Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 77,78 वीं (अंधकार-संबंधी तीन विधियां) विधियां क्या है?


विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 77 ;-

17 FACTS;-(अंधकार संबंधी दूसरी विधि)

1-भगवान शिव कहते है:-

‘जब चंद्रमाहीन वर्षा की रात उपलब्‍ध न हो तो आंखें बंद करो और अपने सामने अंधकार को देखो। फिर आंखे खोलकर अंधकार को देखो। इस प्रकार दोष सदा के लिए विलीन हो जाते है।’

2-अगर तुम आंखें बंद कर लोगे तो जो अंधकार मिलेगा वह झूठा अंधकार होगा।तो क्‍या किया जाए अगर चंद्रमाहीन रात, अंधेरी रात न हो। यदि चाँद हो और चाँदनी का प्रकाश हो तो क्‍या किया जाए? यह सूत्र उसकी कुंजी देता है।‘जब चंद्रमाहीन वर्षा की रात उपलब्‍ध न होतो आंखें

बंद करो और अपने सामने अंधकार को देखो।’आरंभ में यह अंधकार झूठा होगा।लेकिन तुम

इसे सच्‍चा बना सकते हो, और यह इसे सच्‍चा बनाने का उपाय है।

‘फिर आंखें खोलकर अंधकार को देखो।’

3-पहले अपनी आंखें बंद करो और अंधकार को देखो। फिर आंखें खोलों और जिस अंधकार को तुमने भीतर देखा उसे बाहर देखो। अगर बाहर वह विलीन हो जाए तो उसका अर्थ है कि जो अंधकार तुमने भीतर देखा था वह झूठा था।यह कुछ ज्‍यादा कठिन है। पहली विधि

में तुम असली अंधकार को भीतर लिए चलते हो। दूसरी विधि में तुम झूठे अंधकार को बाहर लाते हो। उसे बाहर लाते रहो। आंखें बंद करो अंधेरे को महसूस करो। आंखे खोलों और खुली आंखों से अंधेरे को बाहर फेंको। इस भांति तुम भीतर के झूठे अंधकार को बाहर फेंकते हो। उसे बाहर फेंकते रहो।

4-इसमें कम से कम तीन से छह सप्‍ताह का समय लगेगा।और तब एक दिन तुम अचानक भीतर के अंधकार को बाहर लाने में सफल हो जाओगे। और जिस दिन तुम भीतर के अंधकार को बाहर ला सको,तुमने सच्‍चे आंतरिक अंधकार को पा लिया। सच्‍चे को ही बाहर लाया जा सकता है। झूठे को नहीं लाया जा सकता है।यह एक बहुत अद्भुतअनुभव है। अगर तुम

भीतरी अंधकार को बाहर ला सकते हो तो तुम इसे प्रकाशित कमरे में भी बाहर ला सकते हो। और अंधकार का टुकड़ा तुम्‍हारे सामने फैल जाएगा। यह बहुत अद्भुत अनुभव है, क्‍योंकि कमरा प्रकाशित है। सूर्य के प्रकाश में भी यह संभव है; अगर तुम आंतरिक अंधकार को पा सके तो तुम उसे बाहर भी ला सकते हो। तुम उसे देख सकते हो।

5-एक बार तुम जान गए कि ऐसा हो सकता है तो तुम भरी दोपहरी में भी अंधेरी से अंधेरी से अंधेरी रात जैसा अंधकार फैला सकते हो। सूर्य मौजूद है और तुम अंधकार को फैल सकते हो।

तिब्‍बत में इसी तरह की अनेक विधियां है।वे चीजों को भीतरी जगत से बाहरी जगत में ला सकते है। एक प्रसिद्ध विधि है ... इसे ताप-योग कहते है। सर्द रात में, बर्फ जैसी सर्द रात में बर्फ गिर रही है। एक तिब्‍बती लामा उस सर्द राम में जब चारों और बर्फ गिर रही है।और तापमान शून्‍य से नीचे हो, खुले आकाश के नीचे बैठता है और उसके शरीर से पसीना बहने लगता है।

6-शरीर शास्‍त्र के हिसाब से ये चमत्‍कार है। पसीना कैसे निकलने लगता है। वह भीतरी ताप को बाहर ला रहा है। वैसे ही आंतरिक शीतलता को भी बाहर लाया जा सकता है।महावीर के

जीवन में उल्‍लेख है; अब तक किसी ने भी उसको समझा नहीं है।बल्कि लोग सोचते है कि महावीर कोई तप कर रहे थे। अब तक किसी ने भी उसको समझा नहीं है। कहां जाता है कि जब गर्मी होती है, सूर्य तपता है। तो महावीर सदा ऐसी जगह खड़े होते थे जहां कोई छाया, कोई वृक्ष नहीं होता, कुछ भी नहीं होता।

7-गर्मी के दिनों में वे जलती धूप में खड़े होते। और सर्दी के दिनों में वे कोई शीतल स्‍थान, वृक्ष की छाया या नदी का किनारा चुनते थे। जहां ताप शून्‍य से नीचे हो। सर्दी के समय में वे ध्‍यान करने के लिए सर्द स्‍थान चुनते थे और गर्मी के दिनों में गर्म स्‍थान चुनते थे।उनके अनुयायी सोचते है कि वे तप कर रहे थे।ऐसी बात नहीं है।असल में महावीर इसी तरह की किसी

आंतरिक विधि का प्रयोग कर रहे थे।

8-जब गर्मी पड़ती थी तो वे भीतरी शीतलता को बाहर लाने का प्रयोग कर रहे थे। और यह विपरीत स्‍थिति में ही अनुभव किया जा सकता है। जब सर्दी पड़ती थी तो भीतरी ताप को बाहर लाने का प्रयत्‍न करते थे। और यह भी प्रतिकूल पृष्‍ठभूमि में ही महसूस हो सकता है। वे शरीर के शत्रु नही थे, वे शरीर के विरोध में नहीं थे, जैसा कि लोग समझते है कि महावीर

शरीर को मिटाने में लगे थे। क्‍योंकि अगर तुम अपने शरीर को मिटा सको तो तुम अपनी कामनाओं को भी मिटा सकते हो। यह सत्य नहीं है। वे तप जैसा नहीं कर रहे थे। वे बस आंतरिक को बाहर ला रहे थे। और वे आंतरिक द्वारा सुरक्षित थे।

9-जैसे तिब्‍बती लामा गिरती बर्फ के नीचे ताप पैदा करके पसीना बहा सकते थे। वैसे ही महावीर जलती धूप में खड़े रहते और उन्‍हें पसीना नहीं आता था। वे अपनी आंतरिक शीतलता को बाहर ला रहे थे। वह आंतरिक शीतलता बाहर आकर उनके शरीर की रक्षा करती थी।

इस तरह तुम अपने आंतरिक अंधकार को बाहर ला सकते हो। और वह अनुभव बहुत शीतल होता है। अगर तुम उसे ला सके तो तुम उससे सुरक्षित रहोगे। कोई उत्‍तेजना कोई मनोवेग तुम्‍हें विचलित नहीं कर सकेगा।

10-तो प्रयोग करो। ये तीन बातें है। एक अंधकार में खुली आंखों से देखा और अंधकार को अपने भीतर प्रवेश करने दो। दूसरी अंधकार को अपने चारों और मां के गर्भ की तरह अनुभव करो, उसके साथ रहो ओर उसमें अपने को अधिकाधिक भूल जाओ। और तीसरी बात जहां भी जाओ अपने ह्रदय में अंधकार का एक टुकड़ा साथ लिए जाओ।अगर तुम यह कर सके तो

अंधकार प्रकाश बन जाएगा। तुम अंधकार के द्वारा बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हो जाओगे।

‘जब चंद्रमाहीन वर्षा की रता उपल्‍बध न हो तो आंखें बंद करो, और अपने सामने अंधकार को देखो, फिर आंखें खोल कर अंधकार को देखो।’

11-यह विधि है। पहले इसे भीतर अनुभव करो, गहन अनुभव करो, ताकि तुम उसे बाहर देख सको। फिर आंखों को अचानक खोल दो और बाहर अनुभव करो। इसमे थोड़ा समय जरूर

लगेगा।‘इस प्रकार दोष सदा के लिए विलीन हो जाते है।’अगर तुम आंतरिक अंधकार को

बाहर ला सके तो दोष सदा के लिए विलीन हो जाते है।क्‍योंकि आंतरिक अंधकार अनुभव में आ जाए तो तुम इतने शीतल, इतने शांत इतने अनुद्विग्‍न हो जाओगे कि दोष तुम्‍हारे साथ नहीं रह सकेगा।स्मरण रहे ,दोष तभी तक रहते है जब तक तुम उत्‍तेजित होने की हालत

में रहते हो।

12-दोष अपने आप नहीं रहते; वे तुम्‍हारी उत्‍तेजना की क्षमता में ही रहते है। कोई व्‍यक्‍ति तुम्‍हारा अपमान करता है और तुम्‍हारे भीतर उस अपमान को पीने के लिए अंधकार नहीं है, तुम जल भूल जाते हो। क्रोधित हो जाते हो। और तब कुछ भी संभव है। तुम हिंसक हो सकते हो। तुम वह सब कर सकते हो जो सिर्फ पागल आदमी कर सकता है। कुछ भी संभव है; अब तुम विक्षिप्‍त हो। फिर कोई व्‍यक्‍ति तुम्‍हारी प्रशंसा करता है और तुम दूसरे छोर पर विक्षिप्‍त हो। तुम्‍हारे चारों और स्थितियाँ है और तुम उन्‍हें चुपचाप आत्‍मसात करने में समर्थ नहीं हो।

13-किसी बुद्ध का अपमान करो। वे आत्‍मसात कर लेंगे। वे उसे पचा जाएंगे। कौन अपमान को पचा जाता है? अंधकार का, शांति का आंतरिक पुंज उसे पचा लेता है। तुम कुछ भी विषाक्‍त फेंको, वह आत्‍मसात हो जाता है। उससे कोई प्रति क्रिया नही लौटती है।इसे प्रयोग करो। जब

कोई तुम्‍हारा अपमान करे तो इतना ही स्‍मरण रखो कि मैंअंधकार से भरा हूं।और सहसा तुम्‍हें प्रतीत होगा कि कोई प्रतिक्रिया नहीं उठती है।वह बिलकुल प्रायोगिक विधि है। इसमें विश्‍वास करने की जरूरत नहीं है।

14-जब भी तुम्‍हें मालूम पड़े कि मैं वासना से, या कामना से, भरा हुआ हूं तो आंतरिक अंधकार को स्‍मरण करो। एक क्षण के लिए आंखें बंद करो। अंधकार की भावना करो और तुम देखोगें कि वासना विलीन हो गई है। कामना विदा हो गई है। आंतरिक अंधकार ने उसे पचा लिया। तुम एक असीम शून्‍य हो गए हो। जिसमें कोई भी चीज गिर कर फिर वापस लौट सकती है। तुम अब एक अतल खाई है।इसलिए भगवान शिव कहते है: ‘इस प्रकार दोष सदा

के लिए विलीन हो जाते है।’

15-ये विधियां आसान मालूम पड़ती है।वे आसान है। लेकिन क्‍योंकि वे सरल दिखती है, इसलिए उन्‍हें प्रयोग किए बगैर मत छोड़ दो। वे तुम्‍हारे अहंकार को चुनौती न भी दें तो भी प्रयोग करो। यह हमेशा होता है कि हम सरल चीजों को प्रयोग नहीं करते है। हम सोचते है कि वे इतनी सरल है कि सच नहीं हो सकती है। और सत्‍य सदा सरल होता है। वह कभी जटिल नहीं होता। उसे जटिल होने की जरूरत ही नहीं है। सिर्फ झूठ जटिल होता है। वह सरल नहीं हो सकता। अगर वह सरल हो तो उसका झूठ जाहिर हो जायेगा। और क्‍योंकि कोई चीज सरल मालूम पड़ती है।हम सोचते है कि इससे कुछ नहीं होगा।

16-ऐसा नहीं है कि उससे कुछ नहीं होता है। लेकिन हमारा अहंकार तभी चुनौती पाता है जब कोई चीज बहुत कठिन हो।तुम्‍हारे ही कारण अनेक संप्रदायों ने अपनी विधियों को जटिल

बना दिया है। उसकी कोई जरूरत नहीं है। लेकिन वे उसमे अनावश्‍यक जटिलता और अवरोध निर्मित करते है। ताकि वे कठिन हो सकें। ताकि वे तुम्‍हें भाएं। उनसे तुम्‍हारे अहंकार को चुनौती मिले।अगर कोई चीज बहुत कठिन हो, जिसे बहुत थोड़े लोग करने में समर्थ हों, तो तुम्‍हें लगता है कि यह करने जैसा है।चुनौती कोई अच्‍छी बात नहीं है, क्‍योंकि चुनौती से तुम ज्‍वर-ग्रस्‍त हो जाते हो।यह तुम्‍हें सिर्फ इसलिए करने जैसा लगता है। क्‍योंकि बहुत थोड़े लोग ही इसे कर सकते है।

17-ये विधियां एक दम सरल है।भगवान शिव तुम्‍हारा विचार नहीं करते है; वे विधि का वर्णन ठीक वैसा कर रहे है जैसा वह है। वे उसे सरलतम रूप में, कम से कम शब्‍दों में सूत्र के रूप में प्रकट कर रहे है। तो अपने अहंकार के लिए चुनौती मत खोजों। ये विधियां तुम्‍हें अहंकार की यात्रा पर ले जाने के लिए नहीं है। वे तुम्‍हारे अहंकार को कोई चुनौती नहीं देती। लेकिन यदि तुम इनका प्रयोग करोगे तो वे तुम्‍हें रूपांतरित कर देंगी।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 78;-

18 FACTS;-

(अंधकार संबंधी तीसरी विधि)

1-भगवान शिव कहते है:-

‘’जहां कहीं भी तुम्‍हारा अवधान (ATTENTION)उतरे, उसी बिंदु पर अनुभव।‘’

2-इस विधि में सबसे पहले तुम्‍हें अवधान साधना होगा, अवधान का विकास करना होगा। तुम्‍हें इस भांति का अवधान पूर्ण रूख, रुझान विकसित करना होगा; तो ही यह विधि संभव होगी। और तब जहां भी तुम्‍हारा अवधान उतरे, तुम अनुभव कर सकते हो ...स्‍वयं को अनुभव कर सकते हो। एक फूल को देखने भर से तुम स्‍वयं को अनुभव कर सकते हो।तब फूल को देखना सिर्फ फूल को ही देखना नहीं है। वरन देखने वाले को भी देखना है। लेकिन यह तभी संभव है जब तुम अवधान का रहस्‍य जान लो।

3-तुम भी फूल को देखते हो और तुम सोच सकते हो कि मैं फूल को देख रहा हूं। लेकिन तुमने तो फूल के बारे में विचार करना शुरू कर दिया और तुम फूल को चूक गये। तुम वहां नहीं हो जहां फूल है। तुम कहीं और चले गए, तुम दूर हट गए। अवधान का अर्थ है कि जब तुम फूल को देखते हो तो तुम फूल को ही देखते हो। कोई दूसरा काम नहीं करते हो ..मानों मत ठहर गया है। अब कोई विचारणा नहीं हे। फूल का सीधा अनुभव भर है। तुम यहां हो और फूल वहां है। और कोई विचारण नहीं, दोनों के बीच कोई विचार नहीं।

4-यदि यह संभव हो तो अचानक तुम्‍हारा अवधान फूल से लौटकर स्‍वयं पर आ जाएगा। एक वर्तुल बन जाएगा। तुम फूल को देखोगें और वह दृष्‍टि वापस लौटेंगी; फूल उसे वापस कर देगा, द्रष्‍टा पर ही लौटा देगा। अगर विचार नहीं तो यह घटित होता हे। तब तुम फूल को ही नहीं देखते, तुम देखने वाले को देखते हो। तब देखने वाला और फूल दो आब्जेक्ट्स हो जाते है। तुम दोनों के साक्षी हो जाते हो।

5-लेकिन पहले अवधान को प्रशिक्षित करना होगा। तुममें अवधान बिलकुल नहीं है। तुम्‍हारा अवधान सतत बदलता रहता है ...यहां से वहां से कही और। तुम एक क्षण के लिए भी अवधान पूर्ण नहीं रहते हो।यदि कोई बोल रहा तो तुम बात कभी नहीं सुनते। तुम एक शब्‍द सुनते हो और फिर तुम्‍हारा अवधान और कहीं चला जाता है। फिर तुम्‍हारा अवधान वापस उस बात पर आता है। फिर तुम एक शब्‍द सुनते हो, फिर तुम्‍हारा ध्‍यान कही और चला जाता है।

तुम थोड़े से शब्‍द सुनते हो और बाकी के खाली स्‍थानों पर अपने शब्‍द डाल लेते हो। और सोचते हो कि तुमने उसे सुना है।

6-और तुम जो भी सुनते हो वह तुम्‍हारी अपनी रचना है, तुम्‍हारा अपना धंधा है। तुमने किसी से थोड़े से शब्‍द सुने और खाली जगह पर अपने शब्‍द भर दिये। और तुम जितनी खाली जगह को भरते हो, वह पूरी चीज को बदल देती है।कोई एक शब्‍द बोलता हैऔर तुमने उसके संबंध में

झट सोचना शुरू कर दिया; तुम मौन नहीं रह सकते। यदि तुम सुनते हुए मौन रह सको तो तुम अवधान पूर्ण हो। अवधान का अर्थ है वह मौन सजगता। वह शांत बोध। जिसमें विचारों का कोई व्‍यवधान न हो, बाधा न हो।

7- अवधान का विकास करो। और उसे करके ही तुम उसका विकास कर सकते हो; इसके अतिरिक्‍त कोई मार्ग नहीं है। अवधान दो, उसे बढ़ाते जाओ,प्रयोग से वह विकसित होगा। कुछ भी करते हुए। कहीं भी तुम अवधान को विकसित कर सकते हो। तुम कार में या रेलगाडी में यात्रा कर रहे हो। वही अवधान को बढ़ाने का प्रयोग करो। समय मत गंवाओ। तुम आधा घंटा कार या रेलगाड़ी में रहने वाले हो; वही अवधान साधो। बस वहां होओ। विचार मत करो। किसी व्‍यक्‍ति को देखो, रेलगाड़ी को देखो या बाहर देखो,पर द्रष्‍टा रहो। विचार मत करो। वहां होओ और देखो। तुम्‍हारी दृष्‍टि सीधी, प्रत्‍यक्ष और गहरी हो जाएगी। और तब सब तरफ से तुम्‍हारी दृष्‍टि वापस लौटने लगेगी। और तुम द्रष्‍टा के प्रति बोध से भर जाओगे।

8-तुम्‍हें अपना बोध नहीं है। तुम अपने प्रति सावचेत नहीं हो। क्‍योंकि विचारों की एक दीवार है। जब तुम एक फूल को देखते हो तो पहले तुम्‍हारे विचार तुम्‍हारी दृष्‍टि को बदल देते है; वह उसे अपना रंग दे देते है। और वह दृष्‍टि वापस आती है। वह तुम्‍हें कभी वहां नहीं पाती; तुम कहीं और चले गए होते हो। तुम वहां नहीं होते हो।प्रत्‍येक दृष्‍टि वापस लौटती है। प्रत्‍येक चीज

प्रतिबिंबित होती है। प्रतिसंवेदित होती है। लेकिन तुम उसे ग्रहण करने के लिए वहां मौजूद नहीं होते। तो उसके ग्रहण के लिए मौजूद रहो। पूरे दिन तुम अनेक चीजों पर यह प्रयोग कर सकते हो। और धीरे-धीरे तुम्‍हारा अवधान विकसित होगा। तब इस अवधान के साथ एक प्रयोग करो।

‘जहां कहीं भी तुम्‍हारा अवधान उतरे, उसी बिंदु पर, अनुभव।’

9-तब कहीं भी देखा, लेकिन देखो। अब अवधान वहां है। अब तुम स्‍वयं को अनुभव करोगे। लेकिन पहली शर्त है अवधान पूर्ण होने की क्षमता को प्राप्‍त करना। और तुम इसका अभ्‍यास कही भी कर सकते हो। उसके लिए अतिरिक्‍त समय की जरूरत नहीं है। तुम जो भी कर रहो हो, भोजन कर रहे हो, या स्‍नान कर रहे हो, बस अवधान पूर्ण होओ।लेकिन समस्‍या क्‍या है?

समस्‍या यह है कि हम सब काम मन के द्वारा करते है। और हम निरंतर भविष्‍य के लिए योजनाएं बनाते है। तुम रेलगाड़ी में सफर कर रहे हो और तुम्‍हारा मन किन्‍हीं दूसरी यात्राओं के आयोजन में व्‍यस्‍त है। उनके कार्यक्रम बनाने में संलग्‍न है। इसे बंद करो।

10-झेन संत बोकोजू ने कहा है: ‘मैं यही एक ध्‍यान जानता हूं। जब में भोजन करता हूं तो भोजन करता हूं। जब मैं चलता हूं तो चलता हूं। और जब मुझे नींद आती है तो मैं सो जाता हूं। जो भी होता है; होता है, उसमें मैं कभी हस्‍तक्षेप नहीं करता।’इतना ही करने को है कि हस्‍तक्षेप

मत करो। और जो भी घटित होता हो उसे घटित होने दो। तुम सिर्फ वहां मौजूद रहो। यही चीज तुम्‍हें अवधान पूर्ण बनाएगी। और जब तुम्‍हें अवधान प्राप्‍त हो जाए तो यह विधि तुम्‍हारे हाथ में है।

‘जहां कहीं भी तुम्‍हारा अवधान उतरे, उसी बिंदु पर, अनुभव।’

11-तुम अनुभव करने वाले को अनुभव करोगे। तुम स्‍वयं पर लौट आओगे। सब जगह से तुम प्रतिबिंबित होगे। सब जगह से तुम प्रतिध्‍वनित होगे। सारा अस्‍तित्‍व दर्पण बन जाएगा। तुम सब जगह प्रति बिंबित होगे। पूरा अस्‍तित्‍व तुम्‍हें प्रतिबिंबित करेगा।और केवल तभी तुम स्‍वयं को

जान सकते हो। उसके पहले नहीं । जब तक समस्‍त अस्‍तित्‍व ही तुम्‍हारे लिए दर्पण न बन जाए। जब तक अस्‍तित्‍व का कण-कण तुम्‍हें प्रकट न करे; जब तक प्रत्‍येक संबंध तुम्‍हें विस्‍तृत न करे…।

12-तुम इतने असीम हो कि छोटे दर्पणों से नहीं चलेगा। तुम अंतस से इतने विराट हो कि जब तक सारा आस्‍तित्‍व दर्पण न बने, तुम्‍हें झलक नहीं मिल पाएगी। जब समस्‍त अस्‍तित्‍व दर्पण बन जाता है, केवल तभी तुम प्रतिबिंबित हो सकते हो। तुम्‍हारे भीतर परब्रह्म विराजमान है।

और अस्‍तित्‍व को दर्पण बनाने की विधि है ...अवधान पैदा करो, ज्‍यादा सावचेत बनो, और जहां कहीं तुम्‍हारा अवधान उतरे ..जहां भी, जिस किसी विषय पर भी तुम्‍हारा ध्‍यान जाए ..अचानक स्‍वयं को अनुभव करो।

13-यह संभव है। लेकिन अभी तो यह असंभव है। क्‍योंकि तुमने बुनियादी शर्त नहीं पूरी की है। तुम एक फूल को देख सकते हो। लेकिन वह अवधान नहीं है। अभी तो तुम फूल के चारों और बाहर-भीतर धूम रहे हो। तुमने भागते-भागते फूल को देखा है; तुम उसके साथ क्षण भर के लिए नहीं रहे हो। रुको, अवधान पैदा करो, सावचेत बनो, और समस्‍त जीवन ध्‍यान पूर्ण हो

जाता है।‘जहां कहीं भी तुम्‍हारा अवधान उतरे, उसी बिंदु पर, अनुभव।’बस स्‍वयं को स्‍मरण करो।

14-इस विधि के सहयोगी होने का एक गहरा कारण है। तुम एक गेंद को दीवार पर मारो; गेंद वापस लौट आयेगी। जब तुम किसी फूल या किसी चेहरे को देखते हो तो तुम्‍हारी कुछ उर्जा उस दशा में गति कर रही है। तुम्‍हारा देखना ही उर्जा है। तुम्‍हें पता नहीं है कि जब तुम देखते हो तो तुम उर्जा दे रहे हो। थोड़ी ऊर्जा फेंक रहे हो। तुम्‍हारी ऊर्जा का, तुम्‍हारी जीवन ऊर्जा का एक अंश फेंका जा रहा है। यही कारण है कि दिन भर रास्‍ते पर देखते-देखते तुम थक जाते हो। चलते हुए लोग, विज्ञापन, भीड़ दुकानें—इन्‍हें देखते देखते। तुम थकान अनुभव करते हो। और आराम करने के लिए आंखें बंद कर लेना चाहते हो। क्‍या हुआ? तुम इतने थके माँदे क्‍यों हो? क्योकि तुम ऊर्जा फेंकते रहे हो।

15-बुद्ध और महावीर दोनों इस पर जोर देते थे कि उनके शिष्‍य चलते हुए दूर तक न देखें। जमीन पर दृष्‍टि रखकर चलें। बुद्ध कहते थे कि तुम सिर्फ चार फीट आगे तक देख सकते हो। इधर-उधर कहीं मत देखो। सिर्फ अपनी राह को देखो जिस पर चल रहे हो। चार फीट आगे सरक जाएगी। उससे ज्‍यादा दूर मत देखो। क्‍योंकि तुम्‍हें अकारण अपनी ऊर्जा का अपव्‍यय नहीं करना है।

16-जब तुम देखते हो तो तुम थोड़ी ऊर्जा बाहर फेंकते हो। रुको, मौन प्रतीक्षा करो,उस ऊर्जा को वापस आने दो। और तुम चकित हो जाओगे। अगर तुम ऊर्जा को वापस आने देते हो तो तुम कभी नहीं थकोंगे। इस विधि का प्रयोग करो। शांत हो जाओ। किसी चीज को देखो।शांत रहो। उसके बारे में विचार मत करो। और एक क्षण धैर्य से प्रतीक्षा करो। ऊर्जा वापस आएगी। असल में तुम और भी प्राणवान हो जाओगे।

17- तुम रोज बारह घंटे पढ़ सकते हो और कभी-कभी अठारह घंटे भी;लेकिन अगर तुम निर्विचार मौन होकर पढ़ो तो ऊर्जा वापस आ जाती है।आंखों में कभी कोई अड़चन, कभी कोई थकान अनुभव नहीं होगी क्‍योंकि ऊर्जा व्‍यर्थ नहीं होती है। और तुम कभी थकान अनुभव नहीं करोगे।

18-निर्विचार अवस्‍था में ऊर्जा लौट आती है। कोई बाधा नहीं पड़ती है। और अगर तुम वहां मौजूद हो तो तुम उसे पुन: आत्‍मसात कर लेते हो। और वह पुन: आत्‍मसात करना तुम्‍हें पुनरुज्जीवित कर देता है। सच तो यह है कि तुम्‍हारी आंखें थकनें के बजाय ज्‍यादा शिथिल, ज्‍यादा प्राणवान, ज्‍यादा ऊर्जावान हो जाती है।

....SHIVOHAM...