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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 106,107,108 वीं ( चेतना संबंधी तीन विधियां )109 विधियां क्या है


विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 106;-

34 FACTS;-

1-पहली विधि..भगवान शिव कहते है:-

‘'हर मनुष्‍य की चेतना को अपनी ही चेतना जानो। अंत: आत्‍मचिंता को त्‍यागकर प्रत्‍येक प्राणी हो जाओ।’'

2-‘हर मनुष्‍य की चेतना को अपनी ही चेतना जानो।’वास्‍तव में ऐसा ही है, पर ऐसा लगता नहीं। अपनी चेतना को तुम अपनी चेतना ही समझते हो। और दूसरों की चेतना को तुम कभी अनुभव नहीं करते। अधिक से अधिक तुम यही सोचते हो कि दूसरे भी चेतन है। ऐसा तुम इसीलिए सोचते हो क्‍योंकि जब तुम चेतन हो तो तुम्‍हारे ही जैसे दूसरे प्राणी भी चेतन होने चाहिए।

3-यह एक तार्किक निष्कर्ष है; तुम्‍हें लगता नहीं कि वे चेतन है। यह ऐसे ही है जैसे जब तुम्‍हें सिर में दर्द होता है तो तुम्‍हें उसका पता चलता है, तुम्‍हें उसका अनुभव होता है। लेकिन यदि किसी दूसरे के सिर में दर्द है तो तुम केवल सोचते हो, दूसरे के सिर-दर्द को तुम अनुभव नहीं कर सकते। तुम केवल सोचते हो कि वह जो कह रहा है सच ही होना चाहिए। और उसे तुम्‍हारे सिर-दर्द जैसा ही कुछ हो रहा होगा। लेकिन तुम उसे अनुभव नहीं कर सकते।

4-अनुभव केवल तभी आ सकता है जब तुम दूसरों कि चेतना के प्रति भी जागरूक हो जाओ, अन्‍यथा यह केवल तार्किक निष्‍पति मात्र ही रहेगी। तुम विश्‍वास करते हो, भरोसा करते हो कि दूसरे ईमानदारी से कुछ कह रहे है; और वे जो कह रहे है यह भरोसा करने योग्‍य है, क्‍योंकि तुम्‍हें भी ऐसे ही अनुभव होते है।

5-तार्किकों की एक धारा है जो कहती है कि दूसरे के बारे में कुछ भी जानना असंभव है। अधिक से अधिक माना जा सकता है, पर निश्‍चित रूप से कुछ भी जाना नहीं जा सकता। यह तुम कैसे जान सकते हो कि दूसरे को भी तुम्‍हारे जैसी ही पीड़ा हो रही है या कि दूसरों को तुम्‍हारे ही जैसे दुःख है? दूसरें सामने है पर हम उनमें प्रवेश नहीं कर सकते, हम बस उनकी परिधि को छू सकते है। उनकी अंतस चेतना अनजानी रहती है। हम अपने में ही बंद रहते है।

6-हमारे चारों ओर का संसार अनुभवगत नहीं है। बस माना हुआ है। तर्क से, विचार से मन तो कहता है कि ऐसा है, पर ह्रदय इसे छू नहीं पाता। यही कारण है कि हम दूसरों से ऐसा व्‍यवहार करते है जैसे वे व्‍यक्‍ति न हो वस्‍तुएं हो। लोगों के साथ हमारे संबंध भी ऐसे होते है। जैसे वस्‍तुओं के साथ होते है। पति अपनी पत्‍नी से ऐसा व्‍यवहार करता है जैसे वह कोई वस्‍तु हो: वह उसका मालिक है। पत्‍नी भी पति की इसी तरह मालिक होती है.. जैसे वह कोई वस्‍तु हो। यदि हम दूसरों से व्‍यक्‍तियों की तरह व्‍यवहार करते तो हम उन पर मालकियत न जमाते, क्‍योंकि मालकियत केवल वस्‍तुओं पर ही की जा सकती है।

7-व्‍यक्‍ति का अर्थ है स्‍वतंत्रता। व्‍यक्‍ति पर मालकियत नहीं की जा सकती। यदि तुम उन पर मालकियत करने का प्रयास करोगे। तो उन्‍हें मार डालोगे। वे वस्‍तु हो जाएंगे। वास्‍तव में दूसरों से हमारे संबंध कभी भी ‘मैं-तुम’ वाले नहीं होते। गहरे में वह बस—‘मैं-यह’ (यह यानी वस्‍तु) वाले होते है। दूसरा तो बस एक वस्‍तु होता है जिसका शोषण करना है, जिसका उपयोग करना है। यही कारण है कि प्रेम असंभव होता जा रहा है। क्‍योंकि प्रेम का अर्थ है दूसरे को व्‍यक्‍ति समझना, एक चेतन-प्राणी, एक स्‍वतंत्रता समझना, अपने जितना ही मूल्‍यवान समझना।

8-यदि तुम ऐसे व्‍यवहार करते हो जैसे सब लोग वस्‍तु है तो तुम केंद्र हो जाते हो और दूसरे उपयोग की जाने वाली वस्‍तुएं हो जाती है। संबंध केवल उपयोगिता पर निर्भर हो जाता है। वस्‍तुओं का अपने आप में कोई मूल्‍य नहीं होता; उनका मूल्‍य यही है कि तुम उनका उपयोग कर सकते हो, वे तुम्‍हारे लिए है। तुम अपने घर से संबंधित हो सकते हो; घर तुम्‍हारे लिए है। वह एक उपयोगिता है। कार तुम्‍