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उपासना, साधना और आराधना की त्रिवेणी का रहस्य क्या है ?आपकी साधना कैसे सफल हो सकती हैं ?


आध्यात्मिक साधना का सारा का सारा माहौल तीन टुकड़ों में बँटा हुआ है । ये हैं.. 1-उपासना 2-साधना 3-आराधना उपासना, साधना और आराधना की त्रिवेणी क्या है ;- 07 FACTS;- 1-उपासना, साधना और आराधना की त्रिवेणी ही साधक को लक्ष्य तक पहुंचा सकती है, उपासना अर्थात् उपआसन अर्थात अभीष्ट इष्ट के सान्निध्य में, संपर्क में रहने, बैठने का अभ्यास। पूजा पाठ कर्मकांडों, जप-अनुष्ठानों, ध्यान धारणा की प्रक्रिया को भी उपासना कहा जाता है। 2-साधना अर्थात् अपने आप को साध लेना। जैसे चंचल घोड़े को चतुर घुड़सवार अपने काबू में रखता है वैसे मन की विचारणा एवं चिंतन प्रक्रिया को सही रास्ते पर चलाना, व्यवहार में शालीनता एवं चरित्रनिष्ठा का समावेश करना है। जब तक उपासना से प्राप्त ऊर्जा को साधना रूपी व्यवहारिकता में परिणित नहीं किया जाय तब तक साधना सार्थक नहीं होगी। 3-आराधना का क्रम इसके पश्चात आता है। आराधना का अर्थ अपने इष्टदेव को सृष्टि के कण-कण में मौजूद अनुभव करने का अभ्यास डालना। साधना के द्वारा अर्जित किए गए श्रम, समय एवं साधन का बड़ा भाग समाज के पिछड़ों, जरूरतमंदों के लिये निकालना, गिरों को उठाने, पिछड़ों को बढ़ाने, देश व समाज के लिये स्वयं को अर्पित करने के अभ्यास को आराधना कहा जाता है। इसके लिये सारा जीवन, उच्च विचार का आदर्श अपनाकर औसत नागरिक जीवन स्तर के निर्वाह में काम चलाना पड़ता है। 4-ऐसी भाव सम्वेदना उगाने वाले ही आराधना, रूपी सेवा साधना का कार्य कर सकते हैं। आत्मिक प्रगति के मार्ग में उपासना, साधना, आराधना का जीवनचर्चा में समावेश आवश्यक माना गया है। 5--आत्मोत्कर्ष की साधना के लिये शांतचित रहना आवश्यक है। इसके लिए असीम धैर्य की आवश्यकता पड़ती है। अंतर में उठते भावों-उद्वेगों को रोककर उन्हें संतुलित एवं सुनियोजित करना होता है। उपलब्धियों की आतुरता बचकानी हरकतों से बचना होता है। अंतराल की संतुलित पृष्ठभूमि पर ही शक्तियों का जागरण संभव है। 6-साधना के पूर्व विभिन्न प्रकार के उपचारों की आवश्यकता पड़ती है। शरीरगत संयम- साधना का लाभ, दीर्घकालीन स्वस्थ जीवन तथा आर्थिक तंगी से बचने के रूप में प्राप्त होता है। इस साधना द्वारा बचाई गयी बचत ऊर्जा को, संग्रहित जीवनी शक्ति को, श्रेष्ठ कार्यों में नियोजित करना संभव होता है, इसमें ओजस, तेजस व वर्चस की वृध्दि होती है। 7-व्यवहार में शालीनता अपनाकर अपनी प्रमाणिकता सिध्द की जा सकती है। व्यक्तित्व का विकास तथा प्रतिभा का निखार धर्म के रूप में हाथों हाथ प्राप्त करने का ये सर्वोत्तम विधान है। उपासना क्या है ?- 10 FACTS;- 1-उपासना के नाम पर आपने अगरबत्ती जलाकर और नमस्कार करके उसे समाप्त कर दिया होगा ।अगरबत्ती जलाकर प्रारंभ तो अवश्य करेंपरंतु समाप्त नहीं।जीवन में अध्यात्म के जो भी सिद्धांत हैं, उन्हें अवश्य धारण करने का प्रयास करना चाहिए।वास्तव में यही अध्यात्म की असली शिक्षा है। 2-उपासना माने भगवान के नजदीक बैठना ।नजदीक बैठने का भी एक असर होता है । चंदन के समीप जो पेड़-पौधे होते हैं, वह भी सुगंधित हो जाते हैं ।चंदन का एक बड़ा सा पेड़, जो हिमालय में उगा हुआ है, उससे अगर आपने संबंध जोड़ लिया,तो आप भी खुशबूदार हो गए । 3-लकड़ी , जब वह आग के संपर्क में आ जाती है, तो वह भी आग जैसी लाल हो जाती है। उसे आप नहीं छू सकते, कारण वह भी आग जैसी ही बन जाती है।नजदीक बैठना,अर्थात् समर्पण कर देना। 4-उपासना का मतलब समर्पण है। आपको भी अगर शक्तिशाली या महत्त्वपूर्ण व्यक्ति बनना है, बड़ा काम करना है, तो आपको भी समर्पण करना होगा। आप अगर शेर के बच्चे हैं, तो आपको भी शेर होना चाहिए। आप अगर घोड़े के बच्चे हैं, तो आपको घोड़ा होना चाहिए। आप अगर संत के बच्चे हैं, तो आपको संत होना चाहिए। हम भगवान् के बच्चे हैं, तो हमें भगवान् की तरह बनना चाहिए। 5-बूँद जब अपनी हस्ती समुद्र में गिराती है, तो वह समुद्र बन जाती है। यह समर्पण है। अपनी हस्ती को समाप्त करना ही समर्पण है। अगर बूँद अपनी हस्ती न समाप्त करे, तो वह बूँद ही बनी रहेगी। वह समुद्र नहीं हो सकती है। अध्यात्म में यही भगवान् को समर्पण करना उपासना कहलाती है। 6-भगवान् माने उच्च आदर्शों, उच्च सिद्धान्तों का समुच्चय। उच्च आदर्शों, उच्च सिद्धान्तों को अपने साथ मिला लेना ही उपासना कहलाती है।अपने जीवन में हमें इसी प्रकार की उपासना करनी चाहिए। 7- हमें मालूम है कि ग्वाल- बाल इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने अपनी लाठी के सहारे