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क्या है भगवान श्री कृष्ण के रहस्य ?क्या ग्रंथों में सांकेतिक भाषा में वर्णन किया गया है?

भगवान श्री कृष्ण नाम की महिमा?-

05 FACTS;-

1-श्री कृष्ण भारत में अवतरित हुये भगवान विष्णु के 8वें अवतार और हिन्दू धर्म के ईश्वर हैं। कन्हैया, श्याम, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी उनको जाना जाता हैं।श्री कृष्ण निष्काम कर्मयोगी, एक आदर्श दार्शनिक, स्थितप्रज्ञ एवं दैवी संपदाओं से सुसज्ज महान पुरुष थे। उनका जन्म द्वापरयुग में हुआ था। उनको इस युग के सर्वश्रेष्ठ पुरुष युगपुरुष या युगावतार का स्थान दिया गया है।

2-श्रीकृष्ण के समकालीन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत और महाभारत में कृष्ण का चरित्र विस्तुत रूप से लिखा गया है। भगवद्गीता कृष्ण और अर्जुन का संवाद है जो ग्रंथ आज भी पूरे विश्व में लोकप्रिय है। इस कृति के लिए कृष्ण को जगतगुरु का सम्मान भी दिया जाता है। श्री कृष्ण वसुदेव और देवकी की 8वीं संतान थे। मथुरा के कारावास में उनका जन्म हुआ था और गोकुल में उनका लालन पालन हुआ था। यशोदा और नन्द उनके पालक माता पिता थे। उनका बचपन गोकुल में व्यतीत हुआ।

3-बाल्य अवस्था में ही उन्होंने बड़े बड़े कार्य किये जो किसी सामान्य मनुष्य के लिए सम्भव नहीं थे। मथुरा में मामा कंस का वध किया। सौराष्ट्र में द्वारका नगरी की स्थापना की और वहाँ अपना राज्य बसाया। पांडवों की मदद की और विभिन्न आपत्तियों में उनकी रक्षा की। महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाई और भगवद्गीता का ज्ञान दिया जो उनके जीवन की सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है।

-"कृष्ण" मूलतः एक संस्कृत शब्द है, जो "काला", "अंधेरा" या "गहरा नीला" का समानार्थी है। "अंधकार" शब्द से इसका सम्बन्ध ढलते चंद्रमा के समय को कृष्ण पक्ष कहे जाने में भी स्पष्ट झलकता है।इस नाम का अनुवाद कहीं-कहीं "अति-आकर्षक" के रूप में भी किया गया है।

5-श्रीमदभागवत पुराण के वर्णन अनुसार कृष्ण जब बाल्यावस्था में थे तब नन्दबाबा के घर आचार्य गर्गाचार्य द्वारा उनका नामकरण संस्कार हुआ था। नाम रखते समय गर्गाचार्य ने बताया कि, 'यह पुत्र प्रत्येक युग में अवतार धारण करता है। कभी इसका वर्ण श्वेत, कभी लाल, कभी पीला होता है। पूर्व के प्रत्येक युगों में शरीर धारण करते हुए इसके तीन वर्ण हो चुके हैं। इस बार कृष्णवर्ण का हुआ है, अतः इसका नाम कृष्ण होगा। वासुदेव का पुत्र होने के कारण उसका अतिरतिक्त नाम वासुदेव भी रखा गया। "कृष्ण" नाम के अतिरिक्त भी श्री कृष्ण भगवान को कई अन्य नामों से जाना जाता रहा है, जो उनकी कई विशेषताओं को दर्शाते हैं। सबसे व्यापक नामों में "मोहन", गोविन्द, माधव, और गोपाल प्रमुख हैं।

श्री कृष्ण के रहस्य;- 02 FACTS;- 1- भगवान श्री कृष्ण का नाम मुंह में आते ही हमारे आँखो के सामने उनके सुन्दर बाल छवि या उनके युवा छवि का चेहरा समाने आ जाता है. श्री कृष्ण के हर छवि में उनके मष्तक पर मोर पंख शोभायमान होता है. भगवान श्री कृष्ण को मोर पंख इतना पसंद था की वह उनके श्रृंगार का हिस्सा बन गया था. 2-कहते हैं कि कृष्ण अपनी देह को अपने हिसाब से ढ़ाल लेते थे। कभी उनका शरीर स्त्रियों जैसा सुकोमल हो जाता था तो कभी अत्यंत कठोर। युद्ध के समय उनका शरीर वज्र की तरह कठोर हो जाता था। ऐसा इसलिए हो जाता था क्योंकि वे योग और कलारिपट्टू विद्या में पारंगत थे। श्री कृष्ण का मोर मुकुट धारण करने का रहस्य;- बर्हापीड–श्रीकृष्ण के मस्तक पर मोर पंख का मुकुट है। बालकृष्ण को मोर बहुत पसन्द है।भगवान श्री कृष्ण के मुकुट में मोर पंख धारण करने के संबंध में विद्वानों ने अनेक तर्क दिए है. 10 FACTS;- 1. सारे संसार में मोर ही एकमात्र ऐसा प्राणी माना जाता है जो अपने सम्पूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है. मोरनी का गर्भ धारण मोर के आँसुओ को पीकर होता है. अतः इतने पवित्र पक्षी के पंख को स्वयं भगवान श्री कृष्ण अपने मष्तक पर धारण करते है. 2 .कहा जाता है की राधा के महल में बहुत मोर हुआ करते थे व जब भगवान श्री कृष्ण के बासुरी के धुन में राधा नृत्य करती थी तो उनके साथ वे मोर भी नाचा करते थे. एक दिन किसी मोर का पंख नृत्य करते समय जमीन पर गिर गया जिसे भगवान श्री कृष्ण उठा लेते हैं और कहते हैं कि अरे यह तो हमें पुरस्कार मिला है, उसे अपने सिर पर धारण कर लेते हैं। इसीलिये इनको बर्हापीड़ भी कहते हैं।भगवान कृष्ण के सर पर स्थित मोर पंख राधा के प्रेम की निशानी भी मना जाता है. 3. विद्वानों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण को मोर पंख प्रिय होने का एक यह कारण भी हो सकता है की वे अपने मित्र और शत्रु में कोई भेद नहीं करते थे, वे दोनों के साथ समान भावना रखते थे. इसका उद्धाहरण यह है की भागवान श्री कृष्ण के भाई थे बलराम जो शेषनाग के आवतार माने जाते है व नाग और मोर में बहुत भयंकर शत्रुता होती है. अतः श्री कृष्ण मोर का पंख अपने मुकुट में लगाकर यह संदेश देते है की वे सभी के प्रति समान भावना रखते है. 4 . मोरपंख में सभी तरह के रंग पाए जाते है , गहरे और हलके. भगवान श्री कृष्ण मोर पंख के इन रंगो के माध्यम से यही संदेश देना चाहते है की हमारा जीवन भी इसी तरह के सभी रंगो से भरा पडा है कभी चमकीला तो कभी हल्का, इसी तरह जीवन में भी इन रंगो के भाति कभी सुख आते है और कभी दुःख. 5-श्रीकृष्ण गले में गुँजामाला धारण करते हैं। यह माला उन्हें बहुत प्रिय है। ब्रह्माण्ड का आकार गुँजा जैसा है। श्रीकृष्ण अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड के नायक हैं। उन्होंने ब्रह्माजी को बताया कि तुम तो एक ही ब्रह्माण्ड के ब्रह्मा हो, ऐसे ऐसे अनेक ब्रह्माण्ड मेरे श्रीअंग में विलास करते हैं। इसीलिये उन्होंने गले में गुँजामाला धारण की है। 6-नटवरवपु...श्रीकृष्ण का शरीर ऐसा है कि देखने में लगता है कि मानो लावण्य दौड़ रहा है। वह तरह-तरह के वेश धारण कर लेते हैं। कभी खड़िया से सुन्दर श्रृंगार करते हैं। कभी फेंटे को बांध लेते हैं। 7-कर्णिकार अमलतास के लम्बे लम्बे लटकते हुये फूलों को कहते हैं। इसे कनेर या करवीर का पुष्प भी कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण इस गंधहीन पुष्प को अपने कान में लगाकर रखते हैं। 8- श्रीराधा का शरीर स्वर्णमयी आभा लिये हुये है इसीलिए श्रीकृष्ण ने उनके समान वस्त्र धारण किये हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि भगवान पृथ्वी के उद्धार के लिये अवतरित हुये हैं अत: उन्होंने पृथ्वी के पीले रंग के वस्त्र धारण किये हैं। 9-भगवान के गले में पांच वर्ण के पुष्पों की वैजयन्ती माला है जिसमें शोभा, सौन्दर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीजी छिपी रहती हैं। 10-वेणु एक तो पुरुष है, बांस की बनती है, दूसरे कठोर है। तीसरे उसमें छेद हैं परन्तु इतना होने पर भी श्रीकृष्ण उसे अपने अधरों पर धारण करते हैं क्योंकि वह पोली होती है, अपने अन्दर कुछ भी छिपाकर नहीं रखती। भगवान ने स्वयं कहा है, ‘मोहे कपट छल छिद्र न भावा’। बांस गर्मी, सर्दी, बरसात सहकर भी चीरकर बांसुरी बना लेने पर मीठी तान ही सुनाता है। इसीलिये श्रीकृष्ण को बांसुरी प्रिय है। जीव और ब्रह्म का मिलन ... महारास ;- 04 FACTS;- 1-रासलीला का वर्णन श्रीमद्भागवत में दशम स्कन्ध के अध्याय २९ से ३३ तक में है। ये पांच अध्याय ’श्रीरासपंचाध्यायी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये श्रीमद्भागवतरूपी शरीर के ‘पांच प्राण’ या ‘हृदय’ माने जाते हैं। पंच प्राणों का ईश्वर के साथ रमण ही ‘रास’ है। 2-इस रासलीला के श्रोता हैं–धर्म-ज्ञान, विवेक, वैराग्य से पूर्ण व मरण की प्रतीक्षा करने वाले राजा परीक्षित और वक्ता हैं–ब्रह्मनिष्ठ परम योगी जीवन्मुक्त श्रीशुकदेवजी। इसलिए यह लौकिक श्रृंगारलीला नहीं वरन् भगवान श्रीकृष्ण की अपनी ह्लादिनी शक्ति श्रीराधा और उनकी अन्तरंग शक्तियां कायव्यूहरूपा गोपांगनाओं के साथ होने वाली परम दिव्य रसमयी लीला का वर्णन है। 3-भारतीय वाङग्मय के अघ्ययन से प्रकट होता है कि राधा प्रेम का प्रतीक थीं और कृष्ण और राधा के बीच दैहिक संबंधों की कोई भी अवधारणा शास्त्रों में नहीं है। इसलिए इस प्रेम को “भव्य प्रेम” की श्रेणी में रखते हैं और इसलिए कृष्ण के साथ सदा राधाजी को ही प्रतिष्ठा मिली। 4-भगवान श्रीकृष्ण ने शरद् पूर्णिमा की धवल रात्रि में व्रजगोपियों के संग रासलीला की थी और अपनी योगमाया से इस रात्रि को छ: माह के बराबर कर दिया था अर्थात् यह रासलीला लौकिक सृष्टि के स्तर से ऊपर थी। इस लीला में जीव और ईश्वर का मिलन वर्णित है। 5-सोलह कलाओं से परिपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मुख्यत: आनंद प्रधान माना जाता है। उनके आनंद भाव का पूर्ण विकास उनकी मधुर रस लीला में हुआ है। यह मधुर रस लीला उनकी दिव्य रास क्रीड़ा है , जो श्रृंगार और रस से पूर्ण होते हुए भी इस स्थूल जगत के प्रेम व वासना से मुक्त है।

6-इस रासलीला में वे अपने अंतरंग विशुद्ध भक्तों (जो उनकी निज रसरूपा राधा की सोलह हजार कायरूपा गोपियां हैं) के साथ शरत् की रात्रियों में विलास करते हैं। कृष्ण की इस रासलीला में दो धाराएं हैं , जो दोनों ओर से आती हैं और एकाकार हो जाती हैं। हर क्षण नया मिलन , नया रूप , नया रस और नई तृप्ति- यही प्रेम-रस का अद्वैत स्वरूप है और इसी का नाम रास है। 7-भगवान के साथ रासलीला के लिए जीवात्मा का दिव्य शरीर और दिव्य मन होना अनिवार्य है। दूसरे शब्दों में ,इस मधुर रस लीला में शुद्ध जीव का ब्रह्म से विलासपूर्ण मिलन है ,जिसमें लौकिक प्रेम व काम अंशमात्र भी नहीं है। शुद्ध जीव का अर्थ है- माया के आवरण से रहित जीव। ऐसे जीव का ही ब्रह्म से मिलन होता है। क्या है महारास का रहस्य;- 03 FACTS;- 1-मार्गदर्शक चिंतन-शरद पूर्णिमा वह पावन दिवस जब भगवान श्रीकृष्ण ने वृन्दावन में असंख्य गोपिकाओं के साथ "महारास" रचाया था। शास्त्रों में कहा गया कि परमात्मा रसस्वरूप है अथवा जो रस तत्व है, वही परमात्मा है। 2-श्रीकृष्ण द्वारा उसी आनंद रूप रस का गोपिकाओं के मध्य वितरण ही तो "रास" है। यानि एक ऐसा महोत्सव जिसमें स्वयं ब्रह्म द्वारा जीव को अपने ब्रह्म रस में डुबकी लगाने का अवसर प्रदान किया जाता है। जीवन के अन्य सभी सांसारिक रसों का त्याग कर जीव द्वारा ब्रह्म के साथ ब्रह्मानन्द के आस्वादन का सौभाग्य ही "महारास" है। 3-काम तभी तक जीव को सताता है जब तक जीव जगत में रहे, जगदीश की शरण लेते ही उसका काम स्वतः गल जाता है। अतः "महारास" जीव और जगदीश का मिलन ही है। इसीलिए श्रीमद् भागवत जी में कहा गया कि जो काम को मिटाकर राम से मिला दे, वही "महारास" है। रास क्या है?- 03 FACTS;- 1-रास क्या है? यह है श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के स्वरूपानन्द का वितरण। ‘रास’ शब्द का मूल ‘रस’ है। ‘रस’ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। परन्तु बिना योगमाया के रास नहीं हो सकता क्योंकि रस को अनेक बनाकर ही रास हो सकता है। रस के समूह को रास कहते हैं। 2-जिस दिव्य लीला में एक ही रस अनेक रसों के रूप में प्रकट होकर अनन्त-अनन्त रस का वितरण करे, उसी का नाम ‘रास’ है। रास चिदानन्दमय भगवान के स्व-स्वरूप-वितरण की मधुर लीला है, जिसके भोक्ता-भोग्य दोनों स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही होते हैं। 3-हनुमानप्रसादजी पोद्दार के अनुसार;- आस्वादक आस्वाद्य न दो थे, था मधुमय लीला-संचार। था यह एक विलक्षण पावन परम प्रेमरस का विस्तार।। मधुर परम इस रस-सागर में गोपीजन का ही अधिकार। परम त्याग का मूर्त रूप लख जिन्हें किया हरि ने स्वीकार। गोपियां कौन थीं?- 06 FACTS;- 1-जब ऋषि मुनि हजारों वर्षों तक तपस्या और ब्रह्म चिंतन करते रहने पर भी मन में बसे काम को न मार सके तो उस काम को भी ‘श्रीकृष्णार्पण’ करने की इच्छा से गोपियां का अवतार लेकर गोकुल में आ बसे। इनमें साधन सिद्धा, ऋषि रूपा, श्रुति रूपा, स्वयं सिद्धा, अन्य पूर्वा, अनन्य पूर्वा आदि कई प्रकार की गोपियां थीं। 2-सांसारिक भोगों का उपभोग करने के पहले ही जिसे वैराग्य आ जाता है, वह अनन्यपूर्वा गोपी है। संसार के सभी सुखों का मन से त्याग करके ईश्वर से मिलने के लिए गोपी की भांति निकल पड़ने वाले को ही ईश्वर का सांनिध्य प्राप्त होता है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण भी गोपियों का स्वागत कर उन्हें ‘महाभागा’ कहते हैं–‘स्वागतं वो महाभागा:’। 3-भगवान श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान हैं, पूर्ण परब्रह्म के अवतार हैं और सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हैं। भगवान के समान गोपियां भी सच्चिदानन्दमयी हैं। उनके हृदय में श्रीकृष्ण को तृप्त करने वाला प्रेमामृत है। 4-ब्रह्मा, शंकर, उद्धव और अर्जुन–जिन्होंने गोपियों को पहिचाना है, उन्होंने गोपियों की चरणधूलि प्राप्त करने की अभिलाषा की व गोपियों की उपासना करके भगवान के चरणों में प्रेम का वरदान प्राप्त किया। 5-देव, गन्धर्व, किन्नर तथा नारद आदि ने भी आकाश से एवं महादेवजी ने स्वयं गोपी बनकर गोपीश्वर महादेव के रूप में वंशीवट पर वृन्दावन में रासलीला में प्रवेशकर महारास को अपने तीनों नेत्रों से निहारा है। आज भी श्रीगोपीश्वर महादेव के रूप में निहार रहे हैं। 6-विभिन्न विद्वानों ने श्रीकृष्ण को वेद-पुरुष एवं व्रजगोपियों को उनकी ऋचाओं के रूप में स्वीकारते हुए रासलीला को वेद के विस्ताररूप में देखा है। रासलीला का आध्यात्मिक रहस्य;- 13 FACTS;- 1-माया के आवरण से रहित शुद्ध जीव का ब्रह्म के साथ विलास ही ‘रास’ है। गोपियों के वासना और अज्ञान के आवरण को हटाने के लिए श्रीकृष्ण ने महारास से पूर्व ‘चीरहरण’ लीला की थी। जीवात्मा का परमात्मा के सामने कोई पर्दा नहीं रह सकता। पर्दा माया में ही है। पर्दा होने से वासना और अज्ञान आत्मा को ढक देते हैं और परमात्मा को दूर करते हैं। 2-चीर-हरण से गोपियों का उक्त मोह भंग हुआ। जीव का ब्रह्म से मिलन सहज नहीं होता। चीरहरण लीला द्वारा श्रीकृष्ण ने गोपियों के वासना और अज्ञान रूपी वस्त्रों के आवरण को हटा दिया और शुद्ध-बुद्ध गोपियों के साथ महारास किया। पति के वियोग में छटपटाती पत्नी की भांति जब जीव ईश्वर के वियोग में छटपटाता है, तभी जीव को ईश्वर मिलते हैं। 3-भगवान श्रीकृष्ण ने व्रज में जो वेणुवादन किया तो उसकी ध्वनि दिव्य लोकों में पहुंचकर वहां के देवताओं को भी स्तम्भित कर देती है किन्तु रासलीला की बांसुरी तो ईश्वर से मिलनातुर अधिकारी जीव गोपी को ही सुनाई देती है। 4-वंशी-ध्वनि क्या थी? यह भगवान का आह्वान था। जो अपनी समस्त इन्द्रियों के द्वारा केवल भक्तिरस का ही पान करे, वही गोपी है। ‘स्त्रीत्व’ तथा ‘पुरुषत्व’ की विस्मृति होने के बाद ही गोपीभाव जागता है। शुद्ध गोपीभाव जागने के बाद ही रास की वंशी का स्वर कानों में सुनाई देने लगता है। इसी कारण वेणुनाद एवं रास की अधिकारिणी गोपियाँ ही हुईं। 5-गोपियों ने अपना मन श्रीकृष्ण में मिला दिया था। अत: भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया ने रासलीला के लिए गोपियों के दिव्य मन, दिव्य स्थल की सृष्टि की। 6-अगर रासलीला लौकिक श्रृंगारलीला होती को गोपियां सज-धज कर जातीं परन्तु यहां तो भगवान का आह्वान सुनकर उन्हें जगत भूल गया। उन्होंने उल्टे-सीधे वस्त्र पहन लिए। उनका विचित्र श्रृंगार हो गया। गोविन्द ने उनके मन को हर लिया था। 7-भगवान हैं बड़े लीलामय। उन्हीं की इच्छा से, उन्हीं की वंशी के प्रेमाह्वान पर देह का भान भूली गोपियां जब भगवान के पास पहुंचती हैं तो उन्होंने ऐसी भाव-भंगिमा प्रकट की मानो उन्हें गोपियों के आने का कुछ पता ही न हो और वे उनसे पूछते हैं–’गोपियो! व्रज में कोई विपत्ति तो नहीं आई, घोर रात्रि में यहां आने का कारण क्या है? मेरे पास क्यों आयी हो? पतिसेवा और संतानसेवा करो, वहीं तुम्हें सुख मिलेगा। मैं सुख नहीं केवल आनन्द ही दे सकता हूँ।’ 8-भगवान जीव को संसार में लौटाते हैं, प्रलोभन देते हैं, मायाजाल में फंसाते हैं।रास-शिरोमणि श्रीकृष्ण गोपियों को स्त्री धर्म समझाते हैं। गोपियां जानतीं थीं कि श्रीकृष्ण योगेश्वर, अन्तर्यामी, पूर्णब्रह्म हैं। गोपियां उसका उत्तर देती हैं–’आप ही हमारे सच्चे पति हैं। जब हमें साक्षात् परमात्मा मिल गए तो लौकिक पति से क्या लेना-देना? अब हमारे लिए स्त्री-धर्म पालन करने की आवश्यकता ही नहीं है।’ 9-गोपियां आगे कहती हैं–’हे गोविन्द! हमारे पांव आपके चरण-कमलों को छोड़कर एक पग भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, हम व्रज को लौटें तो कैसे? हमारा मन आपमें ही रमा हुआ है। हम आपके स्वरूप में तदाकार होना चाहती हैं।’ 10-गोपियों ने अपने हृदय में जिस विशुद्ध प्रेमामृत को भर रखा था, उस प्रेमामृत की चाह पूर्णकाम भगवान को हो गई। भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि गोपियों का प्रेम सच्चा है, ये शुद्ध भाव से मुझसे मिलने आईं हैं, अत: उन्होंने उन्हें अपना लिया। 11-गोपियों ने भगवान को प्रेमामृत दिया। गोपियों ने भगवान को सुखी देखा तो उनको परम सुख हुआ और भगवान ने गोपियों को सुखी देखा तो भगवान को परम सुख हुआ। ‘एक-दूसरे को सुखी बनाकर सुखी होना’–इसी का नाम ‘रास’ है। यह रासलीला त्याग की पराकाष्ठा का रूप बताने वाली है। 12-श्रीकृष्ण ने एक साथ अनेक रूप धारण किए। जितनी गोपियां थीं, उतने स्वरूप बना लिए और प्रत्येक गोपी के साथ एक-एक स्वरूप रखकर रासलीला आरम्भ की। हजारों जन्मों की तपस्या के फलस्वरूप विरही जीव आज ईश्वरमय हो गया। गोपियां श्रीकृष्णमय और भगवन्मय हो गयीं। सभी हाथों से हाथ मिलाकर नाचने लगे। रास में साहित्य, संगीत और कला (नृत्य) का समन्वय हुआ है। 13-गोपियां आनन्दातिरेक में नाच रहीं थीं। उन्हें देखकर श्रीकृष्ण ने भी ताल का अनुसरण करते हुए नाचना शुरु कर दिया।ब्रह्म से जीव का मिलन हुआ। जैसे नन्हा-सा शिशु निर्विकार-भाव से अपनी परछाई के साथ खेलता है, वैसे ही रमारमण भगवान श्रीकृष्ण ने व्रजसुन्दरियों के साथ विहार किया। न कोई जड शरीर था और न प्राकृत अंग-संग। भगवान श्रीकृष्ण की इस चिदानन्द रसमयी दिव्य क्रीडा का नाम ही रास है। ब्रह्माजी, देवर्षि नारद एवं रासलीला;- 04 FACTS;- 1-महारास देखते हुए ब्रह्माजी संशकित हुए कि इस प्रकार परायी नारियों से लीला करना शास्त्र-मर्यादा का उल्लंघन है। वे यह नहीं समझ सके कि प्रेम का रास , विलास नहीं , धर्म का फल है , यानी प्रेम का फल है। कृष्ण ने अचानक सभी सोलह हजार गोपियों को अपना स्वरूप दे दिया और सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण दिखाई देने लगे। गोपियां हैं कहां ? 2-भगवान श्रीकृष्ण ने एक और लीला रची–श्रीकृष्ण ने सभी गोपियों को अपना स्वरूप दे दिया। अब तो सब जगह कृष्ण-ही-कृष्ण दिखायी दे रहे थे। गोपियां थीं ही नहीं। महारास प्रेम का अद्वैत स्वरूप है , जिसमें भगवत् स्वरूप हो जाने के बाद जीव का स्वत्व नहीं रहता ।सभी पीताम्बरधारी कृष्ण हैं और एक-दूसरे से रास खेल रहे हैं।अब श्रीकृष्ण के साथ श्रीकृष्ण की क्रीड़ा हो रही है।शुद्ध जीव अब ब्रह्म बन गया है। ब्रह्म का ब्रह्म के साथ विलास करने का नाम रास है। 3-ब्रह्माजी ने मान लिया कि यह स्त्री-पुरुष का मिलन नहीं है; यह तो अंश और अंशी का मिलन है। श्रीकृष्ण गोपीरूप हो गए हैं और गोपियां श्रीकृष्णमय हो गयीं। कृष्णरूप (ब्रह्मरूप) हो जाने के बाद गोपी (जीव) का अस्तित्व कहां रहा? 4-महारास के समय नारदजी वहां आए और अंदर जाने लगे तो सखियों ने उन्हें रोक दिया। नारदजी सोचने लगे कि यदि मैं ब्रह्मा का पुत्र न होकर गोपी होता तो मुझे भी आज परमात्मा का आलिंगन प्राप्त होता। वे ‘राधे-राधे’ कहकर रोने लगे। श्रीराधा को उन पर दया आ गई और उन्हें महारास में प्रवेश की आज्ञा मिल गयी। नारदजी ने राधाकुण्ड में स्नान किया तो उनमें अलौकिक गोपीभाव जाग्रत हो गया और नई नारदी गोपी बनकर परमात्मा श्रीकृष्ण की अलौकिक लीला के साक्षी बने। रासलीला : काम-विजय लीला या मदन मान-भंग लीला;- 04 FACTS;- 1-भगवान श्रीकृष्ण ने जिस प्रकार ब्रह्माजी का गर्व ‘गो-वत्स हरण लीला’ करके, अग्नि का गर्व ‘दावानल-पान लीला’ करके और इन्द्र का गर्व ‘गोवर्धन-धारण लीला’ करके नष्ट किया, उसी प्रकार उन्होंने रासलीला करके कामदेव का गर्व नष्ट किया। 2-यह रासलीला काम के पराभव के लिए हुई है।कामदेव ने जब सब देवताओं को वश में कर लिया तब उसको अभिमान हो गया और उसने भगवान को भी पराजित करने का विचार किया। 3-कामदेव ने भगवान से कहा–’मेरी इच्छा है कि शरद् ऋतु की पूर्णिमा हो, मध्य रात्रि का समय हो उस समय आप स्त्रियों के साथ क्रीडा कीजिए। मैं आकाश में रहकर बाण मारूँ। यदि आपके मन में विकार पैदा हो, तो मैं ईश्वर होऊंगा।’ भगवान तो कन्दर्प-दर्पदलन हैं। श्रीकृष्ण विहार तो गोपियों के साथ कर रहे थे परन्तु उनका मन निर्विकार था। 4-अनेक प्रयत्न करने पर भी कामदेव भगवान श्रीकृष्ण को अपने अधीन न कर सका। भगवान ने मदन का पराभव किया अत: ‘मदनमोहन’ कहलाए। भगवान लौकिक काम को अलौकिक काम से मारते हैं। रासलीला : कुछ महत्वपूर्ण तथ्य;- 04 FACTS;- 1-रासलीला में ब्रह्म ही ऋषियों से, गोपियों से, आह्लादिनी शक्ति से एवं जीवधारियों से मिल रहा है। इस प्रकार रासलीला में (A) गोपी के शरीर से कुछ लेना-देना नहीं है। (B) लौकिक काम का अंश भी नहीं है। (C) रासलीला में किसी स्त्री को प्रवेश नहीं मिला है। उसमें तो शुद्ध जीव ही जा सकता है। (D) यह जीव और ब्रह्म का मिलन है। (E) रासलीला एक आनन्द प्रधान लीला है। रासलीला पठन व श्रवण का महत्व;- 1-श्रीशुकदेवजी ने इस रासलीला के श्रवण का अपूर्व फल बतलाया है–’हृद्रोग व काम का नाश और प्रेमाभक्ति की प्राप्ति।’ इस रासलीला का चिन्तन करने से काम वासना नष्ट होती है। 2-हनुमानप्रसादजी पोद्दार जो इस मधुर शुद्ध रस का किंचित् भी कर पाता आस्वाद। दृश्य जगत् का मिटता सारा शोक-मोह-भय-लोभ-विषाद।। होता कामरोग का उसके जीवन में सर्वथा अभाव। राधा-माधव-चरण-रेणु-कण-करुणा से वह पाता ‘भाव’।। मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है रासलीला। ईश्वर को प्राप्त किए बिना जीव को शान्ति नहीं मिल सकती। जीव ईश्वर के साथ एक हुआ नहीं कि मुक्त हो गया। क्यों है भगवान कृष्ण का रंग नीला ?- 07 FACTS;- 1-“कृष्ण” का अर्थ;-“कृष्ण” संस्कृत के इस शब्द का प्रयोग ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जिसका रंग काला या श्याम हो। मूर्तियों में श्रीकृष्ण को काले वर्ण का दर्शाया जाता है वहीं तस्वीरों में उनकी देह को नीले रंग में प्रदर्शित किया जाता है। 2-ब्रह्म संहिता में श्रीकृष्ण के वर्ण को नीले बादलों के साथ छमछमाते हुए कहा गया है। कलाकृतियों में भी कृष्ण को नीले रंग का दर्शाया जाता है।श्रीकृष्ण के अलावा हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में शिव को भी नीले रंग में प्रदर्शित किया गया है। उन्हें नीलकंठ कहा गया है। शिव को नीलकंठ इसलिए कहा जाता है क्योंकि विषपान की वजह से उनका गला नीला हो गया था। 3-प्रेम के स्वरूप भगवान कृष्ण ने जीवन के अलग-अलग पहलुओं को बड़ी ही सहजता के साथ शब्द दिए हैं।धरती, पाताल, अंतरिक्ष, कोई भी लोक हो, कृष्ण अपनी मौजूदगी हर जगह दर्ज करवाते हैं।कृष्ण का तो अर्थ ही होता है सबसे अधिक आकर्षक। 4-शायद यही वजह है कि कृष्ण भले ही अपने किसी भी स्वरूप में क्यों ना हों, एक बार जो उन्हें देख ले वह अपनी नजर उनसे हटा ही नहीं पाता।लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि कृष्ण को हमेशा नीले रंग में ही क्यों दर्शाया गया है? आखिर कृष्ण के इस नीले रंग का रहस्य क्या है? 5-कृष्ण के इस नीले रंग के पीछे अलग-अलग सिद्धांत मौजूद हैं जिनमें से एक के अनुसार विष्णु का संबंध पानी से है इसलिए उन्होंने जितने भी अवतार लिए, जिनमें से कृष्ण भी एक हैं, उनका रंग भी नीला है।हिन्दू धर्म में उन सभी किरदारों को नीले रंग में प्रस्तुत किया गया है, जिनके पास बुराई से लड़ने की ताकत होती है । 7-कृष्ण के नीले रंग के पीछे एक और मान्यता यह भी है कि प्रकृति ने अपनी रचनाओं में से ज्यादातर को नीला रंग दिया है, जैसे सागर, आकाश, आसमान।इसलिए ऐसा व्यक्ति जिसके भीतर स्थिरता, धैर्य, शीतलता, साहस, समर्पण जैसी भावनाएं हैं उसे भी नीले रंग के रूप में ही देखा जाता है। ये सभी गुण कृष्ण के भीतर मौजूद हैं। क्या वास्तव में श्रीकृष्ण की 16 हजार 108 पत्नियां थी?- 04 FACTS;- 1-कृष्ण का अर्थ हैं अंधकार में विलीन होने वाले, सम्पूर्ण को अपने में समा लेने वाला। इसी भांति राधा शब्द भी धारा का उल्टा है। जहां धारा किसी स्रोत से बाहर आती है वहीं राधा का अर्थ है वापिस अपने स्रोत में समाना। यही कारण है कि राधाकृष्ण युगल को हिंदू धर्मों में शिव-पार्वती जैसी पवित्र भावना के साथ देखा जाता है। राधाकृष्ण वस्तुत कोई युगल (दो भिन्न स्त्री-पुरुष) है ही नहीं, वरन स्वयं में ध्यानलीन होना ही है।

2-पिंगला,इड़ा और सुषुम्णा इन तीन नाडि़यों में से एक सुषुम्णा ही सर्वप्रमुख है,क्योंकि यह योगियों के लिए अत्यंत प्रिय है,क्योंकि यह उनके लिए परमपदरूप आश्रय को देने वाली है। अन्य जितनी भी नाडि़यां हैं, वे सब भी देह में ही स्थित रहती है। ये तीनों नाडि़यां कमल-तंतु के समान अधोमुख होकर स्थित रहती हैं। ये तीनों चंद्र, सूर्य और अग्नि रूपिणी हैं तथा शरीर के पृष्ठवंश अर्थात् मेरुदंड के आश्रय में अवस्थित हैं।

3-श्रीराधा इड़ा औरश्री कृष्ण पिंगला हैं।परंतु राधाकृष्ण युगल रूप में सुषुम्णा में अवस्थित होते हैं।इस प्रकार हम देखते हैं कि जिस परमपद -प्राप्ति की बात योगी व भक्तजन करते रहते हैं,वह शरीर में उपस्थित है। 4-भागवतपुराण के अनुसार अष्ट (देह) प्रकृति के आठ सिद्धातों/सिद्धि के रूप को श्रीकृष्ण की पत्नियां कहा गया है यानि उन्होंने इन आठ पत्नियों से विवाह किया था, जोकि वास्तव में जीवन में अपनाए गए उनके आठ सिद्धांत थे. शेष 16 हजार रानियों से उन्होंने विवाह नहीं किया था लेकिन उन्हें श्रीकृष्ण की पत्नी होने का समान दर्जा दिया जाता है. अष्ट सिद्धि क्या है?- 03 FACTS;- 1-सिद्धियाँ हजारों तरह की होती हैं उन्हें प्राप्त करने के तरीके अलग –अलग शास्त्रों में वर्णित हैं सिद्धियाँ गुण अनुसार सत् रज तम तीन तरह की होती हैं तमोगुण सिद्धि शीघ्र प्राप्त होती है रजोगुण सिद्धि काफी प्रयत्न से प्राप्त होती है और सतोगुणी सिद्धि ईश्वर की इच्छा से प्राप्त होती है । 2-यहाँ आठ सतोगुणी मुख्य सिद्धियाँ का वर्णन किया जा रहा है। पंच तत्वों की स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थतत्व—ये पाँच अवस्थाएँ हैं। इन पर संयम करने से जगत् का निर्माण करने वाले पंचभूतों पर विजयलाभ प्राप्त होता है और प्रकृति वशीभूत हो जाती है। 3-इससे अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्व, ईशित्व—ये अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। अष्ट सिद्धियाँ का वर्णन;- 1-अणिमा सिद्धि;- अपने को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता ही अणिमा है. यह सिद्धि वह सिद्धि है, जिससे युक्त होकर व्यक्ति सूक्ष्म रूप धारण कर एक प्रकार से दूसरों के लिए अदृश्य हो जाता है. इसके द्वारा आकार में लघु होकर एक अणु रुप में परिवर्तित हो सकता है. अणु एवं परमाणुओं की शक्ति से सम्पन्न हो साधक वीर व बलवान हो जाता है. अणिमा की सिद्धि से सम्पन्न योगी अपनी शक्ति द्वारा अपार बल पाता है. 2-महिमा सिद्धि;- अपने को बड़ा एवं विशाल बना लेने की क्षमता को महिमा कहा जाता है. यह आकार को विस्तार देती है विशालकाय स्वरुप को जन्म देने में सहायक है. इस सिद्धि से सम्पन्न होकर साधक प्रकृति को विस्तारित करने में सक्षम होता है. जिस प्रकार केवल ईश्वर ही अपनी इसी सिद्धि से ब्रह्माण्ड का विस्तार करते हैं उसी प्रकार साधक भी इसे पाकर उन्हें जैसी शक्ति भी पाता है. 3-गरिमा सिद्धि;- इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को जितना चाहे, उतना भारी बना सकता है. यह सिद्धि साधक को अनुभव कराती है कि उसका वजन या भार उसके अनुसार बहुत अधिक बढ़ सकता है जिसके द्वारा वह किसी के हटाए या हिलाए जाने पर भी नहीं हिल सकता . 4-लघिमा सिद्धि;- स्वयं को हल्का बना लेने की क्षमता ही लघिमा सिद्धि होती है. लघिमा सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत हल्का अनुभव करता है. इस दिव्य महासिद्धि के प्रभाव से योगी सुदूर अनन्त तक फैले हुए ब्रह्माण्ड के किसी भी पदार्थ को अपने पास बुलाकर उसको लघु करके अपने हिसाब से उसमें परिवर्तन कर सकता है. 5-प्राप्ति सिद्धि;- कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता इस सिद्धि के बल पर जो कुछ भी पाना चाहें उसे प्राप्त किया जा सकता है. इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक जिस भी किसी वस्तु की इच्छा करता है, वह असंभव होने पर भी उसे प्राप्त हो जाती है. जैसे रेगिस्तान में प्यासे को पानी प्राप्त हो सकता है या अमृत की चाह को भी पूरा कर पाने में वह सक्षम हो जाता है केवल इसी सिद्धि द्वारा ही वह असंभव को भी संभव कर सकता है. 6-प्राकाम्य सिद्धि;- कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता प्राकाम्य सिद्धि की प्राप्ति है. इसके सिद्ध हो जाने पर दूसरों के मन के विचार आपके अनुरुप परिवर्तित होने लगते हैं. इस सिद्धि में साधक अत्यंत शक्तिशाली शक्ति का अनुभव करता है. इस सिद्धि को पाने के बाद मनुष्य जिस वस्तु कि इच्छा करता है उसे पाने में कामयाब रहता है. व्यक्ति चाहे तो आसमान में उड़ सकता है और यदि चाहे तो पानी पर चल सकता है. 7-ईशिता सिद्धि;- हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना ही इस सिद्धि का अर्थ है. इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक समस्त प्रभुत्व और अधिकार प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है. सिद्धि प्राप्त होने पर अपने आदेश के अनुसार किसी पर भी अधिकार जमाया जा सकता है. वह चाहे राज्यों से लेकर साम्राज्य ही क्यों न हो. इस सिद्धि को पाने पर साधक ईश रुप में परिवर्तित हो जाता है. 8-वशिता सिद्धि;- जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता को वशिता या वशिकरण कही जाती है. इस सिद्धि के द्वारा जड़, चेतन, जीव-जन्तु, पदार्थ- प्रकृति, सभी को स्वयं के वश में किया जा सकता है. इस सिद्धि से संपन्न होने पर किसी भी प्राणी को अपने वश में किया जा सकता है. अष्ट (देह) प्रकृति क्या हैं.? - 11 FACTS;- 1-जैसे अंकों में ज्ञान को एक संख्या में बोलना हो तो १०८ कह दीजिये संपूर्ण ज्ञान इस 108 में है। १०८ का मतलब हुआ ८ जो ईकाई के स्थान पर है, ० दहाई के स्थान पर है, १ सैकड़ा के स्थान पर है। दहाई ८ का मतलब हुआ अष्टधा प्रकृति ये जो पाँच पदार्थ है आकाश, वायु, अग्नि, जल, थल ये पञ्च महाभूत हो गए। और मन, बुद्धि, अहंकार। ये अष्टधा प्रकृति भी कहलाती है..1- पृथ्वी, 2- जल /आप, 3- अग्नि 4- वायु 5-आकाश 6-मन 7-बुद्धि 8-अहंकार. 2-गीता में इसको इसको अष्टधा प्रकृति कहा गया है। तो इस आठ का अर्थ हो गया प्रकृति। सारा ब्रह्माण्ड। आठ का अर्थ, संकेत है सारा ब्रह्माण्ड। ० का अर्थ है आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म जो निराकार है। उस निराकार आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म का संकेत ० है और जो परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म है उसका संकेत १ है। 3-तो इस १०८ का मतलब था सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सम्पूर्ण ज्ञान। प्रकृतिस्थ का ज्ञान, आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म का ज्ञान और परमात्मा-परमेश्वर का ज्ञान..., तीनों ज्ञान स्थित हो जिनमें उसकी टाइटिल १०८ है। 4-वैदिक काल के महान् मनीषियों ने जगत् की उत्पत्ति पर सूक्ष्म विचार करके यह बताया है कि जगत् जड़ पदार्थ (प्रकृति) और चेतनतत्त्व (पुरुष) के संयोग से उत्पन्न होता है। उनके अनुसार पुरुष की अध्यक्षता में जड़ प्रकृति से बनी शरीरादि उपाधियाँ चैतन्ययुक्त होकर समस्त व्यवहार करने में सक्षम होती हैं। 5-एक आधुनिक दृष्टान्त से इस सिद्धांत को स्पष्ट किया जा सकता है।लोहे के बने वाष्प इंजिन में स्वत कोई गति नहीं होती। परन्तु जब उसका सम्बन्ध उच्च दबाब की वाष्प से होता है तब वह इंजिन गतिमान हो जाता है। केवल वाष्प भी किसी यन्त्र की सहायता के बिना अपनी शक्ति को व्यक्त नहीं कर सकती दोनों के सम्बन्ध से ही यह कार्य सम्पादित किया जाता है। 6-भारत के तत्त्वचिन्तक ऋषियों ने वैज्ञानिक विचार पद्धति से इसका वर्णन किया है कि किस प्रकार सनातन पूर्ण पुरुष प्रकृति की जड़ उपाधियों के संयोग से इस नानाविध सृष्टि के रूप में व्यक्त हुआ है।भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में प्रकृति का वर्णन करते हैं तथा अगले श्लोक में चेतन तत्त्व का। यदि एक बार मनुष्य प्रकृति और पुरुष ;जड़ और चेतन का भेद स्पष्ट रूप से समझ ले तो वह यह भी सरलता से समझ सकेगा कि जड़ उपाधियों के साथ आत्मा का तादात्म्य ही उसके सब दुखों का कारण है। 7-स्वाभाविक ही इस मिथ्या तादात्म्य की निवृत्ति होने पर वह स्वयं अपने स्वरूप को पहचान सकता है जो पूर्ण आनन्दस्वरूप है। आत्मा और अनात्मा के परस्पर तादात्म्य से जीव उत्पन्न होता है। यही संसारी दुखी जीव आत्मानात्मविवेक से यह समझ पाता है कि वह तो वास्तव में जड़ प्रकृति का अधिष्ठान चैतन्य पुर