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क्या है प्राचीन ,दुर्लभ एवं गुहय स्वरोदय विज्ञान?(101-200)


दुर्लभ स्वरोदय शास्त्र ...(101-200) 101– जब दिन अथवा रात के समय किसी व्यक्ति को शुभ-अशुभ कोई भी कार्य करना हो, तो उसे आवश्यकता के अनुसार अपनी नाडी को बदल लेना चाहिए। NOTE;- शिवस्वरोदय के इस अंक में इडा नाड़ी के प्रवाह-काल में किए जाने वाले कार्यों का विवरण दिया जा रहा है। (102 से 105) - तक स्थायी परिणाम देनेवाले जितने भी कार्य हैं, उन्हें इडा अर्थात बाँए स्वर के प्रवाह-काल में प्रारम्भ करना चाहिए, जैसे-सोने के आभूषण खरीदना, लम्बी यात्रा करना, आश्रम-मन्दिर आदि का निर्माण करना, वस्तुओं का संग्रह करना, कुँआ या तालाब खुदवाना, भवन आदि का शिलान्यास करना, तीर्थ-यात्रा करना, विवाह करना या विवाह तय करना, वस्त्र तथा आभूषण खरीदना, ऐसे कार्य जो शान्ति-पूर्वक योग्य हों उन्हें करना, पोषक पदार्थ ग्रहण करना, औषधि सेवन करना, अपने मालिक से मुलाकात करना, मैत्री करना, व्यापार करना, अन्न संग्रह करना, गृह-प्रवेश करना, सेवा करना, खेती करना, बीज बोना, शुभ कार्यों में लगे लोगों के दल से मिलना आदि। (106 से 112 तक )- उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त निम्नलिखित कार्य भी चन्द्र नाड़ी के प्रवाह- काल में प्रारम्भ करना चाहिए- अक्षरारम्भ, मित्र-दर्शन, जन्म, मोक्ष, धर्म, मंत्र-दीक्षा लेना, मंत्र जप या साधना करना, काल-विज्ञान (ज्योतिष) का अभ्यास करना, नये मवेशी को घर लाना, असाध्य रोगों की चिकित्सा, मालिक से संवाद, हाथी और घोड़े की सवारी या उन्हें घुड़साल में बाँधना, धनुर्विद्या का अभ्यास, परोपकार करना, धन की सुरक्षा करना, नृत्य, गायन, अभिनय, संगीत और कला आदि का अध्ययन करना, नगर या गाँव में प्रवेश, तिलक लगाना, जमीन खरीदना, दुखी और निराश लोगों या ज्वर से पीड़ित या मूर्छित व्यक्ति की सहायता करना अपने सम्बन्धियों या स्वामी सम्पर्क करना, ईंधन तथा अन्न संग्रह करना, वर्षा के आगमन के समय स्त्रियों के लिए आभूषण आदि खरीदना, गुरु की पूजा, विष-बाधा को दूर करने के उपाय, योगाभ्यास आदि कार्य इडा नाड़ी के प्रवाह-काल में सिद्धिप्रद होते हैं। लेकिन इडा नाड़ी में वायु, अग्नि अथवा आकाश तत्व सक्रिय हो वैसा नहीं होता, अर्थात इन तत्वों के इडा में प्रवाहित हो तो उक्त कार्य को न करना ही श्रेयस्कर है। 113- दिन हो अथवा रात इडा के प्रवाह-काल में किए गए सभी कार्य सिद्ध होते हैं, अतएव सभी कार्यों के लिए चन्द्र अर्थात इडा नाड़ी का ही चुनाव करना चाहिए। (पिंगला नाड़ी के प्रवाह-काल में किए जानेवाले कार्य पिछले अंक में इडा नाड़ी के प्रवाह-काल में किए जानेवाले कार्यों के विवरण दिए गए थे। इस अंक में पिंगला नाड़ी के प्रवाह-काल में किए जानेवाले कार्यों के विवरण प्रस्तुत हैं। इस संदर्भ में यहाँ आठ श्लोक दिए गए हैं।) (114 से121 तक )--पिंगला नाड़ी के प्रवाह के समय निम्नलिखत कार्य प्रारम्भ करने के सुझाव दिए गए हैं जिससे सफलता मिले- कठिन तथा क्रूर विद्याओं का अध्ययन और अध्यापन, स्त्री-समागम, वेश्या-गमन, जलयान की सवारी, भ्रष्ट कार्य, सुरापान, वीर-मंत्रों आदि की साधना, शत्रु पर विजय या उसे विष देना, शास्त्रों का अध्ययन, शिकार करना, पशुओं का विक्रय, ईंट तथा खपरे बनाना, पत्थर तोड़ना, लकड़ी काटना, रत्न-घर्षण, दारुण कार्य करना, गति का अभ्यास, यंत्र-तंत्र की उपासना, किले या पहाड़ पर चढ़ना, जुआ खेलना, चोरी करना, हाथी या घोड़े की सवारी करना या उन्हें नियंत्रित करना, व्यायाम करना; मारण, उच्चाटन, मोहन (वशीकरण), स्तम्भन, शान्ति और विद्वेषण तांत्रिक षट्कर्म की साधना करना, यक्ष-यक्षिणी, वेताल आदि सूक्ष्म जगत के जीवों से सम्बन्धित साधना या सम्पर्क करना, विषधारी जन्तुओं को नियंत्रित करना; गधे, घोड़े, ऊँट, हाथी अथवा भैसे आदि की सवारी, नदी या समुद्र को तैरकर पार करना, औषधि का सेवन, पत्राचार करना, प्रेरित करना, कृषि कार्य, किसी को क्षुब्ध करना, दान लेना-देना, क्रय-विक्रय, प्रेतात्मओं का आह्वान, शत्रु को नियंत्रित करना या उससे युद्ध करना, तलवार धारण करना, इन्द्रिय सुख का भोग, राज-दर्शन, दावत खाना, स्नान, कठोर कार्य और व्यवहार करना आदि में सूर्य-प्रवाह शुभ होता है। 122– भूख जाग्रत करना, किसी स्त्री को नियंत्रित करना और सोना आदि कार्य बुद्धिमान लोग सफल होने के लिए सूर्य नाड़ी के प्रवाह काल में करते हैं। 123 – सभी प्रकार के क्रूर कार्य और विविध चर कार्य (अस्थायी प्रकृति वाले कार्य) सूर्य नाड़ी के प्रवाह काल में करने पर सिद्ध होते हैं, किसी प्रकार का इसमें संशय नहीं। सुषुम्ना नाड़ी;- 124 - जब साँस थोड़ी-थोड़ी देर में बाँए से दाहिने और दाहिने से बाँए बदलने लगे तो समझना चाहिए कि सुषुम्ना नाड़ी चल रही है। इसी को शून्य स्वर भी कहा जाता है और यह सब कुछ नष्ट कर देता है। 125 - उस नाड़ी में अर्थात् सुषुम्ना में अग्नि तत्व का प्रवाह काल-रूप होता है। सभी शुभ और अशुभ कार्यों के फल को जलाकर भस्मीभूत कर देता है, अतएव इसे विष के समान समझना चाहिए। 126 - यदि किसी की चन्द्र नाड़ी और सूर्य नाड़ी अपने क्रम में न प्रवाहित होकर एक ही नाड़ी काफी लम्बे समय तक प्रवाहित होती रहे तो समझना चाहिए कि उसका कुछ अशुभ होना है, इसमें कोई संशय नहीं है। 127 - हे सुमुखि, जब क्षण-क्षण में बायीं और दाहिनी नाड़ियाँ अपना क्रम बदलती रहें तो ये विषम भाव की द्योतक होती हैं और उस समय किया गया कार्य आशा के विपरीत फल प्रदान करता है (पर आध्यात्मिक साधनाओं को छोड़कर)। 128 - विद्वान लोग दोनों नाड़ियों का एक साथ प्रवाहित होना विष की तरह मानते हैं। अतएव उस समय क्रूर और सौम्य दोनों ही तरह के कार्यों को न करना ही उचित है। क्योंकि उनका वांछित फल नहीं मिलता है। 129 - सुषुम्ना के प्रवाह काल में जीवन, मृत्यु, लाभ, हानि, जय और पराजय आदि के प्रश्न पर ईश्वर का स्मरण करना चाहिए, अर्थात आध्यात्मिक साधना करना चाहिए। 130 - सुषुम्ना नाड़ी के प्रवाह-काल में जय, लाभ और सुख चाहनेवाले को ईश्वर का चिन्तन और योगाभ्यासादि कर्म करना चाहिए, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं करना चाहिए। 131 - सूर्य स्वर के प्रवाह के बाद बार-बार सुषुम्ना के प्रवाहित होने पर न ही किसी को शाप देना चाहिए और न ही वरदान। क्योंकि इस स्थिति में सब निरर्थक होता है। 132 - स्वरों के संक्रमण और तत्वों के संक्रमण के समय अर्थात दो स्वरों और दो तत्त्वों के मिलन के समय कोई भी शुभ कार्य- पुण्य, दानादि कार्य नहीं करना चाहिए। 133- विषम स्वर के प्रवाह काल में यात्रा प्रारम्भ करने का विचार मन में उठने नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे यात्रा में कठिनाई तो आती ही है, हानि भी होती है। यहाँ तक कि मृत्यु भी हो सकती है। 134 - यदि चन्द्र स्वर प्रवाहित हो रहा हो और कोई सामने से आए, बायें से आए अथवा ऊपर से या सामने, बायें या ऊपर की ओर विराजमान हो, तो समझना चाहिए कि उससे आपका काम पूरा होगा। इसी प्रकार जब सूर्य नाड़ी प्रवाहित हो रहा हो, तो नीचे, पीछे अथवा दाहिने से आनेवाला या उक्त दिशाओं में विराजमान व्यक्ति आपको शुभ संदेश देगा या आपका काम पूरा करेगा। किन्तु यदि स्थितियाँ इनके विपरीत हों, तो देशिकों (आध्यात्मिक गुरुजनों) को समझना चाहिए कि वह काल बिलकुल रिक्त और अविवेकपूर्ण है, अर्थात कार्य में सफलता के लिए उचित समय नहीं है। 135- पिछले श्लोक की ही भाँति इस श्लोक में भी वे ही बातें दूत के बारे में कही गयी हैं, अर्थात चन्द्र स्वर के प्रवाह काल में यदि कोई दूत बायें, ऊपर या सामने से आए अथवा सूर्य-स्वर के प्रवाह-काल में यदि वह दाहिने, नीचे या पीछे से आए तो समझना चाहिए कि वह कोई शुभ समाचार लाया है। ऐसा न हो तो विपरीत परिणाम समझना चाहिए। 136 - जब इडा और पिंगला स्वर एक-दूसरे में लय हो जाते हैं, तो वह समय बड़ा ही भीषण होता है। अर्थात् सुषुम्ना स्वर का प्रवाह-काल बड़ा ही विषम होता है। क्योंकि सुषुम्ना को निराहार और स्थिर माना गया है। वह सूक्ष्म तत्व में लय हो जाती है जिसे सज्जन लोग संध्या कहते हैं। 137। - ज्ञानी लोग कहते हैं कि वेद स्वयं वेद नहीं होते, बल्कि ईश्वर का ज्ञान जिससे होता है उसे वेद कहते हैं, अर्थात जब साधक समाधि में प्रवेश कर परम चेतना से युक्त होता है उस अवस्था को वेद कहते हैं। 138– दिन और रात का मिलन संध्या नहीं है, यह तो मात्र एक बाह्य प्रक्रिया है। वास्तविक संध्या तो सुषुम्ना नाड़ी में स्वर के प्रवाह को कहते हैं। 139 – माँ पार्वती भगवान शिव से पूछती हैं – हे देवाधिदेव, हे महादेव, हे जगत के उद्धारक, अपने हृदय में स्थित इस गुह्य ज्ञान के बारे में और अधिक बताने की कृपा करें। 140 - माँ पार्वती के ऐसा पूछने पर भगवान शिव बोले- हे सुन्दरि, स्वरज्ञान सर्वश्रेष्ठ और अत्यन्त गुप्त विद्या है एवं सबसे बड़ा इष्ट देवता है। इस स्वर-ज्ञान में जो योगी सदा रत रहता है, वह योगी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। 141– पूरी सृष्टि पाँच तत्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी) से ही रची गयी है और वह इन्हीं तत्वों में विलीन होती है। परम तत्व इन तत्वों से बिलकुल परे है और वह निरंजन है, अर्थात् अजन्मा है। 142 – योगी लोग सिद्ध योग से तत्वों को जान लेते हैं। वे स्वरज्ञानी इन पंच महाभूतों के दुष्प्रभावों को भली-भाँति समझते हैं और इसलिए वे भी इनसे परे हो जाते हैं। 143– पंच भूतों से निर्मित सृष्टि को तत्त्व के रूपों में, अर्थात पृथिवी, जल, तेज (अग्नि), वायु और आकाश को उनके सूक्ष्म रूपों में उन्हें जान लेता है, उनका साक्षात्कार कर लेता है, वह पूज्य बन जाता है। 144 – भूलोक से सत्यलोक तक सभी लोकों में अस्तित्व-गत देह में तत्त्व भिन्न नहीं होते, अर्थात् पाँच तत्वों से ही निर्मित होता है। लेकिन अस्तित्व प्रत्येक स्तर पर नाड़ियों का भेद अलग हो जाता है। तत्व-विज्ञान;- 145– भगवान शिव कहते हैं कि चाहे बाँया स्वर चल रहा हो या दाहिना, दोनों ही स्वरों के प्रवाह-काल के दौरान बारी-बारी से पंच महाभूतों का उदय होता है। हे सुन्दरि, तत्व-विज्ञान आठ प्रकार का होता है। उन्हें मैं बताता हूँ, ध्यान से सुनो। 146 –पहले भाग में तत्वों की संख्या होती है, दूसरे भाग में स्वर का मिलन होता है, तीसरे भाग में स्वर के चिह्न होते हैं और चौथे भाग में स्वर का स्थान आता है। पाँचवें भाग उनके (तत्वों के) वर्ण (रंग) होते हैं। छठवें भाग में प्राण का स्थान होता है। सातवें भाग में स्वाद का स्थान होता है और आठवें में उनकी दिशा। 148 - हे कमलनयनी, इस प्रकार यह प्राण आठ प्रकार से सम्पूर्ण चर और अचर विश्व में व्याप्त है, अतएव स्वर-ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई ज्ञान नहीं है। 149 – अतएव तड़के उठकर भोर से ही यत्न पूर्वक स्वर का निरीक्षण करना चाहिए। इसीलिए काल के बन्धन से मुक्त होने के लिए योगी लोग स्वर-ज्ञान में विहित कर्म करते हैं, अर्थात् स्वर-ज्ञान के अन्तर्गत बताई गयी विधियों का अभ्यास करते हैं। NOTE;- इस अंक में वे श्लोक आए हैं जिसमें पंच महाभूतों की पहिचान से सम्बन्धित विचार किया गया है। 150 – इस श्लोक मे षण्मुखीमुद्रा (योनिमुद्रा) की विधि बतायी गयी है। इस मुद्रा के अभ्यास से रंगों द्वारा तत्वों की पहिचान की जाती है। इसमें हाथ के दोनों अंगूठों द्वारा दोनों कान, माध्यिका अंगुलियों से दोनों नासिका छिद्र, अनामिका और कनिष्ठिका अंगुलियों से मुख और तर्जनी अंगुलियों से दोनों आँखें बन्द करनी चाहिए। इसे षण्मुखी मुद्रा कहा गया है। वैसे महान स्वरयोगीयो ने इसके अभ्यास की निम्नलिखित विधि बतायी है- 1. सर्वप्रथम किसी भी ध्यानोपयोगी आसन में बैठें। 2. आँखें बन्द कर लें, काकीमुद्रा में मुँह से साँस लें, साँस लेते समय ऐसा अनुभव करें कि प्राण मूलाधार से आज्ञाचक्र की ओर ऊपर की ओर अग्रसर हो रहा है। 3. साँस को जितनी देर तक आराम से रोक सकते हैं, अन्दर रोकें। साथ ही जैसा श्लोक में आँख, नाक, कान आदि अंगुलियों से बन्द करने को कहा गया है, वैसा करें, खेचरी मुद्रा (जीभ को उल्टा करके तालु से लगाना) के साथ अर्ध जालन्धर बन्ध लगाएँ (थोड़ा सिर इस प्रकार झुकाना कि ठोड़ी छाती को स्पर्श न करे) और चेतना को आज्ञाचक्र पर टिकाएँ। 4. सिर को सीधा करें और नाक से सामान्य ढंग से साँस छोड़ें। 5. यह एक चक्र हुआ। ऐसे पाँच चक्र करने चाहिए। प्रत्येक चक्र के बाद कुछ क्षणों तक विश्राम करें, आँख बन्द रखें। अभ्यास के बाद थोड़ी देर तक शांत बैठें और चिदाकाश (आँख बन्द करने पर सामने दिखने वाला रिक्त स्थान) को देखें। इसमें दिखायी पड़ने वाले रंग से सक्रिय तत्व की पहिचान करते हैं, अर्थात् पीले रंग से पृथ्वी, सफेद रंग से जल, लाल रंग से अग्नि, नीले या भूरे रंग से वायु और बिल्कुल काले या विभिन्न रंगों के मिश्रण से आकाशतत्व समझना चाहिए। 151– यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय आवश्यक नही है। भावार्थ – षण्मुखी मुद्रा के अभ्यास के अंत में तत्व प्रकट होते हैं, अर्थात् चिदाकाश में रंग पीला, सफेद, लाल, नीला तथा अनेक वर्णों का मिश्रण (बिन्दुदार) दिखायी देता है। 152 - जल तत्व का रंग सफेद, पृथ्वी तत्व का पीला, अग्नि तत्व का लाल, वायुतत्व का नीला या भूरा और आकाश तत्व का मिश्रित रंग होता है 153 -154 – इन श्लोकों में दर्पण के माध्यम से आकार द्वारा तत्वों को पहचानने का तरीका बताया गया है। इसके अनुसार दर्पण चेहरे के पास लाकर उसपर साँस छोड़ते हैं। परिणाम स्वरूप वाष्प-कण से दर्पण पर आकृति बनती है। उस आकृति से सक्रिय तत्व की पहिचान होती है, अर्थात् चतुर्भुज की आकृति बनने पर स्वर में पृथ्वीतत्व को सक्रिय मानना चाहिए, अर्द्धचन्द्र सी आकृति बने तो जलतत्व , त्रिभुजाकार हो तो अग्नितत्व , वृत्ताकार वायु तत्व और बिना किसी निश्तित आकृति के वाष्प-कण इधर-उधर बिखरे हों तो आकाश तत्व को सक्रिय मानना चाहिए। 155 – इस श्लोक में स्वर के प्रवाह की दिशा में विचलन से तत्त्वों की पहिचान का तरीका बताया गया है। वैसे यह विधि काफी सजग निरीक्षण के लम्बे अभ्यास के बाद ही इस विधि से स्वर में सक्रिय तत्व की पहिचान सम्भव है। इसमें यह बताया गया है कि पृथ्वी तत्व का प्रवाह मध्य में, जल तत्त्व का नीचे की ओर, अग्नि तत्व का ऊपर की ओर तथा वायु तत्व का प्रवाह तिरछा होता है। जब साँस दोनों नासिका-रन्ध्रों से समान रूप से एक साथ प्रवाहित हो, तो आकाश तत्व को सक्रिय समझना चाहिए। 156 – इस श्लोक में शरीर में पंचमहाभूतों की स्थिति बताई गयी है। अग्नितत्व का स्थान दोनों कंधों में, वायु का नाभि में, पृथ्वी का जाँघों में, जल का पैरों में और आकाश तत्व का स्थान मस्तक में कहा गया है। 157 - इस श्लोक में पंच महाभूतों के स्वाद के विषय में चर्चा की गयी है। पृथ्वी का स्वाद मधुर, जल का कषाय, अग्नि का तीक्ष्ण, वायु का अम्लीय (खट्टा) और आकाश का स्वाद कटु बताया गया है। 158 – यहाँ श्वाँस में पंच महाभूतों के उदय के अनुसार इसमें (प्रश्वास) की लम्बाई में परिवर्तन की ओर संकेत किया गया है। जब साँस में वायु तत्व की प्रधानता या उसका उदय हो, तो प्रश्वास की लम्बाई आठ अंगुल, अग्नि तत्व के उदय काल में चार अंगुल, पृथ्वी तत्व के समय बारह अंगुल और जलतत्व के समय सोलह अंगुल होती है। 159 – जब स्वर का प्रवाह ऊपर की ओर हो, अर्थात स्वर में अग्नि तत्व प्रवाहित हो, तो मारण की साधना प्रारम्भ करना उचित है। स्वर की गति नीचे की ओर हो, अर्थात स्वर में जल तत्व का उदय काल शांतिपूर्ण कार्य के लिए उचित होता है। स्वर का प्रवाह यदि तिरछा हो, अर्थात वायु तत्व का उदयकाल हो, तो उच्चाटन जैसी साधना के प्रारम्भ के लिए उचित समय होता है। पर स्वर का प्रवाह मध्य में होने पर, अर्थात पृथ्वी तत्व के प्रवाह-काल में स्तम्भन सम्बन्धी साधना का प्रारम्भ ठीक होता है। लेकिन आकाश तत्व के उदय काल को मध्यम, अर्थात किसी भी कार्य के लिए अनुपयोगी बताया गया है। 160 – पृथ्वी तत्व के उदय-काल में स्थायी प्रकृति के कार्य का प्रारम्भ श्रेयस्कर होता है, जल तत्व के समय अस्थायी कार्य, अग्नि तत्व के समय श्रम-साध्य कठिन कार्य तथा वायु तत्व के प्रवाह में मारण, उच्चाटन जैसे दूसरों को हानि पहुँचाने कार्य करने चाहिए। 161 – आकाश तत्व के प्रवाह काल में कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। यह समय केवल योग का अभ्यास करने योग्य है। यह सभी कार्यों के परिणाम को शून्य कर देता है, अर्थात कोई फल नहीं मिलता। इसलिए योग साधना के अलावा और कोई कार्य करने के विषय में सोचना भी नहीं चाहिए। 162 – पृथ्वी और जल तत्वों के प्रवाह काल में प्रारम्भ किए कार्य सिद्धिदायक होते हैं, अग्नि तत्व में प्रारम्भ किए गए कार्य मृत्युकारक, अर्थात नुकसानदेह होते हैं, वायु तत्व में प्रारम्भ किए गए कार्य सर्वनाश करनेवाले होते हैं, जबकि आकाश तत्व के प्रवाह काल में शुरु किए गए कार्य कोई फल नहीं देते, ऐसा तत्ववादियों का मानना है। 163 - पृथ्वी तत्व के प्रवाह काल में प्रारम्भ किये गये कार्य में स्थायी लाभ मिलता है, जल तत्व में दक्षिण लाभ मिलता है, अग्नि और वायु तत्व हानिकारक होते हैं और आकाश तत्व परिणामहीन होता है। 164- पृथ्वी तत्व का वर्ण पीला है। यह धीमी गति से मध्य में प्रवाहित होता है। इसकी प्रकृति हल्की और उष्ण है। ठोढ़ी तक इसकी ध्वनि होती है। इसके प्रवाह के दौरान किए गए कार्यों में भी स्थायी रूप से सफलता मिलती है। 165 - जल तत्व श्वेत वर्ण का होता है। इसका प्रवाह तेज और नीचे की ओर होता है। इसके प्रवाह काल में साँस की आवाज अधिक होती है और इस समय साँस सोलह अंगुल (लगभग 12 इंच) लम्बी होती है। इसकी प्रकृति शीतल है। इसके प्रवाह काल में प्रारम्भ किये गये कार्य सफलता (क्षणिक) मिलती है। 166 - अग्नि तत्व रक्तवर्ण है। यह घुमावदार तरीके से प्रवाहित होता है। इसकी प्रकृति काफी उष्ण है। इसके प्रवाह काल में साँस की लम्बाई चार अंगुल और ऊपर की ओर होती है। इसे क्रूरतापूर्ण कार्यों के लिए उपयोगी बताया गया है। 167 - वायु तत्व कृष्ण वर्ण (गहरा नीला रंग) है, इसके प्रवाह के समय साँस की लम्बाई आठ अंगुल और गति तिर्यक (तिरछी) होती है। इसकी प्रकृति शीतोष्ण हैं। इस अवधि में गति वाले कार्यों को प्रारम्भ करने पर निश्चित रूप से सफलता मिलती है। 168 – जब स्वर में उक्त सभी तत्वों का संतुलन हो और उनके यथोक्त गुण उपस्थित हों तो उसे योगियों को मोक्ष प्रदान करनेवाला आकाश तत्व समझना चाहिए, अर्थात आकाश तत्व में अन्य चार तत्वों का संतुलन पाया जाता है और उनके गुण भी पाए जाते हैं तथा इसके प्रवाह काल किए गये योग-साधना में पूर्णरूप से सिद्धि मिलती है। 169– पृथ्वी तत्व का पीला, वर्ग का आकार, मधुर स्वाद, गति मध्य और प्रवाह बारह अंगुल (लगभग नौ इंच) होता है। इसे भोग-विलास के लिए उपयुक्त बताया गया है। 170 – जल तत्व का रंग श्वेत होता है, आकार अर्धचन्द्र की तरह, स्वाद कषाय और स्वभाव शीतल होता है। इसके प्रवाह काल में साँस की लम्बाई सोलह अंगुल (लगभग बारह इंच) होती है। यह हमेशा लाभकारी होता है। 171 – अग्नि तत्व का रंग लाल (रक्त जैसा लाल), आकार त्रिभुज, प्रवाह ऊपर की होता है। इस तत्व तत्त्व के प्रवाह काल में साँस की लम्बाई चार अंगुल (लगभग तीन इंच) होती है। इसकी प्रकृति गरम होती है और यह अशुभ कार्य का प्रेरक होता है तथा सदा अहितकर फल देता है। 172। – वायु तत्व का रंग नीला, गोल आकार और अम्लीय स्वाद होता है। इसकी गति तिरछी होती है और इसके प्रवाह काल में साँस की लम्बाई आठ अंगुल (लगभग छः इंच)। इसकी प्रकृति चंचल होती है। इसके प्रवाहकाल में प्रारम्भ किये गये कार्य का परिणाम विनाशकारी होते हैं। 173 – आकाश तत्व का रंग पहचानना कठिन होता है। यह स्वादहीन और प्रत्येक दिशा में गतिवाला होता है। यह मोक्ष प्रदान करता है। आध्यात्मिक साधना के अतिरिक्त अन्य कार्यों में कोई फल नहीं प्राप्त होता है। 174 – पृथ्वी तत्व और जल तत्व कार्य आरम्भ करने के लिए शुभ होते हैं, अर्थात उनके परिणाम अच्छे होते हैं। अग्नि तत्व के प्रवाह काल में प्रारम्भ किए गए कार्य का परिणाम मिला-जुला होता है। जबकि वायु तत्व और आकाश तत्व के प्रवाह काल में कार्य के आरम्भ के परिणाम हानि और सर्वनाश से भरे बताए गए हैं। तत्वों की दिशाओं;- 175 – इस श्लोक में तत्वों की दिशाओं के संकेत किए गए हैं। पृथ्वी तत्व पूर्व और पश्चिम दिशा में, अग्नितत्व दक्षिण में, वायु तत्व उत्तर में और आकाश तत्व मध्य में कोणगत होता है। 176 – जब चन्द्र स्वर में पृथ्वी अथवा जल तत्व अथवा सूर्य स्वर में अग्नि तत्व के प्रवाह काल में प्रारम्भ किए गए सभी प्रकार के कार्यों में सिद्धि मिलती है, इसमें कोई सन्देह नहीं, अर्थात् इस अवधि में प्रारम्भ किए गए शुभ, अशुभ, स्थायी या अस्थायी सभी कार्य सफल होते हैं। 177 – जब दिन में पृथ्वी तत्व और रात मे जल तत्व प्रवाहित हो तो निश्चित रूप से लाभ होता है। अग्नि तत्व का प्रवाह काल किसी कार्य के लिए मृत्युकारक कहा गया है और वायुतत्व का प्रवाह काल सर्वनाश का कारक। आकाश तत्व का प्रवाह काल कोई परिणाम नहीं देता। 178 -179-- जीवन, जय, लाभ, खेती, मंत्र, युद्ध एवं यात्रा के सम्बन्ध में प्रश्न पूछे जाने पर उस समय प्रवाहित होने वाले तत्व को समझना चाहिए और तदनुरूप उत्तर देना चाहिए। जल तत्व के समय शत्रु का आने की संभावना होती है। पृथ्वी तत्व का काल शुभ होता है, अर्थात शत्रु पर विजय का संकेतक है। वायु तत्व के प्रवाह काल को शत्रु का पलायन समझना चाहिए। लेकिन वायु तत्व और आकाश तत्व के समय हानि तथा मृत्यु की अधिक संभावना रहती है। (इस श्लोक में मन में उदित होने वाले विचारों के द्वारा तत्वों को पहचानने की विधि का संकेत किया गया है।) 180 – जब मन में भौतिकता से संबंधित विचार उठ रहे हों, तो समझना चाहिए कि उस समय पृथ्वी तत्व प्रवाहित हो रहा है, अर्थात स्वर में पृथ्वी तत्व की प्रधानता है। जब खुद के विषय में विचार उठें, तो जल तत्व अथवा वायु तत्व की प्रधानता समझनी चाहिए। अग्नि तत्व की प्रधानता होने पर मन में धातुजनित धन सम्बन्धी विचार उठते हैं। पर आकाश तत्व की प्रधानता के समय व्यक्ति का मन लगभग विचार-शून्य होता है। 181 – जब स्वर में पृथ्वी तत्व सक्रिय हो तो अनेक कदम चलिए। जल तत्व और वायुतत्व के प्रवाह काल में दो कदम चलें तथा अग्नि तत्व के प्रवाहित होने पर चार कदम। किन्तु जब आकाश तत्व स्वर में प्रधान हो, अर्थात सक्रिय हो, तो एकदम न चलें। 182 - सूर्य स्वर (दाहिने स्वर) में अग्नितत्व के प्रवाहकाल में मंगल, पृथ्वी तत्व के प्रवाह काल में सूर्य (ग्रह), जल तत्व के प्रवाह में शनि तथा वायु तत्व के प्रवाह काल में राहु का निवास कहा गया है। 183 – पर बाएँ स्वर (इडा नाड़ी) में जलतत्व के प्रवाह काल में चन्द्र ग्रह, पृथ्वी तत्व के प्रवाह में बुध, वायु तत्व के प्रवाह में गुरु और अग्नि तत्व में शुक्र का निवास मना जाता है। उपर्युक्त अवधि में उक्त सभी ग्रह सभी कार्यों के लिए शुभ माने गये हैं। एक बात ध्यान देने की है कि यहाँ केतु का स्थान नहीं बताया गया है । 184 – इस श्लोक के अनुसार पृथ्वी तत्व बुध के, जल तत्व चन्द्र और शुक्र के, अग्नि तत्व सूर्य और मंगल के, वायु तत्व राहु और शनि के तथा आकाश तत्व गुरु के महत्व को निरूपित करते हैं। अर्थात इन तत्वों के अनुसार काम करनेवाले को यश मिलता है। (185–186)- यदि कोई आदमी कहीं चला गया हो और दूसरा व्यक्ति उसके बारे में प्रश्न करता है, तो स्वर और उनमें तत्वों के उदय के अनुसार परिणाम को जानकर सही उत्तर दिया जा सकता है। भगवान शिव कहते हैं कि दाहिना स्वर चल रहा हो, स्वर में राहु हो (अर्थात पिंगला नाड़ी में वायु तत्व सक्रिय हो) और प्रश्नकर्त्ता दाहिनी ओर हो, तो इसका अर्थ हुआ कि वह व्यक्ति जहाँ गया था वहाँ से किसी दूसरे स्थान के लिए प्रस्थान कर गया है। यदि प्रश्न काल में जल तत्व (शनि हो) सक्रिय हो, तो समझना चाहिए कि गया हुआ आदमी वापस आ जाएगा। यदि पृथ्वी तत्व की प्रधानता के समय प्रश्न पूछा गया हो, तो समझना चाहिए कि गया हुआ व्यक्ति जहाँ भी है कुशल से है। पर प्रश्न के समय यदि स्वर में अग्नि तत्व (मंगल हो) का उदय हो, तो समझना चाहिए कि वह आदमी अब मर चुका है। 187 – पृथ्वी तत्व के प्रवाह काल में दुनियादारी के कामों में पूरी सफलता मिलती है, जल तत्व का प्रवाह काल शुभ कार्यों में सफलता देता है, अग्नि तत्व धातु सम्बन्धी कार्यों के लिए उत्तम है और आकाश तत्व चिन्ता आदि परेशानियों से मुक्त करता है। 188 – अतएव जब पृथ्वी और जल तत्व के प्रवाह काल में किसी प्रवासी के विषय में प्रश्न पूछा जाय तो समझना चाहिए कि वह कुशल से है, स्वस्थ और खुश है। पर यदि प्रश्न के समय अग्नि तत्व और वायु तत्व प्रवाहित हो तो समझना चाहिए कि जिसके विषय में प्रश्न पूछा गया है उसे शारीरिक और मानसिक कष्ट है। 189– यदि प्रश्न काल में आकाश तत्व प्रवाहित हो तो समझना चाहिए कि जिसके विषय में प्रश्न पूछा गया वह अपने जीवन के अंतिम क्षण गिन रहा है। इस प्रकार तत्व -ज्ञाता इन बारह प्रश्नों के उत्तर जान लेता है। 190– पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं में पृथ्वी आदि तत्व अपने क्रम के अनुसार प्रबल होते हैं, ऐसा तत्वविदों का मानना है। श्लोक संख्या 175 में तत्वों की दिशाओं का विवरण देखा जा सकता है। 191– हे वरानने, यह देह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँचों तत्वों से मिलकर बना है, ऐसा समझना चाहिए। NOTE;- इन श्लोकों में पाँच तत्वों का शरीर में स्थान और उनके गुणों पर प्रकाश डाला गया है। 192– पृथ्वी तत्व के पाँच गुण अस्थि, मांस, त्वचा, स्नायु तथा रोम बताए गए हैं, ऐसा ब्रह्मज्ञानियों का मानना है। 193– शुक्र (वीर्य), रक्त, मज्जा, मूत्र और लार ये पाँच गुण जल तत्व के माने गए हैं, ऐसा ब्रह्मज्ञानियों का कहना है। 194 – भूख, प्यास, नींद, शारीरिक कान्ति और आलस्य ये पाँच गुण अग्नि तत्व के कहे गए हैं, ऐसा ब्रह्मज्ञानी कहते हैं। 195– वायु तत्व के पाँच गुण- दौड़ना, चलना, ग्रंथिस्राव, शरीर का संकोचन (सिकुड़ना) और प्रसार (फैलाव) बताए गए हैं, ऐसा ब्रह्मज्ञानी कहते हैं। 196 – राग, द्वेष, लज्जा, भय और मोह आकाश तत्व के ये पाँच गुण कहे गए हैं, ऐसा ब्रह्मज्ञानियों का मत है। 197 – शरीर का पचास भाग पृथ्वी तत्व , चालीस भाग जलतत्व , तीस भाग अग्नि तत्व , बीस भाग वायु तत्व और दस भाग आकाश मानना चाहिए। NOTE;-यहाँ यह बताना आवश्यक है कि साधक उपर्युक्त विभाजन प्रतिशत में न समझें, बल्कि यह एक अनुपात है। पुनः इसे श्लोक संख्या 199 में स्पष्ट किया गया है। 198– इसीलिए पृथ्वी तत्व के प्रवाहकाल में किया गये कार्य में दीर्घकलिक सफलता मिलती है, जबकि जल तत्व के प्रवाहकाल में किये गये कार्य में सफलता मिलती है, वायु तत्व के प्रवाहकाल में किए गए कार्य में मामूली सफलता मिलती है और अग्नि तत्व के प्रवाह के समय किए गए कार्य में घोर असफलता मिलती है। 199 – पाँच भाग पृथ्वी, चार भाग जल, तीन भाग अग्नि, दो भाग वायु और एक भाग आकाश है। इसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्व का 5:4:3:2:1 अनुपात समझना चाहिए। 200 – फुत्कारती हुई प्रस्फुटित, विदीर्ण और पतित पृथ्वी अपनी अवस्था के अनुसार सभी कार्यों में अपना प्रभाव डालती है। CONTD... ...SHIVOHAM...

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