता है।कोई तुम्‍हारा अपमान कर रहा है तो तुम अपने को घटना से पृथक कर सकते हो। तुम यह भी देख सकते हो कि तुम अपने शरीर से, अपने मन से और उससे भी जो अपमानित हुआ है; पृथक हो।और अगर तुम ऐसे गवाह हो सको तो फिर तुम्‍हें क्रोध आना असंभव हो जायेगा।क्रोध का अर्थ तादात्‍म्‍य (identification) है। क्रोध तो तब संभव होता है जब तुम तादात्‍म्‍य करते हो अन्यथा क्रोध असंभव है।

9-यह विधि कहती है कि अतीत की किसी घटना को देखो, उसमें तुम्‍हारा रूप उपस्‍थित होगा। यह सूत्र तुम्‍हारी नहीं, तुम्‍हारे रूप की बात करता है।सदा किसी घटना में तुम्‍हारा रूप उलझता है ...तुम उसमे नहीं होते। जब तुम किसी को अपमानित करते हो तो सच में तुम उसे अपमानित नहीं करते बल्कि उसके रूप का अपमान करते हो।यही कारण है कि हिंदू धर्म नाम

रूप से अपने को पृथक करने की बात पर जोर देता है। तुम तुम्‍हारा नाम रूप नहीं हो, तुम वह चैतन्‍य हो जो नाम रूप को जानता है और चैतन्‍य सर्वथा पृथक है।इसीलिए सूत्र कहता है कि अतीत से आरंभ करो। अपने ही रूप को अपने से

अलग देखो और उसके द्वारा रूपांतरित हो जाओ।क्‍योंकि यह निर्ग्रंथन(unwinding) है ...एक गहरी सफाई है।

और तब तुम जानोंगे कि उस समय में जो तुम्‍हारा शरीर है, तुम्‍हारा मन है, अस्‍तित्‍व है, वह तुम्‍हारा वास्‍तविक यथार्थ नहीं है। सार-सत्‍य सर्वथा भिन्‍न है।पूरा जीवन गुजर जाता है..तुम अस्‍पर्शित, निर्दोष रहते हो।शुभ और अशुभ, सफलता और विफलता, प्रशंसा और निंदा, रोग और स्‍वास्‍थ्‍य, जवानी और बुढ़ापा, जन्‍म और मृत्‍यु, सब कुछ व्‍यतीत हो जाता है... और तुम अछूते रहते हो।

10-लेकिन इस विधि के द्वारा अस्‍पर्शित सत्‍य को जाना जा सकता है।अपने अतीत से आरंभ करो या भविष्‍य को देखो,

इसका वही उपयोग है। लेकिन भविष्‍य को देखना भी कठिन है।सिर्फ कवियों और कल्‍पनाशील लोग भविष्‍य को ऐसे देख सकते है जैसे वे किसी यथार्थ को देखते है।इसीलिए सामान्‍यत: अतीत को उपयोग में लाना अच्‍छा है।Youngsters लोगों के लिए भविष्‍य में झांकना सरल है, क्‍योंकि वे भविष्‍योन्‍मुख होते है।बूढे लोगों के लिए मृत्‍यु के सिवाय कोई भविष्‍य नहीं है। इसीलिए वे सदा अतीत के संबंध में विचार करते है और पुन:-पुन: अपने अतीत की स्‍मृति में घूमते रहते है।लेकिन वे भी वही भूल करते है अथार्त अतीत से शुरू कर वर्तमान की ओर आते है जबकि उन्‍हें प्रतिक्रमण करना चाहिए।अगर वे बार-बार

अतीत में प्रतिक्रम से लौट सकें तो धीरे-धीरे उन्‍हें महसूस होगा कि उनका सारा अतीत बह गया।अगर वे अतीत को अपने से चिपकने न दे , न अटके ,तब तुम सजग, पूरे बोध में, पूरे होश में मरोगे।और तब मृत्‍यु तुम्‍हारे लिए मृत्‍यु नहीं बल्‍कि वह अमृत के साथ मिलन में बदल जाएगी।

11-अपनी पूरी चेतना को अतीत के बोझ से मुक्‍त कर दो। उसके मैल को निकालकर उसे शुद्ध कर दो और तब तुम्‍हारा

जीवन रूपांतरित हो जाएगा।यह उपाय कठिन नहीं है ;सिर्फ सतत चेष्टा की जरूरत है और तुम आज से ही इसे शुरू कर सकते हो।अपने बिस्‍तर में लेट कर शुरू करो, और तुम बहुत सुंदर और आनंदित अनुभव करोगे।लेकिन जल्‍दबाजी मत करो।धीरे-धीर पूरे क्रम से गुजरों, ताकि कुछ भी दृष्‍टि से चूके नहीं। यह एक आश्चर्यजनक अनुभव है।क्‍योंकि अनेक ऐसी चीजें तुम्‍हारी निगाह के सामने आएँगी, जिन्‍हें दिन में बहुत व्‍यस्‍त रहने के कारण तुम चूक जाते हो, लेकिन तुम्‍हारी बेहोशी में भी

मन उनको ग्रहण करता जाता है।तुम सड़क पर जा रहे हो और कोई गा रहा था। हो सकता है कि तुमने उसके गीत पर कोई ध्‍यान नहीं दिया हो। तुम्‍हें यह भी बोध न हुआ हो कि तुमने उसकी आवाज भी सुनी। लेकिन तुम्‍हारे मन ने उसके गीत को भी सुना और अपने भीतर स्‍मृति में रख लिया था अब वह गीत तुम्‍हें पकड़े रहेगा। वह तुम्‍हारी चेतना पर अनावश्‍यक बोझ बना रहेगा।

12-तो पीछे लौट कर देखो, लेकिन बहुत धीरे-धीरे उसमे गति करो। ऐसा समझो कि पर्दे पर बहुत धीमी गति से कोई फिल्‍म दिखायी जा रही है। ऐसे ही अपने बीते दिन की छोटी से छोटी घटना को गौर से देखो, उसकी गहराई में जाओ। और तब तुम पाओगे कि तुम्‍हारा दिन सचमुच बहुत बड़ा था। क्‍योंकि मन को उसमे अनगिनत सूचनाएं मिली और मन ने

सबको इकट्ठा कर लिया।तो धीरे-धीरे प्रतिक्रमण करो और तुम उस सबको जानने में सक्षम हो जाओगे।वह रिकार्डर जैसा है। और तुम जैसे-जैसे पीछे जाओगे टेप साफ होता जाएगा। और जब तक तुम सुबह की घटना के पास पहुंचोगे तुम्‍हें नींद आ जाएगी।और तब तुम्‍हारी नींद की गुणवता अलग होगी।वह नींद भी ध्यान पूर्ण होगी।

13-और दूसरे दिन सुबह नींद से जागने पर अपनी आंखों को तुरंत मत खोलों। एक बार फिर रात की घटनाओं में प्रतिक्रम से लोटों। आरंभ में यह कठिन होगा। शुरू में बहुत थोड़ी गति होगी। कभी कोई उस स्‍वप्‍न का अंश जिसे ठीक जागने के पहले तुम देख रहे थे ,दिखाई पड़ेगा। लेकिन धीरे-धीरे तुम्‍हें ज्‍यादा बातें स्‍मरण आने लगेंगी। तुम गहरे प्रवेश करने लगोंगे। और तीन महीने के बाद तुम समय के उस छोर पर पहूंच जाओगे। जब तुम्‍हें नींद लगी थी और तुम सो गए थे।

अगर तुम अपनी नींद में प्रतिक्रम से गहरे उतर सके तो तुम्‍हारी नींद और जागरण की गुणवता बिलकुल बदल जाएगी। तब तुम्‍हें सपने नहीं आएँगे, तब सपने व्‍यर्थ हो जायेंगे।जब तुम दिन और रात दोनों में प्रतिक्रमण कर सके तो फिर सपनों की जरूरत नहीं रहेगी।

क्या स्वप्न मन को फिर से खोलने, खाली करने की प्रक्रिया है?

12 FACTS;-

1- मनोवैज्ञानिक कहते है कि सपना भी मन को फिर से खोलने, खाली करने की प्रक्रिया है। और अगर तुम स्‍वयं यह काम प्रतिक्रमण के द्वारा कर लो तो स्‍वप्‍न देखने जरूरत ही नहीं रहेगी। सपना इतना ही तो करता है कि जो कुछ मन में अटका है। अधूरा पडा था, अपूर्ण था, उसे वह पूरा कर देता है।उदाहरण के लिए तुम सड़क से गुजर रहे थे और तुमने एक

सुंदर मकान देखा और तुम्‍हारे भीतर उस मकान को पाने की सूक्ष्‍म वासना पैदा हो गई। लेकिन उस समय तुम दफ्तर जा रहे थे। और तुम्‍हारे पास दिवा-स्‍वप्‍न देखने का समय नहीं था। तुम उस कामना को टाल गये। तुम्‍हें यह पता भी नहीं चला कि मन ने मकान को पाने की कामना निर्मित कर ली है। लेकिन यह कामना अब भी मन के किसी कोने में अटकी पड़ी है। और अगर तुमने उसे वहां से नहीं हटाया तो वह तुम्‍हारी नींद मुश्‍किल कर देगी।

2-नींद की कठिनाई यही बताती है कि तुम्‍हारा दिन अभी भी तुम पर हावी है और तुम उससे मुक्‍त नहीं हो पा रहे हो। तब रात में तुम स्‍वप्‍न देखेंगे कि तुम उस मकान के मालिक हो गए हो, और अब तुम उस मकान में वास कर रहे हो। और जिस क्षण यह स्‍वप्‍न घटित होता है। क्‍योंकि सपने तुम्‍हारी अधूरी चीजों को पूरा करने में सहयोगी होते है।और ऐसी चीजें है जो पूरी

नहीं हो सकती। तुम्‍हारा मन अनर्गल कामनाए किए जाता है। वे यथार्थ में पूरी नहीं हो सकती।वे अधूरी कामनाए तुम्‍हारे भीतर बनी रहती है।

3-तो क्‍या करना चाहिए ? वास्तव में, स्‍वप्‍न यहां तुम्‍हारी सहायता करता है। स्‍वप्‍न में तुम अधूरी कामनाए को पा सकते हो। और तब तुम्‍हारा मन हलका हो जाएगा। जहां तक मन का संबंध है, स्‍वप्‍न और यथार्थ में कोई फर्क नहीं है। मन के तल पर

अगर फर्क है तो इतना ही कि स्‍वप्‍न यथार्थ से ज्‍यादा सुंदर होगा।स्‍वप्‍न तुम्‍हारा है और उसमे तुम जो चाहे कर सकते हो।वहां कोई दूसरा तो है ही नहीं, तुम ही हो ।वहां कोई अड़चन नहीं है। तुम जो चाहो कर सकते हो, मन के लिए कोई भेद नहीं है। मन स्‍वप्‍न और यथार्थ में कोई भेद नहीं कर सकता है।

4-उदाहरण के लिए तुम्‍हें यदि एक साल के लिए बेहोश करके रख दिया जाए और उस बेहोशी मे तुम सपने देखते रहो। तो एक साल तक तुम्‍हें बिलकुल पता नहीं चलेगा कि जो भी तुम देख रहे हो वह सपना है। सब यथार्थ जैसा लगेगा और स्‍वप्‍न साल भर चलता रहेगा। मनोवैज्ञानिक कहते है कि अगर किसी व्‍यक्‍ति को सौ साल के लिए कोमा में रख दिया जाए तो वह सौ साल तक सपने देखता रहेगा। और उसे क्षण भर के लिए भी संदेह नहीं होगा कि जो मैं कर रहा हूं वह स्‍वप्‍न है। और यदि कोमा में ही मर जाएगा तो उसे कभी पता नहीं चलेगा कि मेरा जीवन एक स्‍वप्‍न था। सच नहीं था।

5-मन के लिए सत्‍य और स्‍वप्‍न दोनों समान है। इसलिए मन अपने को सपनों में भी निर्ग्रंथ कर सकता है। अगर इस विधि का प्रयोग करो तो सपना देखने की जरूरत नहीं है। तब तुम्‍हारी नींद की गुणवता ही पूरी तरह से बदल जायेगी। क्‍योंकि सपनों की अनुपस्‍थिति में तुम अपने अस्‍तित्‍व की आत्‍यंतिक गहराई में उतर सकोगे। और तब नींद में भी तुम्‍हारा बोध कायम रहेगा।

श्रीकृष्‍ण गीता में यही बात कह रहे है कि जब सभी गहरी नींद में होते है तो योगी जागता रहता है। इसका यह अर्थ नहीं कि योगी नहीं सोता। योगी भी सोता है। लेकिन उसकी नींद का गुणधर्म भिन्‍न है। तुम्‍हारी नींद ऐसी है जैसे नशे की बेहोशी होती है। योगी की नींद प्रगाढ़ विश्राम है। जिसमे कोई बेहोशी नहीं रहती है। उसका सारा शरीर विश्राम में होता है। एक-एक कोश विश्राम में होता है। वहां जरा भी तनाव नहीं रहता। और बड़ी बात कि योगी अपनी नींद के प्रति जागरूक रहता है।

6-इस विधि का प्रयोग करो। आज रात से ही प्रयोग शुरू करो। और फिर सुबह भी इसका प्रयोग करना। एक सप्‍ताह में तुम्‍हें मालूम होगा कि तुम विधि से परिचित हो गए हो। एक सप्‍ताह के बाद अपने अतीत पर प्रयोग करो। बीच में एक दिन की छुट्टी

रख सकते हो। किसी एकांत स्‍थान में चले जाओ।अच्‍छा हो कि उपवास करो ...उपवास और मौन। एकांत समुद्र तट पर या किसी झाड़ के नीचे लेटे रहो, वहां से, उसी बिंदु से अपने अतीत में प्रवेश करो। अगर तुम समुद्र तट पर लेटे हो तो रेत को अनुभव करो। धूप को अनुभव करो और तब पीछे की और सरको.. और सरकते चले जाओ। अतीत में गहरे उतरते चले जाओ। देखो कि कौन सी आखिर बात स्‍मरण आती है।

7-तुम्‍हें आश्‍चर्य होगा कि सामान्‍यत: तुम बहुत कुछ स्‍मरण नहीं कर सकते हो। सामान्‍यत: अपनी चार या पाँच वर्ष की उम्र के आगे नहीं जा सकोगे। जिनकी याददाश्‍त बहुत अच्‍छी है वे तीन वर्ष की सीमा तक जा सकते है। उसके बाद अचानक एक अवरोध मिलेगा। जिसके आगे सब कुछ अँधेरा मिलेगा। लेकिन अगर तुम इस विधि का प्रयोग करते रहे तो धीरे-धीरे यह अवरोध टूट जाएगा। तुम अपने जन्‍म के प्रथम दिन को भी याद कर पाओगे।और वह एक बड़ा रहस्योद्घाटन होगा। तब धूप,

बालू और सागर तट पर लौटकर तुम एक दूसरे ही आदमी होगें।

8-यदि तुम श्रम करो तो तुम गर्भ तक जा सकते हो। तुम्‍हारे पास मां के पेट की स्‍मृतियां है। मां के साथ नौ महीने होने की बातें भी तुम्‍हें याद है। तुम्‍हारे मन में उन नौ महीनों की कथा भी लिखी है। जब तुम्‍हारी मां दुःखी हुई थी तो तुमने उसको भी मन में लिख लिया था। क्‍योंकि मां के दुःखी होने से तुम भी दुःखी हुये थे। तुम अपनी मां के साथ इतने जुडे ,संयुक्‍त थे कि जो कुछ तुम्‍हारी मां को होता था वह तुम्‍हें भी होता था। जब वह क्रोध करती थी तो तुम भी क्रोध करते थे। जब वह खुश थी तो तुम भी खुश थे। जब कोई उसकी प्रशंसा करता था तो तुम भी प्रशंसित होते थे। और जब वह बीमार होती थी तो उसकी पीड़ा से तुम भी पीडित होते थे।

9-यदि तुम गर्भ की स्‍मृति में प्रवेश कर सको तो समझो कि तुम और गहरे उतर सकते हो। तब तुम उस क्षण को भी याद कर सकते हो जब तुमने मां के गर्भ में प्रवेश किया था। इसी जाति स्‍मरण के कारण महावीर और बुद्ध कह सके कि पूर्वजन्‍म है और

पुनर्जन्‍म कोई सिद्धांत नहीं है .. वह एक गहन अनुभव है।और अगर तुम उस क्षण की स्‍मृति को पकड़ सको, जब तुमने मां के गर्भ में प्रवेश किया था तो तुम उससे भी आगे जा सकते हो। तुम अपने पूर्व जीवन की मृत्‍यु को भी याद कर सकते हो और एक बार तुमने उस बिंदू को छू लिया तो समझो कि विधि तुम्‍हारे हाथ लग गई। तब तुम आसानी से अपने सभी पूर्व जन्‍मों में गति कर सकते हो।

10-यह एक अनुभव है, और इसके परिणाम आश्‍चर्यजनक है। जब तुम्‍हें पता चलता है कि तुम जन्‍मों –जन्‍मों से उसी व्‍यर्थता को जी रहे हो। जो अभी तुम्‍हारे जीवन में है। एक ही मूढ़ता को तुम जन्‍मों-जन्‍मों में दुहराते रहे हो। भीतरी ढंग ढांचा वही है। सिर्फ ऊपर-ऊपर थोड़ा फर्क है। अभी तुम इस पुरुष /स्‍त्री के प्रेम में हो, कल किसी अन्‍य पुरुष/ स्‍त्री के प्रेम मैं थे। कल तुमने धन बटोरा था, आज भी धन बटोर रहे हो। फर्क इतना है कि कल के सिक्‍के और थे आज के सिक्‍के और है। लेकिन सारा ढांचा वही है, जो पुनरावृत्त होता रहा है।

11-और एक बार तुम देख लो कि जन्‍मों–जन्‍मों से एक ही तरह की मूढ़ता एक दुस्चक्र की भांति घूमती रही है। तो अचानक तुम जाग जाओगे। और तुम्‍हारा पूरा अतीत स्‍वप्‍न से ज्‍यादा नहीं रहेगा। तब वर्तमान सहित सब कुछ स्‍वप्‍न जैसा लगेगा। तब तुम उससे सर्वथा टूट जाओगे। और अब नहीं चाहोगे कि भविष्‍य में फिर से मूढ़ता दोहरे। तब वासना समाप्‍त हो जाएगी। क्‍योंकि वासना भविष्‍य में अतीत का प्रक्षेपण है। उससे अधिक कुछ नहीं है। तुम्‍हारा अतीत का अनुभव भविष्‍य में दुहराना चाहता है और वही तुम्‍हारी कामना है।

12-पुराने अनुभव को फिर से भोगने की चाह ही कामना है। और जब तक तुम इस पूरी प्रक्रिया के प्रति होश पूर्ण नहीं होते हो तब तक वासना से मुक्‍त नहीं हो सकते। तुम्‍हारा समस्‍त अतीत चट्टान की एक अवरोध बनकर तुम्‍हारे सिर पर सवार है और वही तुम्‍हें, तुम्‍हारे भविष्‍य की और “धक्का दे रहा है। अतीत कामना को जन्‍म देकर उसे भविष्‍य में प्रक्षेपित करता है।

अगर तुम अपने अतीत को स्‍वप्‍न की तरह जान जाओ तो सभी कामनाए भुने हुए चने की तरह हो जाएंगी जिनसे अंकुर नहीं फूटता और कामनाओं के गिरते ही भविष्‍य समाप्‍त हो जाता है। और इस अतीत और भविष्‍य की समाप्‍ति के साथ तुम रूपांतरित हो जाते हो।

...SHIVOHAM....