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क्या विशेष महत्व है मां कामाख्या शक्तिपीठ और नवद्वारों की साधना का?PART-02


''कामाख्याये वरदे देवी नीलपवर्त वासिनी! त्व देवी जगत माता योनिमुद्रे नमोस्तुते!!''

मां कामाख्या मंत्र साधना;-

07 FACTS;-

1-हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ कामाख्या सबसे शक्तिशाली पीठ है। अतः माँ को खुश करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए नियमित रूप से देवी कामख्या की मंत्र पढ़ना चाहिए। कामाख्या मंत्र को कल्पवृक्ष भी कहा गया है, क्योंकि यह मंत्र मन की हर मुराद को पूरा करता है।

2-कामाख्या तंत्र में गुरु-तत्व का भी समावेश है तथा इससे ज्ञान की श्रेष्ठता का एहसास होता है। यही कारण है कि ज्ञान के लिए कामाख्या देवी की उपासना की जाती है। इसके अतिरिक्त कामख्या तंत्र से मुक्ति के चारों प्रकार सालोक्य, सारूप्य, सायुज्य और निर्वाण का सौभाग्य प्राप्त होता है। सालोक्य मुक्ति से जहां देवों के संसार में निवास का सौभग्य मिल सकता है, वहीं सारूप्य से ईश्वरत्व के अंश को प्राप्त किया जा सकता है। इसी तरह से सायुज्य देवों की कला से जुड़ना संभव होता है और निर्वाण मुक्ति अनैतिकता वाले नकारात्मक व्यक्तित्व का क्षय होता है।

3-कामाख्या मंत्र अत्यधिक शक्तिशाली माना जाता है|कामाख्या-मंत्र के जाप से शक्ति उपासना के तमाम कार्य पूरे हो जाते हैं इसलिए सभी देवी-देवताओं के उपासकों को यह पूजा अवश्य करनी चाहिए। जिस साधक ने इस मंत्र को सिद्ध कर लिया उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है|

4-मंत्र सिद्धि के विधान कठिन हैं इसलिए इसे हंसी-खेल में लेना घातक है| आत्मबल तथा सिद्धि के प्रति प्रतिबद्धता हो तभी इस ओर कदम बढ़ाना चाहिए। हर विध्न-बाधा को दूर करने के लिए इस मंत्र का जाप करने की सलाह दी गई है।

5-असरकारी और लोकप्रिय मंत्र;-

साधना के आरंभ में विनियोग, करन्यास, अंग न्यास करें| तत्पश्चात ध्यान के लिए देवी के निम्नलिखित अतुलनीय स्वरूप पर अपनी चेतना एकाग्र करें।विनियोग, ऋषादि न्यास, कर न्यास और अंग न्यास के रूप में इस प्रकार हैः-

5-1-ऋषादि न्यास,;-

ओम् अस्य कामाख्या मंत्रस्य श्री अक्षोभ्य ऋषिः, अनुष्टुप् छंदः, श्रीकामाख्या देवता, सर्व-सिद्धि-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः।

5-2-मंत्र विनियोग,;-

श्रीअक्षोभ्य-ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप्-छंदसे नमः मुखे,

श्रीकामाख्या-देवतायै नमः हृदि,सर्व-सिद्धि-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।

5-3-ध्यान;-

''मां कामाख्या के रूप सामान्य देवी की तरह ही हैं। उनकी दो भुजाएं हैं और वह लाल वस्त्र धारण किए विभिन्न रत्नों से सुशोभित सिंहासन पर बैठी रहती हैं। वह तिलक और सिंदूर लगाए हुए है। उनके मुखमंडल से चंद्रमा समान निर्मलता, उज्ज्वलता और मुखाकृति कमल जैसी सुंदरता सहजता से स्पष्ट प्रस्फुटित होती है। उनकी आंखें बड़ी-बड़ी हैं और बेशकीमती हीरे-जवाहरात तथा सोने के बने आभूषण भी पहने रहती हैं।''

यह देवी समस्त विद्याओं की जानकार और सर्वगुण संपन्न है। इस कारण इनमें मां सरस्वती और मां लक्ष्मी के रूपों के भी दर्शन किए जा सकते हैं। इन्हें त्रिनेत्रा भी कहा जाता है। इस देवी का ध्यान कर ही इन मंत्रों के जाप का लाभ मिल सकता है। कारण...मां कामाख्या मां सरस्वती और मां लक्ष्मी से युक्त देवी हैं।

5-4-कामाख्या देवी का आवाहन् और पूजा करने का मंत्र ;-

ॐ कामाख्ये काम-संपन्ने,कामेश्वरी ! हर-प्रिया।

कामनां देहि में नत्यिं, कामेश्वरि! नमोस्तुते ।।

कामदे काम-रूपस्थे, सुभगे सुर-सेविते।

करोमि दर्शनं देव्याः, सर्व-कामार्थ-सिद्धये।।

5-5-इस प्रार्थना का अर्थ इस प्रकार हैः-

हे कामाख्या देवी! आप भगवान शिव की प्रिय हैं और कामना पूरी करने वाली कामना की अधिष्ठत्री हैं। आपसे सदा शुभकामनाओं की अपेक्षा रखता हूं। मेरी कामनाओं को सिद्ध करें। हे कामना को पूर्ण करने वाली देवी! आप सभी कामना देने वाली सुंदरी और देवगणों से सेविता देवि हैं। मैं सभी कामनाओं की सिद्धि के लिए आपके दर्शन करता हूं।

6-कामाख्या देवी का सर्वाधिकमहत्वपूर्ण मंत्र

कामाख्या देवी का एक महत्वपूर्ण मंत्र 22 अक्षरों का है, जिसे कामाख्या तंत्र कहा जाता है।यह मंत्र अत्यंत शक्तिशाली माना गया है| इसकी सिद्धि से समस्त लौकिक अभीष्ट सिद्ध होते हैं| जाप से पूर्व किसी योग्य से विमर्श अवश्य करें तथा उसी की सलाह से जाप की संख्या का संकल्प लें|साधना के आरंभ में विनियोग, करन्यास, अंग न्यास करें|

6-1-तत्पश्चात ध्यान के लिए देवी के निम्नलिखित अतुलनीय स्वरूप पर अपनी चेतना एकाग्र करें –

''रक्ताभ वस्त्रधारिणी देवी कामाख्या, द्विभुजी हैं जिनके मस्तक पर सिंदूर का तिलक शोभा दे रहा है| वह चन्द्रमा के समान उज्जवल तथा कमल जैसी सुंदर हैं| उनके तन पर रत्न जड़ित आभूषण शोभित है| वह मणि-माणिक्य जटित सिंहासन पर आरूढ़ हैं| उन्नत पयोधर वाली देवी कामाख्या मंद-मंद मुस्कुरा रही हैं| श्यामवर्णा देवी सुंदर नेत्रों वाली त्रिनेत्रा हैं| वह अनेक विद्याओं से घिरी हुई हैं| उनके निकट डाकिनी-शाकिनी करबद्ध हैं| हाथों में ताम्बूल लिए नायिकाएँ खड़ी हैं| सिंहों के झुंड देवी कामाख्या की वंदना कर रहे हैं| देवी के अमृत समान वचनों को सुनने के लिए देवी सरस्वती तथा लक्ष्मी भी उत्सुक रहतीं हैं| तीनों लोकों में पूजिता देवी कामाख्या करुणामयी तथा मंगलकारिणी हैं''|

6-2-वह मंत्र हैः-

''ॐ त्रीं, त्रीं, त्रीं, हूं, हूं स्त्रीं ,स्त्रीं कामाख्ये प्रसीद स्त्रीं, स्त्रीं हूं, हूं ,त्रीं, त्रीं, त्रीं स्वाहा!!''

6-3-इस मंत्र के जाप से महापाप को खत्म किया जा सकता है तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सभी की प्राप्ति संभव है। इनका मूल शक्ति है। तीन त्र-अक्षर वाले इस मंत्र का जाप करने वाला साधक मंत्रोच्चारण में पूरी तन्मयता के साथ रम जाता है और देवी में ध्यानमग्न होकर साक्षात देवी-स्वरूप बन जाता है।

7-सफलता के लिये कामाख्या साधना;- साधना मार्ग में मार्गदर्शन का आभाव हो रहा हो या तंत्र क्षेत्र मे सफलता नहीं मिल रही हो तब करे ये कामाख्या साधना।इस साधना में भगवती कामाख्या देवी की कृपा से आपके मार्ग स्वतः खुलते जायेंगे ।साधना तीन दिवसीय है,किसी भी कृष्ण पक्ष की नवमी की रात्रि 11 के बाद आप पूर्व मुख होकर बैठे। सामने लाल वस्त्र पर माँ का कोई भी चित्र रखे,और माँ के चरणों में एक नारियल स्थापित करे...जो की सिंदूर से रंजित हो।

7-1-सिंदूर आपको तिल के तेल में मिलाना है और नारियल पानी वाला तथा जटायुक्त होना आवश्यक है। पंचोपचार विधि से पूजन करें| प्रसाद अर्पित करें| इसके बाद विधिवत हाथ में जल लेकर जाप के लिए संकल्प लें तथा इसके बाद मूंगा माला से निम्न बीज मंत्र की 51 माला 3 दिन तक करे। बीज मंत्र होने के कारण ज्यादा समय नहीं लगेगा फिर भी आप चाहे तो थोडा आराम लेकर भी जाप कर सकते है ...

7-2-बीज मंत्र पूरे मंत्र का एक छोटा रूप होता है जैसे की एक बीज बोने से पेड़ निकलता है उसी प्रकार बीज मंत्र का जाप करने से हर प्रकार की समस्या का समाधान हो जाता हैं। मूल बीज मंत्र "ॐ" होता है जिसे आगे कई अलग बीज में बांटा जाता है- योग बीज, तेजो बीज, शांति बीज, रक्षा बीज।

7-3-कामाख्या साधना बीज मंत्र :-

''ॐ त्रीं नमः''

7-4-जिस साधक ने इस मंत्र को सिद्ध कर लिया उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है|आपको माँ कामाख्या स्वस्थ, धनी और समृद्ध बनाती है और जीवन से सारी बुराई दूर रखती है।आपको ये सामान्य प्रयोग लगे किन्तु ये प्रयोग माँ कामख्या का है अतः इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ ही करे। अगले दिन सुबह नारियल सम्मान के साथ जल प्रवाह कर दीजिये।स्मरण रहे की नारियल फेकना नहीं है सम्मान के साथ पानी में विसर्जित करे।

क्या है बीज मंत्र के लाभ?-

बीज मंत्र हमें हर प्रकार की बीमारी, किसी भी प्रकार के भय, किसी भी प्रकार की चिंता और हर तरह की मोह-माया से मुक्त करता हैं। अगर हम किसी प्रकार की बाधा हेतु, बाधा शांति हेतु, विपत्ति विनाश हेतु, भय या पाप से मुक्त होना चाहते है तो बीज मंत्र का जाप करना चाहिए। मूल बीज मंत्र;- मूल बीज मंत्र "ॐ" होता है जिसे आगे कई अलग बीज में बांटा जाता है- योग बीज, तेजो बीज, शांति बीज, रक्षा बीज.अलग- अलग भगवान का बीज मंत्र जपने से इंसान में ऊर्जा का प्रवाह होता हैं और आप भगवान की छत्र-छाया में रहते हैं। ये सब बीज इस प्रकार जपे जाते हैं- ॐ, क्रीं, श्रीं, ह्रौं, ह्रीं, ऐं, गं, फ्रौं, दं, भ्रं, धूं,हलीं, त्रीं,क्ष्रौं, धं,हं,रां, यं, क्षं, तं।

1.देव बीज मंत्र;- देव बीज मंत्र का उच्चारण करने से सभी देवताओं के दिव्य आशीर्वाद की प्राप्ति होती हैं। 2.दुर्गा बीज मंत्र;- दुर्गा बीज मंत्र का उच्चारण करने से दुर्गा माँ ज़िदगी में आई हर रुकावट पर विजय हासिल करने में मदद करती हैं। 3.भार्गव बीज मंत्र;- भार्गव बीज मंत्र का उच्चारण करने से अगर हम सभी दिव्य शक्तियों से अपनी ज़िंदगी की सुरक्षा के लिए आशीर्वाद मांगे तो हम पूरे संसार में सुरक्षित रह सकते हैं। 4.काली माता बीज मंत्र;- "क्रीं, मंत्र शक्ति या काली माता का रूप होता हैं। सभी प्रमुख तत्वों जैसे आग, जल, धरती, वायु और आकाश पर विजय पाने के काली माता बीज मंत्र सबसे ज्यादा प्रभावशाली होता हैं. सभी शत्रुओं का नाश करने में भी ये मंत्र सफल होता हैं। 5.नरसिंहा बीज मंत्र;- नरसिंहा बीज मंत्र हमें मोह-माया के बंधनों से मुक्ति दिलवाता हैं। इस मंत्र के उच्चारण से गहरी मानसिक शांति भी पाई जा सकती हैं।

क्या अर्थ है नवद्वारों की साधना का?-

08 FACTS;-

1-प्रत्येक वर्ष के चैत्र तथा आश्विन मास में होने वाले नवरात्र को विशेष और सघन साधनाओं के लिए उपयुक्त माना जाता है। इन अठारह दिनों में साधक विशिष्ट अनुष्ठानों से इहलोक तथा परलोक को सुधारने का प्रयास करते हैं। ऐसा माना जाता है कि चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद मनुष्य योनि में जन्म मिलता है।चौरासी लाख योनियों में मनुष्य अपने पूर्व कर्मों का फल भोगता है , लेकिन सिर्फ मनुष्य योनि ही एक ऐसी योनि है जो भोग योनि के साथ-साथ कर्म योनि भी है।

2- यद्यपि मनुष्य जीवन की अवधि इन सब योनियों की सम्मिलित अवधि के सामने एक क्षण के समान है , परन्तु इस योनि की विशेषता यह है कि इसमें जो कुछ भी कर्मफल की आसक्ति को छोड़कर किया जाता है , वह मनुष्य को सदा के लिए जन्म-मरण से मुक्त कर देता है। लेकिन उसके लिए साधना की आवश्यकता होती है। इस साधना के पथ पर मनुष्य को चलने के लिए शरीर रूपी साधन की आवश्यकता होती है , जिसमें नौ द्वार हैं।

3-इसीलिए कहा गया है- ' रंग महल के दस दरवाजे , कौन सी खिड़की खुली थी सैंया निकस गए , मैं ना लड़ी थी! ' ये नौ द्वार हैं- दो चक्षु द्वार , दो नसिका द्वारा , दो श्रोत द्वार , मुख , वायु व उपस्थ द्वार। इस शरीर से देवत्व भी प्राप्त किया जा सकता है और असुरत्व भी , इसी से स्वर्ग को जाया जा सकता है और इसी के द्वारा नरक भी , यही सन्मार्ग की ओर ले जाता है और यही कुमार्ग पर।

4-इंद्रियों की साधना हमें ऊर्ध्वगामी बना देती है और इनका अनियंत्रण हमें अधोगामी बना देता है। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है- जैसे कछुआ आवश्यकता पड़ने पर अपने अंगों को समेट लेता है , वैसे ही जब पुरुष अपनी इंद्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

5-अगर प्रात:काल ब्रह्मामुहूर्त में उठकर 20 मिनट तक ओम् की साधना नादपूर्वक की जाए तो वायु व उपस्थ के स्थानों पर जो मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्र हैं , उन पर आघात होता है जो मनुष्य की कुंडलिनी को जागृत करने में सहायक होता है। तीसरा द्वार है- मुख जिसमें हमारी जिह्वा विराजमान है। विभिन्न प्रकार के स्वादों की ओर तो यह मनुष्य को खींचती ही है , लेकिन अत्यधिक वाचालता , प्रलाप , चुगली , निंदा यह भी इसी के कृत्य हैं। इसकी साधना मनुष्य अधिक से अधिक मौन रह कर कर सकता है।

6-अनुलोम-विलोम प्राणायामों के द्वारा नासिका के दोनों द्वार शुद्ध होकर इड़ा , पिंगला तथा सुषुम्ना नाडि़यों की शुद्धि में सहायक होते हैं। अपने कानों को अगर साधक बंद करके उस नाद को सुने , जिसे कबीर ने अनहद नाद की संज्ञा दी है और जिसे कुंडलिनी की आवाज भी कहा जाता है , तो हमारे श्रोत्र द्वार भी नियंत्रित हो सकते हैं। अपने नेत्रों के द्वारा साधक भगवान के श्रीविग्रहों का दर्शन कर सकता है और आंखें बंद करके अपने आंतरिक नेत्रों से उस ज्योति के दर्शन कर सकता है जो हमारे हृदय में विराजमान है और जिसे परम ज्योति कहा जाता है।

7-पुराणों के अनुसार लक्ष्मीजी का कहना है कि ' जो मनुष्य पवित्र , इंदिय से संयमी , निर्मल , अतिथि की सेवा करने वाला तथा उचित आहार करने वाला है , उसी के पास मेरा निवास है। जो मनुष्य जीवों का हितैषी , क्षमाशील , क्रोधरहित और अपने तथा पराए को सुख पहुंचाने वाला है , उसी के पास मेरा निवास है। ' आशय यही है कि शरीर के ये नौ द्वार ही हमारे उत्थान व पतन के कारण हैं।

8-अगर हम इंद्रिय रूपी घोड़ों की लगाम मन के हाथों सौंप देंगे तो ये कभी शांति से नहीं रहने देंगी , लेकिन अगर इनकी लगाम बुद्धिरूपी सारथी को दे दी जाए तो हम क्या नहीं प्राप्त कर सकते। हमारे लिए सब कुछ सुलभ है। इस शरीर रूपी महल के नौ दरवाजों की साधना हमें परमात्मा के दर्शन करा सकती है , महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करा सकती है। नवरात्रों में इन्हीं की साधना की जाती है।

....SHIVOHAM...