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जन्माष्टमी स्पेशल... क्या है भगवान श्री कृष्ण के रहस्य ?PART-01


THE KEY POINTS;-

1-हिंदू धर्म शास्त्रों में कूट भाषा ( code language) का प्रयोग किया गया है ताकि अयोग्य व्यक्तियो द्वारा दुरुपयोग न किया जा सके।साधना सिद्ध या संपन्न करने की क्रिया को कहानियाँ के द्वारा बताया गया है।

2-कबीर जी इस दोहे द्वारा मनुष्यों को प्रयत्न करने के लिए प्रेरित करते हुए कहते हैं कि..

''जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ''।

अर्थ : -

जिन खोजा: जिसने कोशिश की

तिन पाइया: उसने पा लिया

गहरे पानी पैठ: गहरे पानी मे उतरकर

मैं बपुरा: मैं असहाय

बूडन डरा: डूबने से डरता

रहा किनारे बैठ: किनारे पर बैठा रहा

परमेश्वर और महाविष्णु ;-

0 7 FACTS;-

1-यह अनंत ब्रह्माण्ड अलख-निरंजन परब्रह्म परमात्मा का खेल है। जैसे बालक मिट्टी के घरोंदे बनाता है, कुछ समय उसमें रहने का अभिनय करता है और अंत मे उसे ध्वस्त कर चल देता है। उसी प्रकार परब्रह्म भी इस अनन्त सृष्टि की रचना करता है, उसका पालन करता है और अंत में उसका संहार कर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। यही उसकी क्रीडा है, यही उसका अभिनय है, यही उसका मनोविनोद है, यही उसकी निर्गुण-लीला है जिसमें हम उसकी लीला को तो देखते हैं, परन्तु उस लीलाकर्ता को नहीं देख पाते।

2-परब्रह्म परमात्मा का प्रकृति के असंख्य ब्रह्माण्डों को बनाने-बिगाड़ने का यह अनवरत कार्य कब प्रारम्भ हुआ और कब तक चलेगा, यह कोई नहीं जान सकता। उनके लिए सृष्टि, पालन एवं संहार–तीनों प्रकार की लीलाएं समान हैं। जब प्रकृति में परमात्मा के संकल्प से विकासोन्मुख परिणाम होता है, तो उसे सृष्टि कहते हैं और जब विनाशोन्मुख परिणाम होता है, तो उसे प्रलय कहते हैं। सृष्टि और प्रलय के मध्य की दशा का नाम स्थिति है।

3-वैदिक समय से ही श्रीहरि विष्णु सम्पूर्ण विश्व की सर्वोच्च शक्ति तथा नियन्ता के रूप में मान्य रहे हैं।हिन्दू धर्म के आधारभूत ग्रन्थों में

बहुमान्य पुराणानुसार श्रीहरि विष्णु परमेश्वर के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। पुराणों में त्रिमूर्ति श्रीविष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है। त्रिमूर्ति के अन्य दो रूप ब्रह्मा और शिव को माना जाता है। ब्रह्मा को जहाँ विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है, वहीं शिव को संहारक माना गया है।

4-मूलतः विष्णु और शिव तथा ब्रह्मा भी एक ही हैं यह मान्यता भी बहुशः स्वीकृत रही है। न्याय को प्रश्रय, अन्याय के विनाश तथ