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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 63,64वीं, (साक्षित्व की तेरह विधियां ) विधियां क्या है?


विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 63;- 08 FACTS;- 1-भगवान शिव कहते है:-

‘’जब किसी इंद्रिय-विषय के द्वारा स्‍पष्‍ट बोध हो, उसी बोध में स्‍थित होओ।‘’

2-तुम अपनी आँख के द्वारा देखते हो।ध्‍यान रहे,आँख देखने का माध्यम है;वे स्वयं देख नहीं सकती ;उनके द्वारा तुम देखते हो।द्रष्‍टा पीछे , भीतर छिपा है; आंखें बस द्वार है ,झरोखे है। लेकिन हम सदा सोचते है कि हम आँख से देखते है। हम सोचते है कि हम कान से सुनते है। कभी किसी ने कान से नहीं सुना है। तुम कान के द्वारा सुनते हो ..कान से नहीं। सुननेवाला पीछे है।

कान तो रिसीवर है।कोई तुम्‍हें छूता हूं, प्रेमपूर्वक तुम्‍हारा हाथ अपने हाथ में ले लेता है। यह हाथ वह नहीं है ,जो तुम्‍हें छूता है।वास्तव में, यह वह व्यक्ति है, जो हाथ के द्वारा तुम्‍हें छू रहा है। हाथ यंत्र है और स्‍पर्श से बचना भी दो भांति का है। एक, जब वह सच ही तुम्‍हें स्‍पर्श करता है और दूसरा, जब वह स्‍पर्श से बचना चाहता है ।वह तुम्‍हें छूकर भी स्‍पर्श से बच सकता है । वह हाथ से अपने को अलग कर सकता है ।

3-इसे प्रयोग करके देखो, तुम्‍हें एक भिन्‍न अनुभव होगा। एक दूरी का अनुभव होगा। किसी पर अपना हाथ रखो और अपने को अलग रखो; यहां सिर्फ मुर्दा हाथ होगा ;तुम नहीं। और अगर दूसरा व्‍यक्‍ति संवेदनशील है तो उसे मुर्दा हाथ का एहसास हो जायेगा। वह अपने को आपके इस व्‍यवहार से अपमानित महसूस करेगा क्‍योंकि तुम उसे धोखा दे रहे हो। तुम छूने का

दिखाव कर रहे हो। स्‍त्रियां इस मामले में बहुत संवेदनशील होती है। तुम जो भी कहते हो ,तुम्‍हारा स्‍पर्श उसे झुठला देता है।

यह सूत्र कहता है कि इंद्रियाँ द्वार भर है ..एक माध्‍यम,एक यंत्र,एक रिसीविंग स्‍टेशन और तुम उनके पीछे हो।‘’जब किसी इंद्रिय-विशेष के द्वारा स्‍पष्‍ट बोध हो, उसी बोध में स्‍थित होओ।‘’संगीत सुनते हुए अपने को कान में मत खो दो ..उस चैतन्‍य को स्‍मरण करो जो पीछे छिपा है। होश रखो और किसी को देखते हुए इस विधि को प्रयोग करो।

4-तुम यह प्रयोग किसी को देखते हुए कर सकते हो।आँख एक यंत्र है। तुम आँख के पीछे खड़े हो और उसके द्वारा देख रहे हो। जैसे किसी खिड़की या ऐनक के द्वारा देखते है।तुमने कभी न कभी किसी को अपने ऐनक के ऊपर से देखते हुए देखा होगा। ऐनक उसकी नाक पर उतर आयी है और वह देख रहा है। उसी ढंग से किसी को ,ऐसे देखो जैसे आँख से ऊपर से देखते हो। मानो तुम्‍हारी आंखें सरककर नीचे नाक पर आ गई हों और तुम उनके पीछे से देख रहे हो। अचानक तुम्‍हें गुणवत्‍ता में फर्क मालूम पड़ेगा तुम्‍हारा परिप्रेक्ष्‍य बदलता है। आंखे महज द्वार बन जाती है और यह ध्‍यान बन जाता है।सुनते समय कानों के द्वारा मात्र सुनो और अपने आंतरिक केंद्र के प्रति जागे रहो। स्‍पर्श करते हुए हाथ के द्वारा मात्र छुओ और आंतरिक केंद्र को स्‍मरण रखो जो पीछे छिपा है।किसी भी इंद्रिय से तुम्‍हें आंतरिक केंद्र की अनुभूति हो सकती है। और प्रत्‍येक इंद्रिय आंतरिक केंद्र तक जाती है। उसे सूचना देती है।

5- अगर तुम्‍हारी आंखे ही देखती है और कान ही सुनते है तो यह जानना कठिन होता है कि तुम उसी व्‍यक्‍ति को सुन रहे हो जिसे देख रहे हो। या दो भिन्‍न व्‍यक्‍तियों को देख और सुन रहे हो; क्‍योंकि दोनों इंद्रियाँ भिन्‍न है और वे आपस में नहीं मिलती है। तुम्‍हारी आंखों को तुम्‍हारे कान का पता नहीं है। और तुम्‍हारे कान को तुम्‍हारी आंखों का कुछ पता नहीं है। वे एक दूसरे को नहीं जानते है। वे आपस में कभी मिले नहीं है। उनका एक दूसरे से पर