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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 26, 27वीं विधियों (अचानक रूकने की 5 विधियां)का क्या विवेचन है?


विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 26 ;- 12 FACTS;- 1-भगवान शिव कहते है: - ''जब कोई कामना उठे, उस पर विमर्श (Consider ) करो। फिर, अचानक, उसे छोड़ दो।'' 2-यह सूत्र कहता है कि तुम्‍हें कोई इच्‍छा होती है ...चाहे भोजन की ही इच्‍छा हो तो विचार करो।अथार्त उसके पक्ष या विपक्ष में विचार मत करो; बल्‍कि देखो कि वह इच्‍छा क्‍या है।तुम शास्‍त्रों में ढूंढते हो ;ऋषियों से ,अतीत से और गुरूओ से पूछते हो परन्तु स्‍वयं कामना पर विचार-विमर्श नहीं करते हो।तुम शिक्षा ,संस्‍कृति , धर्म, संस्‍कार आदि पर भी विचार करते हो लेकिन कामना पर नहीं।इसमे मन को बीच में मत लाओ। केवल इस चाह पर विमर्श करो की यह क्‍या है।उदाहरण के लिए, एक नवजात शिशु को कोई भाषा न सिखायी जाए तो वह भाषा नहीं जानेगा।भाषा एक सामाजिक घटना है जो सिखायी जाती है। लेकिन कामना समाजिक घटना नहीं है ;समय के साथ इस बच्‍चे में भी कामना उठेगी।वह जैविक रूप से तुम्‍हारी कोशिकाओं में ही इन- बिल्‍ट है और गहरी है।

3- कामना पर, एक तथ्‍य की तरह विमर्श करो ;उसकी व्‍याख्‍या मत करो। यहां विमर्श का मतलब व्‍याख्‍या नहीं बल्कि तथ्‍य को तथ्‍य की तरह सीधा और प्रत्‍यक्ष देखना है।विचारों और धारणाओं को बीच में मत लो। कोई विचार या कोई धारणा तुम्‍हारी नहीं है।हर विचार या धारणा उधार है ..मौलिक नहीं। इसलिए विचार को बीच में मत लो। सिर्फ कामना को देखो कि वह क्‍या है। ऐसे देखो जैसे कि तुम्‍हें उसके संबंध में कुछ भी पता नहीं है। उसका साक्षात्‍कार करो ; तथ्‍य की तरह देखो कि यह क्‍या है।। दुर्भाग्‍य से यह सर्वाधिक कठिन कामों में से एक है।चाँद पर पहुंचना बहुत अत्‍यंत जटिल है; लेकिन आंतरिक मन के किसी तथ्‍य के साथ जीने की बात के मुकाबले चाँद पर पहुंचना कुछ भी नहीं है।क्‍योंकि तुम जो भी करते हो उसमें मन बहुत सूक्ष्‍म रूप से संलग्‍न रहता है ,सदा समाया रहता है या उलझा रहता है। 4-एक शब्‍द ही तुम्‍हारे भीतर व्‍याख्‍या को जन्‍म देता है।मन ऐसा व्‍याख्‍याकार है कि अगर किसी ने कहा कि ' नींबू का रस' तो तुम्‍हारी लार टपकने लगती है। तुमने शब्‍दों की व्‍याख्‍या कर ली। ‘’नींबू का रस’’ इन शब्‍दों में नींबू जैसी कोई चीज नहीं है। लेकिन तुम्‍हारे मुंह में खट्टापन भर जायेगा। मन ने व्‍याख्‍या कर ली; और मन बीच में आ गया। ''फिर अचानक, उसे छोड़ दो।'' इस विधि के दो हिस्‍से है। पहला कि तथ्‍य के साथ रहो। जो हो रहा है उसके प्रति सजग रहो। अवधान पूर्ण (With Full Attention) रहो।देखो कि तुम्‍हारे भीतर क्‍या-क्‍या घटित होता है।इसका अनुभव करो, इस पर विमर्श करो; कोई निर्णय न लो। सीधे तथ्‍य में प्रवेश करो। यह मत कहो कि यह बुरा है। अगर बुरा कहा तो विमर्श समाप्‍त हो गया, तुम ने द्वार बंद कर दिया और एक गहरा कीमती क्षण गंवा दिया। जिसमें तुम अपने जीवन की एक जैविक पर्त का दर्शन कर सकते थे। 5-तुम अभी जिस पर्त से परिचित हो वह सामाजिक पर्त है, सतही है और तुम उससे ही चिपके हो। सतही चीजों को बीच में मत लाओ। तथ्‍य पर attention/अवधान दो, उसमे प्रवेश करो, और उसका ही निरीक्षण करो। किसी ऋषि विशेष को, क्‍या हुआ यह प्रासंगिक नहीं है।इस जीवंत क्षण में तुम्‍हें जो हो रहा है ..वह important है। ''अचानक छोड़ दो।'' दूसरा हिस्‍सा वास्तव में, अद्भुत है..यहां ‘’अचानक’’ को याद रखो। यह मत कहो कि यह खराब है, बुरा है, या पाप है, इसलिए छोड़ दूँगा ,त्‍याग दूँगा या Supress/दमन कर दूँगा। तब तो Supression ही घटित होगा ..ध्‍यान नहीं।और दमन अपने ही हाथों अपना एक भ्रमित चित निर्मित करना है। 6-Supression मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है; उसके द्वारा तुम उन ऊर्जाओं को दबाते हो ;और psychotic हो जाते हो । ऊर्जा तो है ही, न इसे बाहर जाने दिया गया है और न भीतर; उसे सिर्फ दमित कर दिया गया है।वह कोने में छिप गई है। जहां वह पड़ी रहेगी और विकृत होगी।वास्तव में, विकृत ऊर्जा ही मनुष्‍य की बुनियादी समस्‍या है। जो Mental illness/मानसिक रूग्‍णताएं है, वे विकृत ऊर्जा /Distorted energyकी उप-उत्पती /Sub-originहै। वह ऊर्जा ऐसे ढंगों में अभिव्‍यक्‍त होगी जिसकी कोई कल्‍पना नहीं हो सकती है और बहुत दुःख और संताप लाती है। परन्तु यह सूत्र यह नहीं कहता कि नियंत्रण करो; बल्कि कहता है: ‘’अचानक, छोड़ दो।‘’ 7-अगर कामना पर तुमने विमर्श किया है तो दूसरा भाग कठिन नहीं होगा।यदि विमर्श नहीं किया है तो तुम्‍हारे मन में विचार चलते रहेंगे।कामना उठ रही है;उसे तुमने दबाया नहीं है और वह बाहर जाना चाहती है। और तुम्‍हारे पूरे अस्‍तित्‍व को उद्वेलित कर दिया है।सच तो यह है कि जब तुम किसी कामना पर बिना किसी व्‍याख्‍या के विचार करोगे तो तुम्‍हारा पूरा अस्‍तित्‍व ही कामना बन जाएगा।तुम उसके पक्ष या विपक्ष में नहीं हो। उसके संबंध में तुम्‍हारी कोई धारणा नहीं है, तुम सिर्फ उसे देख रहे हो। तो इस देखने भर से तुम्‍हारा पूरा अस्‍तित्‍व उस कामना में संलग्‍न हो जाएगा। एक अकेली कामना आग की लपट बन जाएगी। उस में तुम्‍हारा अस्‍तित्‍व जलने लगेगा ...वह तुम्‍हारे पूरे शरीर पर फैल जाएगी।तुम्‍हारे शरीर का एक-एक तंतु कांपने लगेगा।कामना अंगारा बन जाएगी। तब उसे छोड़ दो, उससे अचानक हट जाओ। उससे लड़ों मत, इतना ही कहो कि मैं छोड़ता हूं। 8-तब क्‍या होगा। ज्‍यों ही तुम कहते हो कि मैं छोड़ता हूं, एक अलगाव घटित होता है। तुम्‍हारा शरीर और तुम दो हो जाते हो। अचानक एक क्षण को भीतर उनके बीच जमीन-आसमान की दूरी पैदा हो गई। शरीर तो आवेग में, कामना से उद्वेलित है और केंद्र शांत है। मात्र देख रहा है। स्‍मरण रहे, वहां कोई संघर्ष नहीं है। सिर्फ अलगाव है। संघर्ष में तुम अलग नहीं होते, जब तुम लड़ते हो, तुम लड़ाई के विषय के साथ होते हो। तुम जब मात्र छोड़ देते हो ;तब तुम अलग होते हो, तब तुम इसे देख सकते हो। मानो तुम नहीं दूसरा देख रहा है। 9-उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति को Smoking addiction था ...चेन स्‍मोकर थे। और जैसा कि सभी ऐसा करने वाले करते है ;उन्होंने भी निरंतर उससे छूटने की चेष्‍टा की। किसी सुबह अचानक तय करते कि अब मैं ऐसा नहीं करूंगा और शाम होते-होते फिर पीने लगते। और फिर वह अपराधी अनुभव करते और अपना बचाव करते और तब कुछ दिनों तक break लेते। फिर वे यह सब भूल जाते और किसी दिन फिर उससे छूटने की चेष्‍टा करते। फिर वे खुद भी इस दुस्चक्र से ऊब उठे कि Smoking addiction हमेशा-हमेशा के लिए उनका संगी साथी बन गया है। वे गंभीरता से सोचने लगे और तब उन्‍होंने एक ज्ञानी से पूछा कि मैं क्‍या करूं।ज्ञानी ने उनसे कहा कि पहली बात तो यह कि धूम्रपान का विरोध करना छोड़ दो, धूम्रपान करो और मजे से करो। सात दिनों तक इसका कोई विरोध मत करो, इसे स्‍वीकार कर लो। 10 -उस व्यक्ति ने कहा कि यह आप क्‍या कह रहे है। मैं इसके विरोध में रहकर भी इसे नहीं छोड़ सकता हूं। और आप इसे स्‍वीकार करने को कहते है। तब तो छोड़ने की जरा भी संभावना नहीं रहेगी। तब ज्ञानी ने उन्‍हें समझाया कि तुम शत्रुता का रूख प्रयोग करके देख चुके, निष्‍फलता ही हाथ लगी है। अब मैत्री के रूख का प्रयोग करो। बस सात दिनों के लिए धूम्रपान का विरोध मत करो।उस व्यक्ति ने पूछा कि क्‍या तब धूम्रपान छूट जाएगा? ज्ञानी ने कहा कि तुम अब भी उसके प्रति शत्रुता का भाव रखते हो। छोड़ने के भाव में ही शत्रुता है। छोड़ने की बात ही भूल जाओ। धूम्रपान के साथ रहो। उसके साथ सहयोग करो। क्‍या कोई मित्र को छोड़ने का विचार करता है। सात दिन तक छोड़ने की बात को भूल जाओ। उसका सहयोग करो। जितना संभव हो उतने प्रगाढ़ ढंग से, उतने प्रेम के साथ पीओ। जब तुम धूम्रपान कर रहे हो तो उस समय सब कुछ भूलकर धूम्रपान ही हो जाओ। उसके साथ आराम से रहो, उसके साथ संवाद साध लो। 11-ये सात दिन उस व्यक्ति के लिए विमर्श के दिन बन गये। वह धूम्रपान के तथ्‍य को सीधा-सीधा देख पाए। वह इसके विरोध में नहीं थे। इसलिए अब इसका साक्षात्‍कार कर सकते थे। जब तुम किसी व्‍यक्‍ति या वस्‍तु के विरोध में होते हो तो तुम उसका साक्षात्‍कार नहीं कर सकते। विरोध ही बाधा बन जाता है। तब विमर्श नहीं होता क्योंकि तुम शत्रु से न विमर्श करते हो न उसकी आँख से आँख मिलाकर देख सकते हो। तुम उसी व्‍यक्‍ति की आंखों में आँख डालकर देख सकते हो; जिसे तुम प्रेम करते हो अन्‍यथा आँख मिलाना मुश्‍किल है।उस व्यक्ति ने धूम्रपान के तथ्‍य का गहराई से साक्षात्‍कार किया। सात दिन तक वह विमर्श करते रहे। उसने विरोध छोड़ दिया था। इसीलिए ऊर्जा सुरक्षित थी। और वह ध्‍यान बन गया। सात दिन बाद उसने कहा, '' यह अनुभव सुंदर रहा, इतना सुंदर कि अब मैं किसी चीज के विषय में सोचना ही नहीं चाहता। पहली बार मैंने तथ्‍य के साथ संघर्ष नहीं किया ; मैं सिर्फ उसेअनुभव कर रहा हूं ..जो मेरे साथ घटित हो रहा है''। 12-तब उस ज्ञानी ने उससे कहा, ‘’अब जब भी Smoking Attitude / वृति पैदा हो, तो उसे छोड़ दो।'' उसने फिर नहीं पूछा कि कैसे छोड़ना है।क्योंकि उसने पूरी चीज पर विमर्श किया था। और उस ज्ञानी ने उससे कहा, ''अब जब फिर धूम्रपान की चाह पैदा हो तो उसे देखो, और उसे छोड़ दो। सिगरेट को अपने हाथ में ले लो, एक क्षण के लिए रूको और तब सिगरेट को छोड़ दो, गिर जाने दो। और सिगरेट के गिरने के साथ-साथ धूम्रपान की वृति पैदा हो और तुम उसे छोड़ दो तो सारी ऊर्जा एक छलांग लेकर भीतर गति कर जाती है।''विधि एक ही है, केवल उसके आयाम भिन्‍न है।''जब कोई कामना उठे, उस पर विमर्श करो। फिर, अचानक, उसे छोड़ दो।'' ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 27;- 08 FACTS;- 1-भगवान शिव कहते है:- ''पूरी तरह थकनें तक घूमते रहो, और तब जमीन पर गिरकर, इस गिरने में पूर्ण होओ।'' 2-पूरी तरह थकनें तक घूमते रहो ...बस सर्किल में घूमों।यह घूमना तब तक जारी रहे जब तक ऐसा न लगे कि और एक कदम उठना असंभव है।लेकिन यह ख्‍याल रखो कि मन कह सकता है कि अब पूरी तरह थक गए लेकिन मन पर ध्‍यान ही मत दो। वह बार-बार कहेगा कि बस करो, अब बहुत थक गए।तब तक घूमना जारी रखो जब तक महसूस न हो ..विचारना नहीं है, महसूस करना महत्‍वपूर्ण है कि शरीर बिलकुल थक गया है।और अब एक कदम भी उठाना संभव न होगा।और यदि उठाऊंगा तो गिर जाऊँगा।जब तुम अनुभव करो कि अब गिरा तब गिरा ...अब आगे नहीं जा सकता, शरीर भारी और थक कर चूर हो गया है।''तब जमीन पर गिरकर इस गिरने में पूर्ण होओ।'' तब गिर जाओ। 3-ध्‍यान रहे कि थकना इतना हो कि गिरना अपने आप ही घटित हो।अगर तुमने दौड़ना जारी रखा तो गिरना अनिवार्य है।जब यह चरम बिंदू आ जाए तब ..सूत्र कहता है ...'गिरो और इस गिरने में पूर्ण होओ।'इस विधि का केंद्र बिंदू यही है।पहली बात यह है कि मन के कहने से ही मत गिरो क्‍योंकि आयोजन नहीं करो ; बैठने की , लेटने की चेष्‍टा मत करो।पूरे के पूरे गिर जाओ मानो कि पूरा शरीर एक है और वह गिर गया है।ऐसा न हो कि तुमने उसे गिराया है। अगर तुमने गिराया है तो तुम्‍हारे दो हिस्‍से हो गए।एक गिरने वाले तुम हुए और दूसरा गिराया हुआ शरीर हुआ।तब तुम पूर्ण न रहे ...खंडित और विभाजित ही रहे। 4-उसे अखंडित गिरने दो; अपने को समग्ररतः गिरने दो। ‘गिरो’ शब्‍द को याद रखो। व्‍यवस्‍था नहीं करनी है। मृतवत गिर जाना है।इस गिरने में पूर्ण होओ।अगर इस भांति गिरे तो पहली बार तुम्‍हें अपने पूरे अस्‍तित्‍व का, अपनी पूर्णता का एहसास होगा। पहली बार केंद्र को अखंड, अद्वैत का अनुभव घटित होगा।शरीर में ऊर्जा /Energy के तीन dimensions है।एक है Daily activities का dimension जो आसानी से चुक जाता है।यह तल दिनचर्या के कामों के लिए ही है।दूसरा dimension

Emergency works के लिए है।यह ज्‍यादा गहरा है।जब तुम किसी संकट में होते हो तभी इस ऊर्जा का उपयोग करते हो।और तीसरा तल Conscious energy/जाग्रतिक ऊर्जा का है, जो अनंत है। 5-पहले तल की ऊर्जा आसानी से चुक जाती है।यदि कोई तुम्‍हें दौड़ने को कहे तो तुम तीन चार चक्‍कर लगाकर कहोगे कि मैं थक गया हूं।वास्तव में, तुम थके नही हो केवल पहले तल की ऊर्जा समाप्‍त हो गई है।सुबह में यह इतनी आसानी से नहीं चुकती, शाम में जल्‍दी चुक जाती है क्‍योंकि दिन भर तुमने उसका उपयोग किया है।अब इसे विश्राम की जरूरत है।यही वजह है कि रात में शरीर आराम खोजता है ...उसे गहरी नींद की जरूरत है।यह पहला तल हुआ।Conscious energy के भंडार से शरीर फिर अगले दिन के काम के लिए जरूरी ऊर्जा ले लेता है।यदि रात में तुमसे कोई दौड़ने को कहे तो तुम कहोगे कि मुझे नींद आ रही है।तभी कोई आता है और कहता है कि तुम्‍हारे घर में आग लग गई है।अचानक तुम्‍हारी नींद काफूर हो जाती है । थकावट गायब हो जाती है और तुम दौड़ने लगते हो।ये अचानक क्‍या हुआ क्योंकि तुम थके थे।वास्तव में, आपत्काल ने तुम्‍हें तुम्‍हारी ऊर्जा के दूसरे तल से जोड़ दिया, और तुम फिर ताजा हो गये। यह दूसरा तल है। 6-इस विधि में दूसरे तल की ऊर्जा को चुकाना है। पहला तल बहुत आसानी से चुक जाता है।उसके चुकने पर भी दौड़ते रहो। थकनें पर भी दौड़ते रहो। कुछ ही क्षण में ऊर्जा की एक नई लहर आएगी और तुम फिर ताजा हो जाओगे। और तुम्‍हारी थकावट चली जायेगी।उदाहरण के लिए,जब हम साधना शिविर में होते है तब एक चमत्‍कार सा होता है कि हम इतना कर लेते है।तीन-तीन बार पागलों की तरह ध्‍यान करते है। लोग कहते है कि यह हमें असंभव सा लगता है कि अब और नहीं चलेगा ;अगले दिन हाथ पाँव हिलाना भी असंभव होगा। लेकिन रोज तीन सत्र और कठिन श्रम के बावजूद कोई भी नहीं थकता है। 7-ऐसा इसलिए है कि लोग शिविर में दूसरे तल की ऊर्जा से संबंधित हो जाते है। यदि तुम अकेले करोगे तो थक जाओगे। किसी पहाड़ पर जाकर प्रयोग करके देखोगे तो पहले तल के चुकते ही तुम चुक जाओगे ।लेकिन एक बड़े समूह में, जब लोग ध्यान करते है ,तो बात दूसरी है।तुम्‍हें लगता है, दूसरे लोग जब नहीं थके है तो तुमको भी कुछ देर जारी रखना चाहिए।और हरेक आदमी ऐसा ही सोच रहा है कि जब कोई नहीं थका है तो मुझे भी जारी रखना चाहिए।जब सभी ताजा और सक्रिय है तो मैं ही क्‍यों थकान अनुभव करूं?यह समूह भाव हमें प्ररेणा देता है,शक्‍ति देता है और तुम दूसरे तल पर प्रवेश कर जाते हो।और दूसरा तल बहुत बड़ा है...आपातकालीन तल जो है। और जब आपातकालीन तल चुकता है तब तुम जाग्रति तल में, प्रवेश कर जाते हो। अनंत से तुम्‍हारा संबंध स्थापित हो जाता है।इसलिए बहुत श्रम की जरूरत है।इतने श्रम की कि तुम्‍हें लगे कि अब यह मेरे बस की बात नहीं है। 8-लेकिन अभी भी यह सिर्फ तुम्‍हारे पहले तल कि ऊर्जा के वश के बाहर है। जब पहले तल की ऊर्जा चुकती है तो थकावट महसूस होती है। दूसरे तल की ऊर्जा के चुकने पर तुम्‍हें लगेगा की अब अगर और ज्‍यादा किया तो मैं मर जाऊँगा। अनेक लोग कहते है कि जब हम ध्‍यान की गहराई में उतरते है तो एक क्षण को आता है कि हम भयभीत हो जाते है क्‍योंकि लगता है कि इससे आगे जाने पर मृत्‍यु निश्चित है।यह मृत्‍यु का भय पकड़ लेता है और लगता है कि ध्‍यान के बाहर आना नहीं हो सकेगा।यही वह क्षण है, जब तुम्‍हें साहस की जरूरत है।थोड़ा और साहस ...और तुम तीसरे तल में प्रविष्‍ट हो जाओगे। यह सबसे गहरा तल है .. Extreme, Endless.. ।यह विधि तुम्‍हें ऊर्जा के जाग्रतिक सागर में आसानी से उतारने में सहयोगी है।और जब तुम जमीन पर गिरते हो तो पहली बार तुम पूर्ण हो जाओगे ..अद्वैत, कोई विभाजन, कोई द्वैत नही रहेगा।''पूरी तरह थकनें तक घूमते रहो, और तब जमीन पर गिरकर, इस गिरने में पूर्ण होओ।''विभाजनों वाला मन विदा हो जाएगा।और पहली बार वह सत्‍ता प्रकट होगी जो Undivided/अविभाजित है, Inseparable/अविभाज्‍य है।

...SHIVOHAM...