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शिव स्वरोदय के आधार पर स्वरों के साथ उनमें प्रवाहित होने वाले पंच तत्वों का विचार कैसे करें?


क्या है पंच तत्वों का महत्त्वपूर्ण सूक्ष्म विज्ञान?-

08 FACTS;-

1-पंच तत्वों के द्वारा इस समस्त सृष्टि का निर्माण हुआ है। मनुष्य का शरीर भी पाँच तत्वों से ही बना हुआ है।पंचतत्व को ब्रह्मांड में व्याप्त लौकिक एवं अलौकिक वस्तुओं का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कारण और परिणति माना गया है। ब्रह्मांड में प्रकृति से उत्पन्न सभी वस्तुओं में पंचतत्व की अलग-अलग मात्रा मौजूद है। अपने उद्भव के बाद सभी वस्तुएँ नश्वरता को प्राप्त होकर इनमें ही विलीन हो जाती है।तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के किष्किंधाकांड में लिखा है ''क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम सरीरा।''।यह पाँच तत्व है..क्रमश:, क्षिति यानी कि पृथ्वी, जल यानी कि पानी, पावक यानी कि आग, गगन यानी आकाश और समीर यानी कि हवा। 2-योगविद्या में तत्व साधना का अपना महत्त्व एवं स्थान है। पृथ्वी आदि पाँच तत्वों से ही समस्त संसार बना हैं। विद्युत आदि जितनी भी शक्तियाँ इस विश्व में मौजूद हैं। वे सभी इन पञ्च तत्वों की ही अन्तर्हित क्षमता है। आकृति-प्रकृति की भिन्नता युक्त जितने भी पदार्थ इस संसार में दृष्टिगोचर होते हैं वे सब इन्हीं तत्वों के योग-संयोग से बने हैं।न केवल शरीर की,वरन् मन की भी बनावट- तथा स्थिति में इन्हीं पंचतत्वों की भिन्न मात्रा का कारण है। शारीरिक, मानसिक दुर्बलता एवं रुग्णता में भी प्राय: इन तत्वों की ही न्यूनाधिकता पर्दे के पीछे काम करती रहती है। 3-हमारे मनीषियों ने इन पंच तत्त्वों को सदा याद रखने के लिए एक आसान तरीका निकाला और कहा कि यदि मनुष्य 'भगवान' को सदा याद रखे तो इन पांच तत्वों का ध्यान भी बना रहेगा। उन्होंने पंच तत्वों को किसी को भगवान के रूप में तो किसी को अलइलअह अर्थात अल्लाह के रूप में याद रखने की शिक्षा दी।भगवान में आए इन अक्षरों का विश्लेषण इस प्रकार किया गया है- भगवान- भ- भूमि यानि पृथ्वी, ग- गगन यानि आकाश, व- वायु यानि हवा, अ- अग्नि अर्थात आग और न- नीर यानि जल। इसी प्रकार अलइलअइ (अल्लाह)अक्षरों का विश्लेषण इस प्रकार किया गया है- अ- आब यानि पानी, ल- लाब- यानि भूमि, इ- इला-दिव्य पदार्थ अर्थात वायु, अ- आसमान यानि गगन और ह- हरंक यानि अग्नि। इस पांच तत्वों के संचालन व समन्वय से हमारे शरीर में स्थित चेतना (प्राणशक्ति) बिजली-सी होती है। 4-इससे उत्पन्न विद्युत मस्तिक में प्रवाहित होकर मस्तिष्क के 2.4 से 3.3 अरब कोषों को सक्रिय और नियमित करती है। ये कोष अति सूक्ष्म रोम के सदृश्य एवं कंघे के दांतों की तरह पंक्ति में जमे हुए होते हैं। मस्तिष्क के कोष ...पांच प्रकाश के होते हैं और पंच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश) का प्रतिनिधित्व करते हैं। मूलरूप से ये सब मूल तत्व हमारे शरीर में बराबर मात्रा में रहने चाहिए।इन तत्वों का जब तक शरीर में उचित भाग रहता है तब तक स्वस्थता रहती है। जब कमी आने लगती है तो शरीर निर्बल, निस्तेज, आलसी, अशक्त तथा रोगी रहने लगता है। स्वास्थ्य को कायम रखने के लिए यह आवश्यक है कि तत्वों को उचित मात्रा में शरीर में रखने का हम निरंतर प्रयत्न करते रहें और जो कमी आवे उसे पूरा करते रहें। 5-पृथ्वी तत्व असीम सहनशीलता का द्योतक है और इससे मनुष्य धन-धान्य से परिपूर्ण होता है। इसके त्रुटिपूर्ण होने से लोग स्वार्थी हो जाते हैं। जल तत्व शीतलता प्रदान करता है। इसमें विकार आने से सौम्यता कम हो जाती है। अग्नि तत्व विचार शक्ति में सहायक बनता है और मस्तिष्क के भेद अंतर को परखने वाली शक्ति को सरल बनाता है। यदि इसमें त्रुटि आ जाए तो हमारी सोचने की शक्ति का ह्रास होने लगता है। वायु तत्व मानसिक शक्ति तथा स्मरण शक्ति की क्षमता को पोषण प्रदान करता है। अगर इसमें विकार आने लगे तो स्मरण शक्ति कम होने लगती है। आकाश तत्व आवश्यक संतुलन बनाए रखता है। इसमें विकार आने से हमारा शारीरिक संतुलन खोने लगता है।

6-पृथ्वी तत्व का केन्द्र मल द्वार और जननेन्द्रिय के बीच है इसे मूलाधार चक्र कहते हैं। जल तत्व का केन्द्र मूत्राशय की सीध में पेडू पर है इसे स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं। अग्नि तत्व का निवास नाभि और मेरुदण्ड के बीच में है इसे मणिपुर चक्र कहते हैं। वायु केन्द्र हृदय प्रदेश के अनाहत चक्र में है। आकाश तत्व का विशेष स्थान कण्ठ में है, इसे विशुद्ध चक्र कहा जाता है। कब किस तत्व की प्रबलता है इसकी परख थोड़ा सा साधना अभ्यास होने पर सरलतापूर्वक की जा सकती है।

7-पृथ्वी तत्व का रंग पीला, जल का नीला/काला, अग्नि का लाल, वायु का हरा/ भूरा और आकाश का श्वेत /ग्रे है। आँखें बन्द करने पर दिखाई पड़े तब उसके अनुसार तत्व की प्रबलता आँकी जा सकती है। जिह्वा इन्द्रिय को सधा लेने पर मुँह में स्वाद बदलते रहने की प्रक्रिया को समझकर भी तत्वों की प्रबलता जानी जा सकती है। पृथ्वी तत्व का स्वाद मीठा, जल का कसैला, अग्नि का तीखा, वायु का खट्टा और आकाश का खारी होता है। गुण एवं स्वभाव की दृष्टि से यह वर्गीकरण किया जाय तो अग्नि और आकाश सतोगुण वायु और जल रजोगुण तथा पृथ्वी को तमोगुण कहा जा सकता है।

8-शरीर विश्लेषणकर्त्ताओं रासायनिक पदार्थों की न्यूनाधिकता अथवा अमुक जीवाणुओं की उपस्थिति- अनुपस्थिति को शारीरिक असन्तुलन का कारण मानते हैं, पर सूक्ष्मदर्शियों, की दृष्टि में तत्वों का-असन्तुलन ही इन समस्त संभ्रातियों का प्रधान कारण होता है। किस तत्व को शरीर में अथवा मन क्षेत्र में कमी है उसकी पूर्ति के लिए क्या किया जाय, इसका पता लगाने के लिए तत्व विज्ञानी किसी व्यक्ति में क्या रंग कम पड़ रहा है, क्या घट रहा है यह ध्यानस्थ होकर देखते हैं और औषधि उपचारकर्ताओं की तरह जो कमी पड़ी थी, जो विकृति बड़ी थी उसे उस तत्व प्रधान आहार- विहार में अथवा अपने में उस तत्व को उभार कर उसे अनुदान रूप रोगी या अभावग्रस्त को देते हैं। इस तत्व उपचार का लाभ सामान्य औषधि चिकित्सा की तुलना में कहीं अधिक होता है।

.पंच तन्मात्राओं का पंच ज्ञानेन्द्रियों से सम्बन्ध;-

13 FACTS;-

1- पाँच इन्द्रियों के खूँटे से, पाँच तन्मात्राओं के रस्सों से जीव बँधा हुआ है। यह रस्से बड़े ही आकर्षक हैं ।परमात्मा ने पंच तत्वों में तन्मात्रायें उत्पन्न कर और उनके अनुभव के लिये शरीर में ज्ञानेन्द्रियाँ बनाकर, शरीर और संसार को आपस में घनिष्ठ आकर्षण के साथ सम्बद्ध कर दिया है। यदि पंचतत्व केवल स्कूल ही होते, उनमें तन्मात्रायें न होतीं तो इन्द्रियों को संसार के किसी पदार्थ में कुछ आनन्द न आता।

पाँचतत्व पाँच ज्ञानेन्द्रिय पाँचतन्मात्रा

1-1-आकाश कान' 'शब्द'

1-2-वायु त्वचा 'स्पर्श'

1-3-अग्नि नेत्र 'रूप'

1-4-जल जीभ 'रस'

1-5-पृथ्वी नासिका 'गन्ध'

2-आकाश की तन्मात्रा 'शब्द' है। वह कान द्वारा हमें अनुभव होता है। कान भी आकाश तत्व की प्रधानता वाली इन्द्रिय हैं।

3-वायु की तन्मात्रा 'स्पर्श' का ज्ञान त्वचा को होता है। त्वचा में फैले हुए ज्ञान तन्तु दूसरी वस्तुओं का ताप, भार, घनत्व एवं उसके स्पर्श की प्रतिक्रिया का अनुभव कराते हैं। 4-अग्नि तत्व की तन्मात्रा 'रूप' है। यह अग्नि- प्रधान इन्द्रिय नेत्र द्वारा अनुभव किया जाता है। रूप को आँखें ही देखती हैं।

5-जल तत्व की तन्मात्रा 'रस' है। रस का जल-प्रधान इन्द्रिय जिह्वा द्वारा अनुभव होता है, षटरसों का खट्टे, मीठे, खारी, तीखे, कड़ुवे, कसैले का स्वाद जीभ पहचानती है।

6-पृथ्वी तत्व की तमन्मात्रा 'गन्ध' को पृथ्वी गुण प्रधान नासिका इन्द्रिय मालूम करती है।

7-इन्द्रियों में तन्मात्राओं का अनुभव कराने की शक्ति न हो तो संसार का और शरीर का सम्बन्ध ही टूट जाय। जीव को संसार में जीवन-यापन की सुविधा भले ही हो पर किसी प्रकार का आनन्द शेष न रहेगा। संसार के विविध पदार्थों में जो हमें मनमोहक आकर्षण प्रतीत होते हैं उनका एकमात्र कारण 'तन्मात्र' शक्ति है।

8-कल्पना कीजिये कि हम संसार के किसी पदार्थ के रूप में को न देख सकें तो सर्वत्र मौन एवं नीरवता ही रहेगी। स्वाद न चख सकें तो खाने में कोई अन्तर न रहेगा। गंध का अनुभव न हो तो हानिकारक सड़ाँध और उपयोगी उपवन में क्या फर्क किया जा सकेगा। त्वचा की शक्ति न हो तो सर्दी, गर्मी, स्नान, वायु- सेवन, कोमल शैय्या के सेवन आदि से कोई प्रयोजन न रह जायेगा। 9-मानवीय विद्युत की ऊर्जा शरीर के हर अंग में रहती है और वह बाह्य जगत से सम्बन्ध मिलाने के लिए त्वचा के परतों में अधिक सक्रिय रहती है। शरीर का कोई भी अंग स्पर्श किया जाय उसमें तापमान की ही तरह विद्युत ऊर्जा का अनुभव किया जायेगा। यह ऊर्जा सामान्य बिजली की तरह उतना स्पष्ट झटका नहीं मारती या मशीनें चलाने के काम नहीं आती फिर भी अपने कार्यों को सामान्य बिजली की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह सम्पन्न करती है।मस्तिष्क स्पष्टत: एक जीता जागता बिजलीघर है।

10--समस्त काया में बिखरे पड़े अगणित तन्तुओं में संवेदना सम्बन्ध बनाये रहने, उन्हें काम करने की प्रेरणा देने में मस्तिष्क को भारी मात्रा में बिजली खर्च करनी पड़ती है। उसका उत्पादन भी खोपड़ी के भीतर ही होता है ! अधिक समीपता के कारण अधिक मात्रा में बिजली उपलब्ध हो सके, इसीलिए प्रकृति ने महत्त्वपूर्ण ज्ञानेन्द्रियाँ सिर के साथ जोड़कर रखी हैं। आँख, कान, नाक, जीभ जैसी महत्त्वपूर्ण ज्ञानेन्द्रियाँ गरदन से ऊपर ही हैं। इस शिरो भाग में सबसे अधिक विद्युत मात्रा रहती है इसलिए तत्त्वदर्शी आँखें हर मनुष्य के सिर के इर्द-गिर्द प्राय डेढ़ फुट के घेरे में एक तेजोवलय का प्रकाश ..'लाल गोल घेरा' चमकता देख सकती हैं। 11-देवताओं के चित्रों में उनके चेहरे के इर्द-गिर्द एक सूर्य जैसा प्रकाश गोलक बिखरा दिखाया जाता है। इस अलकांर चित्रण में तेजोबलय (Halo)की अधिक मात्रा का आभास मिलता है। अधिक तेजस्वी और मनस्वी व्यक्तियों में स्पष्टत: यह मात्रा अधिक होती है उसी के सहारे वे दूसरों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं।तेजोबलय(Halo) में इन्द्र धनुष जैसे अलग-अलग रेखाओं वाले तो नहीं पर मिश्रित रंग घुले रहते हैं। उनका मिश्रण मन: क्षेत्र में काम करने वाले तत्वों की न्यूनाधिकता के हिसाब से ही होता है। तत्वों की सघनता के हिसाब से रंगों का आभास इस तेजोबलय (Halo)की परिधि में पाया जाता है। 12-सूक्ष्म शरीर में कब कौन सा तत्व बढ़ा हुआ है और किस तत्व की प्रबलता के समय क्या करना अधिक फलप्रद होता है ? यदि इस रहस्य को जाना जा सके तो किसी महत्त्वपूर्ण कार्य का आरम्भ उपयुक्त समय पर किया जा सकता है और सफलता का पक्ष अधिक सरल एवं प्रशस्त बनाया जा सकता है।तत्ववेत्ता मन: शास्त्रियों को अपनी दिव्यदृष्टि इतनी विकसित करनी पड़ती है कि मनुष्य के चेहरे के इर्द-गिर्द विद्यमान तेजोबलय की आभा को देख सकें और उसमें रंगों की दृष्टि से क्या परिवर्तन हुआ है इसे समझ सकें। 13-व्यक्ति की त्वचा का रंग चेहरे पर उड़ता हुआ तेजोबलय(Halo),उसकी स्वाद सम्बन्धी अनुभूतियाँ रंग विशेष की पसन्दगी को कुछ परख कर यह जाना जा सकता है कि उसके शरीर में किस तत्व की न्यूनता एवं किसकी अधिकता है।जिस की न्यूनता हो उसे पूरा करने के लिए उस रंग के वस्त्रों का उपयोग, कमरे की पुताई, खिड़कियों के पर्दे, उसी रंग के काँच में कुछ समय पानी रखकर पीने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। आहार में अभीष्ट रंग के फल आदि का प्रयोग कराया जाता है। रंगीन बल्व की रोशनी पीड़ित भाग या समस्त अंग पर डाली जाती है ।

पांचो तत्वों के गुणों का वर्णन ;-

06 FACTS;-

1-मिट्टी...इसका तत्व नाक है। उसको घ्राण कहते है। सुगंध और दुर्गन्धका ज्ञान उसीसे होता है। पृथ्वी तत्व का वर्ण पीला है। यह धीमी गति से मध्य में प्रवाहित होता है। इसकी प्रकृति हल्की और उष्ण है। ठोढ़ी तक इसकी ध्वनि होती है। इसके प्रवाह के दौरान किए गए कार्यों में भी स्थायी रूप से सफलता मिलती है।

2-जल ... इसका तत्व रसना है। स्वाद उसीसे लिया जाता है ! जलके प्रभावसे शरीर सदा खुश रहता है। खारा, मीठा,कडवा, स्वाद उसीसे मालूम होते है । तत्व श्वेत वर्ण का होता है। इसका प्रवाह तेज और नीचे की ओर होता है। इसके प्रवाह काल में साँस की आवाज अधिक होती है और इस समय साँस सोलह अंगुल (लगभग 12 इंच) लम्बी होती है। इसकी प्रकृति शीतल है। इसके प्रवाह काल में प्रारम्भ किये गये कार्य सफलता (क्षणिक) मिलती है।

3-अग्नि...इसका तत्व आँख है। उसे दृष्टि कहते है ! इसमें प्रकाश भरा हुआ है । अग्नि तत्व रक्तवर्ण है। यह घुमावदार तरीके से प्रवाहित होता है। इसकी प्रकृति काफी उष्ण है। इसके प्रवाह काल में साँस की लम्बाई चार अंगुल और ऊपर की ओर होती है। इसे क्रूरतापूर्ण कार्यों के लिए उपयोगी बताया गया है।

4-वायु....इसका तत्व शरीर है । जिसको त्वक कहते है। सर्दी,गर्मी,कठोरता,कोमलता का ज्ञान उसीसे होता है। वायु तत्व कृष्ण वर्ण (गहरा नीला रंग) है, इसके प्रवाह के समय साँस की लम्बाई आठ अंगुल और गति तिर्यक (तिरछी) होती है। इसकी प्रकृति शीतोष्ण हैं। इस अवधि में गति वाले कार्यों को प्रारम्भ करने पर निश्चित रूप से सफलता मिलती है।

5-आकाश...इसका तत्व कान है । इसे श्रोत कहते है। अच्छे बुरे शब्द इसी श्रोत इन्द्रियसे ही जाने जाते है। ये ही कान है। अगर कान न हो तो मनुष्य जड है।जब स्वर में उक्त सभी तत्त्वों का संतुलन हो और उनके यथोक्त गुण उपस्थित हों तो उसे योगियों को मोक्ष प्रदान करनेवाला आकाश तत्व समझना चाहिए, अर्थात आकाश तत्व में अन्य चार तत्वोंका संतुलन पाया जाता है और उनके गुण भी पाए जाते हैं तथा इसके प्रवाह काल किए गये योग-साधना में पूर्णरूप से सिद्धि मिलती है।

आकाश तत्व का रंग पहचानना कठिन होता है। यह स्वादहीन और प्रत्येक दिशा में गतिवाला होता है। यह मोक्ष प्रदान करता है। आध्यात्मिक साधना के अतिरिक्त अन्य कार्यों में कोई फल नहीं प्राप्त होता है।

6-जब स्वर का प्रवाह ऊपर की ओर हो, अर्थात स्वर में अग्नि तत्त्व प्रवाहित हो, तो मारण की साधना प्रारम्भ करना उचित है। स्वर की गति नीचे की ओर हो, अर्थात स्वर में जल तत्व का उदय काल शांतिपूर्ण कार्य के लिए उचित होता है। स्वर का प्रवाह यदि तिरछा हो, अर्थात वायु तत्व का उदयकाल हो, तो उच्चाटन जैसी साधना के प्रारम्भ के लिए उचित समय होता है। पर स्वर का प्रवाह मध्य में होने पर, अर्थात पृथ्वी तत्व के प्रवाह-काल में स्तम्भन सम्बन्धी साधना का प्रारम्भ ठीक होता है। लेकिन आकाश तत्व के उदय काल को मध्यम, अर्थात किसी भी कार्य के लिए अनुपयोगी बताया गया है।

स्वरों में तत्वो का उदय ;-

03 FACTS;-

1-प्रत्येक नाड़ी के प्रवाह में पंच महाभूतों के उदय का क्रम बताया गया है, अर्थात् स्वर प्रवाह के प्रारम्भ में वायु तत्वों का उदय होता है, तत्पश्चात् अग्नि तत्व , फिर पृथ्वी तत्व , इसके बाद जल तत्व और अन्त में आकाश तत्व का उदय होता है।

2-हर नाड़ी में स्वरों का प्रवाह ढाई घटी अर्थात् एक घंटे का होता है। इस ढाई घटी या एक घंटे के प्रवाह-काल में पाँचों तत्वों बताए गए क्रम से उदित होते हैं। इन तत्व का प्रत्येक नाड़ी में अर्थात् चन्द्र नाड़ी और सूर्य नाड़ी दोनों में अलग-अलग किन्तु एक ही क्रम में तत्वों का उदय होता है।

3-तत्वों के स्वरों में उदय के समय इन्हें पहचानने की एक और बड़ी रोचक युक्ति बताई गई है। इसके अनुसार यदि दर्पण पर अपनी श्वास प्रवाहित की जाये तो उसके वाष्प से आकृति बनती है उससे हम स्वर में प्रवाहित होने वाले तत्व को पहचान सकते हैं। पृथ्वी तत्व के प्रवाह काल में आयत की सी आकृति बनती हैं, जल तत्व में अर्ध्द चन्द्राकार, अग्नि तत्व में त्रिकोणात्मक आकृति, वायु के प्रवाह के समय कोई निश्चित आकृति नहीं बनती। केवल वाष्प के कण बिखरे से दिखते हैं।

श्वास की गति /स्वरों के प्रवाह की गति ;-

04 FACTS;-

1-स्वरों के प्रवाह की गति अथार्त श्वास की गति स्वाभाविक रूप से एक मिनट में 12 बार होती है, परन्तु हमारे कार्यों की विभिन्नता के अनुसार प्रभावित होती है।श्वास के रूप में शरीर में प्रवेश करते समय इसकी गति एक मिनट में 10 बार और बाहर निकलने के समय एक मिनट में 12 बार होता है। गाते समय एक मिनट में 12 बार , खाना खाते समय 16 बार , भूख लगने पर 20 बार , बैठते समय 12 बार ,सामान्य गति से चलते समय 18 बार , सोते समय 27 अंगुल से 30 बार तक, मैथुन करते समय 27 से 36 बार और तेज चलते समय या शारीरिक व्यायाम करते समय इससे भी अधिक हो सकती है।

2-यदि बाहर निकलने वाली साँस की गति नौ बार से कम की जाए तो जीवन दीर्घ होता है और यदि इसकी गति बढ़ती है तो आन्तरिक प्राण दुर्बल होता है जिससे आयु घटती है।साधारण रूप से प्रत्येक मनुष्य के दिन रात में 21600 श्वास चलते हैं। यदि कोई मनुष्य 21600 से कम स्वास चलाता है तो उसकी आयु का समय बढ़ जाता है।यदि अपनी असावधानी से वह अधिक कर देता है तो उसकी आयु का काल घट जाता है।सांसो के विषय में एक प्रसिद्ध कहावत है...

बैठे 12 चले 18 सोबत चले 30 ।

विषय करत में 36 चले क्यों जीवे जगदीश।।

3-अथार्त श्वास की गति बैठते समय एक मिनट में 12 बार,चलते समय 18 बार ,सोते समय 30 बार तथा विषय करते समय 36 बार।इसी कारण योगियों की आयु अधिक होती है।अधिक सोने वाले और विषय लंपट पुरुषों की आयु कम होती है।वह अपनी जीवन यात्रा शीघ्र समाप्त कर देते हैं।जैसा प्राण और शरीर का साथ है, वैसा ही आयु और स्वास्थ्य का साथ है।अतः आयु वृद्धि चाहने वालों को इस कहावत पर भी ध्यान देना चाहिए...

खाए के मूतै सौवे बाम ।

काहे को वैद्य बसावै गांव।।

भोजन करके तुरंत ही मूत्र त्याग करना चाहिए। इससे गुर्दा दर्द की बीमारी कभी नहीं हो पाएगी।रात्रि को बाई करवट

सोने से सीधा स्वर चलेगा। हर एक मनुष्य का दिन में बायां और रात में दायां स्वर चलना चाहिए।इससे मनुष्य निरोग तथा दीर्घजीवी होता है।इसके विपरीत स्वर चलने से वह रोग और शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होता है।

4- यदि प्राण की गति कम की जाय तो अलौकिक सिद्धियाँ मिलती हैं। यदि साधक बाह्य श्वास की लम्बाई पर्याप्त मात्रा में कम कर दे तो उसे भोजन की आवश्यकता नहीं पड़ती है और यदि कुछ और कम कर ले तो वह हवा में उड़ सकता है।यदि प्राण-वायु की गति एक मिनट में 1 बार कम कर दी जाय, तो व्यक्ति निष्काम हो जाता है, एक मिनट में 2 बार कम होने से आनन्द की प्राप्ति होती है और तीन बार होने से कवित्व या लेखन शक्ति मिलती है।साँस की लम्बाई चार बार कम होने से वाक्-सिद्धि, पाँच बार कम होने से दूर-दृष्टि, छः बार कम होने से आकाश में उड़ने की शक्ति और सात बार कम होने से प्रचंड वेग से चलने की गति प्राप्त होती हैं।यदि श्वास की लम्बाई आठ बार कम हो जाय, तो साधक को आठ सिद्धियों की प्राप्ति होती है, नौ बार कम होने पर नौ निधियाँ प्राप्त होती हैं, दस बार कम होने पर अपने शरीर को दस विभिन्न आकारों में बदलने की क्षमता आ जाती है और ग्यारह बार कम होने पर शरीर छाया की तरह हो जाता है, अर्थात् उस व्यक्ति की छाया नहीं पड़ती है।श्वास की लम्बाई बारह बार कम होने पर साधक अमरत्व प्राप्त कर लेता है, अर्थात् साधना के दौरान ऐसी स्थिति आती है कि श्वास की गति रुक जाने के बाद भी वह जीवित रह सकता है, और जब साधक नख-शिख अपने प्राणों को नियंत्रित कर लेता है, तो वह भूख, प्यास और सांसारिक वासनाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है।

शिव स्वरोदय के आधार पर तत्वों और नक्षत्रों के सम्बन्ध;-

02 FACTS;-

1-पृथ्वी तत्व का सम्बन्ध रोहिणी, अनुराधा, ज्येष्ठा, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा और अभिजित से, जल तत्व का आर्द्रा, श्लेषा, मूल, पूर्वाषाढ़, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद और रेवती से, अग्नि तत्व का भरणी, कृत्तिका, पुष्य,मघा, पूर्वा फाल्गुनी, स्वाती और पूर्वा भाद्रपद तथा वायु तत्व का अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा और विशाखा से है।

2-प्रथम पंचम पिंगला नाड़ी से स्वर प्रवाहित होने पर पृथ्वी तत्व का सूर्य से, जल का शनि से, अग्नि का मंगल से और वायु का राहु से सम्बन्ध माना जाता है तथा इड़ा नाड़ी में पृथ्वी का गुरू से, जल का चन्द्रमा से, अग्नि का शुक्र से और वायु का बुध से।

तत्वों को बदलने की आवश्यकता;-

05 FACTS;-

1-जिस प्रकार विभिन्न कार्यों का सम्पादन करने के लिए स्वर बदलने की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही तत्वों को बदलने की भी आवश्यकता भी पड़ती है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति में एक स्वर की एक घंटें की अवधि के दौरान सर्वप्रथम वायु तत्व आठ मिनट तक प्रवाहित होता है, जिसकी लम्बाई नासिका पुट से आठ अंगुल (6 इंच) मानी गयी है। 2-इसके बाद अग्नि तत्व बारह मिनट तक प्रवाहित होता है जिसकी लम्बाई चार अंगुल या 3 इंच तक होती है। तीसरे क्रम में पृथ्वी तत्व 20 मिनट तक प्रवाहित होता है और इसकी लम्बाई बारह अंगुल या नौ इंच तक होती है।

3-तत्वों के प्रवाह को बदलने के उनकी लम्बाई का ज्ञान और अभ्यास होना आवश्यक है और यदि हम स्वर की लम्बाई को तत्वों के अनुसार कर सकें तो स्वर में वह तत्व प्रवाहित होने लगता है।

स्वरों के साथ उनमें प्रवाहित होने वाले पंच तत्वों का विचार ;-

07 FACTS;-

1-दैनिक जीवन में जैसे कार्य का प्रारम्भ उपर्युक्त ढंग से करके स्वास्थ्य लाभ एवं सफलता प्राप्त करने की बात कही गई है, वैसे ही स्वरों के साथ उनमें प्रवाहित होने वाले पंच तत्वों का विचार करना भी अत्यन्त आवश्यक है। अन्यथा असफलता ही हाथ लगेगी। अतएव स्वरों के साथ उक्त विधान का प्रयोग करते समय उनमें प्रवाहित होने वाले तत्वों की पहिचान करना और तद्नुसार कार्य करना आवश्यक है।

2-भौतिक उन्नति या दीर्घकालिक सुख से सम्बन्धित कार्य या स्थायी शान्तिप्रद कार्यों में प्रवृत्त होते समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि उपयुक्त स्वर में पृथ्वी तत्व का उदय हो। अन्यथा अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा। शास्त्रों का कथन है कि पृथ्वी तत्व की प्रधानता के साथ हमारा मन भौतिक सुख के कार्यों के प्रति अधिक आकर्षित होता है।

3-किसी भी स्वर में जल तत्व के उदय के समय किया गया कार्य तत्काल फल देने वाला होता है, भले ही फल अपेक्षाकृत कम हो। जल तत्व की प्रधानता होने पर परिणाम जल की तरह चंचल और उतार-चढ़ाव से भरा होता है। इसलिए इस समय ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिसमें अधिक भाग-दौड़ करना पड़े।

4-अग्नि तत्व का धर्म दाहकता है। इसलिए इसके उदयकाल में कोई भी कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए क्योंकि असफलता के अलावा कुछ भी हाथ नहीं आयेगा। यहाँ तक कि इस समय किसी बात पर अपनी राय भी नहीं देनी चाहिए, अन्यथा अप्रत्याशित कठिनाई में फॅंसने की नौबत भी आ सकती है। धन-सम्पत्ति से संबंधित दुश्चिन्ताएं, परेशानियाँ, वस्तुओं का खोना आदि घटनाएँ अग्नितत्व के उदयकाल में ही सबसे अधिक होती हैं। 5-वायु तो सर्वाधिक चंचल है। अतएव इसके उदयकाल में किया गया कार्य कभी भी सफल नहीं हो सकता। स्वामी सत्यानन्द जी ने अपनी पुस्तक 'स्वर-योग' में एक अद्भुत उदाहरण दिया है और वह हमें वायु तत्व के समय कार्य का चुनाव करने में सहायक हो सकता है। उन्होंने लिखा है कि यदि भीड़-भाड़ वाले प्लेटफार्म पर छूटती गाड़ी पकड़ने के लिए झपटते समय और वायु तत्व का उदय हो तो आप ट्रेन पकड़ने में सफल हो सकते हैं।

6-आकाश तत्व के उदय काल में ध्यान करने के अलावा कोई भी कार्य सफल नहीं होगा, यह ध्यान देने योग्य बात है।सुषुम्ना नाड़ी का प्रवाह काल आध्यात्मिक साधना अर्थात् ध्यान आदि के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इसके अतिरिक्त यदि कोई अन्य कार्य इस काल में प्रारम्भ करते हैं तो उसमें सफलता नहीं मिलेगी। यदि अभ्यास द्वारा ऐसा कुछ किया जा सके जिससे सुषुम्ना नाड़ी का प्रवाह-काल बढ़ सके और उस समय आध्यात्मिक साधना की जाये, विशेषकर उस समय आकाश तत्व का उदय हो (यह एक विरल संयोग है), तो साधक को दुर्लभ और विस्मयकारी अनुभव होंगे।

7-संक्षेप में, यह ध्यान देने की बात है कि इडा और पिंगला स्वर में पृथ्वी तत्व और जल तत्व का उदय काल कार्य के स्वभाव के अनुकूल स्वर का चुनाव सदा सुखद होगा। इडा स्वर में अग्नि तत्व और वायु तत्व का उदयकाल अत्यन्त सामान्य फल देने वाला तथा पिंगला में विनाशकारी होता हैं। आकाश तत्व का उदय काल केवल ध्यान आदि कार्यों में सुखद फलदाता है।'शिव स्वरोदय' का कथन है कि दिन में पृथ्वी तत्व और रात में जल तत्व का उदयकाल सर्वोत्तम होता है। इससे मनुष्य स्वस्थ रहता है और सफलता की संभावना सर्वाधिक होती है।

पंच महाभूतों की स्थिति पाँच चक्रों में ;-

03 FACTS;-

1-यौगिक दृष्टि से शरीर विज्ञान में हमारे शरीर में शक्ति-केन्द्र स्थित हैं; जिन्हें योग में चक्र, आधार या कुण्ड के नाम से जाना जाता है। वैसे तो शरीर में अनेक चक्र हैं, किन्तु इनमें सात-मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार चक्र मुख्य हैं।पंच महाभूतों की स्थिति क्रम से प्रथम पाँच चक्रों में मानी जाती है, जिसका विवरण नीचे देखा जा सकता है:-

चक्र>> मूलाधार>> स्वाधिष्ठान>> मणिपुर>> अनाहत >>विशुद्ध

पंच महाभूत>> पृथ्वी >>जल>> अग्नि >>वायु>> आकाश

2-स्वरोदय विज्ञान के अनुसार पंच महाभूतों की स्थिति उपर्युक्त स्थिति से थोड़ी भिन्न है। शिव स्वरोदय के अनुसार पृथ्वी जंघों में, जल तत्व पैरों में, अग्नि दोनों कंधों में, वायु नाभि में और आकाश मस्तक में स्थित हैं।अन्य मतानुसार पृथ्वी पैरों (Feet) में, जल घुटनों में, अग्नि दोनों कंधों के बीच में स्थित हैं। शेष दो तत्वों की स्थिति के विषय में कोई अन्तर नहीं है। 3- यदि हम शारीरिक और मानिसिक रूप से स्वस्थ हैं तो इनकी दिशा, लम्बाई, अवधि और क्रम निश्चित होते है, इन्हीं की सहायता से स्वरों में तत्वों की पहिचान की जाती है।

प्राणिक ऊर्जा के प्रवाह की दिशा;-

05 FACTS;-

1-शरीर में प्राणिक ऊर्जा के प्रवाह की दिशा की जानकारी आवश्यक है। यौगिक विज्ञान के अनुसार मध्य रात्रि से मध्याह्न तक प्राण नसों में प्रवाहित होता है, अर्थात् इस अवधि में प्राणिक ऊर्जा, सर्वाधिक सक्रिय होती है और मध्याह्न से मध्य रात्रि तक प्राण का प्रवाह शिराओं में होता है। मध्याह्न और मध्य रात्रि में प्राण का प्रवाह दोनों नाड़ी तंत्रों में समान होता है।

2-इसी प्रकार सूर्यास्त के समय प्राण ऊर्जा का प्रवाह शिराओं में और सूर्योदय के समय मेरूदण्ड में सबसे अधिक होता है। इसीलिए शास्त्रों में ये चार संध्याएँ कहीं गयी हैं जो आध्यात्मिक उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गयी हैं।

3-यदि व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ है तो उक्त क्रम से नाड़ी तंत्रों में प्राण का प्रवाह संतुलित रहता है अन्यथा हमारा शरीर बीमारियों को आमंत्रित करने के लिये तैयार रहता है। यदि इडा नाड़ी अपने नियमानुसार प्रवाहित होती है तो चयापचय जनित विष शरीर से उत्सर्जित होता रहता है, जबकि पिंगला अपने क्रम से प्रवाहित होकर शरीर को शक्ति प्रदान करती है।

4-योगियों ने देखा है और पाया है कि यदि साँस किसी एक नासिका से 24 घंटें तक चलती रहे तो यह शरीर में किसी बीमारी के होने का संकेत है। यदि साँस उससे भी लम्बे समय तक एक ही नासिका में प्रवाहित हो तो समझना चाहिए कि शरीर में किसी गम्भीर बीमारी ने आसन जमा लिया है और यदि यह क्रिया दो से तीन दिन तक चलती रहे तो निस्संदेह शीघ्र ही शरीर किसी गंभीरतम बीमारी से ग्रस्त होने वाला है।

5-ऐसी अवस्था में उस नासिका से साँस बदल कर दूसरी नासिका से तब तक प्रवाहित किया जाना चाहिए जब तक प्रात:काल के समय स्वर अपने उचित क्रम में प्रवाहित न होने लगे। इससे होने वाली बीमारी की गंभीरता कम हो जाती है और व्यक्ति शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करता है।

......SHIVOHAM...