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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 31वीं,32वीं विधियां(देखने की सात विधियां)का क्या विवेचन है?


विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 31;-

16 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:- ‘’एक पात्र / कटोरी को उसके किनारों और सामग्री के बिना देखो और थोड़े ही क्षणों में आत्मबोध को प्राप्त हो जाओ'' ।

2-किसी भी चीज को देखो। एक कटोरा या कोई भी चीज काम देगी। लेकिन देखने की गुणवत्‍ता भिन्‍न हो।किसी कटोरे को

उसके पार्श्‍व-भाग या पदार्थ को देखे बिना देखो।अथार्त किसी विषय को पूरा का पूरा देखो, उसे टुकड़ो में मत बांटो। क्योंकि जब तुम किसी चीज को हिस्‍सों में बांटते हो तो आंखों को हिस्‍सों में देखने का मौका मिलता है।पदार्थ को उसकी समग्रता में देखो।

3- तुम एक समूह में सभी को दो ढंग से देख सकते हो ; एक तरफ से देखते हुए आगे बढ़ सकते हो।समूह को देखने का एक ढंग है कि पहले अ को देखो , तब ब को, फिर स को, और इस तरह आगे बढ़ो । लेकिन जब अ, और ब या स को देखो तो "मैं 'उपस्‍थित नहीं रहता है । यदि उपस्‍थित भी रहे तो किनारे पर उपस्‍थित रहता है। और उस हालत में दृष्‍टि एकाग्र और समग्र नहीं रहती है। क्‍योंकि जब ब को देखते हो तो अ से हट जाते हो। और जब स को देखते हो तो में पूरी तरह खो जाते हो ... निगाह से बाहर चला जाता है।लेकिन तुम एक पूरे समूह को -व्‍यक्‍तियों में, इकाइयों में बांटे बगैर भी पूरे का पूरा देख

सकते हो ।इसका प्रयोग करो।

4-पहले किसी चीज को अंश/part में देखो।एक Part के बाद दूसरे Part को और तब अचानक उसे पूरे का पूरा देखो। उसे टुकड़ो-टुकड़ो में मत बांटो। जब तुम किसी चीज को पूरे का पूरा देखते हो, तो आंखों को गति करने की जरूरत नहीं रहती। आंखों को गति करने का मौका न मिले, इस उदेश्‍य से ही ये शर्तें रखी गई है।पदार्थ कटोरे का भौतिक भाग है।

और रूप उसका अभौतिक भाग है। और तुम पदार्थ Matter से अपदार्थ /Abstract की और गति करते हो। यह सहयोगी होगा; तुम किसी व्‍यक्‍ति या किसी फूल के साथ भी प्रयोग कर सकते हो।कमल का फूल सफेद या गुलाबी रंग का होता है और पत्ते लगभग गोल होते हैं। एक कमल को देखो और पूरे का पूरा /Overall अपनी दृष्‍टि में समेटो।

शुरू-शुरू में यह कुछ अजीब सा लगेगा। क्‍योंकि तुम इसके आदी नहीं हो। लेकिन अंत में यह बहुत सुंदर अनुभव होगा। और तब यह मत सोचो कि कमल सुंदर है या असुंदर, सफेद है या पीला। सोचो मत; सिर्फ रूप को देखो और पदार्थ को भूल जाओ।

5-'थोड़े ही क्षणों में बोध को उपलब्‍ध हो जाओ।'अथार्त तुम एकाएक स्‍वयं के प्रति, अपने प्रति बोध से भर जाओगे। किसी पदार्थ को देखते हुए तुम अपने को जान लोगे। क्‍योंकि आंखों को बाहर गति करने की गुंजाइश नहीं है। रूप को समग्रता में लिया गया है और पदार्थ को छोड़ दिया गया है। इसलिए तुम उसके अंशों में नहीं जा सकते। रूप शुद्ध है; अब तुम उसके पदार्थ सोना, चाँदी, लकड़ी वगैरह के सबंध में नहीं सोच सकते ..रूप केवल रूप है ।स्‍वय के प्रति जागना जीवन का

सर्वाधिक आनंदपूर्ण क्षण है। यही समाधि है। जब पहली बार तुम स्‍वयं के बोध से भरते हो तो उसके जो सौंदर्य, जो आनंद होता है, उसकी तुलना तुम किसी भी जानी हुई चीज से नहीं कर सकते हो। सच तो यह है कि पहली बार तुम स्‍वयं होते हो, आत्म वान होते हो। पहली बार तुम जानते हो कि मैं हूं। तुम्‍हारा होना Electric flash की तरह पहली बार प्रकट होता है।

6-उदाहरण के लिए तुमने तीर्थस्थानों में या किसी मनोविज्ञान की किताब में..(3D Effect Photo) एक बाल कृष्ण का चित्र देखा होगा। इस चित्र में, जिन रेखाओं से वह चित्र बना है, उसके भीतर ही एक दूसरा भगवान कृष्ण का चित्र भी छिपा है। चित्र एक ही है। रेखाएं भी वही है। लेकिन आकृतियां दो है ..एक बाल कृष्ण का और दूसरा युवा कृष्ण का ।उस चित्र को

देखो, तो एक साथ दोनों चित्रों को नहीं देख पाओगे। एक बार में उनमें से एक का ही बोध तुम्‍हें हो सकता है। अगर बाल कृष्ण दिखाई देगे तो वह युवा कृष्ण नहीं दिखाई देगे , वह छिपे रहेगे । तुम उन्हें ढूंढना भी चाहोगे तो कठिन होगा; प्रयास ही बाधा बन जाएगा। कारण कि तुम युवा कृष्ण के प्रति बोधपूर्ण हो गए हो, तुम उन्हें न ढूंढ सकोगे। तो इसके लिए तुम्हें एक तरकीब करनी होगी।

7-युवा कृष्ण को एकटक देखो; बाल कृष्ण को बिलकुल भूल जाओ। युवा कृष्ण विदा हो जाएगे और उसके पीछे छिपे बाल कृष्ण को तुम देख लोगे। क्‍योंकि अगर तुमने उनको ढूंढने की कोशिश की तो तुम चूक जाओगे।तुम्‍हारी आंखें किसी एक

बिन्दु पर रुकी नहीं रह सकती है। अगर तुम युवा कृष्ण के चित्र पर टकटकी लगाओगे, तो तुम्‍हारी आंखें थक जायेगी। तब वे अकस्‍मात उस चित्र से हटने लगेंगी। और इस हटने के क्रम में ही तुम दूसरे चित्र को देख लोगे। जो युवा कृष्ण के चित्र की

उन्‍हीं रेखाओं में छिपा था।लेकिन चमत्‍कार यह है कि अब तुम्‍हें बाल कृष्ण का बोध होगा तो युवा कृष्ण तुम्‍हारी आंखों से ओझल हो जाएगे। पर अब तुम्‍हें पता है कि दोनों वहां है। शुरू में तो चाहे तुम को विश्‍वास नहीं होता कि वहां एक बाल कृष्ण छिपे है। लेकिन अब तो तुम जानते हो कि बाल कृष्ण छिपे है। क्‍योंकि तुम उन्हें पहले देख चुके हो। लेकिन जब तक युवा कृष्ण को देखते रहोगे, तुम साथ-साथ बाल कृष्ण को नहीं देख सकोगे। और जब बाल कृष्ण को देखोगें तो युवा कृष्ण गायब हो जाएगे । दोनों चित्र Simultaneously नहीं देखे जा सकते। एक बार में एक ही देखा जा सकता है।

8 -बाहर और भीतर को देखने के संबंध में भी यही बात घटित होती है, तुम दोनों को एक साथ नहीं देख सकते। जब तुम कटोरे या किसी चीज को देखते हो तो तुम बाहर देखते हो। चेतना बाहर गति करती है। नदी बाहर बह रही है। तुम्‍हारा ध्‍यान कटोरे पर है; उसे एकटक देखते रहो। यह टकटकी ही भीतर जाने की सुविधा बना देगी। तुम्‍हारी आंखें थक जाएंगी। वे गति करना चाहेंगी। बाहर जाने का कोई उपाय न देखकर नदी अचानक पीछे मुड़ जाएगी। वही एकमात्र संभावना बची है। तुम ने अपनी चेतना को पीछे लौटने के लिए मजबूर कर दिया। और जब तुम अपने प्रति जागरूक होगे तो कटोरा विदा हो जाएगा। कटोरा वहां नहीं होगा।

9-यही वजह है कि आदि शंकराचार्य कहते है कि सारा जगत माया है। उन्‍होंने ऐसा ही जाना। जब हम अपने को जानते है तो जगत नहीं रहता। हकीकत में जगत माया नहीं है; वह है। लेकिन समस्‍या यह है कि तुम दोनों जगतों को एक साथ नहीं सकते हो। जब आदि शंकराचार्य अपने में प्रवेश करते है, अपनी आत्‍मा को जान लेते है, जब वे साक्षी हो जाते है। तो संसार नहीं रहता है। वे भी सही है। वे कहते है वह माया है; यह भासता/ भ्र्मित /Confuse करता है, है नहीं।तो तथ्‍य के प्रति जागों।जब तुम

संसार को जानते हो तो तुम हो, लेकिन Hidden हो; और तुम विश्‍वास नहीं कर सकते कि मैं Hidden हूं। तुम्‍हारे लिए संसार Excessive रूप में मौजूद है। और अगर तुम अपने को सीधे देखने की कोशिश करोगे तो यह कठिन होगा। प्रयत्‍न

ही बाधा बन जा सकता है।इस लिए तंत्र कहता है कि अपनी दृष्‍टि को कहीं भी संसार में, किसी भी विषय पर स्‍थित करो। और वहां से मत हटो। वहां टिके रहो। टिके रहने का यह प्रयत्‍न ही यह संभावना पैदा कर देगा कि चेतना प्रतिक्रमण/ RETROGRESSION करने लगे। तब तुम स्‍वयं के प्रति बोध से भरोंगे।

10-लेकिन जब तुम स्‍वयं के प्रति जागोगे तो कटोरा तो है लेकिन वह तुम्‍हारे लिए नहीं रहेगा। इसलिए आदि शंकराचार्य कहते है कि संसार माया है। जब तुम स्‍वयं को जान लेते हो तो जगत नहीं रहता है। स्‍वप्‍नवत विलीन हो जाता है।

लेकिन चार्वाक और मार्क्‍स.... वे भी सही है। वे कहते है कि जगत सत्‍य है और आत्‍मा मिथ्‍या है। वह कहीं मिलती नहीं है ;इसीलिए विज्ञान सही है। विज्ञान कहता है कि केवल पदार्थ है, केवल विषय है; विषयी नहीं है। वे भी सही है। क्‍योंकि उनकी आंखे अभी विषय पर टिकी है। वैज्ञानिक का ध्‍यान निरंतर विषयों से बंधा होता है। वह आत्‍मा को बिलकुल भूल बैठता है।

आदि शंकराचार्य और मार्क्‍स दोनों एक अर्थ में सही है और एक अर्थ में गलत है। अगर तुम संसार से बंधे हो, अगर तुम्‍हारी दृष्‍टि संसार पर टिकी है। तो आत्‍मा माया मालूम होगी; स्‍वप्‍न वत लगेगी। और अगर तुम भीतर देख रहे हो तो संसार स्‍वप्‍नवत हो जाएगा।

11-संसार और आत्‍मा दोनों सत्‍य है। लेकिन दोनों के प्रति Simultaneously सजग नहीं हुआ जा सकता।यही समस्‍या है, और इसमे कुछ भी नहीं किया जा सकता। या तो तुम युवा कृष्ण से मिलोंगे या बाल कृष्ण से। उनमें से एक सदा माया रहेगी।

यह विधि सरलता से उपयोग की जा सकती है। और यह थोड़ा समय लेगी। लेकिन यह कठिन नहीं है। एक बार तुम चेतना की प्रतिगति को, पीछे लौटने की प्रक्रिया को ठीक से समझ लो, तो इस विधि का प्रयोग कहीं भी कर सकते हो। किसी बस या रेलगाड़ी से यात्रा करते हुए भी यह संभव है। कही भी संभव है। और कटोरा या किसी खास विषय की जरूरत नहीं है। किसी भी चीज से काम चलेगा। किसी भी चीज को एकटक देखते रहो। देखते ही रहो। और अचानक तुम भीतर मुड़ जाओगे और रेलगाड़ी या बस खो जाएगी।एक सदा माया रहेगी।

12-निश्‍चित ही तब तुम अपनी आंतरिक यात्रा से लौटोगे तो तुम्‍हारी बाहरी यात्रा भी काफी हो चुकेगी। लेकिन रेलगाड़ी खो जायेगी। तुम एक स्‍टेशन से दूसरे स्‍टेशन पहुंच जाओगे। और उनके बीच रेलगाड़ी नहीं, अंतराल रहेगा। रेलगाड़ी तो थी; अन्‍यथा तुम दूसरे स्‍टेशन पर कैसे पहुंचते। लेकिन वह तुम्‍हारे लिए नहीं थी।जो लोग इस विधि का प्रयोग कर सकते

है वह इस संसार में सरलता से रह सकते है। याद रहे, वे किसी भी क्षण किसी भी चीज को गायब करा सकते है। यदि तुम किसी से तंग आ गए हो,तो तुम उसे विलीन करा सकते हो। वह तुम्‍हारे बगल में ही बैठा है, और वह नहीं है। यह माया हो गई है..Hidden हो गई है। सिर्फ टकटकी बांधकर और अपनी चेतना को भीतर ले जाकर उसे तुम अपने लिए अनुपस्‍थित कर सकते हो और ऐसा कई बार हुआ है।

13-उदाहरण के लिए,सुकरात की पत्‍नी जेनथिप्‍पे उसके लिए बहुत चिंतित रहा करती थी।सुकरात शिक्षक के रूप में ठीक

है; लेकिन सुकरात को पति के रूप में बर्दाश्‍त करना महा कठिन काम है।एक दिन की इस घटना के चलते सुकरात की पत्‍नी दो हजार वर्षों से निरंतर निंदित रही है। सुकरात बैठा था और उसने शायद इस विधि जैसा ही कुछ किया होगा। इसका उल्‍लेख नहीं है; उसकी पत्‍नी उसके लिए ट्रे में चाय लेकर आई। उसने देखा सुकरात वहां नहीं है और इसलिए, कहा जाता है कि, उसने सुकरात के चेहरे पर चाय उड़ेल दी। और अचानक वह वापस आ गया। आजीवन उसके चेहरे पर जलने के दाग

पड़े रहे।इस घटना के कारण सुकरात की पत्‍नी बहुत निंदित हुई। लेकिन कोई नहीं जानता है कि सुकरात उस समय क्‍या कर रहा था। क्‍योंकि कोई पत्‍नी अचानक ऐसा नहीं कर सकती। कोई ऐसी बात अवश्‍य हुई होगी। जिस वजह से जेनथिप्‍पे को उस पर चाय उड़ेल देनी पड़ी। वह जरूर किसी आंतरिक समाधि में चला गया होगा। और गरम चाय की जलन के कारण समाधि से वापस लोटा होगा। इस जलन के कारण ही उसकी चेतना लौटी होगी।

14-ऐसा हुआ होगा, क्‍योंकि सुकरात के संबंध में ऐसी ही अनेक घटनाओं का उल्‍लेख मिलता है। एक बार ऐसा

हुआ कि सुकरात अड़तालीस घंटे तक लापता रहा। सब जगह उसकी खोजबीन की गई। सारा एथेंस सुकरात को तलाशता रहा। लेकिन वह कहीं नहीं मिला। और जब मिला तो वह नगर से बहुत दूर किसी वृक्ष के नीचे खड़ा था। उसका आधा शरीर बर्फ से ढक गया था। बर्फ गिर रही थी और वह बर्फ हो गया था। वह खड़ा था और उसकी आंखें खुली थी। लेकिन वे आंखें

किसी भी चीज को देख नहीं रही थी।जब लोग उसके चारों और जमा हो गए और उन्‍होंने उसकी आंखों में झाँका तो उन्‍हें लगा कि वह मर गया है। उसकी आंखें पत्‍थर जैसी हो गई थी। वे देख रही थी पर किसी खास चीज को नहीं देख रही थी। वे स्‍थिर थी, अचल थी। फिर लोगों ने उसकी छाती पर हाथ रखा और तब उन्‍हें भरोसा हुआ कि वह जीवित है।

15-तब उन्‍होंने उसे हिलाया-डुलाया और उसकी चेतना वापस लौटी।होश में आने पर उससे पूछताछ की गई। पता चला कि अड़तालीस घंटों से वह यहां था और उसे इन घंटों का पता ही नहीं चला। मानो ये घंटे उसके लिए घटित नहीं हुए। इतनी देर वह देश काल से इस जगत में नहीं था। तो लोगों ने पूछा कि तुम इतनी देर से क्‍या कर रहे थे। हम तो समझे कि तुम मर

गए...अड़तालीस घंटे।सुकरात ने कहा: ‘’मैं तारों को एकटक देख रहा था और तब अचानक ऐसा हुआ कि तारे खो गए। और तब, मैं नहीं कह सकता, सारा संसार ही विलीन हो गया। लेकिन शीतल, शांत और आनंदपूर्ण अवस्‍था में रहा कि अगर उसे मृत्‍यु कहा जाए तो वह मृत्‍यु हजारों जिंदगी के बराबर है। अगर यह मृत्‍यु है तो मैं बार-बार मृत्‍यु में जाना पसंद करूंगा।

संभव है, यह बात उसकी जानकारी के बिना घटित हुई हो; क्‍योंकि सुकरात सचेतन रूप से किसी आध्‍यात्‍मिक साधना से संबंधित नहीं था। लेकिन वह बड़ा चिंतक था। और हो सकता है यह बात आकस्‍मिक घटित हुई हो कि रात में तारों को देख रहा हो और अचानक उसकी निगाह अंतर्मुखी हो गई हो।

16-तुम भी यह प्रयोग कर सकते हो। तारे अद्भुत है और सुंदर है। जमीन पर लेट जाओ, अंधेरे आसमान को देखो और तब अपनी दृष्‍टि को किसी एक तारे पर स्‍थिर करो। उस पर अपने को एकाग्र करो। उस पर टकटकी बाँध दो। अपनी चेतना को समेटकर एक ही तारे को साथ जोड़ दो; शेष तारों को भूल जाओ। धीरे-धीरे अपनी दृष्‍टि को समेटो, एकाग्र करो।

दूसरे सितारे दूर हो जाएंगे। और धीरे-धीरे विलीन हो जायेगे। और सिर्फ एक तारा बच रहेगा। उसे एकटक देखते जाओ। देखते जाओ। एक क्षण आएगा जब वह तारा भी विलीन हो जाएगा। और जब वह तारा विलीन होगा तब तुम्‍हारा स्‍वरूप तुम्‍हारे सामने प्रकट हो जाएगा।

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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि 32;-

08 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-

'किसी सुंदर व्यक्ति या सामान्य विषय को ऐसे देखो , जैसे उसे पहली बार देख रहे है''।

2-पहले कुछ बुनियादी बातें समझ लो, तब इस विधि का प्रयोग कर सकते हो। हम सदा चीजों को पुरानी आंखों से देखते है। तुम अपने घर आते हो तो तुम उसे देखे बिना ही देखते हो। तुम उसे जानते हो, उसे देखने की जरूरत नहीं है। वर्षों से तुम इस घर में सतत आते रहे हो। तुम सीधे दरवाजे के पास आते हो, उसे खोलते हो और अंदर दाखिल हो जाते हो। उसे देखने की

क्‍या जरूरत है?यह पूरी प्रक्रिया यंत्र-मानव जैसी, रोबोट जैसी है। पूरी प्रक्रिया यांत्रिक है, अचेतन है। यदि कोई चूक हो जाए

ताले में कुंजी न लगे , तो तुम ताले पर दृष्‍टि डालते हो। कुंजी जब जाए तो ताले को क्‍या देखना।यांत्रिक आदत के कारण, एक ही चीज को बार-बार दुहराने के कारण तुम्‍हारी देखने की क्षमता नष्‍ट हो जाती है। तुम्‍हारी दृष्‍टि का ताजापन जाता रहता है।

3-सच तो यह है कि तुम्‍हारी आँख का काम ही खत्‍म हो जाता है। इस बात को ख्‍याल में रख लो वर्ना तुम बुनियादी रूप से अंधे हो जाते हो। आँख की जरूरत ही नहीं रहती।स्‍मरण करो कि तुमने अपनी माता- पिता को, बहन को ,पिछली दफा कब देखा ...कितने वर्ष हो गये अपनो को देखे। । संभव है, तुम्‍हें अपनी पत्‍नी या पति को देखे वर्षों हो गए हो। हालांकि दोनों साथ ही रहते हो।तुम एक दूसरे पर भागती नजर डालकर निकल जाते हो। लेकिन कभी पूरी निगाह नहीं डालते। तो जाओ और

अपनो को ऐसे देखो जैसे कि पहली बार देख रहे हो। क्‍योंकि जब तुम पहली बार देखते हो तो तुम्‍हारी आंखों में ताजगी होती है। तुम्‍हारी आंखें जीवंत होती है क्‍योंकि पहली बार ही आंखों की जरूरत पड़ती है। दूसरी बार उतनी नहीं और तीसरी बार बिलकुल नहीं। कुछ पुनरूक्तियां/ Revivals के बाद हम अंधे ही जीते है।

4-जरा होश से देखो कि जब तुम अपने बच्‍चें से मिलते हो, क्‍या तुम उन्‍हें देखते भी हो?वास्तव में, तुम उन्‍हें नहीं देखते। नहीं देखने की आदत आंखों को मुर्दा बना देती है। आंखें ऊब जाती है; थक जाती है। उन्‍हें लगता है कि पुरानी चीज को ही बार-बार

क्‍या देखना।सच्‍चाई यह है कि कोई भी पुरानी नहीं है, तुम्‍हारी आदत के कारण ऐसा दिखाई पड़ता है। कोई भी वही नहीं है जो कल था ; हो नहीं सकता, अन्‍यथा वह चमत्‍कार है। दूसरे क्षण कोई भी चीज वही नहीं रहती जो थी। जीवन एक प्रवाह है।

सब कुछ बहा जा रहा है। कुछ भी तो वही नहीं है। वही सूर्य कल नहीं होगा ..जो आज ऊगा है।वास्तव में, सूरज कल वही नहीं रहेगा।हर रोज वह नया है...उसमें बुनियादी बदलाहट हो रही है। आकाश भी कल वही नहीं था। आज की सुबह कल नहीं आयेगी। और प्रत्‍येक सुबह की अपनी निजता है, अपना व्‍यक्‍तित्‍व है। आसमान और उसके रंग फिर उसी रूप में प्रकट नहीं होंगे।

5-लेकिन तुम ऐसे जीते हो जैसे कि सब कुछ वही का वही है। कहते है कि आसमान के नीचे कुछ भी नया नहीं है। लेकिन सचाई यह नहीं है। सच्‍चाई यह है कि आसमान के नीचे कुछ भी पुराना नहीं है। सिर्फ तुम्‍हारी आंखें पुरानी हो गई है। चीजों की

आदत हो गई है। तब कुछ नहीं है।बच्‍चों के लिए सब कुछ नया है। इसलिए उन्‍हें सब कुछ Motivate करता है। सुबह का सूरज, समुद्र-तट पर एक रंगीन पत्‍थर। किसी लकड़ी को टुकड़े को देख कर भी वह मचल उठता है। और तुम स्‍वंय भगवान को भी अपने घर आते देख कर भी Motivate नहीं होते। तुम कहोगे, कि मैं उन्‍हें जानता हूं, मैंने उनके बारे में पढ़ा है। बच्‍चे Motivate होते है। क्‍योंकि उनकी आंखें नई और ताजा है। और हरेक चीज एक नई दुनिया है, नया आयाम है। बच्‍चों की आंखों को देखो। उनकी ताजगी उनकी प्रभा पूर्ण सजीवता, उनकी जीवंतता को देखो। वे दर्पण जैसी है—शांत, किंतु गहरे जाने

वाली और ऐसी आंखें ही भीतर पहुंच सकती है।यह विधि कहती है: ‘’किसी सुंदर व्‍यक्‍ति या सामान्‍य विषय को ऐसे देखो जैसे उसे पहली बार देख रहे हो।‘’

6-कोई भी चीज काम देगी। अपने जूतों को ही देखो। तुम वर्षों से उनका इस्‍तेमाल कर रहे हो। आज उन्‍हें ऐसे देखो जैसे कि पहली बार देख रहे हो और फर्क को समझो। उस जूते में में सब कुछ है—उसके पहनने वाले का संपूर्ण जीवन-चरित्र। तुम्‍हारी

चेतना की गुणवत्‍ता अचानक बदल जाती है।इस बात को ख्‍याल में रख लो कि किसी चीज को ऐसे देखना है जैसे कि पहली बार देख रहे हो। और तब अचानक किसी समय तुम चकित रह जाओगे। कि कैसा सौंदर्य भरा हुआ है संसार में।

ऊर्जा की वह लहर, आकर्षण की वह पूर्णता तुम्‍हें अभिभूत कर देती है। लेकिन ‘’किसी सुंदर वस्तु या सामान्‍य विषय को ऐसे

देखो जैसे कि पहली बार देख रहे हो। उससे तुम्‍हारी दृष्‍टि तुम्हें वापस मिल जायेगी।अभी तुम जैसे हो;अंधे हो। और वह अंधापन शारीरिक अंधेपन से ज्‍यादा घातक है; क्‍योंकि आँख के रहते हुए भी तुम नहीं देख सकते।वह विधि तुम्‍हारी

आंखों को इतना ताजा और जीवंत बना देगी कि वे भीतर मुड़ सकें और तुम अपने अंतरस्‍थ को देख लो। लेकिन ऐसे देखो, मानों पहली बार देख रहे हो।

7- एक चित्रकार होने के लिए बच्‍चे की दृष्‍टि की ताजगी फिर से प्राप्‍त करनी होती है। तभी वह किसी चित्र को देख सकता है। छोटी से छोटी चीज को भी देख सकता है और केवल वही देख सकता है।प्रत्‍येक क्षण अपने को अतीत से तोड़ते चलो।

अतीत को अपने भीतर प्रवेश मत करने दो .. मत ढ़ोओ , छोड़ दो। और प्रत्‍येक चीज को ऐसे देखो जैसे कि पहली बार

देख रहे हो। तुम्‍हें तुम्‍हारे अतीत से मुक्‍त करने की यह एक बहुत कारगर विधि है।इस विधि के प्रयोग से तुम सतत वर्तमान में जीने लगोगे। और धीरे-धीरे वर्तमान के साथ तुम्‍हारी घनिष्‍ठता बन जाएगी। तब हरेक चीज नई होगी। और तब तुम इस कथन

को ठीक से समझ सकोगे ''कि तुम एक ही नदी में दोबारा नहीं उतर सकते।तुम एक ही व्‍यक्‍ति को दुबारा नहीं देख सकते। क्‍योंकि जगत में कुछ भी स्‍थायी नहीं है। हर चीज नदी की भांति प्रवाहमान है। यदि तुम अतीत से मुक्‍त हो जाओ और तुम्‍हें वर्तमान को देखने की दृष्‍टि मिल जाए तो तुम अस्‍तित्‍व में प्रवेश कर जाओगे। और यह प्रवेश दोहरा होगा। तुम प्रत्‍येक चीज में, उसके अंतरतम/ Innermost में प्रवेश कर सकोगे; और तुम अपने भीतर भी प्रवेश कर सकोगे।

8-वर्तमान द्वार है और सभी ध्‍यान किसी न किसी रूप में तुम वर्तमान से जोड़ने की चेष्‍टा करते हो। ताकि तुम वर्तमान में जी सको।तो वह विधि सर्वाधिक सुंदर विधियों में से एक है और सरल भी है। और तुम इसका प्रयोग बिना किसी हानि के

कर सकते हो।तुम किसी गली से दूसरी बार गुजर रहे हो। लेकिन अगर उसे ताजा आंखों से देखते हो तो वही गली नई

गली हो जाएगी। तब मिलने पर एक मित्र भी अजनबी मालूम पड़ेगा। लेकिन क्‍या तुम कह सकते हो कि तुम उससे परिचित

हो।वह अभी भी अजनबी है।तुम सब अजनबी एक साथ रह रहे हो। तुम सब एक दूसरे की बाह्य आदतों को, बाहरी प्रतिक्रिया

को जानते हो; लेकिन अस्‍तित्‍व का अंतरस्‍थ अभी भी अपरिचित है, अस्‍पर्शित है। यह प्रयोग तुम्‍हारी दृष्‍टि को ताजगी से भर देगा। तुम्‍हारी आंखें निर्दोष हो जाएगी। वे निर्दोष आंखें ही देख सकती है और वे निर्दोष ही अंतरस्‍थ जगत में प्रवेश कर सकती है।

..SHIVOHAM...