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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 100,101 वीं (गुणधर्म संबंधी दो विधियां) विधियां क्या है?


विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 100;-

35 FACTS;-

1-पहली विधि..भगवान शिव कहते है:-

‘वस्‍तुओं और विषयों का गुणधर्म ज्ञानी व अज्ञानी के लिए समान ही होता है।

ज्ञानी की महानता यह है कि वह आत्‍मगत भाव में बना रहता है। वस्‍तुओं में नहीं खोता।’'

2-यह बड़ी प्‍यारी विधि है। तुम इसे वैसे ही शुरू कर सकते हो जैसे तुम हो; पहले कोई शर्त पूरी नहीं करनी है। बहुत सरल विधि है: तुम व्‍यक्‍तियों से, वस्‍तुओं से, घटनाओं से घिरे हो—हर क्षण तुम्‍हारे चारों और कुछ न कुछ है। वस्‍तुएं है, घटनाएं है, व्‍यक्‍ति है—लेकिन क्‍योंकि तुम सचेत नही हो, इसलिए तुम भर नहीं हो। सब कुछ मौजूद है लेकिन तुम गहरी नींद में सोए हो। वस्‍तुएं तुम्‍हारे चारों तरफ मौजूद है, लोग तुम्‍हारे चारों तरफ घूम रहे है। घटनाएं तुम्‍हारे चारों तरफ घट रही है। लेकिन तुम वहां नहीं हो। या, तुम सोए हुए हो।

3-तो तुम्‍हारे आस-पास जो कुछ भी होता है वहीं मालिक बन जाता है, तुम्‍हारे ऊपर हावी हो जाती है। तुम उसके द्वारा खींच लिए जाते हो। तुम केवल उससे प्रभावित ही नहीं होते। संस्‍कारित भी हो जाते हो, खींच लिए जाते हो। कुछ भी चीज तुम्‍हें पकड़ ले सकती है और तुम उसके पीछे चलने लगोंगे।कोई सुंदर पोशाक देखो, उसका रंग, उसका कपड़ा सुंदर है ...तुम प्रभावित हो गए। कोई कार गुजरी ...तुम प्रभावित हो गए। तुम्‍हारे आस-पास जो कुछ भी चलता है। तुम्‍हें पकड़ लेता है। तुम बलशाली नहीं हो। बाकी सब कुछ तुमसे ज्‍यादा बलशाली है। कुछ भी तुम्‍हें बदल देता है। तुम्‍हारी भाव-दशा, तुम्‍हारा चित, तुम्‍हारा मन, सब दूसरी चीजों पर निर्भर है। विषय तुम्‍हें प्रभावित कर देते है।

4-यह सूत्र कहता है कि ज्ञानी और आज्ञानी एक ही जगत में जीते है। एक बुद्ध पुरूष और तुम एक ही जगत में जीते हो ...जगत वही रहता है। अंतर जगत में नहीं पड़ता,अंतर बुद्ध पुरूष के भीतर घटित हाता है: वह अलग ढंग से जीता है। वह उन्‍हीं वस्‍तुओं के बीच जीती है। लेकिन अलग ढंग से। वह अपना मालिक है। उसकी आत्‍मा असंग और अस्‍पर्शित बनी रहती है। वही राज है। उसको कुछ भी प्रभावित नहीं कर सकता है। बाहर से कुछ भी उसको संस्‍कारित नहीं कर सकता; कुछ भी उस पर हावी नहीं हो सकता। वह निर्लिप्‍त बना रहता है। स्‍वयं बना रहता है। यदि वह कहीं जाना चाहेगा। लेकिन मालिक बना रहेगा। यदि वह किसी छाया के पीछे जाना चाहेगा तो जाएगा, लेकिन यह उसका अपना निर्णय होगा।

5-इस भेद को समझ लेना जरूरी है। निर्लिप्‍त का अर्थ उस व्‍यक्‍ति से नहीं है जिसने संसार का त्‍याग कर दिया ..फिर तो निर्लिप्‍त होने में कोई सार न रहा, कोई अर्थ न रहा। निर्लिप्‍त वह व्‍यक्‍ति है 'जो उसी जगत में जी रहा है जिसमें कि तुम' ...जगत में कोई भेद नहीं है। जो व्‍यक्‍ति संसार का त्‍याग करता है। वह केवल परिस्‍थिति को बदल रहा है, स्‍वयं को नहीं। और यदि तुम स्‍वयं को नहीं बदल सकते तो परिस्‍थिति को बदलने पर ही जोर दोगे। यह कमजोर व्‍यक्‍तित्‍व का लक्षण है।

6-एक शक्‍तिशाली व्‍यक्‍ति है, जो सतर्क और सचेत है। स्‍वयं को बदलना शुरू करेगा। उस परिस्‍थिति को नहीं जिसमें वह है। क्‍योंकि वास्‍तव में परिस्‍थिति को तो बदला ही नहीं जा सकता; अगर तुम एक परिस्‍थिति को बदल दो तो फिर दूसरी परिस्थितियां होगीं। हर क्षण परिस्‍थिति बदलती रहती है। तो हर क्षण समस्‍या तो बनी ही रहने वाली है।