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यंत्र का क्या रहस्य है ?क्या 'श्रीयंत्र' सभी देवी देवता का आधार तथा निवास स्थान है ?क्या है


यंत्र क्या है ?- 05 FACTS;- 1-यंत्र, मंत्र एवं तंत्र शास्त्र को एक पूर्ण विकसित आध्यात्मिक विज्ञान की संज्ञा दी जा सकती है। जिसका उद्देश्य शरीर, मन एवं आत्मा के विकास में एक संतुलन स्थापित करना तथा मनुष्य का भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास करना है। यदि मंत्रों को वैदिक रीति से पूर्ण शुद्धता एवं श्रद्धा के साथ उच्चारित किया जाता है तो इनके उच्चारण से निकलने वाली तरंगे उस दैवीय शक्ति के तरंगों से संपर्क स्थापित कर सकती है जिसको प्रसन्न करने के लिये ये मंत्र उच्चारित किये जाते हैं। 2- हमारे ऋषियों को इन तरंगों की जानकारी थी तथा उन्होंने मंत्रों के माध्यम से इन तरंगों का उपयोग मनुष्य की आध्यात्मिक विकास एवं मानसिक शान्ति के लिये किया। मंत्रों का यदि विधिवत रूप से उच्चारण किया जाए तो इनसे निकलने वाली तरंगे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाती है और मानव शरीर से निकलने वाली तरंगे संबंधित दैवीय तरंगों के संपर्क में आकर मानव मस्तिष्क एवं शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। तथा शब्दों के क्रम का विपर्याय होने पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने लगता है। 3-यंत्रों को सक्रिय एव शक्तिपूर्ण बनाने की क्षमता भी मंत्रों में ही हैं। उसके बिना यंत्र आकार मात्र रह जाऐंगे। यंत्र: मंत्रों की एक रेखाचित्र के माध्यम से अभिव्यक्ति को यंत्र कहते हैं। जिस प्रकार मानव शरीर विशालकाय ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप है। उसी प्रकार विशालकाय ब्रह्मांड को सूक्ष्म रूप में अभिव्यक्त करने के लिये ये यंत्र बनाये जाते हैं। 4-यहां यह उल्लेखनीय है कि मंत्रों एवं यंत्रों का आविष्कार किसने किया है यह कहना बहुत कठिन है क्योंकि इसका कहीं पर भी उल्लेख नहीं मिलता है। चूंकि इन यंत्रो का उल्लेख वेदों एवं पुराणों में मिलता है और वेदों के बारे में कहा जाता हैं कि वे अपौरूपेय है इसलिए उनमें मंत्रों के रचयिताओं का इतिहास और जीवनवृत न होकर जीवन दर्शन और रहस्य सूत्र रूप में ही निरूपित हुआ है। जो कि भाषा और शब्दों की श्लेष शक्ति का पूर्ण समावेश है। अतः यंत्र एवं मंत्रों का रचना भी दैविय शक्तियों द्वारा ही की गई है। इन मंत्रों का रहस्योदघाटन हमारे ऋषि एवं मुनियों ने किया है। जिससे आम आदमी इनका लाभ उठा सके। 5-यंत्र विशिष्ट देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली ऐसी आकृतियां होती हैं जो आकृति, क्रिया तथा शक्ति नामक तीन सिद्धांतों के आधार पर संयुक्त रूप से कार्य करती है। शास्त्रों में यंत्रों को देवी-देवताओं का निवास स्थान माना गया है। जब यंत्रों का निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा शास्त्रोक्त विधि द्वारा की गई हो और साधक पूर्ण विश्वास तथा श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करता हो तो यंत्र-साधना करने वालों को सुख-ऐश्वर्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यंत्र में कितनी दिव्य शक्ति विद्यमान है?- 09 FACTS;- 1-भिन्न प्रकार के यंत्रों की रेखाएं, बीजाक्षर और बीजांक दिव्य शक्तियों से प्रभावित होते हैं। रेखाओं की आकृति, क्रम व अंकों और अक्षरों के आधार पर ही यंत्र को कोई विशिष्ट नाम दिया जाता है। इसमें अंकित अंक और अक्षर देवता से संबंधित बीजांक शक्ति का प्रतीक होते हैं। 2-यंत्र व मंत्र एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों ही अलौकिक हैं। अलौकिक शक्ति से परिपूर्ण होने की वजह से ये इंसान की इच्छा-पूर्ति करने में समर्थ है। यंत्र-साधना में विश्वास और श्रद्धा के साथ-साथ साधना का सर्वांगीण ज्ञान भी आवश्यक है। तभी दिव्य यंत्रों का चमत्कार हम पा सकते हैं। 3-जिस प्रकार मंत्रों में ध्वनि तरंगों की आकृति का महत्व है, उसी प्रकार यंत्रों में बिंदु, रेखा, त्रिकोण, वृत्त, चतुर्भुज इत्यादि का विशिष्ट महत्व होता है। तांत्रिक साधनाओं में यंत्र-साधना का बड़ा महत्व है। साधारण भाषा में यंत्र का तात्पर्य मशीन से होता है। 4-जिस तरह देवी-देवताओं की मूर्ति पूजा की जाती है और उन मूर्तियों से लोगों की आस्था और श्रद्धा जुड़ी होती है, उसी तरह यंत्र भी किसी देवी या देवता के प्रतीक होते हैं। इनकी रचना ज्यामितीय होती है। यंत्र में सारी दैवीय शक्तियां सूक्ष्म रूप से विद्यमान होती है। यंत्र आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विभिन्न देवी-देवताओं के रंग-रूप के रहस्य होते हैं। इसीलिए साधनाओं के माध्यम से इनमें जितनी शक्ति उत्पन्न की जाती है, यंत्र उतने ही चमत्कारी होते हैं। 5-यंत्र विभिन्न आकृतियों का रेखा समूह मात्र होता है जबकि वास्तविकता यह है कि यंत्र का प्रत्येक आकार एक विशेष देवता और तत्व की शक्ति का प्रतीक होता है।सिद्धयंत्र जो आड़ी, तिरछी रेखाओं, बिंदुओं, अंकों, चतुर्भुजों, त्रिकोण आदि से पूरित होते हैं वास्तव में इन्हीं चिह्नों से संचालित होते हैं। इन यंत्रों को यही कल पुर्जे चलाते हैं। 6-भौतिक यंत्र की कार्य-संरचना दिखाई पड़ती है और उसको देखकर मनुष्य प्रभावित होता है जबकि यंत्र मनुष्य की जीवनशैली बदलकर अपना प्रभाव दिखाते हैं। यंत्रों में बहुत शक्ति होती है। यह असंभव कार्य को भी संभव करके दिखाने की शक्ति रखते हैं। यंत्रों की शक्ति इनमें अंकित चिह्न एवं यंत्रों के द्वारा जागृत होती है। मंत्रों के कंपन से सृष्टि के सब पदार्थ बनते हैं और बिगड़ते हैं, यह विज्ञान भी कहता है। इस कारण से मंत्रों में शक्ति होती है। 7-कालांतर में हमारे ऋषियों-मुनियों ने देखा कि दुष्ट लोग भी मंत्रों के माध्यम से घृणित कार्य कर लेते हैं तो इन्होंने इस मंत्र शक्ति को गुप्त रखने के लिए मंत्रों, रेखाओं, चिह्नों से पूरित कर यंत्रों की रचना की जिससे मंत्रों का दुरुपयोग न हो सके, वास्तव में यंत्र भी इलेक्ट्राॅनिक यंत्रों के जैसे सर्किट होते हैं जो देखने में आड़ी-तिरछी रेखाएं होती हैं परंतु उनका जानकार इंजीनियर उन्हीं के माध्यम से रेडियो, टी.वी., कम्प्यूटर आदि का प्रयोग कर लेता है और सामान्यजन को लाभ पहुंचा देता है। 8-यदि ग्रह पृथ्वी तत्व राशि (2, 6, 10) राशि में है तो यंत्र आदि से लाभ मिलता है। ग्रह यदि वायु तत्व (3, 7, 11) राशि में है तो मंत्र जाप करने से लाभ मिलता है और ग्रह यदि जल तत्व (4, 8, 12) राशि में है तो वस्तुओं को पानी में बहाने से लाभ मिलता है। योग कारक ग्रह यदि निर्बल हो, तो यंत्र-धातु से उपचार करें, अशुभ और मारक ग्रहों का उपाय पूजा-पाठ-दान ग्रह की वस्तु को बहाकर करना चाहिए। 9-यंत्रों में मुख्यतः 5 प्रकार की आकृतियों या रेखाचित्रों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात बिंदु, वृत, त्रिकोण, वर्ग एवं षटकोण। बिंदु क्या हैं?- 04 FACTS;- 1-बिंदु आकाश तत्व का द्योतक है। बिंदु प्रत्येक आकार का आधार एवं आरंभ इंगित करता है। दूसरे शब्दों में बिंदु के बिना किसी आकार का आरंभ व अंत निश्चित करना कठिन ही नहीं वरन् असंभव है। 2- बिंदु के अंदर नैसर्गिक गतिशीलता होती है जिसके आधार पर यह प्रत्येक आकार एवं तत्व में अनुप्रविष्ठ होता है। बिंदु को आकाश की संज्ञा दी जाती है क्योंकि पृथ्वी पर स्थित समस्त चर अचर जगत का आरंभिक बिंदु या जड़ आकाश ही है। बिंदु एक प्रकार की शक्ति है जो कि ऊर्जा प्रवाहित करती है। ये बिंदु किसी भी यंत्र का केंद्र होती है। 3-तंत्र शास्त्र में बिंदु को साक्षात शिव की संज्ञा दी गई है जो कि समस्त शक्तियों का स्रोत है। किसी भी यंत्र के मध्य में स्थित बिंदु विभिन्न रेखाचित्रों से घिरी रहती है ये रेखाचित्र विभिन्न दैवीय शक्तियों को दर्शाते हैं तथा बिंदु इनकी शक्ति के स्रोत के रूप में दिखाई जाती है। सरल रेखा: एक बिंदु को जब दूसरे बिंदुओं से मिलाते हैं तो सरल रेखा बनती है। 4-वस्तुतः रेखाएं बिंदु पथ ही है। ये दो बिंदु परमात्मा एक जीवात्मा, सुख-दुख, रात्री दिवस आदि को इंगित करते हैं। इस प्रकार सरल रेखा इंगित करता है कि जीवात्मा एवं परमात्मा, सुख दुख आदि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं तथा इन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में सरल रेखा यह इंगित करती है कि जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है। वृत्त क्या हैं?- 02 FACTS;- 1-वृत की कल्पना करते ही एक चक्राकार आकृति आंखों के सामने उभर कर आती है। जब एक बिंदु के चारो ओर दूसरी बिदु को घुमाया जाए तो उसकी चक्राकार गति होती है। इस चक्राकार गति को प्राकृतिक जगत में घूर्णन क्रिया कहते हैं। 2-वायु सदैव चलायमान है अतः वृत वायु तत्व बन प्रतिनिधित्व करता है। त्रिकोण क्या हैं?- 03 FACTS;- 1-त्रिकोण को वैदिक साहित्य में अत्यधिक महत्ता दी गई है। देखा जाए तो त्रिकोण वह पहला द्वि आयामी रेखाचित्र है जो कि एक स्थान को घेरता है। 2--उघ्र्व मुखी त्रिकोण;- अग्नि तत्व का बोध कराता है क्योंकि अग्नि की गति सदैव अघ्र्वमुखी होती है। यह त्रिकोण उन्नति एवं प्रगति का द्योतक है। वैदिक साहित्य में इसे शिव की संज्ञा दी जाती है। इसका ऊपर से संकरा तथा नीचे से फैला होना ये इंगित करता है कि जीवात्मा का जड़ आकाश में है तथा इसका विस्तार पृथ्वी पर होता है। 3-अधोमुखी त्रिकोण: - जल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। जल के बिना जीवन असंभव है। जल की गति अधोमुखी होती है। इसका नीचे से संकरा तथा ऊपर से फैला होना जीवात्मा का पांच तत्वो के माध्यम से पृथ्वी पर फैलाव एवं इसका सांसारिक जगत में बहुत गहरे तक उलझना इंगित करता है। वर्ग क्या हैं? - 1-किसी भी यंत्र की बाहरी सीमा आम तौर पर वर्गाकार होती है तथा इसका आरंभ मध्य बिंदु से होता है। इस प्रकार प्रत्येक यंत्र ब्रह्मांड के विकास को सूक्ष्म रूप में प्रस्तुत करता है जो कि आकाश से आरंभ होकर पृथ्वी पर पूर्ण विकसित होता है। वर्गाकार रेखाचित्र पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है क्योंकि विस्तार पृथ्वी का गुण है या दूसरे शब्दों में आकाश से आई ऊर्जा का विकास पृथ्वी पर ही होता है। अतः चतुर्भुज बिंदु का चारों दिशाओं में फैलाव पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। तांत्रिकों के क्षेत्र में सूर्य योग के द्वारा ही आकाशीय शक्ति में से भौतिक पदार्थों का सृजन किया जाता है। षट कोणक्या हैं? - 03 FACTS;- 1-उध्र्वामुखी एवं अधोमुखी त्रिकोण से मिलकर बनने वाला षटकोण शिव एवं शक्ति दोनों के संयोग को प्रदर्शित करता है। इसके बिना संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इन षटकोणों के मध्य में स्थित खाली स्थानों को यंत्रों में शिव एवं शक्ति का क्रीडा स्थल माना जाता है। इसी कारण इन खाली स्थानों में विभिन्न अंक या मंत्र इस प्रकार लिखे जाते हैं जिससे कि इन दोनों की कृपा एवं आशिर्वाद प्राप्त किया जा सके। 2-यंत्रों में उपर्युक्त आकृतियों का प्रयोग विभिन्न प्रकार से किया जाता है तथा ब्रह्मांड के विशालकाय रूप को सूक्ष्म रूप में दर्शाया जाता है। इन आकृतियों का विभिन्न यंत्रों में विभिन्न शक्तियों के आवाहन लिए भिन्न-भिन्न रूप से प्रयोग किया गया है तथा इनमें प्रयुक्त किये जाने वाले मंत्रों एवं अंको का चयन भी संबंधित शक्ति के अनुसार ही किया गया है। यंत्र एवं ध्यान ;- 02 FACTS;- 1-यह माना जाता है कि जब कोई व्यक्ति मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित यंत्र पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है तो उसका मष्तिष्क एवं शरीर उस यंत्र की आकार शक्ति से प्रभावित होता है और धीरे-धीरे व्यक्ति को संबंधित शक्तियों की कृपा एवं आशिर्वाद प्राप्त होने लगता है। इस प्रकार यंत्र एवं मंत्र ब्रह्मांड में स्थित विभिन्न शक्तियों तक पहुंचने का या उनका आवाहन करने का एक सशक्त माध्यम है। 2-यदि इन यंत्रों को विधिवत प्रकार से अभिमंत्रित करके इनकी पूजा अर्चना की जाए तथा इन पर ध्यान केन्द्रित किया जाये तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये हमें संबंधित शक्तियों की कृपा का पात्र बन सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र में यंत्र;- 02 FACTS;- 1-ज्योतिष शास्त्र में यंत्र, मंत्र एवं तंत्र के अतिरिक्त बहुत सी दुर्लभ सामग्रियों जैसे औषधि, रत्न, रंगो एवं पदार्थों का भी अत्यधिक महत्व है। संपूर्ण ब्रह्मांड में स्थित सभी तत्व परस्पर संबंधित है। अतः एक ग्रह द्वारा मनुष्य ही नहीं वरन ब्रह्मांड के अनेक दूसरे तत्व भी नियंत्रित होते हें। 2-इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र में यदि किसी ग्रह से संबंधित किसी तत्व की मानव जीवन में कमी पाई जाती है तो उसे परस्पर संबंध के सिद्धांत के आधार पर उस ग्रह से नियंत्रित अन्य तत्वों का प्रयोग करके पूरा करने का प्रयास किया जाता है।

यंत्र किस सिद्धांत पर कार्य करते हैं?-

06 FACTS;-

1-यंत्र देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसी लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त करने के लिए यंत्र-साधना को सबसे सरल विधि माना जाता है। तंत्र के अनुसार यंत्र मंत्र चमत्कारिक दिव्य शक्तियों का निवास होता है। यंत्र सामान्यतः ताम्रपत्र पर बनाए जाते हैं। इसके अलावा यंत्रों को तांबे, चांदी, सोने और स्फटिक में भी बनाया जाता है। ये चारों ही पदार्थ कास्मिक तरंगे उत्पन्न करने और ग्रहण करने की सर्वाधिक क्षमता रखते हैं। कुछ यंत्र भोज-पत्र पर भी बनाए जाते हैं। यंत्र मुख्यतः तीन सिद्धांतों का संयुक्त रूप हैं- आकृति रूप, क्रिया रूप, शक्ति रूप ।

2-ऐसी मान्यता है कि वे ब्रह्मांड के आंतरिक धरातल पर उपस्थित आकार व आकृति का प्रतिरूप हैं। जैसा कि सभी पदार्थों का बाहरी स्वरूप कैसा भी हो, उसका मूल अणुओं का परस्पर संयुक्त रूप ही हैं। इस प्रकार यंत्र में, विश्व की समस्त रचनाएं समाहित हैं। यंत्र को विश्व-विशेष को दर्शाने वाली आकृति कहा जा सता हैं। ये सामान्य आकृतियां ब्रह्ममांड से नक्षत्र का अपनी एक विशेष आकृति रूप-यंत्र होता हैं।

3-यंत्रों की प्रारंभिक आकृतियां मनोवैज्ञानिक चिन्ह हैं जो मानव की आंतरिक स्थिति के अनुरूप उसे अच्छे बुरे का ज्ञान, उसमें वृद्धि या नियंत्रण को संभव बनाती हैं। इसी कारण यंत्र क्रिया रूप हैं।‘‘यंत्र’’ की निरंतर निष्ठापूर्वक पूजा करने से ‘आंतरिक सुषुप्तावस्था समाप्त होकर आत्मशक्ति जाग्रत होती हैं और आकृति और क्रिया से आगे जाकर‘‘शक्ति रूप उत्पन्न होता हैं। जिससे स्वतः उत्पन्न आंतरिक परिवर्तन का मानसिक अनुभव होने लगता हैं। इस स्थिति पर आकर सभी रहस्य खुल जाते हैं।

4- मनुष्य अपनी जिज्ञासु प्रवृति के कारण प्रकृति एवं ब्रह्मांड के रहस्यों

के बारे में जानने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा है। यह भी सर्वमान्य एवं सर्वविदित है कि ब्रह्मांड में स्थित समस्त चर अचर जगत में आपसी संबंध है तथा समस्त ब्रह्मांड एक लयबद्ध तरीके से निश्चित नियमों के आधार पर कार्य करता है।

5-भारतीय वैदिक शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मांड की समस्त क्रियायें ब्रह्मांड में स्थित विभिन्न शक्तियों द्वारा संचालित की जाती है। चूंकि मनुष्य भी इसी ब्रह्मांड का एक प्रमुख भाग है अतः मानव जीवन भी बहुत हद तक इन्ही शक्तियों द्वारा नियंत्रित एवं संचालित किया जाता है। ये शक्तियां मनुष्यों के जीवन को उनके कर्मों के अनुसार नियंत्रित एवं निर्देशित करती है।

6-अतः मानव जीवन के संचालन में इन शक्तियों की अहम भूमिका होती है। भारतीय वैदिक साहित्य में ऐसी अनेक विधियों का वर्णन मिलता है जिसके माध्यम से इन शक्तियों का आवाहन किया जा सकता है तथा इनकी कृपा एवं आशिर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।

यह हैं यंत्रों के संक्षिप्त शब्द व अंक;--

02 FACTS;-

1-यंत्रों के संक्षिप्त शब्द एवं अंक वास्तव में देवी और देवता होते हैं जैसे कि विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि भ्2व् का अर्थ है अर्थात पानी जबकि सामान्यजन नहीं जान पाते हैं इसी प्रकार यंत्रों में उल्लिखित शब्द ह्रीं, क्रीं, श्रीं और क्लीं का क्या अर्थ है एक ज्योतिषी या तांत्रिक ही जान सकता है यह सब देवी के संक्षिप्त नाम हैं जैसे ह्रीं का अर्थ बगलामुखी देवी, क्रीं का अर्थ महाकाली से, श्रीं का अर्थ महालक्ष्मी से, क्लीं का अर्थ भगवती दुर्गा से है।

2-इसी प्रकार से यंत्रों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले चिह्न बिंदु का अर्थ ब्रह्म से, त्रिकोण का अर्थ है शिव एवं भूपूर का अर्थ भगवती से होता है।

यंत्र, मंत्र एवं तंत्र शास्त्र क्या है ?-

09 FACTS;-

1-प्राचीन काल से ही, भारतीय संस्कृति में सुख-समृद्धि, दीर्घजीवन, एवं अच्छे स्वास्थ्य के लिए, यंत्र, तंत्र-मंत्र का महत्वपूर्ण स्थान रहा हैं। विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक महत्व की आकृतियों यंत्र के रूप में, सोने, चांदी, तांबा, अष्टधातु अथवा भोज पत्र पर विभिन्न शक्तियों को जाग्रत करने के लिए बनाई जाती हैं।

2-यह भी मान्यता रही है कि जो मंदिर यंत्र आधारित होते हैं, वे अपना विशेष धार्मिक महत्व रखते हैं।हिंदु संस्कृति में मंदिर जो कि देवी-देवताओं के पूजा स्थल होते हैं, इनका निर्माण वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है। मंदिरों के स्थान का चयन, मूर्ति स्थापना मंदिरों के उपर स्थित गुंबद एवं ध्वजा आदि सभी का निर्माण वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार किया जाता है जिससे वहां पर अधिक से अधिक आध्यात्मिक एवं दैवीय कृपा आ सके।

3-हिंदु संस्कृति में देवी देवताओं को आवाहन करने के अनेक तरीके बताए गये हैं। पूजा करते समय बैठने का ढंग ईश्वर के सामने दंडवत, नतमस्तक होना एक स्थान पर ध्यान केंद्रित करना श्वास प्रक्रिया आत्म नियंत्रण आदि ईश्वर की आराधना के मूलभूत तरीके हैं। इनके माध्यम से मनुष्य ईश्वर के समक्ष स्वयं के शरीर एवं मन को पूर्ण रूप से समर्पित करता है। यह कहना अत्यंत सरल है। परंतु इसका पालन करना कठिन होता है। सही अर्थो में देखा जाए तो शरीर एवं मन का ईश्वर को पूर्णतः समर्पण सबसे बड़ा साधन कहा जा सकता है।

4-यदि हम इसमें सफल हो जाते हैं तो दैवीय शक्तियों की कृपा पात्र अवश्य बनते हैं इसमें कोई संशय नहीं है। इस प्रकार कोई भी पूजा एवं अर्चना तब तक पूरा फल नहीं देती है जब तक कि आराधक या याचक इसे पूर्ण शुद्धि एवं गहनता से नही करे तथा अपने आप को ईश्वर के चरणों में पूर्णतः समर्पित न करे। क्योंकि जरा भी अहंकार साधक की संपूर्ण शक्ति का क्षय कर देता है। यह समस्त ब्रह्मांड शिव एवं शक्ति के सहयोग से संचालित होता है।

5-शिव का अर्थ संक्षेप में ब्रह्मांड में स्थित ऊर्जा से है जिसका कोई स्वरूप नही है। जबकि प्रकृति साक्षात शक्ति है तथा ब्रह्मांड में स्थित ऊर्जा को स्वरूप प्रकृति में स्थित पांच तत्वों के सहयोग से ही मिल पाता है। इन दोनों में से एक भी अभाव में साकार संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। शिव के बिना शक्ति बलहीन है तथा शक्ति के बिना निर्गुण, निराकार शिव स्वरूप हीन व आकार हीन है। अतः यह संसार शिव एवं शक्ति दोनों के सहयोग से ही संचालित होता है।

6-मानव शरीर इसी ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप कहा जा सकता है तथा यह भी शिव (आत्मा) एवं शक्ति के संयोग से ही संचालित होता है। इस प्रकार मानव शरीर में स्थित आत्मा शिव द्वारा नियंत्रित होती है जबकि मानव शरीर एवं मष्तिष्क प्रकृति जिसको कि महामाया भी कहा जाता है द्वारा संचालित होते है।

7-इस प्रक्रिया में शिव रूप अनेक बार गौण हो जाता है तथा मस्तिष्क एवं शरीर का वर्चस्व हो जाता है जिससे आत्मा को कर्म बंधन में बंधकर जन्म-मरण की प्रक्रिया से बार-बार गुजरना पड़ता है तथा अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। अतः मानव जीवन के संतुलित रूप से संचालन हेतु शिव एवं शक्ति में संतुलन होना आवश्यक होता है।

8- मानव जीवन में स्थित इस असंतुलन को दूर करने के लिये तथा इनमें आपसी सामंजस्य स्थापित करने के लिये भारतीय वेदों एवं पुराणों में अनेक विधियों का उल्लेख किया है। यंत्र, मंत्र एवं तंत्र उनमें से प्रमुख है।

9-यंत्र, मंत्र एवं तंत्र शास्त्र को एक पूर्ण विकसित आध्यात्मिक विज्ञान की संज्ञा दी जा सकती है। जिसका उद्देश्य शरीर, मन एवं आत्मा के विकास में एक संतुलन स्थापित करना तथा मनुष्य का भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास करना है।

10 अगस्त 1990-ओरेगॉन में रहस्यमय .... “श्रीयंत्र”

09 FACTS;-

1-दुनिया के सबसे सभ्य और विकसित देश कहे जाने वाले अमेरिका में आज भी एक पहेली अनसुलझी हैं, अमेरिका के सभी वैज्ञानिक, प्रकृति के जानकार, यू.एफ.ओ. से सम्बंधित जानकारी रखने वाले सभी हैरान हैं कि आखिर यह हिन्दुओं का श्री यंत्र बना तो कैसे बना …

इडाहो एयर नेशनल गार्ड का पायलट बिल मिलर 10 अगस्त 1990 को अपनी नियमित प्रशिक्षण उड़ान पर था। अचानक उसने ओरेगॉन प्रांत की एक सूखी हुई झील की रेत पर कोई विचित्र आकृति देखी। यह आकृति लगभग चौथाई मील लंबी-चौड़ी और सतह में लगभग तीन इंच गहरे धंसी हुई थी।

2-बिल मिलर चौंका, क्योंकि लगभग तीस मिनट पहले ही उसने इस मार्ग से उड़ान भरी थी तब उसे ऐसी कोई आकृति नहीं दिखाई दी थी। उसके अलावा कई अन्य पायलट भी इसी मार्ग से लगातार उड़ान भरते थे, उन्होंने भी कभी इस विशाल आकृति के निर्माण की प्रक्रिया अथवा इसे बनाने वालों को कभी नहीं देखा था। आकृति का आकार इतना बड़ा था, कि ऐसा संभव ही नहीं कि पायलटों की निगाह से चूक जाए।

3-सेना में लेफ्टिनेंट पद पर कार्यरत बिल मिलर ने तत्काल इसकी रिपोर्ट अपने उच्चाधिकारियों को दी, कि ओरेगॉन प्रांत की सिटी ऑफ बर्न्स से सत्तर मील दूर सूखी हुई झील की चट्टानों पर कोई रहस्यमयी आकृति दिखाई दे रही है।मिलर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यह आकृति अपने आकार और लकीरों की बनावट से किसी मशीन की आकृति प्रतीत होती है। इस खबर को लगभग तीस दिनों तक आम जनता से छिपाकर रखा गया, कि कहीं उस स्थान पर भीड़ भाड़ ना हो जाए। लेकिन फिर भी 12 सितम्बर 1990 को प्रेस को इसके बारे में पता चल ही गया।

4-सबसे पहले बोईस टीवी स्टेशन ने इसकी ब्रेकिंग न्यूज़ दर्शकों को दी। जैसे ही लोगों ने उस आकृति को देखा तो तत्काल ही समझ गए कि यह हिन्दू धर्म का पवित्र चिन्ह “श्रीयंत्र” है। परन्तु किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था कि हिन्दू आध्यात्मिक यन्त्र की विशाल आकृति ओरेगॉन के उस वीरान स्थल पर कैसे और क्यों आई?

5-14 सितम्बर को अमेरिका असोसिएटेड प्रेस तथा ओरेगॉन की बैण्ड बुलेटिन ने भी प्रमुखता से दिखाया और इस पर चर्चाएं होने लगीं। समाचार पत्रों ने शहर के विख्यात वास्तुविदों एवं इंजीनियरों से संपर्क किया तो उन्होंने भी इस आकृति पर जबरदस्त आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि इतनी बड़ी आकृति को बनाने के लिए यदि जमीन का सिर्फ सर्वे भर किया जाए तब भी कम से कम एक लाख डॉलर का खर्च आएगा। श्रीयंत्र की बेहद जटिल संरचना और उसकी कठिन डिजाइन को देखते हुए जब इसे सादे कागज़ पर बनाना ही मुश्किल होता है तो सूखी झील में आधे मील की लम्बाई-चौड़ाई में जमीन पर इस डिजाइन को बनाना तो बेहद ही मुश्किल और लंबा काम है, यह विशाल आकृति रातोंरात नहीं बनाई जा सकती।

6-इस व्यावहारिक निष्कर्ष से अंदाजा लगाया गया कि निश्चित ही यह मनुष्य की कृति नहीं है।

तमाम माथापच्ची के बाद यह निष्कर्ष इसलिए भी निकाला गया, क्योंकि जितनी विशाल यह आकृति थी, और इसकी रचना एवं निश्चित पंक्तियों की लम्बाई-चौड़ाई को देखते हुए इसे जमीन पर खड़े रहकर बनाना संभव ही नहीं था। बल्कि यह आकृति को जमीन पर खड़े होकर पूरी देखी भी नहीं जा सकती थी, इसे पूरा देखने के लिए सैकड़ों फुट की ऊँचाई चाहिए थी। अंततः तमाम विद्वान, प्रोफ़ेसर, आस्तिक-नास्तिक, अन्य धर्मों के प्रतिनिधि इस बात पर सहमत हुए कि निश्चित ही यह आकृति किसी रहस्यमयी घटना का नतीजा है।

7-फिर भी वैज्ञानिकों की शंका दूर नहीं हुई तो UFO पर रिसर्च करने वाले दो वैज्ञानिक डोन न्यूमन और एलेन डेकर ने 15 सितम्बर को इस आकृति वाले स्थान का दौरा किया और अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इस आकृति के आसपास उन्हें किसी मशीन अथवा टायरों के निशान आदि दिखाई नहीं दिए, बल्कि उनकी खुद की बड़ी स्टेशन वैगन के पहियों के निशान उन चट्टानों और रेत पर तुरंत आ गए थे।

8-ओरेगॉन विश्वविद्यालय के डॉक्टर जेम्स देदरोफ़ ने इस अदभुत घटना पर UFO तथा परावैज्ञानिक शक्तियों से सम्बन्धित एक रिसर्च पेपर भी लिखा जो “ए सिम्बल ऑन द ओरेगॉन डेज़र्ट” के नाम से 1991 में प्रकाशित हुआ। अपने रिसर्च पेपर में वे लिखते हैं कि अमेरिकी सरकार अंत तक अपने नागरिकों को इस दैवीय घटना के बारे कोई ठोस जानकारी नहीं दे सकी, क्योंकि किसी को नहीं पता था कि श्रीयंत्र की वह विशाल आकृति वहाँ बनी कैसे?

9-कई नास्तिकतावादी इस कहानी को झूठा और श्रीयंत्र की आकृति को मानव द्वारा बनाया हुआ सिद्ध करने की कोशिश करने वहाँ जुटे। लेकिन अपने तमाम संसाधनों, ट्रैक्टर, हल, रस्सी, मीटर, नापने के लिए बड़े-बड़े स्केल आदि के बावजूद उस श्रीयंत्र की आकृति से आधी आकृति भी ठीक से और सीधी नहीं बना सके।

इस तरह तमाम कोशिशों के बाबजूद यह आज भी एक रहस्य है की आखिर आखिर कब, कैसे और क्यों बना अमेरिका में यह विशालकाय “श्रीयंत्र” ।

.....SHIVOHAM.