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प्रेम की परिभाषा क्या है? क्या है विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 10वीं विधि(शिथिल होने की )?




विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि10(शिथिल होने की विधि10,11,12);-

भगवान शिव कहते है:-

''प्रिय देवी, प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि वह नित्‍य जीवन हो।''

परंतु क्या है प्रेम की परिभाषा ?प्रेम किसे कहा जाता है?वास्तव में,प्रेम वास्तविक या अवास्तविक नहीं होता है; प्रेम (Love) तो बस प्रेम होता है.. या तो प्रेम है या फिर नहीं है।प्रेम निस्वार्थ होता है और ये बिना किसी अपेक्षा के किया जाता है। प्रेम में छल नहीं होता है सच्चा प्रेम तो निश्छल होता है। सच्चा प्रेम क्या है?- 02 FACTS;- 1-सच्चा प्रेम जो चढ़े नहीं, घटे नहीं ;ज्ञानियों का प्रेम ऐसा होता है, जो कम-ज़्यादा नहीं होता और वह प्रेम तो केवल परमात्मा है।संसार में सच्चा प्रेम है ही नहीं। सच्चा प्रेम उसी व्यक्ति में हो सकता है जिसने अपने आत्मा को पूर्ण रूप से जान लिया है। प्रेम ही ईश्वर है और ईश्वर ही प्रेम है।उदाहरण के लिए शुद्ध प्रेम के बारे में संत कबीर कहते हैं कि... ''घड़ी चढ़े, घड़ी उतरे, वह तो प्रेम न होय, अघट प्रेम ही हृदय बसे, प्रेम कहिए सोय।'' 2-यह परिभाषा बहुत सुंदर है और यही है सबसे सच्चा प्रेम।जो विकृत प्रेम है,उसी का नाम आसक्ति। इस संसार में हम जिसे प्रेम कहते हैं, वह विकृत प्रेम कहलाता है और उसे आसक्ति ही कहा जाएगा। यह आसक्ति तो बिल्कुल वैसी ही है जैसी सुई और चुंबक का आकर्षण ।उसमें प्रेम जैसी वस्तु ही नहीं है। प्रेम की परिभाषा (Definition of Love) क्या है?- 03 FACTS;- 1-वास्तविक प्रेम (True Love) एक ऐसी भावना है जिससे सुधा रस छलकती है। वास्तविक प्रेम में संलिप्त होकर व्यक्ति अपना सर्वश्व अपने प्रिय के लिए न्योछावर कर देता है सच्चे प्रेम में स्वार्थ की कोई भी भावना नहीं होती है।सच्चे प्रेम (True Love)को समझने के लिए हमें पहले तीन बातों को समझना आवश्यक है... 1-1-प्रेम में किसी प्रकार का क्रय-विक्रय नहीं होता है। 1-2-प्रेम की परिभाषा तत्व की दृष्टि से "मैं" से परे हट जाना ही है। 1-3-प्रेम का तीसरा तत्व "प्रेम में कोई प्रतिद्वंदता नहीं होती है" सच्चा प्रेम उसी व्यक्ति से होता है जिसमें मन की शूरता, मन की सौंदर्यता और उदारता कूट-कूट कर भरी हो। 2-सच्चा प्रेमी (True lover) वह है जो अपने प्रिय को जिताने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है स्वयं हार कर भी उसको जिताना चाहता है.प्रेम तो अपने प्रिय के लिए सब कुछ न्यौछावर कर देता है। उसके बदले में कोई चाह (इच्छा) नाम की बात ही नहीं होती है । प्रेम में पुरस्कार भी नहीं होता है । न प्रेम पुरस्कार चाहता है और न प्रशंसा और न किसी प्रकार का आदान प्रदान-यही सच्चे प्रेमी (True lover) का लक्षण है। प्रेम तो सदा अपने प्रिय के लिए रोता है । वह अपने प्रिय का सच्चा उत्थान चाहता है जिसमें यदि स्वयं को भी हानि हो तो भी परवाह नहीं होती है।प्यार पेचीदा होता है जिसे समझना थोड़ा मुश्किल होता है। कभी-कभी लोग आकर्षण और लगाव को ही सच्चा प्यार समझ लेने की गलती कर बैठते हैं।प्यार स्वार्थरहित होता है और लगाव स्वार्थी: जब आप किसी से प्यार करते हैं तो उस इंसान को हमेशा खुश रखने पर ध्यान लगाते हैं। प्यार अहंकार को कम करता है और लगाव बढ़ाता है। 3-प्यार हमेशा के लिए और लगाव थोड़े समय के लिए होता है।"भयवश प्रेम नहीं किया जाता है" भय वश प्रेम करना अधम का मार्ग है जैसे बहुत से लोग नरक के डर से भगवान से या हानि लाभ के डर से देवी देवताओं से प्रेम करते है-वह अधम मार्ग है- प्रेम में न तो कोई बड़ा होता है न कोई छोटा। "प्रेम इसलिए करो कि परमात्मा प्रेमास्पद है"प्रेम की वाणी मौन होती है तथा आँखों से जल बरसता है और हाथ अपने प्रेमी की सेवा करने के लिए तत्पर रहते है जैसे "श्रीकृष्ण व सुदामा"।प्रेम तभी सफल होता है जब अपने हृदय के अंदर प्रेमी के प्रति प्रतिद्वंदता, भय या आदान प्रदान रहित होकर प्रेमास्पद बन जाए तो वही प्रेम आनंदमय हो जाता है। राग में और प्रेम में क्या फर्क है?- 03 FACTS;- 1-प्रेम और राग में अंतर है। प्रेम का अर्थ है, रुचि, आकर्षण। ईश्वर में प्रेम होना चाहिए, ईश्वर में रुचि होनी चाहिये, ईश्वर में आकर्षण होना चाहिए। लेकिन जो राग है, उसमे समस्या है। राग में आसक्ति ( attachment) है, वो अविद्या से पैदा होती है। जो रुचि, जो आकर्षण ‘अविद्या’ के कारण पैदा होती है, उसको बोलते हैं-‘राग’। और जो रुचि, जो आकर्षण ‘विद्या’ (तत्त्व ज्ञान से पैदा होती है, उसको बोलते हैं-‘प्रेम’।प्रेम सबसे करना चाहिए.पर राग किसी से भी नहीं करना चाहिए।। गाये से, घोड़े से, पशु-पक्षी, मनुष्य, ईश्वर सबसे प्रेम करना चाहिए।प्रेम करने का विधान है।अहिंसा का मतलब है, ‘सबसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करना।’ धन से, पुत्र से, परिवार से, संपत्ति से, मोटर-गाड़ी, सोने-चांदी आदि किसी भी चीज से राग नहीं करना चाहिए क्योंकि राग, दुःख-दायक है।प्रेम, दुख दायक नहीं है। क्योंकि राग ‘अविद्या’ के कारण उत्पन्न होता है, और प्रेम ‘तत्त्व-ज्ञान’ के कारण उत्पन्न होता है। इसलिए दोनों में अंतर है। 2-आज प्रेम की परिभाषा (Today's love) क्या है.... अब हम बीसवी और इक्कीसवी सदी के प्रेम की बात करें तो आज के इस आधुनिक समय में ये प्रेम की व्याख्या प्रासंगिक नहीं है। यहाँ पर उपरोक्त व्याख्या सटीक नहीं बैठती है । आज कल के स्मार्ट युग में प्रेम भी स्मार्ट हो चुका है ;प्रेम स्वार्थ रूपी हो चुका है एक दूसरे से अपेक्षाए जुडी है ..वासना ( Lust) की अपेक्षा प्रथम ही द्रष्टिगोचर हो जाती है। प्रेम में आजादी होती है जबकि लगाव में बंधन.. जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो उसे खोने का डर नहीं होता है। आप अपने साथी को रोक-टोक नहीं करते हैं। आपको डर नहीं होता है कि आपका प्यार आपसे दूर चला जाएगा लेकिन जब आपका किसी से लगाव होता है तो आप उस व्यक्ति को कंट्रोल करने की सोचते हैं। आपको डर होता है कि वह आपसे दूर चला जाएगा। आपको असुरक्षित महसूस होने लगता है। 3-वास्तविक प्रेम तो मन की एक उत्कृष्ट अभियक्ति है या फिर आप ये समझ ले कि एक सुखद अहसास है इसमें जब स्वार्थ, वासनात्मक आसक्ति, इर्ष्या, क्रोध का समावेश हो गया तो प्रेम का स्थान कहाँ बचा है-हम आजकल के लोगो को प्रेम का दंभ भरते हुए देखते है तो सोचने पे मजबूर हो जाता हूँ कि अगर आज कल का प्रेम अगर यही है तो फिर कृष्ण और गोपियों का प्रेम (love) क्या था-श्री राधा और श्री कृष्ण का प्रेम भी एक उदाहरण है.. श्रीराधे ने तो अपने आराध्य से कुछ भी नहीं चाहा-केवल मात्र अपने आराध्य की इच्छा में अपनी इच्छा को समर्पित किया-क्या आज किसी का प्यार उस सीमा तक है-शायद नहीं-वास्तविक प्रेम मानव मन की या फिर कहें तो एक सुखद अहसास है। प्रेम त्याग, समर्पण है। प्रेम आपको विनम्र बनाता है। हम जब प्रेम से भरे होते हैं तो सभी के लिये हमारे दिल में प्रेम भरे भाव होते हैं । जब किसी एक के लिये प्रेम व किसी अन्य के लिये दिल में नफरत भरी हो तो वो प्रेम का आभासी रूप होता है। हमें सिर्फ महसूस होता है कि हमारा प्रेम सच्चा है जबकी वो प्रेम होता ही नहीं है बल्कि सिर्फ आसक्ति होती है। शास्त्रों के आधार पर प्रेम का अर्थ क्या होता है, क्या प्रेम और राग एक ही हैं या उसमें अंतर है?- 03 FACTS;- 1-राग, वह पौद्गलिक /जीव संबंधी वस्तु है और प्रेम, वह सच्ची वस्तु है। अब प्रेम ऐसा -होना चाहिए कि बढ़े नहीं, घटे नहीं, उसका नाम प्रेम कहलाता है। और बढ़े-घटे वह राग कहलाता है। इसलिए राग में और प्रेम में फर्क ऐसा है कि वह एकदम बढ़ जाए तो उसे राग कहते हैं। लोग जिसे प्रेम कहते हैं, वह तो आकर्षण और विकर्षण है।यदि आकर्षण बढ़ जाए तो राग में परिणमित होता है और आकर्षण उतर जाए तो द्वेष में परिणमित होता है। इसलिए उसका नाम प्रेम कहलाता ही नहीं है। . 2-संबंधित विज्ञान क्या हैं ?- 06 POINTS;- 1) जगत् के लोग प्रेम कहते हैं वह भ्रांति भाषा की बात है, छलने की बात है। अलौकिक प्रेम की संरक्षण/ आश्रय तो बहुत अलग ही होती है।प्रेम तो सबसे बड़ी वस्तु है। 2) मोह तो अंधे होने के बराबर है जैसे धृतराष्ट्र। अंधा व्यक्ति कीड़े की तरह घूमता है और मार खाता है । और प्रेम तो टिकाऊ होता है। उसमें तो सारी ज़िन्दगी का सुख चाहिए होता है। वह तात्कालिक सुख ढूंढे.. ऐसा नहीं होता है। 3) आसक्ति निकालने से जाती नहीं। क्योंकि इस लोहचुंबक और आलपिन दोनों को आसक्ति जो है, वह जाती नहीं। उसी प्रकार ये मनुष्यों की आसक्ति जाती नहीं। कम होती है, परिमाण कम होता है पर जाता नहीं। 4) सामनेवाला व्यक्ति किस प्रकार आत्यंतिक कल्याण को पाए, निरंतर उसी लक्ष्य के कारण यह प्रेम, यह करुणा फलित होती हुई दिखती है। जगत् ने देखा नहीं, सुना नहीं, श्रद्धा में नहीं आया, अनुभव नहीं किया, ऐसा परमात्म प्रेम प्रत्यक्ष में प्राप्त करना तो प्रेमस्वरूप भक्त द्वारा, प्रेमस्वरूप ज्ञानी द्वारा ही संभव है जो प्रेम कि जीवंत मूर्ति हैं। 5)सुई और चुंबक के आकर्षण को लेकर आपको ऐसा लगता है कि मुझे प्रेम है, इसलिए मैं खिंच रहा हूँ। लेकिन वह प्रेम जैसी वस्तु ही नहीं है। प्रेम तो, ज्ञानी का ‘प्रेम’ है,भक्त का ‘प्रेम’ है वह प्रेम कहलाता है। 6)सच्चा प्रेम वही है जो कभी बढ़ता या घटता नहीं है। मान देनेवाले के प्रति राग नहीं होता, न ही अपमान करनेवाले के प्रति द्वेष होता है। ऐसे प्रेम से दुनिया निर्दोष दिखाई देती है। यह प्रेम मनुष्य के रूप में भगवान का अनुभव करवाता है। क्या जगत् में भी कहीं प्रेम है?- 02 FACTS;- 1-प्रेम जैसी वस्तु ही इस जगत् में नहीं है;संसार में आकर्षण-विकर्षण हो सकता हैं परन्तु प्रेम नहीं । किसी जगह पर प्रेम ही नहीं है; सभी आसक्ति ही है।जहाँ प्रेम के पीछे द्वेष है,उस प्रेम को प्रेम कहा ही कैसे जाए? एक सा प्रेम होना चाहिए। ये मन-वचन-काया आसक्त स्वभाव के हैं। आत्मा आसक्त स्वभाव का नहीं है। और यह देह आसक्त होता है, वह लोहचुंबक और आलपीन जैसा है। क्योंकि वह चाहे जैसा लोह चुंबक हो तब भी वह तांबे को नहीं खींचेगा। वह सिर्फ लोहे को ही खींचेगा। पीतल हो तो नहीं खींचेगा यानी स्वजातीय को ही खींचेगा।वैसे ही शरीर में जो परमाणु है , वे लोह चुंबक वाले हैं। वे स्वजातीय को ही खींचते हैं। समान स्वभाव वाले परमाणु खिंचते हैं। पागल के साथ बनती है और समझदार के साथ नहीं बनती;क्योंकि परमाणु नहीं मिलते हैं। 2-परमाणु-परमाणु मेल खाते हैं। तीन परमाणु अपने और तीन परमाणु उसके, ऐसे परमाणु मेल खाएँ तब आसक्ति होती है। एक के तीन और दूसरे के चार हो तो कुछ भी लेना देना नहीं यानी विज्ञान है यह सब ।अर्थात् जहाँ प्रेम न दिखे, वहाँ मोक्ष का मार्ग ही नहीं।यानी एक प्रमाणिकता और दूसरा प्रेम।इन दो जगह पर भगवान रहते हैं। क्योंकि जहाँ प्रेम है, निष्ठा है, पवित्रता है, वहाँ पर ही भगवान है।शुद्ध प्रेम कैसे उत्पन्न किया जाए या प्रेम स्वरुप कैसे बना जाए?तो अब जितना भेद जाए, उतना शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है। शुद्ध प्रेम को उत्पन्न होने के लिए अपने में से कुछ जाना चाहिए।कोई वस्तु निकल जाए तब वह वस्तु आएगी। इसलिए इसमें से भेद जाए, तब शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है। इसलिए जितना भेद जाए उतना शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है। संपूर्ण भेद जाए तब संपूर्ण शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है। यही रीति है। क्या प्रेम की कसौटी समझना मुश्किल है?--

03 FACTS;- 1-सब जगह एक सरीखा प्रेम दिखता है क्योंकि उनके आत्मा को ही देखते हैं .. दूसरी वस्तु को नहीं।चाहे शरीर से मोटा दिखे , गोरा दिखे ,काला दिखे , लूला-लंगड़ा दिखे और चाहे अच्छे अंगो वाला मनुष्य दिखे।इस प्रेम से ही सब पाप भस्मीभूत हो जाते हैं।प्रेम परमात्मा को पाने की भक्ति है। प्रेम को शब्दों में समझना मुश्किल है। प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती। परिभाषा तो वस्तु या पदार्थ की होती है। प्रेम किया जा सकता है, प्रेम में बहा जा सकता है, प्रेम बना जा सकता है, समझाया नहीं जा सकता। दरअसल, प्रेम ही जीवन है, प्रेम ही प्रकृति है, नदी-झरनों का संगीत है, भंवरों का गुंजन है, हृदय की धड़कन है, कोयल की पुकार है, वनों में नाचते मोर-मोरनी का आकर्षण है। वसंती बयार में दो पत्तों का आलिंगन है और नायक-नायिका के हृदयों में स्पंदन पैदा करने वाली मीठी बयार है, इसलिए यह अनुभव और बोध का विषय है।

2-प्रेम की गहराई में जितना उतरा जाए, प्रेमी उतना ऊपर उठ जाता है। उसका आकार बढ़ जाता है, क्योंकि प्रेम करने वाले मात्रा में प्रेम नहीं करते, वे प्रेम में डूब जाते हैं। प्रेम करने वाले को स्वयं का विस्मरण हो जाता है। उसे कुछ पता नहीं होता कि उसने कितनी मात्रा में प्रेम किया है, क्योंकि प्रेम का कोई अंश नहीं होता, प्रेम आधा नहीं होता, प्रेम पूरा होता है।

प्रेम करने वाले तो यह भी भूल जाते हैं कि वह कौन हैं और किससे प्रेम कर रहे हैं क्योंकि प्रेम में द्वैत, दो का भाव नहीं होता। प्रेम में चेतन मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है, क्योंकि चेतन मन से प्रेम किया ही नहीं जा सकता, वह तो पूर्ण समर्पण है। जहां कुछ नहीं बचता, वहीं प्रेम रहता है। प्रेम बेहोशी है, वहां कोई चेतन मन नहीं है। इस दुनिया में शुद्ध प्रेम, केवल वही परमात्मा है। उसके सिवा अन्य कोई न दुनिया में हुआ है और न हीं होगा। 3-प्रशस्त राग क्या है?- जिस राग से संसार के सारे राग छूट जाते हैं ,वह प्रशस्त राग है ।प्रशस्त राग, प्रत्यक्ष मोक्ष का कारण है। वह राग बांधता नहीं है। क्योंकि उस राग में संसारी हेतु नहीं है।प्रशस्त राग सभी रागों को छुड़वाता है;अर्थात् जिस प्रेम में क्रोध-मान-माया-लोभ कुछ भी नहीं, स्त्री नहीं, पुरुष नहीं जो प्रेम समान ,एक जैसा रहता है।

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ध्यान विधि(तंत्र-सूत्र) 10;-

09 FACTS;-

1-''प्रिय देवी, प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि वह नित्‍य जीवन हो।''भगवान शिव प्रेम से शुरू करते है। यह पहली विधि प्रेम से संबंधित है।एक तनावग्रस्‍त आदमी प्रेम नहीं कर सकता। क्‍यों? क्‍योंकि तनावग्रस्‍त आदमी सदा उद्देश्‍य

से, प्रयोजन से जीता है। वह धन कमा सकता है। लेकिन प्रेम नहीं कर सकता। क्‍योंकि प्रेम प्रयोजन-रहित है।प्रेम कोई वस्‍तु नहीं है। तुम उसे संग्रहीत नहीं कर सकते, तुम उसे बैंक खाते में नहीं डाल सकते। तुम उससे अपने अहंकार की पुष्‍टि नहीं कर सकते। सच तो यह है कि प्रेम सब से अर्थहीन काम है; उससे आगे उसका कोई अर्थ नहीं है। उससे आगे उसका कोई प्रयोजन नहीं है। प्रेम अपने आप में जीता है। किसी अन्‍य चीज के लिए नहीं।

2-तुम धन कमाते हो..किसी प्रयोजन से ;वह एक साधन नहीं है। तुम मकान बनाते हो ..किसी के रहने के लिए। वह भी एक साधन है। प्रेम साधन नहीं है। तुम क्‍यों प्रेम करते हो? किस लिए प्रेम करते हो?प्रेम अपना लक्ष्‍य आप है। यही कारण है

कि हिसाब किताब रखने वाला मन, तार्किक मन, प्रयोजन की भाषा में सोचने वाला मन प्रेम नहीं कर सकता। और जो मन प्रयोजन की भाषा में सोचता है। वह तनावग्रस्‍त होगा। क्‍योंकि प्रयोजन भविष्‍य में ही पूरा किया जा सकता है। यहां और अभी

नहीं।तुम एक मकान बना रहे हो। तुम उसमें अभी ही नहीं रह सकते। पहले बनाना होगा। तुम भविष्‍य में उसमे रह सकते हो; अभी नहीं। तुम धन कमाते हो। बैंक बैलेंस भविष्‍य में बनेगा, अभी नहीं। अभी साधन का उपयोग कर सकते हो, साध्‍य भविष्‍य में आएँगे।

3-मृत्‍यु ,प्रेम और ध्‍यान सब वर्तमान में घटित होते है।इन तीनों को ;प्रेम, ध्‍यान और मृत्‍यु को—एक साथ रखना समान अनुभव है।इसलिए अगर तुम एक में प्रवेश कर गए तो शेष दो में भी प्रवेश पा जाओगे।मृत्‍यु सदा वर्तमान में होती है।अतीत जा चुका वह अब नहीं है। इसलिए अतीत में नहीं मर सकते। और भविष्‍य अभी आया नहीं है। इसलिए उसमे कैसे मरोगे इसलिए अगर तुम मृत्‍यु से डरते हो तो तुम प्रेम नहीं कर सकते।अगर तुम मृत्‍यु से भयभीत हो तो तुम ध्‍यान नहीं कर सकते। और अगर तुम ध्‍यान से डरे हो तो तुम्‍हारा जीवन व्‍यर्थ होगा। किसी प्रयोजन के अर्थ में जीवन व्‍यर्थ नहीं होगा। वह व्‍यर्थ इस अर्थ में होगा कि तुम्‍हें उसमें किसी आनंद की अनुभूति नहीं होगी। जीवन अर्थहीन होगा।भगवान शिव कहते है , ''प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि वह नित्‍य जीवन है।''इसका अर्थ है कि जब तुम्‍हें प्रेम किया जाता है तो अतीत समाप्‍त हो जाता है और भविष्‍य भी नहीं बचता। तुम वर्तमान के आयाम में गति कर जाते हो। तुम अब में प्रवेश कर जाते हो।उस क्षण मन नहीं होता है।

4-यही कारण है कि तथाकथित बुद्धिमान कहते है कि प्रेमी अंधे होते है, मन: शून्य और पागल होते है। वस्‍तुत: वे सच कहते है। प्रेमी इस अर्थ में अंधे होते है कि भविष्‍य पर अपने किए का हिसाब रखने वाली आँख उनके पास नहीं होती। वे अंधे है, क्‍योंकि वे अतीत को नहीं देख पाते। वे अभी और यही में सरक आते है, अतीत और भविष्‍य की चिंता नहीं करते, क्‍या होगा इसकी चिंता नहीं लेते। इस कारण वे अंधे कहे जाते है। वे है। जो कैलकुलेटिव माइंड के है, उनके लिए वे अंधे है, और जो गणित नहीं करते उनके लिए आँख वाले है ; वे देख लेंगे कि प्रेम ही असली आँख है, वास्‍तविक दृष्‍टि है।इसलिए पहली चीज ....प्रेम के क्षण में अतीत और भविष्‍य नहीं होते है। तब एक बिंदु समझने जैसा है। जब अतीत और भविष्‍य नहीं रहते तब क्‍या तुम इस क्षण को वर्तमान कह सकते हो? यह वर्तमान है दो के बीच, अतीत और भविष्‍य के बीच; यह सापेक्ष है। अगर अतीत और भविष्‍य नहीं रहे तो इसे वर्तमान में क्‍या कहते है। वह अर्थहीन है। इसीलिए भगवान शिव वर्तमान शब्‍द का व्यवहार नहीं करते। वे कहते है, नित्‍य जीवन। उनका मतलब शाश्‍वत से है ...शाश्‍वत में प्रवेश करो।

5-हम समय को तीन हिस्‍सों में बांटते है ..भूत, भविष्‍य और वर्तमान। यह विभाजन सर्वथा गलत है।केवल भूत और भविष्‍य समय है, वर्तमान समय का हिस्‍सा नहीं है। वर्तमान शाश्‍वत का हिस्‍सा है। जो बीत गया वह समय है। जो आने वाला है समय

है।लेकिन जो है वह समय नहीं है। क्‍योंकि वह कभी बीतता नहीं है। वह सदा है , शाश्‍वत है।अगर तुम अतीत से चलो तो

तुम कभी वर्तमान में नहीं आते।अतीत से तुम सदा भविष्‍य में यात्रा करते हो। उसमे कोई क्षण नहीं आता जो वर्तमान हो। तुम अतीत से सदा भविष्‍य में गति करते रहते हो।वर्तमान से तुम और अधिकाधिक वर्तमान में गहरे उतरते हो। यही नित्‍य जीवन

है। इसे हम इस तरह भी कह सकते है। अतीत से भविष्‍य तक समय है। समय का अर्थ है कि तुम समतल भूमि पर और सीधी रेखा में गति करते हो।या हम उसे क्षैतिज/Horizontal कह सकते है।और जिस क्षण तुम वर्तमान में होते हो, आयाम / Dimension बदल जाता है।तुम्‍हारी गति ऊर्ध्‍वाधर/Vertical ऊपर-नीचे हो जाती है।तुम ऊपर, ऊँचाई की और जाते हो या नीचे गहराई की और जाते हो।लेकिन तब तुम्‍हारी गति क्षैतिज/Horizontal या समतल/Flat नहीं होती है।

6-भगवान शिव शाश्‍वत में रहते है, समय में नहीं।जीसस से पूछा गया कि आपके प्रभु के राज्‍य में क्‍या होगा? जो पूछ रहा था वह समय के बारे में नहीं पूछ रहा था।वह जानना चाहता था कि वहां उसकी वासनाओं का क्‍या होगा ,कैसे पूरी होंगी ,क्‍या वहां अनंत जीवन होगा या वहां मृत्‍यु भी होगी। क्‍या वहां दुःख भी रहेगा और छोटे और बड़े लोग भी होंगे।वास्तव में, वह इसी

दुनिया की बात पूछ रहा था।और जीसस ने उत्‍तर दिया कि ‘’वहां समय नहीं होगा।क्‍योंकि समय क्षैतिज है, और प्रभु का राज्‍य ऊर्ध्वगामी है। वह शाश्‍वत है। वह सदा यहां है। उसमे प्रवेश के लिए तुम्‍हें समय से हट भर जाना है''।तो प्रेम पहला द्वार है।

इसके द्वारा तुम समय के बाहर निकल सकते हो।यही कारण है कि हर व्यक्ति प्रेम चाहता है, प्रेम करना चाहता है। और कोई नहीं जानता है कि प्रेम को इतनी महिमा क्‍यों दी जाती है? प्रेम के लिए इतनी गहरी चाह क्‍यों है? और जब तक तुम यह ठीक से न समझ लो, तुम न प्रेम कर सकते हो और न पा सकते हो। क्‍योंकि इस धरती पर प्रेम गहन से गहन घटना है।

7-हम सोचते है कि हर व्यक्ति प्रेम करने को सक्षम है और इसी कारण से तुम प्रेम में निराशा होते हो। प्रेम एक और ही आयाम है। यदि तुमने किसी को समय के भीतर प्रेम करने की कोशिश की तो तुम्‍हारी कोशिश हारेगी।समय के रहते प्रेम

संभव नहीं है।उदाहरण के लिए....भक्त मीरा श्रीकृष्‍ण के प्रेम में थी।वह गृहिणी थी ;एक राजकुमार की पत्‍नी। राजा को श्रीकृष्‍ण से ईर्ष्‍या होने लगी। श्रीकृष्‍ण थे नहीं। वे शरीर से उपस्‍थित नहीं थे।श्रीकृष्‍ण और मीरा की शारीरिक मौजूदगी में पाँच हजार वर्षों का फासला था। इसलिए यथार्थ में मीरा श्रीकृष्‍ण के प्रेम में कैसे हो सकती थी।समय का अंतराल इतना लंबा था।

एक दिन राणा ने मीरा से पूछा, तुम अपने प्रेम की बात किए जाती हो, तुम श्रीकृष्‍ण के आसपास नाचती-गाती हो। लेकिन श्रीकृष्‍ण है कहां? तुम किसके प्रेम में हो? किससे सतत बातें किए जाती हो?

8-मीरा ने कहां: श्रीकृष्‍ण यहां है, तुम नहीं हो। क्‍योंकि श्रीकृष्‍ण शाश्‍वत है। वे यहां सदा थे और सदा होंगे। वे यहां है, तुम यहां नहीं हो। एक दिन तुम यहां नहीं थे, किसी दिन फिर यहां नहीं होओगे। इसलिए मैं कैसे विश्‍वास करूं कि इन दो अनस्तित्व के बीच तुम हो। दो अनस्तित्व के बीच अस्‍तित्‍व क्‍या संभव है?राणा समय में है और श्रीकृष्‍ण शाश्‍वत में है। तुम राणा के निकट हो सकते हो। लेकिन दूरी नहीं मिटाई जा सकती। तुम दूर ही रहोगे। और समय में तुम श्रीकृष्‍ण से बहुत दूर हो सकते हो, तो भी तुम उनके निकट हो सकते हो। यह आयाम ही और है। जब तुम समय में देखते हो तो वहां दीवार है। और जब तुम समय के पार देखते हो तो वहां खुला आकाश है, अनंत आकाश।प्रेम अनंत का द्वार खोल सकता है ..अस्‍तित्‍व की शाश्‍वतता का द्वार। इसलिए अगर तुमने कभी सच में प्रेम किया है तो प्रेम को ध्‍यान की विधि बनाया जा सकता है।

9-केवल बाहर रहकर प्रेमी मत बनो, प्रेमपूर्ण होकर शाश्‍वत में प्रवेश करो। जब तुम किसी को प्रेम करते हो तो क्‍या तुम वहां प्रेमी की तरह होते हो? अगर होते हो तो समय में हो, और तुम्‍हारा प्रेम झूठा है। नकली है, अगर तुम अब भी वहां हो और कहते हो कि मैं हूं तो शारीरिक रूप से नजदीक होकर भी आध्‍यात्‍मिक रूप से तुम्‍हारे बीच दो ध्रुवों की दूरी कायम रहती है।

प्रेम में तुम न रहो, सिर्फ प्रेम रहे; इसलिए प्रेम ही हो जाओ।अहंकार को बिलकुल भूल जाओ। प्रेम के कृत्‍य में धुल-मिल जाओ। कृत्‍य में इतनी गहरे समा जाओ कि कर्ता न रहे।और अगर तुम प्रेम में नहीं गहरे उतर सकते तो खाने और चलने में

गहरे उतरना कठिन होगा। बहुत कठिन होगा। क्‍योंकि अहंकार को विसर्जित करने के लिए प्रेम सब से सरल मार्ग है। इसी वजह से अहंकारी लोग प्रेम नहीं कर पाते। वे प्रेम के बारे में बातें कर सकते है ,गीत गा सकते है ,लिख सकते है; लेकिन वे प्रेम

नहीं कर सकते। क्योंकि अहंकार प्रेम नहीं कर सकता है।भगवान शिव कहते है, प्रेम ही हो जाओ।अपने को इस पूरी तरह भूल जाओ कि तुम कह सको कि मैं अब नहीं हूं, केवल प्रेम है। तब ह्रदय नहीं धड़कता है, प्रेम की धड़कता है। तब खून नहीं दौड़ता है, प्रेम ही दौड़ता है। तब आंखे नहीं देखती है, प्रेम ही देखता है। प्रेम बन जाओ और शाश्‍वत जीवन में प्रवेश करो।

'प्रेम को रूपांतरित कैसे किया जाए?'प्रेम बन जाओ''...क्या ये संभव है?-

05 FACTS;-

1-प्रेम अचानक तुम्‍हारे आयाम को बदल देता है। तुम समय से बाहर फेंक दिये जाते हो। तुम शाश्‍वत के आमने-सामने खड़े हो जाते हो। प्रेम गहरा ध्‍यान बन सकता है ..गहरे से गहरा। और कभी-कभी प्रेमियों ने वह जाना है जो संतों ने भी नहीं जाना। कभी-कभी प्रेमियों ने उस केंद्र को छुआ है जो अनेक योगियों ने नहीं छुआ।गोपियों श्रीकृष्‍ण से अपने लिए प्रेम नहीं करती

अपितु श्रीकृष्ण की सेवा के लिए, उनके सुख के लिए श्रीकृष्ण से प्रेम करती है। गोपी शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गयी है–’गो’ अर्थात् इन्द्रियां और ‘पी’ का अर्थ है पान करना अथार्त जो अपनी समस्त इन्द्रियों के द्वारा केवल भक्तिरस का ही पान करे, वही गोपी का एक अन्य अर्थ है केवल श्रीकृष्ण की सुखेच्छा।जिसका जीवन इस प्रकार का है, वही गोपी है। गोपियों की प्रत्येक इन्द्रियां श्रीकृष्ण को अर्पित हैं।गोपियों के मन, प्राण–सब कुछ श्रीकृष्ण के लिए हैं। उनका जीवन केवल श्रीकृष्ण-सुख के लिए है।

2-सम्पूर्ण कामनाओं से रहित उन गोपियों को श्रीकृष्ण को सुखी देखकर अपार सुख होता है। उनके मन में अपने सुख के लिए कल्पना भी नहीं होती। श्रीकृष्ण को सुखी देखकर ही वे दिन-रात सुख-समुद्र में डूबी रहती हैं। गोपी की बुद्धि, उसका मन, चित्त, अहंकार और उसकी सारी इन्द्रियां प्रियतम श्यामसुन्दर के सुख के साधन हैं। उनका जागना-सोना, खाना-पीना, चलना-फिरना, श्रृंगार करना, गीत गाना, बातचीत करना–सब श्रीकृष्ण को सुख पहुँचाने के लिए है।गोपियों का श्रृंगार करना भी

भक्ति है। यदि परमात्मा को प्रसन्न करने के विचार से श्रृंगार किया जाए तो वह भी भक्ति है।मीराबाई सुन्दर श्रृंगार करके गोपालजी के सम्मुख कीर्तन करती थीं।उनका भाव था–’गोपालजी की नजर मुझ पर पड़ने वाली है।इसलिए मैं श्रृंगार करती हूँ।’

3-भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन से कहा है–‘हे अर्जुन ! गोपियां अपने शरीर की रक्षा उसे मेरी वस्तु मानकर करती हैं। गोपियों को छोड़कर मेरा निगूढ़ प्रेमपात्र और कोई नहीं है।’ यही कारण है कि श्रीकृष्ण जोकि स्वयं आनन्दस्वरूप हैं, आनन्द

के अगाध समुद्र हैं, वे भी गोपीप्रेम का अमृत पीकर आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं।गोपियों के प्राण और श्रीकृष्ण में और श्रीकृष्ण के प्राण और गोपियों में कोई अंतर नहीं हैं क्योंकि वे परस्पर अपने-आप ही अपनी छाया को देखकर विमुग्ध होते हैं क्योंकि गोपियां भगवान श्रीकृष्ण की छायामूर्तियां हैं और उनका प्रेम दिव्य, अप्राकृत और अलौकिक है। भगवान श्रीकृष्ण ने गोपांगनाओं के विषय में स्वयं उद्धवजी से कहा है– ‘गोपियों ने मेरे मन और मेरे प्राण को ही अपने मन-प्राण बना लिया और मेरे लिए ही उन्होंने समस्त देह-सम्बन्धी कार्यों का त्याग कर दिया है।’

4-श्रीकृष्ण ही गोपियों के मन हैं। श्रीकृष्ण ही उनके प्राण हैं। उनके सारे कार्य सहज ही श्रीकृष्ण की प्रसन्नता और श्रीकृष्ण के सुख के लिए ही होते हैं। इसलिए गोपी को यह पता नहीं लगाना पड़ता कि भगवान किस बात से प्रसन्न होंगे। उसके अंदर

भगवान का मन ही काम करता है। श्रीकृष्ण के मथुरा से जाने के बाद जब उद्धवजी गोपियों को समझाने व्रज में आते हैं तब गोपियाँ उद्धवजी से कहती हैं–’यहां तो श्याम के सिवा और कुछ है ही नहीं; सारा हृदय तो उससे भरा है, रोम-रोम में तो वह छाया है। तुम्ही बताओ, क्या किया जाय ! वह तो हृदय में गड़ गया है और रोम-रोम में ऐसा अड़ गया है कि किसी भी तरह निकल ही नहीं पाता; भीतर भी वही और बाहर भी सर्वत्र वही। ''ऊधौ, मन न भए दस-बीस।एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, को अवराधै ईस''।अर्थात् हे उद्धव ! हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं। एक ही मन है, वह तो स्याम के संग चला गया अब वह दूसरे में कैसे रमे।गोपियों की अपने से अभिन्नता और दिव्यता बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं–''जैसा मैं वैसी तुम हो।वेद में हमारा किसी प्रकार का भेद वर्णित नहीं है। मैं तुम्हारा प्राण हूँ और तुम मेरे प्राण हो। तुम गोलोक से मेरे साथ आयी हो और मेरे साथ

ही तुम्हारा यहाँ से गमन होगा।’गोपियों ने प्रेम को रूपांतरित किया और प्रेममयी हो गई।

5-तंत्र की शिक्षा है ''काम को काम नहीं रहना है, उसे प्रेम में रूपांतरित होना ही चाहिए।और प्रेम को भी प्रेम ही नहीं रहना

है। उसे प्रकाश में , ध्‍यान के अनुभव में अंतिम, परम रहस्‍यवादी शिखर में रूपांतरित होना चाहिए।प्रेम को रूपांतरित करना है तो कृत्‍य हो जाओ और कर्ता को भूल जाओ। प्रेम करते हुए प्रेम.. महज प्रेम हो जाओ। तब यह तुम्‍हारा प्रेम मेरा प्रेम या किसी अन्‍य का प्रेम नहीं है। तब यह मात्र प्रेम है, तुम प्रेम में नहीं हो, प्रेम ने ही तुम्‍हें आत्‍मसात कर लिया है। तुम तो

अंतर्धान हो गए हो। मात्र प्रवाहमान ऊर्जा बनकर रह गए हो।काम एक निर्दोष ऊर्जा है;स्‍वयं में कुरूप नहीं है। तुम में प्रवाहित होता जीवन है, जीवंत अस्‍तित्‍व है। परंतु केवल 'काम 'शोषण का माध्यम है, और प्रेम एक भिन्‍न जगत में यात्रा है।

जिसका अर्थ है कि 'काम' को प्रेम बनना चाहिए। अगर यह यात्रा क्षणिक न रहे, अगर यह यात्रा ध्‍यान पूर्ण हो जाए, अर्थात अगर तुम अपने को बिलकुल भूल जाओ और प्रेम में विलीन हो जाओ.. गोपियों की तरह ;और केवल प्रेम प्रवाहित होता रहे,तो भगवान शिव कहते है—‘’शाश्‍वत जीवन तुम्‍हारा है।‘’

...SHIVOHAM...