Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

क्या है विज्ञान भैरव तन्त्र सार ? PART02


विज्ञान भैरव तन्त्र सार;-

35 FACTS;-

1-तंत्र विज्ञान है, और वह परमाणु -विज्ञान से भी ज्‍यादा गहन विज्ञान है। परमाणु विज्ञान पदार्थ से संबंधित है; तंत्र तुमसे संबंधित है। और तुम सदा ही किसी भी परमाणु-ऊर्जा से अधिक खतरनाक हो। तंत्र तुमसे, जीवित कोशिका से, स्‍वयं जीवन चेतना से संबंधित है। जो व्‍यक्‍ति जीवन और चेतना में रूचि रखता है। वह अपने काम में दिलचस्‍पी लेगा। 2-काम जीवन का , प्रेम का, चेतना का स्‍त्रोत है। चेतना के जगत में जो भी घट रहा है ;उसका आधार काम है। और अगर कोई साधक काम और प्रेम में उत्‍सुक नहीं है तो वह दार्शनिक हो सकता है ,साधक नहीं ।और दर्शनशास्‍त्र कामोबेश कचरा है .. जो व्‍यर्थ की चीजों के संबंध में ऊहापोह करता है। 3-तंत्र की उत्‍सुकता दर्शन में नहीं है। उसकी उत्‍सुकता वास्‍तविक और अस्‍तित्‍वगत जीवन में है। तंत्र कभी नहीं पूछता है कि क्‍या ईश्‍वर है, क्‍या मोक्ष है, क्‍या स्‍वर्ग -नरक है। तंत्र जीवन के संबंध में बुनियादी प्रश्‍न पूछता है। यही कारण है कि प्रेम में उसकी इतनी रूचि है क्योकि काम और प्रेम बुनियादी है।

4-विज्ञान भैरव तंत्र देवी के प्रश्नों से शुरू होता है और सभी प्रश्न दर्शन के तल पर हाथ में लिए जा सकते हैं। दरअसल कोई भी प्रश्न दो ढंग से हल किया जा सकता है... दार्शनिक ढंग से अथवा समग्रता पूर्वक; बौद्धिक ढंग से अथवा अस्तित्वगत रूप से।यही कारण है कि देवी ऐसे प्रश्न पूछती हैं जो दार्शनिक प्रश्न जैसे दिखते हैं।देवी कहती है... हे शिव, आपका सत्‍य क्‍या है?यह विस्‍मय-भरा विश्‍व क्‍या है?इसका बीज क्‍या है? विश्‍व–चक्र की धुरी क्‍या है?रूपों पर छाए ,लेकिन रूप के परे ;यह जीवन क्‍या है? देश और काल, नाम और प्रत्‍यय के परे जाकर; हम इसमें कैसे पूर्णत: प्रवेश करें? मेरे संशय निमूर्ल करें। 5- विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं है, वह दार्शनिक नहीं है। सिद्धांत इसके लिए अर्थ नहीं रखता। यह उपाय की, विधि की चिंता करता है, सिद्धांत की कतई नहीं। तंत्र शब्द का अर्थ ही है विधि, उपाय, मार्ग। इसलिए यह कोई मीमांसा नहीं है, इस बात को ध्यान में रख लें। बौद्धिक समस्याओं और उनके ऊहापोह से इसका कोई संबंध नहीं है। यह चीजों के 'क्यों' की चिंता नहीं लेता, उनके 'कैसे' की चिंता लेता है, सत्य क्या है इसकी नहीं, वरन इसकी कि सत्य को कैसे उपलब्ध हुआ जाए। 6-तंत्र का अर्थ विधि है। इसलिए यह एक विज्ञान -ग्रंथ है। विज्ञान 'क्यों' की नहीं, 'कैसे' की फिक्र करता है। दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है। दर्शन पूछता है. यह अस्तित्व क्यों है? विज्ञान पूछता है. यह अस्तित्व कैसे है? जब तुम कैसे का प्रश्न पूछते हो, तब उपाय, विधि महत्वपूर्ण हो जाती है। तब सिद्धांत व्यर्थ हो जाते हैं, अनुभव केंद्र बन जाता है। तंत्र विज्ञान है, तंत्र दर्शन नहीं है। दर्शन को समझना आसान है, क्योंकि उसके लिए सिर्फ मस्तिष्क की जरूरत पड़ती है।

7-यदि तुम भाषा जानते हो, यदि तुम प्रत्यय समझते हो तो तुम दर्शन समझ सकते हो। उसके लिए तुमको बदलने की, संपरिवर्तित होने की कोई जरूरत नहीं है। तुम जैसे हो वैसे ही बने रहकर दर्शन को समझ सकते हो। लेकिन वैसे ही रहकर तंत्र को नहीं समझ सकते। तंत्र को समझने के लिए तुम्हारे बदलने की जरूरत रहेगी; बदलाहट की ही नहीं, आमूल बदलाहट की जरूरत होगी। जब तक तुम बिलकुल भिन्न नहीं हो जाते हो, तब तक तंत्र को नहीं समझा जा सकता। क्योंकि तंत्र कोई बौद्धिक प्रस्तावना नहीं है, वह एक अनुभव है। और जब तक तुम अनुभव के प्रति संवेदनशील, तैयार, खुले हुए नहीं होते, तब तक यह अनुभव तुम्हारे पास आने को नहीं है। 8-दर्शन की फिक्र तुम्हारे मन के साथ है। उसके लिए तुम्हारा मस्तिष्क काफी है, उसको तुम्हारी समग्रता नहीं चाहिए। तंत्र तुमको तुम्हारी समग्रता में मांगता है। यह बहुत गहरी चुनौती है, इसमें तुम पूरे और इकट्ठे होकर ही उतर सकते हो। तंत्र खंडित नहीं है। उसकी अगवानी के तरह के रुझान, तरह की यात्रा, और ही तरह के मन की जरूरत।उदाहरण के लिए अगर कोई पूछे, प्रेम क्या है? तो तुम उस प्रश्न का उत्तर बौद्धिक तल पर दे सकते हो, कोई सिद्धांत प्रस्तावित कर सकते हो, किसी विशेष परिकल्पना के लिए दलील दे सकते हो। तुम एक व्यवस्था, एक सिद्धांत, एक मतवाद खड़ा कर सकते हो। और हो सकता है कि प्रेम का तुमको बिलकुल पता न हो। 9-मतवाद गढ़ने के लिए अनुभव की जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि तुम जितना कम जानते हो उतना ही अच्छा। क्योंकि तब तुम बेहिचक व्यवस्था प्रस्तावित कर सकते हो। केवल अंधा आदमी आसानी के साथ प्रकाश की व्याख्या कर सकता है। जब तुम नहीं जानते हो, तब ढीठ होते हो। अज्ञान हमेशा ढीठ होता है, ज्ञान झिझकता है। जितना तुम जानते हो उतनी ही पांव के नीचे की जमीन खिसक नजर आती है। जितना तुम जानते हो उतना ही तुमको तुम्हारे अज्ञान का अनुभव होता है। और जो सच में ही ज्ञानी हैं, वे अज्ञानी हो जाते हैं। वे बच्चों की तरह सरल हो जाते हैं। 10-इसलिए जितना कम जानते हो उतना बेहतर। मीमांसक होना, मतवादी होना, मूढ़ाग्रही होना सचमुच आसान है। किसी भी प्रश्न को बुद्धि के