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समाधि का क्या रहस्य है?आत्म-साक्षात्कार का क्या अर्थ होता है ?-PART 04


आत्म-साक्षात्कार का क्या अर्थ होता है ?-

38 FACTS;-

1-आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है .. ''अहंकार का संपूर्ण तिरोहित हो जाना''। और अहंकार के साथ , हर चीज तिरोहित हो जाती है।ध्यान रहे ,अहंकार

स्वप्नों की व्याख्या द्वारा तिरोहित नही हो सकता है । इसके विपरीत , अहंकार ज्यादा मजबूत हो सकता है , क्योंकि चेतन और अचेतन के बीच का अंतराल कम होगा।मन में जितनी कम तकलीफ होती है ,उतना ज्यादा मजबूत हो जाता है ..मन। निस्संदेह पहले की अपेक्षा आप संसार में बेहतर ढंग से जी पाओगे , क्योंकि संसार अहंकार में ज्यादा विश्वास रखता है । जीवित रहने के संघर्ष में लड़ने के लिए आप ज्यादा सक्षम हो जाओगे ; स्वयं के बारे में आप ज्यादा आश्वस्त हो जाओगे , कम घबराओगे।

2-थियोसोफी तथा थियोसोफिकल सोसायटी की संस्थापिका मादाम हैलीना ब्लावाट्स्की (Helena Petrovna Blavatsky) एक रहस्यदर्शी थीं। वह अतीत और भविष्य दोनों को क्षण में ही जानने की क्षमता से संपन्न थीं। दुनिया भर के धर्म और उनकी परंपरा से जुड़ी ब्लावाट्स्की ने भारतीय धर्म और दर्शन के मर्म को समझकर भारतीयों को आध्यात्मिक रूप से जगाने का प्रयास किया।अपने विश्व भ्रमण के दौरान 1852 में वे पहली बार भारत आई और यहाँ थोड़े दिन रुककर ऋषि परंपरा वाले ब्रह्मज्ञान की संपन्नता से अवगत होकर चली गई थीं।

2- मादाम ब्लावाट्स्की के अनुसार;-

''और यदि तू सातवां द्वार भी पार कर गया, तो क्या तुझे अपने भविष्य का पता है? आनेवाले कल्पों में स्वेच्छा से जीने के लिए तू बाध्य होगा, लेकिन मनुष्यों द्वारा न देखा जाएगा, और न उनका धन्यवाद ही तुझे मिलेगा।’'

3-बोधिसत्व की जो स्थिति है उसे समझने पर, यह सूत्र समझ में आएगा।

बोधिसत्व शरीर से मुक्त हो जाता है ;जगत उसे देख नहीं पाता, लेकिन वह जगत को देख पाता है। जगत उसे समझ नहीं पाता, लेकिन वह जगत को समझ पाता है।और जगत को न मालूम कितने उपायों से वह सहायता भी पहुंचाता है।उसका कोई धन्यवाद भी उसे नहीं मिलता है। मिलने का कोई कारण भी नहीं, क्योंकि जिन्हें सहायता पहुंचाई जाती है, वे उसे देख भी नहीं सकते हैं।

4-यह सूत्र कह रहा है: अगर तू सातवां द्वार भी पार कर गया, तो फिर एक धन्यवाद-रहित कार्य में तुझे पड़ जाना होगा। कोई तुझे धन्यवाद भी न देगा, कोई जानेगा भी नहीं कि तूने क्या किया, कोई पहचानेगा भी नहीं। कहीं लिपिबद्ध न होगी तेरी बात। जो सहायता तूने पहुंचाई है, उसे तू ही जानेगा; वे भी नहीं जानेंगे, जिन्हें सहायता पहुंचाई गई।स्वभावतः ऐसे

कृत्य में कोई तभी उलझ सकता है, जब उसकी अस्मिता पूरी मिट गई हो।

5-अहंकार तो एक ही बात में उत्सुक होता है कि मैं जाना जाऊं, माना जाऊं, कोई धन्यवाद स्वीकार करे, कोई अनुगृहीत हो। बोधिसत्व की अवस्था तो उपलब्ध ही होती है अहंकार के मिट जाने के बाद। तो अब यह सवाल नहीं है कि जिसको सहायता दी है, वह अनुगृहीत हो। अब तो सहायता देना ही अपने आप में पर्याप्त है। लेकिन यह सूत्र एक बात और कहता है, जो बड़ी अजीब और बड़ी विरोधाभासी है।

6-यह सूत्र कहता है: आनेवाले कल्पों में स्वेच्छा से जीने के लिए तू बाध्य

होगा।यह बड़ी उल्टी बात है--स्वेच्छा से जीने के लिए बाध्य! कोई तुझे मजबूर नहीं करेगा कि तू बोधिसत्व बन; कोई तुझे जोर-जबरदस्ती नहीं करेगा कि तू मनुष्यों की सेवा में लग, कि सोए हुए को जगा, कि भटके हुए को मार्ग पर ला; कोई तुझे बाध्य नहीं करेगा। तू चाहे तो खो सकता है महाशून्य में; तू चाहे तो लग सकता है इस महाकार्य में, महाकरुणा के कार्य में। इसलिए बड़े उल्टे शब्दों का प्रयोग किया है--स्वेच्छा से जीने को बाध्य होगा। लेकिन तेरी स्व-इच्छा ही तुझसे कहेगी कि तू जी,रुक, ठहर; खो मत जा, उनके काम पर अभी जिन्हें जरूरत है। यह तेरी स्वेच्छा की ही बाध्यता होगी।

7-बाध्यता तो होती है हमेशा अपनी मर्जी के बिना, कोई और जबरदस्ती करता है।. प्रबोधयुक्तता /चैतन्य अवस्था के लिए या प्रबुद्ध की स्थिति में कोई जबरदस्ती प्रकृति की नहीं रह जाती। परमात्मा का भी कोई आग्रह नहीं रह जाता है--नियम के बाहर हो गया वह व्यक्ति। उसे अब चलाया नहीं जा सकता। वह चलना चाहे, तो चल सकता है। उसे रोका नहीं जा सकता, वह रुकना चाहे तो रुक सकता है।हम सब इस जगत में चलते हैं कार्य

और कारण के नियम में बंधे।

8- हम जो भी कर रहे हैं, वह हमें लगता है कि हम कर रहे हैं; लेकिन हम करते नहीं, हमसे करवाया जाता है। जब आपको क्रोध होता है तो क्या आपको लगता है कि आप क्रोध करते हैं?सच में तुम क्रोध नहीं करते हो।अगर तुम ही करते हो तो रोक सकते हो। लेकिन क्रोध कौन करता है, वह तो जैसे अवश,स्वेच्छा के विपरीत, मजबूरी में किया जाता है। आपसे करवा लिया जाता है, आप करते नहीं हो। करते होते, तब तो मालिक थे।

9-तो इसे ऐसा समझें कि अगर आपसे कोई कहे कि अभी क्रोध करके दिखाएं, तो आप क्रोध न कर सकेंगे। तो आप करते हैं, इस भ्रांति में मत रहना। और जब क्रोध हो रहा है, तब कोई कहे कि इसी वक्त रुक जाएं, तब आप रुक न सकेंगे। तब क्रोध आपको चला रहा है, आप क्रोध को चलाते हैं, ऐसा नहीं है।और आप सोच रहे हैं कि मैं कर रहा हूं। अगर आप कर रहे होते--तो आप रोक कर देखिए, तो पता चल जाएगा। क्योंकि जो भी आप करते हैं, वह आप रोक सकते हैं।जिसे हम रोक नहीं सकते, उसे हम कर रहे हैं, यह भ्रांति है।जो हमारे

वश में नहीं है, हम उसके वश में हैं।पर आदमी के अहंकार को चोट लगती है।

10-इस देश के योगियों ने तो सदा कहा है कि आदमी भी प्रकृति के कार्य-कारण से बंधा चल रहा है। इसको हम नियति कहते हैं, भाग्य कहते हैं। आपके किए कुछ नहीं हो रहा है।और जब यह कहा कि परमात्मा की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, तो उसका मतलब यह है कि आप अपनी मर्जी की बातें छोड़ दें; यह प्रकृति का विराट नियम ही सब हिला रहा है। पत्ता भी हिलता है, तो उस विराट नियम से हिलता है। आप इसमें बीच में अपने 'मैं' को खड़ा मत करें। अगर यह भी खयाल में आ जाए, तो आपकी जिंदगी में क्रांति हो जाएगी। तब आप यह नहीं कहेंगे कि मैं क्रोध करता हूं। आप यही कहेंगे कि क्रोध होता है, प्रेम होता है, घृणा होती है, सुख होता है, दुख होता है।

11-अगर यह बात आपको बिलकुल साफ समझ में आ जाए कि आपके भीतर भी प्रकृति के अंधे नियम काम कर रहे हैं,और आप उनके मालिक नहीं हैं, तो मालकियत की पहली किरण आपके भीतर पैदा हो गई। यह समझ भी लेना कि मैं गुलाम हूं, मालकियत की शुरुआत है। और गुलाम अपने को यह समझ रहे हैं कि मैं तो मालिक हूं, तो फिर उसकी मालकियत कभी भी तय नहीं हो सकती क्योंकि वह भ्रांति में ही मरेगा।

12-प्रबोधयुक्तता हमसे बिलकुल दूसरा छोर है, जहां नियम धक्का देना बंद कर देते हैं, जहां पानी गरम करके भाप नहीं बनाया जा सकता, जहां पानी ठंडा करके बर्फ नहीं बनाया जा सकता। बोधिसत्व अहंकार के छूटते ही, विराग के जन्मते ही, ध्यान की उपलब्धि पर, प्रज्ञा की किरण के पैदा होते ही--धीरे-धीरे-धीरे जिस जगत में काम होता है नियमों का, उसके पार हो रहा है,स्वेच्छा के जगत में प्रवेश कर रहा है।

13-गौतम बुद्ध के जीवन की बड़ी मीठी कथा है। जब उनका जन्म हुआ, तो ज्योतिषियों ने कहा कि यह व्यक्ति या तो सम्राट होगा या संन्यासी होगा। सब लक्षण सम्राट के थे। फिर गौतम बुद्ध तो भिक्षु हो गए, संन्यासी हो गए। और सम्राट साधारण नहीं, चक्रवर्ती सम्राट होगा, सारी पृथ्वी

का सम्राट होगा।गौतम बुद्ध एक नदी के पास से गुजर रहे हैं, निरंजना नदी के पास से गुजर रहे हैं। रेत पर उनके चिह्न बन गए, गीली रेत है,तट पर उनके पैर के चिह्न बन गए।

14-एक ज्योतिषी काशी से लौट रहा था। अभी-अभी ज्योतिष पढ़ा है। यह सुंदर पैर रेत पर देख कर उसने गौर से नजर डाली। पैर से जो चिह्न बन गया है नीचे, वह खबर देता है कि चक्रवर्ती सम्राट का पैर है। ज्योतिषी बहुत चिंतित हो गया। चक्रवर्ती सम्राट का अगर यह पैर हो, तो यह साधारण सी नदी के रेत पर चक्रवर्ती चलने क्यों आया?और वह भी नंगे पैर चलेगा कि उसके पैर का चिह्न रेत पर बन जाए! बड़ी मुश्किल में पड़ गया। सारा ज्योतिष पहले ही कदम पर व्यर्थ होता मालूम पड़ा। अभी-अभी लौटा था निष्णात होकर ज्योतिष में। अपनी पोथी, अपना शास्त्र साथ लिए हुए था। सोचा, इसको नदी में डुबा कर अपने घर लौट जाऊं, क्योंकि अगर इस पैर का आदमी इस रेत पर भरी दुपहरी में चल रहा है नंगे पैर--और इतने स्पष्ट लक्षण तो कभी युगों में किसी आदमी के पैर में होते हैं कि वह चक्रवर्ती सम्राट हो--तो सब हो गया व्यर्थ। अब किसी को ज्योतिष के आधार पर कुछ कहना उचित नहीं है।

15-लेकिन इसके पहले कि वह अपने शास्त्र फेंके, उसने सोचा, जरा देख भी तो लूं, चल कर इन पैरों के सहारे, वह आदमी कहां है। उसकी शक्ल भी तो देख लूं। यह चक्रवर्ती है कौन, जो

पैदल चल रहा है!तो उन पैरों के सहारे वह गया। एक वृक्ष की छाया में गौतम बुद्ध विश्राम कर रहे थे। और भी मुश्किल में पड़ गया, क्योंकि चेहरा भी चक्रवर्ती का था, माथे पर निशान भी चक्रवर्ती के थे।गौतम बुद्ध की आंखें बंद थीं, उनके दोनों हाथ उनकी पालथी में रखे थे;हाथ पर नजर डाली, हाथ भी चक्रवर्ती का था। यह देह, यह सब ढंग चक्रवर्तियों का, और आदमी भिखारी था, भिक्षा का पात्र रखे, वृक्ष के नीचे बैठा था, भरी दुपहरी में अकेला था।

16-हिला कर गौतम बुद्ध को उसने कहा कि महानुभाव, मेरी वर्षों की मेहनत व्यर्थ किए दे रहे हैं--ए सब शास्त्र नदी में फेंक दूं, या क्या करूं? मैं काशी से वर्षों से मेहनत करके, ज्योतिष को सीख करके लौट रहा हूं। और तुममें जैसे पूरे लक्षण प्रगट हुए हैं, ऐसे सिर्फ उदाहरण मिलते हैं ज्योतिष के शास्त्रों में। आदमी तो कभी-कभी हजारों-लाखों साल में ऐसा मिलता है। और पहले ही कदम पर तुमने मुझे मुश्किल में डाल दिया। तुम्हें होना चाहिए चक्रवर्ती सम्राट और तुम यह भिक्षापात्र रखे इस वृक्ष के नीचे क्या कर रहे हो?

17-तो बुद्ध ने कहा कि शास्त्रों को फेंकने की जरूरत नहीं है, तुझे ऐसा आदमी दुबारा जीवन में नहीं मिलेगा। जल्दी मत कर,तुझे जो लोग मिलेंगे, उन पर तेरा ज्योतिष काम करेगा। तू संयोग से, दुर्घटनावश ऐसे आदमी से मिल गया है, जो भाग्य की सीमा के बाहर हो गया है। लक्षण बिलकुल ठीक कहते हैं। जब मैं पैदा हुआ था, तब यही होने की संभावना थी। अगर मैं बंधा हुआ चलता प्रकृति के नियम से तो यही हो जाता। तू चिंता में मत पड़, तुझे बहुत बुद्ध-पुरुष नहीं मिलेंगे जो तेरे नियमों को तोड़ दें। और जो अबुद्ध है, वह नियम के भीतर है। और जो अजाग्रत है, वह प्रकृति के बने हुए नियम के भीतर है। जो जाग्रत है, वह नियम के बाहर है।

18-जाग्रत व्यक्ति का संकल्प होता है, उसकी स्वेच्छा होती है, वह जो चाहे करे। इसलिए यह सूत्र बड़े मजे की बात कहता है। यह कहता है, स्वेच्छा से जीने के लिए तू बाध्य होगा। कोई तुझे बाध्य न कर सकेगा कि रुक और सेवा कर, रुक और करुणा से लोगों को जगा; और सोए, पीड़ित, दुखी, विक्षिप्त लोगों की बीमारी दूर कर, उनके लिए औषधि बन, उनके लिए चिकित्सक बन। कोई तुझे बाध्य न करेगा, लेकिन तू स्वयं ही बाध्य होगा। यह तेरी स्वेच्छा ही होगी, तू स्वयं ही चुनेगा कि मैं रुक जाऊं।

19-"लेकिन तू मनुष्यों के द्वारा न देखा जाएगा, और न उनका धन्यवाद ही तुझे मिलेगा। और अभिभावक-दुर्ग को बनानेवाले अन्य अनगिनत पत्थरों के बीच तू भी एक पत्थर बन कर जीएगा। करुणा के अनेक गुरुओं के द्वारा निर्मित ,उनकी यातनाओं के सहारे ऊपर उठा और उसके रक्त से जुड़ा यह दुर्ग मनुष्य-जाति की रक्षा करता है। क्योंकि मनुष्य मनुष्य है, इसलिए यह उसे भारी विपदाओं और शोक से बचाती है।’

20-यह एक प्रतीक है सत्य समझने योग्य। पहली तो बात यह है कि प्रबोधयुक्तता का कृत्य दिखाई नहीं पड़ता। प्रबोधयुक्तता भी दिखाई पड़ जाए, तो भी उसका कृत्य दिखाई नहीं पड़ता।वह जो कर रहा है, वह आपके अचेतन में वहां काम कर रहा है, जहां का आपको भी पता नहीं है। उसके करने के अपने रास्ते हैं।

20-तिब्बत में एक शब्द है "तुलकू'। ब्लावट्स्की को भी तिब्बत में "तुलकू' ही कहा जाता है। "तुलकू' का अर्थ होता है ऐसा कोई व्यक्ति, जो किसी प्रबोधयुक्तता/बोधिसत्व के प्रभाव में इतना समर्पित हो गया है कि बोधिसत्व उसके द्वारा काम कर सके। ब्लावट्स्की तुलकू बन सकी। स्त्री थी, इसलिए आसानी से बन सकी; समर्पित थी। जो लोग ब्लावट्स्की के पास रहते थे, वे लोग चकित होते थे। जब वह लिखने बैठती थी, तो आविष्ट होती थी, पजेस्ड होती थी।

21-लिखते वक्त उसके चेहरे का रंग-रूप बदल जाता था। आंखें किसी और लोक में चढ़ जाती थीं। और जब वह लिखने बैठती थी तो कभी दस घंटे, कभी बारह घंटे लिखती ही चली जाती थी। पागल की तरह लिखती थी। कभी काटती नहीं थी, जो लिखा था उसको। यह कभी-कभी होता था। जब वह खुद लिखती थी, तब उसे बहुत मेहनत करनी पड़ती थी।

22-तो उसके संगी-साथी उससे पूछते थे, यह क्या होता है? तो वह कहती थी कि जब मैं "तुलकू' की हालत में होती हूं, तब मुझसे कोई लिखवाता है। थियोसाफी में उनको मास्टर्स कहा गया है। कोई सदगुरु लिखवाता है, मैं नहीं लिखती; मेरे हाथ किसी के हाथ बन जाते हैं; कोई मुझमें आविष्ट हो जाता है, और तब लिखना शुरू हो जाता है, तब मैं अपने वश में नहीं होती, मैं सिर्फ वाहन होती हूं। यह पुस्तक भी ऐसे ही वाहन की अवस्था में उपलब्ध हुई है।

23-कभी-कभी ऐसा होता था कि कुछ लिखा जाता था और उसके बाद महीनों तक वह अधूरा ही पड़ा रहता था। संगी-साथी ब्लावट्स्की के कहते कि वह पूरा कर डालो, जो अधूरा पड़ा है। वह कहती, कोई उपाय नहीं है पूरा करने का; क्योंकि मैं पूरा करूं, तो सब खतरा हो जाए; जब मैं फिर आविष्ट हो जाऊंगी, तब पूरा हो जाएगा। उसकी कुछ किताबें अधूरी ही छूट गई हैं,क्योंकि जब कोई बोधिसत्व चेतना उसे पकड़ ले, तभी लिखना हो सकता है।

24-ये जो प्रबोधयुक्तता हैं, ऐसी चेतनाएं जो परमद्वार पर खड़ी हैं; क्षीण होने के, विलीन होने के, शांत होने के, नष्ट हो जाने के द्वार पर खड़ी हैं--महामृत्यु अभी घटनेवाली है जिनके लिए, ये हजार तरह से काम करती हैं। किसी व्यक्ति में आविष्ट हो सकती हैं, किसी व्यक्ति को पता भी न चले, उसका उपयोग कर सकती हैं। तिब्बत में खयाल है, और खयाल सही है कि इन सारी आत्माओं का एक दुर्ग है, जो मनुष्य-जाति को घेरे हुए है चारों तरफ से।

25-आदमी जैसा है, वह बिलकुल पागल है।और वह जो भी करता है, वह सब पागलपन से भरा है। अगर आदमी को बिलकुल उसके ही सहारे छोड़ दिया जाए, तो वह अपने को भी नष्ट कर ले सकता है। वह जो भी कर रहा है वह सब उपद्रव से ग्रस्त है। उसे कुछ पता ही नहीं कि

क्या कर रहा है ,और क्या हो रहा है। यह प्रबोधयुक्तता का दुर्ग, उसे बार-बार मार्ग पर ले आता है, बार-बार उसे भटकने से बचाता है, बार-बार अनेक उपाय करके दिशा और दृष्टि देने की कोशिश करता है।

26-यह सूत्र कह रहा है कि जब तू सातवें द्वार को भी पार कर जाएगा, तब अपनी ही स्वेच्छा से तू भी इस महादुर्ग की एक इट बनना चाहेगा। अनेक गुरुओं की यातनाओं से निर्मित यह दुर्ग है। यह दुर्ग मनुष्य-जाति की रक्षा करता है। तिब्बत में हर बुद्ध-पूर्णिमा को एक विशेष पर्वत पर पांच सौ बौद्ध लामा इकट्ठे होते हैं। हर वर्ष बुद्ध-पूर्णिमा की रात, आधी रात गौतम बुद्ध की वाणी सुनाई पड़ती है। यह बोधिसत्व-वाणी है।

27-एक नियत योजना के अनुसार, एक नियत घड़ी में गौतम बुद्ध की वाणी उपलब्ध होती है। नियत लोग, निश्चित लोग, जो उस वाणी को सुन सकते हैं--क्योंकि वाणी अशरीरी है--वे ही केवल वहां इकट्ठे होते हैं। पांच सौ से ज्यादा लामा वहां कभी इकट्ठे नहीं होते हैं। जब एक लामा उनमें से मर जाता है, समाप्त हो जाता है, तभी एक नए लामा को प्रवेश मिलता है। स्थान गुप्त रखा जाता है; क्योंकि कोई भी गैर-व्यक्ति वहां पहुंच जाए, तो बाधा पड़ सकती है उस घटना में।

28-गौतम बुद्ध मरते वक्त वह निश्चित कर गए हैं।सदगुरु अक्सर निश्चित कर जाते हैं कि

उनके साथ, बाद में जब उनका शरीर न होगा, तो कैसे संबंध स्थापित किया जाए। यह संबंध स्थापित करने के निश्चित सूत्र हैं और उनके ही अनुसार चला जाए, तो संबंध स्थापित होते हैं। जो परंपराएं अपने गुरु से संबंध स्थापित करती रहती हैं, वे जीवित हैं।बहुत सी परंपराएं

हैं, जिनका संबंध सूत्र खो गया है, वे मृत हैं।वे औपचारिक धर्म हो कर रह गई है ।

भारी विस्तार है ,लेकिन विस्तार ही है, इस्टेबिल्शमेंट ही है; भीतर जो सत्व है, वह खो गया है।

तो प्राण नहीं हैं भीतर।

29-सैकड़ों परंपराएं पृथ्वी पर हैं। हर परंपरा किसी महागुरु, किसी प्रबोधयुक्तता की चेतना से चलती है। लेकिन उससे संबंध प्रस्थापित होता ही रहना चाहिए। क्योंकि युग बदलता है, समय बदलता है, भाषा बदलती है। फिर से पुनः संबंध स्थापित होना चाहिए अगर संबंध टूट जाए, तो वह हमारे पास किताबों में रह जाता है। लेकिन ढाई हजार साल पहले की जो स्थिति थी, वह आज नहीं है। ढाई हजार साल पहले जिन लोगों से उन्होंने कहा था, वे लोग आज नहीं हैं। ढाई हजार साल पहले उन्होंने जो विधियां दी थीं, वे आज कारगर नहीं होंगी, क्योंकि आदमी बदल गया है,आदमी का मन बदल गया है।

30-जीवित परंपरा का अर्थ होता है कि बार-बार संबंध स्थापित करके आज के लिए संदेश पाया जा सके। अगर यह न हो सके, तो परंपरा बोझ हो जाती है, और मुर्दा हो जाती है।

यह प्रबोधयुक्तता का जो दुर्ग है, हमारे चारों तरफ मौजूद है बहुत निकट, क्योंकि हमारे हृदय के पास है दुर्ग। इससे संबंध बनाया जा सकता है ;लेकिन उस संबंध को बनाने के लिए पूर्ण समर्पण की दशा चाहिए।

31-मूर्तियां हैं, मंदिर हैं, चर्च हैं, गिरजे हैं, गुरुद्वारे हैं, वे सब प्रतीक हैं; संबंध स्थापित करने के एक तरह के यंत्र हैं, जिनसे संबंध स्थापित किया जा सकता है, जिन पर ध्यान एकाग्र करने से आप इस लोक से हटते हैं और उस लोक के लिए उन्मुख हो जाते हैं। करीब-करीब आज

पृथ्वी पर प्रबोधयुक्तता का संपर्क क्षीणतम हो गया है।

32-और जरूरत बहुत ज्यादा है कि यह हो; और अगर यह न हो, तो आदमी भटक सकता है, खो सकता है। क्योंकि आदमी के पास प्रबोधयुक्तता का जो जीवंत दुर्ग है, अगर उससे ही हमारा संबंध विछिन्न हो जाए, तो हम भटकते ही चले जाएंगे, और गिरते ही चले जाएंगे।आज

आदमी की गिरावट का कारण न तो विज्ञान है, न ही अनीति है।आदमी की गिरावट का

एक ही कारण है कि अनंत-अनंत काल में जो शाश्वत सत्य की खोजें हैं और उन सत्यों की संपत्ति जिनके पास सुरक्षित है, उनसे हमारा संबंध क्षीण हो गया है।

33-उस संबंध को पुनर्जीवित किया जा सके, तो ही मनुष्य को बचाया जा सकता है। अन्यथा यह पृथ्वी खाली कर देनी पड़ेगी। अन्यथा इस पृथ्वी पर आदमी के बचने की इस सदी के बाद कोई संभावना नहीं है। एक महा-आंदोलन की जरूरत है कि पृथ्वी के कोने-कोने में सभी धर्म-परंपराओं से संपर्क पुनर्जीवित किया जा सके। यह किया जा सकता है ,अगर आप समर्पित हैं

और ध्यान में पूरी तरह डूबते हैं, तो आज नहीं कल अचानक आप पाएंगे कि आप एक दूसरे लोक में प्रवेश करने लगे, और दूसरे लोक की वाणी आपको सुनाई पड़ने लगी, और दूसरे लोक की आत्माएं आपसे संबंध स्थापित करने लगी हैं। वे सदा उत्सुक हैं, सिर्फ आपकी तरफ से द्वार खुला चाहिए। और तब आप पाएंगे कि आप नाहक ही परेशान हो रहे थे; जिनसे मार्गदर्शन मिल सकता है वे बहुत निकट हैं।

34-यह सूत्र कहता है: साथ ही, चूंकि मनुष्य इसे नहीं देखता है, इसलिए वह न स्पर्श कर सकता है, और न प्रज्ञा की वाणी सुन सकता है क्योंकि वह जानता ही नहीं है।

"लेकिन ओ जिज्ञासु, निर्दोष आत्मावाले, तूने तो इसे सुना है और तू तो सब कुछ जानता है इसलिए तुझे निर्णय करना है। अतः एक बार फिर से सुन।

"हे सोवान के मार्ग, हे स्रोतापन्न, तू सुरक्षित है। देख, उस मार्ग पर जहां थके हुए यात्री को अंधकार का सामना करना होता है।’

35-यह उसे याद दिला रहा है, यह सूत्र सिर्फ याद दिला रहा है। निर्वाण के पहले खो जाने की संभावना है। यह सूत्र याद दिला रहा है कि तू तो अब सुरक्षित है। अब तुझे तो कोई भय न रहा। तूने वह वाणी सुन ली, जो मुक्त करती है, और तूने वह सत्य स्पर्श कर लिया है। अब तुझे कोई दुख नहीं है। तेरे पैर निरंतर आनंद में बहे जा रहे हैं, लेकिन स्मरण कर उस मार्ग का,जहां तू कल चल रहा था, और जहां तुझे कोई सहारा न था, और जहां तुझे कोई मार्ग-दर्शन देनेवाला नहीं था, उस मार्ग पर अभी भी थके हुए यात्री अंधेरे का सामना कर रहे हैं।

36-"जहां कांटों से छिद कर हाथ लहू-लुहान हो जाते हैं, जहां पांव तीखे व कठोर पत्थरों से कट-फट जाते हैं और जहां "काम'अपने शक्तिशाली शस्त्र चलाता है, वहां जरा सी दूरी ही पार कर एक बड़ा वरदान, महान पुरस्कार तेरी प्रतीक्षा कर रहा है।’अगर तू जरा-सा लौट कर

पीछे देख तो जिस रास्ते पर तू कल तक था, वहां करोड़ों लोग हैं। जैसा तू भटकता था, वे भटक रहे हैं। जिन दुखों में तू डूबता था, उसमें वे डूब रहे हैं। जिन पीड़ाओं को तू अपने हाथ से पकड़ कर भोगता था, वहां वे अपने ही हाथों से अपनी पीड़ाएं निर्मित कर रहे हैं और भोग रहे हैं। पीछे के नरक को देख, यह नरक अगर दिखाई पड़ जाए तुझे, तो तू उनकी सहायता के काम पड़ सकता है।

37-"वह शांत और अकंप यात्री इस धारा पर बहता चला जाता है, जो निर्वाण को चली जाती है। वह जानता है कि जितने ही उसके पांव खून उगलेंगे उतना ही वह स्वयं धुलकर स्वच्छ हो जाएगा। वह भलीभांति जानता है कि सात छोटे-छोटे और क्षणभंगुर जन्मों के बाद निर्वाण

उसका है।’यह भी तुझे साफ है कि ज्यादा देर नहीं है तेरे महानिर्वाण में खो जाने के लिए। शीघ्र ही थोड़े ही जन्मों में समस्त रूप में महाशून्य हो जाएगा। इसके पहले कि तू महाशून्य हो जाए, तू महाशून्य होने की जल्दी मत करना।"ऐसा है ध्यान का मार्ग, जो योगियों का आश्रय

है और जिस अपूर्व लय के लिए स्रोतापन्न लालायित है।'वह धारा में प्रवेश कर रहा है,

साधक है, नया है, लालायित है--इस महाशून्य को जानेवाले मार्ग पर चलने के लिए।

लेकिन, जब उसने अर्हत का मार्ग पार कर लिया, तब कोई लालसा नहीं है।

38-अर्हत होते ही सारी लालसाएं शांत हो जाती हैं, सारी वासनाएं क्षीण हो जाती हैं। तब खतरा है, क्योंकि जब स्वयं की वासना क्षीण हो जाए, तो दूसरे की भी दिखाई नहीं पड़ती और जब स्वयं के दुख मिट जाएं, तो दूसरों के दुखों का कोई खयाल नहीं रह जाता है।हम वही जानते हैं

जो हमारे भीतर होता रहता है। जो हमारे भीतर बंद हो गया, हम भूल जाते हैं कि वह दूसरों के भीतर अभी जारी है।"वहां सदा के लिए क्लेश मिट जाता है'अर्हत होते ही, सिद्ध होते ही सारा क्लेश मिट जाता है।"और तनहा की जड़ें उखड़ जाती हैं।’तृष्णा के सारे जाल टूट जाते हैं।

"लेकिन ओ शिष्य, रुक अभी भी एक और शब्द कहना बाकी है। क्या तू ईश्वरी करुणा को मिटा सकता है? करुणा कोई सदगुण नहीं है। यह नियमों का नियम है--शाश्वत लयबद्धता, आलय की आत्मा। इसे ही तटहीन जागृतिक सत्व, नित्य,सम्यकत्व की प्रभा, वस्तुओं का कौशल और सनातन प्रेम का विधान कहते हैं।’

करुणा का क्या अर्थहैं?-

10 FACTS;-

1-कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम् । सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ॥ अर्थात : कर्पूर के समान चमकीले गौर वर्णवाले, करुणा के साक्षात् अवतार, इस असार संसार के एकमात्र सार, गले में भुजंग की माला डाले, भगवान शंकर जो माता भवानी के साथ भक्तों के हृदय कमलों में सदा सर्वदा बसे रहते हैं...हम उन देवाधिदेव की वंदना करते हैं। मानव समाज को जब भी जिस चीज की आवश्यकता हुई है,भगवान शिव ने अपनी दया और करुणा की छतरी खोल दी है। शिवजी के प्रति हम विभिन्न प्रकार से विचार भी नहीं कर सकते और न ही इतिहास में लिख सकते हैं।

2-मानव सभ्यता और मानव संस्कृति के गठन में भगवान शिव की जो विराट भूमिका है, उसमें यही कहना संगत है कि भगवान शिव को हटा देने पर मानव सभ्यता और मानव संस्कृति के लिए कोई भूमि ही नहीं मिल पाएगी। किंतु मानव सभ्यता और संस्कृति को निकाल देने पर भी भगवान शिव की महिमा रहेगी। वैदिक भाषा और वैदिक धर्म के साथ भी भगवान शिव का सम्यक परिचय था। शिव को हम तंत्र और वेद, दोनों में ही पाते हैं, लेकिन अत्यंत प्राचीन काल में हम उन्हें नहीं पाते हैं, क्योंकि अत्यंत प्राचीन काल में ग्रंथ रचना संभव नहीं थी।

3-‘शिव’ शब्द का अर्थ क्या है? तंत्र, वेद और जो कुछ भी मौखिक या लिखित प्रमाण मिलते हैं, उनसे ‘शिव’ शब्द के तीन अर्थ मिलते हैं। प्रथम या प्रधान अर्थ है-‘शिव’ माने कल्याण या मंगल। यहां ‘शिव’ शब्द का अर्थ है कल्याण। ‘शिवमस्तु’ का अर्थ है ‘कल्याणवस्तु।’ इस कल्याणात्मक शिव के प्रतिभू हैं कल्याणसुंदरम्। कहा जाता है, शिव पंच मुख से जगत का कल्याण करते रहते हैं। अर्थात कल्याणार्थ ही वह सुंदर हैं, कल्याण करते हैं, इसी कारण वह सुंदर हैं। वह कठोर हैं, पर वह अति शांत भी हैं। उनकी कठोरता तथा उनकी शांति, दोनों के पीछे कल्याणसुंदरम् भाव ही निहित है। ‘शिव’ शब्द का प्रथम अर्थ ही है: कल्याण या मंगल। ‘शिव’ शब्द का दूसरा अर्थ है करुणाशंकर और तीसरा अर्थ है ब्रह्म। यही उपयुक्त व्याख्या है।

4-करुणा यानी एक जीवन प्रेम का प्रवाह। करुणा का अर्थ बहता हुआ प्रेम है। प्रेम जब बंध जाता है तब वह भी करुणापूर्ण नहीं रह जाता बल्कि हिसापूर्ण हो जाता है। जीवन में जो विशेष है, वह बहता हुआ ही जीवन रहता है। जहा भी कुछ रुका, वहीं उसका अंत हो जाता है। करुणा का अर्थ है एक ऐसा हृदय जिसकी धारा बिना शर्त सब के प्रति मंगल की कामना से भरी हुई है। 5-करुणा का अर्थ है यह कामना कि दूसरे अपने दुःख और उनके कारणों से मुक्त हों। यह दूसरों की भावनाओं को समझने पर आधारित है विशेषकर जब हम स्वंय उन कठिन अनुभवों से गुज़र चुके हों। भले ही हमने कभी वह अनुभव नहीं किया हो जो वे कर रहे हैं, तब भी हम उनकी जगह स्वंय को रखकर देख सकते और महसूस कर सकते हैं कि वह अनुभव कितना भयंकर है। यह सोचकर कि हम स्वंय इससे मुक्त होने के लिए कितने इच्छुक होंगे, हम दूसरों के लिए भी उसी गहराई से ऐसा चाहेंगे। 6-करुणा हमारे दिलो-दिमाग को दूसरों के लिए खोलती है और हमें उस आत्म-निर्मित कारणों से मुक्त करती है जहाँ हम केवल अपने ही बारे में सोच पाते हैं। हम सभी को जीवन में समस्याओं का सामना करना पड़