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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 49,50वीं विधियों (ऊर्ध्वगमन सम्बन्धी 5)का क्या विवेचन है?



विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि;- 49

(ऊर्ध्वगमन सम्बन्धी दूसरा सूत्र)

08 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-

‘’ऐसे प्रेम-आलिंगन में जब तुम्‍हारी इंद्रियाँ पत्‍तों की भांति कांपने लगें उस कंपन में प्रवेश करो।‘’

2-भगवान शिव अपनी पत्नी ,माता पार्वती से पॉजिटिव और नेगेटिव ऊर्जा /इड़ा और पिंगला के मिलन की ओर संकेत कर रहे

है;जो केवल अक्रिय (Inactive)अवस्था में ही संभव है।अगर आप रीढ़ की शारीरिक बनावट के बारे में जानते हैं, तो आप जानते होंगे कि रीढ़ के दोनों ओर दो छिद्र होते हैं, जो वाहक नली की तरह होते हैं, जिनसे होकर सभी धमनियां गुजरती हैं। ये

इड़ा और पिंगला, यानी बायीं और दाहिनी नाड़ियां हैं।इड़ा और पिंगला जीवन की बुनियादी द्वैतता की प्रतीक हैं। इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव और शक्ति का नाम देते हैं। या इसे बस पुरुषोचित और स्त्रियोचित कह सकते हैं। यह आपके दो पहलू – लॉजिक या तर्क-बुद्धि और इंट्यूशन या सहज-ज्ञान हो सकते हैं। जीवन की रचना भी इसी के आधार पर होती है। इन दोनों गुणों के बिना, जीवन ऐसा नहीं होता, जैसा वह अभी है।

3-सृजन से पहले की अवस्था में सब कुछ मौलिक रूप में होता है। उस अवस्था में द्वैत नहीं होता। लेकिन जैसे ही सृजन होता

है, उसमें द्वैतता आ जाती है।पुरुषोचित और स्त्रियोचित का मतलब शारीरिक रूप से पुरुष या स्त्री होने से नहीं है, बल्कि प्रकृति में मौजूद कुछ खास गुणों से है। प्रकृति के कुछ गुणों को पुरुषोचित माना गया है और कुछ अन्य गुणों को स्त्रियोचित। आप भले ही पुरुष हों, लेकिन यदि आपकी इड़ा नाड़ी अधिक सक्रिय है, तो आपके अंदर स्त्रियोचित गुण हावी हो सकते हैं। आप भले ही स्त्री हों, मगर यदि आपकी पिंगला अधिक सक्रिय है, तो आपमें पुरुषोचित गुण हावी हो सकते हैं।अगर

आप इड़ा और पिंगला के बीच संतुलन बना पाते हैं तो दुनिया में आप प्रभावशाली हो सकते हैं। इससे आप जीवन के सभी पहलुओं को अच्छी तरह संभाल सकते हैं। अधिकतर लोग इड़ा और पिंगला में जीते और मरते हैं, मध्य स्थान सुषुम्ना निष्क्रिय बना रहता है। लेकिन सुषुम्ना मानव शरीर-विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

4-जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, वास्तविक जीवन तभी शुरू होता है।यह सूत्र ऊर्जा को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश

कराने की विधि की ओर संकेत कर रहा है।तुम अपने शरीर को अधिक हलचल नहीं करने देते हो। क्‍योंकि तुम उसे तभी नियंत्रण में रख सकते हो जब वह सीमित रहता है। तब उस पर दिमाग नियंत्रण कर सकता है। जब तुम कांपने लगोगे तो