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कारण-शरीर’ और ‘सूक्ष्म-शरीर’ कैसे बनते हैं। और आत्मा के साथ इनका सम्बन्ध कब तक रहता है?


कारण शरीर ”प्रकृति” का नाम है। सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, इन तीनों के समुदाय का नाम प्रकृति है। ये सूक्ष्मतम कण हैं। उसी का नाम ‘कारण-शरीर’ है।

स अब उस प्रकृति रूपी कारण शरीर से दूसरा जो शरीर उत्पन्न हुआ, उसका नाम ‘सूक्ष्म शरीर’ है। आपने शरीर पर सूती कुर्ता (कपड़ा( पहन रखा है। इसका कारण है धागा। और धागे का कारण है- रूई। रूई, धागा और कॉटन-कुर्ता ये तीन वस्तु हो गयीं। कुर्ता, धागा और रूई, तो ऐसे तीन शरीर हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। स्थूल शरीर है कुर्ता, सूक्ष्म शरीर है धागा, और कारण शरीर है- रूई।

स जो संबंध कुर्ते, धागे और रूई में है, वो ही संबंध इन तीनों शरीर में है। क्या रूई के बिना धागा बन जायेगा, और क्या धागे के बिना कुर्ता बनेगा? कारण शरीर के बिना सूक्ष्म शरीर नहीं बनेगा। सूक्ष्म शरीर के बिना स्थूल शरीर नहीं बनेगा। कहा हैः- कारण शरीर प्रकृति सत्त्वरजसतमः। सत्त्व, रज और तम से अठारह चीजें बनी। उसका नाम है- सूक्ष्म शरीर।

स सृष्टि के आरंभ में जब भगवान ने ये सारी दुनिया बनायी तो कारण शरीर प्रकृति से अठारह पदार्थ उत्पन्न किये। उनके नाम हैं- बु(ि, अहंकार, मन, पाँच ज्ञान- इन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच तन्मात्रा। इनका नाम सूक्ष्म शरीर है। ये सारे पदार्थ प्रकृति से बनते हैं। रूप,रस, गंध आदि पाँच तन्मात्राओं से पाँच महाभूत बनते हैं। जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि, आकाश, इन पाँच महाभूतों के नाम है। इन्हीं पाँच पदार्थों का समुदाय ये स्थूल शरीर है। जो आपको आँख से दिखता है, वो स्थूल रूप। तो ये इन तीनों का संबंध है।

स जब तक जीवात्मा पुर्नजन्म धारण करेगा, यानी एक शरीर छोड़ दिया, दूसरा शरीर धारण कर लिया, तो स्थूल शरीर छूट जायेगा। अतः मृत्यु होने पर ये छूट जायेगा। सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर, ये दोनों जीवात्मा के साथ जुड़े रहेंगे। पुर्नजन्म हुआ फिर नया स्थूल शरीर मिल गया, फिर अगला शरीर, फिर अगला। जब तक मुक्ति नहीं होगी तब तक सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर साथ रहेगा। जब मुक्ति हो जायेगी तब तीनों शरीर छूट जायेंगे। धागा वही रहता है, कुर्ते बदलते रहते हैं।

स सूक्ष्म-शरीर और कारण-शरीर तब तक साथ रहेंगे, जब तक पुर्नजन्म होता रहेगा। जब मोक्ष हो जायेगा तब तीनों दूर हो जायेंगे। अथवा मोक्ष नहीं हुआ और आ गई प्रलय तो प्रलय में तीनों शरीर छूट जायेगा। स्थूल शरीर तो वैसे ही थोड़े-थोड़े दिनों में छूटते रहता हैं। तब सूक्ष्म शरीर भी टूट-फूट कर नष्ट हो जायेगा और कारण शरीर रूपी प्रकृति बचेगी। सूक्ष्म शरीर वापस टूट-फूट कर कारण शरीर के रूप में परिवर्तित हो जायेगा। जैसे मिट्टी का हमने ढ़ेला लिया और उसकी ईंट पका ली और फिर ईंट तोड़कर वापस मिट्टी बना दी, तो वापस ये मिट्टी बन गई यानि कारण शरीर बन गया। जीवात्मा प्रलय के समय तो अलग हो गया पर मुक्ति नहीं मिली। फिर एक नयी सृष्टि बनेगी, तो उसके साथ जीवात्मा को ईश्वर फिर दोबारा जोड़ देगा। तब तक वह बंधन की स्थिति में है। जब तक मोक्ष न हो जाये अथवा प्रलय न हो जाये तब तक ये दोनों शरीर आत्मा के साथ जुड़े रहेंगे। मोक्ष में या प्रलय में ये छूट जायेंगे। मोक्ष होने पर तो फिर हजारों सृष्टियों तक ये तीनों शरीर फिर जुड़ते नहीं हैं।

स अब रही बात राग और द्वेष की। राग और द्वेष भी जीवात्मा की शक्ति है। राग और द्वेष दो प्रकार का है :- एक स्वाभाविक और दूसरा नैमित्तिक। जो स्वाभाविक राग-द्वेष है, वो जीवात्मा से नहीं छूटेगा। वो मुक्ति में भी जीवात्मा में रहेगा। और स्वाभाविक राग-द्वेष में रहते-रहते मुक्ति हो जायेगी। इसमें कोई आपत्ति नहीं है, कोई बाधा नहीं है। जो नैमित्तिक राग-द्वेष है, वो बाधक है। उसे हटाना पड़ेगा, मुक्ति में वो छूट जायेगा।

स स्वाभाविक राग-द्वेष क्या है? और नैमित्तिक राग-द्वेष क्या है? उत्तर है कि जीवात्मा को हमेशा सुख चाहिये। यह उसको सूक्ष्म राग है। ये स्वाभाविक राग है। ये मुक्ति में बाधक नहीं है। जीवात्मा को दुःख कभी भी नहीं चाहिये। दुःख में उसको स्वाभाविक द्वेष है। ये भी मुक्ति में बाधक नहीं। ये स्वाभाविक राग और द्वेष रहेंगे, मुक्ति हो जायेगी। कोई परवाह नहीं।

स अमुक व्यक्ति ने मेरी हानि कर दी, मैं उसकी गर्दन तोडूँगा, ये सोचना नैमित्तिक द्वेष है। खीर, पूड़ी, लड्डू, हलुआ मुझे मिलना चाहिये, मुझे अधिक मिलना चाहिये, उसको कम, ये सोच नैमित्तिक राग है। ये मुक्ति में बाधक है। ये हट जायेगा, फिर मुक्ति होगी। इसके रहते मुक्ति नहीं होगी। इसको छोड़ देंगे तो मुक्ति हो जायेगी।

कारण शरीर को देव शरीर भी कहते हैं, कारण कि पाँचों प्रसिद्ध देवताओं की दिव्य शक्तियों का उसमें समावेश रहता है। परमेश्वर को परमपूज्य कहा है और पाँच देव तत्वों का अधिष्ठाता कहा है। परमात्मा की उपासना का तात्पर्य है श्रद्धा, निष्ठा, प्रज्ञा की त्रिधा, सद्भावनाओं का संगम। इस समागम को जिसने अन्तरात्मा में धारण कर लिया, समझना चाहिए कि उसने ब्राह्मी स्थिति उपलब्ध कर ली। स्वर्ग मुक्ति और ऋद्धि, सिद्धी का भण्डार परब्रह्म को माना जाता है। उसका अवतरण जब कभी जहाँ कहीं हुआ है उसे अन्तःकरण का उच्च स्तर एवं कारण शरीर का आधार बिन्दु के रूप में पाया गया है। समस्त सत्प्रवृत्तियों एवं सद्भावनाओं का उद्गम केन्द्र कारण शरीर ही है। उसी को परिष्कृत करने के लिए भक्ति भाव की साधना की जाती है।

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सृष्टि-तत्त्व और शरीर-संरचना

मूल प्रकृति सबसे पहले बुद्धि, फिर अहङ्कार, फिर ५ तन्मात्राओं (सूक्ष्मभूतों), ५ ज्ञानेन्द्रियों, ५ कर्मेन्द्रियों और मन, फिर तन्मात्राओं से ५ स्थूलभूतों (आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी) में परिवर्तित होती है । अब इन तत्त्वों से हम शरीर की रचना को समझते हैं ।

शरीर के प्रकार

जीव के ४ प्रकार के शरीर होते हैं । वे इस प्रकार हैं –

१) स्थूल शरीर – जो हमें साक्षात् दिखता है – आंखों से दिखता, कानों से सुनाई पड़ता (वाणी, ताली, आदि), नाक से सूंघने में आता, जिह्वा से स्वाद लेने में आता और त्वचा से छूने में आता है । इसी शरीर को सर्जन काटकर देख सकता है ।

२) सूक्ष्म शरीर – यह शरीर सूक्ष्म-तत्त्वों से बना होता है । इसलिए इन्द्रियगोचर नहीं होता । इसके दो विभाग होते हैं-

क) भौतिक – यह शरीर पञ्च सूक्ष्मभूतों और पञ्च प्राणों (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान) का बना होता है ।

ख) स्वाभाविक – यह शरीर पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धि का बना होता है । इनकी चेष्टा जीव की प्रवृत्ति के अनुसार होती है । इसलिए यह शरीर वस्तुतः जीव के स्वभाव को कार्यान्वित करता है । इसी के कारण, स्थूल शरीर-रचना एक समान होने पर भी, जीव स्वभाव से भिन्न होते हैं । इस स्वभाव-भेद से ही इस शरीर का अनुमान भी होता है ।

३) कारण शरीर – यह शरीर मूल प्रकृति का बना होता है । वस्तुतः, यह आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक है । और आकाश के ही समान, जितने भाग में हमारा शरीर स्थित है, उतने भाग को हम अपने शरीर का अंश मान सकते हैं । विकार-रहित प्रकृति का बना होने के कारण, इसमें पूर्णतया ज्ञान का अभाव होता है । महर्षि ने इस अवस्था को गाढ़ निद्रा कहा है ।

४) तुरीय शरीर – यह चौथा शरीर समाधि अवस्था में जीव को उपलब्ध होता है । इस चोगे से वह परमात्मा की अनुभूति कर पाता है । जिस प्रकार भगवद्गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को अपना रूप दिखाने के लिए दिव्य चक्षु देते हैं (न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्व चक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमीश्वरम् ॥ गीता ११।८॥ ), कुछ उसी प्रकार का यह शरीर होता है । यह प्रकृति का बना नहीं मानना चाहिए ।

इस प्रकार, हम सभी ३ शरीरों के पुंज हैं । यदि हम सृष्टि-तत्त्वों से इनकी तुलना करें, तो इस प्रकार का चित्र उभरता है –

सृष्टि-तत्त्व और शरीर

स्थूल शरीर – पञ्च स्थूलभूतों का बना हुआ

सूक्ष्म शरीर – पञ्च सूक्ष्मभूतों, ५ ज्ञानेन्द्रियों, ५ कर्मेन्द्रियों, मन, अहङ्कार और बुद्धि का बना हुआ, अर्थात् ऊपर दिये विवरण में हमें ५ कर्मेन्द्रियों और अहङ्कार को जोड़ना है । अहङ्कार तो बहुत बार मन में ही गिना जाता है, इसलिए कोई कठिनाई नहीं है । परन्तु कर्मेन्द्रियों को ऊपर से मिलाना कठिन है । और ऊपर पञ्च प्राण गिने गये हैं, जो सूक्ष्मतत्त्वों में नहीं गिनाये गये हैं । इनका भी मेल करना कठिन है । सम्भव है कि प्राण-वायु वायु-तन्मात्र के अवयव हों । परन्तु इससे प्रश्न उठता है कि फिर कर्मेन्द्रियां क्यों नहीं गिनाई गईं ? इसके उत्तर में एक सम्भावना उत्पन्न होती है – क्या प्राणों और कर्मेन्द्रियों में कुछ सम्बन्ध है ? हम जानते हैं कि अपान वायु का पायु और उपस्थ कर्मेन्द्रियों से सम्बन्ध है, और वाणी और उदान का भी सम्बन्ध इंगित किया गया है, परन्तु अन्य प्राण कर्मेन्द्रियों से सम्बन्धित नहीं बताये गये हैं, अपितु पाचन-क्रिया से सम्बद्ध बताये गये हैं । किस प्रकार ’वायु’ इन पाचन-क्रियाओं से सम्बद्ध है, यह भी स्पष्ट नहीं है । दूसरी ओर, हम यह अनुभव करते हैं कि जब हमें बल लगाना होता है, तब हम अपान-वायु अन्दर लेते हैं और बल लगाते हुए उसे प्राण-वायु के रूप में छोड़ते हैं । एक और कठिनाई यह है कि कर्मेन्द्रियों के सूक्ष्म-रूप समझ में नहीं आते – हाथ और पैरों के क्या सूक्ष्म-रूप हैं ? ये तो मन के संकेतों पर नाचते हैं ! इन सब तथ्यों से प्रतीत होता है कि ५ कर्मेन्द्रिय और ५ प्राणों का – भिन्न होते हुए भी – कुछ घनिष्ठ सम्बन्ध है । विद्वत्-जन अवश्य इस विषय पर और प्रकाश फेंकनें का कष्ट करें ।

कारण शरीर – कारण प्रकृति का बना हुआ ।

शरीर के पञ्च कोश

शरीर का एक और आयाम है । वह है – पञ्च कोश । ये पञ्च कोश शरीर के ही आकार के होते हैं, परन्तु सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होते जाते हैं । ये हैं –

१) अन्न्मय कोश – “जो त्वचा से लेकर अस्थि-पर्यन्त का समुदाय पृथिवीमय है (सत्यार्थ-प्रकाश, नवां समुल्लास)”, अर्थात् दृश्य शरीर ।

२) प्राणमय कोश – पञ्च प्राण-वायुओं का बना ।

३) मनोमय कोश – पञ्च कर्मेन्द्रियों, मन और अहङ्कार वाला भाग ।

४) विज्ञानमय कोश – पञ्च ज्ञानेन्द्रियों और बुद्धि का अंश ।

५) आनन्दमय कोश – कारण प्रकृति का बना भाग ।

विभागों का समीकरण

यहां स्पष्ट हो जाता है कि अन्नमय कोश स्थूल शरीर ही है । प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय कोश सूक्ष्म शरीर के अंश हैं, और आनन्दमय कोश कारण शरीर है । मैंने कई प्रवचनकर्ताओं को आनन्दमय कोश को – “जीव स्वयं है” – ऐसा बताते हुए सुना है । यह कथन सही नहीं है । आनन्दमय कोश भी प्राकृतिक है, परन्तु वहां वही आनन्द मिलता है, जो सुषुप्ति की अवस्था में मिलता है – और उससे अधिक भी !

यदि कोश भी शरीर के ही विभाग हैं, तो स्थूल-सूक्ष्म-कारण और पञ्च कोशों में भेद क्यों किया गया है ? इसका विश्लेषण करते हुए, हम एक बात एकदम देख सकते हैं कि विज्ञानमय कोश में ज्ञानेन्द्रिय हैं, जो कि पूर्व के मनोमय कोश के मन और अहङ्कार से स्थूलतर है । इसलिए कोशों का विभाग पूर्णतया सूक्ष्मता के अनुसार नहीं है, जबकि ३ शरीरों का विभाजन इसी के अनुसार निर्धारित है । प्रतीत होता है कि ये कोश हमारी अनुभूति के अनुसार हैं – हम शरीर को इन रूपों में अनुभव करते हैं । इसलिए ये योगी के ध्यान करने में सहायता के लिए हैं । ध्यान करते समय हमें पहले अपने अन्नमय कोश पर चित्त को स्थिर करना चाहिए, जैसे भौहों के बीच में, नाभि पर, आदि । इसके उपरान्त हमें प्राणमय शरीर – अपनी श्वास-प्रश्वास पर ध्यान लगाना चाहिए । यहां स्थिर हो जाने पर, हमें मनोमय कोश – जो हिलने-डुलने, देखने-सुनने, आदि का सङ्कल्प करता है – उसको अनुभव करना चाहिए । इसके बाद भी हमारी बुद्धि में विचार आ रहे होंगे । यह विज्ञानमय कोश है । विचारों के स्थिर हो जाने पर, हम अपने-आप आनन्द का अनुभव करने लगेंगे । यही आनन्दमय कोश है ।

जीव इन सभी शरीरों और कोशों से भिन्न है, और स्वतन्त्र सत्ता वाला है । सूक्ष्म और कारण शरीर सृष्टि में आत्मा से चिपक जाते हैं, फिर सर्गान्त में ही छूटते हैं । मुक्तात्मा का भौतिक सूक्ष्म-शरीर तो छूट जाता है, परन्तु स्वाभाविक शरीर बना रहता है, और सर्गान्त में छूटता है । परन्तु इस विषय में विद्वानों में मतभेद रहा है । कुछ का मानना है कि मुक्तात्मा प्रकृति से सर्वथा रहित हो जाता है ।

साङ्ख्य के प्राकृतिक तत्त्वों और शरीर की संरचना में इस प्रकार सीधा-सीधा सम्बन्ध दीख पड़ता है । विभिन्न शास्त्रों में जो भिन्नताएं प्रतीत होती हैं, वे विश्लेषण करने पर नहीं रहतीं । शास्त्रों के सार को समझने के लिए, यह मेल करना बड़ा आवश्यक है ।;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

आत्‍मा तो वस्‍तुत: एक ही है। लेकिन शरीर दो प्रकार के है। एक शरीर जिसे हम स्‍थूल शरीर कहते है, जो हमें दिखाई देता है। एक शरीर जो सूक्ष्‍म शरीर है जो हमें दिखाई नहीं पड़ता है। एक शरीर की जब मृत्‍यु होती है, तो स्‍थूल शरीर तो गिर जाता है। लेकिन जो सूक्ष्‍म शरीर है वह जो सटल बॉडी है, वह नहीं मरती है। आत्‍मा दो शरीरों के भीतर वास कर रही है। एक सूक्ष्‍म और दूसरा स्‍थूल। मृत्‍यु के समय स्‍थूल शरीर गिर जाता है। यह जो मिट्टी पानी से बना हुआ शरीर है यह जो हड्डी मांस मज्‍जा की देह है। यह गिर जाती है। फिर अत्‍यंत सूक्ष्‍म विचारों का, सूक्ष्‍म संवेदनाओं का, सूक्ष्‍म वयब्रेशंस का शरीर शेष रह जाता है, सूक्ष्‍म तंतुओं का।

वह तंतुओं से घिरा हुआ शरीर आत्‍मा के साथ फिर से यात्रा शुरू करता है। और नया जन्‍म फिर नए स्‍थूल शरीर में प्रवेश करता है। तब एक मां के पेट में नई आत्‍मा का प्रवेश होता है, तो उसका अर्थ है सूक्ष्‍म शरीर का प्रवेश। मृत्‍यु के समय सिर्फ स्‍थूल शरीर गिरता है—सूक्ष्‍म शरीर नहीं। लेकिन परम मृत्‍यु के समय—जिसे हम मोक्ष कहते है—उस परम मृत्‍यु के समय स्‍थूल शरीर के साथ ही सूक्ष्‍म शरीर भी गिर जाता है। फिर आत्‍मा का कोई जन्‍म नहीं होता। फिर वह आत्‍मा विराट में लीन हो जाती है। वह जो विराट में लीनता है, वह एक ही है। जैसे एक बूंद सागर में गिर जाती है।

तीन बातें समझ लेनी जरूरी है। आत्‍मा का तत्‍व एक है। उस आत्‍मा के तत्‍व के संबंध में आकर दो तरह के शरीर सक्रिय होते है। एक सूक्ष्‍म शरीर, और एक स्‍थूल शरीर। स्‍थूल शरीर से हम परिचित है, सूक्ष्‍म से योगी परिचित होता है। और योग के भी जो ऊपर उठ जाते हैं, वे उससे परिचित होते है जो आत्‍मा है। सामान्‍य आंखें देख पाती है इस शरीर को। योग-दृष्‍टि, ध्‍यान देख पाता है सूक्ष्‍म शरीर को। लेकिन ध्‍यानातीत, बियांड योग, सूक्ष्‍म के भी पार, उसके भी आगे जो शेष रह जाता है, उसका तो समाधि में अनुभव होता है। ध्‍यान से भी जब व्‍यक्‍ति ऊपर उठ जाता है तो समाधि फलित होती है। और उस समाधि में जो अनुभव होता है, वह परमात्‍मा का अनुभव है।

साधारण मनुष्‍य का अनुभव शरीर का अनुभव है, साधारण योगी का अनुभव सूक्ष्‍म शरीर का अनुभव है, परम योगी का अनुभव परमात्‍मा का अनुभव है। परमात्‍मा एक है, सूक्ष्‍म शरीर अनंत हैं, स्‍थूल शरीर अनंत हैं। वह जो सूक्ष्‍म शरीर है वह है कॉज़ल बॉडी। वह जो सूक्ष्‍म शरीर है, वही नए स्‍थूल शरीर ग्रहण करता है। हम यहां देख रहे हैं कि बहुत से बल्‍ब जले हुए हैं। विद्युत तो एक है। विद्युत बहुत नहीं है। वह ऊर्जा, वह शक्‍ति, वह एनर्जी एक है। लेकिन दो अलग बल्लों से वह प्रकट हुई है। बल्‍ब का शरीर अलग-अलग है, उसकी आत्‍मा एक है।

हमारे भीतर से जो चेतना झांक रही है, वह चेतना एक है। लेकिन उस चेतना के झांकने में दो उपकरणों का, दो वैहिकल का प्रयोग किया गया है। एक सूक्ष्‍म उपकरण है सूक्ष्‍म देह, दूसरा उपकरण है, स्‍थूल देह। हमारा अनुभव स्‍थूल देह तक ही रूक जाता है। यह जो स्‍थूल देह तक रूक गया अनुभव है, यहीं मनुष्‍य के जीवन का सारा अंधकार और दुख है। लेकिन कुछ लोग सूक्ष्‍म शरीर पर भी रूक सकते हैं। जो लोग सूक्ष्‍म शरीर पर रूक जाते हैं, वे ऐसा कहेंगे कि आत्‍माएं अनंत हैं। लेकिन जो सूक्ष्‍म शरीर के भी आगे चले जाते है, वे कहेंगे कि परमात्‍मा एक है। आत्‍मा एक, ब्रह्म एक है।

आत्‍मा के प्रवेश का अर्थ है वह आत्‍मा जिसका अभी सूक्ष्‍म शरीर गिरा नहीं है। इसलिए हम कहते हैं कि जो आत्‍मा परम मुक्‍ति को उपलब्‍ध हो जाती है, उसका जन्‍म-मरण बंद हो जाता है। आत्‍मा का तो कोई जन्‍म-मरण है ही नहीं। वह न तो कभी जन्‍मी है और न कभी मरेगी। वह जो सूक्ष्‍म शरीर है, वह भी समाप्‍त हो जाने पर कोई जन्‍म-मरण नहीं रह जाता। क्‍योंकि सूक्ष्‍म शरीर ही कारण बनता है नए जन्‍मों का।

सूक्ष्‍म शरीर का अर्थ है, हमारे विचार, हमारी कामनाएँ, हमारी वासनाएं, हमारी इच्‍छाएं, हमारे अनुभव, हमारा ज्ञान, इन सबका जो संग्रहीभूत जो इंटिग्रेटेड सीड है, इन सबका जो बीज है, वह हमारा सूक्ष्‍म शरीर है। वही हमें आगे की यात्रा करता है। लेकिन जिस मनुष्‍य के सारे विचार नष्‍ट हो गए, जिस मनुष्‍य की सारी वासनाएं क्षीण हो गई, जिस मनुष्‍य की सारी इच्‍छाएं विलीन हो गई, जिसके भीतर अब कोई भी इच्‍छा शेष न रही, उस मनुष्‍य को जाने के लिए कोई जगह नहीं बचती, जाने का कोई कारण नहीं रह जाता। जन्‍म की कोई वजह नहीं रह जाती।

THE SUBTLE BODY ONLY CAUSES NEW BIRTHS

The soul is indeed the same. But the body has two types. A body that we call a gross body, which we see. A body which is subtle body which we can not see. When one body dies, then the gross body falls. But the subtle body that is the subtle body does not die. The soul resides within two bodies. A subtle and second gross. At the time of death, the gross body falls. This soil which is made of water is the body which is the body of the bone meat marrow. It falls. Then the very subtle thoughts, the subtle sensations, the body of the microscopic body is left, the subtle fibers are left.

The body surrounded by fibers starts traveling again with the soul. And the new birth again enters the new gross body. Then a new soul enters a mother's stomach, then it means the entry of the astral body. At the time of death only the gross body falls - the subtle body is not. But at the time of ultimate death - which we call salvation - during that ultimate death, the subtle body also falls along with the gross body. Then there is no birth of soul. Then the soul becomes absorbed in the Viraat. He who is absorbed in the Viraat is the same. Like a drop falls into the ocean.

It is important to understand three things. The element of the soul is one. In relation to the element of that soul, two types of bodies are active. A subtle body, and a gross body. We are familiar with the gross body, the yogi is familiar with the subtle. And those who rise above the yoga, they are familiar with that which is the soul. Normal eyes can see this body. Yoga-sight, sees the subtle body. But the meditative, Bind Yoga, even beyond the subtle, beyond what is left remains experienced in samadhi. Meditation also results in meditation when a person gets up. And the experience of that Samadhi is the experience of God.

The experience of ordinary man is the experience of the body, the experience of the ordinary yogi is the experience of the astral body, the experience of the ultimate yogi is the experience of God. God is the one, the subtle body is infinite, the gross body is infinite. The subtle body that is the cosmic body is the cosmic body.The one who is the subtle body, that person takes the new physical body. We are seeing here that many bulbs are burnt. Electricity is one. Electricity is not very much. That energy, that power, that energy is one. But he has appeared with two separate bat. The body of the bulb is different, its soul is one.

The consciousness that is beholding from within us, is the consciousness one. But in the peeping of that consciousness two vehicles, two vehicles have been used. A subtle tool is the subtle body, the second is the device, the physical body. Our experience stops only in the physical body. This is the experience which has stopped till the physical body, here is the whole darkness of darkness and darkness. But some people can stop even on the astral body. Those who stop at the astral body, they will say that souls are infinite. But those who go beyond even the subtle body, they will say that God is one. Soul is one, Brahma is one.

There is no contradiction between these two things. The soul which I asked for the entry of the soul means that the soul whose subtle body is not dropped. That is why we say that the soul, which becomes available to the ultimate liberation, ends its birth and death. There is no birth and death in the soul. He is neither born nor will ever die. The person who is the subtle body, does not end there any birth and death. Because the subtle body only causes new births.

The meaning of the astral body, our thoughts, our desires, our desires, our desires, our experience, our knowledge, all those who collect, which is the integrated seed, all of which is the seed, it is our subtle body. That same travels us further. But the man whose thoughts were destroyed, all the desires of the person became impaired, the man's whole desires disappeared, within which there is no desire left, there is no place for that person to go, go There is no reason for it There is no reason to be born.