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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 48वीं(ऊर्ध्वगमन सम्बन्धी 5 विधियां) ‎विधि का क्या विवेचन है?


48-''प्रेम--आलिंगन में आरंभ में उसकी आरंभिक अग्‍नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो''।

भगवान शिव 'ऊर्ध्वगमन' कीओर संकेत कर रहे है ;तो पहले हमें इस ऊर्ध्वगमन साधना के विषय में ज्ञान करना चाहिए।

क्या है प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग ?-

08 FACTS;-

1-भारतीय संस्कृति में प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनाें मार्ग हैं।इसलिए ऊर्ध्वगमन साधना/कुण्डलिनी शक्ति साधना दो प्रकार की होती है...

A-निवृत्ति मार्ग /श्रेय मार्ग B-प्रवृत्तिमार्ग

निवृत्ति मार्ग में प्राणकी गति उलटी करके इन्द्रियों में मन न लगाकर कर्म करते रहता है-योगी।प्रवृत्ति मार्ग में इन्द्रियों में मन लगाकर कर्मेन्द्रियों से कार्य करता रहता है-भोगी ।बहुत कम लोगों की प्रवृत्ति श्रेय मार्ग में होती है जबकि प्रेय व सांसारिक मार्ग, धन व सम्पत्ति प्रधान जीवन में सभी मनुष्यों की प्रवृत्ति होती है। जहां प्रवृत्ति होनी चाहिये वहां नहीं है और जहाँ नहीं होनी चाहिये, वहां प्रवृत्ति होती है। यही मनुष्य जीवन में दुःख का प्रमुख कारण है।हनुमान जी निवृत्ति और भरत जी प्रवृत्ति मार्ग के आचार्य हैं। इन दोनों ही मार्गों में समानता यह है कि दोनों का लक्ष्य प्रभु को प्राप्त करना है।

2-श्रेय मार्ग में प्राणायाम और योग ,जिसमें शक्ति चालिनी मुद्रा ,उड्यान बंध तथा कुम्भक, प्राणायाम और ओज का महत्व प्रतिपादित किया गया है।ऐसी साधना प्रक्रिया अविवाहित, विधुर अथवा सन्यासियों के लिए महत्वपूर्ण है ।यह साधना उन लोगों के लिए उपयुक्त नहीं रही जो गृहस्थाश्रम में रहकर साधना करना चाहते हैं ।गृहस्थ बिना स्त्री के नहीं चलता है और संन्यास स्त्री के रहते कभी नहीं चलता है।परन्तु जहाँ तक साधना का प्रश्न है तो क्या गृहस्थ और क्या सन्यासी ;क्या स्त्री और क्या पुरुष

सभी समान अधिकार रखते हैं।ऐसे प्रवृत्तिमार्गी गृहस्थों के लिए भी साधनारत होने का मार्ग है।निवृत्ति मार्ग में जो कार्य

शक्ति चालिनी मुद्रा ने किया वह कार्य प्रवृत्ति मार्ग में गृहस्थों के लिए रमण मुद्रा से संपन्न किया गया शेष बंध और कुम्भक समान रहे ।

3-इस प्रकार वीर्य को उर्ध्व गति देने के लिए जहाँ सन्यासी लोग भस्त्रिका प्राणायाम का प्रयोग करते थे ;वहां प्रवृत्ति मार्ग साधक दीर्घ रमण का उपयोग करने लगे।इस प्रकार कुण्डलिनी साधना का दूसरा प्रकार रमण मुद्राओं वाला बन गया।

रमण के कारण इस साधना में पति- पत्नी ,दोनों का बराबर का योगदान रहा ।साधक को यम व् नियम का तथा आसन प्राणायाम आदि बहिरंग साधना की उतनी ही तैयारी करनी पड़ती जितनी निवृति मार्ग अपनाने वाले साधक को करनी पड़ती

है।मनुष्य में कार्य करने के लिए ऊर्जा व् आभा तथा ज्योति का मिश्रण ही काम में लाना पड़ता है । मनुष्य में इन तीन