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समाधि का क्या रहस्य है?आत्म-साक्षात्कार का क्या अर्थ होता है ?-PART 04


आत्म-साक्षात्कार का क्या अर्थ होता है ?-

38 FACTS;-

1-आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है .. ''अहंकार का संपूर्ण तिरोहित हो जाना''। और अहंकार के साथ , हर चीज तिरोहित हो जाती है।ध्यान रहे ,अहंकार

स्वप्नों की व्याख्या द्वारा तिरोहित नही हो सकता है । इसके विपरीत , अहंकार ज्यादा मजबूत हो सकता है , क्योंकि चेतन और अचेतन के बीच का अंतराल कम होगा।मन में जितनी कम तकलीफ होती है ,उतना ज्यादा मजबूत हो जाता है ..मन। निस्संदेह पहले की अपेक्षा आप संसार में बेहतर ढंग से जी पाओगे , क्योंकि संसार अहंकार में ज्यादा विश्वास रखता है । जीवित रहने के संघर्ष में लड़ने के लिए आप ज्यादा सक्षम हो जाओगे ; स्वयं के बारे में आप ज्यादा आश्वस्त हो जाओगे , कम घबराओगे।

2-थियोसोफी तथा थियोसोफिकल सोसायटी की संस्थापिका मादाम हैलीना ब्लावाट्स्की (Helena Petrovna Blavatsky) एक रहस्यदर्शी थीं। वह अतीत और भविष्य दोनों को क्षण में ही जानने की क्षमता से संपन्न थीं। दुनिया भर के धर्म और उनकी परंपरा से जुड़ी ब्लावाट्स्की ने भारतीय धर्म और दर्शन के मर्म को समझकर भारतीयों को आध्यात्मिक रूप से जगाने का प्रयास किया।अपने विश्व भ्रमण के दौरान 1852 में वे पहली बार भारत आई और यहाँ थोड़े दिन रुककर ऋषि परंपरा वाले ब्रह्मज्ञान की संपन्नता से अवगत होकर चली गई थीं।

2- मादाम ब्लावाट्स्की के अनुसार;-

''और यदि तू सातवां द्वार भी पार कर गया, तो क्या तुझे अपने भविष्य का पता है? आनेवाले कल्पों में स्वेच्छा से जीने के लिए तू बाध्य होगा, लेकिन मनुष्यों द्वारा न देखा जाएगा, और न उनका धन्यवाद ही तुझे मिलेगा।’'

3-बोधिसत्व की जो स्थिति है उसे समझने पर, यह सूत्र समझ में आएगा।

बोधिसत्व शरीर से मुक्त हो जाता है ;जगत उसे देख नहीं पाता, लेकिन वह जगत को देख पाता है। जगत उसे समझ नहीं पाता, लेकिन वह जगत को समझ पाता है।और जगत को न मालूम कितने उपायों से वह सहायता भी पहुंचाता है।उसका कोई धन्यवाद भी उसे नहीं मिलता है। मिलने का कोई कारण भी नहीं, क्योंकि जिन्हें सहायता पहुंचाई जाती है, वे उसे देख भी नहीं सकते हैं।

4-यह सूत्र कह रहा है: अगर तू सातवां द्वार भी पार कर गया, तो फिर एक धन्यवाद-रहित कार्य में तुझे पड़ जाना होगा। कोई तुझे धन्यवाद भी न देगा, कोई जानेगा भी नहीं कि तूने क्या किया, कोई पहचानेगा भी नहीं। कहीं लिपिबद्ध न होगी तेरी बात। जो सहायता तूने पहुंचाई है, उसे तू ही जानेगा; वे भी नहीं जानेंगे, जिन्हें सहायता पहुंचाई गई।स्वभावतः ऐसे

कृत्य में कोई तभी उलझ सकता है, जब उसकी अस्मिता पूरी मिट गई हो।

5-अहंकार तो एक ही बात में उत्सुक होता है कि मैं जाना जाऊं, माना जाऊं, कोई धन्यवाद स्वीकार करे, कोई अनुगृहीत हो। बोधिसत्व की अवस्था तो उपलब्ध ही होती है अहंकार के मिट जाने के बाद। तो अब यह सवाल नहीं है कि जिसको सहायता दी है, वह अनुगृहीत हो। अब तो सहायता देना ही अपने आप में पर्याप्त है। लेकिन यह सूत्र एक बात और कहता है, जो बड़ी अजीब और बड़ी विरोधाभासी है।

6-यह सूत्र कहता है: आनेवाले कल्पों में स्वेच्छा से जीने के लिए तू बाध्य

होगा।यह बड़ी उल्टी बात है--स्वेच्छा से जीने के लिए बाध्य! कोई तुझे मजबूर नहीं करेगा कि तू बोधिसत्व बन; कोई तुझे जोर-जबरदस्ती नहीं करेगा कि तू मनुष्यों की सेवा में लग, कि सोए हुए को जगा, कि भटक