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क्या है प्राचीन ,दुर्लभ एवं गुहय स्वरोदय विज्ञान?(301-395 )


301 – चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को विद्वान लोग प्रातःकाल उठकर तत्व- -विचार करते हुए और सूर्य के दक्षिणायन तथा उत्तरायण को ध्यान में रखते हुए वर्षफल से सम्बन्धित प्रश्नों का उत्तर दें। 302 -303 – उस समय यदि चन्द्र स्वर का प्रवाह हो तथा उसमें पृथ्वी, जल या वायु तत्व सक्रिय हो, तो आनेवाला वर्ष सम्पन्नता और प्रचुर उपज से भरा होगा। लेकिन उस समय चन्द्र-स्वर में अग्नि अथवा आकाश तत्व की प्रधानता हो, तो समझना चाहिए कि आनेवाले वर्ष में, महीने मे एवं दिनों में अकाल पड़ेगा, बाढ़ से नुकसान होगा एवं दुख की अधिकता रहेगी। 304– लेकिन उस समय सुषुम्ना नाड़ी सक्रिय होना सभी कार्यों में क्रूरता तथा भयावह परिस्थियों के आगम का संकेत है, अर्थात् देश का विभाजन, महामारी, कष्ट, पीड़ा, अभाव आदि की बहुलता देखने को मिलेगी। 305– मेष संक्रान्ति के समय (जब सूर्य मीन राशि से मेष राशि में संक्रमण करता है) तत्व- चिन्तक को अपने प्रवाहित स्वर पर विचार करे और उसके अनुसार लोगों के लिए वर्ष-फल बताए। 306– स्वर में पृथ्वी आदि तत्वों की प्रधानता के आधार पर किसी दिन, मास और वर्ष का फल समझना चाहिए। यदि पृथ्वी या जल तत्व की प्रधानता हो, तो सुख-समृद्धि का संकेत समझना चाहिए। लेकिन वायु, अग्नि अथवा आकाश तत्वों की प्रधानता होने पर इसके बिलकुल विपरीत समझना चाहिए। 307– वर्ष के प्रथम दिन प्रातःकाल स्वर में पृथ्वी ) तत्व- के सक्रिय होने पर समझना चाहिए कि आनेवाले वर्ष में सुभिक्ष रहेगा, पर्याप्त वर्षा होगी, प्रचुर अनाज पैदा होगा, हर प्रकार का सुख मिलेगा और राष्ट्र की हर तरह से वृद्धि होगी। SPECIAL NOTE;- यहाँ यह याद दिलाना आवश्यक है कि भारतीय उपमहाद्वीप में सभी राज्यों में, कुछ राज्यों को छोड़कर, वर्ष का प्रारम्भ चैत्र माह के शुक्लपक्ष के प्रथम दिन से प्रारम्भ होता है। इसे पूरे देश में भिन्न-भिन्न नामों से जानते हैं- वर्ष-प्रतिपदा, गुडीपरवा, उगादि आदि। यह भी याद रखना आवश्यक है कि शुक्लपक्ष में प्रथम तीन दिनतक प्रातःकाल चन्द्रस्वर प्रवाहित होता है। इसलिए इस दिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय या अन्य प्रान्तों में जहाँ नववर्ष जिस दिन प्रारम्भ होता है, उस दिन कौन सा पक्ष, कौन सी तिथि है और उसके अनुसार कौन सा स्वर चलना चाहिए, इसका निर्णयकर अपने स्वर की परीक्षा करके स्वर में उदित तत्त्व के अनुसार वर्षफल का कथन करना चाहिए। सूर्य का मेषराशि में प्रवेश-काल को भी कहीं-कहीं वर्ष का प्रारम्भ माना जाता है। अतः उसके अनुसार वर्षफल समझने की विधि भी बताई गयी है। 308– यदि स्वर (चन्द्र स्वर) में जल तत्व प्रवाहित हो, तो अच्छी वर्षा, अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और शान्ति के संकेत समझना चाहिए। 309– यदि अग्नितत्व प्रवाहित हो, तो दुर्भिक्ष, युद्ध, बहुत मामूली वर्षा आदि की सम्भावना समझनी चाहिए। 310 – मेष संक्रान्ति के समय यदि स्वर में वायु तत्व के प्रवाहित होनेपर अनेक प्रकार के उत्पात, उपद्रव, भय, अल्प वृष्टि आदि की आशंका समझनी चाहिए। (यहाँ से मेष संक्रान्ति के समय स्वर और उसमें सक्रिय तत्व के अनुसार वर्षफल कथन का विधान किया गया है।) 311– मेष संक्रान्ति के समय यदि स्वर में आकाश तत्व प्रवाहित हो, तो सुख-सम्पन्नता का सर्वथा अभाव समझना चाहिए। 312– स्वर का पूर्ण रूप से प्रवाह और उसमें उचित तत्व की उपस्थिति सुख-सम्पन्नता के द्योतक हैं। जब सूर्य-स्वर और चन्द्र स्वर बारी-बारी से प्रवाहित हों, तो उत्तम फसल का संकेत समझना चाहिए। 313– यदि सूर्य स्वर में अग्नि तत्व या केवल आकाश तत्व प्रवाहित हो, तो वस्तुओं के मूल्य में बढ़ोत्तरी की आशंका होती है और इसलिए समय से अनाज आदि की व्यवस्था कर लेनी चाहिए। 314 – यदि मेष संक्रान्ति रात में होती है तथा उसके अगले प्रातःकाल में सूर्य स्वर में अग्नि तत्व , वायु तत्व अथवा आकाश तत्व का प्रवाह हो, तो संसार में रौरव नरक के समान दुख के आने की आशंका रहती है। 315 – रोग सम्बन्धी प्रश्न के समय स्वर में पृथ्वी तत्व तत्त्व प्रवाहित होने पर रोग का कारण प्रारब्ध होता है, जल तत्व प्रवाहित होने पर त्रिदोष (वात, पित्त व कफ) और अग्नि तत्व प्रवाहित होने पर शाकिनी या पितृदोष होता है। 316 – प्रश्नकर्त्ता यदि अप्रवाहित स्वर की ओर से आकर प्रवाहित स्वर की ओर बैठ जाय और किसी रोग के सम्बन्ध में प्रश्न करे, तो अन्तिम साँस गिनता हुआ मूर्च्छित रोगी भी रोगी भी ठीक हो जाएगा। 317 – प्रश्नकर्त्ता सक्रिय स्वर की ओर से किसी रोग के विषय में प्रश्न करे, तो रोग किसी भी स्टेज पर क्यों न हो ठीक हो जाएगा। 318 –दूत (रोगी का सम्बन्धी प्रश्नकर्त्ता) हड़बड़ाहट में बड़बड़ाता हुआ आए और रोग के सम्बन्ध में प्रश्न करे तथा उस समय सूर्य स्वर प्रवाहित हो रहा हो, तो समझना चाहिए कि रोगी स्वस्थ हो जाएगा। परन्तु यदि उस समय चन्द्र स्वर प्रवाहित हो, तो समझना चाहिए कि रोगी बीमारी में होगा। 319– जिस व्यक्ति का स्वर नियंत्रण में हो या उसका मन एकाग्रचित्त हो और वह सक्रिय स्वर की ओर से अपने जीवन के विषय में प्रश्न पूछे, तो उसका उत्तर शुभ फल देनेवाला समझना चाहिए। 320 – बाईं अथवा दाहिनी नाक से साँस लेते समय यदि कोई किसी के रोगी के सम्बन्ध में प्रश्न करे, तो समझना चाहिए कि बिना किसी सन्देह के रोगी स्वस्थ हो जाएगा। 321 – यदि प्रश्न के समय स्वर की गति नीचे की ओर हो, अर्थात् स्वर में जल तत्त्व के प्रवाह काल में (जलतत्व के प्रवाह के समय स्वर की गति नीचे की ओर होती है) प्रश्न पूछा गया हो, तो समझना चाहिए कि रोगी स्वस्थ हो जाएगा। लेकिन रोगी के स्वास्थ्य के विषय में प्रश्न के समय यदि स्वर की गति ऊर्ध्व (ऊपर की ओर) हो, अर्थात् स्वर में अग्नि तत्व सक्रिय हो, तो समझना चाहिए कि रोगी की मृत्यु निश्चित है। 322 – प्रश्न पूछनेवाला खाली स्वर की दिशा में हो तथा उसकी बात समझ में न आए और यदि विषम स्वर प्रवाहित होने लगे, तो किए गए प्रश्न का उत्तर उल्टा समझना चाहिए। 323 – प्रश्न करनेवाला यदि दाहिनी ओर हो और उत्तर देनेवाले का चन्द्र स्वर सक्रिय हो, समझना चाहिए कि सैकड़ों चिकित्सकों से घिरा होनेपर भी रोगी के प्राण नहीं बच सकते। कुछ विद्वान इसका अर्थ इस प्रकार करते हैं- उत्तर देनेवाले का चन्द्र स्वर और प्रश्नकर्त्ता का सूर्य स्वर प्रवाहित हो रहा हो, तो सैकड़ों चिकित्सकों से घिरा होनेपर भी रोगी की मृत्यु निश्चित है। 324 – यदि प्रश्न के समय उत्तर देनेवाले का दाहिना स्वर चल रहा हो और प्रश्न पूछनेवाला (दूत) बायीं ओर खड़ा हो, समझना चाहिए कि उस रोगी को भगवान भी नहीं बचा सकता। 325 – इस श्लोक में तत्वों के क्रम में परिवर्तन होने पर अपने तथा सम्बन्धियों के स्वास्थ्य के विषय में संकेत किया गया है। अर्थात् जब एक ही तत्व का विपरीत क्रम में प्रवाह हो, तो वह रोग द्वारा होनेवाले कष्ट का संकेत है। लेकिन यदि दो तत्व विपरीत क्रम में प्रवाहित हों, तो वे सगे-सम्बन्धियों और मित्रों के लिए विपत्ति के संकेत हैं। परन्तु यदि एक ही तत्व एक माह तक निरन्तर प्रवाहित हो, तो मृत्यु का संकेत है। 326 – सुधी लोगों को क्रम से प्रत्येक माह, पक्ष, दिन के प्रारंभ में (सूर्योदय के समय) और मृत्यु के समय तत्व की परीक्षा करनी चाहिए। इसे समय-ज्ञान कहा गया है। 327 – इस भौतिक शरीर की रचना पंचमहाभूतों से होती है और वह शिवरूपी प्राण से सिंचित होता है। सूर्य-नाड़ी में प्राण का प्रवाह जीव की मृत्यु से रक्षा करता है, अर्थात् शक्ति प्रदान करता है। इसीलिए प्राण को इस पंचभूतात्मक शरीर में दीप कहा गया है। 328 – यदि सूर्यनाड़ी में प्राण को रोकने का अभ्यास किया जाय, तो पिंगला नाड़ी शक्तिशाली होती है और व्यक्ति को लम्बी आयु प्राप्त होती है। 329 – इस कर्मयोग के सदा अभ्यास करके शरीर में स्थित सहस्रार चक्र को विकसित करना चाहिए। क्योंकि इससे अमृत का स्राव होता है, जो व्यक्ति को अमर बना देता है। 330– जो व्यक्ति रात में चन्द्रनाड़ी के प्रवाह को और दिन में सूर्यनाड़ी के प्रवाह को नियमित रूप से रोकता है, वह निस्संदेह योगी होता है। 331– यदि किसी का एक ही स्वर दिन-रात लगातार प्रवाहित होता रहे, तो समझ जाना चाहिए कि तीन वर्ष में उसकी मृत्यु होगी। 332– यदि किसी की पिंगला नाड़ी (दाहिना स्वर) पूरी तरह दिन-रात लगातार प्रवाहित हो तो समझना चाहिए कि उसके जीवन के केवल दो वर्ष बचे हैं। 333 – मनीषियों का मत है कि यदि किसी की एक ही नाड़ी से लगातार तीन रातों तक साँस चले तो समझना चाहिए कि उसका जीवन केवल एक वर्ष शेष रह गया है। 334 – यदि किसी व्यक्ति का बाँया स्वर रात में तथा दाहिना स्वर दिन में लगातार प्रवाहित हो रहा हो, तो समझना चाहिए कि उसके जीवन के मात्र छः माह शेष बचे हैं। 335 – जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब यदि किसी ओर से किसी को कटा-फटा दिखे, तो समझना चाहिए कि उसकी मृत्यु एक से छः माह के अन्दर होगी। यदि सूर्य के प्रतिबिम्ब के बीच में छिद्र दिखे, तो समझना चाहिए कि उसकी जिन्दगी मात्र दस दिन की है और यदि प्रतिबिम्ब धूमिल दिखायी दे, तो उसी दिन उसकी मृत्यु निश्चित है, ऐसा सर्वज्ञ समय-ज्ञानी ऋषियों का विचार है। 336– यदि दूत (प्रश्न करने वाला) लाल, कषाय (नारंगी) अथवा काले रंग के वस्त्र धारण किए हुए हो, दाँत टूटे हों, सिर का मुंडन कराये हो, शरीर में तेल पोते हुए हो अथवा उसके हाथ में रस्सी, राख, आग, नरमुंड, चिमटा हो तथा सूर्यास्त के समय खाली स्वर की दिशा से वह आए और उसी दिशा में बैठ जाय, तो समझना चाहिए कि वह साक्षात् यम है। 337 – किसी रोगी में अचानक मनोविकार उत्पन्न हो जाए तथा थोड़ी ही देर में सुधार के लक्षण दिखने लगे और फिर अचानक प्रलाप करने लगे, तो इसे सन्निपात का लक्षण समझना चाहिए। 338 – उक्त अवस्था में उस व्यक्ति का शरीर शीतल होने लगे तथा उसकी अवस्था खराब होने लगे, तो उसका अनिष्ट समझना चाहिए। उसे मैं विस्तार पूर्वक बताता हूँ। 339 – यदि कोई व्यक्ति अपशब्द कहे और तुरन्त थोड़ी देर में अपने अपशब्द पर पश्चात्ताप करने लगे, तो निस्संदेह उसकी अचानक मृत्यु हो जाती है। 340 – जिस व्यक्ति की अन्दर जानेवाली श्वास शीतल हो और छोड़ी जानेवाली आग की भाँति गरम हो, उसे मृत्यु से बड़ा से बड़ा चिकित्सक भी नहीं बचा सकता। 341 - जो व्यक्ति अपनी जीभ, आकाश, ध्रुवतारा, मातृमंडल, अरुन्धती, चन्द्रमा अथवा शुक्र तारा प्रयास करके भी न देख पाए, तो एक वर्ष के अन्दर उसकी मृत्यु निश्चित है। 342 – यदि किसी व्यक्ति को सूर्य, चन्द्रमा अथवा अग्नि के प्रकाश न दिखाई दे, तो समझना चाहिए कि उसका जीवन ग्यारह माह से अधिक नहीं है। 343 – यदि किसी व्यक्ति को जाग्रत अवस्था अथवा स्वप्न में बावड़ी या कुएँ में सोना, चाँदी, मूत्र या विष्ठा दिखाई दे, तो उसकी आयु दस माह से अधिक नहीं समझनी चाहिए। 344 – यदि किसी को सोने अथवा काले रंग का दीपक दिखाई दे और वस्तुएँ अपने वास्तविक रूप में न दिखकर विकृत रूप में दिखाई पड़ें, तो समझना चाहिए कि उसका जीवन नौ माह से अधिक नहीं है। 345 – यदि किसी को मोटा व्यक्ति दुबला, दुबला मोटा, श्याम वर्ण का गौर, गौर वर्ण का श्याम, सज्जन व्यक्ति दुर्जन, वीर व्यक्ति कायर, शान्त व्यक्ति विकार से भरा दिखे, तो समझना चाहिए कि उसकी आयु केवल आठ माह शेष है। 346 – जब किसी आदमी की हथेली अथवा जीभ के मूल में दर्द हो, उसके खून का रंग काला हो जाय एवं सूई चुभाने पर भी दर्द का अनुभव न हो, तो समझना चाहिए वह सात महीने तक जीवित रहेगा। 347 – जब बिना बीमारी के किसी आदमी की बीच की तीन उँगलियाँ न मुड़ें, गला सूखे तथा किसी विषय पर लगातार बोलने पर भी उसे याद न रहे, तो उसकी छः महीने में मृत्यु होती है। 348 – जब याददास्त के नष्ट होने और छाती (nipple) के चमड़े पर किसी प्रकार की अनुभूति न होने के लक्षण दिखाई दें, तो समझना चाहिए कि उस आदमी की मृत्यु पाँचवें महीने में होने की सम्भावना है। 349 – जब किसी आदमी को दिखाई न दे और उसकी आँखों में दर्द हो, तो उसकी मृत्यु चौथे महीने में निश्चित है। 350 – जब किसी आदमी के दाँत सुन्न हो जाएँ और अण्डकोषों को दबाने पर दर्द का अनुभव न हो, तो तीसरे महीने में उसकी मृत्यु अवश्य होती है। SPECIAL NOTE;- इन श्लोकों में बहुत ही प्रभावी छायोपासना की विधि बताई गयी है। यह साधना प्रातःकाल या सायंकाल सूर्य की उपस्थिति में करनी चाहिए। साधकों से अनुरोध है कि किसी सक्षम गुरु-सान्निध्य के बिना स्वयं इसका अभ्यास न करें। इस साधना के परिणाम स्वरूप कुछ ऐसी अनुभूतियाँ हो सकती हैं, जो मानसिक संतुलन को अव्यवस्थित कर सकती हैं। जो सक्षम गुरु होता है, वह इस साधना के पहले की तैयारी करवाता है। इस साधना का अभ्यास करने के पहले साधक का भयमुक्त होना आवश्यक है। छाया उपासना;- 351– हे देवि, अब मैं तुम्हें शैवागम (आगम अर्थात् तंत्र) में बतायी गयी छाया उपासना की विधि संक्षेप में बताता हूँ, जिससे मनुष्य त्रिकालज्ञ हो जाता है। 352 – एकान्त निर्जन स्थान में जाकर और सूर्य की ओर पीठ करके खड़ा हो जाए या बैठ जाए। फिर अपनी छाया के कंठ भाग को देखे और उस पर मन को थोड़ी देर तक केन्द्रित करे। 353 – इसके बाद आकाश की ओर देखते हुए ''ह्रीं परब्रह्मणे नमः'' मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए अथवा तबतक जप करना चाहिए, जबतक आकाश में भगवान शिव की आकृति न दिखने लगे। 354– छः मास तक इस प्रकार अपनी छाया की उपासना करने पर साधक को शुद्ध स्फटिक की भाँति आलोक युक्त भगवान शिव की आकृति का दर्शन होता है। इसके बाद साधक समस्त प्राणी जगत का स्वामी हो जाता है और यदि वह दो वर्षों तक इस प्रकार साधना करता है, तो वह साक्षात् शिव हो जाता है। 355 – इसका नियमित अभ्यास करने से मनुष्य त्रिकालज्ञ हो जाता है और परमानन्द मंक अवस्थित होता है। इसका निरन्तर अभ्यास करनेवाले योगी के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं होता। 356– यदि वह रूप (भगवान शिव की आकृति) कृष्ण वर्ण का दिखाई पड़े, तो साधक को समझना चाहिए कि आने वाले छः माह में उसकी मृत्यु सुनिश्चित है। 357 – यदि वह आकृति पीले रंग की दिखाई पड़े, तो साधक को समझ लेना चाहिए कि वह निकट भविष्य में बीमार होनेवाला है। लाल रंग की आकृति दिखने पर भयग्रस्तता, नीले रंग की दिखने पर उसे हानि, दुख तथा अभावग्रस्त होने का सामना करना पड़ता है। लेकिन यदि आकृति बहुरंगी दिखाई पड़े, तो साधक पूर्णरूपेण सिद्ध हो जाता है। 358– यदि चरण, टाँग, पेट और बाहें न दिखाई दें, तो साधक को समझना चाहिए कि निकट भविष्य में उसकी मृत्यु निश्चित है। 359– यदि छाया में बायीं भुजा न दिखे, तो पत्नी और दाहिनी भुजा न दिखे, तो भाई या किसी घनिष्ट मित्र अथवा समबन्धी एवं स्वयं की मृत्यु निकट भविष्य में निश्चित है। 360– यदि छाया का सिर न दिखाई पड़े, तो एक माह में, जंघे और कंधा न दिखाई पड़ें तो आठ दिन में और छाया न दिखाई पड़े, तो तुरन्त मृत्यु निश्चित है। 361 – सबेरे सूर्योदय के बाद सूर्य की ओर पीठ करके खड़ा होना चाहिए और अपनी छाया पर मन को केन्द्रित करना चाहिए। यदि छाया की उँगलियाँ न दिखाई पड़े, तो तुरन्त मृत्यु समझना चाहिए। यदि पूरी छाया न दिखाई पड़े, तो भी तत्काल मृत्यु समझनी चाहिए। कान, सिर, चेहरा, हाथ, पीठ या छाती का भाग न दिखाई पड़े, तो भी समझना चाहिए कि मृत्यु एकदम सन्निकट है। लेकिन यदि छाया का सिर न दिखे और दिग्भ्रम हो, तो उस व्यक्ति का जीवन केवल छः माह समझना चाहिए। 362– किसी व्यक्ति का दाहिना स्वर लगातार सोलह दिन तक चलता रहे, तो उसका जीवन महीने के बचे शेष दिनों तक, अर्थात् केवल 14 दिन समझना चाहिए। 363– कालज्ञान रखनेवाले योगियों का मत है कि यदि दाहिना स्वर लगातार चले तथा बाँया स्वर बिलकुल न चले, तो समझना चाहिए कि उस व्यक्ति की मृत्यु पन्द्रह दिन में हो जाएगी। 364 – शौच के समय यदि किसी व्यक्ति का मल, मूत्र और अपान वायु एक साथ निकले, तो समझना चहिए कि उसकी मृत्यु दस दिन में होगी। 365– कालज्ञानियों का मत है कि यदि किसी व्यक्ति का बाँया स्वर लगातार चले और दाहिना स्वर बिलकुल न चले, तो समझना चाहिए कि उसकी मृत्यु एक माह में होगी। 366– जिस व्यक्ति की आयु समाप्त हो गयी है उसे अरुन्धती, ध्रुव, विष्णु के तीन चरण और मातृमंडल नहीं दिखायी पड़ते। 367– उपर्युक्त श्लोक में कथित चारों चीजों का विवरण इस श्लोक में दिया गया - जिह्वा को अरुन्धती, नाक के अग्र भाग को ध्रुव, दोनों भौहें और उनके मध्य भाग को विष्णु के तीन चरण तथा आँखों के तारों को मातृमंडल कहते हैं। 368– ऐसा कहा जाता है कि जिस व्यक्ति को अपनी भौहें न दिखें, उसकी मृत्य़ु नौ दिन में, सामान्य ध्वनि कानों से न सुनाई पड़े तो सात दिन में, आँखों का तारा न दिखे तो पाँच दिन में, नासिका का अग्रभाग न दिखे तो तीन दिन में और जिह्वा न दिखे तो एक दिन में मृत्यु होगी। 369 – अपनी आँखों के कोनों को दबाने पर चमकते तेज विन्दु यदि न दिखें, तो समझना चाहिए कि उस व्यक्ति की मृत्यु दस दिन में होगी। 370– तीर्थ में स्नान करने, दान देने, तपस्या, सत्कर्म करने, जप, योग और ध्यान करने से व्यक्ति की आयु लम्बी होती है। 371– धातु और मल-मूत्र के दोष शरीर का नाश कर देते हैं। प्राण वायु के संतुलन से इन दोषों में कमी आती है, जिससे शारीरिक शक्ति और तेज बढ़ते हैं। 372– अतएव धर्म आदि के साधनरूप इस शरीर की रक्षा करनी चाहिए। योगाभ्यास के लिए शरीर को नियमित रूप से तैयार करना चाहिए। क्योंकि असाध्य रोग जीवन को नष्ट कर देते हैं और योगाभ्यास के अतिरिक्त इन असाध्य रोगों का दूसरा कोई उपचार भी नहीं है। 373 – जिन मनुष्यों के हृदय में इस शाश्वत् अद्वितीय रहस्य (स्वरोदय विज्ञान) का स्फुरण होता है, उसपर महादेव भागवान शिव की कृपा होती है। इससे उसका शरीर चन्द्रमा की तरह आलोकित हो जाता है और स्वप्न में भी उसे मृत्यु का भय नहीं होता। 374– इडा नाड़ी को गंगा, पिंगला को यमुना और इनके मध्य में स्थित सुषुम्ना नाड़ी को सरस्वती के नाम से जाना जाता है। जहाँ इन तीनों नाड़ियों का मिलन होता है उसे प्रयाग (भ्रूमध्य) कहते हैं। 375– शीघ्र सिद्धि देनेवाली साधना की प्रक्रिया बताते हैं - सबसे पहले योगी को पद्मासन में बैठकर उड्डियान बन्ध लगाना चाहिए। SPECIAL NOTE;- निम्नलिखित श्लोकों में प्राणायाम की प्रक्रिया और उससे होनेवाले लाभ की चर्चा की गयी है। पर, साधकों से अनुरोध है कि वे प्राणायाम किसी सक्षम व्यक्ति से सीखकर ही अभ्यास करें, विशेषकर जिनमें कुम्भक प्राणायाम को सम्मिलित करना हो। प्राणायाम की अनगिनत प्रक्रियाएँ हैं और उनके प्रयोजन भी भिन्न हैं। कुम्भक युक्त प्राणायाम एक सक्षम साधक के सान्निध्य और मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। 376– इस श्लोक में प्राणायाम के अंगों और उससे होनेवाले लाभ की ओर संकेत किया गया है। प्राणायाम में पूरक, कुम्भक और रेचक तीन क्रियाएँ होती हैं। योगी लोग इसे शरीर के विकारों को दूर करने के कारण के रूप में जानते हैं। अतएव इसका प्रतिदिन अभ्यास करना चाहिए। पूरक का अर्थ साँस को अपनी पूरी क्षमता के अनुसार अन्दर लेना है। रेचक का अर्थ है साँस को पूर्णरूपेण बाहर छोड़ना। तथा कुम्भक का अर्थ है पूरक करने के बाद साँस को यथाशक्ति अन्दर या रेचक क्रिया के बाद साँस को बाहर रोकना। इसीलिए यह (कुम्भक) दो प्रकार का होता है- अन्तः कुम्भक और बाह्य कुम्भक। 377– पूरक से शरीर की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषण मिलता है और शरीर की रक्त, वीर्य आदि सप्त धातुओं में सन्तुलन आता है। कुम्भक से उचित प्राण-संचार होता है और जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है। 378– रेचक करने से शरीर का पाप मिटता है, अर्थात् शरीर और मन के विकार दूर होते हैं। इसके अभ्यास से साधक योगपद प्राप्त करता है (अर्थात् योगी हो जाता है) और शरीर में सर्वांगीण सन्तुलन स्थापित होता है तथा साधक मृत्युजयी बनता है। 379– सुधी व्यक्ति को दाहिने नासिका रन्ध्र से साँस को अन्दर लेना चाहिए, फिर यथाशक्ति सहज ढंग से कुम्भक करना चाहिए और इसके बाद साँस को बाँए नासिका रन्ध्र से छोड़ना चाहिए। 380 – जो लोग चन्द्र नाड़ी से साँस अन्दर लेकर सूर्य नाड़ी से रेचन करते हैं और फिर सूर्य नाड़ी से साँस अन्दर लेकर चन्द्र नाड़ी से उसका रेचन करते हैं, वे जब तक चन्द्रमा और तारे रहते हैं तब तक जीवित रहते हैं (अर्थात् दीर्घजीवी होते हैं)। यह अनुलोम-विलोम या नाड़ी-शोधक प्राणायाम की विधि है। 381– अपने शरीर में जो नाड़ी प्रवाहित हो रही हो, उससे साँस अन्दर भरकर और मुँह बन्दकर यथाशक्ति आन्तरिक कुम्भक करने से वृद्ध भी युवा हो जाता है। 382– मुख, नासिका, कान और आँखों को दोनों हाथों की उँगलियों से बन्दकर स्वर में सक्रिय तत्त्व के प्रति सचेत होने का अभ्यास करना चाहिए। इस अभ्यास को षण्मुखी मुद्रा कहते हैं। षण्मुखी मुद्रा के अभ्यास की पूरी विधि शिवस्वरोदय के 150वें श्लोक पर चर्चा के दौरान दी गयी थी। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; 150 श्लोक ;- 1. सर्वप्रथम किसी भी ध्यानोपयोगी आसन में बैठें। 2. आँखें बन्द कर लें, काकीमुद्रा में मुँह से साँस लें, साँस लेते समय ऐसा अनुभव करें कि प्राण मूलाधार से आज्ञाचक्र की ओर ऊपर की ओर अग्रसर हो रहा है। 3. (थोड़ा सिर इस प्रकार झुकाना है कि ठोड़ी छाती को स्पर्श न करे) और चेतना को आज्ञाचक्र पर टिकाएँ। साँस को जितनी देर तक आराम से रोक सकते हैं, अन्दर रोकें। साथ ही जैसा श्लोक में आँख, नाक, कान आदि अंगुलियों से बन्द करने को कहा गया है, वैसा करें, खेचरी मुद्रा (जीभ को उल्टा करके तालु से लगाना) के साथ अर्ध जालन्धर बन्ध लगाएँ। 4. सिर को सीधा करें और नाक से सामान्य ढंग से साँस छोड़ें। 5. यह एक चक्र हुआ। ऐसे पाँच चक्र करने चाहिए। प्रत्येक चक्र के बाद कुछ क्षणों तक विश्राम करें, आँख बन्द रखें। अभ्यास के बाद थोड़ी देर तक शांत बैठें और चिदाकाश (आँख बन्द करने पर सामने दिखने वाला रिक्त स्थान) को देखें। इसमें दिखायी पड़ने वाले रंग से सक्रिय तत्व की पहिचान करते हैं, अर्थात् पीले रंग से पृथ्वी, सफेद रंग से जल, लाल रंग से अग्नि, नीले या भूरे रंग से वायु और बिल्कुल काले या विभिन्न रंगों के मिश्रण से आकाश तत्व समझना चाहिए। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; 383– जो योगी इस मुद्रा का प्रतिदिन अभ्यास करता है, वह तत्वों के आकार, गति, स्वाद, रंग और लक्षण को पहचानने में सक्षम हो जाता है। इससे उसके पास स्वस्थ और सफल सम्पर्क स्थापित करने की क्षमता आ जाती है। 384– आशा और कामनाओं से मुक्त योगी चिन्तारहित होकर संसार में रहते हुए भी उससे निर्लिप्त रहता है, जैसे रंगमंच पर अभिनय कर रहा हो। इस प्रकार वह कालजयी हो जाता है। 385 – विश्व को जाननेवाली आद्या शक्ति योगी को अपने नेत्रों से दिखाई देती है। अतएव योगी को अपने मन को उसी में स्थिर करना चाहिए। 386– इसके पूर्व प्राणायाम आदि के बताए साधनों का अभ्यास करनेवाले साधक की आयु तीन घटी रोज बढ़ती है। इस परम गुह्य (गोपनीय) ज्ञान का उपदेश भगवान शिव ने माँ पार्वती को सिद्ध के गुणों के उद्गम स्थल (गुण-गह्वर) में दिया। 387– योगी पद्मासन में बैठकर मूलबंध लगाकर अपान वायु को रोकता है और प्राणवायु को रोककर उसे सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ब्रह्मरंध्र तक और फिर वहाँ से उसे आकाश (सहस्रार चक्र) में ले जाता है। जो योगी ऐसा करने में सफल होते हैं, वे ही धन्य हैं। 388– जो योगी इस ज्ञान को जानता है और प्रतिदिन इस ग्रंथ का पाठ करता है, वह सभी दुखों से मुक्त होता है तथा अन्त में उसकी सारी मनोकामनाएँ पूरी होती है। 389– जो स्वरज्ञान का नित्य अभ्यास कर इसे अपना बना लेता है, लक्ष्मी उसके चरणों में होती है। वह जहाँ कहीं भी रहता है, सभी शारीरिक सुख सदा उसके पास रहते हैं, अर्थात् मिलते हैं। 390– जिस प्रकार वेदों में प्रणव और ब्राह्मणों के लिए सूर्य पूज्य हैं, उसी प्रकार संसार में स्वर-योगी पूज्य होता है। 391 – तीन नाडियों और पाँच तत्वों का जिन्हें सम्यक ज्ञान होता है, उन्हें समग्र ज्ञान हो जाता है। विभिन्न प्रकार की औषधियों, जड़ी-बूटियों अथवा अनेक प्रकार के रसायनों का ज्ञान भी उनकी बराबरी नहीं कर सकता। तीन नाड़ियों और पाँच तत्वों के ज्ञाता को इन चीजों की आवश्यकता नहीं पड़ती। क्योंकि वह इनकी सहायता से सब कुछ करने में समर्थ होता है, यहाँ तक कि मृत्यु को भी पराजित करने में सक्षम होता है। 392– इस प्रकार के ज्ञान से सम्पन्न महात्मा यदि आपको इस विद्या का थोड़ा ज्ञान भी देता है, तो इससे बढ़कर इस विश्व में कुछ भी नहीं है तथा उसके ऋण से कभी भी उऋण नहीं हो सकते। 393– भगवान शिव कहते हैं कि हे देवि, युद्ध, स्त्री-वशीकरण, गर्भाधान, व्याधि एवं मृत्युकाल के परिप्रेक्ष्य में मैंने तुम्हें स्वर और तत्वों का वर्णन किया है। 394– इस संसार में सिद्धों और योगियों द्वारा प्रसिद्ध ज्ञान का प्रवर्तन किया गया है, उसका जो नियम-पूर्वक जप और पाठ करेगा तथा पालन करेगा, विशेषकर सूर्य और चन्द्र ग्रहण के समय, तो वह सिद्धिदायक होगा और उससे साधक को पूर्णत्व प्राप्त होगा। 395– जो व्यक्ति अपने स्थान पर बैठकर परमात्मा का ध्यान करता है, अधिक नहीं सोता तथा मिताहारी (कम भोजन करनेवाला) है और उसे जानता है, वही कर्मशील होता है।;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

....SHIVOHAM....