Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

उपासना, साधना और आराधना की त्रिवेणी का रहस्य क्या है ?आपकी साधना कैसे सफल हो सकती हैं ?


आध्यात्मिक साधना का सारा का सारा माहौल तीन टुकड़ों में बँटा हुआ है । ये हैं.. 1-उपासना 2-साधना 3-आराधना उपासना, साधना और आराधना की त्रिवेणी क्या है ;- 07 FACTS;- 1-उपासना, साधना और आराधना की त्रिवेणी ही साधक को लक्ष्य तक पहुंचा सकती है, उपासना अर्थात् उपआसन अर्थात अभीष्ट इष्ट के सान्निध्य में, संपर्क में रहने, बैठने का अभ्यास। पूजा पाठ कर्मकांडों, जप-अनुष्ठानों, ध्यान धारणा की प्रक्रिया को भी उपासना कहा जाता है। 2-साधना अर्थात् अपने आप को साध लेना। जैसे चंचल घोड़े को चतुर घुड़सवार अपने काबू में रखता है वैसे मन की विचारणा एवं चिंतन प्रक्रिया को सही रास्ते पर चलाना, व्यवहार में शालीनता एवं चरित्रनिष्ठा का समावेश करना है। जब तक उपासना से प्राप्त ऊर्जा को साधना रूपी व्यवहारिकता में परिणित नहीं किया जाय तब तक साधना सार्थक नहीं होगी। 3-आराधना का क्रम इसके पश्चात आता है। आराधना का अर्थ अपने इष्टदेव को सृष्टि के कण-कण में मौजूद अनुभव करने का अभ्यास डालना। साधना के द्वारा अर्जित किए गए श्रम, समय एवं साधन का बड़ा भाग समाज के पिछड़ों, जरूरतमंदों के लिये निकालना, गिरों को उठाने, पिछड़ों को बढ़ाने, देश व समाज के लिये स्वयं को अर्पित करने के अभ्यास को आराधना कहा जाता है। इसके लिये सारा जीवन, उच्च विचार का आदर्श अपनाकर औसत नागरिक जीवन स्तर के निर्वाह में काम चलाना पड़ता है। 4-ऐसी भाव सम्वेदना उगाने वाले ही आराधना, रूपी सेवा साधना का कार्य कर सकते हैं। आत्मिक प्रगति के मार्ग में उपासना, साधना, आराधना का जीवनचर्चा में समावेश आवश्यक माना गया है। 5--आत्मोत्कर्ष की साधना के लिये शांतचित रहना आवश्यक है। इसके लिए असीम धैर्य की आवश्यकता पड़ती है। अंतर में उठते भावों-उद्वेगों को रोककर उन्हें संतुलित एवं सुनियोजित करना होता है। उपलब्धियों की आतुरता बचकानी हरकतों से बचना होता है। अंतराल की संतुलित पृष्ठभूमि पर ही शक्तियों का जागरण संभव है। 6-साधना के पूर्व विभिन्न प्रकार के उपचारों की आवश्यकता पड़ती है। शरीरगत संयम- साधना का लाभ, दीर्घकालीन स्वस्थ जीवन तथा आर्थिक तंगी से बचने के रूप में प्राप्त होता है। इस साधना द्वारा बचाई गयी बचत ऊर्जा को, संग्रहित जीवनी शक्ति को, श्रेष्ठ कार्यों में नियोजित करना संभव होता है, इसमें ओजस, तेजस व वर्चस की वृध्दि होती है। 7-व्यवहार में शालीनता अपनाकर अपनी प्रमाणिकता सिध्द की जा सकती है। व्यक्तित्व का विकास तथा प्रतिभा का निखार धर्म के रूप में हाथों हाथ प्राप्त करने का ये सर्वोत्तम विधान है। उपासना क्या है ?- 10 FACTS;- 1-उपासना के नाम पर आपने अगरबत्ती जलाकर और नमस्कार करके उसे समाप्त कर दिया होगा ।अगरबत्ती जलाकर प्रारंभ तो अवश्य करेंपरंतु समाप्त नहीं।जीवन में अध्यात्म के जो भी सिद्धांत हैं, उन्हें अवश्य धारण करने का प्रयास करना चाहिए।वास्तव में यही अध्यात्म की असली शिक्षा है। 2-उपासना माने भगवान के नजदीक बैठना ।नजदीक बैठने का भी एक असर होता है । चंदन के समीप जो पेड़-पौधे होते हैं, वह भी सुगंधित हो जाते हैं ।चंदन का एक बड़ा सा पेड़, जो हिमालय में उगा हुआ है, उससे अगर आपने संबंध जोड़ लिया,तो आप भी खुशबूदार हो गए । 3-लकड़ी , जब वह आग के संपर्क में आ जाती है, तो वह भी आग जैसी लाल हो जाती है। उसे आप नहीं छू सकते, कारण वह भी आग जैसी ही बन जाती है।नजदीक बैठना,अर्थात् समर्पण कर देना। 4-उपासना का मतलब समर्पण है। आपको भी अगर शक्तिशाली या महत्त्वपूर्ण व्यक्ति बनना है, बड़ा काम करना है, तो आपको भी समर्पण करना होगा। आप अगर शेर के बच्चे हैं, तो आपको भी शेर होना चाहिए। आप अगर घोड़े के बच्चे हैं, तो आपको घोड़ा होना चाहिए। आप अगर संत के बच्चे हैं, तो आपको संत होना चाहिए। हम भगवान् के बच्चे हैं, तो हमें भगवान् की तरह बनना चाहिए। 5-बूँद जब अपनी हस्ती समुद्र में गिराती है, तो वह समुद्र बन जाती है। यह समर्पण है। अपनी हस्ती को समाप्त करना ही समर्पण है। अगर बूँद अपनी हस्ती न समाप्त करे, तो वह बूँद ही बनी रहेगी। वह समुद्र नहीं हो सकती है। अध्यात्म में यही भगवान् को समर्पण करना उपासना कहलाती है। 6-भगवान् माने उच्च आदर्शों, उच्च सिद्धान्तों का समुच्चय। उच्च आदर्शों, उच्च सिद्धान्तों को अपने साथ मिला लेना ही उपासना कहलाती है।अपने जीवन में हमें इसी प्रकार की उपासना करनी चाहिए। 7- हमें मालूम है कि ग्वाल- बाल इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने अपनी लाठी के सहारे गोवर्धन को उठा लिया था। इसी तरह रीछ- बन्दर इतने शक्तिशाली थे कि वे बड़े- बड़े पत्थर उठाकर लाये और समुद्र में सेतु बनाकर उसे लाँघ गये थे। क्या यह उनकी शक्ति थी? नहीं ....यह भगवान् श्रीकृष्ण एवं राम के प्रति उनके समर्पण की शक्ति थी, जिसके बल पर वे इतने शक्तिशाली हो गये थे। भगवान् के साथ,मिल जाने से, जुड़ जाने से आदमी न जाने क्या से क्या हो जाता है। 8-हमें मछली पकड़ने वालों, चिड़िया पकड़ने वालों के तरीके से नहीं बनना और न इस तरह की उपासना करना, जो आटे की गोली और चावल के दाने फेंककर उन्हें फँसा लेते और पकड़ लेते हैं तथा कबाब बना लेते हैं। आप ऐसे उपासक मत बनना, जो भगवान् को फँसाने के लिए तरह- तरह के प्रलोभन फेंकता है। 9- बिजली का तार लगा हो, परन्तु उसका सम्बन्ध जनरेटर से न हो तो करेण्ट कहाँ से आयेगा? उसी तरह हमारे अंदर अहंकार, लोभ, मोह भरा हो, तो वे चीजें हम नहीं पा सकते हैं। जो भगवान् के पास हैं। अपने पिता की सम्पत्ति के अधिकारी आप तभी हो सकते हैं, जब आप उनका ध्यान रखते हों, उनके आदर्शों पर चलते हों। आप केवल यह कहें कि हम तो उन्हें पिताजी- पिताजी कहते थे तथा अपना सारा वेतन अपनी पाकेट में रखते थे और उनकी हारी- बीमारी से हमारा कोई लेना- देना नहीं था, तो फिर आपको उनकी सम्पत्ति का कोई अधिकार नहीं मिलने वाला है। 10-आपने नदी को देखा होगा कि वह कितनी गहरी होती है। चौड़ी एवं गहरी नदी को कोई आसानी से पार नहीं कर सकता है, किन्तु जब वह एक नाव पर बैठ जाता है, तो नाव वाले की सह जिम्मेदारी होती है कि वह नाव को भी न डूबने दे और वह व्यक्ति जो उसमें बैठा है, उसे भी न डुबाये। इस तरह नाविक उस व्यक्ति को पार उतार देता है। ठीक उसी प्रकार जब हम भगवान् को, नाविक के रूप में समर्पण कर देते हैं, पूरी शक्ति से उपासना में मन लगाते हैं, तो वह हमें इस भवसागर से पार कर देता है।यही है उपासना। साधना क्या है ?- 16 FACTS;- 1-साधना किसकी की जाए? भगवान् की?भगवान् को न तो किसी साधना की बात सुनने का समय है और न ही उसे साधा जा सकता है। वस्तुतः जो साधना हम करते हैं, वह केवल अपने लिए होती है और स्वयं की होती है। साधना का अर्थ होता है- साध लेना। अपने आपको सँभाल लेना, तपा लेना, गरम कर लेना, परिष्कृत कर लेना, शक्तिवान बना लेना, यह सभी अर्थ साधना के हैं। 2-साधना के संदर्भ में सर्कस के जानवरों का उदाहरण दे सकते हैं कि हाथी, घोड़े, शेर आदि जब अपने को साध लेते हैं, तो कैसे- कैसे चमत्कार दिखाते हैं। साधे गये ये जानवर अपने मालिक का पेट पालने तथा सैकड़ों लोगों का मनोरंजन करने, खेल दिखाने में समर्थ होते हैं। इन जानवरों को साध लिया गया होता है परंतु ये कैसे साधे जाते हैं ?...यह रिंगमास्टर के हण्टरों से साधे जाते हैं। वह उन्हें हण्टर मार- मारकर साधता है। 3-अगर उन्हें ऐसे ही कहा जाए कि भाईसाहब आप इस तरह का करतब दिखाइये, तो इसके लिए वे तैयार नहीं होंगे, वरन उल्टे आपके ऊपर, मास्टर के ऊपर हमला कर देंगे।साधना में भी यही होता है। 4-मनुष्य के, साधक के मन के ऊपर चाबुक मारने से, हण्टर मारने से, गरम करने से, तपाने से वह काबू में आ जाता है। इसीलिए तपस्वी तपस्या करते हैं। हिन्दी में इसे ‘साधना’ कहते हैं और संस्कृत में ‘तपस्या’ कहते हैं। यह दोनों एक ही हैं। अतः साधना का मतलब है- अपने आपको तपाना। 5-खेत की जोताई अगर ठीक ढंग से नहीं होगी, तो उसमें बोवाई भी ठीक ढंग से नहीं की जा सकेगी। अतः अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए पहले खेत की जोताई करना आवश्यक है, ताकि उसमें से कंकड़- पत्थर आदि निकाल दिए जाएँ। उसके बाद बोवाई की जाती है। कपड़ों की धुलाई पहले करनी पड़ती है, तब उसकी रँगाई होती है। बिना धुलाये कपड़ों की रँगाई नहीं हो सकती है। काले, मैले- कुचैले कपड़े नहीं रँगे जा सकते हैं। 6-उसी प्रकार से राम का नाम लेना एक तरह से रँगाई है। राम की भक्ति के लिए साफ- सुथरे कपड़ों की आवश्यकता है। माँ अपने बच्चों को गोद में लेती है, परन्तु जब बच्चा गन्दा कर देता है, तो वह उसे गोद में नहीं उठाती है। पहले उसकी सफाई करती है, उसके बाद उसके कपड़े बदलती है, तब गोद में लेती है। 7-भगवान् भी ठीक उसी तरह के हैं। वे मैले- कुचैले प्रवृत्ति के लोगों को पसन्द नहीं करते हैं। यहाँ साफ- सुथरा से मतलब कपड़े से नहीं है, बल्कि भीतर से है- अंतरंग से है। इसी को स्वच्छ रखना, परिष्कृत करना पड़ता है। तपस्या एवं साधना इसी का नाम है। अपने अन्दर जो बुराइयाँ हैं, भूले हैं, कमियाँ हैं, दोष- दुर्गुण हैं, कषाय- कल्मष हैं, उसे दूर करना व उनके लिए कठिनाइयाँ उठाना ही साधना या तपस्या कहलाती है। इसी का दूसरा नाम पात्रता का विकास है। 8-कहने का तात्पर्य यह है कि वर्षा के समय आप बाहर जो भी पात्र रखेंगे- कटोरी गिलास जो कुछ भी रखेंगे, उसी के अनुरूप उसमें जल भर जाएगा। इसी तरह आपकी पात्रता जितनी होगी, उतना ही भगवान् का प्यार, अनुकम्पा आप पर बरसती चली जाएगी। 9-घोड़ा जितना तेजी से दौड़ सकता है, उसी के अनुसार उसका मूल्य मिलता है। गाय जितना दूध देती है, उसी के अनुसार उसका मूल्यांकन होता है। अगर आपके कमण्डलु में सुराख है, तो उसमें डाला गया पदार्थ बह जाएगा। नाव में अगर सुराख है, तो नाव पार नहीं हो सकती है। वह डूब जाएगी। अतः आप अपने बर्तन को बिना सुराख के बनाने का प्रयत्न करें। इसी सुराख को बन्द करने में अपना श्रम .. लगाये । 10-वासना, तृष्णा और अहंता- यही तीन सुराख हैं, जो मनुष्य को आगे नहीं बढ़ने देते हैं। इन्हें ही भवबन्धन कहा गया है। अगर आपका मन संसार की ओर अधिक लगा हुआ है, तो आप आध्यात्मिकता की ओर कैसे बढ़ पाएँगे? फिर आपका मन पूजा- उपासना में कैसे लगेगा? आप इस दिशा में आगे कैसे बढ़ेंगे? गोली चलाने वाला अगर निशाना न साधे, तो उसका काम कैसे चलेगा? वह कभी इधर को भटके, कभी उधर को भटके, तो उससे निशाना कैसे साधा जाएगा? 11- दस जगह ध्यान रहा, तो आप विजेता नहीं बन सकते हैं। भगवान् आपको अपनाने के लिए हाथ बढ़ा रहा है, परन्तु ये तीन हथकड़ियाँ वासना, तृष्णा एवं अहंता आपको भगवान् तक पहुँचने में रुकावट पैदा कर रही हैं। आपको इनसे लोहा लेना होगा। आप अगर अपने हाथों को नहीं खोलेंगे, तो भगवान् की गोद में आप कैसे जाएँगे? 12-साधना में आपको अपने मन को समझाना होगा। अगर मन नहीं मानता है, तो आपको उसकी पिटाई करनी होगी। बैल जब खेतों में हल नहीं खींचता है तथा घोड़ा जब रास्ते पर चलने अथवा दौड़ने को तैयार नहीं होता है, तो उसकी पिटाई करनी पड़ती है। हमें अपने आपको रूई की तरह से धुनने का प्रयास करने है, जो धुनने के पश्चात् फूलकर इतनी स्वच्छ और मोटी हो जाती है कि उससे नयी चीज का निर्माण होता है। 13-भगवान् का भजन करने एवं नाम लेने के लिए अपना सुधार करना परम आवश्यक है। वाल्मीकि ने जब यह काम किया, तो भगवान् के परमप्रिय भक्त हो गये। उनकी वाणी में एक ताकत आ गयी। उसने डकैती छोड़ दी, उसके बाद भगवान् का नाम लिया, तो काम बन गया। कहने का मतलब यह है कि आप अपने आपको धोकर इतना निर्मल बना लें कि भगवान् आपको मजबूर होकर प्यार करने लग जाए। राम नाम के महत्त्व से ज्यादा आपकी जीभ का महत्त्व है। 14-आप जीभ पर कंट्रोल रखिए, तब ही काम बनेगा। जीभ पर काबू रखें, आप ईमानदारी की कमाई खाएँ, बेईमानी की कमाई न खाएँ। अपने जीवन में सादा जीवन उच्च विचार लाएँ। इस सिद्धान्त को जीवन का अंग बनाने से ही काम बनेगा। आपको खाने के लिए दो मुट्ठी अनाज और तन ढँकने के लिए थोड़ा- सा कपड़ा चाहिए, जो इस शरीर के द्वारा आप सहज ही पूरा कर सकते हैं।अगर आप अपने जीवन को शुद्ध एवं पवित्र करेंगे, तो आप भगवान् की गोदी के हकदार हो जाएँगे। ऐसा बनकर आदमी बहुत कुछ काम कर सकता है। 15-सादा जीवन के माने है- कसा हुआ जीवन। आपको अपना जीवन सादा बनाना होगा।जो आदमी महान बने, ऊँचे उठे हैं, उन सभी ने अपने आपको तपाया है। आप किसी भी महापुरुष का इतिहास उठाकर पढ़कर देखें, तो पायेंगे कि अपने को तपाने के बाद ही उन्होंने वर्चस्व प्राप्त किया और फिर जहाँ भी वे गये चमत्कार करते चले गये। 16-तलवार से सिर काटने के लिए उसे तेज करना पड़ता है, पत्थर पर घिसना पड़ता है। आपको भी प्रगति करने के लिए अपने आपको तपाना होगा, घिसना होगा ।अपने आपको अधिक से अधिक तपाएँ, अधिक से अधिक घिसें, ताकि हम ज्यादा- से समाज के काम आ सकें। समाज की सेवा करना ही हमारा लक्ष्य हो। अगर आप भी ऐसा कर सकें, तो बहुत फायदा होगा। आराधना क्या है और किसकी की जानी चाहिए?- 13 FACTS;- 1-आराधना कहते हैं- समाजसेवा को, जन कल्याण को। सेवाधर्म वह नकद धर्म है, जो हाथों हाथ फल देता है। हमें बोने और काटने की बात कभी नहीं भूलना चाहिये। कहीं से भी कोई चीज फोकट में नहीं मिलती है, चाहे वे गुरु हों या भगवान् हों। हाँ, यह हो सकता है कि बोया जाए और काटा जाए। हम मक्के का एक बीज बोते हैं, तो न जाने कितने हजार हो जाते हैं। वही बाजरे के साथ भी होता है।हमें फोकट में खाने की विद्या एवं माँगने की विद्या छोड़कर बोने और काटने की विद्या सीख चाहिये, इससे ही हमें फायदा होगा। 2-इसके लिए विधान भी है..वह एक नयी विधि है...बोने और काटने की । हमें मंत्र के महापुरश्चरण करने होंगे।जो कुछ भी "हमारे"पास है, उसे भगवान् के खेत में बो दो।तीन चीजें भगवान् की दी हुई हैं और एक चीज हमारी कमाई हुई है। 1-शरीर- स्थूल 2-बुद्धि- सूक्ष्म 3-भावना-कारण ये तीन चीजें जो भगवान् ने दी हैं। यह तीन शरीर-स्थूल ,सूक्ष्म और कारण के प्रतीक हैं। इसमें तीन चीजें भरी रहती हैं- स्थूल में श्रम, समय। सूक्ष्म में मन, बुद्धि। कारण में भावना। 3-इसके अलावा जो चौथी चीज है, वह है धन-सम्पदा जो मनुष्य कमाता है। इसे भगवान् नहीं देता है। भगवान् न किसी को गरीब बनाता है, न अमीर। भगवान् न किसी को धनवान बनाता है, न कंगाल बनाता है।यह हमारा बनाया हुआ है। 4-परंतु कहाँ बोया जाए?.... भगवान् के खेत में।परंतु भगवान् कहाँ है और उनका खेत कहाँ है?वास्तव में यह सारा विश्व ही भगवान् का खेत है। यह भगवान् विराट् है। इसे ही विराट् ब्रह्म कहते हैं। अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण ने इसी विराट् ब्रह्म का दर्शन कराया था। उन्होंने दिव्यचक्षु से उनका दर्शन कराया था। यही उन्होंने कौशल्या जी को दिखाया था।जो कुछ भी करना हो, इसी समग्र सृष्टि के लिए करना चाहिए।यही भगवान् की वास्तविक पूजा कहलाती है। इसे ही आराधना कहते हैं। 5-हमें इसी विराट् ब्रह्म के खेत में बोना चाहिए। अर्थात् जनसमाज की सेवा करनी चाहिए। जनसमाज का कल्याण करने, उसे ऊँचा उठाने, समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने में अपनी समस्त शक्तियाँ एवं सम्पदा लगा दे, फिर आगे देखना कि यह सौ गुनी हो जाएँगी। जो भी तीन-चार चीजें आपके पास हैं, उसे लगा दे, ऋद्धि-सिद्धियाँ मिल जाएँगी। यह सब आपके पीछे घूमेंगी और आप धनी बन जायेंगे । 1-दृढ़ विचार > हमारा शरीर > सूर्योदय से पहले भगवान् का नाम अर्थात् भजन >बाकी समय भगवान् का काम अर्थात् सूर्य निकलने से लेकर सूर्य डूबने तक सारा समय भगवान् के लिए /समाज के लिए लगाना। 2-बुद्धि >बुद्धि को सन्मार्ग की ओर ले जाये तथा इससे समाज, देश को ऊँचा उठाने का प्रयास करें। 3-भावना-संवेदना > केवल अपने कुटुम्बियों के लिए, बेटे-बेटी के लिए नहीं >अपनी भावना एवं संवेदना के माध्यम से इस संसार में रहने वाले व्यक्तियों के दुःखों के निवारण के लिए उपयोग करें।यह है ‘बोया एवं काटा’ का सिद्धान्त। 4-ये विचार कि हमारे पास कुछ है, तो उसे किस तरह से बाँट सकते हैं ..अगर किसी के पास दुःख है, तो उसे किस तरह से दूर कर सकते हैं। यही अपने पूरे जीवनकाल में करना चाहिए। । इसके अलावा जो भी धन हो , उसे भी भगवान् के कार्य में खर्च करें। यह है आराधना-समाज के लिए, भगवान् के लिए। 5-केवल पत्थर की मूर्ति के लिए नहीं, वरन् समाज के लिए काम करें । पत्थर की मूर्ति को भगवान् नहीं कहते हैं। समाज को ही भगवान् कहते हैं। एक दो मालियों की कहानी हैं..एक राजा ने एक बगीचा एक माली को दिया तथा दूसरा बगीचा दूसरे माली को। एक ने तो बगीचे में राजा का चित्र लगा दिया और नित्य चन्दन लगाता, आरती उतारता तथा एक सौ आठ परिक्रमा करता रहा। इसके कारण बगीचे का कार्य उपेक्षित पड़ा रहा। बगीचा सूखने लगा। 6-दूसरा माली तो राजा का नाम भी भूल गया, परन्तु वह निरन्तर बगीचे में खाद-पानी डालने, निराई करने का काम करता रहा। इससे उसका बगीचा हरियाली से भरा-पूरा होता चला गया। राजा एक वर्ष बाद बगीचा देखने आया, तो पहले वाले माली को उसने हटा दिया, जो एक सौ आठ परिक्रमा करता और आरती उतारता था। दूसरे उस माली का अभिनन्दन किया, उसे ऊँचा उठा दिया, जिसने वास्तव में बगीचे को सुन्दर बनाने का प्रयास किया था। 7-हमारा भगवान् भी उसी तरह का है। जो कुछ भी करना भगवान् के लिए करना, समाज के लिए करना।जो हम करेंगे, उसके एवज में भी हम पाते रहेंगे। आपका तो हमेशा दिल धड़कता रहता है। आपको तो भगवान् का नाम लेना सहज मालूम पड़ता है, पर भगवान् का काम करना मुश्किल पड़ता है तथा उसके लिए पैसा लगाना तो और भी मुश्किल मालूम पड़ता है।भगवान् का अनुग्रह कैसा होता है.. कहते हैं कि देवता ऊपर से फूल बरसाते हैं। आपके ऊपर भी हमेशा फूल बरसे अर्थात जिसे प्रोत्साहन, साहस, हिम्मत, प्रेरणा, उत्साह, उम्मीद कह सकते हैं। 8-भगवान् हमेशा हमारे बॉडीगार्ड के रूप में फिरता रहता है। वह कहता है कि कभी भी हिम्मत मत हारना, साहस मत खोना, किसी से डरना मत। जो तुम्हें तंग करेगा, उसे हम ठीक कर देंगे। हमारा बॉडीगार्ड आगे-आगे चलता है। हम उसके पीछे चलते हैं।हम सुरक्षित होकर मिनिस्टर के तरीके से शानदार ढंग से चलते हैं। 9-आध्यात्मिक क्षेत्र में सिद्धि पाने के लिए अनेक लोग प्रयास करते हैं, पर उन्हें सिद्धि क्यों नहीं मिलती है? साधना से सिद्धि पाने का क्या रहस्य है? इस रहस्य को न जानने के कारण ही प्रायः लोग खाली हाथ रह जाते हैं। साधना की सिद्धि होना निश्चित है। साधना सामान्य चीज नहीं है। यह असामान्य चीज है। परन्तु साधना को साधना की तरह किया जाना परम आवश्यक है। साधना कैसी होनी चाहिए इस सम्बन्ध में एक रहस्य हैं।जिसकी आप जाँच-पड़ताल कर सकते हैं। 10-आध्यात्मिक गुरु, हिमालयवासी हैं और सूक्ष्म-शरीरधारी हैं,वे प्रकाश के रूप में रहते है।वे तभी मिलते हैं जब हम चार चीजों को भगवान् के खेत में लगाते हैं।। समय, श्रम, बुद्धि-जो भगवान् से मिली है और धन वह है, जो संसार में कमाया जाता है। 11-उपासना और साधना ऐसी है कि सारी जिन्दगी भर धोबी के तरीके से अपने जीवन को धोना और अपनी कमियों को चुन-चुनकर निकालने का प्रयत्न करना । आराधना है समाज को ऊँचा उठाने के लिए ..आप अगर इन तीनों चीजों का समन्वय अपने जीवन में करेंगे, तो आपको साधना से सिद्धि अवश्य मिलेगी। 12-हम सभी के लिए ये नियम और शर्तें हैं कि आप केवल अपने तथा अपने परिवार के लिए ही खर्च मत कीजिए, वरन् कुछ हिस्सा भगवान् के लिए भी खर्च कीजिए। साथ ही बोइये और काटिये। फिर देखिये कि जीवन में क्या-क्या चमत्कार होते हैं। 13-आप जनहित में, लोकमंगल में, पिछड़ों को ऊँचा उठाने में अपना श्रम, समय, साधन लगाएँ। अगर आप इतना करेंगे, तो विश्वास रखिये आपको साधना से सिद्धि मिल सकती है। परन्तु आपको सही रूपसाधना से इन तीनों को पूरा करना होगा।तभी आपकी साधना सफल होगी।उपासना से कठिन हैं साधना और साधना से कठिन हैं आराधना परंतु असंभव कुछ भी नहीं हैं।

चार प्रकार के गुरु ;-

03 FACTS;- 1-जिनकी वाणी में जीव को उसके स्वरूप-धर्म में प्रतिष्ठित करने की गुरुता (क्षमता) है– वही ‘गुरु’ हैं| आध्यात्मिक जगत में प्रमुखतः चार प्रकार के गुरु माने जाते हैं– (A) दीक्षा-गुरु– जो वैदिक विधि से शिष्य को वैदिक मंत्र प्रदान करते हैं (B) शिक्षा-गुरु– जो सत्संग के द्वारा भक्ति का उपदेश प्रदान करते हैं (C) चैत्य-गुरु– सभी जीवों के ह्रदय में स्थित परमात्मा ही सब को अच्छे-बुरे का ज्ञान प्रदान करते हैं– वे ही सबके चैत्य-गुरु हैं| (D) पथ-प्रदर्शक गुरु– वे जो हमें यथार्थ गुरु का आश्रय दिलवाते हैं| 2-चैतन्य चरितामृत में आता है;– ''चाहे कोई ब्राह्मण हो, संन्यासी हो, अथवा किसी ने शूद्रों के कुल में ही क्यों जन्म ग्रहण किया हो– किन्तु यदि वह व्यक्ति कृष्णतत्त्व के अनुभवी हैं तो वह मनुष्यमात्र के गुरु हैं|'' 2-1-'''अपना उद्धार चाहने वाले सभी व्यक्ति चार वैष्णव सम्प्रदायों में से किसी एक में दीक्षा ले सकते हैं क्योंकि इन्हीं चार सम्प्रदायों में ही वैदिक ज्ञान तथा भक्ति अपने यथार्थ स्वरूप में प्रवाहित होती है– (1) ब्रह्म सम्प्रदाय (2) श्रीसंप्रदाय (3) रूद्र संप्रदाय (4) कुमार संप्रदाय 2-2-‘ भगवान् वामन, ब्रह्मा जी, अनंत-शेष एवं सनकादी चार कुमार भगवान् विष्णु के आदेश से कलि युग में ब्राह्मणों के कुल में जन्म लेंगे| विष्णुस्वामी वामन के अंश से, मध्वाचार्य ब्रह्मा जी के अंश से, रामानुजाचार्य अनंत-शेष के अंश से एवं निम्बादित्य सनक के अंश से कलियुग में प्रकट हो चार वैष्णव-सम्प्रदायों के प्रवर्तक होंगे| यह सभी विक्रमी संवत के प्रारम्भ से ही चारों दिशाओं को पवित्र कर देंगे|

2-2-‘ भगवान् वामन, ब्रह्मा जी, अनंत-शेष एवं सनकादी चार कुमार भगवान् विष्णु के आदेश से कलि युग में ब्राह्मणों के कुल में जन्म लेंगे| विष्णुस्वामी वामन के अंश से, मध्वाचार्य ब्रह्मा जी के अंश से, रामानुजाचार्य अनंत-शेष के अंश से एवं निम्बादित्य सनक के अंश से कलियुग में प्रकट हो चार वैष्णव-सम्प्रदायों के प्रवर्तक होंगे| यह सभी विक्रमी संवत के प्रारम्भ से ही चारों दिशाओं को पवित्र कर देंगे| 2-3- कलियुग में जो मनुष्य इन चार वैष्णव-सम्प्रदायों में दीक्षा से विहीन होते हैं– उनके द्वारा जपे हुए मन्त्र इत्यादि सभी निष्फल होते हैं| अत: कलियुग में अपना कल्याण चाहने वाले सभी मनुष्यों को इन्हीं चार सम्प्रदायों में मन्त्र-दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए|’' 2-4- आठवीं शदी के दार्शनिक एवं अद्वैतवेदान्त के प्रतिपादक शंकराचार्य स्मार्त सम्प्रदाय के संस्थापक थे।वैष्णव धर्म की स्थापना करने वाले चार आचार्यों ने चार सम्प्रदायों की स्थापना की।इनसे सबसे पहले शंकराचार्य ने अद्वैत सम्प्रदाय की स्थापना की थी, जो अद्वैतवाद कहलाता है। उन आचार्यों के नाम हैं;- 1-रामानुजाचार्य>श्री सम्प्रदाय 2-मध्वाचार्य,> ब्रह्म सम्प्रदाय 3-विष्णुस्वामी> शुद्धाद्वैतवाद 4-निम्बार्काचार्य>‘द्वैताद्वैतवाद’ 2-5-रामानुजाचार्य (1017-1137 ई॰): रामानुजाचार्य ने श्री सम्प्रदाय की स्थापना की। इन्होंने हिन्दी को अपने प्रचार का माध्यम बनाया। उनका दर्शन विशिष्टाद्वैत है, इसलिए विशिष्टाद्वैतवाद कहलाता है। मध्वाचार्य (13वीं शताब्दी) ने ब्रह्म सम्प्रदाय की स्थापना की। उनका दार्शनिक मत है ..द्वैतवाद। 2-6-विष्णु स्वामी ने रुद्र सम्प्रदाय का प्रर्वतन किया। उनका दार्शनिकमत शुद्धाद्वैतवाद कहलाता है।निम्बार्कचार्या ने हंस या सनकादि सम्प्रदाय की स्थापना की। उनका दार्शनिक मत ‘द्वैताद्वैतवाद’ कहलाता है, जिसे भेदाभेदवाद भी कहा जाता है। उन्होंने कृष्ण को विष्णु का अवतार माना है। रचनाएँ : ब्रह्मसूत्रा, उपनिषद् और गीता की टीका। 3-कलियुग में आगम की पूजापद्धति विशेष उपयोगी तथा लाभदायक मानी जाती हैं| महानिर्वाण तंत्र' के अनुसार कलियुग में वैष्णव मंत्र विषहीन सर्प की भांति निष्फल है क्योंकि कलियुग में प्राणी मेध्य (पवित्र) तथा अमेध्य (अपवित्र) के विचारों से बहुधा हीन होते हैं और इन्हीं के कल्याणार्थ महादेव ने आगमों का उपदेश पार्वती को स्वयं दिया|

......SHIVOHAM....

2-3- कलियुग में जो मनुष्य इन चार वैष्णव-सम्प्रदायों में दीक्षा से विहीन होते हैं– उनके द्वारा जपे हुए मन्त्र इत्यादि सभी निष्फल होते हैं| अत: कलियुग में अपना कल्याण चाहने वाले सभी मनुष्यों को इन्हीं चार सम्प्रदायों में मन्त्र-दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए|’' 3-कलियुग में आगम की पूजापद्धति विशेष उपयोगी तथा लाभदायक मानी जाती हैं| महानिर्वाण तंत्र' के अनुसार कलियुग में वैष्णव मंत्र विषहीन सर्प की भांति निष्फल है क्योंकि कलियुग में प्राणी मेध्य (पवित्र) तथा अमेध्य (अपवित्र) के विचारों से बहुधा हीन होते हैं और इन्हीं के कल्याणार्थ महादेव ने आगमों का उपदेश पार्वती को स्वयं दिया|

......SHIVOHAM....