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साम्यावस्था की प्राप्ति कैसे करें?


साम्यावस्था;-

वह अवस्था जिसमें सत्व, रज और तम तीनों गुण बराबर हों, उनमें किसी प्रकार का विकार, या वैषम्य न हो ।

जीवन और द्वन्द्व आज इस कदर घुल मिल गए हैं कि दोनों को एक दूसरे का पर्याय कह लें तो कोई अत्युक्ति नहीं। हर कहीं अनिश्चय है। एक निर्णय हो पाए, तब तक दूसरा विचार आ टपकता है। एक स्थिति बन पाए इसके पहले दूसरी आ जाती है। गरीब हो या अमीर इसी अन्तर्द्वंद्व के झूले में उलझते रहते हैं। गरीब की समस्याएं छोटी लगती हैं अमीर की बड़ी। पर तह तक पहुँचने पर बात एक हो जाती है। अन्तर झोंपड़ी और महल का है। मन की संरचना प्रायः एक जैसी है। प्रवृत्तियों, अभिलाषाओं, आकाँक्षाओं में कोई अन्तर नहीं।

इस तत्व की समानता के कारण समाजशास्त्री मार्क्स ने इसे मनुष्य व्यापी समस्या के रूप में लिया। उसे अपनी रचनाओं में कहना पड़ा-पूरे समाज में द्वन्द्व व्याप्त है। समाज है ही डायलेक्टिकल। इसमें तब तक सुधार नहीं लाया जा सकता जब तक विषम स्थिति समाप्त न हो, साम्य न उपस्थित हो जाए। मार्क्स के चिन्तन में कमी नहीं। तत्वतः व्यक्ति के प्रसार का नाम समाज है। व्यक्ति की समस्याएं प्रकारान्तर से समाज की समस्याएं हैं। समस्याओं की जड़ को उनने नाम दिया द्वन्द्व। जब तक इसकी समाप्ति नहीं हो जाती तब तक सुख शान्ति कुछ भी वह जो श्रेयस्कर है उपलब्ध नहीं हो सकता।

साम्यावस्था की प्राप्ति के लिए उनके लिए प्रेरणा स्रोत था ‘अर्थ’। आर्थिक बँटवारा बराबर हो जाय तो शायद साम्य आ सके। इस सोच ने आधी दुनिया में क्रान्ति मचा दी। पर यह प्रयोग असफल रहा। इसे असफल होना था ही। धनी आदमी कम अनिश्चय में नहीं रहते। निरन्तर एक गहरी जलन-किंकर्तव्य-विमूढ़ता उन्हें झुलसाती रहती है।

मान लें यह प्रयोग सफल हो भी जाता, धन का बराबर वितरण हो भी जाता तो भी परेशानी जाने वाली नहीं थी अधिक से अधिक रूप बदल जाते। कल अगर साम्यता आ जाए तो भी कोई सुन्दर होगा कोई असुन्दर होगा और किसी के सुन्दर होने पर उतनी ही ईर्ष्या जगेगी जितनी किसी के धनवान होने पर जगती है। एक आदमी बुद्धिमान होगा-एक बुद्धिहीन होगा। बदले हुए रूपों में समस्याएं बनी रहेंगी क्योंकि मन द्वन्द्वात्मक है। टकराहट जीवन की आंतरिक शक्तियों में है।

प्रख्यात तत्वेत्ता ए. एन. व्हाइटहेड ने अपने ग्रन्थ “एडवेन्चर आँव आइडियाज” में इन टकराहट के कारणों का खुलासा करते हुए कहा है कि हमारे जीवन का सामान्य व्यवहार दो परस्पर पूरक शक्तियों से नियंत्रित होता है। पहली जीवन में अन्तर्निहित इच्छा शक्ति है। दूसरी परिवर्तनकारी शक्ति जो इस जीवन को लक्ष्य प्रणाली प्रदान करने के लिए मन के किसी कोने में यदा-कदा उमंगती रहती है। इनमें से पहली शक्ति का संचालन सहज प्रेरित है। पशु पर्यन्त अब मानव जीवन की सुख-सुविधा, सहज ज्ञान सन्तुष्टि का कारण सहज और स्वचालित प्रेरणा के प्रति उसका पूर्ण आज्ञा पालन है। इसी एक को सब कुछ मान लेने की कोशिश ने अनेकों विचार उपजाए-विचारकों को प्रेरित किया। इन सभी विचारों में सामान्य दोष यह है कि इसकी पैठ मनुष्य के सच्चे स्वभाव तक नहीं हो पाती।

वास्तव में मनुष्य दोहरी प्रकृति का प्राणी है। एक तो पशु प्रवृत्ति है। जो अपनी सहज प्रवृत्तियों आवेगों, इच्छाओं, स्वचालित प्रेरणाओं के अनुसार जीवनयापन करती है। दूसरी एक अतिजागरुक, बौद्धिक, नैतिक, सौन्दर्यात्मक विवेक पूर्ण और गतिशील प्रकृति है। एक ऐसा चिन्तनशील मन है जो निम्न प्रकृति का परिशोधन चाहता है। एक ऐसा संकल्प है जो देवत्व को जीवन में उतारने के लिए हुलसता रहता है।

मनीषी क्षामस कुन के ग्रंथ “द इसेन्शियल टेन्शन” के अनुसार द्वन्द्व का कारण इन्हीं दोनों प्रकृतियों का टकराव है। इस टकराव के कारण अभी तक उच्चतर जीवन एक ऐसी वस्तु माना जाता रहा है, जो निम्न जीवन पर ऊपर से लादी जाती है। उसे एक अनाधिकारी हमलावर समझा जाता है, जो सदा हमारे सामान्य जीवन में हस्तक्षेप करता रहता है। जिसका काम डाँटना और आदेश करना है। ये दोनों तत्व एक सतत् और पारस्परिक झमेले में निवास करते हैं और सदा ही एक दूसरे के द्वारा व्याकुल, दुखित और प्रभावहीन किए जाते हैं। ये दोनों उस बेमेल पति-पत्नी के समान हैं जो सदा ही झगड़ते रहते हैं । मानव मन की समस्त व्याकुलता, असन्तुष्टि, श्रान्ति, उदासी और निराशा का स्रोत इंसान की उस व्यावहारिक, असफलता में है जो उसे अपनी दोहरी प्रकृति की पहेली हल करने पर मिलती है।

विनोबा ने इस संकेत करते हुए अपनी पुस्तक साम्य सत्र में एक सत्र का प्रतिपादन किया है “अभिधेयं परम साम्यम्” । उनके अनुसार सर्वोदय या जीवन में साम्यावस्था का उदय इस पहेली का सही हल खोजने पर ही हो सकेगा। पश्चिमी तत्ववेत्ता मेस्टर एकहार्ट ने इस तथ्य को अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि यद्यपि सभी किसी न किसी अंतर्द्वंद्व से ग्रसित हैं, पर उनके प्रकार अलग हैं। उन्होंने मोटे तौर पर तीन विभाजन किए हैं। एक वे जो इच्छाओं में जीते हैं। दूसरे जो विचारों में जीते हैं। इन दोनों के बीच एक पतला विभाजन है-जो भाव में जीते हैं।

बहुतायत इच्छाओं में जीने वालों की है। समुद्र की भाँति मन में इन्हीं के ज्वार-भाटे उठते रहते हैं। उच्च प्रकृति और निम्न प्रकृति परस्पर विरोधी इच्छाओं को उछालती रहती हैं, इनसे उबरने का रास्ता है-इच्छाओं के प्रति जागरुक होना। इच्छाओं के ढेर में किसी सद्इच्छा को चुनकर उसे संकल्प में बदल डालना। निरन्तर दिवास्वप्नों को देखने से उत्तम है, संकल्पबद्ध हो क्रियाशील हुआ जाय। संकल्प के क्रियाशील होते ही मन साम्यावस्था की ओर गतिशील होता लगेगा। इच्छाओं के बादल तिरोहित होने लगेंगे।

जो लोग इच्छाओं की जगह विचारों में जीते हैं, उनके लिए इस प्रक्रिया का ज्यादा अर्थ नहीं है। इनके लिए विचारों के प्रति सजग हो जाओ-इतना ही मूल्यवान है, लेकिन ऐसों की संख्या कम है। कोई एक आइन्स्टीन होता है विचार में जीने वाला। ऐसे आदमी इच्छा भी करते हैं तो विचार के लिए। जबकि औसत व्यक्ति विचार भी करता है तो इच्छा के लिए।

सामान्य व्यक्ति की चाहत होगी मकान हो जाए तब विचार होगा कैसे हो? क्या धन्धा करूं कहाँ से धन बटोरूं? लेकिन आइन्स्टीन जैसे व्यक्ति उन्हें मकान की खबर ही नहीं। कहते हैं एक बार वे एक मित्र के यहाँ भोजन करने गए। भोजन समाप्ति के बाद गप-शप होने लगी। रात बढ़ती देखकर वे घड़ी देखकर सिर खुजलाने लगते। आखिर मित्र को कहना पड़ा क्या आज आप सोयेंगे नहीं? वे बोल पड़े यही तो मैं सोच रहा हूँ। मित्र बोले अरे यह घर तो मेरा है। उनने कहा “माफ करना मुझे यह याद नहीं रहा कि घर किसका है?” अब ऐसा व्यक्ति घर बनाने की इच्छा नहीं कर सकता। यदि कभी घर का ख्याल आएगा भी तो इसलिए कि प्रयोगशाला छोटी पड़ गई है विचारों का ठीक से समायोजन हो इसलिए। इनके लिए आवश्यक है विचारों के प्रति सचेत रहना।

एक अलग प्रकार है-भाव में जीने का। वे जो भावना में जीतें हैं न तो इच्छा में जीतें हैं न विचारों में। उनके लिए न किसी प्रयोगशाला का कोई अर्थ है, न किसी गणित की खोज करनी है, न कोई दर्शन शास्त्र की पहेली हल करनी है। न कोई बड़ा राज्य बनाना है, न कहीं बड़े मकान खड़े करने हैं।

भाव है पारदर्शी ठीक काँच की तरह। जबकि इच्छाएँ पत्थर की तरह अपारदर्शी हैं। इनके आर पार कुछ नहीं दिखाई देता। ऐसे व्यक्ति को अंतर्द्वंद्व से उबरने के लिए महात्मा बुद्ध ने एक प्रक्रिया सुझाई है-

भाव है पारदर्शी ठीक काँच की तरह। जबकि इच्छाएँ पत्थर की तरह अपारदर्शी हैं। इनके आर पार कुछ नहीं दिखाई देता। ऐसे व्यक्ति को अंतर्द्वंद्व से उबरने के लिए महात्मा बुद्ध ने एक प्रक्रिया सुझाई है-

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योग के प्रकार और उपयोग

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योग शब्द इतना व्यापक एंड महत्वपूर्ण है कि सभी सिद्धांतवादियों ने इसको अपनाया है पर अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार इसको समझा. भक्तियोग, राजयोग, हठयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, लययोग, शून्ययोग इत्यादि इसके व्यापकता के परिचायक है. भक्ति प्रधान लोगों ने भक्तियोग, ज्ञान निष्ठा वालों ने ज्ञानयोग, निष्काम कर्म निष्ठा वालों ने कर्मयोग अपनाया. इत्यादि .........

कुछ लोगों ने कुछ आसन और धोती आदि क्रियाओं को सिखाकर इसे हो योग का मूल उद्देश्य माना. कुछ पाखंडियों ने कुछ प्राणायाम सीख कर जल समाधि और भू समाधि का प्रदर्शन कर ख़ुद को पूज़वाया. यहाँ तक की कुछ लोगों ने यछिनी, पिछासिनी आदि तामसिक सिद्धियाँ लेकर अपने को योगी सिद्ध घोषित कर पूज़वाया

योग शब्द का अर्थ है मिलाने वाली क्रिया - जुड़ना. भगवान पतंजलि ने योगश्चित्तवृत्ति निरोध: कह कर योग शब्द को अभिव्यक्त किया. चित्त वृत्तियों को नितांत रुक जाना ही निरोध है. निरोध: समाधि: समाधिर्वयोग: अर्थात निरोध ही समाधि है और समाधि ही योग है. समाधि को परिभासित किया - समाधि साम्यावस्था जीवात्मा परमात्मन: अर्थात जीवात्मा और परमात्मा की अभिन्नता या जुड़ना ही समाधि है

अर्थात जब जीवात्मा अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाए उसे समाधि कहते है

समाधि की दो अवस्थाएँ सम्प्रज्ञात और असंप्रज्ञात समाधि दोनो को ही योग कहा गया है - दूसरे शब्दों में सम्प्रज्ञात को एकाग्रावस्था और असंप्रज्ञात को निरुद्धावस्था कहते है

सारे संसार के प्राणीयों के चित्त पाँच अवस्थाओं में विभक्त रहा करते है -

1. मूढ़ावस्था के प्राणी - ये तमोगुण प्रधान होते है रजोगुण सतोगुण गौण रहते है. ये काम क्रोध लोभ आलस्य से भरे होते है . इनका लोक परलोक ईश्वर भजन से कोई सम्बंध नहीं होता बस किसी तरह इनकी उदर पूर्ति होती

2. छिप्तावस्था के प्राणी - ये रजोगुण प्रधान प्राणी होते है तमोगुण सतोगुण गौण रहता है. सांसारिक व्यापार हाई इनका मुख्य लछ होता है. इनके मन में चंचलता दुःख शोक चिंताए लगी रहती है, इन लोगों का मन ईश्वर आराधना में नहीं लगता. इनका सिद्धांत होता है - यावत जीवेत सुखम जीवेत रणम लित्वा घृतम पिवेत अर्थात जब तक जियो सुख से जियो चाहे क़र्ज़ा लेना पड़े, एक दिन शरीर नष्ट हो जाएगा, किसने पुनर्जन्म देखा. इनको लोक परलोक सुधारने से कोई मतलब नहीं होता

3. विछिप्तावस्था के प्राणी - इनमे सतोगुण प्रधान होता है रजोगुण एवं तमोगुण गौण होते है. इनके मन में प्रसन्नता दया छमा परोपकार की भावना होती है. ईश्वर आराधना में इनकी पूर्ण अभिरुचि होती है. इनका माँ थोड़ा थोड़ा एकाग्र होने लगता है किंतु पूर्ण एकाग्र नहीं होता इसलिए ए योग श्रेणी में नहीं आते. ये लोग जप ताप स्वाध्याय में संलग्न होते है और ईश्वर कृपा का इंतज़ार करते है. योग की वर्णमाला एकाग्रता से शुरू होती है

4. एकाग्रावस्था के प्राणी - इनमे सतोगुण प्रधान होता है रजोगुण तमोगुण गौण है. इनका मन अपर वैराग्य को प्राप्त होता है. मनुष्य का मन बड़ा अद्भुत शक्तिशाली है, वस्तुतः इस सृष्टि के सारे बड़े कार्य मन की एकाग्रता से ही सम्भव होते है. जब तक हमारे मन में एकाग्रता नहीं आती तब तक सारे मंत्रो का उच्चारण केवल मात्र शब्द वर्ण है . शब्द की उत्पत्ति आकाश से हुई है और उसी में विलय हो जाता है. राम नाम का उच्चारण करके हम तब तक लाभ नहीं उठा सकते जब तक हमारा मन राम के रूप में एकाग्र ना हो जाए. इसलिए भगवान पतंजलि देव ने नाम का जप करना और अर्थ का ध्यान करना ए दोनो क्रियाएँ एक साथ चलने के लिए कहा है. तभी मनुष्य नाम जप के परिणाम को पा सकता है. इस अवस्था में सम्प्रज्ञात योग का आरम्भ होता है.

5. निरुद्धावस्था के प्राणी - इस अवस्था में बाहर से गुण का परिणाम बंद होकर चित्त सत्व में निरोध परिणाम संस्कार मात्र शेष रहता है. वे दृष्टा स्वरूप में स्थित हो जाते है

ऊपर बताई अवस्थाओं में केवल एकाग्रावस्था एवं निरोधावस्था के प्राणी योग श्रेणी में आते है.

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एक माला के मनके हम सब

साधारण अर्थों में एकता को अपनेपन का पर्याय माना जा सकता है। शरीर एक है इस एकता में हाथ, पैर, आँख, नाक, कान आदि विभिन्न अंग अवयव सम्मिलित हैं। पाचन संस्थान, रक्तवाही संस्थान, श्वसन संस्थान जैसे अनेक तंत्र हैं। शारीरिक चेतना इनमें से हर एक में एक सही समायी है। वह सभी को जीवन दे रही है। इनमें से प्रत्येक का दुःख-कष्ट उसकी अपने तकलीफ है। किसी के प्रति तनिक भी उपेक्षा का भाव नहीं है।

इतने पर भी हर अंग अपने आप में पूर्ण है। पैर, हाथ आदि बाहरी अंग हों अथवा श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र जैसे भीतरी संस्थान, सभी अपने आप में सक्षम हैं। पैर के लिए हाथ की जरूरत नहीं । वह अपना काम हाथ की सहायता के बगैर कर लेगा। दृष्टि संकीर्ण हो तो किसी एक को देखने-सुनने, उसके बारे में पढ़ने-लिखने से उसे दूसरे से भिन्न समझा जा सकता है। किसी अंग विशेष में रहने वाले परजीवी ऐसा समझते हों तो कोई आश्चर्य नहीं। परन्तु इस दृष्टि की संकीर्णता से असलियत बदलने से तो रही, वास्तविकता यही है कि शरीर एक है, सभी अंक अवयवों की भलाई एक दूसरे के साथ अपनापन बनाए रखने में है। जहाँ कहीं जिस किसी अंग में परायापन अथवा अलगाव आया वहीं सड़न शुरू हो जाती है। सही कहा जाय तो अपनापन या एकता स्वभाव है-प्रकृति है। परायापन अथवा अलगाव विकृति है।

यह सत्य न केवल शरीर पर, वरन् समूचे संसार पर लागू होता है। इसके सभी सदस्य परिवार के हितों में अपना भला मानते हैं। परिवार न तो कोई वस्तु है न व्यक्ति। यह कुछ लोगों के बीच पनपे अपनेपन का दूसरा रूप है। धीरे-धीरे पता चलता है कि सिर्फ परिवार अपने आप में सक्षम नहीं है, तो यह दायरा गाँव शहर से बढ़ते हुए देश तक जा पहुँचता है। इस स्तर पर आकर पता चलता है कि एक देश दूसरे से बिल्कुल कट कर अपना अस्तित्व बनाये रखने में मुश्किल महसूस करता है, तो विश्व एकता की बात चलने लगती है। ‘वसुधा ही कुटुम्ब है, इस बात को सत्य स्वीकारा जाने लगता है।

बात न केवल मनुष्य जाति की है वरन् यही तथ्य प्रकृति के अन्य घटकों के सम्बन्ध में भी है। प्रत्यक्ष में तो बड़ा विचित्र लगता है कि चलने फिरने बोलने वाला मनुष्य पेड़-पौधों अथवा किन्हीं जड़ वस्तुओं से अपनापन स्थापित करे। एकता अथवा अपनापन अपने जैसी ही किन्हीं चीजों में होना चाहिए। जब बाहर से सभी चीजें अपने जैसी न नजर होती हों तो फिर अपनापन क्यों?

आधुनिक समय में एकता के इस तथ्य की ढूंढ़-खोज की गई है। खोजने के दो मार्ग रहे हैं एक मनोवैज्ञानिक दूसरा भौतिक-शास्त्रीय। दोनों के नतीजे आश्चर्यजनक रूप से एकता को वैज्ञानिक कसौटी पर खरा साबित करने वाले सिद्ध हुए हैं।

मनोविज्ञान ने एकता को “कलेक्टिव अनकाँशस” अर्थात् सामूहिक अचेतन के आधार पर साबित किया है। यद्यपि दर्शन के क्षेत्र में यह बात लाइबिनित्ज, काण्ट आदि ने भी कही थी, पर बाद में मूर्धन्य मनीषी सी जी कारस ने अपने प्रयोगों की कसौटी पर इसे खरा साबित किया। इसके अनुसार हमारा मन उतना ही नहीं है। जितना हमें समझ में आता है। मन की गहराइयों में हम एक दूसरे से जुड़े हैं। सपनों में कभी-कभी दूसरे के जीवन की घटनाएं देखना इस का प्रमाण है। इसी के आधार पर दुनिया के अलग-अलग भागों में रहने वाले लोग एक सी बातें सोच लेते हैं। एक दूसरे के मन में प्रवेश सम्भव, हो जाता है। एडवर्ड वान हर्टमान आदि

मनोवेत्ताओं ने इस एकता के क्षेत्र को असीम माना है। n श्रोडिंकर बेल आदि प्रख्यात भौतिक शास्त्रियों ने इसी एकता की खोज दूसरे ढंग से की है। उनके अनुसार संसार की हर चीज चाहे वह सजीव हो या निर्जीव बाहरी तौर पर अणु-परमाणुओं से बनी है। मनुष्य का शरीर इसका अपवाद नहीं है। इनके स्वरूप में दिखाई पड़ने वाला अन्तर सिर्फ आणविक संरचना भर का है। वैज्ञानिक ने परमाणु के लगभग बीस हिस्से किए हैं। इस क्रम में आगे एक ऐसी दशा आती है, जिसमें उन्होंने स्वीकारा कि सही माने में कणों का अस्तित्व न होकर वैद्युत चुम्बकीय तरंगें ही इनकी मूलसत्ता है। एक कदम और आगे बढ़ने पर पता चलता है कि ये तरंगें न होकर सिर्फ ऊर्जा के प्रचंड प्रवाह हैं, जो यहाँ-वहाँ सभी जगह एक से हैं। बिना किसी भेद-भाव के सभी में समाए हुए हैं।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रिटजोफ काप्रा ने अपनी पुस्तक “ताओ ऑफ फिजिक्स” में इस एक से ऊर्जा-प्रवाह की बात की संगति गीतकार के कथन “मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मिणगणाइव” से बिठायी है। वैज्ञानिक अनुसंधानों की बहुत गहराई में न जाया जाय तो भी एक बात तो साबित हो ही जाती है कि बाहर और भीतर सभी कुछ एक-सा है। हम सभी एक बड़ी माला के मनके भर हैं, ऐसे मनके जिनके सभी जगह फैली एक चेतना ऊर्जा ने पिरो रखा है।

मनके की शोभा माला के कारण है। इसी में उसकी गरिमा है। सम्भव है यह बात ठीक-ठीक न संकुचित संकीर्ण होना है। यह संकीर्णता कुछ अपने को पूरी तरह से स्वतन्त्र मान ले और उससे टूटने का प्रयास करे। पर यह प्रयास पेड़ से मिलने वाले जीवन प्रवाह को अवरुद्ध कर देता है। इसे एक मानने के कारण जीवन को जो हरा-भरापन फूल-फलों की जो सम्पदा मिली हुई थी, टूटने के प्रयास में इस सभी से वंचित होना पड़ता है।

हमारे अपने जीवन के व्यवहारिक धरातल में बिल्कुल यही सत्य लागू होता है। जरूरत इसे अनुभव करने और व्यवहार में लाने की है। जैसे-जैसे अपनेपन का दायरा बढ़ता जायेगा सुख और शान्ति बढ़ती जाएगी। इसको बढ़ाने के लिए जरूरी है कि इस दायरे को समेटा न जाय। पारिवारिक एकता हमें सुविधा प्रदान करती है, तो सामाजिक एकता सुरक्षा और शान्ति।

बढ़ता हुआ अपनापन,डर-भय, अशान्ति सभी का नामों-निशान मिटा देता है, क्योंकि इसका एक मात्र कारण है अलगाव और परायापन। सामान्यतया घर में हमारी अनुभूति अपनेपन की रहती है। यही कारण है कि इसके सदस्य के बीच स्वयं को कहीं अधिक सुरक्षित और शाँत महसूस किया जाता है। जैसे ही इस अनुभूति में कमी आती है, अलगाव की दरार पनपती है, तो भाई को भाई से डर लगने लगता है, बाप-बेटे से भय खाता है, अड़ोसी-पड़ोसी एवं गाँव शहर अपने लगते हैं।

इससे हमें सुविधा, सहायता सहानुभूति सभी कुछ मिलती है। एकता अथवा अपनेपन के बारे में मनोवैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण तथ्य और जोड़ा है। उनके अनुसार इसकी लगातार बढ़ती अनुभूति भाव सम्वेदनाओं को, विशाल,चिन्तन चेतना को व्यापक और प्रखर बनाती है। इसके प्रमाण देश-विदेश के विभिन्न महापुरुषों के जीवन में देखे जा सकते हैं। महान दार्शनिक जान डेविड थोरो को विभिन्न जंगली जानवरों के बीच अपनापन दिखाई देता था। इसी कारण उन्हें सर्वत्र निर्भयता थी। स्वामी रामतीर्थ समूचे भारत को अपना शरीर और संसार को अपना घर कहा करते थे। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि जब मैं “मैं” का उच्चारण करता हूँ तो इसमें मुझे समूचे विश्व का बोध होता है। विभिन्न महापुरुषों के ये भाव और कुछ नहीं सिर्फ बढ़ी हुई एकता अथवा अपनेपन की व्यापकता थी। हमारे अपने जीवन में एकत्व की भावना विकसित हो सके, इसके लिए शुरुआत घर, परिवार से करनी होगी। परिवार के हित में अपना हित और उसके अनहित में अपना अनहित समझा जाय। आज कल टूटते परिवार की समस्या के मूल में इसी का अभाव है। किन्तु ध्यान रखा जाय कि यह सिर्फ पहला कदम है जिसकी पूर्णता दूसरे के बिना किसी कीमत पर नहीं। दूसरा कदम होगा कि समाज के हितों में परिवार का हित समझा जाय। एक के बिना दूसरा अधूरा है।

इसका व्यावहारिक नीति-निर्धारण अपनी स्वयं की स्थिति तथा स्थान परिवेश को ध्यान में रख कर किया जा सकता है। इस ओर बढ़ाए गए कदम, क्रियाकलापों एवं व्यावहारिक गतिविधियों के रूप में एक ही होगा-एकता अपनत्व को क्रमशः बढ़ाते चलना, उसकी व्यापकता की ओर गतिशील होना। इस ओर बढ़ते प्रगतिक्रम के अनुरूप धीरे-धीरे समाज के प्रति वही भाव आने लगेगा जो अभी अपने दुःख सुख लगने लगेंगे। वस्तुतः यही जीवन की प्रकृति है। अलगाव के अलावा और कुछ नहीं। इसे हर कीमत पर दूर किया जाना चाहिए। इसी में अपनी गरिमा है और गतिशील भी।