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योग व अष्टांग योग क्या है? इसके अंगों के क्या अर्थ हैं? इसकी क्या महत्ता है ?PART-01


योग व अष्टांग योग का अर्थ;-

05 FACTS;-

1-गणित की संख्याओं को जोड़ने के लिए भी ‘योग’ शब्द का प्रयोग किया जाता है परन्तु आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि में जब ‘योग’ शब्द का प्रयोग किया जाता है तब उसका अर्थ आत्मा को परमात्मा से जोड़ना होता है।

2- महर्षि पंतजलि ने आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की क्रिया को आठ भागों में बांट दिया है। यही क्रिया अष्टांग योग के नाम से प्रसिद्ध है। आत्मा में बेहद बिखराव (विक्षेप) है जिसके कारण वह परमात्मा, जो आत्मा में भी व्याप्त है, की अनुभूति नहीं कर पाता। यूँ भी कहा जा सकता है कि अपने विक्षेपों (बिखराव) के समाप्त होने पर आत्मा स्वत: ही परमात्मा को पा लेता है।

3-योग के आठों अंगों का ध्येय आत्मा के विक्षेपों को दूर करना ही है। परमात्मा को प्राप्त करने का अष्टांग योग से अन्य कोर्इ मार्ग नहीं। अष्टांग योग के पहले दो अंग-यम और नियम हमारे संसारिक व्यवहार में सिद्धान्तिक एकरूपता लाते हैं। अन्य छ: अंग आत्मा के अन्य विक्षेपों को दूर करते हैं।

4-महर्षि पंतजलि द्वारा वर्णित योग के आठ अंगो के क्रम का भी अत्यन्त महत्त्व है। हर अंग आत्मा के विशिष्ट (खास तरह के) विक्षेपों को दूर करता है परन्तु तभी, जब उसके पहले के अंग सिद्ध कर लिए गए हों। उदाहरणार्थ यम और नियम को सिद्ध किए बगैर आसन को सिद्ध नहीं किया जा सकता।

5-सभी मत वाले इस बात को मानते हैं कि केवल असत्य, हिंसा आदि की राह पर चलने वाले र्इश्वर को कभी नहीं पास करते। यह इस बात की पुष्टि ही है कि र्इश्वर को पाने का अष्टांग योग एक मात्र रास्ता है।

अष्टांग योग क्या है?-

अष्टांग योग (आठ अंगों वाला योग), को आठ अलग-अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए; यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। योग के ये आठ अंग हैं:-

1)-यम

2) नियम

3) आसन

4) प्राणायाम

5) प्रत्याहार

6) धारणा

7) ध्यान

8) समाधि

अष्टांग योग की व्याख्या;-

1-योग का पहला अंग-यम;-

पहला अंग 'यम' का अर्थ हैं ''आत्म संयम'' अथार्त जीवन को एक दिशा देना। आत्म संयम का अर्थ है, केंद्र में प्रतिष्ठित होना।जब तुम अपने जीवन को दिशा देते हो, तो तुरंत तुम्हारे भीतर एक केंद्र बनना शुरू हो जाता है। दिशा से निर्मित होता है केंद्र; फिर केंद्र देता है दिशा।और वे परस्पर एक दूसरे को बढ़ाते हैं। जब तक तुम आत्म संयमी नहीं होते, दूसरी बात की संभावना नहीं है