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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 55,56वीं विधियां (आत्‍म-स्‍मरण की चार विधियां)क्या है?



विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि;- 55-

(आत्‍म-स्‍मरण की तीसरी विधि)

16 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-

‘’जब नींद अभी नहीं आयी हो और बाह्य जागरण विदा हो गया हो, उस मध्‍य बिंदू पर बोधपूर्ण रहने से आत्‍मा प्रकाशित होती है।‘’

2-तुम्‍हारी चेतना में कई मोड़ आते है, और मोड़ के बिंदु भीआते है। इन बिंदुओं पर तुम अन्‍य समयों की तुलना में अपने केंद्र के ज्‍यादा करीब होते हो। तुम कार चलाते समय गियर बदलते हो और गियर बदलते हुए तुम न्‍यूट्रल से गुजरते हो। यह न्‍यूट्रल

गियर निकटतम है।सुबह जब नींद विदा हो रही होती है और तुम जागने लगते हो। लेकिन अभी जागे नहीं हो, ठीक उस मध्‍य बिंदु पर तुम न्‍यूट्रल गियर में होते हो। यह एक बिंदु है जहां तुम न सोए हो और न जागे हो, ठीक मध्‍य में हो; तब तुम न्‍यूट्रल गियर में हो। नींद से जागरण में आते समय तुम्‍हारी चेतना की पूरी व्‍यवस्‍था बदल जाती है। वह एक व्‍यवस्‍था से दूसरी व्‍यवस्‍था में छलांग लेती है। और इन दोनों के बीच में कोई व्‍यवस्‍था नहीं होती, एक अंतराल होता है। इस अंतराल में तुम्‍हें अपनी आत्‍मा की एक झलक मिल सकती है।

3-वही बात फिर रात में घटित होती है जब तुम अपनी जाग्रत व्‍यवस्‍था से नींद की व्‍यवस्‍था में, चेतन से अचेतन में छलांग लेते हो। तब फिर एक क्षण के लिए कोई व्‍यवस्‍था नहीं होती है या किसी व्‍यवस्‍था की पकड़ नहीं होती है। क्‍योंकि तब तुम एक से दूसरी व्‍यवस्‍था में छलांग लेते हो। इन दोनों के मध्‍य में अगर तुम सजग रह सकें, बोधपूर्ण रह सके और अपना स्‍मरण रख सके, तो तुम्‍हें अपने सच्‍चे स्‍वरूप की झलक मिल जाएगी। तो इसके लिए नींद में उतरने के पहले विश्राम पूर्ण होओ

और आंखे बंद कर लो। कमरे में अँधेरा कर लो ;आंखे बंद कर लो और कुछ मत करो,बस प्रतीक्षा करो।अब तुम्‍हारा शरीर शिथिल हो रहा है ,भारी हो रहा है। बस शिथिलता को, भारीपन को महसूस करो।

4-नींद की अपनी ही व्‍यवस्‍था है, वह काम करने लगती है। तुम्‍हारी जाग्रत चेतना विलीन हो रही है। इसे स्‍मरण रखो, क्‍योंकि वह क्षण बहुत सूक्ष्‍म है। वह क्षण परमाणु सा छोटा होता है। इसे चूक गये तो चूक गये। वह कोई बड़ा अंतराल नहीं है ,बहुत छोटा ..केवल क्षण भर का अंतराल है, जिसमें तुम जागरण से नींद में प्रवेश कर जाते हो। तो बस पूरी सजगता से प्रतीक्षा

करो। इसमे थोड़ा समय लगेगा। कम से कम तीन महीने लगते है। तब एक दिन तुम्‍हें उस क्षण की झलक मिलेगी। जो ठीक बीच में है। तो जल्‍दी मत करो। यह अभी ही नहीं होगा, यह आज रात ही नहीं होगा। लेकिन तुम्‍हें शुरू करना है और महीनों प्रतीक्षा करनी है। साधारण: तीन महीने में किसी दिन यह घटित होगा। यह रोज ही घटित हो रहा है। लेकिन तुम्‍हारी सजगता और अंतराल का मिलन आयोजित नहीं किया जा सकता। वह घटित हो ही रहा है। तुम प्रतीक्षा किए जाओ और किसी दिन वह घटित होगा।

5-किसी दिन तुम्‍हें अचानक यह बोध होगा कि मैं न जागा हूं और न सोया हूं।यह एक बहुत विचित्र अनुभव है, तुम उससे भयभीत भी हो सकते हो। अब तक तुमने दो ही अवस्‍थाएं जानी है। तुम्‍हें जागने का पता है, तुम्‍हें अपनी नींद का पता है। लेकिन तुम्हें यह नहीं पता है कि तुम्‍हारे भीतर एक तीसरा बिंदू भी है। जब तुम न जागे हुए हो और न सोये हुए हो। इस बिंदू के प्रथम दर्शन पर तुम भयभीत या आंतरिक भी हो सकते हो।न भयभीत होओ और न आतंरिक। जो कुछ भी भी नया या अनजाना होगा ;वह जरूर भयभीत करेगा । क्‍योंकि ,जब तुम्‍हें इस क्षण का बार-बार अनुभव होगा तो तुम्‍हें एक और एहसास देगा कि तुम न जीवित हो और न मृत।कि तुम न यह हो और न वह।वास्तव में, यह अतल खाई जैसा है।

6-नींद और जागरण की व्‍यवस्‍थाएं दो पहाड़ियों की भांति है, तुम एक से दूसरे पर छलांग लगाते हो। लेकिन यदि तुम उसके मध्‍य में ठहर जाओ तो तुम अतल खाई में गिर जाओगे। और इस खाई का कहीं अंत नहीं है। तुम बस गिरते और गिरते ही

जाओगे।सूफियों ने इस विधि का उपयोग किया है। लेकिन जब वे किसी साधक को यह विधि देते है तो सुरक्षा के लिए वे साथ

ही एक और विधि भी देते है।सूफी साधना में इस विधि के दिये जाने से पहले दूसरी विधि यह दी जाती है कि तुम बंद आंखों से कल्‍पना करो, कि तुम अतल कुएं में गिर रहे हो। और गिरते ही जाओ ..गिरते ही जाओ। सतत गिरते ही जाओ। यह कुआं अतल है, तुम कहीं रूक नहीं सकते। यह गिरना कही रूकने वाला नहीं है। तुम रूक सकते हो, आंखें खोलकर कह सकते हो कि अब और नहीं। लेकिन यह गिरना अपने आप में कही रूकने वाला नहीं है। अगर तुम गिरते रहे तो कुआं अतल है। और वह ज्यादा अंधकारपूर्ण होता जाएगा।

7-सूफी साधना में अतल कुएं में गिरने का यह अभ्‍यास पहले कराया जाता हैजो अच्‍छा और उपयोगी है। अगर तुमने इसका अभ्‍यास किया और अगर इसके सौंदर्य ,शांति को जाना, अनुभव किया, तो तुम चाहे जितने गहरे कुएं में उतर सकते हो। तुम ज्‍यादा शांत हो सकते हो। संसार बहुत पीछे छूट जायेगा और तुम्‍हें लगेगा कि मैं बहुत दूर निकल आया हूं। अंधकार के साथ शांति बढ़ती है क्योकि नीचे गहरे में कहीं कोई तल नहीं है। इसलिए भय भी पकड़ सकता है। लेकिन तुम्‍हें मालूम है कि यह

सिर्फ कल्‍पना है, इसलिए तुम इसे जारी रख सकते हो।इस अभ्‍यास के द्वारा तुम इस विधि के लिए तैयार होते हो। और फिर जब तुम जागरण और नींद के अंतराल के कुएं में गिरते हो तो यह कल्‍पना नहीं है, यह यथार्थ है। और यह कुआं भी अतल है ,अनंत है। इसीलिए इसे शून्‍य कहा गया है, जिसका अंत नहीं है। और तुम एक बार इसे जान गए तो तुम भी अनंत हो गये।

‘’जब नींद अभी नहीं आयी हो और बाह्य जागरण विदा हो गया हो, उस मध्‍य बिंदु पर बोधपूर्ण रहने से आत्‍मा प्रकाशित होती है।‘’

8-तब तुम जानते हो कि मैं कौन हूं, मेरा सच्‍चा स्‍वभाव क्‍या है, मेरा प्रमाणिक अस्‍तित्‍व क्‍या है। जागते हुए झूठे हो और यह तुम भली भांति जानते हो। जब तुम जागे हुए हो, तुम झूठे बने रहते हो। तुम उस समय मुस्कराते हो, जब कि आंसू बहाना ज्‍यादा सच होता है। तुम्‍हारे आंसू भी भरोसे योग्‍य नहीं है। वे भी दिखाऊ या नकली हो सकते है। जो लोग चेहरे पढ़ना जानते है वे कह सकते है कि यह मुस्‍कुराहट बस तुम्‍हारे चेहरे पर है, होठो पर है ,ऊपरी है। भीतर उसकी कोई जड़ें नहीं है। यह

मुस्‍कुराहट तुम्‍हारे प्राणों से नहीं उठी है बल्कि उपर से ओढ़ी या थोपी गई है।तुम जो कहते हो या करते हो, सब नकली है। यह जरूरी नहीं है कि तुम यह नकली व्‍यापार जान बूझकर करते हो। हो सकता है कि उसके प्रति तुम सर्वथा अंजान हो । यह व्‍यापार स्‍वचालित है।

9-जब तुम जागे हुए हो..यह झूठ चलता रहता है और यह झूठ तब भी चलता रहा है जब तुम सोए हुए हो -लेकिन तब और ढंग से चलता है। तुम्‍हारे सपने प्रतीकात्‍मक है, सच नहीं। हैरानी की बात है कि तुम अपने सपनों मे भी सच्‍चे नहीं हो, तुम अपने

सपनों में भी भयभीत हो। और तुम प्रतीक निर्मित करते हो।अब मनोविश्‍लेषक तुम्‍हारे सपनों का विश्‍लेषण करता रहता है। उसका यह धंधा एक भारी धंधा बन गया है। क्‍योंकि तुम खुद अपने सपनों का विश्‍लेषण नहीं कर सकते हो। सपने प्रतीकात्‍मक रूप से सच नहीं है। वे सिर्फ प्रतीकों के द्वारा कुछ कहते है।उदाहरण के लिए अगर तुम अपनी मां की या किसी की हत्‍या करना चाहते हो, उससे छुटकारा चाहते हो तो तुम सपने में उसकी हत्‍या नहीं करोगे। तुम उसकी जगह किसी ऐसे व्‍यक्‍ति की हत्‍या कर दोगे, जो देखने में उसके जैसा होगा।

10- तुम अपने सपने में भी प्रमाणिक नहीं हो सकते। यह कारण है कि मनोविश्‍लेषण / एक पेशेवर व्‍यक्‍ति की जरूरत पड़ती है। जो तुम्‍हारे सपनों की व्‍याख्‍या कर सके। लेकिन तुम सपने को भी एक ढंग से रख सकते हो कि मनोविश्‍लेषण भी धोखा

खा जाए।तुम्‍हारे सपने भी सर्वथा झूठे है। लेकिन अगर तुम जागते हुए सच्‍चे रह सको तो तुम्‍हारे सपने सच हो सकते है, तब वे प्रतीकात्‍मक नहीं होंगे। तब अगर तुम किसी की हत्‍या करना चाहोगे तो सपने में तुम उसकी ही हत्‍या करोगे ,किसी और की नहीं। और फिर व्‍याख्‍या करने वालों की जरूरत नहीं होगी। तुम्‍हें खुद पता होगा की तुम्‍हारे सपनों का अर्थ क्‍या है। लेकिन हम इतने झूठे है, धोखेबाज है, कि सपने के एकांत में भी संसार से, समाज से डरते है।

11-लेकिन यह सिखावन क्‍यों? गहरे में यह संभावना है कि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति अनिवार्यतः अपनी मां के विरोध में चला जाए, क्‍योंकि मां ने तुम्‍हें सिर्फ जन्‍म ही नहीं दिया, उसने तुम्‍हें झूठ और नकली बनने के लिए मजबूर किया है। तुम जो भी हो, अपनी मां के बनाए हुए हो। अगर तुम एक नरक हो तो इसमें तुम्‍हारी मां का सबसे बड़ा हाथ है। अगर तुम दुःख में हो तो उस दुःख में कहीं न कहीं तुम्‍हारी मां मौजूद है, क्‍योंकि मां ने तुम्‍हें जन्‍म दिया, उसने तुम्‍हें पाल-पोसकर बड़ा किया। या कहें कि उसने तुम्‍हें पाल-पोसकर नकली बनाया। उसने तुम्‍हें तुम्‍हारी प्रामाणिकता से हटा दिया। तुम्‍हारा पहला झूठ तुम्‍हारे और तुम्‍हारी

मां के बीच घटित हुआ है।जब बच्‍चे ने बोलना भी नहीं सीखा है, उसके पास भाषा भी नहीं है। तब भी वह झूठ बोल सकता है। देर अबेर वह जान जाता है कि उसके अनेक भाव मां को पसंद नहीं है।

12-मां का चेहरा, उसकी आंखें, उसका व्‍यवहार, उसकी मुद्रा, सब बात बता देते है कि उसकी कुछ चीजें पसंद नहीं है , स्‍वीकृत नहीं है। और तब बच्‍चा दमन करने लगता है; उसे लगता है कि कुछ गलत है। अभी उसके पास भाषा नहीं है, उसका मन सक्रिय नहीं है। लेकिन उसका सारा शरीर दमन करने लग जाता है। और फिर उसे पता चलता है कि कभी-कभी कोई बात उसकी मां के द्वारा सराही जाती है। और यह बच्‍चा मां पर निर्भर है, उसका जीवन ही मां पर निर्भर है। अगर मां उसे छोड़

दे तो वह नहीं जी सकता। उसका पूरा जीवन मां पर केंद्रित है।इसलिए मां का व्यवहार, उसकी बात, उसका इशारा ..बच्‍चे के लिए महत्‍वपूर्ण हो जाता है। अगर बच्‍चा मुस्कराता है और तब मां उसे प्रेम देती है ,लाड़-दुलार करती है और दूध पिलाती है ,छाती से लगाती है। तो समझो की बच्‍चा राजनीति सीखने लगा। वह तब भी मुस्‍कुराएगा जब उसके मुस्‍कुराहट नहीं भी होगी। क्‍योंकि अब वह जानता है कि ऐसा करके वह मां को खुश कर सकता है। अब वह झूठी मुस्‍कुराहट मुस्‍कुराएगा। अब एक झूठा व्‍यक्‍ति पैदा हो गया। अब एक राजनीतिज्ञ अस्‍तित्‍व में आया। अब वह जानता है कि कैसे झूठ हुआ जाए।

13-और यह सब वह अपनी मां के सत्‍संग से सीखता है। संसार में वह उसका पहला संबंध है। इसलिए जब उसे अपने दुखों का पता चलता है ,अपने नरक का बोध होता है, उलझनें घेरेंगी, तब उसे यह भी पता चलेगा कि इन सबमें कही न कहीं उसकी मां छिपी है।और पूरी संभावना यह है कि तुम अपनी मां के प्रति शत्रुता अनुभव करते हो। यही कारण है कि सभी संस्‍कृतियों में जोर दिया जाता है कि मां की हत्‍या जघन्‍य पाप है। विचार में भी, सपने में भी, तुम मां की हत्‍या न कर सको।

तुम्‍हारे ये दो चेहरे, झूठे है। एक चेहरा तुम्‍हारे जागरण में प्रकट होता है और दूसरा तुम्‍हारी नींद में। इन दो झूठे चेहरों के बीच एक छोटा सा द्वार है, एक छोटा सा अंतराल है। इस अंतराल में तुम्‍हें अपने मौलिक चेहरे की झलक मिल सकती है—उस मौलिक चेहरे की ,जो तब था;जब तुम मां से संबंधित नहीं हुए थे। और मां के जरिए समाज से नहीं जुड़े थे। जब तुम अपने साथ अकेले थे ; केवल तुम थे—तुम यह/ वह नहीं थे। जब कोई विभाजन नहीं था। केवल सत्‍य था; कुछ असत्‍य नहीं था। इन दो व्‍यवस्‍थाओं के बीच तुम्‍हें अपने उस सच्‍चे चेहरे की झलक मिल सकती है।

14-साधारणत: हम अपने सपनों की चिंता नहीं लेते है, हम सिर्फ जागते समय की चिंता लेते है। लेकिन मनोविश्‍लेषण तुम्‍हारे सपनों की ज्‍यादा चिंता लेते है। वह तुम्‍हारे जागरण की चिंता नहीं लेता है। क्‍योंकि वह समझता है कि जागे हुए तुम ज्‍यादा झूठे होते हो। तुम्‍हारे सपनों से कुछ पकड़ा जा सकता है। जब तुम सोए होते हो तो कम सजग होते हो। तब तुम कुछ आरोपित नहीं करते, तब तुम तोड़ते-मरोड़ते नहीं। उस अवस्‍था में कुछ सत्‍य पकड़ा जा सकता है। क्‍योंकि तुम जागते हुए जिसे दबाओगें वह

तुम्‍हारे सपनों में उभरकर आएगा। वह तुम्‍हारे सपनों को प्रभावित करेगा।मनोचिकित्‍सक तुम्‍हारे जागरण की फिक्र नहीं

करते है, क्‍योंकि वे जानते है कि वह बिलकुल झूठ है। अगर कुछ सच्‍चा, कुछ यथार्थ देखना हो तो वह केवल सपनों में देखा जा सकता है।

15-लेकिन तंत्र कहता है कि सपने भी उतने सच नहीं है हालांकि जागरण की तुलना में वे ज्‍यादा सच है। यह पहेली सी मालूम पड़ती है क्‍योंकि हम सपनों को असत्‍य मानते है। वे जागरण की घड़ियों की बजाय ज्‍यादा सच है क्‍योंकि सपनों में

तुम अपने पहरे पर कम होते हो।नींद में संसार सोया रहता है और दमित चीजें ऊपर आ सकती है या अपने को अभिव्‍यक्‍त कर सकती है। हां यह अभिव्‍यक्‍ति प्रतीकात्‍मक होगी; पर प्रतीकों को समझा जा सकता है।सारी दुनियां में मनुष्‍य के प्रतीक

समान है।जागते हुए तुम भिन्‍न भाषा बोल सकते हो। लेकिन सपने में तुम वही भाषा बोलते हो जो सारे लोग बोलते है। सारी दुनिया की स्‍वप्‍न भाषा एक है। अगर भोजन की इच्‍छा को दबाया गया है, भूख को दमित किया गया है तो उसे भी सपने में सर्वत्र एक ही तरह के प्रतीक अभिव्‍यक्‍त करेंगे। स्‍वप्‍न की एक भाषा है।

16-लेकिन प्रतीकों के कारण ही स्‍वप्‍नों के साथ एक दूसरी कठिनाई है। फ्रायड उसका अर्थ एक ढंग से कर सकता है। जुंग उनका अर्थ दूसरे ढंग से कर सकता है। और एडलर उनका अर्थ और भी भिन्‍न ढंग से कर सकता है। अगर सौ मनोविश्‍लेषक तुम्‍हारा विश्‍लेषण करें तो वे सौ व्‍याख्‍याएं करेंगे। और तुम पहले से ज्‍यादा उलझन में पड़ जाओगे। एक ही चीज की सौ

व्‍याख्‍याएं तुम्‍हें और भी भृमित कर देंगी।तंत्र कहता है, तुम न जागते हुए सच हो और न सोते हुए सच हो, तुम इन दो अवस्‍थाओं के बीच में कहीं सच हो। इसलिए न जागरण की फिक्र करो और नींद की और न स्‍वप्‍न की। सिर्फ अंतराल की फिक्र करो। उस अंतराल के प्रति जागों। एक से दूसरी अवस्‍था में गुजरते हुए इस अंतराल का दर्शन करो।और एक बार तुम जान जाते हो कि यह अंतराल कब आता है।तुम उसके मालिक हो जाते हो। तब तुम्‍हें कुंजी मिल गई, तुम किसी भी वक्‍त उस अंतराल को खोलकर उसमे प्रवेश कर सकते हो। तब होने का एक भिन्‍न आयाम, एक नया आयाम खुलता है।

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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि;- 56-

(आत्‍म-स्‍मरण की चौथी विधि)

11 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-

''भ्रांतियां छलती है, रंग सीमित करते है, विभाज्‍य भी अविभाज्‍य है।''

2-यह एक दुर्लभ विधि है। जिसका प्रयोग बहुत कम हुआ है। लेकिन भारत के एक महानतम गुरु /शिक्षकआदि शंकराचार्य ने इस विधि का प्रयोग किया है।आदि शंकराचार्य ने तो अपना पूरा दर्शन ही इस विधि के आधार पर अथार्त माया के दर्शन पर खड़ा किया है।आदि शंकराचार्य कहते है कि सब कुछ माया है। तुम जो भी देखते, सुनते या अनुभव करते हो, सब माया है। वह सत्‍य नहीं है। क्‍योंकि सत्‍य को इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता।तुम्हारी माँ तुमसे कुछ कह रही है और तुम सुन रहे

हो ,हो सकता है कि यह सब स्‍वप्‍न हो।यह कैसे जाना जा सकता है कि यह स्‍वप्‍न नहीं, सत्‍य है।वास्तव में, यह स्‍वप्‍न है या नहीं, यह तय करने का कोई उपाय नहीं है।

3-चीनी फ़क़ीर च्‍वांगत्‍सु के बारे में कहा जाता है कि एक रात उसने स्‍वप्‍न देखा कि वह तितली हो गया है। सुबह जागने पर वह बहुत दुःखी था।वास्तव में, वह दुःखी होने वाला व्‍यक्‍ति नहीं था। उसके शिष्‍य इकट्ठे हुए और उन्‍होंने पूछा: गुरूदेव आप

इतने दुःखी क्‍यों है?च्‍वांगत्‍सु ने बताया कि रात के सपने के कारण वह दुःखी है। उसके शिष्‍यों ने कहा कि हैरानी की बात है कि आप सपने के कारण दुःखी है। आपने तो हमें यही सिखाया कि यदि सारा संसार भी दुःख देने आए तो दुःखी मत होना। और एक सपने के कारण आप दुःखी है? आप क्‍या कहते है?च्‍वांगत्‍सु ने कहा किय ह सपना ही ऐसा है कि इसमे मैं बहुत उलझन

में पड़ गया हूं और इसलिए दुःखी हूं। मैंने सपना देखा कि मैं तितली हो गया हूं।

4-शिष्‍यों ने पूछा कि इसमें हैरानी की बात क्‍या है?च्‍वांगत्‍सु ने कहा कि दिक्‍कत यह है कि अगर च्‍वांत्‍सु सपना देख सकता है कि मैं तितली हो गया हूं। तो इससे उलटा भी हो सकता है। तितली सपना देख सकती है कि मैं च्‍वांगत्‍सु हो गयी हूं। यही कारण है कि मैं परेशान हूं कि क्‍या ठीक है और क्‍या गलत है? अगर एक बात हो सकती है तो दूसरी भी हो सकती है।

और कहा जाता है कि च्‍वांगत्‍सु को जीवन भर एक पहेली का हल न मिला, यह सदा उसके साथ रही।वास्तव में, इंद्रियों से कोई

निर्णय संभव नहीं है, क्‍योंकि सपना देखते हुए सपना यथार्थ मालूम पड़ता है ...उतना ही यथार्थ जितना कुछ भी दूसरा यथार्थ मालूम पड़ता है। जब तुम सपना देखते हो तो तुम्‍हें वह सदा सच्‍चा मालूम पड़ता है। और जब सपने को सच की तरह देखा जा सकता है तो सच को भी सपने की तरह देखा जा सकता है।

5-आदि शंकराचार्य कहते है कि इंद्रियों से यह जानना संभव नहीं है कि जो चीज तुम्‍हारे सामने है वह सच है या स्‍वप्‍न। और जब जानने का उपाय ही नहीं है कि वह सच है या झूठ तो आदि शंकराचार्य उसे माया कहते है।माया का अर्थ झूठ नहीं है,

बल्कि माया का अर्थ है कि यह निर्णय करना असंभव है कि वह सच है या झूठ।वास्तव में, पश्‍चिम की भाषाओं में माया का गलत अनुवाद हुआ है कि माया शब्‍द अयथार्थ या झूठ का अर्थ रखता है। यह अर्थ सही नहीं है। माया का इतना ही अर्थ है कि

यह निश्‍चित नहीं हो सकता है कि कोई चीज यथार्थ है कि अयथार्थ। यह उलझन माया है।यह सारा जगत माया है। तुम उसके संबंध में कुछ भी निर्णय पूर्वक नहीं कह सकते। यह जगत निरंतर तुमसे छूट जाता है, बदल जाता है ; कुछ से कुछ हो जाता है। यह इंद्रजाल या स्‍वप्‍नवत सा लगता है। और यह विधि इसी दृष्‍टि से संबधित है।‘’भ्रांतियां छलती है‘’या जो चीज छले वह भ्रांति है।

6-‘’रंग सीमित करते है'', अथार्त इस माया के जगत में कुछ भी निश्‍चित नहीं है। सारा जगत इंद्रधनुष के समान है, वह भासता है, लेकिन है नहीं। जब तुम उससे बहुत दूर होते हो तो वह है, जब करीब जाते हो तो वह खोता जाता है। जितना करीब जाओगे उतना ही वह खोता जाएगा। और अगर तुम उस बिंदू पर पहुंच जाओ जहां इंद्रधनुष दिखाई पड़ता था

तो वह बिलकुल खो जायेगा।सारा जगत इंद्रधनुष के रंगों जैसा है। और सच्‍चाई यही है कि जब तुम दूर होते हो, सब कुछ आशा पूर्ण दिखाई देता है; जब तुम करीब आते हो, आशा खो जाती है। और जब तुम मंजिल पर पहुंच जाते हो, तब तो राख ही बचती है। मृत इंद्रधनुष बचता है जिसके सब रंग उड़ जाते है। कुछ भी वैसा नहीं है जैसा दिखता था। जैसा तुमने चाहा था वैसा कुछ भी नहीं है।

7-‘’विभाज्‍य भी अविभाज्‍य है'' अथार्त तुम्‍हारा सब गणित, तुम्‍हारा सब हिसाब-किताब, तुम्‍हारी सब धारणाएं, तुम्‍हारे सब सिद्धांत ..सब कुछ व्‍यर्थ हो जाते है।हम त्रिदेव, त्रिदेवी के रूप में ईश्वर को विभाजित कर देते हैं।परंतु त्रिदेव के रूप में

विभाजित होने वाला ब्रह्म भी एक ही है अथार्त अविभाज्य है।अगर तुम इस माया को समझने की चेष्‍टा करोगे तो तुम्‍हारी

चेष्‍टा ही तुम्‍हें और भ्रांत कर देगी। वहां कुछ भी निश्‍चित नहीं है ;सब अनिश्‍चित है। जगत एक परिवर्तनों का प्रवाह है, और

तुम्‍हारे लिए यह तय करने का कोई उपाय नहीं है कि क्‍या सच है और क्‍या नहीं है।अगर यह दृष्‍टि तुममें गहरी उतर जाए कि तुम जिस चीज के संबंध में निश्‍चित नहीं हो सके ..वह माया है। तब तुम अपने ही आप, सहजता से अपनी तरफ मुड़ जाओगे।लेकिन तब तुम्‍हें अपना केंद्र सिर्फ अपने भीतर खोजना होगा।क्योकि वही एकमात्र सुनिश्‍चितता है।इसे इस तरह समझने की कोशिश करे कि कोई रात में स्‍वप्‍न देख सकता है कि वह तितली बन गया है।

8-परन्तु वह स्‍वप्‍न में तय नहीं कर सकता कि यह सच है या झूठ है। और अगली सुबह वह च्‍वांगत्‍सु की तरह उलझन में

पड़ सकता है कि अब कहीं तितली भी यह सपना तो नहीं देख रही कि वह च्‍वांगत्‍सु हो गई है।अब ये दो सपने है और तुलना का कोई उपाय नहीं है कि इनमें कौन सच है और कौन झूठ।लेकिन च्‍वांगत्‍सु उसे चूक रहे है जो स्‍वप्‍न देख रहा है कि च्‍वांगत्‍सु तितली बन गया है। वह उसे भी चूक रहे है जो यह विचार करता है कि बात बिलकुल उलटी भी हो सकती है।परन्तु यह देखने वाला द्रष्‍टा कौन है? कौन है वह... जो सोया हुआ था और अब जागा हुआ है?कोई तुम्‍हारे लिए असत्‍य हो सकता है ,स्‍वप्‍न हो सकता है। लेकिन तुम अपने लिए स्‍वप्‍न नहीं हो सकते । क्‍योंकि स्‍वप्‍न के होने के लिए भी एक स्‍वप्‍न देखने वाले की जरूरत है। यह विधि कहती है: स्‍वप्‍न को भूल जाओ ;सारा जगत माया है; लेकिन तुम माया नहीं हो। तुम जगत के पीछे मत भागों। क्‍योंकि वहां सुनिश्‍चित होने की कोई संभावना नहीं है कि क्‍या सत्‍य है और क्‍या असत्‍य। और अब तो वैज्ञानिक शोध से भी यह बात सिद्ध हो चुकी है।

9-पिछले तीन सौ वर्षों तक विज्ञान सुनिश्‍चित था और आदि शंकराचार्य एक दार्शनिक /एक कवि जैसे मालूम पड़ते थे।लेकिन

अब विज्ञान का निश्‍चय अनिश्‍चय में बदल गया है।अब बड़े से बड़ा वैज्ञानिक कहते है कि कुछ भी निश्‍चित नहीं है और पदार्थ के साथ हम कभी निश्‍चित नहीं हो सकते। सब कुछ पुन: संदिग्‍ध हो गया है अथार्त बदलता हुआ मालूम पड़ता है। बाहरी रूप-रंग ही निश्‍चित मालूम पड़ता है। लेकिन जैसे-जैसे तुम उसमे गहरे जाते हो सब अनिश्‍चित /धुंधला होता जाता है।आदि

शंकराचार्य और तंत्र ने सदा कहा है कि जगत माया है।आदि शंकराचार्य के जन्‍म के पहले भी ''तंत्र'' इस विधि का उपयोग करता था कि जगत माया है ,उसे स्‍वप्‍नवत समझो। और अगर तुमने इसे माया समझा तो तुम जान जाओगे ही कि यह माया है। तब तुम्‍हारी पूरी चेतना भीतर की और मुड़ जाएगी क्‍योंकि सत्‍य को जानने की प्रबल इच्छा है।

10-अगर सारा जगत अयथार्थ है, असत्‍य है, तो उससे कोई आश्रय नहीं मिल सकता है। इसका अर्थ है कि तुम छायाओं

के पीछे भाग रहे हो और अपने समय, शक्‍ति , जीवन का अपव्‍यय कर रह हो। अब भीतर की तरफ चलो क्‍योंकि एक बात तो निश्‍चित है कि 'मैं हूं'। यदि सारा जगत भी माया है तो भी एक चीज निश्‍चित है कि कोई है, जो जानता है कि यह माया है। ज्ञान भ्रांत हो सकता है, ज्ञेय भ्रांत हो सकता है, लेकिन ज्ञाता भ्रांत नहीं हो सकता। वही एक मात्र निश्‍चय है, एकमात्र चट्टान है, जिस

पर तुम खड़े हो सकते हो।जगत का अनुभव तीन खंडों में तोड़ा जा सकता है। 11-ये तीन त्रिभंगियां/ Tridents हैं–ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान। जो वस्तुएं दिखाई पड़ती हैं, वे हैं ज्ञेय, “The Known’।तो दूसरा है: ज्ञान/Knowledge। वैज्ञानिक , दार्शनिक , कवि , मनीषी , विचारक आदि ज्ञान को बढ़ाते हैं।इसके भीतर छिपा है तुम्हारा ज्ञाता स्वरूप / Knower। जो परम रहस्य के खोजी हैं, वे ज्ञान की नहीं बल्कि यह फिक्र करते हैं कि “यह जाननेवाला कौन

है!’ज्ञाता ज्ञान के द्वारा ज्ञेय तक पहुंचने का प्रयास करता है। ये तीन त्रिभंगियां/ Tridents हैं– साधक ,साध्य ,साधना । साधक

साधना के द्वाराअपने साध्य तक पहुंचने का प्रयास करता है।साधना उसका कर्म है और साध्य उसका लक्ष्य। यह विधि कहती है: ‘’संसार को देखो; यह स्‍वप्‍नवत है, माया है, वैसा बिलकुल नहीं है ..जैसा भासता है। यह बस इंद्रधनुष जैसा है। इस भाव की

गहराई में उतरो और तुम अपने पर फेंक दिए जाओगे। और अपने अंतस पर आने के साथ-साथ तुम निश्‍चय को, सत्‍य को, असंदिग्‍ध को, परम को उपलब्‍ध हो जाते हो।विज्ञान कभी परम तक नहीं पहुंच सकता, वह सदा सापेक्ष रहेगा।सिर्फ धर्म परम को उपलब्‍ध हो सकता है।क्‍योंकि धर्म उसे खोजता है जो चिन्‍मय है। धर्म स्‍वप्‍न को नहीं बल्कि स्‍वप्‍नदर्शी को , दृश्‍य को नहीं बल्कि द्रष्‍टा को खोजता है।

....SHIVOHAM...