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मिलिए एक अनूठे संत से जिनका नाम था – गुरजिएफ


गुरजिएफ एक शानदार गुरु थे, लेकिन उन्हें हमेशा एक बदमाश संत के रूप में जाना गया। बदमाश, लेकिन संत। उनके तौर-तरीके बड़े उग्र थे और लोगों के साथ उन्होंने कई पागलपन भरे काम किए, लोगों के साथ कई चालें चलीं जिन्हें बर्दाश्त करना काफी मुश्किल था। सद्‌गुरु सुना रहे हैं गुरजिएफ की कहानी।

इंग्लैंड में उनकी अच्छी खासी पैठ थी। जब वह बोलते थे तो लोग उन्हें सुनना चाहते थे। अगर किसी शाम छह बजे गुरजिएफ बोलने वाले होते तो लंदन के किसी बड़े से हॉल में पांच सौ लोग इकट्ठे हो जाते। अगर कोई एक मिनट की देरी से भी आता, तो उसे दरवाजे बंद मिलते। तो लोग शाम के ठीक छह बजे आ जाते और इंतजार करने लगते। साढ़े छह, सात, आठ, नौ बज जाते। लोग इंतजार करते रहते। हर थोड़ी देर बाद गुरजिएफ के शिष्य आते और कहते कि वह बस आ ही रहे हैं। इस तरह लोग दस बजे तक इंतजार करते रहते।

दस बजे अचानक शिष्य आते और बोलते कि गुरजिएफ आज नहीं बोलेंगे। आज रात बारह बजे वह किसी दूसरे शहर में बोलने जा रहे हैं, जो यहां से सौ किलोमीटर दूर है। ऐसे में उन पांच सौ लोगों में से करीब पचास लोग उस दूसरे शहर के लिए निकल पड़ते और बाकी लोग थक कर घर लौट जाते। दूसरे शहर में भी ये पचास लोग सुबह तक इंतजार करते रहते। सुबह-सुबह फिर शिष्य आ कर बताते कि गुरजिएफ यहां नहीं बोलेंगे। वह दोपहर बारह बजे किसी दूसरे स्थान पर बोलने जा रहे हैं। अब पचास में से केवल पांच लोग वहां पहुंचते। अंत में गुरजिएफ उनके सामने आते और बोलते- अब ठीक है। मैं बस इन्हीं पांच लोगों से बात करना चाहता था। बाकी सभी लोग मनोरंजन के लिए आए थे। अच्छा है कि वे लोग यहां से चले गए। फिर वे उन पांच लोगों से बातचीत करते।

जर्मनी में उन्होंने एक आश्रम खोला, जिसे कैंप के रूप में जाना जाता था। यूरोपीय समाज के उच्च वर्ग के लोग इन कैंपों में आए। ये वो लोग होते थे जिन्होंने अपने जीवन में कभी काम नहीं किया था। इन लोगों को वहां फावड़े, कुल्हाड़ी दे दिए जाते और फिर गुरजिएफ उनसे कहते - "आज आपको यहां खाई खोदनी है, पूरा जोर लगाकर, दोपहर के भोजन के लिए भी आपको रुकना नहीं है।" सभी लोग खुदाई चालू कर देते, क्योंकि अगर गुरु जी कुछ कह रहे हैं तो उसका कुछ न कुछ मतलब होगा। शाम होते होते वे सभी थककर चूर हो जाते। उनके शरीर में दर्द होने लगता। गुरजिएफ जब देखते कि वे लोग अब और नहीं सह सकते तो कहते, 'अच्छा चलो, थोड़ा और खोदो और फिर गड्ढे को भर कर आ जाओ।' लोग पागल हो जाते। तब तक करीब नब्बे फीसदी लोग तो अपनी गाड़ियों से वहां से निकल लेते। इसके बाद गुरजिएफ बचे हुए दस फीसदी लोगों के साथ अपना वास्तविक काम शुरू करते.

एक व्यक्ति जिसने गुरजिएफ को मशहूर बना दिया, उसका नाम था ओसपिंस्की। आप हमेशा यह पाएंगे कि ज्यादातर ज्ञानी लोगों के भीतर इतनी क्षमता नहीं होती कि वे अपने आप ही मशहूर हो जाएं। अपने संदेश के प्रचार प्रसार के लिए उन्हें एक अच्छे शिष्य की जरूरत होती है, क्योंकि हो सकता है कि दुनिया के तौर-तरीकों से बखूबी निबटने में वे माहिर न हो। आज हर कोई रामकृष्ण परमहंस के बारे में बात कर रहा है। अगर विवेकानंद न होते तो रामकृष्ण कहीं खो गए होते। उन्हें भुला दिया गया होता। तो गुरजिएफ को ओसपिंस्की मिल गया। ओसपिंस्की अपने आप में काफी मशहूर था। वह एक महान दार्शनिक, गणितज्ञ और बड़ा बुद्धिजीवी था। उसने सत्य पर एक किताब लिखी, जो सत्रह सौ से भी ज्यादा पृष्ठों की थी।

गुरजिएफ जब देखते कि वे लोग अब और नहीं सह सकते तो कहते, 'अच्छा चलो, थोड़ा और खोदो और फिर गड्ढे को भर कर आ जाओ।' लोग पागल हो जाते। तब तक करीब नब्बे फीसदी लोग तो अपनी गाड़ियों से वहां से निकल लेते। इसके बाद गुरजिएफ बचे हुए दस फीसदी लोगों के साथ अपना वास्तविक काम शुरू करते।

जब वह गुरजिएफ से मिलने गया, तो उसे लंबा इंतजार करना पड़ा। करीब तीन से चार दिन तक वह उनसे मिल न पाया। ऐसा नहीं था कि गुरजिएफ किसी काम में व्यस्त थे, बस वह ओसपिंस्की को इंतजार कराना चाहते थे। घर के भीतर वह खाली समय बिता रहे थे, लेकिन ओसपिंस्की को उन्होंने वक्त नहीं दिया। ओसपिंस्की इससे चिढ़ गया। अंत में ओसपिंस्की को गुरजिएफ से मिलने का समय मिला। गुरजिएफ ने उससे कहा, 'तुमने बहुत सी किताबें लिखी हैं इसलिए तुम बहुत कुछ जानते हो। जो कुछ तुम जानते हो, उसी के बारे में दोबारा बात करके समय बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है।' एक काम करो - एक पेंसिल और कागज का एक टुकड़ा पकड़ाते हुए बोले, 'इस पर वे सभी बातें लिख दो जो तुम जानते हो। हम उन चीजों के बारे में बात करेंगे जो तुम नहीं जानते।'

इस बात से ओसपिंस्की को बड़ी बेइज्जती महसूस हुई, लेकिन पेंसिल और कागज लेकर वह अपने गुरु के पास बैठ गया और बस यूं ही देखता रहा। घंटों बीत गए। दोनों वहीं बैठे रहे, लेकिन ओसपिंस्की एक भी शब्द उस कागज पर नहीं लिख सका। वह बिल्कुल खोया सा महसूस करने लगा। आंखों में आंसू भर आए, फिर वह बोला, 'मैं वास्तव में कुछ नहीं जानता।' गुरजिएफ ने कहा, 'तुम कुछ नहीं जानते? लेकिन मैंने तो सुना है कि तुमने सत्य पर सत्रह सौ पृष्ठों की किताब लिखी है। मुझे नहीं पता कि तुमने सत्य को सत्रह सौ पृष्ठों में कैसे फैला दिया। वह तो बिल्कुल हल्का हो गया होगा।' ओसपिंस्की रोने लगा और उसने खुद को समर्पित कर दिया।

गुरजिएफ ने उसे अपना शिष्य बना लिया और उसके बाद शुरू हुई असली यातनाएं। ओसपिंस्की बड़ा हठी किस्म का बुद्धिजीवी था। उसके साथ समस्या यह थी कि वह काफी शिक्षित था। उसका अध्ययन बहुत ज्यादा था। उसका अहम बड़ा परिष्कृत था। मोटे घमंड को तोड़ा जा सकता है लेकिन परिष्कृत किस्म के अहम फिसलकर निकल जाने वाले होते हैं।

गुरजिएफ ने ओसपिंस्की के साथ बड़ी बेतुकी चालें चलीं और उसे पागल कर दिया। एक बार गुरजिएफ अमेरिका में भाषण देने जा रहे थे। वहां पहुंचने के लिए वे दोनों साथ में रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे थे। गुरजिएफ जो भी बोलते थे, ओसपिंस्की उसका एक-एक शब्द लिख लेता था, क्योंकि वह उनकी कही गई बातों का बड़ा संकलन बनाना चाहता था। गुरजिएफ के बारे में ज्यादा से ज्यादा किताबें ओसपिंस्की द्वारा ही छापी गईं। उस समय एक समुद्री किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचने के लिए अमेरिकी ट्रेनों को तीन-चार दिन लग जाते थे। इस दौरान लंच या डिनर के लिए जब वे पैंट्री कार में आए, अचानक गुरजिएफ ऐसे व्यवहार करने लगे, जैसे वह नशे में हों। ओसपिंस्की ने गुरजिएफ को नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मेज पर रखा शराब का एक गिलास उठाया और उसे एक महिला के सिर पर उड़ेल दिया। महिला चीख पड़ी। सभी लोग गुरजिएफ को ट्रेन से बाहर फेंक देना चाहते थे, लेकिन ओसपिंस्की सभी को रोकने लगा और बोला, 'नहीं ऐसा मत कीजिए। यह ज्ञानी पुरुष हैं। यह नशे में नहीं हैं। यह ज्ञानी हैं।' ओसपिंस्की ने किसी तरह स्थिति को संभाला और किसी तरह गुरजिएफ को वापस केबिन में लाकर उनसे कहा कि यह आप क्या कर रहे हैं..

केबिन में पहुंचते ही गुरजिएफ शांति से बैठ गए। ओसपिंस्की ने उन्हें चेतावनी दी और कहा, 'कृपा करके दोबारा ऐसा मत कीजिए। मैं फिर से ऐसी स्थिति को नहीं संभाल पाऊंगा। चलिए अब खाना खाते हैं। मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया है।' वे दोनों फिर से खाना खाने चले गए। जैसे ही वे पैंट्री कार में पहुंचे, गुरजिएफ ने फिर से ऐसे व्यवहार किया, जैसे वह नशे में हों। उन्होंने एक सूटकेस उठाकर चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया। इस पर हर कोई गुस्से में भर गया। जैसे-तैसे ओसपिंस्की गुरजिएफ को उठाकर केबिन में लाया और उनसे कहा, 'आपने फिर वही हरकत की! आपने उस आदमी का सूटकेस बाहर फेंक दिया। अब उस आदमी का क्या होगा?'

इस समय तक ओसपिंस्की गुरजिएफ की प्रशंसा में कुछ किताबें लिख चुका था। इसके बाद उसने गुरजिएफ की निंदा करते हुए एक किताब लिखी।

गुरजिएफ ने कहा, 'चिंता मत करो। वह उसका नहीं, तुम्हारा सूटकेस था।' ओसपिंस्की सिर पकड़कर बैठ गया और बोला, 'उस सूटकेस में मेरी महीनों की मेहनत थी। मैंने जो भी किया है, वह सब उसमें था। आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? 'गुरजिएफ बोले, 'चिंता क्यों करते हो? मैंने तुम्हारा सारा काम यहां रख दिया है और केवल सूटकेस बाहर फेंका है। 'ओसपिंस्की के साथ वह ऐसी हरकतें करते रहते थे, जिनकी वजह से ओसपिंस्की पागल हो उठा

रूसी क्रांति जब अपने उफान पर थी और प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत हो रही थी, उस वक्त यात्रा करना जोखिम से भरा होता था। उस वक्त ओसपिंस्की इंग्लैंड में थे और गुरजिएफ रूस के किसी ग्रामीण इलाके में थे। उन्होंने ओसपिंस्की को एक टेलिग्राम भेजकर तुरंत आने को कहा। गुरु ने बुलाया तो ओसपिंस्की को जाना ही था। ओसपिंस्की सब कुछ छोड़कर चल पड़ा। तमाम मुश्किलों से गुजरते हुए और खतरों से खेलते हुए ओसपिंस्की ने यूरोप और रूस की यात्रा की। जब वह गुरजिएफ के पास पहुंचा तो उसने सोचा कि जरूर कोई बेहद अहम बात होगी। गुरजिएफ ने उसे देखा और बोले, 'अच्छा आ गए तुम। चलो ठीक है, अब वापस चले जाओ।' इस बार तो ओसपिंस्की को बड़ा गुस्सा आया और वह गुरजिएफ को छोड़ कर चला गया। इस समय तक वह गुरजिएफ की प्रशंसा में कुछ किताबें लिख चुका था। इसके बाद उसने गुरजिएफ की निंदा करते हुए एक किताब लिखी। गुरजिएफ ने कहा, 'कितना बेवकूफ है! मैंने कहा था कि वापस जाओ। अगर वह वापस चला जाता, तो उसे ज्ञान की प्राप्ति हो गई होती। ज्ञानोदय के वह कितना नजदीक था, लेकिन बेवकूफ ने मौका गंवा दिया।'

इन गुरुओं के काम करने के अलग-अलग तरीके होते हैं। लेकिन कुल मिलाकर लक्ष्य यही होता है कि ऐसी तीव्रता आपके भीतर पैदा कर दी जाए कि आप संपूर्ण हो जाएं।

गुरजिएफ एक कहानी कहा करता था। एक जंगल में एक सम्राट का आना हुआ; शिकार को आया था। फिर दस्तरखान बिछा, भोजन का वक्त हुआ। बड़े—बड़े बहुमूल्य पकवान बनाकर लाए गए थे। थालियां सजीं। बड़ा आयोजन होने लगा। कुछ चींटियों को बास लगी, चींटियां गईं——जो संदेशवाहक चींटियां थीं जो खबर लेने जाती थीं। ऐसा भोजन तो उन्होंने कभी देखा ही नहीं था——ऐसा रंग—बिरंगा भोजन, ऐसी सुवास….जैसे स्वर्ग उतर आया पृथ्वी पर। नाचती हुई लौटीं, मग्न हुई लौटीं। खबर दी और चींटियों को। चींटियों में तो एकदम तूफान आ गया। चींटियां एकदम विक्षिप्त होने लगीं——बातें सुन—सुनकर मूर्छित होने लगीं। ऐसा भोजन, इतनी—इतनी थालियां, ऐसी गंध….बात ही ऐसी कि; जाने की तो सुध किसको रही! एक—दूसरे को बताने में ऐसी उत्तेजना फैली कि चींटियों का जो राजा था वह बहुत परेशान हुआ। उसने कहा : ये तो पगला जाएंगी। उसने कहा : तुम रुको, पहले मैं अपने वजीरों को लेकर जाता हूं, पक्का पता लगाकर आता हूं। वजीरों को लेकर गया। देखा कि हालत तो ठीक ही थी, जो खबर दी गई है। मगर बात सुनकर जब चींटियों की यह हालत हुई जा रही है कि लड़खड़ा कर गिर रही हैं, बेहोश हो रही हैं, तो इस भोजन के पास आकर उनकी क्या गति होगी? अपने वजीरों से कहा : हम क्या करें? तो बूढ़े बड़े वजीर ने कहा : जो आदमी करते हैं वही हम भी करें। मजबूरी में हमें आदमी की नकल करनी पड़ेगी क्योंकि चींटियों के इतिहास में इस तरह की घटना पहले कभी घटी नहीं, आदमियों के इतिहास में घटती रही है। सम्राट ने कहा : मैं कुछ समझा नहीं। चींटियों के सम्राट ने कहा : मैं कुछ समझा नहीं। उन्होंने कहा कि हम एक नक्शा बनाएं, नक्शे में थालियां बनाएं, थालियों में रंग—बिरंगे भोजन भरें और नक्शे को ले चलें, और नक्शे को बिछा दें और चींटियों से कहें देखो——ऐसे—ऐसे भोजन, ऐसी—ऐसी थालियां….वे नक्शे में ही मस्त हो जाएंगी, न यहां तक आएंगी न झंझट होगी। और यही हुआ। नक्शा बनाया गया, नक्शा लाया गया और चींटियों का तो कहना क्या——बैंड—बाजे बजे, नाच—कूद हुआ, स्वागत—समारोह हुआ। रात—भर चींटियां सोई ही नहीं——नक्शे पर घूम रही हैं, इधर से उधर जा रही हैं; यह रंग, वह रंग। होशियार वजीरों ने थोड़ी—सी सुगंध भी छिड़क दी थी नक्शे पर। नासापुट चींटियों के भर गए। चींटियां भूल ही गईं भोजन की बात। गुरजिएफ कहता था चींटियां अभी भी नक्शे से उलझी हैं, नक्शे से चिपकी हैं, नक्शे का ही मजा ले रही हैं। और चींटियों के वजीर ने ठीक कहा था कि हमें आदमियों की नकल करनी पड़ेगी। ऐसे ही वेद हैं, एक नक्शा; ऐसे ही कुरान है, दूसरा नक्शा; ऐसे ही बाइबिल है, तीसरा नक्शा। और लोग चींटियों की तरह नक्शों से उलझे हैं——कोई वेद से चिपका है, कोई कुरान से, कोई बाइबिल से। आंखें फूटी जा रही हैं उनकी वेद पढ़—पढ़ कर, मस्तिष्क भरमा जा रहा है। लोग गीता ही पढ़—पढ़ कर डोल रहे हैं। वही चींटियों की हालत है। कुरान पढ़—पढ़ कर आनंदित हो रहे हैं, मुहम्मद होने की फिक्र ही न रही। महावीर होने की चिंता किसको है? बुद्ध किसको होना है? चैतन्य की समाधि को किसे पाना है? समाधि शब्द ही काफी है। लोग उसी पर शोध कर रहे हैं। पतंजलि के योग— सूत्रों पर ग्रंथों पर ग्रंथ लिखे जा रहे हैं। ब्रह्मसूत्र पर बादरायण के टीकाओं पर टीकाएं लिखी जा रही हैं। नक्शों के नक्शे और नक्शों के भी नक्शे बनाए जा रहे हैं। यह सिलसिला लंबा चल रहा है। इससे जागो, इससे कुछ भी न होगा। जो भी जागे हैं वे सभी यही कहते हैं : इससे कुछ भी न होगा, असली यात्रा करनी होगी। और असली यात्रा बाहर की तरफ नहीं है, भीतर की तरफ है। असली आंख चाहिए और असली आंख यह चमड़े की आंख नहीं है, ध्यान की आंख है। ध्यान—चक्षु को खोलो, फिर अपूर्व है आनंद, फिर सच्चिदानंद है।

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जार्ज गुरजिएफ के पास जब भी कोई नये शिष्य आते थे तो पहला उसका काम था कि वह उनको इतनी शराब पिला देता...।

अब यह तुम थोड़े हैरान होओगे कि कोई सदगुरु- और शिष्यों को शराब पिलाए! लेकिन गुरजिएफ के अपने रास्ते थे। हर सदगुरु के अपने रास्ते होते हैं।

इतनी शराब पिला देता... पिलाए ही जाता, पिलाए ही जाता; जब तक कि वह बिलकुल बेहोश न हो जाता, गिर न जाता, अल्ल-बल्ल न बकने लगता। जब वह अल्ल - बल्ल बकने लगता, तब वह बैठकर सुनता कि वह क्या कह रहा है।

उसी से वह निर्णय लेता उसके संबंध में कि कहां से काम शुरू करना है। क्योंकि जब तक वह होश में है तब तक तो वह धोखा देगा। तब तक मसला कुछ और होगा, बताएगा कुछ और। कामवासना से पीड़ित होगा और ब्रह्मचर्य के संबंध में पूछेगा। धन के लिए आतुर होगा और ध्यान की चर्चा चलायेगा। पद के लिए भीतर महत्त्वाकांक्षा होगी और संन्यास क्या है, ऐसे प्रश्न उठायेगा। भोग में लिप्सा होगी और त्याग के संबंध में विचार -विमर्श करेगा। क्यों? क्योंकि ये अच्छी- अच्छी बातें हैं और इन अच्छी- अच्छी बातों पर बात करने से प्रतिष्ठा बढ़ती है।

लोग अपनी सच्ची समस्याएं भी नहीं कहते। लोग ऐसी समस्याओं पर चर्चा करते हैं जो उनकी समस्याएं ही नहीं हैं; जिनसे उनका कुछ लेना-देना नहीं है। और अगर तुम चिकित्सक को ऐसी बीमारी बताओगे जो तुम्हारी बीमारी नहीं है तो इलाज कैसे होगा?

गुरजिएफ ठीक करता था, डटकर शराब पिला देता। और जब वह गिर पड़ता आदमी और अल्ल-बल्ल बकने लगता तब बैठकर सुनता, उसके एक -एक वचन को सुनता, क्योंकि अब वह सच्ची बात बोल रहा है। अब होश -हवास तो गया, अब हिसाब -किताब तो गया। अब वह जो कहता है, उससे उसकी सचाई पता चलेगी। वह उसके आधार पर उसकी साधना तय करता। उसको पता ही नहीं चल पाता कभी कि उसकी साधना कैसे तय की गयी।

गुरजिएफ बड़ा मनोवैज्ञानिक था! फ्रायड को तीन साल लग जाते हैं मनोविश्लेषण करने में, गरजिएफ दो- तीन घंटों में निपटा लेता था।

जॉर्ज गुरजिएफ

गुरजिएफ कहता है, "तुम मात्र शरीर के और कुछ नहीं, और जब शरीर मरेगा तुम भी मरोगे। कभी एकाध दफा कोई व्यक्ति मृत्यु से बच पाता है--केवल वही जो अपने जीवन में आत्मा का सृजन कर लेता है मृत्यु से बचता है--सब नहीं। कोई बुद्ध; कोई जीसस, पर तुम नहीं। तुम बस मर जाओगे, तुम्हारा कोई निशान नहीं बचेगा।"

गुरजिएफ क्या करना चाह रहा था? वह तुम्हें तुम्हारी जड़ों से हिला रहा था; वह तुम्हारी हर तरह की सांत्वना और मूर्खता भरे सिद्धांत छीन लेना चाहता था जो तुम्हें खुद पर काम को स्थगित करने में सहायता करते हैं। अब यदि लोगों को यह बताना, "तुम्हारे पास कोई आत्मा नहीं है, तुम केवल भाजी तरकारी हो, फूलगोभी या फिर पत्तागोभी"-- फूलगोभी भी कॉलेज से शिक्षित एक पत्तागोभी है--" उससे अधिक कुछ भी नहीं।" वह वाकई में एक सर्वोत्कृष्ट सद्गुरु था। वह तुम्हारे पांव तले जमीन खींच रहा था। वह तुम्हें ऐसा झटके दे रहा था कि तुम्हें पूरी स्थिति के बारे में सोचना पड़ता: क्या तुम पत्तागोभी बन के रहना चाहते हो? वह तुम्हारे आस-पास ऐसी परिस्थिति खड़ी कर रहा था जिसमें तुम्हें आत्मा को पाने के लिए खोजबीन करनी पड़े, क्योंकि मरना कौन चाहता है?

और इस विचार ने कि आत्मा अमर है लोगों को बहुत सांत्वना दी है कि वे कभी मरेंगे नहीं, कि मृत्यु केवल एक झलक है, केवल एक लंबी नींद, एक शांतिप्रद नींद, और तुम फिर से जन्म लोगे। गुरजिएफ कहता है, "यह सब बकवास है, पूरी बकवास। मरे कि तुम हमेशा के लिए मरे--जब तक कि तुम आत्मा को निर्मित नहीं कर लेते..."

अब अंतर देखें: तुम्हें कहा गया है कि पहले से ही एक आत्मा हो, और गुरजिएफ पूरी तरह से इसे बदल देता है। वह कहता है, "तुम पहले से आत्मा नहीं हो, परंतु एक संभावना मात्र हो। तुम इसका उपयोग कर सकते हो, या चूक सकते हो।"

और मैं तुम्हें बताना चाहूंगा कि गुरजिएफ केवल एक युक्ति का उपयोग कर रहा था। यह सच नहीं है। हर एक व्यक्ति आत्मा के साथ पैदा होता है। पर उन लोगों के साथ क्या किया जाए जो उसे सांत्वना की तरह प्रयोग करते आए हैं? कभी- कभी एक महान सद्गुरु को झूठ बोलना पड़ता है--और केवल एक महान सद्गुरु को ही झूठ बोलने का अधिकार है-- तुम्हें नींद से जगाने के लिए।

गुरजिएफ की बहुत आलोचना हुई क्योंकि वह झूठा था--और झूठ सूफियों द्वारा आया; वह एक सूफी था। उसका शिक्षण सूफी आश्रमों और स्कूलों में हुआ था। और असल में, अपने समय में, पश्चिम में उसने सूफीवाद को एक नए रूप में शुरू किया था। परंतु तब एक साधारण ईसाई मन के लिए उसे समझ पाना असंभव था क्योंकि सत्य मूल्यवान है, और कोई सोच नहीं सकता कि कोई संबुद्ध सद्गुरु झूठ बोल सकता है।

क्या तुम सोच सकते हो कि जीसस झूठ बोलेंगे? और मुझे पता है कि उन्होंने झूठ कहा--लेकिन ईसाई इसके बारे में सोच भी नहीं सकते: "जीसस झूठ कह रहे हैं? नहीं, वे सबसे सच्चे व्यक्ति थे।" लेकिन फिर तुम्हें पता नहीं--ज्ञान का प्रश्न बहुत-बहुत खतरनाक होता है। उन्होंने बहुत सी बातों के बारें में झूठ बोला--एक सद्गुरु को बोलना पड़ता है, अगर वह तुम्हारी मदद करना चाहता है। अन्यथा, वह एक संत हो सकता है, लेकिन उसके द्वारा कोई मदद संभव नहीं। और बिना मदद किये एक संत मुर्दा होता है। और यदि कोई संत मदद नहीं कर सकता, उसके यहां होने का क्या फायदा? इसमें कोई अर्थ नहीं।जो कुछ भी वह जीवन से अर्जित कर सकता था, उसने कर लिया। वह मदद के लिए यहां है।

गुरजिएफ की बहुत आलोचना हुई क्योंकि पश्चिम उसे समझ नहीं पाया, एक साधारण ईसाई मन उसे समझ नहीं पाया। तो पश्चिम में गुरजिएफ के बारे में दो तरह की सोच है। एक सोचता है कि वह एक बहुत ही शरारती व्यक्ति था--संत तो बिल्कुल नहीं, बस शैतान का अवतार। दूसरा कि वह एक महान संत था जिसके बारे में पश्चिम को पिछली कुछ सदियों से पता चला है। यह दोनों बातें सच हैं, क्योंकि वह बिल्कुल मध्य में था। वह एक 'po' व्यक्तित्व था। ना तो तुम उसके बारे में हां कह सकते हो और ना ही ना कह सकते हो। तुम कह सकते हो कि वह एक पवित्र पापी था, या फिर पापी संत। पर तुम विभाजन नहीं कर सकते, तुम उसके बारे में सरल नहीं हो सकते। जो ज्ञान उसे था वह बहुत ही जटिल था।

गुरजिएफ कहता है: द्रष्टा को याद रखो--आत्म-स्मृति। बुद्ध कहते हैं: द्रष्टा को भूल जाओ बस दृश्य को देखो। यदि तुम्हें बुद्ध और गुरजिएफ में से किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं कहूंगा बुद्ध को चुने। गुरजिएफ के साथ एक खतरा है की तुम अपने प्रति सचेत होने कि बजाय अपने प्रति संकोची हो सकते हो, तुम अहंकारी हो सकते हो। मैंने महसूस किया कि कई गुरजिएफ के शिष्यों में, वे अत्यधिक अहंकारी हो गए। ऐसा नहीं की गुरजिएफ अहंकारी था--वह अपने समय के गिने-चुने संबुद्ध व्यक्तियों में से एक था; परंतु उसकी इस विधि में एक खतरा है, स्वयं के प्रति सचेत होने में और आत्म-स्मृति में भेद करना अति कठिन है। यह इतना सूक्ष्म है कि इसमें भेद करना लगभग नामुमकिन है; अनजान लोगों के लिए यह लगभग पूरी संभावना है की उन्हें आत्म-संकोच घेर ले; यह आत्म-स्मृति नहीं होगी।

यह शब्द "आत्मा" खतरनाक है-- तुम आत्मा के विचार में ज्यादा से ज्यादा स्तिथ होने लगते हो। और आत्मा का ख्याल तुम्हें आस्तित्व से दूर कर देता है।

बुद्ध कहते हैं आत्मा को भूल जाओ, क्योंकि आत्मा है ही नहीं; आत्मा बस एक व्याकरण का शब्द है, भाषागत शब्द है--यह अस्तित्वगत नहीं है। तुम बस तत्व को गौर से देखो। तत्व को देखने पर, तत्व विलीन होने लगता है। जब तत्व विलीन हो जाता है, अपने क्रोध को देखो--और उस देखने में, तुम उसे विलीन होते हुए देखोगे--जैसे ही क्रोध विलीन होता है मौन आ जाता है। वहां कोई आत्मा नहीं होती, कोई देखने वाला नहीं बचता और ना ही कुछ देखने के लिए; तब मौन आता है। मौन विपस्सना द्वारा लाया जाता है, बुद्ध द्वारा दी गई जागरूकता की विधि।

एक बूढ़ी औरत आस्पेंस्की से बहुत ज्यादा प्रभावित हो गई, और फिर वह गुरजिएफ से मिलने चली गई। केवल एक सप्ताह के भीतर वह लौट आई, और उसने आस्पेंस्की से कहा, "मुझे लगता है कि गुरजिएफ महान है, पर यह मुझे पक्का नहीं है कि वह अच्छा है या बुरा, कि वह शैतान है या संत। इसका मुझे पक्का नहीं है। वह महान है - इतना तो पक्का है। लेकिन वह एक महान शैतान, या एक महान संत हो सकता है - इसका पक्का नहीं है।" और गुरजिएफ ने इस तरह से व्यवहार किया कि वह का ऐसा प्रभाव छोड़े।

एलन वाट ने गुरजिएफ के बारे में लिखा है और उसे एक बदमाश संत कहा है--क्योंकि कभी-कभी वह एक बदमाश की तरह व्यवहार करता, पर वह सब एक अभिनय होता था और जानबूझ कर किया गया था, उन सब से बचने के लिए जो अनावश्यक समय और ऊर्जा ले लेते थे। ये सब उनको वापस भेजने के लिए किया गया था जो केवल तभी काम करते थे जब उन्हें पक्का हो। केवल उन्हें ही अनुमति दी जाती जो तब भी कर सकते जब भले जिन्हें गुरु के ऊपर भरोसा ना हो लेकिन खुद पर भरोसा होता।

और गुरजिएफ के प्रति समर्पण, तुम्हें रमण महर्षि के प्रति समर्पण की तुलना में ज्यादा रूपांतरित कर देगा, क्योंकि रमण महर्षि इतने सरल और इतने सीधे हैं कि वहां समर्पण कुछ अर्थ नहीं रखता। तुम उसके सिवा कुछ कर भी नहीं सकते। वे इतने खुले हैं--बिल्कुल एक बच्चे के सामान-- इतने पवित्र कि समर्पण घट ही जाएगा। किन्तु यह समर्पण रमण महर्षि की वजह से होगा, तुम्हारी वजह से नहीं। जहां तक तुम्हारा प्रश्न है इसके कोई मायने नहीं। यदि गुरजिएफ के प्रति तुम्हारा समर्पण होता, तब यह तुम्हारे कारण हुआ, क्योंकि गुरजिएफ किसी भी प्रकार से इसका समर्थन नहीं करने वाला।

बल्कि, वह इस में सब तरह की बाधाएं खड़ी करेगा। अगर तब भी तुम समर्पण कर देते हो, यह तुम्हें रूपांतरित कर देगा। तो उसके बारे में पूरी तरह से निश्चित होने की जरुरत नहीं--और यह असंभव है--किन्तु तुम्हें खुद के बारे में निश्चित होना जरुरी है।