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शिव स्वरोदय(1-100)


शिव स्वरोदय विज्ञान;-

02 FACTS;-

'शिव स्वरोदय';-

02 FACTS

1-स्वरोदय विज्ञान पर अत्यन्त प्राचीन ग्रंथ है। इसमें कुल 395 श्लोक हैं। यह ग्रंथ शिव-पार्वती संवाद के रूप में लिखा गया है। शायद इसलिए कि सम्पूर्ण सृष्टि में समष्टि और व्यष्टि का अनवरत संवाद चलता रहता है और योगी अन्तर्मुखी होकर योग द्वारा इस संवाद को सुनता है, समझता है और आत्मसात करता हैं। इस ग्रंथ के रचयिता साक्षात् देवाधिदेव भगवान शिव को माना जाता है।

2-यहाँ शिव स्वरोदय के श्लोकों का हिन्दी में अनुवाद दिया जाएगा। आवश्यकतानुसार व्याख्या भी करने का प्रयास किया जाएगा। वैसे यह ग्रंथ बहुत ही सरल संस्कृत भाषा में लिखा गया है। इसमें बतायी गयी साधनाओं का अभ्यास बिना किसी स्वरयोगी के सान्निध्य के करना वर्जित है। केवल निरापद प्रयोगों को ही साधक अपनाएँ।

श्लोक ;-01 TO 100

महेश्वरं शैलजां गणनायकं संसारतारकं गुरुं च नमस्कृत्य परमात्मानं भजे।

1-अर्थ:- महेश्वर भगवान शिव, माँ पार्वती, श्री गणेश और संसार से उद्धार करने वाले गुरु को नमस्कार करके परमात्मा का स्मरण करता हूँ।

अर्थ:2- माँ पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि हे देवाधिदेव महादेव, मेरे स्वामी, मुझ पर कृपा करके सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाले ज्ञान प्रदान कीजिए।

3 -अर्थ: - हे देव, मुझे यह बताने की कृपा करें कि यह ब्रह्माण्ड कैसे उत्पन्न हुआ, यह कैसे परिवर्तित होता है, अन्यथा यह कैसे विलीन हो जाता है, अर्थात् इसका प्रलय कैसे होता है और ब्रह्माण्ड का मूल कारण क्या है?

4-अर्थ:-भगवान बोले - हे देवि, यह ब्रह्माण्ड तत्व से उत्पन्न होता है, तत्व से परिवर्तित होता है, तत्व में ही विलीन हो जाता है और तत्व से ही ब्रह्माण्ड का निर्णय होता है, अर्थात् तत्व ही ब्रह्माण्ड का मूल कारण है। (इस प्रकार सृष्टि का अनन्त क्रम चलता रहता है)

5 -अर्थ:- हे देव! किस प्रकार (सृष्टि, स्थिति, संहार एवं इनके निर्णय) का मूल कारण तत्व हैं? तत्ववादियों ने उसका क्या स्वरूप बताया है? वह तत्व क्या है?

6-अर्थ:- हे देवि, अजन्मा और निराकार एक मात्र देवता महेश्वर हैं, वे ही इस जगत प्रपंच के मूल कारण हैं। उन्हीं देव से सर्वप्रथम यह आकाश उत्पन्न हुआ और आकाश से वायु उत्पन्न हुआ।

7-अर्थ:- वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी का उद्भव हुआ। इन पाँच प्रकार से ये पंच महाभूत विस्तृत होकर (समष्टि रूप से) सृष्टि करते हैं।

8-अर्थ:- उन्हीं पंच महाभूतों से ब्रह्माण्ड उत्पन्न होता है, उन्हीं के द्वारा परिवर्तित होता है और उन्हीं में विलीन हो जाता है तथा सृष्टि का क्रम सतत् चलता रहता है।

9 - अर्थ:- हे सुन्दरि, इन्हीं पाँच तत्वों से निर्मित हमारे शरीर में ये पाँचों तत्व सूक्ष्म रूप से सक्रिय रहते हैं, जिनसे हमारे शरीर में परिवर्तन होता रहता है। इनका पूर्ण ज्ञान तत्वदर्शी योगियों को ही होता है। यहाँ तत्वायोगी का अर्थ तत्व की साधना कर तत्वों के रहस्यों के प्रकाश का साक्षात् करने वाले योगियों से है।

10- अर्थ:-हे देवि, इसके बाद मैं अब तुम्हें शरीर में स्थित स्वरोदय को व्यक्त करने वाले स्वर के विषय में बताता हूँ। यह स्वर “हंस” रूप है अर्थात् जब साँस बाहर निकलती है तो ‘हं’ की ध्वनि होती है और जब साँस अन्दर जाती है तो ‘सः (सो)’ की ध्वनि होती है। इसके संचरण के स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर तीनों काल- भूत, भविष्य और वर्तमान हस्तामलवक हो जाते हैं।

11-(हे देवि), स्वरोदय का ज्ञान अत्यन्त गोपनीय ज्ञानों से भी गोपनीय है। यह अपने ज्ञाता का हर प्रकार से हित करता है। यह स्वरोदय ज्ञान सभी ज्ञानों के मस्तक पर मणि के समान है, अर्थात् यह ज्ञानी के लिए अमूल्य रत्न से भी बढ़कर है।

12- सूक्ष्म से भी सूक्ष्म होने पर भी यह ज्ञान सुबोध और सत्य का साधन है अर्थात् सत्य का बोध कराने वाला है। यह नास्तिकों को आश्चर्य में डालने वाला और आस्तिकों के लिए उनकी आस्था का आधार है।

13-(हे देवि) जिस व्यक्ति की प्रकृति शांत हो गयी हो, जिसका चित्त शुद्ध हो, सदाचारी हो, अपने गुरु के प्रति एकनिष्ठ हो, जिसका निश्चय दृढ़ हो, ऐसे पुनीत आचरण वाले व्यक्ति को स्वरोदय ज्ञान की दीक्षा देनी चाहिए या ऐसा व्यक्ति स्वरोदय ज्ञान का अधिकारी होता है।

14- दुष्ट, दुर्जन, क्रोधी, नास्तिक, कामुक, सत्त्वहीन और दुराचारी को स्वरोदय ज्ञान की दीक्षा कभी नहीं देनी चाहिए।

15-हे देवि शरीर में स्थित इस उत्तम ज्ञान को सुनो, जिसे विशेष रुप जान लेने पर (व्यक्ति) सर्वज्ञ हो जाता है।

16-सभी वेदों, शास्त्रों, संगीत आदि उत्तम ज्ञान स्वर में ही सन्निविष्ट है। हमारे अस्तित्व की तीनों अवस्थाएँ- चेतन, अवचेतन और अचेतन स्वर मे ही संगुम्फित हैं। (और क्या कहूँ?) स्वर ही आत्म-स्वरूप है।

17;- स्वरोदय विज्ञान के ज्ञान के अभाव में एक ज्योतिषी वैसे ही है, जैसे बिना स्वामी का घर, शास्त्र-ज्ञान के बिना मुख और बिना शिर के शरीर। अर्थात् एक ज्योतिषि के लिए स्वर-ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है।

18- नाड़ियों, प्राणों तथा तत्त्वों के भेद का यथावत ज्ञान और सुषुम्ना के साथ उनके संयोग को जो व्यक्ति विवेक पूर्वक जानता है, वह मुक्ति पाने का अधिकारी होता है।

19-हे सुमुखि, स्वर का ज्ञान होने पर शुभ स्वर के प्रभाव से विद्वान दृष्ट और अदृष्ट जो शुभ है, उसका कथन करते है, अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट रुप से क्या शुभ और क्या अशुभ है, बताते हैं।

NOTE;-

(इस अंक में भगवान शिव ने माँ पार्वती को विभिन्न प्रकार से स्वर की महिमा समझाई है।)

20- ये विराट और लघु ब्रह्माण्ड और इनमें स्थित सभी वस्तुएं स्वर से निर्मित हैं और स्वर ही सृष्टि के संहारक साक्षात् महेश्वर (शिव) हैं।

21- स्वर के ज्ञान से बढ़कर कोई गोपनीय ज्ञान, स्वर-ज्ञान से बढ़कर कोई धन और स्वर ज्ञान से बड़ा कोई दूसरा ज्ञान न देखा गया और न ही सुना गया है।

22-- स्वर की शक्ति से शत्रु पराजित हो जाता है, बिछुड़ा मित्र मिल जाता है। यहाँ तक कि माता लक्ष्मी की कृपा, यश और सुख, सब कुछ मिल जाता है।

23- स्वर ज्ञान द्वारा पत्नी की प्राप्ति, शासक से मिलन, देवताओं की सिद्धि मिल जाती है और राजा भी वश में हो जाता है।

24-अनुकूल स्वर के समय यात्रा करनी चाहिए, स्वादिष्ट भोजन करना चाहिए तथा मल-मूत्र विसर्जन भी अनुकूल स्वर के काल में ही करना चाहिए।

25-हे वरानने, सभी शास्त्रों, वेदों, वेदान्तों, पुराणों और स्मृतियों द्वारा बताया गया कोई ज्ञान या तत्व स्वर ज्ञान से बढ़कर नहीं है।

26-- जब तक तत्वों का पूर्ण ज्ञान नहीं हो जाता, तब तक हम अज्ञान के वशीभूत होकर नाम आदि के मिथ्या भवजाल में फंसे रहते हैं।

27- स्वरोदय शास्त्र सभी उत्तम शास्त्रों में श्रेष्ठ है जो हमारे आत्मारूपी घट (घर) को दीपक की ज्योति के रूप में आलोकित करता है।

28-इस परम विद्या का उद्देश्य मात्र भौतिक जगत सम्बन्धी अथवा अन्य उपलब्धियों से जुड़े प्रश्नों के उत्तर पाना नहीं है। बल्कि आत्म-साक्षात्कार हेतु इस विद्या को स्वयं सीखना चाहिए और निष्ठापूर्वक इसका अभ्यास करना चाहिए।

29-स्वरज्ञानी को किसी काम को प्रारम्भ करने के लिए ज्योतिषीय दृष्टिकोण से शुभ तिथि, नक्षत्र, दिन, ग्रहदेवता, भद्रा, व्यतिपात और योग (वैधृति आदि) आदि के विचार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अर्थात् कार्य के अनुकूल स्वर और तत्व के उदय काल में कभी भी कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है।

30-हे देवि, यदि कोई व्यक्ति दुर्भाग्य से कभी नास्तिक हो जाये, तो स्वरोदय ज्ञान प्राप्त कर लेने पर वह पुन: पावन हो जाता है और उसे भी शुभ फल ही मिलते हैं।

31- मनुष्य के शरीर में अनेक नाड़ियों का जाल बिछा हुआ है। बुद्धिमान लोगों को अपने शरीर को अच्छी तरह जानने के लिए इनके विषय में अवश्य जानना चाहिए।

32– शरीर में नाभि केंद्र से ऊपर की ओर अंकुर की तरह निकली हुई हैं और पूरे शरीर में व्यवस्थित ढंग से फैली हुई हैं।

33– इन नाड़ियों में सर्पाकार कुण्डलिनी शक्ति सोती हुई निवास करती है। वहां से दस नाड़ियां ऊपर की ओर गयी हैं और दस नीचे की ओर।

34 – दो-दो नाड़ियाँ शरीर के दोनों ओर तिरछी गयी हैं। इस प्रकार दस ऊपर, दस नीचे और चार शरीर के दोनों तिरछी जाने वाली नाड़ियाँ संख्या में चौबीस हैं। किन्तु उनमें दस नाडियाँ मुख्य हैं जिनसे होकर दस प्राण हमारे शरीर में निरन्तर प्रवाहित होते रहते हैं।

35- ऊपर और नीचे विपरीत कोणों से निकलने वाली ये नाड़ियाँ शरीर में जहाँ आपस में मिलती हैं वहाँ ये चक्र का आकार बना लेती हैं। किन्तु इनका नियंत्रण प्राण शक्ति से ही होता है।

37– इन चौबीस नाडियों में दस श्रेष्ठ हैं और उनमें भी तीन सर्वोत्तम हैं – इडा, पिंगला और सुषुम्ना।

38-A– उक्त तीन नाड़ियों के अलावा सात नाड़ियाँ हैं – गांधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू और शंखिनी।

NOTE;-

इस अंक में नाड़ियों की स्थिति तथा प्राणों के नाम सहित स्थान का विवरण दिया जा रहा हैः- उक्त चार श्लोकों को अर्थ सुविधा की दृष्टि से एक साथ लिया जा रहा है।

(38-से 41 तक)शरीर के बाएँ भाग में इडा नाड़ी, दाहिने भाग में पिंगला, मध्य भाग में सुषुम्ना, बाईं आँख में गांधारी, दाहिनी आँख में हस्तिजिह्वा, दाहिने कान में पूषा, बाएँ कान में यशस्विनी, मुखमण्डल में अलम्बुषा, जननांगों में कुहू और गुदा में शांखिनी नाड़ी स्थित है। इस प्रकार से दस नाड़ियाँ शरीर के उक्त अंगों के द्वार पर अर्थात् ये अंग जहाँ खुलते हैं, वहाँ स्थित हैं। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ प्राण मार्ग में स्थित हैं। इस प्रकार दस नाडियाँ उक्त अंगों में शरीर के मध्य भाग में स्थित हैं।

( 42 से-47 तक) - हे शिवे, नाड़ियों के बाद अब मैं तुम्हें इनसे संबंधित वायुओं (प्राणों) के विषय में बताऊँगा। इनकी भी संख्या दस है। दस में पाँच प्रमुख प्राण है और पाँच सहायक प्राण हैं। पाँच मुख्य वायु (प्राण) है- प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। सहायक प्राण वायु हैं - नाग, कूर्म, कृकल (कृकर), देवदत्त और धनंजय। प्रमुख पाँच प्राणों की स्थिति निम्नवत है। प्राण वायु स्थिति प्राण हृदय अपान उत्सर्जक अंग समान नाभि उदान कंठ व्यान पूरे शरीर में पाँच सहायक प्राण-वायु के कार्य निम्न लिखित हैं- सहायक प्राण-वायु कार्य नाग डकार आना कूर्म पलकों का झपकना कृकल छींक आना देवदत्त जम्हाई आना धनंजय यह पूरे शरीर में व्याप्त रहता है मृत्यु के बाद भी कुछ तक समय यह शरीर में बना रहता है। इस प्रकार ये दस प्राण वायु दस नाड़ियो से होकर शरीर में जीव के रुप में भ्रमण करते रहते हैं, अर्थात् सक्रिय रहते हैं।

48– इडा, पिङ्गला और सुषुम्ना तीनों नाड़ियों की सहायता से शरीर के मध्य भाग में प्राणों के संचार को प्रत्यक्ष करना चाहिए। यहाँ शरीर के मध्य के दो अर्थ निकलते हैं- पहला नाभि और दूसरा मेरुदण्ड।

49– इडा नाडी बायीं ओर स्थित है तथा पिङ्गला दाहिनी ओर। अतएव इडा को वाम क्षेत्र और पिंगला को दक्षिण क्षेत्र कहा जाता है।

50– चंद्रमा इडा नाडी में स्थित है और सूर्य पिङ्गला नाडी में तथा सुषुम्ना स्वयं शिव-स्वरूप है। भगवान शिव का वह स्वरूप हंस कहलाता है, अर्थात् जहाँ शिव और शक्ति एक हो जाते हैं और श्वाँस अवरुद्घ हो जाती है। क्योंकि-

51 –तंत्रशास्त्र और योगशास्त्र की मान्यता है कि जब हमारी श्वाँस बाहर निकलती है तो “हं” की ध्वनि निकलती है और जब श्वाँस अन्दर जाती है तो “सः (सो)” की। हं को शिव- स्वरूप माना जाता है और सः या सो को शक्ति-रूप।

52–वायीं नासिका से प्रवाहित होने वाला स्वर चन्द्र कहलाता है और शक्ति का रूप माना जाता है। इसी प्रकार दाहिनी नासिका से प्रवाहित होने वाला स्वर सूर्य कहलाता है, जिसे शम्भु (शिव) का रूप माना जाता है।

53– श्वास लेते समय विद्वान लोग जो दान देते हैं, वह दान इस संसार में कई करोड़गुना हो जाता है।

54 -एकाग्रचित्त होकर योगी चन्द्र और सूर्य नाड़ियों की गतिविधियों के द्वारा सबकुछ जान लेता है।

55-जब मन एकाग्र हो तो तत्व चिन्तन करना चाहिए। किन्तु जब मन अस्थिर हो तो ऐसा करना उचित नहीं है। जो ऐसा करता है उसे इष्ट-सिद्धि, हर प्रकार के लाभ और सर्वत्र विजय उपलब्ध होते हैं।

56 – जो मनुष्य (साधक) अभ्यास करके चन्द्र और सूर्य नाडियों में सन्तुलन बना लेते हैं, वे त्रिकालज्ञ हो जाते हैं।

57– बायीं ओर स्थित इडा नाडी अमृत प्रवाहित कर शरीर को शक्ति और पोषण प्रदान करती है तथा दाहिनी ओर स्थित पिंगला नाडी शरीर को विकसित करती है।

58– मध्यमा अर्थात सुषुम्ना किसी भी काम के लिए सदा क्रूर और असफलता प्रदान करने वाली है (आध्यात्मिक साधना या उपासना आदि को छोड़कर)। अर्थात् उत्तम भाव से किया कार्य भी निष्फल होता है। जबकि इडा नाडी के प्रवाह काल में किये गये शुभकार्य सदा सिद्धिप्रद होते हैं।

59–बाएँ स्वर के प्रवाह के समय घर से बाहर जाना शुभ होता है और दाहिने स्वर के प्रवाह काल में अपने घर में या किसी के घर में प्रवेश शुभ दायक होता है। चन्द्र स्वर को सदा सम और सूर्य स्वर को विषम समझना चाहिए। अर्थात् चन्द्र स्वर को स्थिर और सूर्य स्वर को चंचल या गतिशील मानना चाहिए।

60–चन्द्र नाडी का प्रवाह स्त्री रूप या शक्ति स्वरूप तथा सूर्य नाडी का प्रवाह पुरुष रूप या शिव स्वरूप माना जाता है। चन्द्र नाडी गौर तथा सूर्य नाडी श्याम वर्ण की मानी जाती है। चन्द्र नाडी के प्रवाह काल में सौम्य कार्य करना उचित है।

61 – सूर्य नाडी के प्रवाह काल में श्रमपूर्ण कठोर कार्य करना चाहिए और सुषुम्ना के प्रवाह काल में इन्द्रिय सुख तथा मोक्ष प्रदान करने वाले कार्य करना चाहिए।

62- शुक्ल पक्ष में प्रथम तीन दिन सूर्योदय के समय चन्द्र स्वर प्रवाहित होता है और कृष्ण पक्ष में सूर्य स्वर और तीन-तीन दिन पर इनके उदय का क्रम बदलता रहता है। इस प्रकार स्वरोदय काल का क्रम समझना चाहिए।

63 - पिछले श्लोक में बताए गए क्रम से शुक्ल पक्ष में चन्द्र स्वर और कृष्ण पक्ष में सूर्य स्वर प्रतिदिन क्रम से ढाई-ढाई घटी अर्थात एक-एक घंटे साठ घटियों में प्रवाहित होते हैं यदि उनमें किसी प्रकार का अवरोध न किया जाए। घटी के हिसाब से साठ घटी का दिन-रात होता है। इस प्रकार ढाई घटी का एक घंटा होता है।

64 - प्रत्येक नाड़ी के एक घंटे के प्रवाह काल में पाँचो तत्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का उदय होता है। यदि उपर्युक्त श्लोकों में बताए गए क्रम से प्रातःकाल स्वरों का क्रम न हो तो उन्हें परिवर्तित कर ठीक कर लेना चाहिए, अन्यथा कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।

65 - शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को इड़ा तथा कृष्ण-पक्ष की प्रतिपदा को पिंगला नाड़ी चलनी चाहिए। तब योगी को दत्तचित्त होकर कार्य करना चाहिए। उसमें उसे सफलता मिलती है।

66- रात में चन्द्रनाड़ी और दिन में सूर्यनाड़ी को रोकने में जो सफल हो जाता है वह निस्सन्देह योगी है।

67- सूर्यनाड़ी द्वारा अर्थात् पिंगला नाड़ी द्वारा सूर्य को अर्थात् शरीर में स्थित प्राण ऊर्जा को नियंत्रित किया जाता है तथा चन्द्र नाड़ी अर्थात् इड़ा नाड़ी द्वारा चन्द्रमा को वश में किया जा सकता है। यहाँ चन्द्रमा मन का संकेतक है। अर्थात् इडा द्वारा मन को नियंत्रित किया जाता है। इस क्रिया को जो जानता है और उसका अभ्यास करके दक्षता प्राप्त कर लेता है, वह तत्क्षण, तीनों लोकों का स्वामी बन जाता है।

68- यदि चन्द्र नाड़ी में स्वर का उदय हो और सूर्यनाड़ी में उसका समापन हो, तो ऐसी स्थिति में मिली सम्पति कल्याणकारी होती है। परन्तु यदि स्वरों का क्रम उल्टा हो, तो कोई लाभ नहीं मिलेगा। अतएव उसे छोड़ देना चाहिए।

69 -शुक्ल पक्ष में विशेषकर सोम, बुध, गुरु और शुक्रवार को चन्द्रनाड़ी अर्थात् वायीं नासिका से स्वर के प्रवाह काल में किए गए सभी कार्यों में सफलता मिलती है।

70 -कृष्ण पक्ष में विशेषकर रवि, मंगल और शनिवार को सूर्यनाडी के प्रवाह काल में किए गए अस्थायी फलदायक कार्यों में सफलता मिलती है।

71- यहाँ प्रत्येक नाड़ी के प्रवाह में पंच महाभूतों के उदय का क्रम बताया गया है, अर्थात् स्वर प्रवाह के प्रारम्भ में वायु तत्व का उदय होता है, तत्पश्चात् अग्नितत्व , फिर पृथ्वी तत्व , इसके बाद जल तत्व और अन्त में आकाश तत्व का उदय होता है।

72 -जैसा कि तिरसठवें श्लोक में आया है कि हर नाड़ी में स्वरों का प्रवाह ढाई घटी अर्थात् एक घंटे का होता है। इस ढाई घटी या एक घंटे के प्रवाह-काल में पाँचों तत्व पिछले श्लोक में बताए गए क्रम से उदित होते हैं। इन तत्त्वों का प्रत्येक नाड़ी में अलग-अलग अर्थात् चन्द्र नाड़ी और सूर्य नाड़ी दोनों में अलग-अलग किन्तु एक ही क्रम में तत्वों का उदय होता है।

73 - दिन और रात, इन चौबीस घंटों में बारह संक्रम अर्थात् राशियाँ होती हैं। इनमें वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियाँ चन्द्रनाडी में स्थित हैं।

74 -मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ राशियाँ सूर्य नाड़ी में स्थित हैं। शुभ और अशुभ कार्यां के निर्णय हेतु इनका विचार करना चाहिए।

NOTE;-

इस अंक में स्वर विशेष के प्रवाह-काल में किए जाने वाले कार्य विशेष का उल्लेख किया जा रहा है।

75 - चन्द्रमा का सम्बन्ध पूर्व और उत्तर दिशा से है और सूर्य का दक्षिण और पश्चिम दिशा से। अतएव दाहिनी नाक से साँस चलते समय दक्षिण और पश्चिम दिशा की यात्रा प्रारम्भ नहीं करनी चाहिए।

76 - इडा् नाड़ी के प्रवाह के समय उत्तर एवं पूर्व दिशा की यात्रा आरम्भ नहीं करनी चाहिए। 'क्योंकि इड़ा के प्रवाह काल में यात्रा के आरम्भ करने पर रास्ते में डाकुओं द्वारा लुटने का भय होता है या यात्रा से वह घर नहीं लौट पाता।

77- अतएव बुद्धिमान लोग सफलता पाने के उद्देश्य से वर्जित नाड़ी के प्रवाह के दौरान वर्जित दिशा की यात्रा प्रारम्भ नहीं करते, अन्यथा मृत्यु अवश्यंभावी है।

78- यदि शुक्ल पक्ष की द्वितीया को सूर्योदय के समय चन्द्र स्वर प्रवाहित हो, तो लाभ और मित्र के मिलने की संभावना अधिक होती है।

79 - जब सूर्योदय के समय सूर्य स्वर और चन्द्रोदय के समय चन्द्र स्वर बहे, तो उस दिन किए गए सभी कार्य सफल होते हैं।

80- लेकिन जब सूर्योदय के समय चन्द्र नाड़ी और चन्द्रोदय के समय सूर्य नाड़ी प्रवाहित हो, तो उस दिन किए सारे कार्य संघर्षपूर्ण और निष्फल होते हैं।

81- विद्वान लोग कहते हैं कि सूर्य स्वर के प्रवाह काल में किए गए कार्यों में अभूतपूर्व सफलता मिलती है, जबकि चन्द्रस्वर के प्रवाह काल में किए गए कार्यों में ऐसा कुछ नहीं होता।

NOTE;-

इस अंक का प्रतिपाद्य विषय है कि यदि नियत तिथि को प्रात:काल नियत स्वर प्रवाहित न हो तो किस प्रकार के दुष्परिणाम सामने आते हैं या आने की संभावना बनती है।

(82 - 84 श्लोक) प्रात: काल में (सूर्योदय के समय) यदि विपरीत स्वर प्रवाहित होता है, अर्थात् प्रात:काल सूर्य स्वर के स्थान पर चन्द्र स्वर प्रवाहित हो और चन्द्र स्वर के स्थान पर सूर्य स्वर प्रवाहित हो, तो प्रथम काल खण्ड में मानसिक चंचलता होती है, दूसरे कालखण्ड में धनहानि, तीसरे में यात्रा (अनचाही) चौथे में असफलता, पॉचवें में राज्य विध्वंस, छठवें में सर्वनाश, सातवें में शरीर व्याधि और कष्ट तथा आठवें कालखण्ड में मृत्यु।

85- आठ दिनों तक निरन्तर प्रात:, दोपहर और सायंकाल यदि विपरीत स्वर चले, तो सभी कार्यों में असफलता मिलती है और कीर्ति लेशमात्र भी नहीं मिलती।

86 - यदि सूर्योदय काल और मध्याह्न में चन्द्र स्वर और सूर्यास्त के समय सूर्य स्वर प्रवाहित हो तो उस दिन हर तरह की सफलता मिलती है। लेकिन स्वरों का क्रम यदि उल्टा हो, तो शुभ कार्यों को न करना ही बुद्धिमानी है।

87- यात्रा प्रारम्भ करते समय जिस नाक से साँस चल रही हो वही पैर घर से पहले निकाल कर यात्रा करनी चाहिए। इस प्रकार यात्रा निर्विघ्न सफल होती है।

88- यदि चन्द्र स्वर प्रवाहित हो तो समसंख्या में तथा सूर्य स्वर के प्रवाह के समय विषम संख्या में कदम भरना चाहिए। इससे यात्रा सिद्धिप्रद होती है।

NOTE;-

शिव स्वरोदय के इस अंक में मनोकामना की सिद्धि के संदर्भ में दिए गए श्लोकों पर चर्चा की जा रही है।

89- प्रात: काल उठकर यह जाँच करनी चाहिए कि स्वर किस नासिका से प्रवाहित हो रहा है। इसके बाद जिस नासिका से स्वर चल रहा हो उस हाथ के करतल (हथेली) को देखना चाहिए और उसी से चेहरे का वही भाग स्पर्श करना चाहिए। अर्थात् यदि बायीं नासिका से साँस चल रही हो तो बाँए हाथ की हथेली ऊपर से नीचे तक देखनी चाहिए और उससे चेहरे का बायाँ हिस्सा स्पर्श करना चाहिए। यदि दाहिना स्वर चल रहा हो तो दाहिने हाथ से स्पर्श करना चाहिए। ऐसा करने से वांछित फल मिलता है।

( वैसे स्वर-विज्ञानियों ने यह भी सलाह दी है कि विस्तर से उतरते समय (प्रात:काल) उसी ओर का पैर जमीन पर सबसे पहले रखना चाहिए जिस नाक से साँस चल रही हो।)

90- दान देते समय अथवा कुछ भी देते समय या लेते समय उसी हाथ का प्रयोग करना चाहिए जिस नासिका से स्वर प्रवाहित हो रहा हो। इसी प्रकार यात्रा शुरू करते उसी ओर के पैर को घर से पहले निकालना चाहिए जिस नासिका से स्वर प्रवाहित हो रहा हो।

91- उपर्युक्त श्लोक में बताए गए तरीके को जो अपनाते हैं, उन्हें न कभी नुकसान होता है और न ही अवांछित व्यक्तियों से कष्ट होता है। बल्कि इससे उन्हें सुख और शान्ति मिलती है।

92- जब अपने गुरु, राजा, मित्र या मंत्री का सम्मान करना हो तो उन्हें अपने सक्रिय स्वर की ही ओर रखना चाहिए।

93 - जय, लाभ और सुख चाहने वाले को अपने शत्रु, चोर, साहूकार, अभियोग लगाने वाले को रोकने हेतु उन्हें अपने निष्क्रिय स्वर की ओर, अर्थात जिस नासिका से स्वर प्रवाहित न हो उस ओर रखना चाहिए।

94- लम्बी यात्रा का प्रारम्भ बाएँ स्वर के प्रवाह काल में करना चाहिए और कम दूरी की यात्रा दाहिने स्वर के प्रवाह काल में करनी चाहिए।