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काली मंदिर : क्याें चढ़ाई जाती है बलि?/महिलाएं क्‍यों न जाएं शनि मंदिर में?


देश के कई देवी मंदिरों में, ख़ास कर देवी काली के मंदिरों में जानवरों की बलि देने का रिवाज़ है। क्यों स्थापित किया गया था ये रिवाज़, क्या है इसका विज्ञान?

प्रश्न : सद्‌गुरु, मैंने सुना है कि दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में जानवरों की बलि दी जाती है। बताया जाता है कि रामकृष्ण परमहंस के समय भी ऐसा होता था। उनके जैसा इंसान इसकी अनुमति कैसे दे सकता है?

सद्‌गुरु : तो रामकृष्ण पशु-बलि की अनुमति कैसे दे सकते थे? वैसे अनुमति देना या न देना उनके हाथ में नहीं था, फिर भी वह इसका विरोध कर सकते थे, जो उन्होंने नहीं किया। क्योंकि काली को बलि पसंद है। उन्हें जो पसंद है, वह वैसा ही करते थे।

काली को वह क्यों पसंद है, इसके लिए आपको समझना पड़ेगा कि ये देवी-देवता हैं क्या। यह इकलौती ऐसी संस्कृति है, जहां हमारे पास भगवान बनाने की, तकनीक है। बाकी हर जगह लोग यह मानते हैं कि ईश्वर सृष्टिकर्ता है और आप सृष्टि के एक अंग हैं। सिर्फ यही ऐसी संस्कृति है, जहां हम जानते हैं कि हम ईश्वर बना सकते हैं। हमने अलग-अलग मकसद के लिए अलग-अलग तरह के देवी-देवता बनाए। हमने उन्हें जीवित रखने और आगे बनाए रखने के लिए कुछ विशेष ध्वनियां उत्पन्न कीं और उनके साथ कुछ विधि-विधानों को जोड़ा।

काली मंदिर में अगर आप बलि देना छोड़ देते हैं, तो इसका मतलब है कि आपने तय कर लिया है कि आपको काली की जरूरत नहीं है क्योंकि कुछ समय बाद उनकी शक्ति घटती जाएगी और फिर वह नष्ट हो जाएंगी, क्योंकि उन्हें इसी तरह बनाया गया है।

आप मूंगफली मुंह के अंदर डालते हैं, एक जीवन की बलि चढ़ती है, तो दूसरा जीवन बेहतर होता है। क्योंकि जीवन के अंदर एक जीवन, उसके अंदर एक जीवन होता है क्योंकि यहां जो है, बस जीवन है।

उन्हें रोजाना नए जीवन की जरूरत पड़ती है। इसका मतलब यह नहीं है कि वह उसे खाना चाहती हैं। वह उनका जीवन है। अगर आप उसे वापस ले लें, तो यह ऐसा है मानो आपने अपनी बैट्री चार्ज नहीं कीं, वह धीरे-धीरे नष्ट हो जाएगी। इस बात को समझते हुए उन्होंने ऐसा होने दिया।

अगर कोई व्यक्ति वाकई बिना किसी रस्म, बिना किसी बलिदान के यूं ही चीजों को ऊर्जा प्रदान करने में समर्थ है, तो वह उसी तरह काली को सक्रिय रख सकता है। लेकिन आप इस बात की उम्मीद नहीं कर सकते कि विशेष क्षमताओं वाला कोई ज्ञानी पुरुष आकर यह सब करेगा। इसलिए यह परंपरा स्थापित हो गई है, जिसे कोई भी जारी रख सकता है

यहां तक कि आज भी अधिकांश काली-मंदिरों में रोजाना बलि दी जाती है। क्या यह क्रूरता नहीं है? लोग वैसे भी मांस खा रहे हैं। किसी कसाईघर में उन्हें मारने के बजाय आप उस जीवन-ऊर्जा को एक खास तरीके से इस्तेमाल करके अपने बनाए गए देवता को और शक्तिशाली बना रहे हैं।

अब, सबसे पहले यह समझते हैं कि यह बलिदान क्या है। मैं चाहता हूं कि आप ठीक नजरिये से इसे देखें। मैं पशु-बलि या मानव-बलि की बात नहीं कर रहा हूं, बलि कैसी भी हो, मैं सिर्फ यह बता रहा हूं कि उसके पीछे वजह क्या होती है।

एक जीवन को मारने का मकसद क्या है? क्या इससे कोई भगवान खुश होगा? इसका भगवान से कोई लेना-देना नहीं है। इसका मकसद है शरीर को नष्ट करके, जीवन-ऊर्जा को बाहर निकालना और इस ऊर्जा का एक खास मकसद के लिए इस्तेमाल करना। बस वह एक थोड़ी असभ्य टेक्नोलॉजी थी लेकिन फिर भी वह एक टेक्नोलॉजी थी।

आप नारियल तोड़ते हैं, वह भी एक बलि है। क्योंकि मंदिर में नारियल तोडऩे या नीबू काटने का उद्देश्य बस नई ऊर्जा को मुक्त करना और उसका लाभ उठाना है। किसी बकरे या मुर्गे या किसी भी चीज को काटने का उद्देश्य भी यही है।

कुछ अतिवादी उदाहरणों में लोगों ने अपने बच्चों तक की बलि दे दी है। तांत्रिक जीवन-शैली में लोगों ने खुद की बलि भी दी है।

बलि के लिए हमेशा इस तरह के जीवन को चुना जाता है, जो ताजा और पूरी तरह जीवंत हो। जब मानव-बलि दी जाती थी, तो हमेशा युवा लोगों को चुना जाता था। यही बात पशु बलि पर लागू होती है, कोई भी बूढ़े बकरे की बलि नहीं देता। जवान और जीवंत बकरे को चुना जाता है।

लेकिन लोग सिर्फ गर्दन और नारियल तोड़ते हैं। उसका लाभ कैसे उठाना है, यह उन्हें मालूम नहीं है, वह तकनीक काफी हद तक नष्ट हो चुकी है। बहुत कम जगहों पर लोगों को इसकी जानकारी है। बाकी जगहों पर वे बस रस्म की तरह उसे करते हैं और सोचते हैं कि इससे देवी-देवता खुश होंगे। वैसे भी नारियल या मुर्गा या जिस भी चीज की आप बलि देने वाले हैं, आपको ही खाना है। कोई देवी-देवता उसे खाने नहीं आएंगे।

इस बलि ने बहुत से रूप अपना लिए हैं। इसने कई सूक्ष्म रूप भी लिए हैं। कुछ अतिवादी उदाहरणों में लोगों ने अपने बच्चों तक की बलि दे दी है। तांत्रिक जीवन-शैली में लोगों ने खुद की बलि भी दी है। ऐसे मंदिर भी रहे हैं, जहां पशु-बलि या मानव-बलि की जगह किसी और चीज का इस्तेमाल किया गया है।

एक जीवन को मारने का मकसद क्या है? क्या इससे कोई भगवान खुश होगा? इसका भगवान से कोई लेना-देना नहीं है।

आप ऐसा सोच भी नहीं सकते, क्योंकि आप उसे पवित्र स्थान की तरह देखते हैं, लेकिन वे एक स्त्री के मासिक स्राव का इस्तेमाल करते थे, क्योंकि वह जीवन है। किसी शिशु को मारने की जगह वे बस उस स्राव का इस्तेमाल करते थे, क्योंकि वह जीवन बनाने वाली चीज है, उससे उन्होंने वो चीज बनाई, जिसे आप भगवान कहते हैं।

मैं भी लगातार बलि दे रहा हूं - हम किसी मनुष्य या किसी चीज को मार नहीं रहे हैं। अगर आप किसी जीवन का त्याग नहीं करेंगे, तो कुछ भी नहीं होगा। (ताली बजाते हैं) यह भी एक बलि है। हम नहीं चाहते, लेकिन हम आपको दिखा सकते हैं कि इस बलि से क्या हो सकता है। यह आपको उड़ा सकता है, क्योंकि इसमें जीवन-ऊर्जा छोड़ी जा रही है। तो जीवन के किसी न किसी हिस्से को त्यागे बिना आप कोई लाभदायक काम नहीं कर सकते। आप आध्यात्मिकता की चर्चा ही करते रह जाएंगे।

आध्यात्मिकता की बात करना बस मनोरंजन है। इससे आपको कोई लाभ नहीं होगा। यह आपको मनोवैज्ञानिक संतुष्टि या शायद तसल्ली देता है। अगर आप तसल्ली चाहते हैं, तो आप सिर्फ मनोविकार की तरफ बढ़ रहे हैं। लोग हमारे मन को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। आध्यात्मिक प्रक्रिया का उद्देश्य यह नहीं है। आध्यात्मिकता या रहस्यवाद इस बारे में नहीं है। वह तो भौतिकता की सीमाओं के परे एक ऐसे आयाम को खोजने की प्रक्रिया है, जो भौतिक का आधार है। जो स्थूल का आधार है, वही सृष्टा है।

आप नारियल तोड़ते हैं, वह भी एक बलि है। क्योंकि मंदिर में नारियल तोडऩे या नीबू काटने का उद्देश्य बस नई ऊर्जा को मुक्त करना और उसका लाभ उठाना है।

हकीकत तो ये है कि आपके जीवन में भी अगर कुछ महत्वपूर्ण होना है, तो आपको किसी न किसी चीज की बलि देनी होगी, वरना ऐसा नहीं होगा। क्या यह सच नहीं है? अगर आप अपने कारोबार में, अपने कैरियर में कामयाब हैं, तो आप जानते हैं कि आपने अपनी जिन्दगी उसमें झोंक दी है, वरना ऐसा नहीं होता। क्या आप ऑफिस में अपने जीवन के आठ घंटों की बलि नहीं दे रहे? अपना कारोबार बढ़ाने के लिए, अपना कैरियर बनाने के लिए, अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए क्या आप अपना जीवन बलिदान नहीं कर रहे? जीवन तो बाहर कहीं किसी खेल के मैदान या किसी गली में है, लेकिन आप कॉलेज में बैठकर मोटी-मोटी किताबों को पढ़ते हैं। क्या आप अपने जीवन का बलिदान नहीं कर रहे?

जीवन को त्यागे बिना आप जीवन को ऊपर नहीं उठा सकते। आप उसे कैसे करते हैं, यह आपके ऊपर है। आप किसी दूसरे जीवन को समाप्त करने जा रहे हैं या आपने इसके लिए कुछ दूसरे साधन ढूंढे हैं, लेकिन जीवन को त्यागे बिना आप जीवन को विकसित नहीं कर सकते।

आप अपने जीवन को विकसित करने के लिए इसी तकनीक का सहारा लेते हैं। आप पेड़ से सेब तोड़ते हैं, उसे खाते हैं, आपका जीवन बेहतर होता है। आप मूंगफली मुंह के अंदर डालते हैं, एक जीवन की बलि चढ़ती है, तो दूसरा जीवन बेहतर होता है। क्योंकि जीवन के अंदर एक जीवन, उसके अंदर एक जीवन होता है क्योंकि यहां जो है, बस जीवन है। आपको बस उसे संभालना हैं। आप उसे कितनी नरमी से, कितने सूक्ष्म और शक्तिशाली तरीकों से संभालते हैं, या फिर असभ्य तरीकों से निपटते हैं, बस फर्क इतना ही है।

ऊर्जा देवी भारतीय संस्कृति

एक अचूक एवं अत्यधिक शक्तिशाली महामंत्र, इसकी सिद्धि से हर कोई मानेगा आपकी बात ! मंत्रो का हमारे जीवन में अत्यधिक प्रभाव है. यदि मंत्रो का उच्चारण शुद्ध हो तो यह मनुष्य, जीव-जन्तुओ पर गहरा एवं सकरात्मक प्रभाव डालता है. परन्तु यदि मंत्रो का उच्चारण गलत हो तो यह प्राणी पर विपरीत प्रभाव डालता है तथा इसके साथ ही अनिष्टता का भी भय रहता है.

मंत्रों की शक्ति तथा इनका महत्व ज्योतिष में वर्णित सभी रत्नों एवम उपायों से अधिक है. मंत्रों के माध्यम से ऐसे बहुत से दोष बहुत हद तक नियंत्रित किए जा सकते हैं जो रत्नों तथा अन्य उपायों के द्वारा ठीक नहीं किए जा सकते.

क्योंकि ज्योतिष में रत्नों का प्रयोग किसी जन्मांग में केवल शुभ असर देने वाले ग्रहों को बल प्रदान करने के लिए किया जा सकता है. वहीँ अशुभ असर देने वाले ग्रहों के रत्न धारण करना वर्जित है क्योंकि किसी ग्रह विशेष का रत्न धारण करने से केवल उस ग्रह की ताकत बढ़ती है. उसका स्वभाव नहीं बदलता इसलिए जहां एक ओर अच्छे असर देने वाले ग्रहों की ताकत बढ़ने से उनसे होने वाले लाभ बढ़ जाते हैं, वहीं दूसरी ओर बुरा असर देने वाले ग्रहों की ताकत बढ़ने से उनके द्वारा की जाने वाली हानि की मात्रा भी बढ़ जाती है

इसलिए किसी जन्मांग में बुरा असर देने वाले ग्रहों के लिए रत्न धारण नहीं करने चाहिए .

वहीं दूसरी ओर किसी ग्रह विशेष का मंत्र उस ग्रह की ताकत बढ़ाने के साथ-साथ उसका किसी जन्मांग में बुरा स्वभाव बदलने में भी पूरी तरह से सक्षम होता है इसलिए मंत्रों का प्रयोग किसी जन्मांग में अच्छा तथा बुरा असर देने वाले दोनो ही तरह के ग्रहों के लिए किया जा सकता है .

अतः आज हम आपको एक ऐसे शक्तिशाली मन्त्र के बारे में बताएंगे जिसका प्रभाव अचूक है तथा इस मन्त्र की सिद्धि द्वारा हर एक व्यक्ति आपकी बात मनेगा.

किंतु ध्यान रहे इस विधि का दुरुपयोग या स्वहित के लिए प्रयोग निषिद्ध है और यदि किसी ने ऐसा किया तो उसे इसका दुष्परिणाम भुगतना ही होता है.

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महाराष्ट्र के शनि सिगनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर उठे विवाद ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। तो क्या यह महिलाओं के साथ भेद-भाव है या इसके पीछे कोई वजह है?

सदगुरु, कुछ खास मंदिरों में महिलाओं को क्यों नहीं जाने दिया जा रहा है? उदाहरण के तौर पर शनि मंदिर में ऐसा किया जा रहा है। ऐसा भेदभाव क्यों?

सदगुरु :

लिंग भैरवी के गर्भ गृह में पुरुषों को जाने की इजाजत नहीं है, लेकिन उन्होंने कभी भी इसका विरोध नहीं किया। क्योंकि पुरुष शादीशुदा और घरेलू हैं, इसलिए विरोध नहीं करने के लिए ट्रेंड हैं। इसे समझने की जरूरत है कि इस तरह के मंदिर प्रार्थना करने के लिए नहीं होते। इनमें अलग तरह की ऊर्जा होती हैं।

महिलाओं के बायोलाॅजी की प्रकृति कुछ ऐसी है कि तंत्र-मंत्र की ये शक्तियां उनकी शारीरिक व मानसिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं।

जब हमने जाना कि सौर मंडल के ग्रहों का हमारे शरीर विज्ञान, हमारी मानसिक संरचना और हमारे जीवन पर असर पड़ता है तब हमने विभिन्न ग्रहों के मंदिर बनाये। भारतीय ज्योतिषी कुछ जटिल गणना करके ये बताते हैं कि किस ग्रह का आपके ऊपर सबसे ज्यादा प्रभाव होगा। यह गणना आपके जन्म की तारीख और समय और जन्मस्थान के अक्षांश और देशांतर के आधार पर होती है। ये चीजें एक हद तक आपके लिए प्रासंगिक होती हैं। लेकिन यदि आपकी पहुंच भीतरी तकनीक तक हो गई है तो ये ग्रहों के प्रभाव को बराबर कर देगी।

शनि एक दूर का ग्रह है जो कि तीस वर्षों में सूर्य का एक चक्कर लगाता है। शनि का चक्कर, पृथ्वी का चक्कर और आपके जन्म से संबंधित आंकड़ों पर विचार करके ज्योतिषी गणना कर सकते हैं कि आपके जीवन के किस दौर में शनि का आपके ऊपर क्या प्रभाव है। शनि सूर्य का एक पुत्र है। सूर्य का दूसरा पुत्र भी है जिसे यम कहा जाता है। शनि - शासन, चिंता, अवसाद, बीमारी और विपत्ति का देवता है। यम मृत्यु का देवता है। ये दोनों भाई-भाई हैं जो हमेशा एक साथ काम करते हैं। इन दोनों की मां यानि सूर्य की पत्नी का नाम छाया है। छाया का मतलब परछाई होता है। यह ऐसा विज्ञान है जो संकेतों या इशारों के जरीये व्यक्त किया गया है। सूर्य हमारे लिए प्रकाश का स्रोत है। उसकी पत्नी को छाया इसलिए कहा गया है क्योंकि जहां सूर्य की रोशनी होगी वहां छाया भी होगी। शनिवार सप्ताह का सातवां दिन होता है। यह शनि का दिन है, इसीनिए आप इसे शनिवार कहते हैं। भारतीय ज्योतिष विज्ञान के अनुसार शनि सातवां ग्रह है। ग्रह का मतलब होता है पकड़ना या प्रभाव डालना। आधुनिक खगोल विज्ञान के हिसाब से शनि छठा ग्रह है। लेकिन भारतीय ज्योतिष शास्त्र उन सभी आकाशीय पिण्डों ग्रह मानता है जो पृथ्वी पर बसे जीवन पर अपना बहुत ज्यादा प्रभाव डालते हैं। इस हिसाब से सूर्य और चन्द्र की गणना भी ग्रहों के रूप में ही की जाती है। यही कारण है कि शनि सातवां ग्रह समझा जाता है।

सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि, ये सब ग्रह क्रमानुसार इस पृथ्वी पर बसे जीवन को बहुत शक्तिशाली तरीके से प्रभावित करते हैं। बेशक शनि सातवां ग्रह है लेकिन वो बहुत प्रभावशाली है। जहां स्वास्थ्य और प्रसन्नता आपको जीवन में मुक्ति देते हैं वहीं बीमारियां और अवसाद आपकी जिंदगी पर गंभीरतापूर्वक हावी हो जाती हैं। सवाल यह है कि क्या ग्रह जैसी बाहरी ताकतों को आप इस बात की अनुमति दे रहे हैं कि वो आपको प्रभावित करें? या आप चाहते हैं कि आपकी भीतरी प्रकृति का केवल आपके ऊपर प्रभाव हो। इसलिए भारतीय ज्योतिष परंपरा में इस विद्या को गहराई से जानने वाले विद्वान उन लोगों के बारे में भविष्यवाणियां करने से इंकार कर देते हैं जो आध्यात्मिक राह पर चल रहे होते हैं या जिनके जीवन पर किसी आध्यात्मिक गुरु का प्रभाव होता है। क्योंकि शनि का एक चक्कर तीस साल में पूरा होता है, इसलिए तीस साल में एक बार आप उससे प्रभावित होने के लिए अतिसंवेदनशील हो जाते हैं।

इसी समय को हिंदी प्रदेशों में साढ़े साती कहा जाता है और तमिल में येलेराई शनि कहा जाता है। यह समय साढ़े सात साल तक चलता है। इस दौरान आप बीमारी, अवसाद, विपत्ति और मृत्यु की जकड़ में जल्दी से आ जाते हैं। आपकी स्थिति इतनी नाजुक हो जाती है कि बाहरी प्रभावों से आप आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। साढे़ साती के दौरान हो रही मुश्किलों को दूर करने के लिए शनि मंदिरों में कई तरह की धार्मिक प्रक्रियाएं और अनुष्ठान किए जाते हैं। शनि देव के कई मंदिर हैं जहां शनि को ईश्वर माना जाता है। इस समय यह विवाद चल रहा है कि महाराष्ट्र के शनि सिगनापुर मंदिर में महिलाओं को अंदर जाने की अनुमति दी जाए या नहीं। इस मंदिर में बहुत शक्तिशाली प्रक्रियाएं की जाती हैं। शनि मंदिरों का उपयोग खास तौर से तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक के कामों के लिए किया जाता है।

विशेष रूप से तांत्रिक प्रभावों को दूर करने या उनसे बचने के लिए लोग इन मंदिरों में आते हैं। इसके अलावा जब उन्हें लगता है कि वो या उनके परिवार का कोई सदस्य किसी बाहरी प्रभाव से ग्रस्त है तो वे वहां आते हैं। चूंकि तांत्रिक प्रक्रियाएं यहां की जाती हैं, इसलिए इन जगहों की ऊर्जाएं महिलाओं के लिए अनुकूल नहीं होती हैं। स्त्री को प्रकृति ने एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है - अगली पीढ़ी के निर्माण का, इसलिए उसका शरीर इस तरह की ऊर्जाओं को लेकर अधिक ग्रहणशील और नाजुक होता है। विशेष रूप से गर्भावस्था और मासिक धर्म के दिनों में तो इन ऊर्जाओं से प्रभावित होने या कहें चोटिल होने की संभावना और बढ़ जाती है। ते क्या महिलाओं को ऐसे मंदिर के गर्भगृह में बिल्कुल भी नहीं जाना चाहिए? अगर वो ठीक तरह से इसके लिए प्रशिक्षित हैं तो वो जा सकती हैं। लेकिन इस उद्देश्य के लिए पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को प्रशिक्षित करना बहुत मुश्किल काम है, सिर्फ इसलिए क्योंकि जीवन के इस मामले में पुरुषों को कुछ जैविक लाभ प्रकृति से पहले से ही मिले हुए हैं। महिलाओं की बायोलाॅजी की प्रकृति कुछ ऐसी है कि तंत्र-मंत्र की ये शक्तियां उनकी शारीरिक व मानसिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं। तंत्र मंत्र के प्रभावों को हटाने और झाड़-फूंक करने के लिए कुछ खास तरह की ऊर्जाओं का उपयोग किया जाता है जो महिलाओं के लिए बिल्कुल भी अच्छी नहीं होती। शनि अच्छा नहीं है। लेकिन वो हमारी जिंदगी का एक हिस्सा है। हमें उसका भी सामना करना है, उससे निपटना है। तंत्र-मंत्र की इन शक्तियों की वजह से महिलाओं से कहा जाता है कि वे वहां दाखिल न हों जहां इस तरह चीजें होती हैं। उनके शरीर के लिए यह अच्छा नहीं होता है। जब जीवन में कुछ चीजंे बिगड़ने लगती हैं तो आपको एक खास तरीके से उनसे निपटना पड़ता है। हो सकता है कि आपका तरीका सुखद न हो। ये मंदिर इन्हीं उद्देश्यों के लिए के लिए बनाए गये हैं। आज कुछ लोग इसे भेदभाव की नजर से देखते हैं। उनको लगता है कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाकर महिलाओं के साथ भेदभाव किया जा रहा है। यह भेदभाव नहीं बल्कि समझदारी है।

अगर किसी दिन पुरुष लिंग भैरवी के सामने विरोध प्रदर्शन करने लगें और गर्भगृह में दाखिल होना चाहें तो मैं लिंग भैरवी के द्वार पर ताला लगा दूंगा। मैं उनको गर्भगृह में दाखिल होने नहीं दूंगा क्योंकि ये पुरुषों के लिए नहीं बनाया गया है। ये भेदभाव नहीं है। ये विवेक से लिया गया निर्णय है जो बहुत जरूरी है।

हो सकता है कि जिस तरीके से इसे लागू किया जा रहा है वो तरीका अशिष्ट हो और उसे देखकर लगता हो कि ये भेदभाव की नीति है। इसी वजह से महिलाएं इसका विरोध कर रही हैं। अगर किसी दिन पुरुष लिंग भैरवी के सामने विरोध प्रदर्शन करने लगें और गर्भगृह में दाखिल होना चाहें तो मैं लिंग भैरवी के द्वार पर ताला लगा दूंगा। मैं उनको गर्भगृह में दाखिल होने नहीं दूंगा क्योंकि ये पुरुषों के लिए नहीं बनाया गया है, जब तक वो इसके लिए ठीक तरह से प्रशिक्षित नहीं किए जाएं। ये भेदभाव नहीं है। ये विवेक से लिया गया निर्णय है जो बहुत जरूरी है। ध्यानलिंग की व्यवस्था भी आधे चन्द्र मास तक पुरुष संभालते हैं और अगले आधे चन्द्रमास में इसका प्रबंधन महिलाओं के हाथों में चला जाता है। ध्यानलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कुछ इसी तरह की गई है। वेेलांगिरी हिल मंदिर जैसे कुछ खास मंदिरों में भी जाने से महिलाओं को रोक दिया जाता है। क्योंकि रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है। इस रास्ते पर पहले जंगली जानवरों का खतरा बना रहता था इसलिए ऐसा समझा जाता था कि यह रास्ता महिलाओं के लिए असुरक्षित है। लेकिन आज इन नियमों पर ढील दी जा सकती है। शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर जो मांग उठी है, इसके लिए जरुरत है लोगों को शिक्षित करने की, उन्हें इन मंदिरों के पीछे के विज्ञान के बारे में बताने की। हमें यह बताना चाहिए ये किन चीजों के बारे में हैं और क्यों इनको बनाया गया था। आज लोकतांत्रिक उत्साह के कारण हम समानता की स्थापना करना चाहते हैं लेकिन कई मामलों में यह कार्य महिलाओं के लिए अहितकारी होगा। वरना तो हम एक ही प्रजाति के दो लिंग हैं। इस तरह के कुछ मामलों के अलावा दो ही जगहों पर लिंग-भेद रखा जाना चाहिए - एक बाथरूम और दूसरा बेडरूम।

प्रेम और आशीर्वाद