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ब्रह्मज्ञान की परिभाषा क्या है?


ब्रह्म-विद्या का अर्थ वह विद्या है, जिससे हम उसे जानते है, जो सब जानता है। गणित आप जिससे जानते है, फ़िज़िक्स आप जिससे जानते है, केमिस्‍ट्री आप जिससे जानते है। उस तत्‍व को ही जान लेना ब्रह्म विद्या है। जानने वाले को जान लेना ब्रह्म विद्या है। ज्ञान के स्‍त्रोत को ही जान लेना ब्रह्म विद्या है। भीतर जहां चेतना को केंद्र हे, जहां से मैं जानता हूं आपको, जहां से मैं देखता हूं आपको; उसे भी देख लेना, उसे भी जान लेना, उसे भी पहचान लेना, उसकी प्रत्‍यभिज्ञा, उसका पुनर् स्मरण ब्रह्म विद्या है।

कृष्‍ण कहते है, विद्याओं में मैं ब्रह्म विद्या हूं।

इसलिए भारत ने फिर बाकी विद्याओं की बहुत फ्रिक नहीं की। भारत के और विद्याओं में पिछडे जाने का बुनियादी कारण यही है। भारत ने फिर और विद्याओं की फिक्र नहीं कि, ब्रह्म-विद्या की फिक्र की।

लेकिन उसमें अड़चन है, क्‍योंकि ब्रह्म-विद्या जानने को कभी लाखों-करोड़ो में एक आदमी उत्‍सुक होता है। पूरा देश ब्रह्म-विद्या जानने को उत्‍सुक नहीं होता। और भारत के जो श्रेष्‍ठतम मनीषी थे, वे ब्रह्म-विद्या में उत्‍सुक थे। और भारत का जो सामान्य जन था। उसकी कोई उत्‍सुकता ब्रह्म-विद्या में नहीं थी। उसकी उत्‍सुकता तो और विधवाओं में थी। लेकिन सामान्य जन और विद्याओं को विकसित नहीं कर सकता। विकसित तो परम मनीषी करते है। और परम मनीषी उन विद्याओं में उत्‍सुक ही न थे।

इसलिए भारत ने बुद्ध को जाना, महावीर को, कृष्‍ण को, पतंजलि को, कपिल को, नागराजन को, वसु बंध को, शंकर को जाना भारत ने। ये सारे, इनमें से कोई भी अल्बर्ट आइंस्टीन हो सकता है, इनमें से कोई भी प्‍लांक हो सकता है। इनमें से कोई भी किसी भी विधा में प्रवेश कर सकता है। लेकिन भारत का जो श्रेष्‍ठतम मनीषी था, वह परम विद्या में उत्‍सुक था। और भारत का जो सामान्य जन था। उसकी तो परम विद्या में कोई उत्‍सुकता ही नहीं थी। उसकी उत्‍सुकता दूसरी विद्याओं में है। लेकिन वह विकसित नहीं कर सकता। विकसित तो परम मनीषी करते है।

पश्‍चिम में दूसरी विद्याओं को विकसित किया, क्‍योंकि पश्‍चिम के बड़े मनीषी और विद्याओं में उत्‍सुक थे। इसलिए एक अद्भुत घटना घटी। पश्‍चिम ने सब विद्याएँ विकसित कर लीं और आज पश्‍चिम को लग रहा है। कि वह आत्‍म-अज्ञान से भरा हुआ है। और पूरब ने आत्‍म-ज्ञान विकसित कर लिया और आज पूरब को लग रहा है। कि हमसे ज्‍यादा दीन और दरिद्र और भुखमरा दुनिया में कोई नहीं है।

हमने एक अति कर ली, परम विद्या पर हमने सब लगा दिया दांव। उन्‍होंने दूसरी अति कर ली। उन्‍होंने आत्‍म विद्या को छोड़कर बाकी सब विद्याओं पर दांव लगा दिया। बड़ी उलटी बात है। वे आत्‍म-अज्ञान से पीड़ित है और हम शारीरिक दीनता और दरिद्रता से पीड़ित हे।

वह जो परम विद्या है, इस परम विद्या और सारी विद्याओं का जब संतुलन हो, तो पूर्ण संस्‍कृति विकसित होती है। इसलिए न तो पूरब और न पश्‍चिम ही पूर्ण है। फिर भी अगर चुनाव करना हो अगर तो परम विद्या ही चुनने जैसी है। सारी बिद्याएं छोड़ी जा सकती है। क्‍योंकि और सब पा कर कुछ भी पाने जैसा नहीं है।

कृष्‍ण कहते है। मैं परम विद्या हूं सब विद्याओं में।

लेकिन यह बात आप ध्‍यान रखना, और विद्याओं का वे निषेध नहीं करते है। और विद्याओं में जो श्रेष्‍ठ है, उसकी सुचना भर दे रहे है। वे यह नहीं कह रहे है कि सिर्फ अध्‍यात्‍म-विद्या को खोजना है, बाकी सब छोड़ देना है।

यह भी सोचने जैसा है। कि अध्यात्म-विद्या परम विद्या तभी हो सकती है। जब दूसरी बिद्याएं भी हो। नहीं तो यह परम विद्या नहीं रह जाएगी। आप कोई मंदिर का अकेला सोने का शिखर बना लें और दीवालें न हों तो समझ लेना शिखर जमीन पर पडा हुआ लोगों के पैरो की ठोकर खाए गा। मंदिर का स्‍वर्ण-शिखर आकाश में उठता ही इसलिए है कि पत्‍थर की दीवालें उसे सम्‍हालती है। अध्‍यात्‍म-विद्या का शिखर भी तभी सम्‍हलता है, जब और सारी बिद्याएं दीवालें बन जाती है। और सम्‍हालती है।

अब तक हम कहीं भी मंदिर नहीं बना पाए। हमने शिखर बना लिया, पश्‍चिम ने मंदिर की दीवालें बना ली। जब तक हमारी शिखर पिश्चम के मंदिर पर न चढ़े, तब तक दुनिया में पूर्ण संस्‍कृति पैदा नहीं हो सकती। ये विरोध भास नहीं समन्‍वय को दोर है। हम यहां पर दीवालों का जिर्णधार करने में लगे है। कलस तो है पर दीवालें हमें पश्‍चिम से ही लेनी है।

सत्य की परिभाषा क्या है? सत्य की इतनी ही परिभाषा है कि जो सदा था, जो सदा है और सदा रहेगा। असत्य की इतनी ही परिभाषा है कि जो कल नहीं था, अभी है, कल फिर नहीं हो जाएगा। असत्य का अर्थ है, दो नहीं के बीच थोड़ी देर को होना है; दो न होने के बीच थोड़ी देर को होने का भ्रम है। थोड़ा सोचो, जब दोनों तरफ नहीं है, तो बीच में हो कैसे सकेगा! माया का मतलब यह है: कल नहीं थी, आज है, कल फिर नहीं हो जाएगी। तो जो दो कोनों पर नहीं है, वह बीच में हो नहीं सकती, सिर्फ दिखाई पड़ती होगी, भास होता होगा। क्योंकि 'नहीं' से 'है' कैसे पैदा हो सकता है? और जो 'है', वह फिर 'नहीं' में कैसे खो सकता है? तुम नहीं थे एक दिन। जन्म के पहले तुम कहां थे? मृत्यु के बाद तुम कहां रहोगे? थोड़ी सी देर का सपना है। आंख लगी, सपना देख लिया है; आंख खुलते ही खो जाएगा। सत्य की परिभाषा क्या है? सत्य की इतनी ही परिभाषा है कि जो सदा था, जो सदा है और सदा रहेगा। असत्य की इतनी ही परिभाषा है कि जो कल नहीं था, अभी है, कल फिर नहीं हो जाएगा। असत्य का अर्थ है, दो नहीं के बीच थोड़ी देर को होना है; दो न होने के बीच थोड़ी देर को होने का भ्रम है। थोड़ा सोचो, जब दोनों तरफ नहीं है, तो बीच में हो कैसे सकेगा! इसलिए शंकर संसार को माया कहते हैं। माया का मतलब यह है: कल नहीं थी, आज है, कल फिर नहीं हो जाएगी। तो जो दो कोनों पर नहीं है, वह बीच में हो नहीं सकती, सिर्फ दिखाई पड़ती होगी, भास होता होगा। क्योंकि 'नहीं' से 'है' कैसे पैदा हो सकता है? और जो 'है', वह फिर 'नहीं' में कैसे खो सकता है? तुम नहीं थे एक दिन। जन्म के पहले तुम कहां थे? मृत्यु के बाद तुम कहां रहोगे? थोड़ी सी देर का सपना है। आंख लगी, सपना देख लिया है; आंख खुलते ही खो जाएगा। सहजो ने कहा है: जगत तरैया भोर की। जैसे सुबह का तारा होता है, आखिरी--अब डूबा, तब डूबा। डबडबाता है। तुम देखते ही रहोगे और देखते ही देखते खो जाएगा। जगत तरैया भोर की--ऐसा सारा जीवन है। महावीर ने कहा है: जैसे घास के पत्ते पर ओस की बूंद--ऐसा जीवन है। घास के पत्ते पर ओस की बूंद को कभी गौर से देखा? अब ढलकी, तब ढलकी। तुम्हारे देखते-देखते ही ढल जाएगी; हवा का जरा सा झोंका काफी है। सूरज का निकलना--भाप बन जाएगी--काफी है। जरा सा धक्का, और गई। जब होती है, तब तो मोतियों कोर् ईष्या होती है। जब होती है बूंद ओस की, तब तो मोती भी शरमाते होंगे, झेंप जाते होंगे, ऐसी चमकती है। पर उसका होना क्या है? न जैसा है; हुई, न हुई, बराबर है। जीवन क्षणभंगुर है तो सत्य नहीं हो सकता। तुमने जो भी जाना है, अगर वह जाना और फिर खो जाता है, वह सत्य नहीं हो सकता। वह मन की ही भावना रही होगी; वह मन की ही कल्पना रही होगी; वह तुम्हारा ही प्रक्षेपण रहा होगा। वैसी सच्चाई नहीं है, तुमने मान लिया होगा। वह तुम्हारी मान्यता है। मान्यता माया है। तुम्हारे भीतर की कामना को तुम जीवन के पर्दे पर आरोपित करके देखते चले जाते हो।

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ब्रह्मज्ञान क्या है?-

तैत्तिरीय उपनिषद के अनुसार''मैं इस बात को जान गया कि आनन्द ही ब्रह्म है।''

ब्रह्मज्ञान के नाम पर हम लोग भ्रान्तियों से घिरे हुए हैं। हम सोचते हैं कि ब्रह्मज्ञान कोई हौव्वा है — इससे दूर ही रहना चाहिए।

ब्रह्मज्ञान की बातें अधिकतर हम साधु-महात्माओं से सुनते हैं, इसलिये हम लोग समझते हैं कि ब्रह्मज्ञान तो साधु-महात्मा हो जाने पर ही हो सकता है और ब्रह्मज्ञान हो जाने पर हमारा जीवन भी उन की तरह शुष्क और अर्थहीन हो जायेगा। फिर तो उनकी तरह हम भी संसार में कोई सुख नहीं भोग पायेंगे। हम सोचते हैं कि ब्रह्मज्ञान हम से हमारा सुख छीन लेगा और हमारे पास रह जायेगी एक नीरस और बोरिंग जिन्दगी।

लेकिन यह हमारी भ्रान्ति है।

जब “मैं” और “तू” के एक हो जाने से हमारी दिव्यता प्रकट होती है, तो फिर दिक्कत किस बात की है?

हम लोग अपने अस्तित्व की सच्चाई को देखने से क्यों कतराते हैं?

हम लोग ब्रह्मज्ञान से डरते क्यों हैं?हम लोग ब्रह्मज्ञान से इसलिये डरते हैं क्योंकि हम ब्रह्मज्ञान का अर्थ नहीं समझते।

ऐसी भ्रान्ति के लिये आप का कोई दोष नहीं है। जो लोग ब्रह्मज्ञान की बातें करते हैं, अक्सर वे तोते की तरह एक ही रट लगाये रहते हैं — जीवन का कोई अर्थ नहीं है... संसार में तो दुख ही दुख है... जीवन तो विकारों से भरा पड़ा है, आदि आदि। क्योंकि अधिकतर तो संसार को छोड़ने वाले ही ब्रह्मज्ञान की बातें करते हैं, इसलिये हमें लगता है कि ब्रह्मज्ञान किसी प्रकार के त्याग पर आधारित है। इसलिये ब्रह्मज्ञान से हमें भय लगने लगता है।

लेकिन यह भय निराधार है। हम आप को यह बताना चाहते हैं कि ब्रह्मज्ञान कोई त्याग नहीं है — यह तो एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। ब्रह्मज्ञान आपको संपूर्ण सुख देता है — भौतिक भी और अध्यात्मिक भी। ब्रह्म का तो अर्थ ही आनन्द है।

ब्रह्मज्ञान कोई हौव्वा नहीं है। यह तो एक व्यवहारिक सूत्र है जो हमारी उच्चतम सफलता का मार्ग खोलता है।

ब्रह्म के अर्थ को समझने के लिये हम आप को ले चलते हैं तैत्तिरीय उपनिषद की एक प्रसिद्ध कथा की ओर। भृगुवल्ली नाम के अध्याय में चर्चित यह कथा है तो थोड़ी लम्बी, पर हम आपके समक्ष उसक संक्षिप्त भाषान्तर (version) प्रस्तुत करते हैं।

प्रसिद्ध ऋषि भृगु के मन में जिज्ञासा उठी कि ब्रह्म को जाना जाये — ब्रह्म को समझा जाये। उनके पिता वरुण जी वेदों को जानने वाले ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे। भृगुजी ने अपने ब्रह्मज्ञानी पिता वरुण जी से प्रार्थना की —

“भगवन, मैं ब्रह्म को जानना चाहता हूँ, अतेव आप कृपा कर के मुझे ब्रह्म का अर्थ समझाइये।”

तब वरुण जी ने भृगु से कहा, “तातन्न अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी — ये सब ब्रह्म की उपलब्धि के द्वार हैं। इन सब में ब्रह्म की सत्ता स्फ-रित हो रही है।” फिर साथ में यह भी बताया कि सब प्रत्यक्ष दिखने वाले प्राणी जिस से उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीते हैं, तथा प्रयाण करते हुए जिस में विलीन हो जाते हैं, वही ब्रह्म है।

भृगु जी कुछ समझ नहीं पाये। उन्होंने वरुण जी से विस्तार पूर्वक समझाने की विनती की।

“मेरे समझाने से कुछ नहीं होगा”, वरुण जी बोले, “यह तुम्हें स्वयं ही समझना होगा। जाओ, तपस्या करो और स्वयं जानो इसका अर्थ।”

भृगु जी ने निष्ठापूर्वक पिता के कथन पर विचार किया, मनन किया। यही उनका तप था।

मनन के बाद भृगु जी इस निश्चय पर पहुँचे कि अन्न ही ब्रह्म है। उन्हें अन्न में वे सारे लक्षण नजर आये जो पिता जी ने बताये थे —

समस्त प्राणी अन्न से ही (अन्न के परिणार्मभूत वीर्य से) उत्पन्न होते हैं, अन्न खा कर ही जीवित रहते हैं और मरणोपरान्त अन्न देने वाली पृथ्वी में ही प्रविष्ट हो जाते हैं।

लेकिन वरुण जी ने भृगु महाराज के इस निश्चय का समर्थन नहीं किया। वे जानते थे कि पुत्र ने ब्रह्म के स्थूल रूप को ही समझा है। ब्रह्म के वास्तविक रूप तक उसकी बुद्धि अभी हीं पहुँची है।

भृगु जी ने फिर प्रार्थना की, “भगवन्! यदि मैं ठीक नहीं समझा तो आप ही मुझे ब्रह्मतत्त्व समझाइये।” लेकिन वरुण जी नहीं माने। उन्होंने कहा, “तू तप के द्वारा ब्रह्म को समझने की कोशिश कर। तेरा तप ब्रह्म का बोध कराने में सर्वथा समर्थ है।”

पिता की आज्ञा पाकर भृगु जी ने फिर तप शुरू किया। इस बार उन्होंने निश्चय किया —

प्राण ही ब्रह्म है।

लेकिन इस बार भी वरुण जी ने न तो उनके निश्चय का समर्थन किया और न ही उसे ब्रह्म का अर्थ समझाया।

“तुम्हारा तप ही ब्रह्म की प्राप्ति का साधन है।” — ऐसा कह कर उन्होंने भृगु जी को फिर से तपस्या करने के लिए कहा।

अगली दो बार भृगु जी के निश्चय थे —

मन ही ब्रह्म है।

विज्ञान ही ब्रह्म है।

लेकिन वरुण जी ने इन दोनों का भी समर्थन नहीं किया। उन्होंने सोचा — इस बार बेटा ब्रह्म के निकट आ गया है। उसका विचार स्थूल और सूक्ष्म दोनों जड़ तत्त्वों से ऊपर उठ कर चेतन तक तो पहुँच गया है, किन्तु ब्रह्म का स्वरूप तो इससे भी विलक्षण है। इसे अभी और तपस्या की आवश्यकता है।

जब इस बार भी भृगु जी के निश्चय को समर्थन नहीं मिला तो वे पुनः तप करने चले गये।

पाँचवीं बार भृगु जी ने अन्तिम रूप से निश्चर्यपूर्वक जाना—

आनन्द ही ब्रह्म है।

सचमुच में आनन्द से ही सारे प्राणी उत्पन्न होते हैं, आनन्द के सहारे ही वे जीते हैं, तथा इस लोक से प्रयाण करते हुए अन्त में आनन्द में ही विलीन हो जाते हैं।

इस प्रकार जान लेने पर भृगु जी को ब्रह्म का पूरा ज्ञान हो गया। तब से भृगु महाराज ब्रह्मज्ञानी कहलाने लगे।

आनन्द ही ब्रह्म है — इस बोध में ब्रह्मज्ञान है।

यहाँ पर एक बात को ठीक से समझना है — ब्रह्म और आनन्द एक ही तत्त्व के दो नाम हैं। ब्रह्म आनन्द से अलग नहीं है, आनन्द ब्रह्म से अलग नहीं है। ऐसा नहीं है कि ब्रह्म में आनन्द है, और ऐसा भी नहीं है कि आनन्द में ब्रह्म है। तथ्य यह है कि आनन्द ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही आनन्द है।

इसे समझने के लिये एक छोटा सा उदाहरण लेते हैं —

जब हम कहते हैं कि गिलास में पानी है तो इसका अर्थ होता है कि गिलास और पानी दो अलग-अलग चीजें हैं। एक ओर जहाँ पानी के बिना भी गिलास हो सकता है, वहीं दूसरी और गिलास के बिना भी पानी हो सकता है। लेकिन जब पानी की अधिकता इतनी बढ जाये कि हम उसे समुद्र कहने लगें,तब यह कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती कि समुद्र में पानी भरा है। समुद्र का अर्थ ही है — अथाह पानी। इसी प्रकार ब्रह्म का अर्थ ही है — अथाह आनन्द। ब्रह्म का अर्थ ही है — आनन्द का समुद्र।

आनन्द का अपार सागर ही परमात्मा है। कोई इसे गा—ड़ कहता है, तो कोई खुदा कहता है। कोई उसे ओंकार कहता है तो कोई उसे महाशक्ति कहता है। कोई इसी को कर्त्तापुरख कहता है तो कोई सुप्रीम पावर कहता है। नाम चाहे जो भी हो किन्तु ब्रह्म एक ही है — आनन्द का सागर! अनन्त सुख का महासमुद्र!

तुलसीदास जी ने भी अपने परमात्मा (राम) को आनन्द-सिंधु ही कहा है। पुत्रों के जन्म के अवसर पर मुनि वसिष्ठ जी भी दशरथ के घर आये थे। देखिये! नामकरण के समय वसिष्ठ जी दशरथ महाराज से क्या कहते हैं —

जो आनन्द सिन्धु सुख रासी।

सी करते त्रैलोकी सुपासी।।

सो सुखधाम राम असनामा।

अखिल लोक दायक बिश्रामा।।

यह जो आनन्द के समुद्र और सुख की राशि हैं, और जिस (आनन्द सिंधु) के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं, उन (आप के सबसे बड़े बेटे) का नाम राम है। राम सुख का भवन हैं और वे तीनों लोकों को शांति देने वाले हैं।

परमात्मा सुख से ओत-प्रोत है। परमात्मा सुख का अथाह सागर है। अनन्त सुख ही परमात्मा है। वेदान्त में परमात्मा की यही परिभाषा दी गई है।

परमात्मा में केवल सुख होता है — इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। जो परमात्मा में डूबता है, वह भी सुख से सरोबार हो जाता है। सुख में डूब जाने का ज्ञान ही ब्रह्मज्ञान है।

आनन्द में डूब जाने का ज्ञान ब्रह्मज्ञान है।

भृगुवल्ली की कथा में दो बातें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पहली बात तो यह है कि ब्रह्मज्ञान केवल अपने ही अन्दर से हो सकता है, किसी और उपाय से नहीं। इसीलिये तो इसे आत्मज्ञान कहा जाता है। भृगु जी बार-बार विनती करते रहे कि वरुण जी उसे ब्रह्म का अर्थ समझाएँ, लेकिन वरुण जी एक ही बात पर अड़े रहे — ब्रह्मज्ञान तो केवल अपने स्वयं के मनन से ही हो सकता है। ब्रह्मज्ञान कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका लड्रडू बनाकर किसी दूसरे के मुँह में ड़ाला जा सके। जो सच्चा ब्रह्मज्ञानी है, वह जानता है कि ब्रह्मज्ञान तो अपने पुत्र को भी नहीं दिया जा सकता, दूसरों को देने की बात तो दूर रही।

लेकिन फिर भी हमारे बहुत सारे महात्मा “ब्रह्मज्ञान” को प्रसाद की तरह बाँटने में लगे हुए हैं,और बहुत सारे लोग उसे बटोर कर ले जाने में लगे हुए हैं।

सोचिये जरा—

कैसा होगा यह प्रसाद!

कैसे होंगे बाँटने वालेन्!

कैसे होंगे बटोरने वाले!

भृगुवल्ली की दूसरी उल्लेखनीय बात कथा की विवेचना में कही गई है। कथा के अन्त में दी गई यह टिप्पणी ध्यानपूर्वक पढने योग्य है —

जो कोई मनुष्य भृगु की भान्ति तपस्यापूर्वक विचार कर आनन्द-स्वरूप परब्रह्म परमात्मा को जान लेता है, वह भी आनन्द-स्वरूप परमात्मा में स्थित हो जाता है। इतना ही नहीं, वह इस लोक में भी बहुत अन्न वाला और अन्न को भली भान्ति पचाने की शक्ति वाला हो जाता है।। ऐसा ब्रह्मज्ञानी नाना प्रकार के जीवनयात्रोपयोगी भोगों से सम्पन्न हो जाता है और उन सब को सेवन करने की सामर्थ्य भी उसमें आ जाती है। उस के मन, शरीर और इन्दि्रयाँ सर्वथा निर्विकार और निरोग हो जाते हैं। वह सन्तान से, पशुओं से (धन-सम्पत्ति), ब्रह्म तेज से और बड़ी भारी कीर्ति से समृद्ध होकर जगत में सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है।

अब देखिये जरा! ब्रह्मज्ञानी को माया भी मिलती है और राम भी। ब्रह्मज्ञानी के पास धन भी होता है, स्वास्थ्य भी। ब्रह्मज्ञानी को भोग भी उपलब्ध होते हैं और उन के सेवन के सामर्थ्य भी। ब्रह्मज्ञानी को भौतिक सुख भी मिलता है और अध्यात्मिक सुख भी। ब्रह्मज्ञानी को संसार भी मिलता है और परमात्मा भी — क्योंकि संसार परमात्मा से अलग नहीं है । ब्रह्मज्ञान वह पूर्ण ज्ञान है जिसके लिये देवता यात्रा करते हैं।

ब्रह्मज्ञान वह पूर्ण ज्ञान है जिसके लिये देवता यात्रा करते हैं।

संसार को छोड़कर पाया गया परमात्मा अधूरा है। भौतिकता अपूर्ण है तो अध्यात्मिकता भी अपूर्ण है। एक अपूर्णता को छोड़कर दूसरी अपूर्णता के पीछे भागने का क्या लाभ?

ब्रह्मज्ञानी को संसार भी मिलता है और परमात्मा भी - क्योंकि संसार परमात्मा से अलग नहीं है।

ईशावास्योपनिषद की एक श्रुति की विवेचना करते हुए प्रो— सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार कहते हैं —

“इस श्रुति का तीसरा अर्थ भी है। इस अर्थ के अनुसार ‘अविद्या’ का अर्थ है भौतिकवाद (मद्देरालिस्म्) तथा ‘विद्या’ का अर्थ है अध्यात्मवाद (स्परित्ुालिस्म्)। जो ‘अविद्या’ अर्थात्र भौतिकवाद की उपासना करते हैं, वे गहन अन्धकार में जा पहुँचते हैं, और जो ‘विद्या’ अर्थात् निरे, कोरे अध्यात्मवाद की उपासना करते हैं, भौतिक-जगत् की परवाह नहीं करते, वे उससे भी गहरे अन्धकार में जा पहुँचते हैं, क्योंकि भौतिकवाद में कुछ हाथ आता है, कम-से-कम संसार हाथ आता है, निरे, थोथे अध्यात्मवाद में तो कुछ भी हाथ नहीं आता।”

हम दोनों यह मानते हैं कि अध्यात्मिकता के बिना भौतिकता लंगड़ी है। लेकिन, हम लोगों को यह भी समझना है कि भौतिकता के बिना अध्यात्मिकता अन्धी है। दोनों को एक साथ अपना कर ही हम पूर्ण हो सकते हैं।

आपको शायद बचपन की यह कहानी याद होगी —

एक दिन नदी में बाढ आई। किनारे पर बसे हुए गाँव में बाढ का पानी भरने लगा। लोगों ने गाँव छोड़ कर भागना शुरू कर दिया। सारा गाँव खाली हो गया, लेकिन दो लोग रह गये। एक लंगड़ा था जो बाढ के बढते हुए पानी को तो देख रहा था, लेकिन वह वहाँ से जा नहीं सकता था। दूसरा आदमी अंधा था जो चल तो सकता था लेकिन रास्ता नहीं देख सकता था। उन दोनों ने मिलकर योजना बनाई — अन्धे ने लंगड़े को अपने कंधों पर बिख दिया। फिर अन्धा चलता गया और लंगड़ा उसे राह दिखाता रहा। आपसी सहयोग से दोनों बच गये।

अध्यात्मिकता और भौतिकता को लेकर लड़ने की आवश्यकता नहीं है। इन दोनों के साथ हमें सहयोग का सम्बन्ध बनाना है, ठीक वैसे, जैसे प्रो— सत्यव्रत जी समझा रहे हैं —

“उपनिषद का ऋषि संसार को छोड़ने के लिये नहीं कहता, वह भोगने और त्यागने की, अविॅा और विद्या की, असम्भूति और संभूति की बात कहता है। विद्या भी ठीक, अविद्या भी ठीक, सम्भूति भी ठीक, असम्भूति भी ठीक — ये मिलकर चलें तो ठीक, एकुदूसरे से लडें तो ना-ठीक। इस प्रकार के समन्वय को ईशावास्योपनिषद का सार कहा जा सकता है।”

अध्यात्मिकता हमारी भौतिकता का पूरक है— उसका विकल्प नहीं।

अध्यात्मिकता का अर्थ त्याग नहीं है। अध्यात्मिकता का अर्थ संसार से विमुखता भी नहीं है। अध्यात्मिकता तो हमारी वह दृष्टि है जिस से हम यह देख लेते हैं कि हमारी धन-दौलत और हमारे घर-परिवार के पार भी बहुत कुछ है। इस का अर्थ यह नहीं कि यह बोध उसी को हो सकता है जो संसार का त्याग करता है, या संसार को तुच्छ और मिथ्या कहने लगता है।

अध्यात्मिक होने का अर्थ साधु-महात्मा हो जाने से नहीं है। अध्यात्मिक होने का अर्थ है — परमात्मा के साथ एकात्मकता बनाकर जीने की कला सीख लेना। अध्यात्मिक होने का अर्थ है — इस अस्तित्त्व के साथ सहयोग का सम्बन्ध बना लेना। अध्यात्मिक होने का अर्थ है — परमात्मा को अपने जीवन में घोल लेना।

अध्यात्मिक होने का उद्देश्य है — सुख की अनुभूति को बनाये रखना। अध्यात्मिक होने का उद्देश्य है — ब्रह्म में स्थित हो जाना।

एक अध्यात्मिक व्यक्ति अपने हर सुख को परम सुख बना देता है। अध्यात्मिक व्यक्ति जानता है कि परम सुख कहीं आसमान से नहीं टपकता। वह जानता है कि आनन्द कहीं बाहर से नहीं आता। हमारी यात्रा ही हमारे छोटे से सुख को परम सुख बनाती है, हमारी यात्रा ही हमारे क्षणिक सुख को आनन्द बनाती है।

सारी महिमा यात्रा की है।

अध्यत्मिकता यह नहीं कहती कि हम दरिद्रता का जीवन-यापन करें। अध्यात्मिकता का यह अर्थ नहीं कि हम दीन-हीन बन कर जीवन काटें। अध्यात्मिकता तो हमारी भौतिकता की पूर्णता है। यह पूर्णता तभी पाई जा सकती है, जब हम संसार को छोड़ कर नहीं, संसार के साथ चलते हैं। हम पूर्ण तभी हो सकते हैं जब हम भौतिकता का त्याग नहीं, भौतिकता को साथ लेकर यात्रा करते हैं।

देवता भौतिकता की उपेक्षा नहीं करते — तभी तो इनका शरीर स्वस्थ और सुन्दर होता है। देवता संसार की उपेक्षा नहीं करते — तभी तो इनके साथ पत्नी भी होती है, वाहन भी होता है, मदिरा भी होती है। देवता सब को साथ लेकर स्वर्ग पहुँचते हैं, किसी को छोड़कर नहीं। देवता सब को साथ लेकर आनन्द तक पहुँचते हैं।

आनन्द तक पहुँचने की यात्रा वास्तव में पूर्ण होने की यात्रा है।

आप संसार में रहकर भी अध्यात्मिक सुख का अनुभव कर सकते हैं। संसार के त्याग का अध्यात्मिकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। सांसारिक सुख और अध्यात्मिक सुख परस्पर अपवर्जक (mutually exclusive) नहीं हैं। एक को पाने के लिये दूसरे को छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। सांसारिकता और अध्यात्मिकता एक दूसरे को पूरक हैं। जो परमात्मा अध्यात्मिक सुख में है, वही परमात्मा भौतिक सुख में है। प्रश्न इस बात का नहीं कि सांसारिक सुख को छोड़ा जाये या अध्यात्मिक सुख को, प्रश्न तो यह है कि सांसारिकता और अध्यात्मिकता का सामंजस्य कैसे बिठाया जाये।

अध्यात्मिक सुख के लिये भौतिक सुख छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता तो भौतिकता और अध्यात्मिकता में सामंजस्य बिठाने की है।

यह जरूरी नहीं कि एक महात्मा आपसे अधिक अध्यात्मिक हो। हो सकता है कि वह आप से भी बड़ा संसारी हो। यदि आप भौतिक सुख को परमात्मा की कृपा समझ कर स्वीकार करते हैं तो आप उस महात्मा से अच्छे हैं जो संसार को कोसने में लगा हुआ है। यदि आप सांसारिक सुख को परमात्मा का आशीर्वाद समझ कर भोगते हैं, तो आप उस त्यागी से अच्छे हैं जो संसार और संसारियों को तुच्छ समझने में अपना बड़प्पन समझता है। हमारे साधु-महात्मा भी उतने अपूर्ण हैं, जितने कि हम संसारी।

हमारे एक परिचित हैं —श्री यश शारद। उन्होंने हमें एक दिलचस्प घटना सुनाई थी। घटना सुनाने से पहले हम आप को बताना चाहते हैं कि शारद जी वाटरलू (केनेड़ा) में रहते हैं। इनसे हमारा परिचय वहीं पर हुआ था। सरल हृदय और उन्मुक्त विचारों वाले शारद जी बहुगुणी प्रतिभा के मालिक हैं। एक ओर जहाँ वे बड़े अच्छे वक्ता हैं, कलाकार हैं, स्टेज और नाटक के दिग्दर्शन में निपुण हैं, वहीं दूसरी ओर वे उर्दू के बहुत अच्छे शायर भी हैं। कीनिया (अफ़्रीका) से आये हुए शारद जी पहले सेन्ट जान्स में रहते थे। सेन्ट-जान्स केनेडा के न्यू फाउंडलैं्ड नामक प्रांत की राजधानी है।

हाँ, तो वह घटना हम आप को शारद जी के शब्दों में ही सुनाते हैं —

काफी पुरानी बात है। उन दिनों सेन्ट-जान्स में एक बहुत बड़े स्वामी आये थे। (मैं चाहता हूँ कि स्वामी जी का नाम गुप्त रखा जाये।) वहाँ के मन्दिर में स्वामी जी का प्रवचन रखा गया। मुझे यह बताने में बड़ी खुशी है कि स्वामी जी ने बड़ा ही सुन्दर प्रवचन दिया था।

मैं मन्दिर का सेक्रेटरी था, इसलिये उन के स्वागत-सत्कार का भार मेरे ऊपर था। जब उन का प्रवचन समाप्त हुआ तो मेरे मन में विचार आया कि स्वामी जी से उनके मिशन के बारे में कुछ पूछा जाये। वे अपने मिशन के प्रचार के लिये हर साल आते थे। आप तो जानते ही हैं कि केवल वे ही नहीं और भी कई स्वामी, महात्मा अपने मिशन, अपनी संस्था के प्रचार के लिये केनेड़ा आते हैं, अमरीका जाते हैं, इंग्लैंड़ जाते हैं। मैं ने अपनी जिज्ञासावश तथा उपस्थित श्रोताओं के लाभ हेतु प्रश्न पूछा, “स्वामी जी, भारत के हालात देखते हुए ऐसा लगता है कि हम हिन्दुओं को संगठित होकर रहना चाहिए। लेकिन आजकल नए-नए मिशन, नई-नई संस्थाएँ बनती जा रही हैं। हर स्वामी अपना एक नया ग्रुप बना देता है, हर महात्मा अपना एक नया मिशन खड़ा कर देता है। क्या इतने सारे मिशन हिन्दू-एकता के लिये लाभदायक हैं? हमें तो लगता है कि जितने अधिक मिशन होंगे, जितनी अधिक संस्थाएँ होंगी, हिन्दू-एकता को उतना नुकसान होगा, हिन्दू-समाज उतना ही बँटता जायेगा।”

मेरे मन में यह जिज्ञासा काफी समय से थी। सोचा, स्वामी जी से अच्छा इस बात को और कौन समझा पायेगा। जो स्वयं इतना बड़ा मिशन चला रहे हैं, आज हमें उन से कुछ सीखने का अवसर मिला है। मुझे विश्वास था कि स्वामी जी सहर्थ मेरे प्रश्न का उत्तर देंगे।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनकी प्रतिक्रिया तो उल्टी हुई। स्वामी जी बिगड़ कर बोले — “बैठ जाओ! यह तो बिल्क-ल व्यर्थ का प्रश्न है।” मैंने दोबारा बड़ी नम्रता से प्रार्थना की — “स्वामी जी, नाराज होने की बात नहीं है। हमें जिज्ञासा है कि आप हमारे प्रश्न का उत्तर दें। देखिये, उपस्थित श्रोता भी आपके विचार जानने के लिये कितने उत्सुक हैं!”

मेरा इतना कहना था कि स्वामी जी क्रोध से उबल पड़े। “किस बात का उत्तर दूँ?” गुस्से से लाल होकर वे मुझ पर बरस पड़े, “तुम्हें तो किसी महात्मा से बात करने की तमीज भी नहीं है।”

मैं हक्का-बक्का रह गया। स्वामी जी ने सीधे-सीधे मुझ पर प्रहार कर दिया। वे तो हमारे महमान थे, हमारे आदरणीय थे। प्रवचन के बाद मुझे धन्यवाद का प्रस्ताव रखना था। लेकिन अब काहे का धन्यवाद? अब तो मेरा शांत रहना मुश्किल हो गया। स्वामी जी का इतना क्रोध! अब मैं इनका धन्यवाद कैसे कर सकता था? मैं भी तैश में आकर बोल गया, “स्वामी जी, बोलने की तमीज तो आप में भी नहीं है। अभी तक आपने भी कुछ नहीं सीखा। आप जो पाना चाहते हैं, हम जो पाना चाहते हैं, उससे तो हम दोनों ही दूर हैं। मुझ में और आप में कोई अन्तर नहीं है। आपने भगवे कपड़े जरूर ड़ाल रखे हैं, किन्तु अपने क्रोध पर तो जरा भी निंत्रण नहीं रख सकते। मैं भी क्रोध कर रहा हूँ, लेकिन मैं अपने आप को महात्मा तो नहीं कहता।”

गरमा-गरम विवाद हुआ। स्वामी जी बर्दाश्त नहीं कर पाये कि हम दोनों बराबर हैं। एक संसारी महात्मा से बराबरी की जुर्रत ही कैसे कर सकता है? वे इतने बड़े स्वामी हैं!

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