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क्या स्वरोदय विज्ञान से नाड़ी-शुद्धि संभव है?क्या नाड़ी-शुद्धि से साधकों के सभी दोष नष्ट हो जाते है


स्वरोदय विज्ञान;-

05 FACTS;-

1-स्वरोदय विज्ञान अपने आप में एक सम्पूर्ण विज्ञान है। स्वरोदय अर्थात नासिका के छिद्रों से ग्रहण किया जाने वाला श्वास जो कि वायु की शक्ल में होता है। विज्ञान अर्थात जॅहा पर किसी विषय की गूढ़तम बातें एंव प्रयोग कहे जाते है। 2-कब कौन सा काम शुरू करना होगा शुभ, नाड़ी ज्ञान से तय होता है संसार का प्रत्येक जीव अपनी नासिका के छिद्रों द्वारा सॉंस अर्जन करता है एंव उसका विर्सजन करता है।इसी सांस के द्वारा प्रत्येक जीव के प्राण स्थिर रहते है। 3-पृथ्वी तत्व युक्त चलने वाली सॉस मध्य में चलती है। जल तत्व से युक्त होकर चलने वाली श्वांस नीचे को बहती है।अग्नि तत्व से युक्त हेाकर चलने वाली श्वांस ऊपर की ओर चलती है। वायु तत्व से युक्त होकर चलने वाली श्वांस तिरछी चलती है और आकाश तत्व से युक्त होकर चलने वाली श्वांस दोनों छिद्रों से प्रवाहित होती है। 4-दोनों कन्धों पर अग्नि तत्व निवास करता है। नाभि में वायु तत्व, घुटनों में पृथ्वी तत्व, पॉवों में जल तत्व और सिर में आकाश तत्व निवास करता है। 5-सूर्य स्वर साक्षात् शिव स्वरूप है। चन्द्र स्वर साक्षात् देवी स्वरूप है। सुषुम्ना स्वर साक्षात् काल स्वरूप है।

नाडि़यां क्या है?

10 FACTS;-

1-मानव शरीर में साढ़े तीन लाख नाडि़यां उपस्थित हैं,उनमें 14 नाडि़यां प्रमुख मानी गई हैं। वे हैं-सुषुम्णा, इड़ा, पिंगला, गांधारी, हस्तिजिह्वका, कुहू, सरस्वती, पूषा, शंखिनी, पयस्विनी, वारुणा, अलंबुषा, विश्वादरी और यशस्विनी। इन 14 नाडि़यों में भी पिंगला, इड़ा और सुषुम्णा ये तीन नाडि़यां प्रमुख हैं।

2-पिंगला,इड़ा और सुषुम्णा इन तीन नाडि़यों में से एक सुषुम्णा ही सर्वप्रमुख है,क्योंकि यह योगियों के लिए अत्यंत प्रिय है,क्योंकि यह उनके लिए परमपदरूप आश्रय को देने वाली है। अन्य जितनी भी नाडि़यां हैं, वे सब भी देह में ही स्थित रहती है। ये तीनों नाडि़यां कमल-तंतु के समान अधोमुख होकर स्थित रहती हैं। ये तीनों चंद्र, सूर्य और अग्नि रूपिणी हैं तथा शरीर के पृष्ठवंश अर्थात् मेरुदंड के आश्रय में अवस्थित हैं। उन नाडि़यों के बीच स्थित चित्रा नाड़ी अत्यंत विशिष्ट है। वहीं पर सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर श्रेष्ठ ब्रह्मरंध्र विद्यमान है।

3-इस प्रकार हम देखते हैं कि जिस परमपद -प्राप्ति की बात योगी व भक्तजन करते रहते हैं,वह शरीर में उपस्थित है। निरंतर साधना के जरिए हम शक्तियों को जगाकर परमपद की अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं। वह चित्रा नाड़ी पंचवर्णा है, उज्ज्वल और शुद्ध भी है। सुषुम्णा के मध्य में स्थित चित्रा नाड़ी शरीर की उपाधि की कारणभूत भी है। यही वह दिव्य मार्ग है, जिसे अमृत और आनंद के रूप में बनाया गया है।

4-गुदास्थान से दो अंगुल ऊपर और मेरू से दो अंगुल नीचे, चार अंगुल विस्तार का एक आधार कमल समरूप से विद्यमान है। इसे मूलाधार चक्र कहते हैं। इस आधार कमल की कर्णिका में त्रिकोणाकार योनि सुशोभित है, जो सर्व प्रयत्नों द्वारा गोपनीय है अर्थात इसे किसी अनधिकारी के समक्ष नहीं कहना चाहिए,किंतु अधिकारी पुरुष से गोपनीय रखना व्यर्थ है।

5-वही परमदेवता स्वरूपा कुंडलिनी साढे़ तीन लपेटे लगाए हुए सुषुम्णा के मार्ग में स्थित रहती है। वह कुटिला अर्थात टेढ़ी और विद्युत रेखा के आकार की होती है। यह कुंडलिनी ही जगत् की सृष्टि स्वरूपा हैं। वही वाग्देवी वाच्य,अवाच्य रूप तथा देवताओं के द्वारा भी नमस्कृत की हुई है। 6-इड़ा और पिंगला नाडि़यों के मध्य में सुषुम्णा नाड़ी स्थित है। इस सुषुम्णा नाड़ी के छह स्थानों में (डाकिनी, हाकिनी, काकिनी, राकिनी और शाकिनी नाम की) छह शक्तियां रहती हैं, वहीं छह कमल भी विद्यमान हैं अर्थात मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि और आज्ञा।

इन छह कमलों को छह चक्र भी कहते हैं। योग जानने वाले विद्वान इनको जानते हैं। सुषुम्णा के पांच स्थान हैं, जिनके अनेक स्थान हैं, जो कि प्रयोजन होने पर शास्त्रों के द्वारा जाने जा सकते हैं।

7-अन्यान्य नाडि़यां मूलाधार से निकलकर जीभ, नेत्र, पांवों के अंगूठे, कान, कुक्षि, कक्ष, हाथों के अंगूठे, गुदा, उपस्थ आदि अंगों में आकर समाप्त हो जाती हैं अर्थात सभी नाडि़यों का आश्रय मूलाधार ही है।

इन्हीं नाडियों से इनकी शाखा-उपशाखाएं निकलकर क्रमशः साढे़ तीन लाख नाडि़यां अपने-अपने स्थान में जाकर स्थित हो गई हैं। यह सभी नाडि़यां भोगवहा अर्थात भुक्त पदार्थों को प्रवाहित करने वाली होती हैं। यह वायु के संचार में अत्यंत दक्ष होती हैं पूरे शरीर में इन्हीं के जरिए प्राणवायु का संचार होता है। यह वायु के संचार में अत्यंत दक्ष एवं संयोग-वियोग से ओत-प्रोत होती हुई मनुष्य के कलेवर (देह) में विद्यमान रहती हैं।

8-बारह कलाओं से युक्त सूर्यमंडल के मध्य में जो अग्नि प्रज्वलित रहती है उसके द्वारा अन्न का पाचन होता है। वह वैश्वानर अग्नि मेरे(शिव) ही तेज से प्रकट हुई है। यह प्राणियों के देहों में विद्यमान रहकर विविध प्रकार के परिपाक में संलग्न रहती है। वही वैश्वानर अग्नि, आयु, बल और पुष्टि के देने वाली है, उसी से शरीर कांतिमय होता है और जितने भी रोग हैं, उन सबका नाश हो जाता है।

9-इस वैश्वानर अग्नि को विधिपूर्वक प्रज्वलित करना और फिर उसमें अन्न की आहुति देनी चाहिए। अर्थात इस वैश्वानर अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए किसी सद्गुरु से शिक्षा लेनी चाहिए और जब इसके ठीक प्रकार से प्रज्वलित करना आ जाए तब उसके अनुकूल जो अन्न हो, उसका भोजन करें।

10-यह देह ब्रह्मांड संज्ञक है। इसमें अनेक स्थान भरे पड़े हैं। यहां प्रधान-प्रधान स्थान बताए गए हैं, जिन्हें शास्त्रों के अध्ययन से जाना जा सकता है। इस देह में विद्यमान ऐसे स्थानों को कई नामों से पुकारा जाता है। यहां जो बताया गया,उतना कहना ही बहुत है,उससे अधिक कहना व्यर्थ ही है। इस प्रकार कल्पित हुए शरीर में बसा हुआ जीव अनादि काल से चली आ रही वासना रूपी माला में घूमता हुआ कर्म की शृंखलाओं में बंधा रहता है। वह अनेक प्रकार के गुणों को ग्रहण करता हुआ संसार के सभी व्यापारों को किया करता है तथा पहले से उपार्जित शुभ-अशुभ विविध कर्मों के फलों को भोगता है।

दुख क्यों मिलता है?

02 FACTS;-

1-संसार में जितने भी शुभ-अशुभ कर्म दिखाई देते हैं, उन सभी का कारण एक मात्र कर्म ही है। सभी प्राणी कर्मों के अनुसार भोगों को भोगते रहते हैं। जो-जो सुख-दुःख के देने वाले कामादि दोष है, वे सभी जीव के कर्मानुसार ही प्रवृत्त होते हैं। तात्पर्य यह है कि मनुष्य के लिए सुख-दुख की प्रवृत्ति कर्म से ही हैं। शुभ कर्म से सुख और अशुभ कर्म से दुःख की प्राप्ति होती है।

2-पुण्य कर्मों के करने से शरीरधारी को सुख प्राप्ति की होती है और पुण्य के फलस्वरूप श्रेष्ठ भोज्य सामग्री अथवा अन्यान्य बाह्य वस्तुएं उसे स्वतः ही उपलब्ध हो जाती हैं। यह जीव कर्मबल से सुख अथवा दुख भोगने के लिए विवश है। वह जब पाप कर्म में आसक्त होता है तब उसे दुख ही मिलता है यदि सुख मिलता भी है तो क्षणिक और वह भी पूर्व संचित पुण्य के फलस्वरूप ही।

दुख या सुख क्या है ?

04 FACTS;-

1-जीव को अपने ही कर्म के फल को भोगना होता है,क्योंकि कर्म का फल ही दुख या सुख है। इसलिए जो कर्त्ता है, वही भोक्ता है, इसमें कोई संदेह नहीं अर्थात कर्त्ता से भोक्ता भिन्न नहीं हो सकता।

2-चैतन्य आत्मा के माया से उपहित होने पर ही संपूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है। जिस जीव के भोग के लिए जो काल निश्चित होता है, उसे उसी काल में अपने कर्म फल का भोग प्राप्त करने के लिए जन्म लेना होता है। जिस प्रकार नेत्र के दोष से शुक्ति(सीप) में रजत का आरोप होता है, उसी प्रकार जीव भी अपने ही कर्म दोष के प्रभाव से ब्रह्म में इस मिथ्या संसार प्रपंच का आरोप कर लेता है।वह वस्तु जिसमें भ्रम का आरोप होता है अधिष्ठान होती है। जैसे रज्जु (रस्सी)में सर्प और शुक्ति में रजत । यहाँ रज्जु और शुक्ति दोनों अधिष्ठान हैं क्योंकि इन्हीं में सर्प और रजत का भ्रम होता है ।

3-जीव को वासना के कारण ही भ्रम उत्पन्न हो जाता है और जब तक वासना निर्मूल नहीं होती, तब तक भ्रम भी नष्ट नहीं होता। इसी प्रकार जब ज्ञान उत्पन्न होता है, तब कुछ भी शेष नहीं रहता। इस कारण ज्ञान को ही मोक्ष का साधन समझना चाहिए।

4-जो कुछ भी विशेष दृष्टि से साक्षात दिखाई देता है, वही प्रत्यक्ष भ्रम का कारण होता है। अर्थात विशेष रूप से प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले दृश्यजाल में ही जीव फंस जाता है, वही उसके बंधन का कारण है। माया का परदा बड़ा होने के कारण बुद्धि उस दृश्य प्रपंच से ऊपर नहीं उठती, इसलिए यथार्थ ज्ञान नहीं हो पाता।

आत्मसाक्षात्कार प्राप्ति का प्रयत्न;-

05 FACTS;-

1--यह साक्षात् दृश्यमान् पदार्थ का भ्रम तब तक नष्ट नहीं होता, तब तक कि ब्रह्म का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हो जाता और ब्रह्म का प्रत्यक्ष अनुभव तभी संभव है, जबकि आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव हो जाए। आत्मा का विशेष दर्शन होने पर ही संसार का मिथ्या ज्ञान मिट पाता है। आत्म-साक्षात्कार के अतिरिक्त अन्य किसी भी उपाय से उस अज्ञान की निवृत्ति नहीं हो सकती, जिस प्रकार की शुक्ति में रजत का भ्रम शुक्ति के प्रत्यक्ष हुए बिना नहीं मिट सकता।

2-क्योंकि जब तक आत्मा को साक्षात्कार नहीं होता, तब तक जीव को सभी भूत विविध प्रकार के दिखाई देते हैंजब तक कर्म से अर्जित यह

शरीर विद्यमान है, तब तक इसके निर्वाण का साधन कर लेना चाहिए। अर्थात् इस शरीर के रहते हुए ही आत्मज्ञान प्राप्ति का प्रयत्न कर लेना चाहिए, क्योंकि शरीर के छूटने पर तो कोई साधन हो नहीं सकता वरन् कर्मानुसार पुनर्देह धारण करना ही होगा। अन्यथा मनुष्य शरीर में जन्म लेकर शरीर को व्यर्थ भार ढोने से लाभ ही क्या हुआ?

3-अभिप्राय यह है कि आत्मज्ञान की प्राप्ति का प्रयत्न न करके विषय-भोगो में पड़ा रहना पृथिवी के लिए भारस्वरूप ही है। विषयों में आसक्त रहने वाले पुरुष सदा ही विषय सुख में डूबे रहते हैं और उनकी वाणी मोक्ष विषयक वार्तालाप में अवरुद्ध रहती हुई पाप कर्म में ही लगी रहती है। तात्पर्य यह है कि विषयासक्त पुरुषों की चर्चा में ही लगी रहती है। इस प्रकार वे मन, कर्म, वचन से विषय को ही सुख मानते हुए उन्हीं में लगे रहते हैं॥

4- ज्ञानी पुरुष जब आत्मा के द्वारा आत्मा को देखता हुआ अन्य किसी वस्तु को न देखे अर्थात आत्मा के अतिरिक्त कोई अन्य वस्तु उसे दिखाई न दे, तब मेरे मत से कर्म का परित्याग कर दे, तो उसके लिए कोई दोष नहीं होता। कामादि सभी पदार्थ ज्ञान में लीन हो जाते हैं। इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। जब सभी तत्वों का अभाव हो जाता है, तब स्वयं तत्व- अर्थात आत्म ज्ञान ही प्रकाशित रहता है।

5-तात्पर्य यह है कि काम-क्रोध आदि विकारों को छोड़कर आत्मज्ञान की प्राप्ति का ही प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि आत्मज्ञान की उपलब्धि होने पर कोई भी विकार शेष नहीं रहता॥ जो मनुष्य इस शरीर को ब्रह्मांड जान लेता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त हो जाता है।

योगसिद्धि क्या है ? ;-

05 FACTS;-

1-अब मैं योगसिद्धि के विषय में कहता हूं। इस विधि को जानने वाले योगी को योग के साधना में कष्ट प्रतीत नहीं होता। अभिप्राय यह है कि योग-साधन की विधि को जान लेने पर साधक को कष्ट नहीं होता और विधि को जान कर साधक को कष्ट नहीं होता और विधि को न जान कर योग साधना करना कष्टकारी प्रतीत होता है।

2-शरीर को सीधा रखकर, हाथों को जोड़कर गुरु ॐ को प्रणाम करें और बाएं और दाएं भाग में विघ्नों को नष्ट करने वाले गणेश जी को, क्षेत्रपाल को और भगवती अंबिका को प्रणाम करें। तत्पश्चात दाएं हाथ अंगूठे से पिंगला नाड़ी (दाएं नासारंध्र) को रोककर इडा नाड़ी (बाएं नासारंध्र) से यथाशक्ति वायु को खींचकर रोकें और फिर पिंगला द्वारा धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। अर्थात एक नासारंध्र से पूरक (वायु को खींचना) करके कुंभक द्वारा (वायु को रोकना) और फिर दूसरे नासारंध्र से रेचन करें अर्थात वायु को निकाल दें। पूरक, कुंभक और रेचक, यह तीनों प्राणायाम के अंग हैं॥

3- इसी प्रकार फिर पिंगला नाड़ी से पूरक करके कुंभक करें और फिर इड़ा से धीरे-धीरे वायु को निकालें, वेगपूर्वक न निकालें, इस प्रकार योग के विधान से बीस बार कुंभक करने वाला व्यक्ति सभी द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है। तात्पर्य यह है कि प्राणायाम के अभ्यास को उत्तरोत्तर बढ़ाता हुआ साधक वायु को वश में कर ले तो फिर उसके लिए कोई कष्ट शेष नहीं रहता॥

4-ऊपर कही हुई विधि से नित्य प्रति प्रातःकाल, मध्याहृ काल, सायंकाल और अर्द्धरात्रि के समय अर्थात् चार बार कुंभक करना चाहिए। इस प्रकार यदि आलस्य का त्याग करके नित्य नियमपूर्वक दो महीने तक प्राणायाम करने वाले व्यक्ति की नाड़ी-शुद्धि में विलंब नहीं होता अर्थात् नाड़ी निश्चित ही शुद्ध हो जाती है।

5- जब तत्त्वदर्शी योगी की नाड़ी शुद्ध हो जाती है, तब सभी दोष नष्ट हो जाते हैं और योग की नवीन प्रक्रियाओं का आरंभ किया जा सकता है। नाड़ी शुद्ध होने के पश्चात योगी के देह में जो चिन्ह दिखाई देते हैं, उन सभी को संक्षेप में कहता हूं।

नाड़ी शुद्ध होने के पश्चात योगी के देह में चिन्ह;-

13 FACTS;-

1-नाड़ी शुद्ध होने पर योगी का शरीर सम हो जाता है (अर्थात तब वह न मोटा रहता है न पतला) शरीर में सुगंध आने लगनी है श्रेष्ठ कांति अर्थात उज्जवल तेज दिखाई देता है,माधुर्य आ जाता है। इसी स्थिति को योगावस्था कहा जाता है।

2-सिद्धांत ग्रंथों (वेदादि) का श्रवण करें, सदा वैराग्य युक्त भाव से घर में रहं, ईश्वर का नाम संकीर्तन करते रहें, जो कुछ सुनें, वह शुभ ही सुनें अर्थात बुरी बातों को कभी न सुनें। धृति, क्षमा, तप, शौच और लज्जा का भाव रखें । इस प्रकार से नियमों के प्रति सदा तत्पर रहने वाला योगी शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

2-सूर्य नाड़ी अर्थात दांई नासिका में स्थित पिंगला नाड़ी का प्रवाह रहने पर योगी को भोजन करना चाहिए तथा चंद्र (इड़ा) नाड़ी में वायु का प्रवाह रहने पर शयन करना ठीक है। भोजन करने के तुरंत बाद अथवा भूखे रहने पर कभी भी अभ्यास न करं। अभ्यास काल के पूर्व घी का भोजन करना चाहिए।

3-वायु को वश में कर लेने पर कुंभक सिद्ध होता है और जब केवल कुंभक सिद्ध हो जाता है तब योगी क्या नहीं कर सकता? योगी के देह में पहली बार के प्रयत्न से पसीना आता है, योगी को उत्पन्न हुए पसीने का देह में ही मर्दन कर लेना चाहिए। यदि पसीने को देह में नहीं मलेगा तो धातु नष्ट हो जाएगी।

5-योग सिद्धि के लिए तब तक योगशास्त्रोक्त नियमों का पालन करें जब कि वायु की सिद्धि न हो जाए और जब तक अल्प निद्रा और अल्प मल-मूत्र न होने लगे। तत्वदर्शी योगी शारीरिक और मानसिक वेदना से परे हो जाते हैं साथ ही उनका शरीर पसीने जैसे मलों से भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है।

8-दूसरी बार के प्रयत्न से कंप होता है और तीसरी बार में मेंढक की वृत्ति होती है अर्थात मेंढक जिस प्रकार उछलता और पृथ्वी पर आ जाता है, वैसे ही योगी भी आसन भूमि से ऊंचा उठता और फिर भूमि पर आ जाता है। बाद मे योगी आकाश गमन में सक्षम हो जाता है।

6- जब अभ्यास दृढ़ हो जाए, तब उक्त नियमों के पालन की आवश्यकता नहीं रहती। योगाभ्यासी को थोड़ा-थोड़ा भोजन अनेक बार करना चाहिए। नित्य प्रति पूर्वोक्त प्रकार से कुम्भक करें। इससे कुंभक सिद्ध हो जाता है और साधक को इच्छानुसार वायु के धारण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है।

7-साधक के देह में कफ, पित्त और वात दूषित नहीं होते। निर्धारित समय तक योगी को भोजन आदि पर संयम रखना आवश्यक है। योगी यदि अत्यधिक भोजन करे अथवा बहुत कम खाए तो भी उसे कुछ कष्ट नहीं होता और अभ्यास करते-करते उसे भूचरी विद्या की सिद्धि हो जाती है, जिस प्रकार मेंढ़क हाथ मार कर पृथ्वी में घुसता है, वैसे ही योगी भी हाथ से ताड़न करके पृथिवी में प्रवेश करता है।

8- योगाभ्यास में अनेक अति दारुण विघ्न उपस्थित हो जाते हैं, उनका शमन होना अत्यंत कठिन है। फिर भी साधक का कर्त्तव्य है कि जब तक प्राण कंठगत न हो जाए, तब तक साधन में तत्पर रहे। अर्थात साधना में धैर्य की आवश्यकता होती है, इसलिए विघ्नों के उपस्थित होने पर निराश नहीं होना चाहिए।

9-साधक को विघ्नों को नष्ट करने के लिए इंद्रियों को वश में करने की चेष्टा करनी चाहिए। साथ ही एकांत स्थान में बैठकर मनोयोगपूर्वक स्पष्ट रूप से उच्चारण करते हुए ओंकार का जप भी करना चाहिए। विद्वान, साधक पूर्वजन्म के अर्जित कर्म और इस जन्म में किए गए कर्म ,इन दोनों के फल को प्राणायाम से अवश्य ही नष्ट कर डालता है।

10-योगियों में श्रेष्ठसाधक पूर्वजन्मों के अर्जित पाप-पुण्य रूपी कर्मों को सोलह प्राणायाम करके नष्ट कर डालता है। वह योगी पापों के समूह को वैसे ही नष्ट कर देता है जैसे आग सूखी घास को भस्म करत डालती है।

11-क्रमपूर्वक प्राणायाम का अभ्यास होने पर जब प्राणवायु को तीन घड़ी तक रोके रखने की शक्ति आ जाती है, तब योगी अपनी इच्छा के अनुसार सभी सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है। इस बात में तनिक भी संदेह नहीं किया जाना चाहिए। वह वाक् सिद्धि में समर्थ हो जाता है अर्थात वह विभिन्न विषयों के मर्मभाव को अभिव्यक्त करने में सक्षम हो जाता है तथा उसके द्वारा कही गई बातें सत्य साबित होने लगती हैं।

12-सही-गलत के बीच विभेद करने का स्वविवेक उसके भीतर पैदा हो जाता है और दूरदर्शन की शक्ति भी आ जाती है। श्रुति अर्थात सुदूर के शब्दों को भी सुन सकता है, सूक्ष्म दर्शन अर्थात् सूक्ष्म वस्तु को देख सकता है और दूसरे के शरीर में प्रविष्ट हो सकता है।

13-उसके शरीर से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ भी दूसरों के लिए स्वर्ण के समान हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में योगी को अदृश्य होने की शक्ति प्राप्त हो जाती है तथा आकाश में उड़ने की सामर्थ्य आ जाती है। इन सभी कार्यों को योगी,कुंभक को सिद्ध करके पूर्ण कर सकता है, इसके पश्चात् उसकी घटावस्था हो सकती है। वायु के अभ्यास में परायण योगी के लिए घटावस्था में संसार में सब कुछ प्राप्य हो जाता है।

घटावस्था क्या है ?

07 FACTS;-

1-प्राण, अपान, नाद, बिंदु, जीवात्मा और परमात्मा जब एकत्र हो जाए तब वह योगी की घटावस्था कहलाती है। जब योगी में एक प्रहर भर वायु-धारण की शक्ति आ जाए ,तब साधन में अंतर न आने पर अवश्य ही प्रत्याहार हो सकता है।

2-योगी को जिस-जिस पदार्थ की जानकारी हो,उसी-उसी पदार्थ में उसे आत्मा की भावना करनी चाहिए। जिन इंद्रियों के द्वारा पदार्थ का बोध होता हो उसी में आत्मभाव करने से योगी इंद्रियजयी हो जाता है।

3-अभिप्राय यह है कि जैसे चक्षु से रूप का या कानों से शब्द का बोध होता है, तब उसी रूप अथवा शब्द में आत्मा-भाव करने से चक्षु रूप में आसक्त न होंगे और कान शब्द में आसक्त न होंगे तो चक्षु या कान रूपी इंद्रिया स्वयं ही वश में हो जाएंगी। यही तथ्य अन्य इंद्रियों और उनके विषयों के संबंध में भी समझना चाहिए।

4-जब एक बार पूरे प्रहर अर्थात तीन घंटे तक योगाभ्यास द्वारा कुंभक में स्थिरता प्राप्त हो जाए अथवा आठ घड़ी तक वायु को निश्चल रखने का क्षमता प्राप्त हो जाए तो योगी के भीतर अपने ही सामर्थ्य से केवल पैर के अंगूठे पर खड़ा रहने की शक्ति आ जाती है। परंतु योगी को अपनी शक्तियों के प्रदर्शन के लोभ से बचना चाहिए। उसे अपनी सामर्थ्य की गोपनीयता रखने के लिए विक्षिप्त जैसी चेष्टा प्रदर्शित करनी चाहिए।

5-जब योगी पांच प्रकार की धारणा को सिद्ध कर लेता है तब उसमें पंचभूतों को धारण करने की क्षमता भी पैदा हो जाती है। फिर उन भूतों से उसे किसी प्रकार का भय नहीं होता। मूलाधार चक्र में वायु को पांच घड़ी अर्थात दो घंटे तक धारण करें।

6- फिर उससे ऊपर स्वाधिष्ठान चक्र में दो घंटे तक धारण किए रहें। इसी प्रकार मणिपुर चक्र में और अनाहद तक में भी दो-दो घंटे तक वायु धारण करने का विधान है। फिर विशुिद्ध चक्र और आज्ञा चक्र में भी पांच-पांच घड़ी तक ही वायु-धारणा का अभ्यास करें। इस प्रकार गुदा, मेढ़, नाभि, हृदय, कंठ और भृकुटियों के मध्य में स्थित षट्चक्रों में वायु धारणा करने के इस अभ्यास से सिद्ध होने वाले योगी का पंचभूतों के द्वारा नष्ट होना कदापि संभव नहीं है।

7-इस प्रकार का अभ्यास करने वाला योगी, सौ ब्रह्माओं का मृत्युकाल पूर्ण होने पर भी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता।इस प्रकार ज्ञान की संपन्नता होने पर समाधि भी इच्छानुसार होती है। अर्थात् समाधि में जिस ध्येय का ध्यान किया जाता है, उसी में चित्त नितांत लीन हो जाता है। वह योगी वायु की चैतन्यता को ग्रहण करता हुआ क्रियाशक्ति को वेगवती बना लेता है और सभी चक्रों को जीतकर ज्ञानशक्ति में विलीन हो जाता है अर्थात् आत्मज्ञान या ब्रह्मज्ञान में ही तन्मय हो जाता है। इसी अवस्था को शास्त्रों में ब्रह्मज्ञान की अवस्था कहा जाता है।

रोगनाशक उपाय;-

03 FACTS;-

1-शिवजी कहते हैं कि अब मैं क्लेशों को नष्ट करने के लिए प्राण वायु के उस साधन को कहता हूं, जिससे कि इस संसार चक्र में होने वाले रोगों का निश्चय ही नाश हो जाता है। आशय यह है कि साधक को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना आवश्यक है। अन्यथा साधना में चित्त नहीं लगेगा। इसीलिए शिवजी ने रोगनाशक उपाय कहा है कि यदि जिह्वा को तालु के मूल में लगाकर बुद्धिमान योगी प्राण-वायु का पान करता है, तो उसके रोगों का अवश्य नाश हो जाता है॥

2- इस प्रकार ज्ञान की संपन्नता होने पर समाधि भी इच्छानुसार होती है। अर्थात् समाधि में जिस ध्येय का ध्यान किया जाता है, उसी में चित्त नितांत लीन हो जाता है। वह योगी वायु की चैतन्यता को ग्रहण करता हुआ क्रिया शक्ति का वेगवती बना लेता है और सभी चक्रों को जीतकर ज्ञानशक्ति में विलीन हो जाता है।

3-शिवजी कहते हैं कि अब मैं क्लेशों को नष्ट करने के लिए प्राण वायु के उस साधन को कहता हूं, जिससे कि इस संसार चक्र में होने वाले रोगों का निश्चय ही नाश हो जाता है। आशय यह है कि साधक को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना आवश्यक है। अन्यथा साधना में चित्त नहीं लगेगा। इसीलिए शिवजी ने रोगनाशक उपाय कहा है कि यदि जिह्वा को तालु के मूल में लगाकर बुद्धिमान योगी प्राण-वायु का पान करता है, तो उसके रोगों का अवश्य नाश हो जाता है॥

प्राण अपान की विधि; -

12 FACTS;-

1-विधान का जानने वाला जो साधक कौए की चोंच के समान मुख-मुद्रा बनाकर शीतल वायु को पीता है। वह साधक अवश्य ही मोक्ष का भाजन है, जो विद्वान विधि सहित नित्य प्रति सरस वायु का पान करता है, उसके सभी रोग, श्रम-दाह और वृद्धावस्था आदि का शीघ्र नाश हो जाता है। आशय यह है ऐसी साधना करने वालों के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं और उसके लिए वृद्धावस्था कष्टकर साबित नहीं होती।

2-जो योगी जीभ ऊंची करके अर्थात ब्रह्यरंध्र मार्ग में ले जाकर चंद्रमा से निकलते हुए अमृतरस का पान करता है वह दीर्घजीवी हो जाता है और वह मरने से नहीं डरता। जीभ को ऊंची करके अमृत पान करना खेचरी मुद्रा की प्रक्रिया है, जो योगी नीचे के दांत से राजदंत को दबाकर उसके छिद्र के द्वारा विधिपूर्वक वायु को पीता है और साथ कुंडलिनी देवी का ध्यान करता है, वह छह महीने में ही कवि हो जाता है।

3-जो योगी जीभ ऊंची करके अर्थात ब्रह्यरन्ध्र मार्ग में ले जाकर चंद्रमा से नितलते हुए अमृतरस का पान करता है। अर्थात दीर्घ जीवी हो जाता है और वह मरने से नहीं डरता। जीभ को ऊंची करके अमृत पान करना खेचरी मुद्रा की प्रक्रिया है, जो योगी नीचे के दांत से राजदंत को दबाकर उसके छिद्र के द्वारा विधि पूर्वक वायु को पीता है और साथ कुंडलिनी देवी का ध्यान करता है तो वह छह महीने ही कवि हो जाता है।

4-ऊपर कही हुई काकी मुद्रा की विधि से जो योगी दोनों संध्याओं में कुंडलिनी के मुख का ध्यान करता हुआ प्राण वायु का पान करता है उनका क्षय रोग शीघ्र ही शांत हो जाता है, जो विद्वान योगी कौए की चोंच जैसी मुद्रा बनाकर दिन-रात प्राणवायु का पान करते हैं। उनके रोग अवश्य नष्ट हो जाते हैं तथा उन्हें दूर के शब्द श्रवण शक्ति प्राप्त होकर दूर दर्शन की क्षमता भी उपलब्ध हो जाती है। इस प्रकार वह रोगी सुक्ष्म की वस्तुओं को देखने में भी देखने में भी समर्थ हो जाता है।

5-जो मेधावी पुरुष दांत के द्वारा को पीडि़त करके तथा जीभ को ऊपर शर्नः शनैः वायु का पान करता है। वह शीघ्र ही मृत्यु को जीत कर चिरंजीवी हो जाता है जो योगी इस अभ्यास को नित्यप्रति करता है, वह छह महीने में ही सब पापों से मुक्त हो जाता है और उसके सभी रोग नष्ट हो जाते हैं।

6-यदि उक्त विधि से कोई योगी एक वर्ष तक अभ्यास करता रहे तो अवश्य ही मृत्यु को जीत लेता है, इसलिए योग साधन करने वाले मुमुक्षु को यत्नपूर्वक इसकी साधना करना चाहिए। यदि इस प्रकार का साधन तीन वर्ष तक लिया जाए, तो निश्चय ही वह भैरव हो जाता है अर्थात भैरव के समान सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है साथ ही अणिमादि अष्ट सिद्धियों की उपलब्धि हो जाती है और उस साधक के वश में समस्त भूतगण स्वयं ही हो जाते हैं।

7-यदि योगी की जीभ आधे क्षण के लिए भी ऊपर स्थित हो जाए तो क्षण भर में ही स