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भगवान बुद्ध के कल्याणकारी उपदेश क्या वास्तव में ‘कल्प-तरु’ है?सम्यक दृष्टि क्या है?PART-02


क्या है ‘कल्प-तरु’ ?

10 FACTS;-

1-भारतीय साहित्य में आदि काल से चली आ रही है। ‘कल्पतरु’ जैसा नाम है, उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कहीं यह ‘कल्पना तरु’ न हो। यदि ‘कल्पना तरु’ भी हो तो कल्पना प्रसूत करने की शक्ति तो इसमें है ही। इस पुरातन वृक्ष की छाया हर युग एवं हर एक में अपनी शीतलता प्रदान करती रही है। इसकी गाथा सुरलोक, नरलोक एवं नागलोक तक प्रचलित है।

2-वास्तव में यह ‘कल्प-तरु’ है क्या? क्या ‘नदंन कानन’ का एक अपूर्व वृक्ष! इन्द्र का मनोरथ पूर्ण करने वाला पारिजात!! यह भी कहा जाता है कि इन्द्र ने इस ‘कल्प-वृक्ष’ से जो माँगा सो पाया। उसकी मनोकामना पूरी हो गई तो फिर इसे क्यों न प्राप्त किया जाय?

3-पौराणिक साहित्य में ‘कल्प-वृक्ष’ के बारे में कहा गया है कि ‘समुद्र मन्थन’ के समय जो अनुपम रत्न निकले उसमें एक यह भी है। ‘समुद्र मन्थन’ आध्यात्मिक पक्ष में मनुष्य की दैवी और आसुरी वृत्तियों का संघर्ष है। वैदिक साहित्य में मनुष्य का शरीर घट या कलश कहा गया है। मन उसका दैव अंश है। साथ-साथ सम्पूर्ण मानव को समुद्र की संज्ञा दी गई है। इसी समुद्र का मंथन प्रत्येक मनुष्य के जीवन में चलता रहता है। इसी संघर्ष में उसके विकास का रहस्य छिपा है। संघर्षहीन प्राणी को प्रकृति का जड़ अंश ही समझना चाहिये।

4-शरीर क्रिया विज्ञान में मनुष्य के केन्द्रीय नाड़ी जाल का वर्णन एक वृक्ष के रूप में किया गया है। पश्चिम के विद्वान् इसे ‘जीवन-वृक्ष’ कहते हैं। नाड़ी की शाखा-प्रशाखादि इस वृक्ष के अंग-प्रत्यंग हैं। मनुष्य का स्वास्थ्य और जीवन इस नाड़ी संस्थापन पर प्रतिष्ठित है। यह वनस्पति ही ‘मनुष्य जीवन’ के केन्द्र में ‘स्थापित यूप’ है। यही वृक्ष साँकेतिक “कल्पतरु” है। 5-वास्तव में यह कल्पतरु मानव ही है। प्रकृति की सर्वोत्तम कृति!..... जो अपने को ‘कल्पवृक्ष’ समझकर भी स्वयं ‘संकल्प’ भूल गया, साथ-साथ खो बैठा अपना स्वस्थ रूप ‘विकल्प’ की घूर्णिचक्र में पड़कर। इसे भी नियति का व्यंग कहिये, “तेरे अंदर सब कुछ है, और तू ढूँढ़ रहा है बाहर।”

‘6-कल्प’ और ‘कल्पना’ एक ही धातु से बने हैं। ‘कल्प’ दो प्रकार का है- एक ‘संकल्प’ और दूसरा ‘विकल्प’। कल्प में ‘सम्’ और ‘वि’ उपसर्ग जोड़ने से दो शब्द बनते हैं-

सम+कल्प=समाधि।

वि+कल्प=व्याधि।

7-मन की शक्तियों का रहस्य ‘संकल्प’ या ‘समाधि’ है। नाना विकल्पों से मन व्याधि की ओर जाता है। उसकी शक्ति का क्षय होता है। इस प्रकार का ‘कल्प तरु’ प्रकृति ने प्रत्येक प्राणी के भीतर लगाया है। उसी का फल हम संकल्प मात्र से मनोनुकूल प्राप्त कर सकते हैं, पर उसकी उपलब्धि तरु की छाया तक ही सीमित है। स्रष्टा ने इसे भी अपनी मर्यादा के अंतर्गत ही रखा है। सम्भवतः इस पवित्र वस्तु को मर्यादा हीन होने से बचाया है। यह सच है कि कल्प तरु की छाया से बाहर मन का राज्य समाप्त हो जाता है।

8-कहीं-कहीं पर इस कल्प तरु को स्वर्ग का वृक्ष कहा गया है। इस साँकेतिक प्रयोग का भी रहस्य है। विचार मस्तिष्क में उत्पन्न होते हैं। मनोरथ की गति का पहिया मस्तिष्क में चक्कर काटता है। मस्तिष्क का अन्य नाम स्वर्ग भी है, जहाँ ज्योतिलोक है। इसी से इस ‘कल्प-तरु’ को स्वर्ग का वासी कहा गया है। अर्थात् स्वर्ग का वृक्ष, जो कि नीचे उगता ही नहीं। 9-इसका एक और प्रचलित नाम है और वह है पारिजात! ‘पारिजात’ की संज्ञा देने का भी विशेष प्रयोजन है। यह जन्म लेते ही प्राणी के साथ उगता है, मृत्यु के संग यह भी सुप्त हो जो जाता है। यह संकल्प या कल्पना दो प्रकार का है- एक शिव और दूसरा अशिव। ‘

10-शिव संकल्प’ मानव कल्याण का हेतु हैं। इसी से पुराणकार ने कल्प वृक्ष के तले ‘शिव संकल्प’ अमृत प्राप्त करने की शिक्षा दी है। अब यह प्राणी पर निर्भर करता है कि वह अपने कानून के ‘पारिजात’ से ‘संकल्प’ या ‘विकल्प’ का पुष्प माँग ले।

धार्मिक सुधारक महात्मा बुद्ध;-

12 FACTS;-

1-हमारे देश में जो धार्मिक सुधारक हुए हैं उनमें महात्मा बुद्ध का स्थान बहुत ऊँचा है। इनके उपदेश गिरी हुई आत्माओं को उठाने वाले हैं। नीच प्रकृति के व्यक्ति भी इनके उपदेशों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। मनुष्यों को सदाचार की शिक्षा देने के लिए जिन बातों की आवश्यकता है वे सभी महात्मा बुद्ध के उपदेशों में पाई जाती हैं। 2-महात्मा बुद्ध के उपदेशों की शैली बड़ी सरल और मनोरंजक है जिसे साधारण मनुष्य भी भली प्रकार समझ लेते हैं। वे अन्य कितने ही दार्शनिकों की तरह मनुष्य को शब्दों की भूल-भुलैया में नहीं डालते। वह छोटे-छोटे उदाहरणों और छोटे वाक्यों में ही बड़े से बड़े सिद्धान्तों को प्रकट कर देते हैं। उनके उपदेशों में सूखापन नहीं रहता। उनकी बात चित्त में गढ़ जाती है। 3-हमारे इतिहास में एक समय ऐसा आ चुका है जब बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म के अनुयायियों में बड़ा झगड़ा होता था। पर बुद्ध भगवान के उपदेशों में इस विरोध का कोई कारण नहीं मिलता। उनके उपदेश तो इतने सारगर्भित हैं कि किसी भी धर्म का अनुयायी उन पर आक्षेप नहीं कर सकता। 3-1-ऐसा जान पड़ता है कि महात्मा बुद्ध ने अपने समय में वैदिक धर्मावलम्बियों को तत्वहीन और बाहरी धार्मिक रूढ़ियों में फँसा हुआ देखा। उनमें आडम्बर बहुत बढ़ गया था और सच्चे धार्मिक जीवन के चिह्न कम थे। वेद के नाम पर अनेकों प्रकार की कुप्रथाएं प्रचलित थीं। वेद मन्त्रों को पढ़-पढ़कर अत्याचार किये जा रहे थे। जिन वेद-मन्त्रों में प्राणरक्षा का वर्णन था उन्हीं को पढ़कर पशुओं का बलिदान किया जाता था। जिन वेद-मन्त्रों से कुछ जातियोँ अन्य जातियों पर अत्याचार करती थीं। 3-2-सच्चे ब्राह्मण तथा आत्मज्ञान के उपदेशक नहीं रहे थे, उनका स्थान झूँठे, पाखण्डी और आडम्बर-युक्त मनुष्यों ने ले लिया था। इनमें ब्राह्मणों की विद्या, उनका तप, उनका त्याग तो था नहीं, हाँ स्वार्थ, मतान्धता और अत्याचार अवश्य थे।यज्ञ अवश्य होते थे, परन्तु ऐसे यज्ञ जिनका वेदों में विधान न था और जिनसे मनुष्य को लाभ के बदले हानि होती थी। 4-वेदों में यज्ञ के तीन लाभ होते बताये हैं- (1) सन्तान की उत्पत्ति (2) पशुओं की उन्नति (3) ब्रह्म-विद्या की प्राप्ति 4-महात्मा बुद्ध ने उस समय होने वाले यज्ञों में इनमें से एक भी बात को न पाया। यज्ञों में पशु-हिंसा देख कर उनका मन पिघल गया। उन्होंने घर-द्वार इसीलिए छोड़ा था कि संसार के प्राणियों को दुःख से छुड़ाने का मार्ग तलाश करें। पर देश भर में धर्म के नाम पर इस प्रकार की प्राणी हिंसा होती देखकर उनका हृदय व्यथित हो गया और उन्होंने इस धार्मिक पाखंड को दूर करने का निश्चय कर लिया और नये धर्म का उपदेश करने लगे। 5-जो उपदेश बुद्ध भगवान ने किया वह प्राचीन वैदिक धर्म के प्रतिकूल न था। जिस सदाचार की ओर वेदों का संकेत था उसी की ओर महात्मा बुद्ध भी संकेत करते थे पर उस समय के आडम्बरी धर्म-धुरन्धरों को यह बात रुचिकर न थी। इससे उनके स्वार्थ साधन में अड़चन पड़ती थी और उनके पाखंड की पोल खुलती थी। अतः वह स्वभावतः बुद्ध भगवान से विरुद्ध हो गये। 6-महात्मा बुद्ध ने लोगों से कहा कि संसार अनित्य है। वर्तमान काल थोड़ी ही देर बाद भूत काल में परिणित हो जायगा। इसलिये संसार में लिप्त न हो और हमेशा सावधान रहो। महात्मा बुद्ध के उपदेशों ने सहस्रों और लाखों सदाचारी भिक्षु उत्पन्न कर दिये, जिन्होंने अहिंसा, दया, शुद्ध आचार और पवित्र जीवन के सिद्धान्तों का प्रचार लंका, ब्रह्मदेश, चीन, जापान, पश्चिमी एशिया आदि दूर-दूर के देशों तक कर दिया। 7-स्वार्थ त्याग तथा विचारों और जीवन की पवित्रता हर एक भिक्षु का मुख्य उद्देश्य था। इस बात का छोटा सा उदाहरण यह है कि एक बार एक भिक्षु ने भिक्षा माँगते समय एक युवती लड़की को देखा, जो उसे भीख देने को आई थी। लड़की के सौंदर्य ने भिक्षु के मन को विचलित कर दिया। भिक्षु ने इसके प्रायश्चित स्वरूप चाकू से अपनी आँख निकाल ली। यह सदाचार की पराकाष्ठा थी। यह भाव बुद्ध भगवान के उपदेशों ने ही उत्पन्न किये थे। 8-बुद्ध भगवान के उपदेशों में कुछ शोकवाद की झलक पाई जाती है। संसार की असारता पर आवश्यकता से अधिक बल दिया गया है। जीवन के दुःखों का वर्णन करने में अत्युक्ति से काम लिया गया है। जीवन के सुखों के साथ न्याय नहीं किया गया है। इन सुखों के कारण मनुष्यों की कितने अंशों में उन्नति भी होती है इस पर पूरा विचार नहीं किया गया है। परन्तु सम्भवतः ये सब बातें उस समय आवश्यक थीं। 9-बुद्ध भगवान के अधिकतर उपदेश भिक्षुओं के प्रति थे। भिक्षुओं का मार्ग मुख्य रूप से निवृत्ति का हैं। गृहस्थों को प्रवृत्ति उपदेश करना चाहिए। इसलिए कुछ आश्चर्य नहीं यदि बुद्ध ने निवृत्ति मार्ग पर जोर दिया। सम्भवतः इसी से त्यागी बौद्ध भिक्षुओं का प्रबल दल तैयार हो सका। 10-महात्मा बुद्ध का उपदेश केवल सुधार करना था। वैदिक सभ्यता के स्थान पर कोई नई सभ्यता के लाना उनका प्रयोजन न था। इसलिये यद्यपि बौद्धों ने वेदों का अप्रमाणिक माना, पर वैदिक संस्कृति या सभ्यता से उन्होंने नाता न तोड़ा। सामाजिक संगठन का ढाँचा बौद्धों के समय में भी ज्यों का त्यों कायम था। 11-बुद्ध के उपदेश ग्रन्थ ‘धम्मपद’ के ‘ब्राह्मण वर्ग’ के पढ़ने से विदित होता है कि जिसको ‘ब्राह्म धर्म’ कहते हैं उसका विरोध करना बुद्ध को अभीष्ट न था। वह उस धर्म की बुराइयों को दूर करना चाहते थे। महात्मा बुद्ध ने यह नहीं कहा कि 'कौन' सर्वश्रेष्ठ हैंतथा 'कौन' सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं। उन्होंने केवल यह बताया है कि ब्राह्मण कौन हैं?लोग केवल जन्म से ही अपने को ब्राह्मण कहते थे, गुणों पर कुछ ध्यान न था। इसीलिए बुद्ध को कहना पड़ा.... 11-1-“जटा, गोत्र और जाति से कोई ब्राह्मण नहीं हो सकता। सच्चा ब्राह्मण वह है जिसमें सत्य और धर्म पाये जावें।”

11-2-“जो ध्यानी, दोष रहित, कृतकार्य, विषय रहित और ऊंचे उद्देश्यों का पालन करता है उसी को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।”

11-3-“जो शरीर, वाणी और मन से बुरा काम नहीं करता उसको मैं ब्राह्मण कहता हूँ।”

11-4-“मैं किसी को उसकी योनि अथवा माता के कारण ब्राह्मण नहीं कहता, चाहे लोग उसका सम्मान ही क्यों न करें और चाहे वह धनवान ही क्यों न हों। मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जो निर्धन और बन्धनों से मुक्त है।”

11-5-“मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जिसने कुछ अपराध नहीं किया, फिर भी गाली, हानि तथा दण्ड के शक्ति के साथ सह लेता है। जिसमें शान्ति का बल है और सेना के समान शक्ति है।”

“मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जो सुखों में लिप्त नहीं होता जैसे कमल पानी में लिप्त नहीं होता।”

12-प्रतीत होता है कि आजकल की भाँति बुद्ध के जमाने में भी पाखण्डी की प्रबलता हो गई थी।इस प्रकार महात्मा बुद्ध के उपदेश अधिकाँश में वैदिक धर्म ग्रन्थों से मिलते हैं। बहुत से तो महाभारत गीता, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में ज्यों के त्यों पाये जाते हैं।

सम्यक दृष्टि (गौतम बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग) क्या है?-

06 FACTS;-

1-बौद्ध धर्म की दो प्रधान शाखाएँ हैं—हीनयान (या उत्तरीय) और महायान (या दक्षिणी)। इनमें से हीनयान शाखा के सब ग्रंथ पाली भाषा में हैं और बौद्ध धर्म के मूल रूप का प्रतिपादन करते हैं। महायान शाखा कुछ पीछे की है और उसके सब ग्रंथ सस्कृत में लिखे गए हैं। महायान शाखा में ही अनेक आचार्यों द्वारा बौद्ध सिद्धांतों का निरूपण गूढ़ तर्कप्रणाली द्वारा दार्शनिक दृष्टि से हुआ है। प्राचीन काल में वैदिक आचार्यों का जिन बौद्ध आचार्यों से शास्त्रार्थ होता था वे प्रायः महायान शाखा के थे।

2-निर्वाण शब्द पीड़ा या दु:ख से मुक्ति पाने की स्थिति है। पाली में "निब्बाण" का अर्थ है "मुक्ति पाना"- यानी, लालच, घृणा और भ्रम की अग्नि से मुक्ति। मोक्ष तक पहुँचने के तीन सरलतम मार्ग हैं। पहला आष्टांग योग, दूसरा जिन त्रिरत्न और तीसरा हैं आष्टांगिक मार्ग/सम्यक दृष्टि।परन्तु, यदि आप अभ्यास और जाग्रति के प्रति समर्पित नहीं हैं तो कहीं भी पहुँच नहीं सकते हैं।

3-त्रिरत्न एक संस्कृत शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- 'तीन रत्न'। पालि भाषा में इसे 'ति-रतन' लिखा जाता है। इसे 'त्रिध' या 'त्रिगुण शरण' भी कहते हैं, जो बौद्ध और जैन के तीन घटक हैं।बौद्ध धर्म में त्रिरत्न 'बुद्ध', 'धर्म' (सिद्धांत या विधि) तथा 'संघ' (मठीय व्यवस्था या धार्मिकों का समुदाय) हैं। बुद्ध के समय से ही बौद्ध मत में दीक्षा त्रित्व के इन शब्दों की औपचारिक मान्यताओं में निहित है-"मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ, मैं धर्म की शरण में जाता हूँ, मैं संघ की शरण में जाता हूँ।" (बुद्धं शरणम् गच्छामि, धम्मम् धरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि)

4-आष्टांगिक मार्ग सर्वश्रेष्ठ इसलिए है कि यह हर दृष्टि से जीवन को शांतिपूर्ण और आनंदमय बनाता है।गौतम बुद्ध ने इस दुःख निरोध प्रतिपद आष्टांगिक मार्ग को 'मध्यमा प्रतिपद' या मध्यम मार्ग की संज्ञा दी है। अर्थात जीवन में संतुलन ही मध्यम मार्ग पर चलना है। 5-तृष्णा ही सभी दु:खों का मूल कारण है। तृष्णा के कारण संसार की विभिन्न वस्तुओं की ओर मनुष्य प्रवृत्त होता है; और जब वह उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता अथवा जब वे प्राप्त होकर भी नष्ट हो जाती हैं तब उसे दु:ख होता है। तृष्णा के साथ मृत्यु प्राप्त करनेवाला प्राणी उसकी प्रेरणा से फिर भी जन्म ग्रहण करता है और संसार के दु:खचक्र में पिसता रहता है। अत: तृष्णा का सर्वथा प्रहाण करने का जो मार्ग है वही मुक्ति का मार्ग है। इसे दु:ख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा कहते हैं।

6-गौतम बुद्ध ने चार आर्य सत्य बताए हैं- दुख, दुख की उत्पत्ति, दुख से मुक्ति और मुक्तिगामी आर्य-आष्टांगिक मार्ग। दुख से मुक्ति के आठ उपायों को गौतम बुद्ध ने आष्टांगिक मार्ग कहा है। ये हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मात, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि।यदि इन मार्गों का मर्म समझ गए तो मुक्त हो जाओगे। क्या है आष्टांगिक मार्ग?

08 FACTS;- 1 -सम्यक दृष्टि :-

पहला सूत्र है आठ अंगों में- सम्यक दृष्टि ..जो है, वही देखना। जैसा है, वैसा ही देखना ,अन्यथा न करना। कोई धारणा बीच में न लाना ; कामना, वासना, धारणा को बीच में न लाना। जो है, वैसा ही देखना। इसे सही दृष्टि कह सकते हैं। इसे यथार्थ को समझने की दृष्टि भी कह सकते हैं। सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि हम जीवन के दुःख और सुख का सही अवलोकन करें। 2 -सम्यक संकल्प : -

दूसरा है- सम्यक संकल्प। हठ मत करना। अक्सर लोग हठ को संकल्प मान लेते हैं और हठी आदमी को कहते हैं, यह संकल्पवान है। जिद तो अहंकार है। संकल्प में कोई अहंकार नहीं होता। हठ और संकल्प में यही फर्क है। सम्यक संकल्प का अर्थ होता है, जो करने योग्य है, वह करना। और जो करने योग्य है, उस पर पूरा जीवन दांव पर लगा देना है।जीवन में संकल्पों का बहुत महत्व है। यदि दुःख से छुटकारा पाना हो तो दृढ़ निश्चय कर लें कि आर्य मार्ग पर चलना है। 3 -सम्यक वाक :-

तीसरा है- सम्यक वाणी। जो है, वही कहना। जैसा है, वैसा ही कहना। ऊपर कुछ, भीतर कुछ, ऐसा नहीं, क्योंकि अगर तुम सत्य की खोज में चले हो तो पहली शर्त तो पूरी करनी ही पड़ेगी कि तुम सच्चे हो जाओ। जो झूठा है, उससे सत्य का संबंध न जुड़ सकेगा। अगर कोई बात पसंद नहीं पड़ती तो निवेदन कर देना कि पसंद नहीं पड़ती है। झुठलाना मत। तुम अपने जीवन में थोड़ा देखना, तुम कुछ हो भीतर, बाहर कुछ बताए चले जाते हो। धीरे-धीरे यह बाहर की पर्त इतनी मजबूत हो जाती है कि तुम भूल ही जाते हो कि तुम भीतर क्या हो। सम्यक वाणी का अर्थ है- धीरे-धीरे सभी अर्थों में, दृष्टि में, संकल्प में, वाणी में हृदय की अंतरतम अवस्था को

झलकने देना।जीवन में वाणी की पवित्रता और सत्यता होना आवश्यक है। यदि वाणी की पवित्रता और सत्यता नहीं है तो दुःख निर्मित होने में ज्यादा समय नहीं लगता। 4 -सम्यक कर्मांत :- चौथा है-- सम्यक कर्मात। एक दिशा पर नजर रखना; वही करना, जो वस्तुत: तुम्हारा हृदय करने को कहता है। व्यर्थ की बातें मत किए चले जाना। किसी ने कह दिया तो कर लिया। सम्यक कर्मात का अर्थ होता है, वही करना है, जो तुम्हें करने योग्य लगता है। ऐसे ही हर किसी की बात में मत पड़ जाना। 5 -सम्यक आजीवका :-

पांचवां है- सम्यक आजीव। हर किसी चीज को आजीविका मत बना लेना।अगर तुम्हारी आजीविका सम्यक हो तो तुम्हारे जीवन में शांति होगी।कर्म चक्र से छूटने के लिए आचरण की शुद्धि होना जरूरी है। आचरण की शुद्धि क्रोध, द्वेष और दुराचार आदि का त्याग करने से होती है। यदि आपने दूसरों का हक मारकर या अन्य किसी अन्यायपूर्ण उपाय से जीवन के साधन जुटाए हैं तो इसका परिणाम भी भुगतना होगा इसीलिए न्यायपूर्ण जीविकोपार्जन आवश्यक है। 6 -सम्यक व्यायाम :-

छठवां है- सम्यक व्यायाम। अति न करना ; कुछ लोग हैं आलसी और कुछ लोग हैं अति कर्मठ। दोनों ही नुकसान में पड़ जाते हैं। आलसी उठता ही नहीं, तो पहुंचे कैसे! कर्मठ मंजिल के सामने से भी निकल जाता है दौडता हुआ, रुके कैसे, वह रुक ही नहीं सकता। रुकने की उसे आदत नहीं है। जब तुम तीर को चलाओ, तब प्रत्यंचा सम्यक खिंचनी चाहिए। अगर थोड़ी कम खिंची तो पहले ही गिर जाएगा तीर। थोड़ी ज्यादा खिंच गयी तो आगे निकल जाएगा तीर। इसलिए बुद्ध का जोर अति वर्जित करने पर है।ऐसा प्रयत्न करें जिससे शुभ की उत्पत्ति और अशुभ का निरोध हो। जीवन में शुभ के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। 7 -सम्यक स्मृति :-

और सातवां- सम्यक् स्मृति। व्यर्थ को भूलना और सार्थक को सम्हालना। तुम अक्सर उल्टा करते हो। सार्थक तो भूल जाते हो, व्यर्थ को याद रखते हो। जीवन में जो भी बहुमूल्य है, उसको तो बिसार देते हो। सबसे ज्यादा बहुमूल्य तो तुम्हारी चेतना है, उसको तो तुम बिल्कुल ही बिसार कर बैठ गए हो । इसको बुद्ध ने कहा, सम्यक् स्मृति। बुद्ध के स्मृति शब्द से ही संतों का सुरति शब्द आया। सुरति स्मृति का ही अपभ्रंश है। जिसे कबीर सुरति कहते हैं, वह बुद्ध की स्मृति ही है। उसे थोड़ा मीठा कर लिया- सुरति, अपनी याद, अपनी पहचान। चित्त में एकाग्रता का भाव आता है शारीरिक तथा मानसिक भोग-विलास की वस्तुओं से स्वयं को दूर रखने से। एकाग्रता से विचार और भावनाएँ स्थिर होकर शुद्ध बनी रहती हैं। 8 - सम्यक समाधि : -

03 POINTS;-

उपरोक्त सात मार्ग के अभ्यास से चित्त की एकाग्रता द्वारा निर्विकल्प प्रज्ञा की अनुभूति होती है। यह समाधि ही धर्म के समुद्र में लगाई गई छलांग है।और आठवां है- सम्यक समाधि। बुद्ध समाधि में भी कहते हैं सम्यक ख्याल रखना। क्योंकि ऐसी भी समाधियां हैं, जो सम्यक नहीं हैं। जड़ समाधि। एक आदमी मूर्छित पड़ जाता है, इसको बुद्ध सम्यक समाधि नहीं कहते। ऐसा आदमी गहरी निद्रा में पड़ गया, बेहोशी। मन के तो पार चला गया है, लेकिन ऊपर नहीं गया, नीचे चला गया। मन तो बंद हो गया, क्योंकि गहरी मूच्र्छा में मन तो बंद हो जाएगा, लेकिन यह बंद होना कुछ काम का न हुआ। मन बंद हो जाए और होश भी बना रहे। मन तो चुप हो जाए, विचार तो बंद हो जाएं, लेकिन बोध न खो जाए।

2-तीन स्थितियां हैं मन की। स्वप्न, जागृति, सुषुप्ति। स्वप्न तो बंद होना चाहिए- चाहे सम्यक समाधि हो, चाहे असम्यक समाधि हो, स्वप्न तो दोनों में बंद हो जाएगा। विचार की तरंगें बंद हो जाएंगी। लेकिन जड़ समाधि में आदमी गहरी मूच्र्छा में पड़ गया, सुषुप्ति में डूब गया, उसे होश ही नहीं है। जब वापस लौटेगा तो निश्चित ही शांत लौटेगा, बड़ा प्रसन्न लौटेगा, क्योंकि इतना विश्राम मिल गया। लेकिन यह कोई बात न हुई! यह तो नींद का ही प्रयोग हुआ। यह तो योगतंद्रा हुई। असली बात तो तब घटेगी, जब तुम भीतर जाओ और होशपूर्वक जाओ। तब तुम प्रसन्न भी लौटोगे, आनंदित भी लौटोगे और प्रज्ञावान होकर भी लौटोगे। तुम बाहर आओगे, तुम्हारी ज्योति और होगी। तुम्हारी प्रभा और होगी।

3-दो तरह की समाधियां हैं। जड़ समाधि, आदमी गांजा पीकर जड़ समाधि में चला जाता है, अफीम खाकर जड़ समाधि में चला जाता है।बुद्ध ने उनका बड़ा विरोध किया। बुद्ध ने कहा, यह भी कोई बात है! माना कि सुख मिलता है, इसमें कोई शक नहीं है। गांजे का दम लगा लिया तो डूब गए, एक तरह का सुख मिलता है। मगर यह डुबकी नींद की है। यह कुछ मनुष्य योग्य हुआ! ऊपर उठो, जागते हुए भीतर जाओ। मशाल लेकर भीतर जाओ, ताकि सब रास्ता भी उजाला हो जाए और तुम्हें पता भी हो जाए, तो जब जाना हो, तब चले जाओ। और तुम फिर किसी चीज पर निर्भर भी न रहोगे। असली बात है, जाग्रत होकर आनंद को उपलब्ध हो जाना। उसको उन्होंने सम्यक समाधि कहा।

यही हैं आर्य-आष्टांगिक मार्ग। क्यों आवश्यक हैं आष्टांगिक मार्ग?-

04 FACTS;-

1-इस मार्ग के प्रथम दो अंग प्रज्ञा के और अंतिम दो समाधि के हैं। बीच के चार शील के हैं। इस तरह शील, समाधि और प्रज्ञा इन्हीं तीन में आठों अंगों का सन्निवेश हो जाता है। शील शुद्ध होने पर ही आध्यात्मिक जीवन में कोई प्रवेश पा सकता है। शुद्ध शील के आधार पर मुमुक्षु ध्यानाभ्यास कर समाधि का लाभ करता है और समाधिस्थ अवस्था में ही उसे सत्य का साक्षात्कार होता है। इसे प्रज्ञा कहते हैं, जिसके उद्बुद्ध होते ही साधक को सत्ता मात्र के

अनित्य, अनाम और दु:खस्वरूप का साक्षात्कार हो जाता है।

2-प्रज्ञा के आलोक में इसका अज्ञानांधकार नष्ट हो जाता है। इससे संसार की सारी तृष्णाएं चली जाती हैं। वीततृष्ण हो वह कहीं भी अहंकार ममकार नहीं करता और सुख दु:ख के बंधन से ऊपर उठ जाता है। इस जीवन के अनंतर, तृष्णा के न होने के कारण, उसके फिर जन्म ग्रहण करने का कोई हेतु नहीं रहता। इस प्रकार, शील-समाधि-प्रज्ञावाला मार्ग आठ अंगों में विभक्त हो आर्य आष्टांगिक मार्ग कहा जाता है। 3-'काल चक्र' अर्थात समय का चक्र। समय और कर्म का अटूट संबंध है। कर्म का चक्र समय के साथ सदा घूमता रहता है। आज आपका जो व्यवहार है वह बीते कल से निकला हुआ है। कुछ लोग हैं जिनके साथ हर वक्त बुरा होता रहता है तो इसके पीछे कार्य-कारण की अनंत श्रृंखला है। दुःख या रोग और सुख या सेहत सभी हमारे पिछले विचार और कर्म का परिणाम हैं। 4-पुनर्जन्म का कारण पिछला जन्म है। पिछले जन्म के कर्म चक्र पर आधारित यह जन्म है। बौद्ध धर्म के इस कर्म चक्र का संबंध वैसा नहीं है जैसा कि माना जाता है कि हमारा भाग्य पिछले जन्म के कर्मों पर आधारित है या जैसी कि आम धारणा है पिछले जन्मों के पाप के कारण यह भुगतना पड़ रहा है। नहीं, कर्म चक्र का अर्थ प्रवृत्तियों की पुनरावृत्ति से और घटनाओं के दोहराव से है। बुरे घटनाक्रम से जीवन को धीरे-धीरे अच्छे घटनाक्रम के चक्र पर ले जाना होगा।यही हैं आर्य-आष्टांगिक मार्ग। ....SHIVOHAM....

.....SHIVOHAM....