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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 61,62वीं, (साक्षित्व की तेरह विधियां ) विधियां क्या है?


विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 61;-

16 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-

''जैसे जल से लहरें उठती है और अग्‍नि से लपटें, वैसे ही सर्वव्‍यापक हम से लहराता है।‘’

2-पहले तो हमे यह समझना है कि ''लहर क्‍या है,'' और तब हम समझ सकते है कि कैसे यह चेतना की लहर हमे ध्‍यान में ले जाने में सहयोगी हो सकती है।उदाहरण के लिए तुम सागर में उठती लहरों को देखते हो। वे प्रकट होती है; एक अर्थ में वे है, और फिर भी किसी गहरे अर्थ में वे नहीं है। लहर के संबंध में समझने की यह पहली बात है। यह केवल गहरे अर्थ में

प्रकट होता है;कि एक लहर है। लेकिन किसी गहरे अर्थ में लहर नहीं है .. सिर्फ सागर है। सागर के बिना लहर नहीं हो सकती। और जब लहर है भी तो भी यह सागर ही है। लहर रूप भर है ..सत्‍य नहीं है। सागर सत्‍य है लेकिन लहर केवल रूप

है।भाषा के कारण अनेक समस्‍याएं उठ खड़ी होती है क्‍योंकि हम लहर कहते है।बेहतर हो कि हम लहर न कहकर

लहराना कहें। लहराना कोई वस्‍तु ,पदार्थ या तत्‍व सत्‍य नहीं है...एक क्रिया है,एक गति है, प्रक्रिया है।

3-पदार्थ या तत्‍व तो सागर है; लहर एक रूप भर है।सागर शांत हो सकता है लेकिन तब लहरें विलीन हो जाएंगी ..परन्तु

सागर तो रहेगा। सागर शांत हो सकता है ,बहुत सक्रिय और क्षुब्‍ध हो सकता है; या सागर निष्‍क्रिय हो सकता है। लेकिन तुम्‍हें कोई शांत लहर देखने को नहीं मिलेगी। लहर सक्रियता है, सत्‍य नहीं। जब सक्रियता है तो लहर है; यह लहराना

है, गति है ..एक साधारण सी हलचल।लेकिन जब शांति आती है ,निष्‍क्रियता आती है तो लहर नहीं रहती। लेकिन सागर रहता है। दोनों अवस्‍थाओं में सागर सत्‍य है। लहर उसका एक खेल है ;लहर उठती है और खो जाती है। लेकिन सागर रहता है।दूसरी बात लहरें अलग-अलग दिखती है।प्रत्‍येक लहर का अपना व्‍यक्‍तित्‍व है ..अनूठा औरों से भिन्‍न।

कोई दो लहरें समान नहीं होती।कोई लहर बड़ी होती है तो कोई छोटी ..उनके अपने-अपने विशिष्‍ट लक्षण होते है। प्रत्‍येक लहर का निजी ढंग होता है।

4-एक लहर उठ रही होती है,दूसरी मिट रही होती है। जब एक उठती है तो दूसरी गिरती है। दोनों एक नहीं हो सकती। क्‍योंकि एक जन्‍म ले रही होती है और दूसरी मिट रही होती है। फिर भी दोनों लहरों के पीछे जो सत्‍य है वह एक ही है।लेकिन

संभव है कि उठती हुई लहर मिटने वाली लहर से ऊर्जा ग्रहण कर रही हो। मिटने वाली लहर अपनी मृत्‍यु के द्वारा उसे उठने में मदद कर रही हो। बिखरने वाली लहर उस लहर के लिए कारण बन सकती है जो उठ रही है। बहुत गहरे में वे एक ही सागर से जुड़ी है। वे भिन्‍न या पृथक नहीं है। उनका व्‍यक्‍तित्‍व झूठ है, भ्रामक है। वे जुड़ी है ,उनका द्वैत भासता है ;लेकिन है

नहीं। उनका अद्वैत सत्‍य है।सूत्र है: ‘’जैसे जल से लहरें उठती है, और अग्‍नि से लपटें, वैसे ही सर्वव्‍यापक हम से लहराता है।‘’

हम Global सागर में लहर मात्र है। इस पर ध्‍यान करो; इस भाव को अपने भीतर खूब गहरे उतरने दो। अपनी श्‍वास को उठती हुई लहर की तरह महसूस करना शुरू करो। तुम श्‍वास लेते हो; तुम श्‍वास छोड़ते हो। जो श्‍वास अभी तुम्‍हारे अंदर जा रही है वह एक क्षण पहले किसी दूसरे की श्‍वास थी।और जो श्‍वास अभी तुम्‍हारे से बाहर जा रही है। वही श्‍वास अगले क्षण किसी दूसरी की श्‍वास हो जायेगी।

5-श्‍वास लेना जीवन के सागर में लहरों के उठनें-गिरने जैसा ही है। तुम पृथक नहीं हो, बस लहर हो। गहराई में तुम एक हो। हम सब इकट्ठे है, संयुक्‍त है। वैयक्‍तिकता झूठी है, भ्रामक है। इसलिए अहंकार एकमात्र बाधा है।वैयक्‍तिकता झूठी है ,वह

भासती है; लेकिन सत्‍य नहीं है।सत्‍य तो अखंड है, सागर है,अद्वैत है।यही कारण है कि प्रत्‍येक धर्म अहंकार के विरोध में है।निराकार और साकार एक ही सिक्के के दो पह्लू है।हम भले ही साकार ईश्‍वर को न माने ;परन्तु निराकार सत्ता को तो मानना ही पड़ेगा।जो व्‍यक्‍ति कहता है कि ईश्‍वर नहीं है वह अधार्मिक न भी हो, लेकिन जो कहता है कि मैं हूं वह अवश्‍य अधार्मिक

है।उदाहरण के लिए गौतम बुद्ध नास्‍तिक थे; वे किसी साकार ईश्‍वर में विश्‍वास नहीं करते थे।महावीर, वर्धमान नास्‍तिक थे। उन्‍हें भी किसी साकार ईश्‍वर में विश्‍वास नहीं था। लेकिन वे पहुंच गए, उन्‍होंने पाया; वे समग्रता को, पूर्ण को उपलब्‍ध हुए। अगर तुम्‍हें किसी साकार परमात्‍मा में विश्‍वास नहीं है तो तुम अधार्मिक नहीं हो;यह अवश्य है कि तुम्हारा मार्ग कठिन होगा।

6-वास्तव में धर्म के लिए साकार ईश्‍वर बुनियादी नहीं है। धर्म के लिए निरहंकार बुनियादी है।और अगर तुम साकार ईश्‍वर में विश्‍वास भी करते हो, लेकिन अहंकार भरे मन से विश्‍वास करते हो तो तुम अधार्मिक हो।अहंकार रहित

मन के लिए ईश्‍वर में विश्‍वास की भी जरूरत नहीं है। निरहंकारी व्‍यक्‍ति अपने आप ही, सहज ही.. परमात्‍मा में लीन हो जाता है। निरहंकारी होकर तुम लहर से नहीं चिपके रह सकते हो; तुम्‍हें सागर में गिरना ही होगा। अहंकार लहर से चिपका रहता है। जीवन को सागर की भांति देखो और अपने को लहर मात्र समझो; और इस भाव को अपने भीतर उतरने दो। इस विधि को तुम

कई ढंग से उपयोग में ला सकते हो। श्‍वास लेते हो तो भाव करो कि सागर ही तुम्‍हारे भीतर श्‍वास ले रहा है; सागर ही तुम्‍हारे भीतर आता है और बाहर जाता है।

7-प्रत्‍येक श्‍वास के साथ महसूस करो। जब लहर मिट रही है, उन दोनों के बीच तुम कौन हो।बस एक शून्‍य.. एक खाली पन।

उस शून्यता के भाव के साथ तुम रूपांतरित हो जाओगे। उस खालीपन के भाव के साथ तुम्‍हारे सब दुःख विलीन हो जायेगे। क्‍योंकि दुःख को होने के लिए किसी केंद्र की जरूरत होती है ..वह भी झूठे केंद्र की। शून्‍य ही तुम्‍हारा असली केंद्र है। उस शून्‍य में दुःख नहीं है। उस शून्‍य में तुम गहन विश्राम में होते हो। जब तुम ही नहीं हो तो तनावग्रस्‍त कौन होगा। तुम तब आनंद से भर जाते हो। ऐसा नहीं है कि तुम आनंदपूर्ण होते हो; सिर्फ आनंद होता है। तुम्‍हारे बिना क्‍या तुम दुःख निर्मित कर सकते

हो।यही कारण है कि गौतम बुद्ध कभी नहीं कहते है कि उस अवस्‍था में, परम अवस्‍था में आनंद होगा। वे ऐसा नहीं कहते; वे यही कहते है कि दुःख नहीं होगा ..बस।

8-आनंद की बात करने से तुम भटक सकते हो, इसलिए बुद्ध आनंद की बात नहीं करते। वे कहते है कि आनंद की बात ही मत करो। सिर्फ जानो कि दुःख से कैसे मुक्‍त हुआ जाए; उसका मतलब है कि अपने बिना ,खुद के बिना कैसे हुआ जाए।

हमारी समस्‍या यह है कि लहर अपने को सागर से पृथक मानती है। तब समस्‍याएं उठ खड़ी होती है। अगर लहर अपने को सागर से पृथक मानती है तो उसे तुरंत मृत्‍यु का भय पकड़ता है। लहर तो मिटेगी। लहर अपने चारों और अन्‍य लहरों को मिटते हुए देख सकती है। लहर जानती है कि उसके उठने में ही कहीं मृत्‍यु छिपी है। क्‍योंकि दूसरी लहरें भी तो क्षण भर पहले उठ रही थी और अब वे गिर रही है ,बिखर रही है ,मिट रही है। तुम्‍हें भी मिटना होगा।अगर लहर अपने को सागर से पृथक मानती है तो देर-अबेर मृत्‍यु का भय उसे अवश्‍य घेरेगा। लेकिन अगर लहर जान ले कि मैं नहीं हूं, सागर है। तो मृत्‍यु का कोई भय नहीं है।

9- लहर ही मरती है; सागर नहीं मरता। मैं मर सकता हूं; लेकिन जीवन नहीं मरता। तुम मर सकते हो, तुम मरोगे ;लेकिन जीवन नहीं मरेगा ,अस्‍तित्‍व नहीं मरेगा। अस्‍तित्‍व तो लहराता ही जाता है। वह तुममें लहराया है; वह दूसरों में लहराएगा। और जब तुम्‍हारी लहर बिखर रही होगी; तो संभव है कि तुम्‍हारे बिखराव में से ही दूसरी लहरें उठे। सागर जारी रहता है।जब

तुम अपने को लहर के रूप में पृथक देख लेते हो तो सागर के साथ, अरूप के साथ एक जान लेते हो। एकात्‍म अनुभव करते हो। प्रत्‍येक संताप में, प्रत्‍येक चिंता में मृत्‍यु का भय मूलभूत है। तुम भयभीत हो, कांप रहे हो। चाहे तुम्‍हें इसका बोध न हो, लेकिन अगर तुम अपने अंतस में प्रवेश करोगे तो पाओगे कि प्रत्‍येक क्षण तुम कांप रहे हो, क्‍योंकि तुम मरने वाले हो। तुम अनेक सुरक्षा के उपाय कर सकते हो, तुम अपने चारों और क़िलाबंदी कर सकते हो; लेकिन कुछ भी काम न देगा। धूल-धूल में जा मिलती है। तुम धूल में मिलने ही वाले हो।

10-क्‍या तुमने कभी इस तथ्‍य पर ध्‍यान किया है कि अभी तुम रास्‍ते पर चल रहे हो तो जो धूल तुम्‍हारे जूते पर जमा हो रही है, हो सकता है वह धूल किसी न किसी नेपोलियन, किसी न किसी सिकंदर के शरीर की धूल हो।यही तुम्‍हारी भी हाल होने वाला है। इस क्षण तुम हो और अगले क्षण तुम नहीं होगे।देर-अबेर धूल-धूल में मिल जाएगी। लहर विदा हो जायेगी।

भय पकड़ता है।जरा कल्‍पना करो कि तुम किसी के जूते से चिपकी हुई धूल हो या कोई तुम्‍हारे शरीर से, चाक पर बर्तन गढ़ रहा हो। या कल्‍पना करो कि तुम किसी कीड़े के शरीर में या वृक्ष के शरीर में प्रवेश कर रहे हो। लेकिन यही हो रहा है। प्रत्‍येक चीज रूप है और रूप को मिटना है। केवल अरूप शाश्‍वत है। अगर तुम रूप से बंधे हो, अगर रूप ही तुम्‍हारा तादात्‍म्‍य है। अगर तुम अपने को लहर मानते हो, तो तुम अपने ही हाथों उपद्रव में पड़ने वाले हो।

11-तुम सागर हो, लहर नहीं। यह ध्‍यान सहयोगी हो सकता है। यह तुम्‍हारा रूपांतरण बन सकता है। लेकिन इसे अपने पूरे जीवन पर फैलने दो। श्‍वास लेते हुए सोचो, भोजन करते हुए सोचो, चलते हुए सोचो। दो चीजें सोचो कि रूप सदा लहर है।और

अरूप सागर है कि रूप मृण्‍मय है और अरूप अमृत है।और ऐसा नहीं है कि तुम किसी दिन मरोगे; तुम प्रतिदिन मर रहे हो। बचपन मरता है और यौवन जन्‍म लेता है। फिर यौवन मरता है और बुढ़ापा जन्‍म लेता है।और फिर बुढ़ापा मरता है और रूप विदा हो जाता है। प्रत्‍येक क्षण तुम मर रहे हो; प्रत्‍येक क्षण तुम जन्‍म रहे हो। तुम्‍हारे जनम का पहला दिन तुम्‍हारे जीवन का पहला दिन नहीं है। वह तो आने वाले अनेक-अनेक जन्‍मों में से एक है। वैसे ही तुम्‍हारे इस जीवन की मृत्‍यु ...पहली मृत्‍यु नहीं है। वह तो सिर्फ इस जीवन की मृत्‍यु है। वैसे ही तुम पहले भी मरते रहे हो। प्रतिक्षण कुछ मर रहा है और कुछ जन्‍म ले रहा है। तुम्‍हारा एक अंश मरता है, दूसरा अंश जन्‍मता है।

12-शरीर शास्‍त्री कहते है कि सात वर्षों में तुम्‍हारे शरीर का कुछ भी पुराना नहीं बचता है। एक-एक चीज, एक-एक कोष्‍ठ/ Cell बदल जाता है। अगर तुम सत्‍तर वर्ष जीने वाले हो तो इस बीच तुम्‍हारा शरीर पूरे का पूरा दस बार बदलेगा। हर सात वर्षों में तुम्‍हें नया शरीर मिलता है। लेकिन यह परिवर्तन अचानक नहीं होता। प्रत्‍येक क्षण कुछ न कुछ बदल रहा होता है।

तुम एक लहर हो और वह भी बहुत ठोस नहीं। प्रत्‍येक क्षण बदल रही होऔर लहर स्थिर , गतिहीन नहीं हो

सकती। लहर को सतत बदलते रहना है, सतत गतिमान रहना है।स्थिर लहर जैसी कोई चीज नहीं होती। स्थिर लहर का कोई अर्थ नहीं है क्योकि वह गति है, प्रक्रिया है। तुम गति हो, प्रक्रिया हो। अगर तुम इस गति से तादात्‍म्‍य कर बैठे हो और अपने को जन्‍म और मृत्‍यु के बीच सीमित मानने लगते हो।तो तुम पीड़ा में, दुःख में पड़ोगे। तब तुम आभास को सत्‍य मान रहे हो। इसको ही आदि शंकराचार्य माया कहते थे।

13-सागर ब्रह्म है; सागर सत्‍य है। अपने को लहर मानो और उसके साक्षी होओ। तुम कुछ कर नहीं सकते हो। ये लहरें विलीन होंगी। जो प्रकट हुआ है, वह विलीन होगा, उसके संबंध में कुछ नहीं किया जा सकता है। सब प्रयत्‍न बिलकुल व्‍यर्थ है। सिर्फ एक चीज की जा सकती है। वह है इस लहर रूप का साक्षी होना। और एक बार तुम साक्षी हो गए तो तुम्‍हें अचानक उसका बोध हो जाएगा जो लहर के पार है। जो लहर के पीछे है, जो लहर में भी है और लहर के बाहर भी है। जिससे लहर बनती है और जो फिर भी लहर के पार है; जो सागर है।''जैसे-जल से लहरें उठती है। अग्‍नि से लपटें, वैसे ही सर्वव्‍यापक हम से लहराता है।‘’सर्वव्‍यापक हमसे लहराता है। तुम नहीं हो; सर्वव्‍यापक है।वह तुम्‍हारे द्वारा लहरा रहा है। इसे महसूस करो,

इसका मनन करो, इस पर ध्‍यान करो। और बहुत-बहुत ढंगों से इसे अपने पर घटित होने दो।

14-सागर तुममें लहरा रहा है, जीवन तुममें धड़क रहा है।जो भी तुम्‍हें घटित हो रहा है। ऐसा भाव करो कि वह ब्रह्मांड

में घटित हो रहा है कि मैं उसका अंश हूं, कि मैं सतह पर एक लहर मात्र हूं, सब कुछ अस्‍तित्‍व पर छोड़ दो।

एक झेन सदगुरू को जब भूख लगती है, तो वह कहता था ...कि ऐसा लगता है कि अस्‍तित्‍व को मेरे द्वारा भूख लगी है। जब उसे प्‍यास लगती है तो वह कहता था कि मेरे भीतर अस्‍तित्‍व प्‍यासा है।यह ध्‍यान तुम्‍हें उसी स्थिति में पहुंचा

देगा।तब तुम्‍हारा अहंकार बिखर जाता है, मिट जाता है और सब कुछ ब्रह्मांड का हिस्‍सा हो जाता है। तब जो भी होता है, अस्‍तित्‍व को होता है। तुम अब यहां नहीं हो और तब कोई पाप नहीं है; तब कोई जिम्मेदारी नहीं है।अब तो केवल तुम हो;

इसलिए किसके प्रति जिम्‍मेदार होगे?

15-अब अगर तुम किसी को मरते देखोगें तो तुम्‍हें लगेगा कि उसके साथ, उसके भीतर मैं ही मर रहा हूं। तब तुम्‍हें लगेगा कि पूरा जगत मर रहा है और मैं उस जगत का अंश हूं।और अगर किसी फूल को खिलते देखोगें तो तुम उसके साथ-साथ खिलोगे। अब सारा ब्रह्मांड तुममय है। और ऐसी घनिष्‍ठता में, ऐसा लयबद्धता में होना ही समाधि में होना है। ध्‍यान मार्ग है और

यह एकता का भाव, सब के साथ जुड़े होने का भाव मंजिल है।इसे प्रयोग करो। सागर को स्‍मरण रखो और लहर को भूल जाओ । ध्‍यान रहे, जब भी तुम लहर को स्‍मरण करोगे और लहर की भांति व्‍यवहार करोगे तो तुम भूल करोगे और उसके कारण दुःख में पड़ोगे। वहां आकाश में कोई नहीं बैठा है या ऐसा कोई ईश्‍वर नहीं है ,जो तुम्‍हें दंड दे रहा है।जब भी तुम किसी भ्रांति के शिकार होते हो, तो तुम अपने को दंड देते हो। जगत में एक नियम है ,धर्म है। अगर तुम इसके साथ लयबद्ध चलते हो तो तुम आनंद में हो। यदि तुम उसके विपरीत चलोगे, तो तुम अपने को दुःख में पाओगे।वहां आकाश में तुम्‍हारे पापों का कोई बही-खाता नहीं है और न ही उसकी कोई जरूरत है।

16-यह ठीक गुरूत्‍वाकर्षण जैसा है।अगर तुम सही ढंग से चलते हो तो गुरूत्‍वाकर्षण सहयोगी होता है, गुरूत्‍वाकर्षण के बिना तुम चल नहीं सकते। लेकिन अगर तुम गलत ढंग से चलोगे तो गिरोगे; अपनी हड्डी भी तोड़ सकते हो। लेकिन कोई तुम्‍हें दंड नहीं दे रहा है। सिर्फ नियम है गुरुत्वाकर्षण का... निरपेक्ष नियम है। अगर तुम गलत चलोगे और गिरोगे तो तुम्‍हारी हड्डी टूट जायेगी और ठीक से चलोगे तो उसका मतलब है कि तुम गुरूत्‍वाकर्षण का सही उपयोग कर रहे हो। ऊर्जा का सही और

गलत दोनों तरह से उपयोग हो सकता है।जब तुम अपने को लहर मानते हो तो तुम जागतिक नियम के विरोध में हो, तुम सत्‍य के विरोध में हो।तब तुम अपने लिए दुःख निर्मित करोगे। कर्म के सिद्धांत का यही मतलब है। कोई कानून बनाने वाला नहीं है। परमात्‍मा कोई जज नहीं है। जज होना कुरूप बात है। और अगर ईश्‍वर कोई जज होता तो बिलकुल ऊब जाता।जगत में अपने नियम है। और बुनियादी नियम यह है कि सच्‍चा होना.. आनंद में होना है।तथा झूठा होना ..दुःख में होना है औरअष्टावक्र गीता भी यही कहती है।

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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 62 ;-

14 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-

''मन एक द्वार है—यही मन जहां कही भी भटकता है, जो कुछ भी सोचता है। मनन करता है। सपने देखता है। यही मन और यही क्षण द्वार है।''

2-यही एक अति क्रांतिकारी विधि है, क्‍योंकि हम कभी नहीं सोचते कि साधारण मन द्वार है। हम सोचते है कि कोई महान मन, कोई बुद्ध या जीसस का मन प्रवेश कर सकता है। हम सोचते है कि बुद्ध या जीसस के पास कोई असाधारण मन है जबकि यह सूत्र कहता है कि तुम्‍हारा साधारण मन ही द्वार है। यही मन जो सपने देखता है,कल्‍पनाएं करता है, ऊलजलूल सोच-विचार करता है। यही मन द्वार है जो कुरूप कामनाओं और वासनाओं से क्रोध और लोभ से खचाखच भरा है। जिसमें यह सब जो है निंदित है; जो तुम्‍हारे बस के बाहर है।जो तुम्‍हें यहां -वहां भटकाता रहता है ..यही मन द्वार है।

‘’जहां कहीं तुम्‍हारा मन भटकता है…..।‘’इस जहां कहीं को स्‍मरण रखो। भटकने का विषय महत्‍वपूर्ण नहीं है।जहां कहीं

तुम्‍हारा मन भटकता है। भीतर या बाहर, उसी स्‍थान पर..आदि।

3- यह बात समझने जैसी है कि एक साधारण मन उतना साधारण नहीं है जितना हम समझते है। साधारण मन जागतिक मन से असंबद्ध नहीं है। वह उसका ही अंश है। उसकी जड़ें अस्‍तित्‍व के केंद्र तक चली गई है। अन्‍यथा तुम अस्‍तित्‍व में नहीं हो सकते हो। एक पापी भी परमात्‍मा में आधारित है; अन्‍यथा यह अस्‍तित्‍व में नहीं हो सकता था। वह जो शैतान है वह भी परमात्‍मा के सहारे के बिना नहीं हो सकता है।अस्‍तित्‍व ही इसलिए संभव है क्‍योंकि वह परमात्‍मा में प्रतिष्‍ठित है।तुम्‍हारा मन स्‍वप्‍न

देखता है। कल्‍पना करता है, भटकता है; वह तनावग्रस्‍त है, दुःखी है। संताप में है। वह जैसे भी गति करता है, जहां भी जाता है, वह समग्र से जुड़ा रहता है..अन्‍यथा संभव नहीं है। तुम अस्‍तित्‍व से भाग नहीं सकते ..वह असंभव है। इसी क्षण तुम्‍हारे जड़ें

अस्‍तित्‍व में गड़ी है। लेकिन हमारी जड़ें अस्‍तित्‍व में गड़ी है तो इससे अहंकारी मन को लगेगा कि कुछ भटकना ही नहीं है। क्योकि हम तो परमात्‍मा में ही है ;फिर इतनी आपा धापी की क्‍या जरूरत है।

4-वास्तव में तुम्‍हारी जड़ें तो परमात्‍मा में है। लेकिन तुम इस तथ्‍य के प्रति मूर्छित हो। जब मन भटकता है तो दो चीजें होती है: मन और भटकाव;मन के विषय और मन; आकाश में तैरते बादल और आकाश। वहां दो चीजें है: बादल और आकाश। कभी ऐसा भी हो सकता है बादल इतने हो जाते है कि आकाश छिप जाता है। तुम उसे देख नहीं सकते हो।लेकिन जब

तुम नहीं देख पाते हो तब भी आकाश विलीन नहीं होता है। वह विलीन नहीं हो सकता है। वह है; आच्‍छादित या प्रकट, दृश्य या अदृश्‍य है। अगर तुम बादलों पर ही ध्‍यान देते हो तो आकाश भूल जाता है।और अगर तुम आकाश पर ध्‍यान देते हो तो बादल गौण हो जाते है।वे आते और जाते है, तुम्‍हें बादलों की बहुत चिंता लेने की जरूरत नहीं लेनी चाहिए।हमे पता होना चाहिए कि इन बादलों ने आकाश को तनिक भी नष्‍ट नहीं किया है। न गंदा किया है और न ही उसका स्‍पर्श किया है।

5-जब तुम्‍हारा मन भटकता है तो दो चीजें होती है। एक तो बादल है, विचार है, विषय है, बिंब/ Image है। और दूसरी चेतना है, खुद मन है। जब तुम बादलों पर, विचारों पर, बिंबों पर बहुत ध्‍यान देते हो तो तुम आकाश को भूल जाते हो। तब तुम मेजबान को भूल गए और मेहमान में ही बुरी तरह से उलझ गये। वे विचार, वे बिंब, जो भटक रहे है केवल मेहमान है। अगर

तुम मेहमानों पर सब ध्‍यान लगा देते हो तो तुम अपनी आत्‍मा ही भूल बैठे।अपने ध्‍यान को मेहमानों से हटाकर मेजबान पर लगाओ; बादलों से हटाकर आकाश पर केंद्रित करो। और इसे व्‍यावहारिक ढंग से करो।कामनाये या वासनाये जो उठती है ;वह बादल है। यदि बड़ा घर पाने को लोभ पैदा होता है तो यह भी बादल है। तुम इससे इतने ग्रस्‍त हो जा सकते हो कि तुम भूल ही जाओ कि यह किस में उठ रहा है। यह किसी को घटित हो रहा है। कौन इसके पीछे है।

6-किस आकाश में यह बादल उठ रहे है। उस आकाश को स्‍मरण करो; और अचानक बादल विदा हो जाएगा। सिर्फ बदलने की जरूरत है। परिप्रेक्ष्‍य बदलने की जरूरत है। दृष्‍टि को विषय से विषयी पर, बाहर से भीतर पर, बादल से आकाश पर, अतिथि से आतिथेय पर ले जाने की जरूरत है। सिर्फ दृष्‍टि को /फोकस को बदलना है।उदाहरण के लिए एक झेन सदगुरू

एक झेन सदगुरू लिंची प्रवचन कर रहे थे । भीड़ में से किसी ने कहा: मेरे एक प्रश्‍न का उत्‍तर दें, मैं कौन हूं? लिंची ने बोलना बंद कर दिया। सब लोग चौकन्‍ने हो गए। लिंची क्‍या उत्‍तर देने जा रहा है। सब यही सोच रहे थे। लेकिन उसने कोई उत्‍तर नहीं दिया। वह कुर्सी से नीचे उतरा, आगे बढ़ा और उस आदमी के पास पहुंचा। पूरी भीड़ चकित और सजग हो उठी। लोगों की श्‍वासें तक रूक गई।सदगुरू लिंची क्‍या करने जा रहा है। उसे कुर्सी पर बैठे-बैठे ही जवाब देना था; कुर्सी से उठने की क्‍या जरूरत थी? और प्रश्‍नकर्ता तो बहुत भयभीत हो गया।

7-लिंची अपनी बेधक दृष्‍टि उस व्‍यक्‍ति पर जमाए पास आये । उसने उस व्यक्ति का गला पकड़ लिया, उसे झकझोरा और कहा; आंखे बंद करो और उसका स्‍मरण करो जो यह प्रश्‍न पूछ रहा है।उस व्यक्ति ने आंखें बंद की ..हांलाकि डरते-डरते।

वह अपने भीतर खोजने गया कि किसने यह प्रश्‍न पूछा था। और वह वापस नहीं आया। भीड़ प्रतीक्षा करती रही। प्रतीक्षा करती रही,उस व्यक्ति का चेहरा मौन और शांत हो गया। तब लिंची ने उसे फिर झकझोरा: ‘’अब बाहर आओ, और सब को बताओ कि तुम कौन हो। वह व्यक्ति हंसने लगा और कहा: जवाब देने का आपका खूब अद्भुत ढंग है। लेकिन यदि कोई व्‍यक्‍ति अभी मुझसे यही पूछे तो मैं भी वहीं करूंगा। ‘’मैं उत्‍तर नहीं दे सकता।‘’यह दृष्‍टि की, परिप्रेक्ष्य की बदलाहट थी।

तुम पूछते हो कि मैं कौन हूं और तुम्‍हारा मन ..प्रश्‍न पर केंद्रित है, जब कि उत्‍तर प्रश्‍न के ठीक पीछे प्रश्‍न कर्ता में छिपा है। दृष्‍टि को बदलों;अपने पर लौट आओ।

8- यह सूत्र कहता है: ‘’जहां-जहां तुम्‍हारा मन भटकता है, भीतर या बाहर,उसी स्‍थान पर यह।

‘’तुम सोचते हो कि बादल मेरी संपदा है। तुम सोचते हो कि जितनी ज्‍यादा बादल होंगे, मैं उतना ही बेहतर, उतना ही ज्‍यादा समृद्ध हो जाऊँगा। और तुम्‍हारा सारा आंतरिक आकाश उनसे आच्छादित है, ढंका है। एक अर्थ में, बादलों में आकाश खो गया है। और बादल ही तुम्‍हारा जीवन है। और बादलों का जीवन ही संसार है।यह बात एक क्षण में घट सकती

है। यह दृष्‍टि सदा अचानक ही घटती है।इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम कुछ भी मत करो और अचानक घटेगी। तुम्‍हें बहुत कुछ करना होगा। लेकिन यह क्रमिक ढंग से नहीं घटता। तब करते-करते एक दिन वह क्षण आता है जब तुम भाप बनने के सही तापमान पर पहुंच जाते हो। अचानक पानी-पानी नहीं रहता है; वह भाप बन गया। अचानक तुम विषय से बाहर हो गए। तुम्‍हारी आंखें अब बादलों पर नहीं अटकती है। अब अचानक तुम आंतरिक आकाश की तरफ या भीतर मुड़ जाते हो।

9-ऐसा कभी क्रमिक रूप से नहीं होता कि तुम्‍हारी आँख का एक अंश भीतर की और मुड़ जाता है और उसका दूसरा अंश बाहर बादलों पर लगा रहता है।या कि तुम दस प्रतिशत भीतर हो और नब्‍बे प्रतिशत बाहर, कि बीस प्रतिशत भीतर हो और अस्‍सी प्रतिशत बाहर।वास्तव में, जब यह घटित होता है तो शत प्रतिशत होता है। क्‍योंकि तुम अपनी दृष्‍टि को खंड-खंड नहीं कर सकते हो। या तो तुम विषयों को देखते हो या अपने को; या तो संसार को या ब्रह्म को।फिर तुम संसार में वापस आ सकते

हो ,अपनी दृष्‍टि बदल सकते हो। सच तो यह है कि तुम तभी मालिक होते हो जब स्‍वेच्‍छा से अपनी दृष्‍टि बदल सकते हो।

उदाहरण के लिए एक तिब्‍बती संत मारपा जब ज्ञान को उपलब्‍ध हुआ ..जब वह अंतस की और मुड़ गया ,उसने अंतराकाश का, अनंत का साक्षात्‍कार किया ..तो किसी ने उससे पूछा: मारपा अब कैसे हो? तो मारपा ने अत्‍तर दिया वह अपूर्व है, अप्रत्‍याशित है।अब तक किसी बुद्ध ने वैसा उत्‍तर नहीं दिया था। मारपा ने कहा: पहले जैसा ही दुःखी। वह

व्यक्ति तो भौचक्‍का रह गया; उसने पूछा: पहले जैसा ही दुखी? लेकिन मारपा हंसा, उसने कहा: हां, लेकिन एक फर्क के साथ।

10-और फर्क यह है कि अब मेरा दुःख स्‍वैच्‍छिक है। अब मैं कभी-कभी बस संसार का स्‍वाद लेने के लिए अपने से बाहर लौट सकता हूं। लेकिन मैं मालिक हूं। मैं किसी भी क्षण भीतर लौट सकता हूं। और दोनों ध्रुवों के बीच गति कर सकता हूं। तभी कोई जीवित रह सकता है। कभी मैं दुखों में लौट सकता हूं, लेकिन अब दुख मुझे नहीं घटित होते है, मैं ही उन्‍हें घटित होता

हूं। और मैं उनसे अछूता रह सकता हूं।निश्‍चित ही, जब तुम स्‍वेच्‍छा से गति करते हो ..एक बार तुमने जान लिया कि दृष्‍टि को अंतर्मुखी कैसे किया जाए,तुम संसार में वापस आ सकते हो। सभी बुद्ध पुरूष संसार में वापस आए है। वे दृष्‍टि को फिर संसार में ले जाते है। लेकिन अब आंतरिक मनुष्‍य की गुणवता भिन्‍न है। वह जानता है कि यह उसकी स्‍वतंत्र दृष्‍टि है; वह बादलों को भी गति करने की इजाजत दे सकता है।लेकिन अब बादल मालिक न रहे ..वे तुम पर हावी नहीं हो सकते है। वे अब तुम्‍हारी मर्जी से घूमते है।

11-और कभी-कभी बादलों से भरा आकाश, उनकी हलचल सुंदर होता है। अगर आकाश-आकाश बना रहे तो बादलों को तैरने दिया जा सकता है। समस्‍या तो तब खड़ी होती है। जब आकाश अपने को भूल जाता है। और वहां बादल ही बादल रह

जाते है। तब सब कुछ कुरूप हो जाता है। क्‍योंकि स्‍वतंत्रता खो गई।यह सूत्र सुंदर है: ‘’जहां कहीं तुम्‍हारा मन भटकता है,

भीतर या बाहर, उसी स्‍थान पर, यह।‘’झेन परंपरा में इस सूत्र का गहरा उपयोग हुआ है। झेन कहते है कि साधारण मन ही बुद्ध-मन है। भोजन करते हुए तुम बुद्ध हो; सोते हुए तुम बुद्ध हो। कुएं से पानी ले जाते हुए तुम बुद्ध हो। तुम हो, कुएं से पानी ले जाते हुए ,भोजन करते हुए ,विस्‍तर पर लेटे हुए.. तुम बुद्ध हो। यह पहेली जैसा लगता है। लेकिन यह सच है। अगर पानी ढोते हुए तुम सिर्फ पानी ढोते हो। तुम उसे समस्‍या नहीं बनाते और सिर्फ पानी ढोते हो। अगर तुम्‍हारा मन बादलों से मुक्‍त है। और आकाश खाली है। अगर तुम केवल पानी ढोते हो, तो तुम बुद्ध हो। तब भोजन करते हुए तुम सिर्फ भोजन करते हो और कुछ नहीं करते।

12-लेकिन हम जब भोजन करते है तो उसके साथ हजारों चीजें करते-रहते है। हो सकता है तुम्‍हारा मन भोजन में बिलकुल न

हो; तुम्‍हारा शरीर यंत्र की भांति भोजन कर रहा हो। तुम्‍हारा मन कहीं और हो सकता है।जब तुम दफ्तर जाते हो तो तुम्‍हारा मन घर में होता है। तुम जब घर में होते हो तो तुम्हारा मन दफ्तर में होता है। और तुम ऐसा जादुई करिश्‍मा कर नहीं सकते;घर में होकर तुम घर में ही हो सकते हो, दफ्तर में नहीं हो सकते। और अगर तुम दफ्तर में हो तो तुम्‍हारा दिमाग ठीक नहीं है ।

तब हर चीज दूसरी चीज में उलझ जाती है। गुत्‍थमगुत्‍था हो जाती है। तब कुछ भी स्‍पष्‍ट नहीं है। और यही मन समस्‍या है।कुएं से पानी खींचते हुए, कुएं से पानी ढोते हुए तुम अगर मात्र यही काम कर रहे हो तो तुम बुद्ध हो। अगर तुम झेन सदगुरूओं के पास जाओ और उसने पूछो कि आप क्‍या करते है? आपकी साधना क्‍या है? ध्‍यान क्‍या है? तो वे कहेंगे: जब नींद आती है तो हम सो जाते है। जब भूख लगती है तो हम भोजन करते है। बस यही हमारी साधना है और कोई साधना नहीं है।

लेकिन यह बहुत कठिन है। हालांकि आसान मालूम होती है।

13-अगर भोजन करते हुए तुम सिर्फ भोजन करो,अगर बैठे हुए तुम सिर्फ बैठो और कुछ न करो। कोई विचार न हो, अगर तुम वर्तमान क्षण के साथ रह सको,डूब सको ..उससे हटो नहीं, न कोई अतीत हो, न कोई भविष्‍य हो,केवल वर्तमान क्षण ही एकमात्र अस्‍तित्‍व हो, तो तुम बुद्ध हो। तब यही मन ..बुद्ध मन बन जाता है।तो जब तुम्‍हारा मन भटकता है

तो उसे रोकने की चेष्‍टा मत करो, बल्‍कि आकाश को स्‍मरण करो। उसे किसी बिंदु पर लाने की, एकाग्र करने की चेष्‍टा मत करो ;केवल उसे भटकने दो। लेकिन भटकाव पर बहुत अवधान मत दो ...न पक्ष में,न विपक्ष में, क्‍योंकि तुम चाहे उसके पक्ष में रहो या विपक्ष में, तुम उससे बंधे रहते हो।आकाश को स्‍मरण करो।भटकन को चलने दो।और इतना ही कहो; ठीक है,

मन एक चलती हुई राह है,अनेक लोग इधर-उधर चले जा रहे है लेकिन मैं आकाश हूं..बादल नहीं।

14- इसी स्‍मरण को याद रखो। इस भाव में उतरो ; इसमें ही स्‍थिर रहो। देर अबेर तुम देखोगें कि बादलों की गति बंद पड़ गई है। बादलों के बीच में अंतराल आने लगा है। वे अब उतने घने नहीं रहे है ;उनकी गति मंद पड़ गई है। उनके पीछे का आकाश दिखाई पड़ने लगा है।अपने को आकाश की भांति अनुभव करते रहो; बादलों की भांति नहीं। देर-अबेर किसी

दिन, किसी सम्‍यक क्षण में,जब तुम्‍हारी दृष्‍टि सचमुच भीतर लौट गई है ;बादल विलीन हो जाएंगे।और तब तुम शुद्ध आकाश

हो, सदा से शुद्ध,सदा से अस्‍पर्शित आकाश हो।और एक बार तुमने इस शुद्धता ,अस्‍पर्शिता को जान लिया तो फिर बादलों में, बादलों के संसार में वापस आ सकते हो। तब संसार का अपना ही सौदर्य है, तब तुम इसमे रह सकते हो।लेकिन अब तुम

मालिक हो।मालिक के लिए संसार समस्‍या नहीं है...बुरा नहीं है। तब संसार का अपना ही सौदर्य है; वह सुंदर है , प्‍यारा है। लेकिन तुम उसे सौंदर्य को, उस माधुर्य को अपने भीतर मालिक होकर ही जान सकते हो।

.....SHIVOHAM....