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क्या है विपश्यना ध्यान साधना ?


क्या है विपश्यना ध्यान साधना;-

विज्ञानं भैरव तंत्र में भगवन शिव ने श्‍वास-क्रिया से संबंधित नौ विधियां बताई है।विज्ञानं भैरव तंत्र के मार्ग पर चलने के लिए ईश्वर को मानना न मानना, आत्मा को मानना या न मानना आवश्यक नहीं है। गौतम बुद्ध ने विज्ञानं भैरव तंत्र को पूर्णरूपेण पालन किया है।विज्ञानं भैरव तंत्र का धर्म ,इस पृथ्वी पर अकेला वैज्ञानिक धर्म है जिसमें मान्यता, पूर्वाग्रह, विश्वास इत्यादि की कोई भी आवश्यकता नहीं है।इसीलिए विपश्यना क्रिया में कोई लिंग भेद, वर्ण, जात-पात, आयु-अवस्था, धनाढ्य-दरिद्र आदि का कहीं कोई बन्धन नहीं है। विपश्यना क्रिया साधना सहज है, सरल है और सुगम है।विपश्यना क्रिया उठते-बैठते, सोते-जागते, घर में, घर से बाहर, किसी भी समय और किसी भी अवस्था में कोई भी कर सकता है।बस देखना है और अवलोकन करना है।

विपश्यना का अर्थ है -वि + पश्य + ना अथार्त विशेष प्रकार से देखना।योग साधना के तीन मार्ग प्रचलित हैं ...विपश्यना, भावातीत ध्यान और हठयोग। गौतम बुद्ध ने ध्यान की 'विपश्यना-साधना' द्वारा बुद्धत्व प्राप्त किया था। यह वास्तव में सत्य की उपासना है ...सत्य में जीने का अभ्यास है।विपश्यना सम्यक् ज्ञान है। जो जैसा है, उसे ठीक वैसा ही देख-समझकर जो आचरण होगा, वही सही और कल्याणकारी सम्यक आचरण होगा। विपस्सना एक सरल प्रयोग है ..वह है अपनी आती-जाती श्वास के प्रति साक्षीभाव। श्वास जीवन है और सेतु है। श्वास से ही तुम्हारी आत्मा और देह जुड़ी है।इस पार देह है, उस पार चैतन्य है, मध्य में श्वास है। यदि तुम श्वास को ठीक से देखते रहो, तो अनिवार्य रूप से, तुम अपने को शरीर से भिन्न जानोगे।क्योंकि श्वास को देखने के लिए जरूरी है कि तुम अपनी आत्मचेतना में स्थिर हो जाओ।जो श्वास को देखेगा, वह श्वास से भिन्न हो गया, और जो श्वास से भिन्न हो गया वह शरीर से तो भिन्न हो ही गया। क्योंकि शरीर सबसे दूर है; उसके बाद श्वास है; उसके बाद तुम हो।शरीर से छूटो, श्वास से छूटो, तो शाश्वत का दर्शन होता है।उस दर्शन में ही ऊंचाई है, गहराई है ...बाकी सब तो व्यर्थ की आपाधापी है।श्वास भावों से जुड़ी है। यह तो हम जानते ही है कि क्रोध में श्वास एक ढंग से चलती है और करुणा में ...दूसरे ढंग से। दौड़ते हो, तो एक ढंग से चलती है; औरआहिस्ता चलते हो तो दूसरे ढंग से चलती है। भाव को बदलो तो श्वास बदल जाती है़ और इससे उल्टा भी सच है कि श्वास को बदलो तो भाव बदल जाते हैं।हम कोशिश कर सकते है कि क्रोध आये तो श्वास को स्थिर रखें ...शांत रहें। फिर तुम क्रोध करना भी चाहोगे तो क्रोध न कर पाओगे। क्रोध के लिए जरूरी है कि श्वास ,चेतना उससे आंदोलित हो जाये ...नहीं तो क्रोध देह पर ही रहेगा और देह पर आये क्रोध का कुछ अर्थ नहीं है।तुम कभी नदी-तट पर सुबह उगते सूरज को देखो ।यदि भाव शांत हैं तो श्वास भी शांत हो जाती है।

प्राणायाम में श्वास क