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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 22, 23,24 विधियां क्या है? July 7, 2018


विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि;- 23-

47 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है: -

‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो। इस एक को छोड़कर अन्‍य सभी विषयों की अनुपस्‍थिति को अनुभव करो। फिर विषय-भाव और अनुपस्‍थिति भाव को भी छोड़कर आत्‍मोपलब्‍ध होओ।‘’

’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो।‘’

कोई भी विषय, उदाहरण के लिए एक गुलाब का फूल है—कोई भी चीज चलेगी।

‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो….’’

देखने से काम नहीं चलेगा, अनुभव करना है। तुम गुलाब के फूल को देखते हो, लेकिन उससे तुम्‍हारा ह्रदय आंदोलित नहीं होता है। तब तुम गुलाब को अनुभव नहीं करते हो। अन्‍यथा तुम रोते और चीखते, अन्‍यथा तुम हंसते और नाचते। तुम गुलाब को महसूस नहीं कर रहे हो, तुम सिर्फ गुलाब को देख रहे हो।

और तुम्‍हारा देखना भी पूरा नहीं है। अधूरा है। तुम कभी किसी चीज को पूरा नहीं देखते अतीत हमेशा बीच में आता है। गुलाब को देखते ही अतीत-स्‍मृति कहती है कि यह गुलाब है। और यह कहकर तुम आगे बढ़ जाते हो। लेकिन तब तुमने सच में गुलाब को नहीं देखा। जब मन कहता है कि यह गुलाब है तो उसका अर्थ हुआ कि तुम इसके बारे में सब कुछ जानते हो, क्‍योंकि तुमने बहुत गुलाब देखे है। मन कहता है कि अब और क्‍या जानना है। आगे बढ़ो। और आगे बढ़ जाते हो।

यह देखना अधूरा है। यह देखना-देखना नहीं है। गुलाब के फूल के साथ रहो। उसे देखो और फिर उसे महसूस करो। उसे अनुभव करो। अनुभव करने के लिए क्‍या करना है? उसे स्‍पर्श करो, उसे सूंघो; उसे गहरा शारीरिक अनुभव बनने दो। पहले अपनी आंखों को बंद करो और गुलाब को अपने पूरे चेहरे को छूने दो। इस स्‍पर्श को महसूस करो। फिर गुलाब को आँख से स्‍पर्श करो। फिर गुलाब को नाक से सूंधो। फिर गुलाब के पास ह्रदय को ले जाओ और उसके साथ मौन हो जाओ। गुलाब को अपना भाव अर्पित करो। सब कुछ भूल जाओ। सारी दूनिया को भूल जाओ। गुलाब के साथ समग्रत: रहो।

‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो। इस एक को छोड़कर अन्‍य सभी विषयों की अनुपस्‍थिति को अनुभव करो।

यदि तुम्‍हारा मन अन्‍य चीजों के संबंध में सोच रहा है तो गुलाब का अनुभव गहरा नहीं जाएगा। सभी अन्‍य गुलाबों को भूल जाओ। सभी अन्‍य लोगों को भूल जाओ। सब कुछ को भूल जाओ। केवल इस गुलाब को रहने दो। यही गुलाब हो, यही गुलाब। सब कुछ को भूल जाओ। केवल इस गुलाब को रहने दो। यही गुलाब, को तुम्‍हें आच्‍छादित कर लेने दो। समझो कि तुम इस गुलाब में डूब गये हो।

यह कठिन होगा, क्‍योंकि हम इतने संवेदनशील नहीं है। लेकिन स्‍त्रियों के लिए यह उतना कठिन नहीं होगा। क्‍योंकि वे किसी चीज को आसानी से महसूस करती है। पुरूषों के लिए यह ज्‍यादा कठिन होगा। हां, अगर उनका सौंदर्य बोध विकसित हो, कवि, चित्रकार या संगीतकार का सौंदर्य बोध विकसित होता है। तो बात और है। तब वे भी अनुभव कर सकते है। लेकिन इसका प्रयोग करो।

बच्‍चे यह प्रयोग बहुत सरलता से कर सकते है। मैं अपने एक मित्र के बेटे को यह प्रयोग सिखाता था। यह किसी चीज को आसानी से अनुभव करता था। फिर मैंने उसे गुलाब का फल दिया और उससे यह सब कहा जो तुम्‍हें अब कह रहा हूं। उसने यह किया और कहा कि मैं गुलाब का फूल बन गया हूं। मेरा भाव यही है कि मैं ही गुलाब का फूल हूं।

बच्‍चे इस विधि को बहुत आसानी से कर सकते है। लेकिन हम उन्‍हें इसमें प्रशिक्षित नहीं करते। प्रशिक्षित किया जाए तो बच्‍चे सर्वश्रेष्‍ठ ध्‍यानी हो सकते है।

‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो। इस एक को छोड़कर अन्‍य सभी विषयों की अनुपस्‍थिति को अनुभव करो।‘’

प्रेम में यही घटित होता है। अगर तुम किसी के प्रेम में हो तो तुम सारे संसार को भूल जाते हो। और अगर अभी भी संसार तुम्‍हें याद है तो भली भांति समझो कि यह प्रेम नहीं है। प्रेम में तुम संसार को भूल जाते हो, सिर्फ प्रेमिका या प्रेमी याद रहता है। इसलिए मैं कहता हूं कि प्रेम ध्‍यान है। तुम इस विधि को प्रेम-विधि के रूप में भी उपयोग कर सकते हो। अब अन्‍य सब कुछ भूल जाओ।

कुछ दिन हुए एक मित्र अपनी पत्‍नी के साथ मेरे पास आए। पत्‍नी को पति से कोई शिकायत थी। इसलिए पत्‍नी आई थी। मित्र ने कहा कि मैं एक वर्ष से ध्‍यान कर रहा हूं। और लगती है। यह आवाज मेरे ध्‍यान में सहयोगी है। लेकिन अब एक आश्‍चर्य की घटना घटती है। जब मैं अपनी पत्‍नी के साथ संभोग करता हूं, और संभोग शिखर छूने लगता है तब भी मेरे मुंह से रजनीश-रजनीश की आवाज निकलने लगती है। और इस कारण मेरी पत्‍नी को बहुत अड़चन होती है। वह अक्‍सर पूछती है कि तुम प्रेम करते हो या ध्‍यान करते हो या क्‍या करते हो? और ये रजनीश बीच में कैसे आ जाते है।

उस मित्र ने कहा कि मुश्‍किल यह है कि अगर मैं रजनीश-रजनीश न चिल्‍लाउं तो संभोग का शिखर चूक जाता है। और चिल्‍लाउं तो पत्‍नी पीडित होती है। सह रोने चिल्‍लाने लगती है। और मुसीबत खड़ी कर देती है। तो उन्‍होंने मेरी सलाह पूछी और कहां कि पत्‍नी को साथ लाने का यही कारण है।

उनकी पत्‍नी की शिकायत दुरूस्‍त है। क्‍योंकि वह कैसे मान सकती है कि कोई दूसरा व्‍यक्‍ति उनके बीच में आये। यही कारण है कि प्रेम के लिए एकांत जरूरी है। बहुत जरूरी है। सब कुछ को भूलने के लिए एकांत अर्थपूर्ण है।

अभी यूरोप और अमेरिका में वे समूह संभोग का प्रयोग कर रहे है—एक कमरे में अनेक जोड़े संभोग में उतरते है। यह मूढ़ता है। अत्‍यंतिक मूढ़ता है। क्‍योंकि समूह में संभोग की गहराई नहीं छुई जा सकती है। वह सिर्फ काम क्रीड़ा बन कर रह जाएगी। दूसरों की उपस्‍थिति बाधा बन जाती है। तब इस संभोग को ध्‍यान भी नहीं बनाया जा सकता है।

अगर तुम शेष संसार को भूल सको तो ही तुम किसी विषय के प्रेम में हो सकते हो। चाहे वह गुलाब का फूल हो या पत्‍थर हो या कोई भी चीज हो, शर्त यही है कि उस चीज की उपस्‍थिति महसूस करो और अन्‍य चीजों की अनुपस्‍थिति महसूस करो। केवल वही विषय वस्‍तु तुम्‍हारी चेतना में अस्‍तित्‍वगत रूप से रहे।

अच्‍छा हो कि इस विधि के प्रयोग के लिए कोई ऐसी चीज चुनो जो तुम्‍हें प्रीतिकर हो। अपने सामने एक चट्टान रखकर शेष संसार को भूलना कठिन होगा। यह कठिन होगा, लेकिन झेन सदगुओं ने यह भी किया है। उन्‍होंने ध्‍यान के लिए रॉक गार्डन बना रखा है। वहां पेड़-पौधे या फूल नहीं होते। पत्‍थर और बालू होते है। और वे पत्‍थर पर ध्‍यान करते है।

वे कहते है कि अगर किसी पत्‍थर के प्रति तुम्‍हारा गहन प्रेम हो तो कोई भी आदमी तुम्‍हारे लिए बाधा नहीं हो सकता। और मनुष्‍य चट्टान जैसे ही तो है। अगर तुम चट्टान को प्रेम कर सकते हो तो मनुष्‍य को प्रेम करने में क्‍या कठिनाई। तब कोई अड़चन नहीं है। मनुष्‍य चट्टान जैसे है। उससे भी ज्‍यादा पथरीले। उन्‍हें तोड़ना उनमें प्रवेश करना अति कठिन है।

लेकिन अच्‍छा हो कि कोई ऐसी चीज चुनो जिसके प्रति तुम्‍हारा सहज प्रेम हो। और तब शेष संसार को भूल जाओ। उसकी उपस्‍थिति का मजा लो, उसका स्‍वाद लो आनंद लो। उस वस्‍तु में गहरे उतरो और उस वस्‍तु को अपने में गहरा उतरने दो।

‘’फिर विषय भाव को छोड़कर…….।‘’

अब इस विधि का कठिन अंश आता है। तुमने पहले ही सब विषय छोड़ दिए है। सिर्फ यह एक विषय तुम्‍हारे लिए रहा है। सबको भूलकर एक इसे तुमने याद रखा था। अब ‘’विषय भाव को छोड़कर….।‘’ अब उस भाव को भी छोड़कर। अब तो दो ही चींजे बची है, एक विषय की उपस्‍थिति है और शेष चीजों की अनुपस्‍थिति है। अब उस अनुपस्‍थिति को भी छोड़ दो। केवल यह गु लाब या केवल यह चेहरा। यह केवल यह स्‍त्री या केवल यह पुरूष या यह चट्टान की उपस्‍थिति बची है। उसे भी छोड़ दो। और उसके प्रति जो भाव है, उसे भी तुम अचानक एक आत्‍यंतिक शून्‍य में गिर जाते हो। जहां कुछ भी नहीं बचता।

और शिव कहते है: ’’आत्‍मोपल्‍बध होओ।‘’ इस शून्‍य को, इस ना-कुछ को उपलब्‍ध हो, यही तुम्‍हारा स्‍वभाव है, यही शुद्ध होना है।

शून्‍य को सीधे पहुंचना कठिन होगा—कठिन और श्रम-साध्‍य। इसलिए किसी विषय को माध्‍यम बनाकर वहां अच्‍छा है। पहले किसी विषय को अपने मन में ले लो और उसे इस समग्रता से अनुभव करो। कि किसी अन्‍य चीज को याद रखने की जरूरत न रहे। तुम्‍हारी समस्‍त चेतना इस एक चीज से भर जाए। और तब इस विषय को भी छोड़ दो, इसे भी भूल जाओ। तब तुम किसी अगाध अतल में प्रविष्ट हो जाते हो। जहां कुछ भी नहीं है। वहां केवल तुम्‍हारी आत्‍मा है। शुद्ध और निष्‍कलुष। यह शुद्ध अस्‍तित्‍व यह शुद्ध चैतन्‍य ही तुम्‍हारा स्‍वभाव है।

लेकिन इस विधि को कई चरणों में बांटकर प्रयोग करो। पूरी विधि को एकबारगी काम में मत लाओ। पहल एक विषय का भाव निर्मित करो। कुछ दिन तक सिर्फ इस हिस्‍से का प्रयोग करो। पूरी विधि का प्रयोग मत करो। पहले कुछ दिनों तक या कुछ हफ्तों तक इस एक हिस्‍से की, पहले हिस्‍से की साधना करो। विषय-भाव पैदा करो। पहले विषय को महसूस करो। और एक ही विषय चुनो, उसे बार-बार बदलों मत। क्‍योंकि हर बदलते विषय के साथ तुम्‍हें फिर-फिर उतना ही श्रम करना होगा।

अगर तुमने विषय के रूप में गुलाब का फूल चुना है तो रोज-रोज गुलाब के फूल का ही उपयोग करो। उस गुलाब के फूल से तुम भर जाओ। भरपूर हो जाओ। ऐसे भर जाओ कि एक दिन कह सको की मैं फूल ही हूं। तब विधि का पहला हिस्‍सा सध गया, पूरा हूआ।

जब फूल ही रह जाए और शेष सब कुछ भूल जाए, तब इस भाव का कुछ दिनों तक आनंद लो। यह भाव अपने आप में सुंदर है। बहुत-बहुत सुंदर है। यह अपने आप में बहुत प्राणवान है, शक्‍तिशाली है। कुछ दिनों तक यही अनुभव करते रहो। और जब तुम उसके साथ रच-पच जाओगे, लयवद्ध हो जाओगे, तो फिर वह सरल हो जाएगा। फिर उसके लिए संघर्ष नहीं करना होगा। तब फूल अचानक प्रकट होता है। और समस्‍त संसार भूल जाता है। केवल फूल रहता है।

इसके बाद विधि के दूसरे भाग पर प्रयोग करो। अपनी आँख बंद कर लो और फूल को भी भूल जाओ। याद रहे, अगर तुमने पहल भाग को ठीक-ठीक साधा है तो दूसरा भाग कठिन नहीं होगा। लेकिन यदि पूरी विधि पर एक साथ प्रयोग करोगे तो दूसरा भाग कठिन ही नहीं असंभव होगा। पहले भाग में अगर तुमने एक फूल के लिए सारी दुनियां को भूला दिया तो दूसरे भाग में शून्‍य के लिए फूल को भूलाना आसानी से हो सकेगा। दूसरा भाग आएगा। लेकिन उसके लिए पहल भाग पहले करना जरूरी है।

लेकिन मन बहुत चालाक है। मन सदा कहेगा। कि पूरी विधि को एक साथ प्रयोग करो। लेकिन उसमे तुम सफल नहीं हो सकते हो। और तब मन कहेगा कि यह विधि काम की नहीं है। या यह तुम्‍हारे लिए नही है।

इसलिए अगर सफल होना चाहते हो तो विधि को क्रम में प्रयोग करो। पहले-पहले भाग को पूरा करो और तब दूसरे भाग को हाथ में लो। और तब विषय भी विलीन हो जाता है। और मात्र तुम्‍हारी चेतना रहती है। शुद्ध प्रकाश, शुद्ध ज्‍योति-शिखा।

कल्‍पना करो कि तुम्‍हारे पास दीया है, और दिए की रोशनी अनेक चीजों पर पड़ रही है। मन की आंखों से देखो कि तुम्‍हारे अंधेरे कमरे में अनेक-अनेक चीजें है। और तुम एक दिया वहां लाते हो और सब चीजें प्रकाशित हो जाती है। दीया उन सब चीजों को प्रकाशित करता है। जिन्‍हें तुम वहां देखते हो।

लेकिन अब तुम उनमें से एक विषय चून लो, और उसी विषय के साथ रहो। दीया वहीं है, लेकिन अब उसकी रोशनी एक ही विषय पर पड़ती है। फिर उस एक विषय को भी हटा दो। और तब दीए के लिए कोई विषय नहीं बचा।

वही बात तुम्‍हारी चेतना के लिए सही है। तुम प्रकाश हो, ज्‍योति शिखा हो। और सारा संसार तुम्‍हारा विषय है। तुम सारे संसार को छोड़ देते हो। और एक विषय पर अपने को एकाग्र करते हो। तुम्‍हारी ज्‍योति शिखा वही रहती है। लेकिन अब वह अनेक विषयों में व्‍यस्‍त नहीं है। वह एक ही विषय में व्‍यस्‍त है। और फिर उस एक विषय को भी छोड़ दो। अचानक तब सिर्फ प्रकाश बचता है। चेतना बचती है। वह प्रकाश किसी विषय को नहीं प्रकाशित कर रहा है।

इसी को बुद्ध ने निर्वाण कहा है। इसी को महावीर ने कैवल्‍य कहा है। परम एकांत कहा है। उपनिषादो ने इसे ही ब्रह्मज्ञान या आत्‍मज्ञान कहा है। शिव कहते है कि अगर तुम इस विधि को साध लो तो तुम ब्रह्मज्ञान को उपल्‍बध हो जाओगे।;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि;- 24

- 47 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-

‘’जब किसी व्‍यक्‍ति के पक्ष या विपक्ष में कोई भाव उठे तो उसे उस व्‍यक्‍ति पर मत आरोपित करे।‘’

अगर हमें किसी के विरूद्ध घृणा अनुभव हो या किसी के लिए प्रेम अनुभव हो तो हम क्‍या करते है? हम उस घृणा या प्रेम को उस व्‍यक्‍ति पर आरोपित कर देते है। अगर तुम मेरे प्रति घृणा अनुभव करते हो तो उस घृणा के ही कारण तुम अपने को बिलकुल भूल जाते हो। और मैं तुम्‍हारा एक मात्र लक्ष्‍य या विषय बन जाता हूं। वैसे ही जब तुम मुझे प्रेम करते हो तो भी तुम अपने को बिलकुल ही भूल जाते हो। और मुझे अपना एक मात्र विषय बना लेते हो। तुम अपनी घृणा को प्रेम को या जो भी भाव हो, उसे मुझे पर प्रक्षेपित कर देते हो। उस दशा में तुम आंतरिक केंद्र को भूल जाते हो। और दूसरे को अपना केंद्र बना लेते हो।

यह सूत्र कहता है। कि जब किसी के प्रति घृणा, प्रेम या कोई और भाव पक्ष या विपक्ष में पैदा हो तो उसको, उस भाव को उस व्‍यक्‍ति पर आरोपित मत करो। बल्‍कि स्‍मरण रखो कि उस भाव का स्‍त्रोत तुम स्‍वयं हो।

मैं तुम्‍हें प्रेम करता हूं। इसमें सामान्‍य भाव यह है कि तुम मेरे प्रेम के स्‍त्रोत हो। लेकिन यह हकीकत नहीं है। मैं ही स्‍त्रोत हूं, तुम तो महज वह पर्दा हो जिस पर मैं अपने प्रेम को प्रक्षेपित करता हूं। तुम मात्र पर्दा हो। मैं अपना प्रेम तुम पर प्रक्षेपित करता हूं। और मैं कहता हूं कि तुम मेरे प्रेम के स्‍त्रोत हो। लेकिन यह तथ्‍य नहीं है। यह झूठ है। यह मेरी ही प्रेम की ऊर्जा है जिसे मैं तुम पर प्रक्षेपित कर रहा हूं।

इस प्रेम की ऊर्जा की प्रभा में पड़ कर तुम सुंदर हो जाते हो। हो सकता है। किसी के लिए तुम सुंदर न होओ। हो सकता है कि किसी के लिए तुम बिलकुल कुरूप और विकर्षण से भरे होओ। ऐसा क्‍यों? अगर तुम ही प्रेम के स्‍त्रोत हो तो प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को तुम्‍हारे प्रति प्रेमपूर्ण होना चाहिए।

लेकिन तुम स्‍त्रोत नहीं हो। मैं तुम पर प्रेम आरोपित करता हूं तो तुम सुंदर हो जाते हो। कोई दूसरा व्‍यक्‍ति तुम पर घृणा आरोपित करता है और तुम कुरूप हो जाते हो। और हो सकता है कोई तीसरा व्‍यक्‍ति तुम्‍हारे प्रति बिलकुल उदासीन हो, तटस्‍थ हो। उसने तुम्‍हें देखा तक न हो। आखिर हो क्‍या रहा है? हम अपने-अपने भाव दूसरों पर फैला रहे है।

यही कारण है कि सुहागरात में चंद्रमा तुम्‍हें सुंदर, चमत्‍कारपूर्ण और अपूर्व दिखाई देता है। उस समय सारा संसार तुम्‍हें अपूर्व मालूम देता है। और हो सकता है उसी रात तुम्‍हारे पड़ोसी के लिए अद्भुत रात्रि अस्‍तित्‍व में न हो। और अगर उसका बच्‍चा मर गया हो। तो वही चाँद उसके लिए उदास, दुःखी और असहनीय मालूम पड़ेगा। और वही चाँद तुम्‍हारे लिए इतना मोहक है, मादक है और तुम्‍हें पागल किए दे रहा है। क्‍यों? क्‍या चंद्रमा स्‍त्रोत है, आधार है? यह चंद्रमा केवल पर्दा है जिस पर तुम अपने को फैला रहे हो। प्रक्षेपित कर रहे हो।

यह सूत्र कहता है: ‘’जब किसी व्‍यक्‍ति के पक्ष या विपक्ष में कोई भाव उठे तो उसे उस व्‍यक्‍ति पर मत आरोपित करो, बल्‍कि केंद्रित रहो।‘’

यहां व्‍यक्‍ति की जगह कोई वस्‍तु भी हो सकती है। विषय के रूप में कुछ भी काम देगा। तुम सदा केंद्रित रहो। याद रहे कि तुम स्‍त्रोत हो और विषय की और गति करने की बजाएं स्‍त्रोत की और गति करो। जब घृणा का भाव उठे तो घृणा के विषय पर जाने की बजाएं उस बिंदु पर जाना बेहतर है जहां पर घृणा आ रही है। उस व्‍यक्‍ति को मत खोजों जो इस घृणा का विषय है। लक्ष्‍य है; उस केंद्र को खोजों जहां से घृणा उठ रही है। केंद्र की तरफ चलो, भीतर जाओ अपनी घृणा या प्रेम या जो भी भाव हो उसे केंद्र की और स्‍त्रोत की और, उदगम की और यात्रा का साधन बनाओ। उदगम पर जाओ, और वहां केंद्रित रहो।

इसे प्रयोग करो। यह बहुत ही मनोवैज्ञानिक विधि है। किसी ने तुम्‍हारा अपमान किया और तुम क्रोधित हो गए, ज्‍वरग्रस्‍त हो गए। अभी तुम्‍हारा यह क्रोध को उस आदमी प्रवाहित हो रहा है। जिसने तुम्‍हें अपमानित किया। तुम अपने पूरे क्रोध को उस आदमी पर प्रक्षेपित हो रहा है। जिसने तुम्‍हें अपमानित किया, अगर उसने तुम्‍हें अपमानित किया तो सच में क्‍या किया? उसने केवल तुम्‍हें थोड़ा कुरेदा। उसने तुम्‍हारे क्रोध को उभरने में थोड़ा सहायता कर दी। लेकिन यह क्रोध तुम्‍हारा है।

वह व्‍यक्‍ति बुद्ध के पास जाए और उन्‍हें अपमानित करे तो वह उनमें कोई क्रोध पैदा नहीं कर सकेगा। वह अगर जीसस के पास जाए तो जीसस उसे अपना दूसर गाल भी हाजिर कर देंगे। और बोधिधर्म के पाए जाए तो वह अट्टहास कर उठेंगे। यह व्‍यक्‍ति पर निर्भर है।

इसलिए दूसरा व्‍यक्‍ति स्‍त्रोत नहीं है। स्‍त्रोत सदा तुम्‍हारे भीतर है। दूसरा सिर्फ स्‍त्रोत पर चोट कर रहा है। लेकिन अगर तुम्‍हारे भीतर क्रोध नहीं है तो क्रोध बाहर नहीं आएगा। यदि तुम बुद्ध को चोट करो तो करूणा आएगी। क्‍योंकि वहां क्रोध नहीं है।

एक सूखे कुएं में बाल्‍टी डालों तो कुछ भी हाथ नहीं आता। पानी वाले कुएं में बाल्‍टी डालों और वह पानी से भरकर बाहर आती है। लेकिन पानी कुएं में है। कुआं स्‍त्रोत है। बाल्‍टी तो पानी को बाहर लाने का निमित मात्र है।

जो आदमी तुम्‍हें अपमानित करता है वह बाल्‍टी का काम करता है। वह तुम्‍हारे भीतर से तुम्‍हारे क्रोध, घृणा या किसी भी आग को बाहर ले आता है। तो स्‍मरण रहे। तुम स्‍त्रोत हो।

इस विधि के लिए विशेष रूप से इस बात को ध्‍यान में रख लो कि दूसरों पर तुम जो भी भाव प्रक्षेपित करते हो उसका स्‍त्रोत सदा तुम्‍हारे भीतर है। इसलिए जब भी कोई भाव पक्ष या विपक्ष में उठे तो तुरंत भीतर प्रवेश करो और उस स्‍त्रोत के पास पहु्ंचो जहां से यह भाव उठ रहा है। स्‍त्रोत पर केंद्रित रहो, विषय की चिंता ही छोड़ दो। किसी ने तुम्‍हें तुम्‍हारे क्रोध को जानने का मोका दिया है। इसके लिए उसे तुरंत धन्‍यवाद दो और उसे भूल जाओ। फिर आंखें बंद कर लो और अपने भीतर सरक जाओ। और उस स्‍त्रोत पर ध्‍यान दो जहां से यह प्रेम या क्रोध का भाव उठ रहा है।

भीतर गति करने पर तुम्‍हें वह स्‍त्रोत मिल जाएगा। क्‍योंकि ये भाव उसी स्‍त्रोत से आते है। घृणा हो या प्रेम, सब तुम्‍हारे स्‍त्रोत से आते है। इस स्‍त्रोत के पास उस समय पहुंचना आसान है जब तुम क्रोध या प्रेम या घृणा सक्रिय रूप से अनुभव करते हो। इस क्षण में भीतर प्रवेश करना आसान होता है। जब तार गर्म है तो उसे पकड़कर भीतर जाना आसान होता है। और भीतर जाकर जब तुम एक शीतल बिंदू पर पहुंचोगे तो अचानक एक भिन्‍न आयाम, एक दूसरा ही संसार सामने खुलने लगता है।

इसलिए क्रोध, घृणा या प्रेम जो भी हो उसका उपयोग अंतर्यात्रा के लिए करो। हम सदा दूसरों की तरफ गति करने में इन भावों का उपयोग करते हे। और जब अपने भाव आरोपित करने के लिए हमें कोई नहीं मिलता तो बड़ी निराशा लगती है। तब हम अपने भावों को निर्जीव वस्‍तुओं पर भी आरोपित करने लगते है। मैंने लोग देखे है जो अपने जूतों पर क्रोध करते है। और क्रोध से उन्‍हें फेंकते है। वे क्‍या कर रहे है? मैंने लोगों को देखा है जो घर के दरवाजे पर क्रोध करते है, क्रोध में उसे खोलते है, उसे गालियां तक देते है। वे क्‍या कर रहे है?

इस प्रसंग में मैं एक झेन अंतदृष्‍टि की चर्चा से अपनी बात समाप्‍त करूं। एक बहुत बड़े झेन सदगुरू लिंची कहा करते थे:

मैं जब युवा था तो मुझे नौका-विहार का बहुत शौक था। मेरे पास एक छोटी सी नाव थी और उसे लेकर में अक्‍सर अकेला झील की सैर करता था। मैं घंटों झील में रहता था।

एक दिन ऐसा हुआ कि मैं अपनी नाव में आँख बंद कर सुंदर रात पर ध्‍यान कर रहा था। तभी एक खाली नाव उलटी दिशा में आई और मेरी नाव से टकरा गई। मेरी आंखे बंद थी। इसलिए मैंने मन में सोचा कि किसी व्‍यक्‍ति ने अपनी नाव मेरी नाव से टकरा दी है। और मुझे क्रोध आ गया।

मैंने आंखें खोली और मैं उस व्‍यक्‍ति को क्रोध में कुछ कहने ही जा रहा था कि मैंने देखा कि दूसरी नाव खाली है। अब मुझे कुछ करने का कोई उपाय न रहा। किस पर यह क्रोध प्रकट करूं? नाव तो खाली है। और वह नाव धार के साथ बहकर आई थी। और मेरी नाव से टकरा गई थी। अब मेरे लिए कुछ भी करने को न था। एक खाली नाव पर क्रोध उतारने की कोई संभावना न थी। तब फिर एक ही उपाय बाकी रहा। मैंने आंखें बंद कर ली। और अपने क्रोध को पकड़ कर उलटी दिशा में बहने लगा। और में पहूंच गया अपने केंद्र पर। वह खाली नाव में आत्‍म ज्ञान का कारण बन गई। उस मौन रात में मैं आपने भीतर सरक गया। और क्रोध मेरी सवारी बन गया। और खाली नाव मेरी गुरु हो गई।

और फिर लिंची ने कहा, अब जब कोई आदमी मेरा अपमान करता है तो मैं हंसता हूं और कहता हूं कि यह नाव भी खाली है। मैं आंखें बंद करता हूं और अपने भीतर चला जाता हूं।

इस विधि को प्रयोग करो। यह तुम्‍हारे लिए चमत्‍कार कर सकती है।

.......SHIVOHAM....