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।। परकाया प्रवेश साधना ज्ञान ।।


परकाया प्रवेश साधना ज्ञान ।। जब साधक की कुंडली पूर्ण जाग्रत हो जाती है तब साधक किसी मृत देह को जो किसी हार्ट अटैक,फांसी से,जल में दम घुटने से प्राप्त होती है उसमे अपनी आत्मा को प्रवेश कराता है और उस शरीर को धारण कर लेता है। पुराना शरीर कहीं फ़ेंक देता है जो जंगली जानवरो के भोजन के काम आता है। इस साधना में साधक की आत्मा अनाहत चक्र से बाहर निकलती है ह्रदय स्थल से और संकल्प मात्र से साधक दूसरे शरीर में प्रवेश कर लेता है। शरीर की सभी प्राण वायु आत्मा तत्व में खींचकर अनाहत चक्र में आ जाती है।जैसे चेनल गेट को खोलते है और बन्द करते हैं। अगर साधक वापस अपने शरीर में आना चाहता है तो पुनः संकल्प मात्र से वापस आ जाता है। योग से 8 वर्ष,मन्त्र से 2 वर्ष और देव वरदान साधना से 41 दिन में साधक परकाया सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इस शक्ति का उपयोग आदि शंकराचार्य ने किया था जब शास्त्र तर्क में वो कामकला का वर्णन नही कर पाये थे और एक मृत राजा की देह में जाकर 1 माह तक काम का अनुभव कर वापस अपनी देह में आकर शास्त्रार्थ जीता था। किन्तु कुछ लोग इसका दुरूपयोग भी करते है जैसे किसी जीवित देह को छीन कर उसकी आत्मा को बाहर कर देना और उससे सम्बंधित स्त्री का भोग करना।यह गलत कार्य है।अतः इस साधना को सिखाना बन्द कर दिया है।ऐसे कामांध साधक किसी भी स्त्री को पाने के लिए उसके पति की देह में आ जाते है और अपना कार्य सिद्ध करते है। कुछ साधक मानव भलाई करते हुए देह बदलते है और धर्म की रक्षा करते है।;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

किसी दुसरे के शरीर में प्रवेश करने को परकाया प्रवेश कहते हैं। यह अति उच्च स्तिरीय गुप्त विद्या है और इसे प्रयोग करने के लिए नियम भी बहुत सख्त हैं। साथ-साथ इसमें खतरा भी हद से ज्यादा है। अति उच्च स्तर के सिद्ध योगी ही ऐसा करने मे सक्षम हैं। परकाया प्रवेश ज्यादातर मृत शरीर में ही होता है। क्योकिं जिवित शरीर में पहले से ही आत्मा विद्यमान है, अतः उसमें प्रवेश के कुछ द्सरे असाधरण नियम है।

जिवित शरीर में पहले से मौजूद आत्मा के समानान्तर खुद को उस शरीर में स्थापित करना इतना आसान नही है। इस तरह के मामलों में उस जिवित शरीर से इज़ाज़त लेने का प्रावधान है। किसी जिवित शरीर में प्रवेश के लिए दुष्टात्माएं अत्याचार का सहारा लेती हैं, वही पवित्र आत्मांए मर्यादाओं और नियमों का पालन करती हैं। दोंनों ही परिस्थितियों में शरीरी आत्मा को पता होता है कि उसके शरीर में किसी अन्य आत्मा का प्रवेश हुआ है। असल में दुष्टात्माएं परमात्मा से नही डरती, जबकि पवित्र आत्माएं, परमात्मा का आदर करती हैं और सृष्टि के नियमों का पालन करती हैं।

कुछ विशेष नियम

शुद्ध और पुर्ण स्वच्छ जिवित शरीर में केवल पवित्र आत्माएं ही प्रवेश कर सकती है। अशुद्ध और अस्वच्छ जिवित शरीर में ही बुरी आत्माएं प्रवेश करती हैं। धर्म स्थलों पर बुरी आत्माओं को सामान्यतः सीधे प्रवेश की इज़ाज़त नही है। ऐसा करने पर उनके सुक्ष्म शरीर में आग लग जाती है और उन्हें वहां से भागना ही पडता है। अशरीरी आत्मा केवल जिवित शरीर में ही प्रवेश करके ही धर्म स्थलों पर प्रवेश कर सकती है। ऐसे में उसे कुछ नही होता पर जिवित शरीरधारी आत्मा वहां खुद को असहज महसूस करेगी। उसका स्वभाव बदल जायेगा। पूजा पाठ या धर्म कर्म करने वाले इन्सान की पवित्र एवं ताकतवर दिव्य शक्तियां रक्षा करती हैं। वे उसे बुराई से बचाती हैं। बुराई पंचप्रेत पर चलती है। ये पंचप्रेत हैंः काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार। पंचप्रेत से विकार उत्पन्न होता है और विकार से पाप उत्पन्न होता है। विकार से ग्रसित पाप-आत्मा ही बुरी आत्माओं का शिकार बनती हैं। परकाया प्रवेश करने वाली आत्मा जिवित शरीरधारी आत्मा के कर्मों को जानने के बाद ही उसमें प्रवेश करती हैं क्योंकि हर शरीर हर आत्मा के काम का नही होता। खुद को शरीर और कपडों से पूरी तरह पाक साफ़ रख कर बुरी आत्माओं के प्रभाव से काफ़ी हद तक बचा जा सकता है। इसलिए साफ़ सफ़ाई का विशेष ख्याल रखिए। परमात्मा की पूजा उपासना करने वाले से बुरी आत्माएं डरती है। ऐसे इन्सान की आत्मिक शक्ति बहुत ज्यादा होती है। उससे बुरी आत्माएं सदा दूर रहती हैं। परमात्मा की पूजा उपासना से ही कल्याण होता है। ॐ की पूजा किजिए। सदा ॐ का मनन चिन्तन किजिए। ॐ का ध्यान किजिए। ॐ ही परमात्मा है। ॐ ही इस सृष्टि का सबसे बडा सत्य है। यही जीवन का आधार है। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; कुण्डलिनी शक्ति से ही साधक किसी भी बीमार को ठीक कर सकता है।किसी को श्राप भी दे सकता है या अदृश्य तरंगो की अग्नि से जला सकता है। परकाया प्रवेश;- पातंजलि योग दर्शन’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण, परकाया प्रवेश जैसी अनेकों योग विभूतियों का वर्णन है।

मरने के बाद सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तो उसके साथ अन्य सूक्ष्म परमाणु कहिए या कर्म भी गमन करते हैं जो उनके परिमाप के अनुसार अगले जन्म में रिफ्लेक्ट होते हैं, जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि। इस सूक्ष्म शरीर को मरने से पहले ही जाग्रत कर उसमें स्थिति हो जाने वाला व्यक्ति ही परकाय प्रवेश सिद्धि योगा में पारंगत हो सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यह कि खुद के शरीर पर आपका कितना कंट्रोल है? योग अनुसार जब तक आप खुद के शरीर को वश में करन नहीं जानते तब तक दूसरे के शरीर में प्रवेश करना मुश्किल होगा।पातंजलि योग दर्शन’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण, परकाया प्रवेश जैसी अनेकों योग विभूतियों का वर्णन है।

मरने के बाद सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तो उसके साथ अन्य सूक्ष्म परमाणु कहिए या कर्म भी गमन करते हैं जो उनके परिमाप के अनुसार अगले जन्म में रिफ्लेक्ट होते हैं, जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि। इस सूक्ष्म शरीर को मरने से पहले ही जाग्रत कर उसमें स्थिति हो जाने वाला व्यक्ति ही परकाय प्रवेश सिद्धि योगा में पारंगत हो सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यह कि खुद के शरीर पर आपका कितना कंट्रोल है? योग अनुसार जब तक आप खुद के शरीर को वश में करन नहीं जानते तब तक दूसरे के शरीर में प्रवेश करना मुश्किल होगा।

दूसरों के शरीर में प्रवेश करने की विद्या को परकाय प्रवेश योग विद्या कहते हैं। आदि शंकराचार्य इस विद्या में अच्छी तरह से पारंगत थे। नाथ संप्रदाय के और भी बहुत से साधक इस तकनीक से अवगत थे, लेकिन आम जनता के लिए तो यह बहुत ही कठिन जान पड़ता है। क्यों?

योग में कहा गया है कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है ‘चित्त की वृत्तियां’। इसीलिए योग सूत्र का पहला सूत्र है- योगस्य चित्तवृत्ति निरोध:। इस चित्त में हजारों जन्मों की आसक्ति, अहंकार काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से उपजे कर्म संग्रहित रहते हैं, जिसे संचित कर्म कहते हैं।

यह संचित कर्म ही हमारा प्रारब्ध भी होते हैं और इसी से आगे की दिशा भी तय होती है। इस चित्त की पांच अवस्थाएं होती है जिसे समझ कर ही हम सूक्ष्म शरीर को सक्रिय कर सकते हैं। सूक्ष्म शरीर से बाहर निकल कर ही हम दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

इस चित्त या मानसिक अवस्था के पांच रूप हैं:- (1)क्षिप्त (2) मूढ़ (3)विक्षिप्त (4)एकाग्र और (5)निरुद्व। प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ मानसिक वृत्तियों का निरोध होता है।

(1)क्षिप्त : क्षिप्त अवस्था में चित्त एक विषय से दूसरे विषय पर लगातार दौड़ता रहता है। ऐसे व्यक्ति में विचारों, कल्पनाओं की भरमार रहती है। (2)मूढ़ : मूढ़ अवस्था में निद्रा, आलस्य, उदासी, निरुत्साह आदि प्रवृत्तियों या आदतों का बोलबाला रहता है। (3)विक्षिप्त : विक्षिप्तावस्था में मन थोड़ी देर के लिए एक विषय में लगता है पर क्षण में ही दूसरे विषय की ओर चला जाता है। पल प्रति‍पल मानसिक अवस्था बदलती रहती है। (4)एकाग्र : एकाग्र अवस्था में चित्त देर तक एक विषय पर लगा रहता है। यह अवस्था स्थितप्रज्ञ होने की दिशा में उठाया गया पहला कदम है। (5)निरुद्व : निरुद्व अवस्था में चित्त की सभी वृत्तियों का लोप हो जाता है और चित्त अपनी स्वाभाविक स्थिर, शान्त अवस्था में आ जाता है। अर्थात व्यक्ति को स्वयं के होने का पूर्ण अहसास होता है। उसके उपर से मन, मस्तिष्क में घुमड़ रहे बादल छट जाते हैं और वह पूर्ण जाग्रत रहकर दृष्टा बन जाता है। यह योग की पहली समाधि अवस्था भी कही गई है।

*ध्यान योग का सहारा : निरुद्व अवस्था को समझें यह व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करती है। यही व्यक्ति का असली स्वरूप है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए सांसार की व्यर्थ की बातों, क्रियाकलापों आदि से ध्यान हटाकर संयमित भोजन का सेवन करते हुए प्रतिदिन ध्यान करना आवश्यक है। इस दौरान कम से कम बोलना और लोगों से कम ही व्यवहार रखना भी जरूरी है।

*ज्ञान योग का सहारा : चित्त की वृत्तियों और संचित कर्म के नाश के लिए योग में ज्ञानयोग का वर्णन मिलता है। ज्ञानयोग का पहला सूत्र है कि स्वयं को शरीर मानना छोड़कर आत्मा मानों। आत्मा का ज्ञान होना सूक्ष्म शरीर के होने का आभास दिलाएगा।

कैसे होगा यह संभव : चित्त जब वृत्ति शून्य (निरुद्व अवस्था) होता है तब बंधन के शिथिल हो जाने पर और संयम द्वारा चित्त की प्रवेश निर्गम मार्ग नाड़ी के ज्ञान से चित्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। यह बहुत आसान है, चित्त की स्थिरता से सूक्ष्म शरीर में होने का अहसास बढ़ता है। सूक्ष्म शरीर के निरंतर अहसास से स्थूल शरीर से बाहर निकलने की इच्‍छा बलवान होती है।

*योग निंद्रा विधि : जब ध्यान की अवस्था गहराने लगे तब निंद्रा काल में जाग्रत होकर शरीर से बाहर निकला जा सकता है। इस दौरान यह अहसास होता रहेगा की स्थूल शरीर सो रहा है। शरीर को अपने सुरक्षित स्थान पर सोने दें और आप हवा में उड़ने का मजा लें। ध्यान रखें किसी दूसरे के शरीर में उसकी इजाजत के बगैर प्रवेश करना अपराध है।

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दूसरों के शरीर में प्रवेश करने की विद्या को परकाय प्रवेश योग विद्या कहते हैं। आदि शंकराचार्य इस विद्या में अच्छी तरह से पारंगत थे। नाथ संप्रदाय के और भी बहुत से साधक इस तकनीक से अवगत थे, लेकिन आम जनता के लिए तो यह बहुत ही कठिन जान पड़ता है। क्यों?पुनर्जन्म की तरह परकाया प्रवेश अर्थात् एक भौतिक शरीर से दूसरे भौतिक शरीर में प्रवेश करना भी पूर्णतया सत्य है। एक बार वेदांत के महाज्ञाता आद्य शंकराचार्य का एक विदूषी महिला भारती से शास्त्रार्थ हुआ। धर्म दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान अन्य विषयों में तो जीत गए परन्तु एक विषय में शास्त्रार्थ उनको बीच में ही रोकना पड़ा। महिला ने कामशास्त्र विषय छेड़कर परिस्थिति ही बिल्कुल विपरीत कर दी थी। विषयक चर्चा के लिए शंकराचार्य जी बिल्कुल ही अबोध और अन्जान थे। व्यवहार में आए बिना इस विषय पर चर्चा करना भी उनके लिए असम्भव था। उन्होंने ज्ञान प्राप्त करने के लिए समय मांगा। इस समयावधि में उन्होंने अपने सूक्ष्म शरीर को एक राजा के शरीर प्रवेश करवाया। दो शरीरों के मिलन का अनुभव अर्जित किया और तदनुसार भारती से चर्चा करके उसको शास्त्रार्थ में पराजित किया। परकाया प्रवेश का यह एक बहुत बड़ा उदाहरण है। हमारे दो शरीर हैं। एक स्थूल जो दृष्ट है और दूसरा सूक्ष्म शरीर जो सर्व साधारण को दृष्ट नहीं है। इसके रूप-स्वरूप की अलग-अलग तरीकों से परिकल्पनाएं की गयी हैं। परन्तु शास्त्र सम्मत सूक्ष्म शरीर की लम्बाई मात्र अंगूठे के बराबर मानी गयी है। इसका स्वरूप इतना अधिक पारदर्शी है कि प्रकाश भी उसके आर-पार जा सकता है। जैन धर्म में सूक्ष्मतर शरीर अर्थात् आत्मा को अरूप, अगन्ध, अव्यक्त, अशब्द, अरस, चैतन्यस्वरूप और इन्द्रियों द्वारा अग्राह्य कहा गया है। स्थूल और सूक्ष्म के अतिरिक्त आत्मा को धर्म में संसारी और मुक्त रूप से जाना गया है। पुनर्जन्म और परकाया प्रवेश दोनों का वस्तुतः एक ही अर्थ है – एक को छोड़कर दूसरा नवीन शरीर धारण करना। अन्तर केवल इतना है कि पुनर्जन्म विधिगत नियमों अर्थात प्रारब्ध और संचित कर्मानुसार प्राकृतिक रूप से होता है। परन्तु परकाया प्रवेश स्वेच्छा से धारण किया जा सकता है और यह सरल नहीं है। कोई बिरला योगी, संत महात्मा तथा सिद्ध पुरूष आदि ही अपनी प्रबल इच्छा शक्ति अथवा योगक्रियाओं के द्वारा परकाया प्रवेश कर सकता है। भौतिक वाद से दूर सत्कमरें और पूर्णतयः अध्यात्म से जुड़ा कोई साधारण सा साधक भी अपनी स्वेच्छा से किसी दूसरे भौतिक शरीर में प्रवेश कर सकता है। प्राणायाम और योग साधना के पारगंत रेचक प्राणायाम पर पूर्ण नियत्रंण के बाद कुण्डलनी से सूक्ष्म शरीर अर्थात् आत्मा को बाहर निकालकर वांछित किसी भी अन्य भौतिक शरीर में प्रवेश करवा सकते हैं। शंकराचार्य जी ने ऐसे ही राजा के शरीर में अपने सूक्ष्मतम शरीर का परकाया प्रवेश करवाया था। रामायण, महाभारत, पुराण आदि मान्य ग्रंथों के अतिरिक्त अन्य प्रामाणिक ग्रंथों में भी परकाया प्रवेश के अनेकों विवरण मिलते हैं। – ‘अष्टांग योग’ के अनुसार इन्द्रियों को नियंत्रित करके, निष्काम कर्मानुसार साधक के सूक्ष्म शरीर अर्थात् आत्मा को अन्य किसी जीवित अथवा मृत शरीर में प्रवेश करवाया जा सकता है। – ‘योग वशिष्ठ’ के अनुसार रेचक प्राणायाम के सतत् अभ्यास के बाद अन्य शरीर में आत्मा का प्रवेश किया जा सकता है। – ‘भगवान् शंकराचार्या घ्’ के अनुसार यदि सौन्दर्य लहरी के 87वें क्रमांक का श्लोक नित्य एक सहस्त्र बार जप कर लिया जाए तो परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। – ‘तंत्र सार’, ‘मंत्र महार्णव’, ‘मंत्र महोदधि’ आदि तंत्र सम्बधी प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार आकाश तत्त्व की सिद्धि के बाद परकाया प्रवेश सम्भव होने लगता है। खेचरी मुद्रा का सतत् अभ्यास और इसमें पारंगत होना परकाया सिद्धि प्रक्रिया में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होता है। – ‘व्यास भाष्य’ के अनुसार अष्टांग योग अर्थात यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभ्यास और निष्काम भाव से भौतिक संसाधनों का त्याग और नाड़ियों में संयम स्थापित करके चित्त के उनमें आवागमन के मार्ग का आभास किया जाता है। चित्त के परिभ्र्रमण मार्ग का पूर्ण ज्ञान हो जाने के बाद साधक, योगी, तपस्वी अथवा संत पुरूष अपनी समस्त इन्द्रियों सहित चित्त को निकालकर परकाया प्रवेश कर जाते हैं। – ‘भोजवृत्ति’ के अनुसार भौतिक बन्धनों के कारणों को समाधि द्वारा शिथिल किया जाता है। नाड़ियों में इन बन्धनों के कारण ही चित्त अस्थिर रहता है। नाड़ियों की शिथिलता से चित्त को अपने लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त होने लगता है। इस अवस्था में पहुँचने के बाद योगी, साधक अथवा अन्य अपने चित्त को इन्द्रियों सहित दूसरे अन्य किसी शरीर में प्रविष्ट करवा सकता है। – यूनानी पद्धति के अनुसार परकाया प्रवेश को छाया पुरूष से जोड़ा गया है। परकाया सिद्धि के लिए विभिन्न त्राटक क्रियाओं द्वारा इसको सिद्ध किया जा सकता है। हठ योगी परकाया प्रवेश सिद्धि में त्राटक क्रियाओं द्वारा मन की गति को स्थिर और नियंत्रित करने के बाद परकाया प्रवेश में सिद्ध होते हैं। परकाया प्रवेश ध्यान योग, ज्ञान योग और योग निंद्रा द्वारा सम्भव हो सकता है। सांसारिक बंधनों से मुक्ति के मार्ग तलाशना और उनसे धीरे-धीरे विरक्त होते जाना तथा मौन, अल्पाहार और आत्मकेन्द्रित मनः स्थिति द्वारा ध्यान योग में सिद्धहस्त होकर परकाया प्रवेश सिद्धि का एक अच्छा उपक्रम है। कुल सार-सत यह है कि आत्मा के तीन स्वरूप है-जीवात्मा जो भौतिक शरीर में वास करता है। जीवात्मा जब वासनामय शरीर में निवास करता है तो वह प्रेतात्मा स्वरूप कहलाता है। इन दोनों से अलग आत्मा का तीसरा स्वरूप है सूक्ष्म आत्मा। ज्ञान योग के द्वारा चित्त की वृत्तियों और संचित कर्मों का शमन करके आत्मज्ञान अर्थात् स्वयं के शरीर को एक देह न मानकर आत्मा मानना। जब यह भावना बलवती हो जाती है तब ही ध्यान भी लगता है और धीरे-धीरे यह अभ्यास चित्त को ध्यान की एक चरम अवस्था में ले जाता है। ऐसे में भौतिक शरीर का आभास तो स्वतः ही पूर्णतया समाप्त हो जाता है और तब सूक्ष्म शरीर का आभास होने लगता है। यहाँ से भी अनेक अवस्थाएं सामने आती हैं। साधक या तो चिर निद्रा में चला जाता है अथवा अर्धचेतन अवस्था में समाधिस्थ हो जाता है। यही कहीं एक ऐसी अवस्था भी आती है जो सूक्ष्म आत्मा को वायव्य गुणों से पूर्ण कर देती है और तब इच्छानुसार उसको किसी अन्य शरीर में प्रवेश करवाया जा सकता है।

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क्या आप चाहते हैं अपने शरीर से बाहर निकलकर उड़ते हुए देश-दुनिया में घूमना?

ध्वनि की गति से भी तेज गति से उड़कर आप अमेरिका या अमेरिका से भारत आ सकते हैं। निश्चित ही सुनने में यह आपको कठिन, अजीब या हास्यापद लगे, लेकिन यह बहुत ही आसान है। आप इसे आजमाएंगे तो निश्चित ही सफल हो जाएंगे। आप सूक्ष्म शरीर से बाहर निकलकर पुन: अपने शरीर में लौट सकते हैं।

जिन्होंने उपनिषदों और ध्यान की सभी विधियों का अध्ययन किया है संभवत: वे जानते हैं कि यह कैसे संभव होगा। दरअस्ल अब तो यह वैज्ञानिकों के द्वारा भी सिद्ध हो चुका है कि व्यक्ति के भीतर एक और शरीर होता है जो नाभि और मस्तिष्क के केंद्र से जुड़ा होता है। इसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं।

जब हम सो जाते हैं तो हमारा सूक्ष्म शरीर सक्रिय हो जाता है। यह शरीर ही स्वप्न देखता है और यही शरीर जागृत अवस्था में कल्पना करने की शमता रखता है। इसी से हमारे मन और बुद्धि जुड़ी हुई है; जिसका केंद्र है हमारे स्थूल मस्तिष्क के बीच स्थित पीनियल ग्रंथि। नाभि में उर्जा का मुख्‍य केंद्र होता है जबकि मस्तिष्क में चेतना का।

पहली स्टेप : साक्षी भाव या जागरण क्या है इसे अच्छी तरह समझकर यदि आप लगातार तीन माह तक ध्यान करते हैं तो यह सूक्ष्म शरीर और ज्यादा सक्रिय होकर आपके शरीर से बाहर निकलने के लिए तैयार हो जाता है। चलते, फिरते, देखते, सुनते, सोते, जागते आदि किसी भी कार्य को करते वक्त आप साक्षी भाव में रहे। अर्थात अपनी हर हरकत को देखने वाले बनें उसमें इनवाल्व होने वाले नहीं। जैसे कुछ लोग फिल्म देखते वक्त उसमें इतने इनवाल्व हो जाते हैं कि हंसने, रोने या भावुक होने लगते हैं। इसे भी बेहोशी से भरा मनुष्य कहते हैं।

इसके लिए आपको पहले साक्षी भाव क्या होता है। कैसे इसे साधा जाए। कैसे ध्यान करें। इस संबंध में संतों की किताबों का गहन अध्ययन करना चाहिए। खुद को देखने की प्रक्रिया को समझना चाहिए। यंत्रवत जीवन को छोड़कर जागृत जीवन शैली को अपनाना चाहिए। दो विचारों के बीच जो खाली स्थान होना है उसी पर ध्यान देना चाहिए। दो श्वासों के बीच तो रिक्त स्थान है वही धर्म का रहस्य है, इससे गंभीरता से समझना चाहिए।

दूसरी स्टेप : अदि आपका साक्षी भाव गहराने लगे तब आप नींद में भी अपनी नींद और स्वप्न के भी साक्षी होने लगेंगे। आप अपनी नींद पर प्रयोग करें। सोना महत्वपूर्ण है, लेकिन सोते हुए नींद में ही जागकर स्वप्न देखना सबसे महत्वपूर्ण है। नींद से जागना और नींद में ही जाग जाना दोनों के फर्क को समझना जरूरी है। जब ऐसा होने लगेगा तो फिर स्वप्न पर आपका अधिकार हो जाएगा। लगातर ध्यान जारी रखने से फिर आपको स्वप्न तो नहीं आएंगे लेकिन आप नींद के भीतर जागे हुए मनुष्य बन जाएंगे। इसे बौद्ध धर्म में असुत्ता मुनि कहते हैं।

जब व्यक्ति नींद में ही जाग जाता है तो वह चल रहे सपने को साक्षी भाव बनकर देखता रहता है और उसे यह भी महसूस होता है कि उसका शरीर गहरी नींद में सो रहा है। ऐसे व्यक्ति की स्थूल आंखें बंद रहती है लेकिन सूक्ष्म शरीर की आंखे खुल जाती है जिसके चलते वह सब कुछ देख सकता है।

सावधानी : नींद और जागरण में संतुलन बना रहे इसका विशेष ध्यान रखना जरूरी है। इसके लिए दिन में कसरत करना और उत्तम प्रकार का भोजन करना और व्रत रखना भी जरूरी है। यदि मसालेदार तामसिक, रासजी भोजन या नशा आदि का सेवन करते हैं तो इससे शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में आपकी संपूर्ण ध्यान या साक्षीभाव असफल हो जाता है। नींद और जागरण में भी बदलाव आ जाता है। तो भोजन और कसरत का विशेष आयोजन करें अच्‍छी नींद और जागरण के लिए।

तीसरी स्टेप : जब आप नींद और स्वप्न पर अधिकार कर लें तब आप आपको अपने सूक्ष्म शरीर में होने का अहसास होगा। अब आप धीरे धीरे शरीर से बाहर निकलने का प्रयास करें। पहले आप उठकर बैठ जाएंगे। आपको बिल्कुल हल्कापन लगने लगेगा। जैसे अंतरिक्ष में कोई वैज्ञानिक चहलकदमी करता है ठीक उसी तरह आपका यह सूक्ष्म शरीर में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति से परे होकर हवा में तैरने लगेगा। इसीलिए आप धीरे धीरे उठने का प्रयास करने के बाद सर्वप्रथम खड़े हो जाएं।

इस प्रक्रिया में जला भी जल्दबाजी न करें। कुछ दिन तक उठकर बैठने, बैठकर खड़े होने और फिर खड़े होकर फिर बैठने और फिर पुन: लेट जाने का ही अभ्यास करें। अब आप अपने सूक्ष्म शरीर से बाहर निकलने के लिए स्वतंत्र हैं।

सावधानी और चेतावनी : यदि आप अपने सूक्ष्म शरीर से निकलने में सक्षम हो गए हैं तो अब आप अपने स्थूल शरीर की रक्षा और उसकी उचित देखभाल का भी प्रबंध करें। यह स्थूल शरीर इस अवस्था में गहरी नींद में होता है। यदि आप कहीं बाहर विचरण कर रहे हैं और ऐसे में किसी व्यक्ति ने आपको जगाने का प्रयास किया तो इसके क्या परिणाम होंगे यह कहा नहीं जा सकता। हो सकता है कि आप एक क्षण में ही अपने शरीर में लौटकर जाग जाएं और यह भी हो सकता है कि ऐसे में नाभि से जुड़े आपके सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से संपर्क ही टूट जाए। संपर्क टूटने का अर्थ है मृत्यु। तो उपरोक्त साहसी कार्य करने से पहले उचित गुरू की सलाह जरूर लें।

दूसरे के शरीर में प्रवेश करना : यदि आप अपने स्थूल शरीर से बाहर निकलना सीख गए हैं तो अब आप किसी दूसरे के शरीर में भी प्रवेश कर सकते हैं। क्या होगा दूसरे के शरीर में प्रवेश करने से? आदि शंकराचार्य यह विधि जानते थे, और भी बहुत से साधक इस तकनीक से अवगत थे, लेकिन आम जनता के लिए तो यह बहुत ही कठिन जान पड़ता है। क्यों?

योग में कहा गया है कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है 'चित्त की वृत्तियां'। इसीलिए योग सूत्र का पहला सूत्र है- योगस्य चित्तवृत्ति निरोध:। इस चित्त में हजारों जन्मों की आसक्ति, अहंकार काम, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से उपजे कर्म संग्रहित रहते हैं, जिसे संचित कर्म कहते हैं।

यह संचित कर्म ही हमारा प्रारब्ध भी होते हैं और इसी से आगे की दिशा भी तय होती है। इस चित्त की पांच अवस्थाएं होती है जिसे समझ कर ही हम सूक्ष्म शरीर को सक्रिय कर सकते हैं। सूक्ष्म शरीर से बाहर निकल कर ही हम दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

इस चित्त या मानसिक अवस्था के पांच रूप हैं:- (1)क्षिप्त (2) मूढ़ (3)विक्षिप्त (4)एकाग्र और (5)निरुद्व। प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ मानसिक वृत्तियों का निरोध होता है।

(1)क्षिप्त : क्षिप्त अवस्था में चित्त एक विषय से दूसरे विषय पर लगातार दौड़ता रहता है। ऐसे व्यक्ति में विचारों, कल्पनाओं की भरमार रहती है।

(2)मूढ़ : मूढ़ अवस्था में निद्रा, आलस्य, उदासी, निरुत्साह आदि प्रवृत्तियों या आदतों का बोलबाला रहता है।

(3)विक्षिप्त : विक्षिप्तावस्था में मन थोड़ी देर के लिए एक विषय में लगता है पर क्षण में ही दूसरे विषय की ओर चला जाता है। पल प्रति‍पल मानसिक अवस्था बदलती रहती है।

(4)एकाग्र : एकाग्र अवस्था में चित्त देर तक एक विषय पर लगा रहता है। यह अवस्था स्थितप्रज्ञ होने की दिशा में उठाया गया पहला कदम है।

(5)निरुद्व : निरुद्व अवस्था में चित्त की सभी वृत्तियों का लोप हो जाता है और चित्त अपनी स्वाभाविक स्थिर, शान्त अवस्था में आ जाता है। अर्थात व्यक्ति को स्वयं के होने का पूर्ण अहसास होता है। उसके उपर से मन, मस्तिष्क में घुमड़ रहे बादल छट जाते हैं और वह पूर्ण जाग्रत रहकर दृष्टा बन जाता है। यह योग की पहली समाधि अवस्था भी कही गई है।

*ध्यान योग का सहारा : निरुद्व अवस्था को समझें यह व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करती है। यही व्यक्ति का असली स्वरूप है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए सांसार की व्यर्थ की बातों, क्रियाकलापों आदि से ध्यान हटाकर संयमित भोजन का सेवन करते हुए प्रतिदिन ध्यान करना आवश्यक है। इस दौरान कम से कम बोलना और लोगों से कम ही व्यवहार रखना भी जरूरी है।

ज्ञान योग का सहारा : चित्त की वृत्तियों और संचित कर्म के नाश के लिए योग में ज्ञानयोग का वर्णन मिलता है। ज्ञानयोग का पहला सूत्र है कि स्वयं को शरीर मानना छोड़कर आत्मा मानों। आत्मा का ज्ञान होना सूक्ष्म शरीर के होने का आभास दिलाएगा।

कैसे होगा यह संभव : चित्त जब वृत्ति शून्य (निरुद्व अवस्था) होता है तब बंधन के शिथिल हो जाने पर और संयम द्वारा चित्त की प्रवेश निर्गम मार्ग नाड़ी के ज्ञान से चित्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। यह बहुत आसान है, चित्त की स्थिरता से सूक्ष्म शरीर में होने का अहसास बढ़ता है। सूक्ष्म शरीर के निरंतर अहसास से स्थूल शरीर से बाहर निकलने की इच्‍छा बलवान होती है।

योग निंद्रा विधि : जब ध्यान की अवस्था गहराने लगे तब निंद्रा काल में जाग्रत होकर शरीर से बाहर निकला जा सकता है। इस दौरान यह अहसास होता रहेगा की स्थूल शरीर सो रहा है। शरीर को अपने सुरक्षित स्थान पर सोने दें और आप हवा में उड़ने का मजा लें। ध्यान रखें किसी दूसरे के शरीर में उसकी इजाजत के बगैर प्रवेश करना अपराध है।