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क्या भगवान शिव परिवार के देवता हैं?कौन हैं मुरुगन स्वामी?


शिव परिवार;-

10 FACTS;-

1-भगवान शिव का परिवार संसार में उत्कृष्ट परिवार का उदहारण प्रस्तुतु करता हैं।भगवान शिव परिवार के मुखिया हैं।शिव को सृष्टि का प्राण

माना जाता है, अगर शिव नहीं हों तो सृष्टि शव के समान हो जाती है। इस कारण शिव को कालों का काल यानी महाकाल भी कहा गया है। शिव प्राण देते हैं, जीवन देते हैं और संहार भी करते हैं।

2-भगवान शिव सही अर्थों में परिवार के देवता हैं, क्योंकि ये एकमात्र ऐसे देवता हैं, जिनका परिवार संपूर्ण है। भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय व श्रीगणेश के बारे में तो सभी जानते हैं, लेकिन उनकी एक पुत्री भी है।

3-भगवान शिव की पुत्री;-

भगवान शिव की पुत्री का नाम अशोक सुंदरी है। पौराणिक कथाओं और कुछ लोक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए कल्प वृक्ष (सबकी इच्छाएं पूरी करने वाला पेड़) से कन्या प्राप्ति का वरदान मांगा, फलस्वरूप अशोक सुंदरी का जन्म हुआ। अशोक सुंदरी का विवाह परम पराक्रमी राजा नहुष से हुआ था। माता पार्वती के वरदान से अशोक सुंदरी ययाति जैसे वीर पुत्र तथा सौ रूपवती कन्याओं की माता बनीं।

4-जगदंबा पार्वती;-

भगवान शिव की पत्नी जगदंबा पार्वती हैं। शिवपुराण के अनुसार, ये पर्वतराज हिमालय व मैना की पुत्री हैं। पार्वती को ही शक्ति माना गया है। शरीर में शक्ति ना हो तो शरीर बेकार है, शक्ति तेज का पुंज है। मानव को हर काम में सफलता की शक्ति पार्वती यानी दुर्गा देती हैं। भगवान शिव ने अर्धनारीश्वर स्वरूप में स्वयं शक्ति के महत्व को सिद्ध किया है।

5-श्रीगणेश

भगवान शिव के छोटे पुत्र हैं गणेश, इनका मुख हाथी का है, इसलिए इन्हें गजमुख भी कहा जाता है। श्रीगणेश को प्रथम पूज्य की उपाधि प्राप्त है। किसी भी शुभ कार्य से पहले इनका पूजन किया जाता है। ग्रंथों में इन्हें परम शक्तिशाली व बुद्धिमान बताया गया है। इनके पूजन से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।श्रीगणेश ने अनेक अवतार लेकर दुष्टों का अंत किया है।

6-चार बहुएं;-

03 POINTS;-

भगवान शिव की चार बहुएं हैं,श्रीगणेश की पत्नी सिद्धि और बुद्धि और कार्तिकेय की पत्नी देवसेना और वल्ली।शिवपुराण के अनुसार,

ये प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियां हैं। कुछ स्थानों पर रिद्धि और सिद्धि का नाम मिलता है । सिद्धि कार्यों में, मनोरथों में सफलता देती है। बुद्धि ज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करती हैं।

2-देवसेना को ब्रह्मा की मानस पुत्री शतरूपा का एक अंश कहा जाता है अर्थात उन्हें ब्रह्मा की पुत्री माना गया है।देवसेना को देवराज इंद्र की बेटी के रूप में वर्णित किया जाता है।देवसेना स्वतंत्र पूजा का आनंद नहीं लेती है, लेकिन अपने अधिकांश मंदिरों में कार्तिकेय की पत्नी के रूप में पूजा की जाती है। देवसेना को आम तौर पर वल्ली के एक विरोधी समूह के रूप में दर्शाया जाता है, जो उसकी सह-पत्नी है।

3-देवसेना की संस्कृत नाम का अर्थ है "देवताओं की सेना" और इस प्रकार, उनके पति को देवसेनापति ("देवसेना का स्वामी") कहा जाता है। देवतापैण एक उपन्यास है जो देवताओं के प्रधान सेनापति के रूप में उनकी भूमिका भी बताता है। वह देविनाई या देवियानी (तमिल, जिसका शाब्दिक अर्थ "आकाशीय हाथी" है) कहा जाता है, क्योंकि वह इंद्र के दिव्य हाथी ऐरावत द्वारा उठाई गई थी।तिरुपन्द्रकुन्द्र मुरुगन मंदिर को उनकी शादी का स्थल माना जाता है। दक्षिण के साथ साथ इनकी पूजा उत्तर भारत में देवी षष्ठी (जिन्हें छठी मैया भी कहा जाता है ) के रुप में की जाती है।

7-पौत्र;-

ग्रंथों के अनुसार, भगवान गणेश के दो पुत्र हैं क्षेम और लाभ। क्षेम हमारे अर्जित पुण्य, धन, ज्ञान और ख्याति को सुरक्षित रखते हैं। सीधा अर्थ है हमारी मेहनत से कमाई गई हर वस्तु को सुरक्षित रखते हैं, उसे कम नहीं होने देते और धीरे-धीरे उसे बढ़ाते हैं। लाभ का काम निरंतर उसमें वृद्धि देने का है। लाभ हमें धन, यश आदि में निरंतर बढ़ोत्तरी देता है।

8-अयप्पा स्वामी:-

भगवान अयप्पा के पिता शिव और माता मोहिनी हैं।शिव और विष्णु से उत्पन होने के कारण उनको 'हरिहरपुत्र' कहा जाता है। भारतीय राज्य केरल में शबरीमलई में अयप्पा स्वामी का प्रसिद्ध मंदिर है, जहां विश्‍वभर से लोग शिव के इस पुत्र के मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं। इस मंदिर के पास मकर संक्रांति की रात घने अंधेरे में रह-रहकर यहां एक ज्योति दिखती है। इस ज्योति के दर्शन के लिए दुनियाभर से करोड़ों श्रद्धालु हर साल आते हैं।

9-भूमा /मंगल:-

एक समय जब कैलाश पर्वत पर भगवान शिव समाधि में ध्यान लगाये बैठे थे, उस समय उनके ललाट से तीन पसीने की बूंदें पृथ्वी पर गिरीं। इन बूंदों से पृथ्वी ने एक सुंदर और प्यारे बालक को जन्म दिया, जिसके चार भुजाएं थीं और वय रक्त वर्ण का था। इस पुत्र को पृथ्वी ने पालन पोषण करना शुरु किया। तभी भूमि का पुत्र होने के कारण यह भौम कहलाया। कुछ बड़ा होने पर मंगल काशी पहुंचा और भगवान शिव की कड़ी तपस्या की। तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसे मंगल लोक प्रदान किया।

10-शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय/मुरुगन; -

02 POINTS;-

1-शिव-पुत्र कार्तिकेय का नाम ही स्कन्द है। स्कन्द का अर्थ होता है- क्षरण अर्थात् विनाश। भगवान शिव संहार के देवता हैं। उनका पुत्र कार्तिकेय संहारक शस्त्र अथवा शक्ति के रूप में जाना जाता है।इनके पास देवताओं के सेनापति का पद है।भगवान कार्तिकेय को ही मुरुगन नाम से पूजा जाता है।भगवान मुरुगन के अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं।दक्षिण

राज्यों खासकर तमिलनाडु में उनकी पूजा की जाती है।इन्हें तमीज

कादुवुल अर्थात तमिल के देवता कहा जाता है।

2-मां पार्वती के श्राप के कारण यह सदा बाल स्वरूप में ही रहते हैं।

इनका वाहन मोर है।हिन्दू धर्म से संबंधित होने के बावजूद

यजीदी धर्म के लोग भी शिवपुत्र, कार्तिकेय की आराधना करते हैं। इन्हें दक्षिण भारत में मुरुगन देवता तथा विश्व के अन्य देशों जैसे श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि में भी कार्तिकेय को इष्ट देव के रूप में स्वीकार किया गया है।

कौन हैं भगवान मुरुगन ?-

10 FACTS;-

1-भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय, देवताओं के सेनापति, साहस के अवतार हैं। कम आयु में ही अपने अदम्य साहस के बल पर उन्होंने तारकासुर का नाश किया था। इसलिए आत्मविश्वास और आत्मबल की प्राप्ति कार्तिकेय से होती है। शिवपुराण के अनुसार, कार्तिकेय ब्रह्मचारी हैं, वहीं ब्रह्मवैवर्त पुराण में इनकी पत्नी का नाम देवसेना बताया गया है।

2-भगवान मुरुगन का स्वरूप एक छोटे से बालक का है। यह मोर पर बैठे हुए हैं तथा इनके माथे पर मोर पंख का मुकुट है। इनके चेहरे पर मंद मुस्कान रहती है। इनका एक हाथ वर मुद्रा में है तथा एक हाथ में तीर जैसा दिखने वाला शस्त्र है। कई जगह मुरुगन (भगवान कार्तिकेय) के छह मुख भी दिखाए गए हैं।मुरुगन हिंदू धर्म के देवता हैं। उत्तर भारत में इन्हें कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है। मुरुगन को युद्ध और विजय का देवता कहा जाता है।इनके अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं।

3-एक कथा के अनुसार जब देवी सती के बाद पूरे ब्रह्मांड में राक्षसों का अत्याचार फैलने लगता है ;तो इससे दुखी होकर सभी देवता भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे और अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की। तब ब्रह्मा जी उन्हें बताया कि इस राक्षस तारक का अंत शिव पुत्र द्वारा ही संभव है। इसके बाद देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ।

4-तारकासुर के अत्याचार से पीड़ित देवताओं पर प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने पार्वती जी का पाणिग्रहण तो किया परन्तु एकान्तनिष्ठ हो गये।

अग्निदेव सुरकार्य का स्मरण कराने वहाँ उज्ज्वल कपोत वेश से पहुँचे।भूमि, अग्नि, गंगादेवी सब क्रमश: उस ऊर्जा को धारण करने में असमर्थ रहीं। अन्त में शरवण (कास-वन) में वह निक्षिप्त होकर तेजोमय बालक बना। कृत्तिकाओं ने उसे अपना पुत्र बनाना चाहा। बालक ने छ: मुख धारण कर छहों कृत्तिकाओं का स्तनपान किया। उसी से वह षण्मुख शम्भुपुत्र कार्तिकेय हुआ।पार्वती ने इन छ: सिरों को जोड़कर एक सिर में परिवर्तित किया। इस तरह कार्तिकेय का जन्म हुआ।

5-कार्तिकेय ने आगे चलकर देवताओं की सेना का नेतृत्व कर तारकासुर का नाश किया था। कृत्तिकाओं यानि अप्सराओं ने इन्हें अपना पुत्र बनाया था, इसी कारण इनका नाम 'कार्तिकेय' पड़ा।। देवताओं ने अपना सेनापतित्व उन्हें प्रदान किया ।सैन्यशक्ति की प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन इनकी कृपा से सम्पन्न होता है।

6-शिवजी के तृतीय नेत्र से प्रकाश की जो छह किरणें प्रकट हुईं, उससे कार्तिक मास में उनके जिस बालक का जन्म हुआ, उसका एक नाम ‘कार्तिकेय’ भी है।ये छह किरणें ‘सारावन’ अर्थात् सरकंडे के जंगल में गिरी थीं। इसलिए कार्तिकेय का नाम ‘सरवन बाव’ भी है। ये छह किरणें ‘सारावन’ में गिरते ही छह बालकों के रूप में परिणत हो गईं, जिनका पालन छह सेविकाओं रूपी कृत्तिकाओं ने किया। जब पार्वती जी ने इन बालकों को गोद में उठाया तो यह एक-शरीरी शिशु बन गया। किंतु इसके सिर छह ही रहे, जिसके कारण ‘कार्तिकेय’ का एक अन्य नाम ‘षड्मुख’ प्रचलित हो गया। ये छह चेहरे ज्ञान, वैराग्य, बल, कीर्ति, श्री और ऐश्वर्य प्रदान करने के प्रतीक हैं। 7-अपने यौवन काल में कार्तिकेय ने देवताओं की सेना का अधिपति बनकर युद्ध में सूरपद्मन राक्षस को मारा तो उसका शरीर दो भागों में बदल गया। उनमें से एक मोर बन गया, जिस पर मूर्तियों में कार्तिकेय जी सवार दिखाई पड़ते हैं। राक्षस के शरीर का दूसरा भाग मुरगे के रूप में नज़र आया, जो कि उनके विजय-ध्वज का चिह्न बन गया। इस प्रकार ‘मोर’ तथा ‘मुरगा’ शब्द कार्तिकेय (स्कंद) के तमिल नाम ‘मुरुगन’ को प्रतिध्वनित करता है।

8- पुराणों के अनुसार षष्ठी तिथि को कार्तिकेय भगवान का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन स्कन्द यानि कार्तिकेय भगवान की पूजा का भी विशेष महत्व माना गया है।उत्तरी ध्रुव के निकटवर्ती प्रदेश उत्तर कुरु के क्षे‍त्र विशेष में ही इन्होंने स्कंद नाम से शासन किया था। इनके नाम पर ही स्कंद पुराण है।स्कन्द पुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय (स्कन्द) ही हैं।

9-कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के छठे दिन बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के निवासी जो त्योहार मनाते हैं, उसे ‘सूर्य छठ’ अथवा ‘डाला छठ’ कहा जाता है।तमिलनाडु में इसे ‘स्कंद षष्ठी’ पुकारा जाता है वस्तुत: यह लोकपर्व माता पार्वती और भगवान् शिव के पुत्र ‘स्कंद’ (कार्तिकेय) तथा उनकी पत्नी ‘षष्ठी’ से संबंधित है।षण्मुख, द्विभुज, मयूरासीन देवसेनापति कुमार कार्तिक की आराधना दक्षिण भारत में बहुत प्रचलित हैं ये ब्रह्मपुत्री देवसेना-षष्टी देवी के पति होने के कारण सन्तान प्राप्ति की कामना से तो पूजे ही जाते हैं, इनको नैष्ठिक रूप से आराध्य मानने वाला सम्प्रदाय भी है।

कार्तिकेय को माता पार्वती का शाप/वरदान ;-

07 FACTS;-

1-एक बार शंकर भगवान ने माता पार्वती के साथ जुआ खेलने की अभिलाषा प्रकट की। खेल में भगवान शंकर अपना सब कुछ हार गए। हारने के बाद भोलेनाथ अपनी लीला को रचते हुए पत्तो के वस्त्र पहनकर गंगा के तट पर चले गए। कार्तिकेय जी को जब सारी बात पता चली, तो वह माता पार्वती से समस्त वस्तुएँ वापस लेने आए। इस बार खेल में माँ पार्वती हार गईं तथा कार्तिकेय शंकर जी का सारा सामान लेकर वापस चले गए।

2-अब इधर माता पार्वती भी चिंतित हो गईं कि सारा सामान भी गया तथा पति भी दूर हो गए।माँ पार्वती जी ने अपनी व्यथा अपने प्रिय पुत्र गणेश को बताई तो मातृ भक्त गणोश जी स्वयं खेल खेलने शंकर भगवान के पास पहुंचे। गणेश जी जीत गए तथा लौटकर अपनी जीत का समाचार माता को सुनाया। इस पर माँ पार्वती बोलीं कि उन्हें अपने पिता को साथ लेकर आना चाहिए था। गणेश फिर भोलेनाथ की खोज करने निकल पड़े। भोलेनाथ से उनकी भेंट हरिद्वार में हुई। उस समय भोलेनाथ भगवान विष्णु व कार्तिकेय के साथ भ्रमण कर रहे थे।

3-माँ पार्वती से नाराज़ भोलेनाथ ने लौटने से मना कर दिया। भोलेनाथ के भक्त रावण ने गणेश के वाहन मूषक को बिल्ली का रूप धारण करके डरा दिया। मूषक गणेश जी को छोड़कर भाग गए। इधर भगवान विष्णु ने भोलेनाथ की इच्छा से पासा का रूप धारण कर लिया। गणेश जी ने माता के उदास होने की बात भोलेनाथ को कह सुनाई। इस पर भोलेनाथ बोले कि हमने नया पासा बनवाया है, अगर तुम्हारी माता पुन: खेल खेलने को सहमत हों, तो मैं वापस चल सकता हूँ।

4-गणेश जी के आश्वासन पर भोलेनाथ वापस पार्वती के पास पहुंचे तथा खेल खेलने को कहा। इस पर पार्वती हंस पड़ी व बोलीं- ‘अभी पास क्या चीज़ है.. जिससे खेल खेला जाए।’ यह सुनकर भोलेनाथ चुप हो गए। इस पर नारद ने अपनी वीणा आदि सामग्री उन्हें दी। इस खेल में भोलेनाथ हर बार जीतने लगे। एक दो पासे फैंकने के बाद गणेश जी समझ गए तथा उन्होंने भगवान विष्णु के पासा रूप धारण करने का रहस्य माता पार्वती को बता दिया।

5-सारी बात सुनकर माता पार्वती जी को क्रोध आ गया। रावण ने माता को समझाने का प्रयास किया, पर उनका क्रोध शांत नहीं हुआ तथा क्रोधवश उन्होंने भोलेनाथ को शाप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ उनके सिर पर रहेगा। नारद को कभी एक स्थान पर न टिकने का अभिषाप मिला। भगवान विष्णु को शाप दिया कि यही रावण तुम्हारा शत्रु होगा तथा रावण को शाप दिया कि विष्णु ही तुम्हारा विनाश करेंगे।

6-कार्तिकेय को भी माता पार्वती ने कभी जवान न होने का शाप दे दिया।

इस पर सर्वजन चिंतित हो उठे। तब नारद जी ने अपनी विनोदपूर्ण बातों से माता का क्रोध शांत किया, तो माता ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। नारद जी बोले कि आप सभी को वरदान दें, तभी मैं वरदान लूँगा। पार्वती जी सहमत हो गईं।

7-तब भोलेनाथ ने कार्तिक शुक्ल के दिन जुए में विजयी रहने वाले को वर्ष भर विजयी बनाने का वरदान मांगा। भगवान विष्णु ने अपने प्रत्येक छोटे-बड़े कार्य में सफलता का वर मांगा, परंतु कार्तिकेय ने सदा बालक रहने का ही वर मांगा तथा कहा- ‘मुझे विषय वासना का संसर्ग न हो तथा सदा भगवत स्मरण में लीन रहूँ।’ अंत में नारद जी ने देवर्षि होने का वरदान मांगा। माता पार्वती ने रावण को समस्त वेदों की सुविस्तृत व्याख्या देते हुए सबके लिए तथास्तु कहा।

8-स्कन्द का देवसेना, वल्ली के साथ विवाह;-

06 POINTS;-

1-स्कन्द की दो पत्नियां है ; पहली पत्नी का नाम देवसेना था जोकि देवेंद्र की पुत्री है दूसरी पत्नी का नाम वल्ली एक आदिवासी राजा की पुत्री थी जो उन्हें पहाड़ में 1 गड्ढे में मिली थी।मुरुगन और वल्ली की विवाह स्थल वल्लिमलै माना जाता है |

2-देवयानी एवं वल्ली क्रियाशक्ति और इच्छा शक्ति का प्रतीक है |स्वयं कार्तिकेय जी अर्थात मुरगन स्वामी ज्ञान शक्ति का प्रतीक है| अतः देवताओ के रक्षक सुब्रमण्यम ने इन दोनो शक्तियों को प्राप्त किया | मान्यता है कि एक युवक(कार्तिकेय)को अपनी कर्म (देवयानी)भी करना चाहिये और अपनी इच्छा (वल्ली)को भी पूरी करना चाहिये| जब वह इन दोनों शक्तियों को नियंत्रण में लाता है ,वह संपूर्ण मनुष्य बनता है |

3-इन्‍द्र ने स्‍कन्‍द को सेनापति के पद पर अभिषिक्त करने के पश्चात उस कुमारी देवसेना का स्‍मरण किया, जिसका उन्‍होंने केशी के हाथ से उद्धार किया था। उन्‍होंने सोचा, स्‍वयं ब्रह्मा जी ने निश्चय ही कुमार कार्तिकेय को ही उसका पति नियत किया है। यह सोचकर वे देवसेना को वस्‍त्रा भुषणों से भूषित करके ले आये। फिर बलसंहारक इन्‍द्र ने स्‍कन्‍द से कहा- ‘सुर श्रेष्‍ठ तुम्‍हारे जन्‍म लेने के पहले से ही ब्रह्मा जी ने इस कन्‍या को तुम्‍हारी पत्नी नियत की है, अत: तुम वेद मन्‍त्रों के उच्चारण पूर्वक, इसका विधिवत पाणिग्रहण करो।

4-इन्‍द्र के ऐसा कहने पर स्‍कन्‍द ने विधिपूर्वक देवसेना का पाणिग्रहण किया। उस समय मन्‍त्रवेत्ता बृहस्‍पति जी ने वेद मन्‍त्रों का जप और होम किया।मुरुगन एवं देवयानी की विवाह स्थल तिरुपरकुन्रम पर्वत है |उन्ही को लोग षष्‍ठी, लक्ष्‍मी, आशा, सुख प्रदा, सिनीवाली, कुहू, सद्वृति तथा अपराजिता कहते हैं। जब देवसेना ने स्‍कन्‍द को अपने सनातन पति के रुप में प्राप्‍त कर लिया, तब लक्ष्मी देवी ने स्‍वयं मूर्तिमती होकर उनका आश्रय लिया।

5-पच्चमी तिथि को स्‍कन्‍द देव श्री अर्थात शोभा से सेवित हुए, इसलिये उस तिथि को श्री पच्चमी कहते हैं और षष्‍ठी कृतार्थ हुए थे, इसलिये षष्‍ठी

महातिथि मानी गयी है।ब्रह्मïवैवर्त पुराण’ से भी षष्ठी देवी की स्कंद जी की पत्नी बताते हुए ‘सप्त मातृकांओं’ में प्रमुख माना गया है। इन ग्रंथों में ‘षष्ठी’ के नाम की व्याख्या इस प्रकार की गई है—’प्रकृति की षष्ठांश रूपिणी’। इन्हीं पुराणों में ‘षष्ठी’ को बालकों की ‘अधिष्ठात्री देवी’, ‘बालदा’ (बालक प्रदान करने वाली), उनकी धात्री, संरक्षिका और सदैव उनके पास रहने वाली (सिद्धयोगिनी) भी माना गया है।

6-वहीं पर यह भी उल्लिखित है कि षष्ठी का वर्ण (रंग) श्वेत चम्पक पुष्प के समान है तथा वह ‘सुस्थिर यौवना’, रत्नाभूषणों से सुशोभित, कृपामयी एवं भक्तानुग्रहकत्र्री भी है। बालक के जन्म के बाद सूतिका गृह में छठे दिन, इक्कीसवें दिन तथा आगे भी बालक के अन्न प्राशन एवं शुभ कार्यों के समय ‘ऊं ह्री षष्ठीदेव्यै स्वाहा’ (अष्टाक्षर मंत्र जप करते हुए षष्ठी-पूजन किया जाता है।शालिग्राम शिला, वृट वृक्ष की जड़, किसी घड़े अथवा घर की दीवार पर षष्ठी माता की आकृति गेरु अथवा हलदी से बनाई जाती है।

9-मुरुगन के अन्य नाम (Other Name of Lord Murgan)

1. कार्तिकेय

2. महासेन

3. शरजन्मा

4. षडानन

5. पार्वतीनन्दन

6. स्कन्द

7. सुब्रमण्यम,सेनानी

8. कुमार

9-स्कंद देव

10-क्या कारण था कि शिव पुत्र कार्तिकेय कैलाश छोड़कर दक्षिण की तरफ चल पड़े?

15 POINTS;-

1-शिवपुत्र कार्तिकेय के बारे में चमत्कारी बात यह थी कि वह एक महान प्रयोग से जन्मे थे, जिसमें छह जीवों को एक शरीर में जीवन दिया गया था। पहले भी इस तरह के कई प्रयोग हुए हैं, जहां एक ही शरीर में दो योगी रहते थे। वे अलग-अलग भाषाएं बोलते थे और उनके अस्तित्व का तरीका भी अलग होता था।

2-हालांकि शिव ने अपना बीज एक हवन कुंड में डाल दिया। हवन कुंड का मतलब है ‘होम कुंड’। होम कुंड ऋषियों के लिए एक प्रयोगशाला की तरह था, जहां वे कई चीजों को उत्पन्न करते थे।होम कुंड से, छह कृतिकाओं

ने शिव का बीज अपने गर्भ में धारण किया। ये कृतिकाएं गैर इंसानी प्राणी या इस धरती की नहीं थीं और उनकी क्षमता बहुत उच्च स्तर की थी।उन्होंने साढ़े तीन महीने तक उस बीज को गर्भ में धारण रखा, उसके बाद जीवन आकार लेने लगा और छह भ्रूण विकसित हुए।

3-इसके बाद कृतिकाओं को लगा कि यह बीज उनके लिए कुछ ज्यादा गर्म है और वे उसे और ज्यादा समय तक धारण नहीं कर सकतीं।चूंकि ये

कृतिकाएं मुख्य रूप से एक आयाम से दूसरे आयाम में भ्रमण करती रहती थीं, इसलिए उनमें सृष्टि के किसी खास अंश के प्रति जिम्मेदारी की कोई भावना नहीं थी। इसलिए, जाते समय उन्होंने इन बच्चों को अपने गर्भ से बाहर निकाल दिया। उस समय वे बीज से थोड़ी ज्यादा विकसित अवस्था में थे। फिर वे चली गईं।

4-माँ पार्वती खुद शिवपुत्र को जन्म नहीं दे पाई थीं, इसलिए वह इसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहती थीं। उन्होंने इन छह अल्पविकसित बच्चों को कमल के पत्तों में लपेटकर उनके विकास की स्थिति पैदा करने की कोशिश की। वह देख सकती थीं कि अलग-अलग उनके बचने की संभावना बहुत कम है क्योंकि वे पूर्ण विकसित नहीं थे। मगर उन्हें यह लगा कि इन छह भ्रूणों में छह शानदार गुण हैं।माँ पार्वती ने सोचा, ‘अगर ये सभी गुण किसी एक पुरुष में हो, तो वह कितना अद्भुत होगा।’ अपनी तांत्रिक शक्तियों के जरिये उन्होंने इन छह नन्हें भ्रूणों को एक में मिला दिया।

5-उन्होंने एक ही शरीर में छह जीवों को समाविष्ट कर दिया, जिसके बाद कार्तिकेय का जन्म हुआ। आज भी, कार्तिकेय को ‘अरुमुगा’ या छह चेहरों वाले देवता की तरह देखा जाता है। वह एक अद्भुत क्षमता वाले इंसान थे। 8 साल की उम्र में ही वह एक अजेय योद्धा बन गए थे।

6-एक बार ऐसा हुआ कि गणपति और कार्तिकेय में एक छोटी सी झड़प हो गई। कार्तिकेय को अपने वाहन, तेजी से उड़ने वाले मोर, पर बहुत गर्व था। दोनों में बहस छिड़ गई। फिर उन्होंने आपस में एक प्रतियोगिता करने का फैसला किया कि कौन सबसे तीव्र गति से दुनिया का चक्कर लगा सकता है। जो भी जीतेगा, उसे माता -पिता से एक खास तरह का ईनाम मिलेगा।प्रतियोगिता शुरू हुई।

7-कार्तिकेय अपने मोर पर उड़ चले। उन्होंने पूरी दुनिया का चक्कर लगाया मगर जब वह लौटे तो देखकर हैरान रह गए कि गणपति वहीं बैठे थे,उन्हें ईनाम मिल चुका था ।कार्तिकेय क्रोधित हो गए।दरअसल

गणपति ने शिव और माँ पार्वती के तीन चक्कर लगा लिए थे। गणपति बोले, ‘मेरे लिए, मेरी पूरी दुनिया आप लोग ही हैं। मेरे लिए इतना काफी है, उसे दौड़ने दीजिए।’

8-मगर कार्तिकेय को यह एक बड़ा अन्याय लगा, इसलिए वह इसे लेकर बहुत गुस्से में थे।माँ पार्वती ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि कुछ चीजें ‘वस्तुपरक’ और कुछ ‘व्यक्तिपरक’ होती हैं, सभी अनुभव व्यक्तिपरक होते हैं। वस्तुएं सिर्फ व्यक्तिपरक अनुभव पैदा करने के लिए होती हैं। अपने आप में उनकी कोई अहमियत नहीं है। इसलिए गणपति ने बस अपने माता-पिता का चक्कर लगाया क्योंकि उनके अंदर यह समझदारी थी कि ‘मेरे माता-पिता मेरी दुनिया हैं, इसलिए मैं उनके ही चक्कर लगा लेता हूं।’

9-मगर कार्तिकेय को अपनी मां की कोई बात समझ नहीं आई और उन्होंने घर छोड़ दिया। वह अपने पिता से दूर चले जाना चाहते थे।

वह गुस्से में दक्षिण भारत चले आए और एक योद्धा बन गए। वह कई रूपों में एक बेमिसाल योद्धा थे। उन्होंने दक्षिण में कई युद्ध जीते, मगर उन्होंने राज करने के लिए युद्ध नहीं जीता। उन्हें लगता था कि उनके माता-पिता ने उनके साथ अन्याय किया, इसलिए वह न्याय स्थापित करना चाहते थे। 10-वह किसी आंदोलनकारी या क्रांतिकारी की तरह थे। इसलिए जहां भी उन्हें अन्याय नजर आता था, वहां वह युद्ध छेड़ देते थे।अपने गुस्से में वह छोटी से छोटी चीज को बड़ा अन्याय मान लेते थे और बहुत से लोगों को उन्होंने मौट के घाट उतार दिया। उन्होंने एक के बाद एक लड़ाइयां लड़ीं और दक्षिण की ओर चलते गए।

11-परन्तु कार्तिकेय ने अगस्त्य मुनि की सहायता की ।अगस्त्य दक्षिण में आध्यात्मिकता लेकर गए थे। जहां भी अगस्त्य को विरोध का सामना करना पड़ा, वहां कार्तिकेय ने युद्ध लड़ा।अगस्त्य ने ही उन्हें युद्ध कौशल सिखाया और अगस्त्य ने ही उनके गुस्से को ज्ञानप्राप्ति के एक साधन के रूप में बदल दिया।

12-कार्तिकेय को आखिरकार सुब्रह्मण्य नामक जगह पर आराम मिला। वह युद्ध से ऊब गए थे। उन्हें समझ आ गया था कि हजार सालों तक लड़ने के बाद भी इस तरह से दुनिया को बदला नहीं जा सकता। एक समाधान दस और समस्याएं पैदा कर देगा। इसलिए उन्होंने सारी हिंसा छोड़ दी, और अंतिम बार, अपने तलवार को कर्नाटक के ‘घाटी सुब्रह्मण्य’ में साफ किया।