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MA KAMAKHYA


योनिरुपा कामाख्या देवी का स्वरुप:- श्रीदेवी ने कहा - हे भगवन् ! हे प्रभो ! आप सभी धर्मो के ज्ञाता, सभी विद्याओं के स्वामी, सभी आगमों के प्रकाशक और सदैव आनन्दमय हदयवाले हैं । देव ! मैंने सुना है कि आपकी ही कृपा से समस्त तन्त्रों, सभी प्रकार की साधनाओं और सब प्रकार की विद्याओं की उपासना का फल मिलता है । हे प्रभो ! श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ जो तंत्र आपको ज्ञात हो और अत्यंत श्रेष्ठ ब्रह्म प्रतिपादक जो अपौरुषेय ज्ञान आज भी गुप्त हो, उसे सुनने की मेरी इच्छा है। श्री शिव बोले - हे प्राणवल्लभे ! प्रश्न का उत्तर देता हूँ, सुनो ! वरदयिनी महामाया कामाख्या योनिरुपा हैं, वे नित्या हैं, वर और आनन्ददात्री हैं तथा महान ऐश्वर्य को बढ़ानेवाली हैं । वे सबकी जननी और रक्षाकारिणी हैं । वे सदैव स्थूल और सूक्ष्म सभी को मूलभूता, शक्तिस्वरुपा, कल्याणकारिणी हैं । मैं उन्हीं महाविद्या, विराट स्वरुपा ' कामाख्या ' का तन्त्र बताता हूँ । अत्यन्त सावधान चित्त से सुनो । सारे विश्व में जितने प्रकार की विद्याओं की साधना द्वारा साधक लोग जिन विविध सिद्धियों को प्राप्त करते हैं, उन सभी के क्षेत्र में एकमात्र ' कामाख्या ' ही वरदायिनी अर्थात् अभीष्ट फलदात्री हैं । साधकों के लिए ' कामाख्या ' सर्वविद्यास्वरुपिणी और सर्वासिद्धिदायिनी हैं । जो मनुष्य ' कामाख्या ' सर्वविद्यास्वरुपिणी और सर्वसिद्धिदायिनी हैं । जो मनुष्य 'कामाख्या ' के प्रति उदासीन रहता है, वह तीनों लोकों में निन्दित होता है । एकमात्र कामात्मिका महामाया ' कामाख्या ' को छोड़कर अन्य कोई भी सिद्धिरुपी सम्पदा देने में सक्षम नहीं है । ' कामाख्या ' सदैव धर्म और अर्थ - स्वरुपा हैं । ' कामाख्या ' काम और मोक्षस्वरुपा हैं । ' कामाख्या ' ही निर्वाण मुक्ति और ' कामाख्या ' ही सायुज्य मुक्ति कही गई हैं । ' कामाख्या ' ही सालोक्य और सारुप्य मुक्तिस्वरुपा हैं । ' कामाख्या ' ही श्रेष्ठ गति हैं । हे देवि ! ब्रह्मत्व, विष्णुत्व, शिवत्व, चन्द्रत्व या समस्त देवताओं का देवत्व जिस शक्ति में निहित है, वही काम - रुपिणी ' कामाख्या ' हैं । सभी विद्याओं का जो कुछ लौकिक वाक्य है, वही ' कामाख्या ' हैं । सभी विद्याओं का जो कुछ लौकिक वाक्य है, वही ' कामाख्या ' हैं । सभी विद्याओं का जो कुछ लौकिक वाक्य है, वही ' कामाख्या ' हैं । महाविद्यारुपिणी सभी महादेवियाँ ' कामाख्या ' के ही स्वरुप हैं । हे प्रिय ! अपने हदय में उन सबका ध्यान कर स्वयं देख लो । तीनों लोकों में ' कामाख्या ' के अतिरिक्त अन्य कोई नही हैं । तन्त्रादि में लाखो – करोड़ो महाविद्यालयें वर्णित हैं । हे देवी ! इन सबमें सबसे श्रेष्ठ षोडशी ही मानी गई हैं । हे देवि ! उनकी मूल कारण जगदम्बा ' कामाख्या ' ही हैं । हे देवि ! जिस प्रकार चन्द्रमा की कान्ति प्रकट होती है, फिर लुप्त हो जाती है और पुनः प्रकट होती है, उसी प्रकार स्थावर और जंगम् तथा नित्य और अनित्य - जो कुछ भी है, वह सब ' कामाख्या ' के बिना उत्पन्न नहीं होता, वह सर्वथा सत्य है । श्री शिव ने कहा - हे देवि ! मैं श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ ' मन्त्रोद्धार ' को कहूँगा, जिसे जानकर देवताओं को भी सिद्धि प्राप्त होती है । सुनो । देवि ! इसके प्रभाव से सारा जगत् मुग्ध हो जाता है । जिस प्रकार बालक को माता मोहित करती है या राजा जिस प्रकार प्रजा को वशीभूत कर लेता है, उसी प्रकार हे सुरेश्वरि ! देव, दानव, गन्धर्व, किन्नर आदि क्षण भर में वश में आ जाते हैं । इस मन्त्र के सामने, हे देवि ! राजा और मन्त्री आदि तथा अन्य सभी मनुष्य भेड़ आदि पशुओं के समान वशीभूत हो जाते हैं । हाथी, घोडे, रथ आदि के रहित सारी नगरी, राजा - रानी और उर्वशी आदि स्वर्ग की अप्सरायें भी इस मन्त्र के प्रभाव से क्षणभर में वशीभूत हो जाती हैं ॥ हे देवी, महेश्वरी ! श्रेष्ठ साधक इस मन्त्र से स्तम्भन, मोहन, क्षोभण, जृम्भण, द्रावण, त्रासन, विद्वेषण, उच्चाटन और विशेषकर स्त्रियों का आकर्षण तथा अन्य सबका वशीकरण करने में समर्थ होता है । कटाक्ष मात्र से साधक अग्नि, सूर्य, वायु और जल - राशि - सभी को स्तम्भित कर देता है, इसमें सन्देह नहीं । हे प्राणप्रिये ! इस मन्त्र का ज्ञाता कामदेव के समान जगत् को जीत लेता है । तीनों लोकों में उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं रहता । नाद - बिन्दु ( ँ ) से युक्त ' जृम्भणान्त ' = ' त ', ' यात्रा – वाराण ' = ' र ', ' वाम - कर्ण ' = ' ई ' अर्थात् ' त्रीं ' - इस बीज को त्रिगुणीकृत करे - ' त्री त्रीं त्रीं । कल्पवृक्ष के समान इस मन्त्र का जप करें । बुद्धिमान् साधक एक, दो या चार बार इसका जप करें । सभी विद्याओं के साधकों को उक्त कामाख्या - मन्त्र की साधना करनी चाहिए, अन्यथा सिद्धि की हानि होती है और उनके पग - पग पर विघ्न होता है । शाक्त, वैष्णव, शैव और गाणपत्य - सभी देवताओं के उपासक महामाया द्वारा उसी प्रकार नियन्त्रित रहते है जिस प्रकार तेली का बैल । अतः हे देवी ! उक्त मन्त्र की साधना शाक्तों के लिए आवश्यक हैं । इस मन्त्र की साधना में चक्रादि - शोधन या कालादि - शोधन की आवश्यकता नहीं है । जो इस मन्त्र के संबंध में शोधन - विचार करता है, उसका सबकुछ नष्ट हो जाता है और वह नरक में जाता है । हे देवी ! इस मन्त्र की साधना में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता इसके द्वारा शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है । श्री देवी ने कहा - काली - तारा का मन्त्र देने में जो चक्र - विचार करता है, उसकी क्या दशा होती है ? उसके उद्धार का क्या कोई उपाय नहीं हैं ? श्री शिव ने कहा - हे देव - देवेशि ! हम ( ब्रह्मा - विष्णु - शिव ) और अग्नि तथा काल भी एवं अन्य जो कुछ उत्पन्न हुआ है, वह सब महेश्वरी से ही उत्पन्न हुआ है । कालिका और तारिणी के मन्त्रों की महिमा मैं क्या बताऊँ ! हे प्रिये ! अज्ञान या मोहवश यदि कोई काली और तारा के मन्त्रसंबंध में चक्रादि गणना करता है, तो वह कुत्ते के मल में कीड़े का जन्म पाता है और हे महादेवी ! कल्प के अन्त में भी उसे मोक्ष नहीं मिलता । इन देवी की पूजा विधि कहूँगा, जो तीनों लोकों की सिद्धिदायिनी हैं । हे देवेशि ! हठपूर्वक घोर साधना करने से जो - जो सिद्धि मिलती है, वह सब इस पूजा से क्षण मात्र में मिल जाती है, इसमें सन्देह नहीं । सिन्दूर से वृत्त ( मंडल ) बनाकर त्रिकोण की रचना करें । उसके मध्य में स्वबीजों ( त्रीं त्रीं त्रीं ) को उत्तम साधक लिखें । तब चतुष्कोण बनाकर आठ वज्रों को अंकित कर न्यासों को कर आठ दिशाओं में उनकी पूजा करें । कामाख्या मन्त्र के ऋषि अक्षोभ्य, छन्द अनुष्टप्, देवता कामाख्या और सर्वासिद्धि के लिए विनियोग है । स्व - बीज ( त्रीं ) में छः दीर्घ स्वर लगाकर ( त्रां, त्रीं, त्रूं, त्रैं, त्रौं त्रः ) कराङ्गन्यासादि करे । तब अभीष्टदायिनी कामाख्या देवी का ध्यान करें । लाल वस्त्रधारिणी, द्विभुजा, सिन्दूरतिलक लगाए, निर्मल चन्द्रवत् उज्ज्वलं एवं कमल के समान सुन्दर मुखवाली, स्वर्णादि के बने मणिमाणिक्य - जटित आभूषणों से शोभित, विविध रत्नों से बने सिंहासन पर बैठी हुई, हँस - मुखी, पदमराग मणि जैसी आभा वाली, पीनोन्नत - पयोधरा, कृष्णवर्णा, कान तक फैले बड़े - बड़े नेत्रोंवाली, कटाक्ष मात्र से महदैश्वर्यदायिनी, शंकर - मोहिनी, सर्वांग - सुन्दरी, नित्या, विद्याओं द्वारा घिरी हुई, डाकिनी, योगिनी, विद्याधारी समूहों द्वारा शोभायमाना, सुन्दर स्त्रियों से विभूषिता, विविध सुगन्धादि से सुवासित देहवाली, हाथों में ताम्बूलादि लिए नायिकाओं द्वारा सुशोभिता और प्रति - नियत समस्त सिद्ध समूहों द्वारा वन्दिता, त्रिनेत्रा, सम्मोहन करनेवाली, पुष्पधनधारिणी, भग - लिंग - समाख्यातां एवं किन्नरियों के समान नृत्यपरायणा देवी के अमृतमय वचनों को सुनने के लिए उत्सुका सरस्वती और लक्ष्मी से युक्ता देवी कामाख्या समस्त गुणों से सम्पन्ना, असीम दयामयी एवं मंगलरुपिणी हैं । उक्त प्रकार ध्यान कर कामाख्या देवी का आह्वान करें । तब हे शिवप्रिये ! यथाशक्ति विधिपूर्वक उनकी पूजा करें । कुंकुम आदि लाल पुष्पों, सुगन्धित कुसुमों, जवा, यावक, सिन्दूर और विशेषकर करवीर पुष्पों से पूजन करें । हे देवेशि ! करवीर पुष्पों में कामाख्या देवी स्वयं निवास करती हैं । जवा और मालती आदि सुगान्धित पुष्पों को भी वैसा ही समझें । करवीर पुष्प की महिमा कहना संभव नहीं हैं । जवा पुष्प को देने से साधक गणपतिस्वरुप बन जाता है । अम्बिका की पूजा सदैव पंचतत्त्वों से करें । पंचतत्त्वों के बिना पूजा व्यर्थ होती है । पंचतत्त्वों के द्वारा देवी की प्रसन्नता क्षणभर में हो जाती हैं । हे महादेवी ! पंचमकारों से साधक शिव स्वरुप हो जाता है । कलियुग में पंचतत्त्वों के समान कुछ भी नहीं है । पंचतत्त्व परब्रह्म स्वरुप है और श्रेष्ठ गतिदायक हैं । हे महादेवी ! पंचतत्त्व स्वयं सदाशिव, ब्रह्मा और विष्णु स्वरुप हैं । पंचतत्त्वों से भोग और मोक्ष दोनों मिलने हैं, अतः उनका साधन ' महायोग ' कहा गया है । पंचतत्त्वों के बिना शाक्तों को सुखभोग और मोक्ष नहीं मिलता । हे देवेशि ! पंचतत्त्वों के प्रभाव से करोड़ो महापाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जिस प्रकार अग्नि रुई के ढेर को भस्म कर देती हैं । पंचतत्त्व जहाँ होते हैं, वहीं देवी निश्चय ही निवास करती हैं । पंचतत्त्व से रहित स्थान से जगदम्बिका दूर ही रहती हैं । ' मद्य ' से स्वर्ग का आनन्द मिलता है, ' मांस ' से राज्य प्राप्त होता है, ' मत्स्य ' से भैरवी पुत्र की योग्यता मिलती है और ' मुद्रा ' से साधुता आती है । परम तत्त्व ' पंचम ' से, हे महादेवी ! मनुष्य सायुज्य - मुक्ति को प्राप्त करता है । भक्तिपूर्वक देवी का अर्चन करे, तो यह सब लाभ होता है । स्वयम्भू - कुसुमों और कुण्ड - गोलोदभव शुभ - पुष्पों से, कुंकुम आदि से और आसव से देवी को ' अर्घ्य ' निवेदित करे । विविध उपहार, अन्नादि, खीर आदि नैवेद्यों से तथा वस्त्रों एवं आभूषणों आदि से देवी की पूजा कर आवरण - देवताओं का पूजन करें । वहीं इन्द्रादि दिकपालों और उनके अस्त्रों की पूजा कर हे शंकरि ! श्रेष्ठ साधक दोनों पार्श्वो में लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा करें । हे देवी ! यन्त्र के मध्य में अन्नदा, धनदा, सुखदा, जयदा, रसदा, मोहदा, ऋद्धिया, वृद्धिदा, शुद्धिदा, भुक्तिदा, मुक्तिदा, मोक्षदा, सुखदा, ज्ञानदा, कान्तिदा - इन सोलह महादेवियों की सदा पूजा करें । साथ ही हे शिवे ! यत्नपूर्वक डाकिनी आदि सिद्धियों की उसी प्रकार पूजा करें । तब देवी के षडंगों की पूजा कर पुष्पांजलियाँ प्रदान करें और शुद्ध भाव से साधक यथाशक्ति मन्त्र का जप करें । जप समर्पित कर घण्टाघड़ियाल बजाकर पर - देवता को प्रसन्न करें और स्तोत्र, कवच का पाठ कर विधि पूर्वक प्रणाम करें । इसके बाद हदयस्थ देवी को ' शेषिका ' के प्रति उन्मुख कर ईशान कोण में त्रिकोण की कल्पना कर उस पर निर्माल्य छोड़े । साधकों के साथ भक्तिपूर्वक निर्माल्य ग्रहण कर अपनी शक्ति के साथ पंचतत्त्वों से विहार करें । शक्ति ही साधना और जपादि का मूल है । शक्ति ही जीवन का मूल और वही इहलोक एवं परलोक का मूल है । शक्ति ही तप का मूल है और हे प्रिये ! चारों वर्गों - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का भी मूल है । जड़ और जंगम - सभी का मूल शक्ति है । हे देवी ! इस तथ्य को न समझकर पापी लोग निश्चित रुप से भयानक नरक में जाते हैं । इसलिए भगवान् शिव की आज्ञा के अनुसार साधक प्रयत्न करके शक्ति का जूठा द्रव्य पीते हैं अन्यथा रौरव नरक में जाते हैं । हे देवी ! शक्ति को जो कुछ दिया जाता है, वह देवता को ही अर्पित होता है । जिन उद्देश्यों से वह सब दिया जाता है, हे कुलेश्वरि ! वे सभी सफल होते हैं, यह सर्वथा सत्य है । शक्ति के बिना कलियुग में जो चक्रार्चन करता या करवाता है, वह घोर नरक में जाता है, उसके मोक्ष का उपाय नहीं है । हे प्रिय ! जिस - जिस कामना के लिए उक्त प्रकार जो देवी की पूजा करता है, वह उस - उस कामना को हस्तगत कर निश्चय ही विजय प्राप्त करता है । पुरश्चरणकाल में बुद्धिमान् साधक को एक लाख ' जप ' करना चाहिए और उसका दशांश ' हवन ' घृत, शर्करा, मधु - युक्त खीर द्वारा करना चाहिए । उसका दशांश ' तर्पण ' चन्दनयुक्त जल से करना चाहिए । उसका दशांश गन्धादि द्वारा ' अभिषेक ' करना चाहिए । ' अभिषेक ' का दशांश उत्तम द्विजों को मिष्ठानों द्वारा और देवी - भक्तों को पंचतत्त्वों द्वारा भोजन कराना चाहिए । इस प्रकार पुरश्चरण की क्रिया कर साधक सिद्ध हो जाता है । हे देवी ! तब वह प्रयोगों के करने में निश्चित रुप से सक्षम हो जाता है । हे कुलेश्वरि ! यह सारा पूजनादि कामाख्या को प्रसन्न करता है । ' त्रिकोण - यन्त्र ' में की गई पूजा से भगवती अत्याधिक प्रसन्न होती हैं । हे प्रिये ! उसमें आवाहनादि सभी कर्म कर उस पर विविध प्रकार के गन्धादि का लेप करें । इससे देवी को अत्यन्त प्रसन्नता होती है और साधक शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है । मेरे ज्ञान में ' त्रिकोण ' पूजा के समान अन्य कोई पूजा नहीं हैं । श्रीगुरु का रहस्य :- श्री देवी बोलीं - हे प्रभो महादेव ! गुरुतत्त्व को विशेष रुप से बताइए । हे देव ! गुरुत्व को वहन करना बड़ा कठिन हैं । मनुष्य में यह कैसे आता है ? वहीं सदगुरु या श्रेष्ठ गुरु कौन है, यह भी हे प्रभो ! बताइए । हे महादेव ! मेरे इस घोर सन्देह को दूर करिए । देवी की बात सुनकर भगवान शंकर ने कहा - सज्जनों के लिए हितकारक श्रेष्ठ सारपूर्ण ज्ञान सुनो । सदाशिव ही गुरु कहे गए हैं । वे आदिनाथ कहलाते हैं । महाकाली से युक्त वे देव सच्चिदानन्द - स्वरुप हैं । हे महामाये ! उन्हीं के प्रसाद से मैं शिव अजर और अमर हूँ । वे आदिनाथ सनातन परब्रह्म हैं, वे श्री धर्म और तीनों गुणों के प्रभु हैं । अतः मनुष्य ' गुरु ' नहीं हैं, किन्तु उनकी भावना मात्र हैं । जैसे साधकों की दीक्षा में वृक्षादि में पूजन किया जाता है । अतएव महेश्वरि ! मनुष्य गुरु कहाँ है ? मनुष्य की ' गुरुता ' तो भावना ही है । हे देवी ! उसमें वास्तविकता नहीं हैं । मन्त्र देनेवाला अपने शिरस्थ कमल में गुरु का जो ध्यान करता है उसी ध्यान को वह शिष्य के सिर में उपदिष्ट करता है । अन्य कोई बात नहीं है । अखण्डमण्डलाकार चराचर जगत् जिसके द्वारा व्याप्त है, उस सचिदानन्द ब्रह्म के पद को जो दिखाता है, उस श्रीगुरु को नमस्कार है - यह जो वन्दना प्रसिद्ध है, उससे स्पष्ट है कि सच्चिदानन्द ब्रह्मपद को खानेवाला मनुष्य गुरु है, अतः हे देवी ! मनुष्य में ' गुरुता ' को कल्पना ही की जाती है । न तो गुरु और न स्वयं शिष्य - दोनों की यह मूर्खता ही है कि सदा वे यही निश्चयपूर्वक समझते हैं कि यह मनुष्य ' गुरु ' है और यह ' शिष्य ' । वस्तुतः मनुष्य मात्र दिखानेवाला है, स्वयं ' गुरु ' नही हैं । इस प्रकार मनुष्य में गुरु की भावना रखने से मोक्ष नहीं मिलता है, यह सत्य है । हे देवी ! जैसे खानेवाला को भोजन स्वर्णादि - पात्र में दिया जाता है, वैसे ही मन्त्र द्वारा सबकुछ ब्रह्म को समर्पित किया जाता है । हे कुलेश्वरी ! यदि उस पात्र को निन्दनीय या टूटा हुआ पाया जाता है, तो उसे त्याग कर अन्य पात्र में भोजन देकर खानेवाले को सन्तुष्ट किया जाता है । उसी प्रकार लालची, दुष्ट मनुष्य शिष्य को पाकर उसे भी छोड़ देना चाहिए क्योंकि संसार में जो निन्दनीय है, उसे मन्त्र देने से सदाशिव रुष्ट होते हैं । राजा को जैसे राजत्व और प्रजाओं को मण्डलसमूह का दान जिस प्रकार कल्याणकारी होता है, उसी प्रकार शिष्य को मन्त्रदान श्रेयस्कर होता है । मण्डलादिदान के क्षेत्र में जैसे हिंस्र दान - ग्रहीता को छोड़कर अन्य उपयुक्त पात्र को ही दान दिया जाता है, उसी प्रकार अन्य क्षेत्रों में - ज्ञान देते समय भी उसी नियम को माना जाता है ।सभी लोकों में सत्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए ही गुरु की सेवा की जाती है । ज्ञान से मोक्ष मिलता है, अतः ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है । इसलिए जो ज्ञान देता है, उसी का आश्रय गुरु - रुप में लिया जाता है । अन्न का इच्छुक अन्नहीन को छोड़ देता है, वैसे ही ज्ञानेच्छु ज्ञानहीन का त्याग करना है । जिस व्यक्ति में ज्ञानत्रय का प्रकाश होता है, वही गुरु है, शिवस्वरुप ही है । अज्ञानी को छोड़कर ज्ञानियों को ही शरण लेनी चाहिए । हे पार्वती ! ज्ञान से ही सदा ' धर्म ' होता है, ज्ञान से ' अर्थ ' मिलता है, ज्ञान से ' काम ' की प्राप्ति होती है और ज्ञान से ही निर्मल ' मोक्ष ' मिलता है । ज्ञान ही श्रेष्ठ वस्तु है । ज्ञान से श्रेष्ठ कुछ नहीं है । ज्ञान के लिए ही देवता की उपासना की जाती है । ज्ञान ही तपस्या का फल है । जैसे मधु की इच्छा से भौंरा एक फूल से दूसरे फूल पर जाता है, वैसे ही ज्ञान के इच्छुक शिष्य को एक गुरु से दूसरे गुरु के पास जाना चाहिए । शिष्य का धन लेनेवाले गुरु बहुत हैं किन्तु हे देवी ! शिष्य के दुःख को दूर करनेवाले सदगुरु दुर्लभ हैं । ज्ञानरुपी अञ्जन को सलाई से अज्ञान रुपी अन्धेपन को दूर कर जो आँखें खोल देते हैं अर्थात् ज्ञान प्रदान करते हैं, उन श्रीगुरुदेव को नमस्कार है । उक्त बात को समझकर ही साधक को सदा ' गुरुता ' की भावना करनी चाहिए । हे शिव ! ज्ञानी लोगों में ही भक्त शिष्यों की ' गुरुत्व ' की कल्पना होती है । शान्त, संयमी, कुलीन, सदा शुद्ध अन्तः करण और पंचतत्त्वों से अर्चन करनेवाला जो ज्ञानी है, वही ' सदगुरु ' कहा गया है । बहुत से शिष्यों को आश्रय देने से ' वह सिद्ध हैं '- ऐसी ख्याति प्राप्ति करते हैं । हे प्रिये ! दैवी शक्ति से चमत्कारपूर्ण ' सदगुरु ' कहलाते हैं । जो मनोहर, हितकारी, अभूतपूर्व, तर्कसम्मत बातें करते हैं और तन्त्र - मन्त्र से युक्त कथन करते हैं, वे ही ' सदगुरु ' हैं । जो सदैव शिष्य के उदबोधन और कल्याण के लिए उत्सुक रहते हैं तथा अनुशासन करने में एवं कृपा करने में समर्थ होते हैं, वे ही ' सदगुरु ' हैं । जिनकी दृष्टि सदा परमार्थ पर रहती है, गुरुचरणकमलों में जो सदैव आसक्त रहते हैं, वे ही ' सदगुरु ' माने जाते हैं । हे देवी ! असमर्थ मानव गुरु को छोड़कर, उक्त गुणों को देखकर शिष्य को योग्य ' गुरु ' के पास जाना चाहिए, इसमें कोई शंका की बात नहीं है । केवल शिष्ज्य की सम्पति के ग्राहक और माँगनेवाले बहुत से गुरु होते हैं, जो लोगों द्वारा व्यंग्य से गुरु कहे जाते हैं तथा निन्दनीय होते हैं तथा निन्दनीय होते हैं । शरीर, मन और वाणी से यदि कोई शिष्य भक्तियुक्त है, तो उसे देखकर जो गुरु उससे किसी वस्तु की कामना करता है और उसे सान्त्वना नहीं देता, तो वह निन्दित होता है । जो गर्हित कर्मो द्वारा शिष्य के धन आदि का नाश करता है और शिष्य के हितैषी लोगों की उपेक्षा करता है, वह गुरु नहीं - नीच मनुष्य है । जो गुरु शिष्य को ' महाविद्या ' का मन्त्र बताकर ' वीराचार ' की शिक्षा नहीं देता, वह घोर नरक में जाता है और शिष्य का भी पतन होता है, वह सर्वथा निश्चित है । पशु - भाव में रहते हुए जो गुरु भगवती काली और भगवती तारा के मन्त्र की दीक्षा देकर उनका ' आचार ' नहीं बताता, वह नरक से कभी छुटकारा नहीं पाता । इसलिए हे प्रिये ! साधकों को ' पशु - गुरु ' का सदा त्याग करना चाहिए क्योंकि पशु - दीक्षा अधम कही गई है, जो चारों वर्ग ( धर्म - अर्थ – काम - मोक्ष ) की विशेष रुप से बाधक है । संयोग से यदि पशुदीक्षा कोई शक्ति उपासक पा जाए, तो उसे किसी कौल साधक से प्रार्थना कर उस मन्त्र की दीक्षा पुनः लेनी चाहिए । तब ( कौल साधक से पुनः दीक्षा लेने पर ) वह विद्या ( मन्त्र ) माँ के समान अभीष्ट फलदायिनी हो जाती है । अन्यथा देवी साधक से विमुख रहती हैं, जिससे साधक की सदगति नहीं होती । पूर्वोक्त दोष - युक्त चाहे कोई दिव्य साधक हो, या वीर साधक, उन दोनों ही के प्रति शिष्य को गुरु - भावना नहीं रखनी चाहिए । केवल उन्हें अपना हितैषी समझना चाहिए, गुरु मानना छोड़ देना चाहिए । ऐसा करने से कोई दोष नहीं होता । भगवान् शिव का ऐसा ही आदेश है । श्री देवी बोलीं - हे परमेशान ! बताइए कि ' दिव्य ', ' वीर ' और ' पशु ' - इन साधकों में क्या विशेषता है ? यह सुनने को मेरा मन उत्सुक है । श्रीशिव ने कहा - हे विश्ववन्दनीय देवी ! तुमने जो श्रेष्ठ सार की बात पूछी है, उसे सुनो । ' दिव्य ' साधक सबकिए लिए मनोहर, अल्पभाषी और स्थिर रहनेवाला होता है । वह गम्भीर, शिष्टता से बात करनेवाला, भावुक, ध्यानतत्पर, गुरुचरणकमलों को छोड़कर अन्य सबसे निर्भय, सब कुछ देखनेवाला, सब कुछ बतानेवाला, सभी प्रकार के दुष्टों को निवारण करनेवाला, सर्वगुणसम्पन्न और अधिक क्या कहूँ, साक्षात् मेरे समान ही तेजस्वी होता है । हे देवी ! वीर साधक भयहीन, अभयदाता, गुरुभक्त, वाकपटु, शक्तिशाली, सच्चरित्र, पञ्चतत्त्वप्रेमी, अतिउत्साही, अत्यन्त बुद्धिमान्, साहसी, महामना और सज्जनों का सदा पालन करने वाला होता है । तत्त्वों से युक्त वीरसाधक सदा नम्रता दिखाने को अति उत्सुक रहता है । हे प्रिये ! इस प्रकार बहुत से गुणों से सम्पन्न वीर साधक रुद्र के ही समान सर्वसमर्थ होता है । हे महादेवी ! सभी देवों द्वारा बहिष्कृत पशुओं के सम्बन्ध में सुनो । पंचतत्त्वों की निन्दा करनेवाले, नीच, पापयुक्त मन वाले पशु साधकों में कुछ तो छाग ( बकरे ) के समान कामुक, कुछ मेष ( भेंड़े ) के समान क्रोधी, कुछ गधे के समान मूर्ख और कुछ सुअर के समान दुराचारी होते हैं । हे देवी ! इस प्रकार के दुष्ट हीन मनुष्यों को ' पशु ' समझना चाहिए । इनका देवी - पूजन सिद्धिदायक नहीं होता । अतः पशु स्वभाव वाले साधकों को निराकरण करना चाहिए । वे परामर्थ के कार्यों से सर्वथा बाहर ही रखे जाने चाहिए । श्री दे वी बोलीं - हे नाथ ! आपने क्या ही विचित्र बात बताई है, इससे मेरा सन्देह और भी पुष्ट हो गया है । आपने स्वयं सदा बताया है कि ' पशु - भाव ' क्षुद्र भाव है, इसे ' साधारण भाव ' कहना अधिक उचित होगा किन्तु पशुभाव से की फल देवता को अर्पित न हो सके, तो उक्त क्षुद्र भाव को ' पशु - भाव ' या ' साधारण भाव ' कैसे कहा जा सकता है ? हे दयामय प्रभो ! मेरे इस सन्देह को शीघ्र नष्ट करें, जैसे सूर्य अँधेरे को क्षण भर में नष्ट कर देता है । श्री शिव ने कहा - विशेष जाननेवाली देवी ! तुमने ठीक कहा । शुद्ध सार की बात सुनो । जिसे ' पशुभाव ' कहते हैं, उसका पालन करनेवाला कलियुग में कौन हैं ? जो पंचतत्त्व को ग्रहण नहीं करता किन्तु उसकी निन्दा नहीं करता । शिव ने जो कुच कहा है, वह सत्य है - यही वह सोचता है । निन्दा करना वह पाप समझता है । वही ' पाशव ' या ' पशुभाव ' का पालन करनेवाला है । उसके ' आचार ' को मैं बताता हूँ, जो सन्देह को नष्ट कर देता है, उसे सुनो । ' पशुभाव ' का पालन करनेवाला नित्य हविष्यान्न खाए, ताम्बूल को छुए भी नहीं । ऋतुस्नान की हुई नारी के सिवा किसी नारी को काम से स्पर्श न करे । पराई स्त्री को यदि कामभाव से देखे तो तत्काल स्वर्ण दान कर प्रायश्चित करे । पशुभाव के साधक को मत्स्य, मांस आदि का सदा त्याग करना चाहिए । सुगन्ध, पुष्पमाला, रेशमी वस्त्रादि धारण न करें । सदा मन्दिर में रहे, भोजन के लिए ही घर में जाए । पुत्र - पुत्री आदि से सदा स्नेह करे । सदैव ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए प्रार्थना करता रहे और जो कुछ पास में हो, उसका त्याग न करे । यदि पास में धन हो, तो सदा दान - पुण्य करता रहे । यदि अपना भला चाहता हो, तो कभी कंजूसी न करे । हे महादेवी ! कर्म में डालनेवाले अहंकार आदि सभी को दूर करें । विशेष कर क्रोध को दूर रखें । प्रतिदिन माता - पिता की सेवा मन लगाकर करता रहें । दूसरों की निन्दा, दूसरों से शत्रुता और अहंकार से दूर रहें । हे परमेश्वरी ! पशु स्वभाव वाले को कभी दीक्षा न दें । यह अत्यन्त सत्य बात है, इसकी उपेक्षा कभी न करें । अज्ञान या लोभ वश यदि कोई मन्त्र देता है, तो हे महादेवी ! उसे देवी का शाप लगता है, वह सर्वथा सत्य है । इस प्रकार ' पशु साधक ' के बहुत से आचार मैंने बताए हैं, तथापि इनसे न मोक्ष मिलता है और न ही कभी सिद्धि मिलती है । यदि किसी मनुष्य को खङ्ग की धार पर चलने की क्षमता हो, तो वह पश्वाचार का सदा पालन करे, किन्तु उसे सिद्धि नहीं मिलेगी । हे देवी ! कलियुग में जम्बूद्वीप का कोई ब्राह्मण कभी पशुसाधक न बने, ऐसी शिव की आज्ञा है । हे देवी ! सत्ययुग में चारो वर्ण क्रमशः दूध, घी, मधु और पिष्टक द्वारा और त्रेतायुग में सभी जातियाँ घी द्वारा पूजा करें । द्वापरयुग में सभी वर्ण मधु द्वारा और हे देवी ! कलियुग में केवल आसव द्वारा ही देवी पूजनीया हैं । हे दुर्गे ! कलियुग में अनुकल्प का विधान नहीं है । कलियुग में ब्राह्मणों और शूद्र आदि के लिए अनुकल्प नहीं हैं । शिव द्वारा कथित यह सर्वथा सत्य है । सदगुरु की शरण लेकर व्यक्ति को कुलाचार का पालन करना चाहिए । हे कल्याणी ! दिव्यभाव को प्राप्त करे, चाहे वीरभाव को । वीर साधक पृथ्वी पर अनायास ही असाध्य को भी सिद्ध कर लेता है । हे देवी ! इस संसार में वीरभाव कठिनाई से प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं । सैकड़ों पशुकल्पों से भी वैसी सिद्धि पाने में कोई समर्थ नहीं होता, जैसे कोई पशु कभी पर्वत को पार नहीं कर सकता । हे सुन्दरी ! यह अत्यन्त गुप्त रहस्य तुमसे कहा है । इसे हे अनघे ! सदा गोपनीय रखना चाहिए । ॥ काम - कला का साधन :- श्री देवी बोलीं - हे परमेश्वर ! पंचतत्त्वों से जो साधक देवी का पूजन नहीं करते, उनमें किन देवियों के साधक और कौन सब से अधिक निन्दनीय हैं ? श्रीशिव ने कहा - हे परमेश्वरी ! कलियुग में पंचतत्त्वविहीन सभी शाक्तों में विशेषतया ब्राह्मण साधक निन्दनीय हैं । उनमें भी हे कुलेश्वरी ! कालिका और तारा के साधकों की मद्य बिना साधना अति हास्यास्पद है । हे देवी ! जैसे दीक्षा के बिना साधना करना हास्यास्पद है, उसी प्रकार इन दोनों महादेवियों के साधकों की तत्त्वरहित साधना समझनी चाहिए । हे देवी ! जैसे शिला में बोया हुआ बीज अंकुरित नहीं होता, वर्षा के बिना भूमि जोती नहीं जा सकती, ऋतु के बिना सन्तान नहीं होती और बिना चले किसी गाँव तक पहुँचा नहीं जा सकता, उसी प्रकार पंचतत्त्वों के बिना देवी की साधना सफल नहीं होती । अतः दोनों महाविद्याओं के साधकों को प्रसन्न मन से विधिपूर्वक पंचतत्त्वों पंचतत्त्वों से पूजन करना चाहिए । मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और स्त्रियों के सम्पर्क में सदैव जगदम्बा का उत्तम अर्चन करना चाहिए । अन्यथा विद्वानों और देवताओं द्वारा निन्दा की जाती है । अतः मन, वचन और शरीर से तत्त्व - परायण होना चाहिए । कालिका और तारिणी की दीक्षा लेकर जो मनुष्य मद्य - सेवन नहीं करता, वह कलियुग में पतित होता है । वैदिकी और तान्त्रिकी सन्ध्या तथा जप - होम से बहिष्कृत होकर वह अब्राह्मण कहा जाता है तथा वह मूर्ख नष्ट होता है । पितरों के लिए वह जो तर्पण करता है, वह भी स्वीकृत नहीं होता । अतः ऐसे व्यक्ति को यदि अपने कल्याण की इच्छा हो, तो पितरों का तर्पण न करें । काली और तारा के मन्त्र को पाकर जो ' वीराचार ' का पालन नहीं करता, उसके शरीर में शूद्रता आ जाती हैं । ऐसे क्षत्रिय की भी वही दशा होती है । वैश्य चाण्डाल के समान और शूद्र शूकर के समान पापग्रस्त हो जाता है । अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी को सदा पंचतत्त्वों से देवी की पूजा करनी चाहिए, इसमें कुछ भी शंका न करें । हे देवी ! कलियुग में जो कुलेश्वरी की पूजा पंचतत्त्वों से करता है, उसके लिए तीनों लोकों में कोई भी कार्य असाध्य नहीं रह जाता । वही व्यक्ति ब्रह्मज्ञानी, विष्णुभक्त, शक्तिउपासक, गणेशोपासक, सूर्योपासक, परमार्थी और पूर्ण दीक्षित माना जाता है । वही वास्तव में धार्मिक साधु, ज्ञानी, अत्यन्त पुण्यात्मा, यज्ञकर्ता, सभी कार्यों में योग्य और देवस्वरुप होता है । हे गिरिजे ! सभी का मत है कि तीर्थ पवित्र होते हैं । इन तीर्थो से भी पवित्र ' कौल ' साधक होता है, इससे अधिक क्या कहें । उसकी माँ धन्य है और उसका पिता धन्य है, उसकी जाति और परिवारवाले धन्य हैं, उससे बात करनेवाले धन्य हैं । हे परमेश्वरि ! समस्त पितर लोग नाचते गाते हुए आनन्द से कहते हैं कि कोई भी हमारे कुल में कुलज्ञानी होगा, जिससे हम कुलीनों की सभा में सम्मिलित हो सकेंगे । यह जानकार अन्य पितर भी उत्सक हो उठते हैं । हे देवेशि ! पंचमुखों से कुलाचार की महिमा और फलों का वर्णन कहाँ तक करुँ ! श्री देवी बोली - हे कौलेश !साधकों को सुखदायक साधन बताइए, जो दिव्य, सुन्दर, मनोहर और सभी वांछित फलों को देनेवाला हो श्रीशिव ने कहा - हे कान्ते ! सुखदायक ' कामकला ' के साधन को सुनो । जो कुछ मैंने पहले बताया था, वह विस्मृत हो गया है । उसी को फिर बताता हूँ । कुल - ज्ञानी साधक अत्यन्त सुन्दर और दिव्य स्थान को देखकर भक्तिपूर्वक और हदय में परमा देवी का एकाग्र चित्त से ध्यान का सुन्दर सुगन्धित पुष्पों से उस स्थान को सज्जित कर उस पर बैठें । शत्रुनाशउपाय :- श्री देवी बोलीं - हे देवेश, महेश्वर ! कामाख्या के रहस्य को मैंने सुना । हे प्रभो ! बताइए कि महान् शत्रु के विनाश का क्या उपाय ? श्री शिव ने कहा - हे देवी ! और भी अधिक गुप्त बात तुम्हारे स्नेह से बताता हूँ । महावीर श्रेष्ठ साधक को इस प्रयोग को करना चाहिए । महादेवी का पंचतत्त्वो से पूजन कर अत्यन्त आनन्दमय होकर इस महान् उपाय को करें । अपने मूत्र को लेकर कूर्च - बीज ( हूँ ) से शुद्ध करें । घोर – स्वरुपा भैरवीं का तर्पण करें और शत्रु का नाम लेकर उसे स्वयं पी जाएँ । दस दिशाओं में, महापीठ पर और मुख पर उसे छिड़ककर और नग्न होकर वहाँ भ्रमण करें । इस प्रयोग से निश्चय ही शत्रु का नाश हो जाएगा । वीर्य, रक्त और मूत्र - इन सबके प्रति यदि वीरसाधक को घृणा हो, तो भैरवी उससे क्रोधित होती है, यह मैं सर्वथा सत्य कहता हूँ । हे महेशानि ! देख या सुनकर जो मनुष्य निन्दा करता है, वह चन्द्र और सूर्य जब तक हैं, तब तक हैं, तब तक भयंकर नरक में रहता है । हे महेशानि ! ' वीराचार ' की निन्दा मन से भी न करनी चाहिए । हे महादेवी ! जो ' वीर ' है, वह सदा स्वेच्छाचारी होकर भी सदा पवित्र रहता है । हे शिवे ! मिट्टी का पात्र लेकर ' साध्य ' का नाम लिखे । वायु - बीज ( यं ) से उसे पुटित कर उस पर अपना मूत्र छिड़कें और माया - बीज ( ह्रीं ) का १०८ बार जप करें । इससे हे महेश्वरी ! शत्रु का उन्माद होता है या वह मर जाता है । हे देवी, शंकरी ! बाएँ हाथ से अपने मूत्र को लेकर भैरवी को तर्पण करें, तो मारण और उच्चाटन होते हैं । भैरवी - मन्त्र ( ह्स्रैं ) से शोधित स्वमूत्र को श्रेष्ठ साधक फेंके, तो हे महेश्वर ! शत्रु को उन्माद होता है, या वह मुग्ध अथवा क्षुब्ध या वशीभूत होता है, यह निश्चित है । वीर साधक केवल मूत्र - साधन द्वारा इन्द्र के समान शत्रु का नाश कर देता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है । श्री देवी बोलीं - हे प्रभो, महेशान ! वीर्य, रक्त और मूत्र पर संसार में शुद्ध कैसे हैं ? यह बताइए और मेरे सन्देह को नष्ट करें । श्री शिव ने कहा - हे देवी ! रहस्य को सुनो । महान् ज्ञान को मैं बताता हूँ । वीर्य मैं हूँ, रक्त तुम हो । इन दोनों ही से सारा विश्व है । समस्त शरीर ही शुद्ध है क्योंकि यह वीर्य और रक्त से उत्पन्न होता है । इस प्रकार के शरीर में जो - जो वस्तु होती हैं, वह हे देवी ! अशुद्ध कैसे हैं ? पापी ही निन्दा करता है, यह निश्चित है । हे देवी ! यह ब्रह्मज्ञान है, जिसे मैंने तुमसे कहा है । हे देवी ! इस प्रकार सारा संसार ही शुद्ध है । फिर अपने शरीर में विद्यमान वस्तुओं का क्या कहना । ब्रह्मज्ञान के बिना मोक्ष नहीं होता । हे पार्वती ! ब्रह्मज्ञानी साक्षात् ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही होता है । वही दीक्षाप्राप्त साधक हैं, शुद्ध, वेदज्ञ ब्राह्मण है । उसकी गोद में समस्त तीर्थ निश्चित रुप से निवास करते हैं । पूर्णाभिषेक तत्त्व एवं गुरु लक्षण :- श्री देवी बोलीं - हे विश्व - वन्दनीय महादेव ! दयासागर भगवन् ! कौलों के ' पूर्णाभिषेक ' के सम्बन्ध में मुझे बताइए, जो सुखप्रद और मोक्षदायक होता है । श्री शिव ने कहा - हे मेरी प्राणप्रिये देवी ! अत्यन्त विलक्षण ' पूर्णाभीषेक ' के सम्बन्ध में सुनो, जो सभी आशाओं की पूर्ति करनेवाला और शिवत्व को देनेवाला है । मन्त्र - तन्त्र में पारङ्गत, सिद्ध और सभी में श्रेष्ठ कौल सदगुरु के पास आंकर ' अभिषेक ' की विधि को करें । अत्यन्त गुप्त और शुद्ध तथा सुन्दर गृह में, जो कौलिक द्वारा समर्थित हो, वेश्यांगनाओं और तत्त्वों को सुन्दर प्रयत्न के साथ एकत्रित करें । फिर वहीं विशिष्ट कौलों को बुलाकर भक्तिपूर्वक बिठाये । तब ' अभिषेक ' के वस्त्रादि आभूषणों से गुरु की पूजा करें । विधिवत्, भक्तिपूर्वक गुरु को प्रणाम करें, स्तुति, वचनों से उन्हें प्रसन्न करें । फिर शुद्ध भाव से प्रार्थना करें कि ' हे नाथ ! कुलधर्म को बताएँ और मुझे कृतार्थ करें । हे दयासागर, श्री गुरुदेव ! मैं अभिषिक्त साधकों के साथ आपकी शरण में आया हूँ ।' हे प्रिय ! तब शक्तिमान् गुरु प्रसन्न होकर तत्त्वों का शोधन करें और मन्त्रों एवं मुद्राओं द्वारा अपने सम्मुख कलश की स्थापना कर धूप – दीप आदि के द्वारा वातावरण को प्रफुल्लित कर विविध पुष्पों, सुगन्धियों और सभी प्रकार की सामग्रियों से पूजन करें । महापूजा को समाप्त कर और तत्त्वों को अर्पित कर चुकने पर पहले स्त्रियों को देकर तब थोड़ा प्रसाद स्वयं ग्रहण करें । तन्त्रोक्त विधि से चक्र की रचना कर साधकों का अभिषेक कर उन्हें पान कराएँ और स्वयं पान करें । मत्स्य, मांसादि चर्व्य और चोष्य भोजन करते हुए यथासुख वेश्याओं के साथ परमानन्द के साथ विहार करें और कहें कि ' कर्म करानेवाले को अटल सिद्धि प्राप्त हो । ' इस प्रकार ' अभिषेक ' कर्म निश्चय ही शीघ्र और निर्विघ्न सम्पन्न होता है । हे शंकरी ! चक्रालय से एक भी व्यक्ति बाहर न निकले । प्रत्येक साधक को वहीं प्रातः कृत्यादि समस्त कार्य करने चाहिए । इस प्रकार तीन दिनों तक शिष्य रात - दिन भक्तिपूर्वक उन सबका अर्चन करें । तब वह ' अभिषिक्त ' होता है । हे पार्वती ! अनुष्ठान की विधि बताता हूँ, सादर सुनो । न बहुत बड़ा और न बहुत छोटा - उचित रुप का ' घट ' लाएँ । चाहे ताँबे का बना हो या सोने का अथवा हीरे - मोती - मूंगे या सोने - चाँदी को हो । विविध प्रकार के आभूषण और वस्त्र, विविध प्रकार के द्रव्य पर्याप्त मात्रा में, कस्तूरी, कुंकुम और विविध प्रकार के सुगन्धित पदार्थ एकत्र करें । विविध प्रकार के पुष्प और मालाएँ, यत्नपूर्वक पाँचों तत्त्व और धूप तथा घृत - दीप प्रयत्न करके लाएँ । तब हे प्रिये ! गुरुदेव शिष्य को शुद्ध गृह में लाएँ और वेश्याओं तथा साधकों के साथ पूजन करें । ' पटल ' में बताई विधि से भक्तिपूर्वक देवी की पूजा समाप्त करें और आनन्द के साथ स्तुतियों द्वारा प्रणाम करें । तदनन्तर हे कुलेश्वरी १ शिवशक्तियों को गन्ध, पुष्प - मालादि से सुशोभित करें । प्रत्येक को आसन, वस्त्र और आभूषण प्रदान करें । तब शंखादि वाद्य बजाते हुए, मंगलाचरण का गान करते हुए, ' घट ' की स्थापना करें । हे प्रिये ! उसकी विधि सुनो । काम - बीज ( क्लीं ) से ' घट ' का प्रोक्षण कर, वाग् - भव ( ऐं ) से उसे शुद्ध करें । शक्ति ( सौः ) से ' कलश ' को स्थापित कर माया ( ह्रीं ) द्वारा उसे जल से भरें । उसमें यत्न - पूर्व प्रवाल ( मूंगा ) आदि पाँच रत्न डालें और निम्न मन्त्र से तीर्थो का आह्वान करें । गंगा आदि सभी नदियाँ और समुद्र तथा सरोवर, सभी सागर एवं धाराएँ, तालाब, नद और जलाशय, पवित्र झरने आदि जो समस्त पवित्र तीर्थ स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी में हैं, वे सब इस ' घट ' में प्रविष्ट हो जाएँ । रमा - बीज ( श्रीं ) से घट के ऊपर अभिमन्त्रित पल्लव रखें । कूर्च ( हूं ) से फल दे और हद ( नमः ) से गन्ध एवं वस्त्र प्रदान करें । ललना ( स्त्रीं ) से सिन्दूर और काम - बीज ( क्लीं ) से पुष्प चढ़ाएँ । मूल - मन्त्र का उच्चारण करते हुए दूर्वा चढ़ाकर प्रणव ( ॐ ) से घट का अभ्युक्षण करें । ' हूं फट् स्वाहा ' के कुशों द्वारा घट का ताड़न करें । तब घट में योनि - पीठ का ध्यान कर उसका पूजन करें । इसके बाद उस घट के ऊपर अपने तन्त्रोक्त विधान से हाथ रखकर गुरुदेव शिष्य को देखते हुए निम्न मन्त्र द्वारा घट से प्रार्थना करें । अर्थात् समस्त तीर्थो के जल से पूर्ण एवं देवता के अभीष्ट फल को देनेवाले हे ब्रह्मकलश ! उठो और हमारे मनोरथ को पूर्ण करो । हे पार्वती ! परमानन्दपूर्वक गुरुदेव मन्त्रों का उच्चारण करते हुए आम्रपल्लव द्वारा पहले शिष्य का अभिषेक करें । फिर उपस्थित सभी साधकों और शक्तियों सहित समस्त मण्डल पर जल छिड़कें । इससे सभी भक्तों का कल्याण होता है । अन्त में शिष्य को आनन्दपूर्वक भगवती एवं गुरुदेव के श्रीचरणों में बारम्बार प्रणाम करना चाहिए और स्वर्ण - मूल्य के अनुसार यथाशक्ति दक्षिणा गुरु को देनी चाहिए । विविध प्रकार के वस्त्रों, अलंकारों, सुगन्धित पदार्थो एवं पुष्प - माला आदि से तथा स्तुति - प्रार्थना - वचनों द्वारा उन्हें प्रसन्न करना चाहिए और पुनः प्रणाम करना चाहिए । गुरुदेव मनसा, वाचा और शरीर से शिष्य को आशीर्वाद दें । विविध उपदेशों से शिष्य को उत्तम तत्त्व समझाएँ । तब साधकों और शक्तियों के साथ गुरुदेव आनन्द से विहार करें । साधक एवं शक्तियाँ भी यत्नपूर्वक शिष्य को आशीर्वाद प्रदान करें । इस प्रकार बुद्धिमान् व्यक्ति तीन दिनों तक साधकों को भोजन कराएँ । आठवें दिन शिष्य पुनः अभिषेक कराएँ । उस समय हे प्रिये ! सम्पत्ति - ली के लिए सात कुम्भ स्थापित कर ताम्र - पात्रस्थ जल द्वारा श्रेष्ठ मन्त्र का जप करें । अन्त में शक्तियों और साधकों को भी प्रयत्नपूर्वक वस्त्राभूषण प्रदान करें । गुरुलक्षण :- श्री देवी बोलीं - हे देवेश ! अभिषेक कर्म का रहस्य मैनें सुन लिया । इस कर्म करने के अधिकारी गुरुदेव अथवा कौन व्यक्ति हैं ? हे प्रभू ! मुझे यह बतलाइये । श्री शिव ने कहा - महान् ज्ञानी, विशुद्धाचारी एवं गुरुभक्त श्रेष्ठ कौलिक जो अनुशासन करने में और कृपा करने में समर्थ है तथा जो शिष्यों का पालन करता रहता हैं, पत्नी - पुत्रादि से मुक्त रहता हुआ अपने कुटुम्बियों से सम्मानित होता हुआ सदा आगम - शास्त्र में श्रद्धा रखता है, वही इस ' अभिषेक - कर्म ' के करने का अधिकारी है, अन्य कोई नहीं । हे वरदायिनि ! अन्धे, लूले, रोगी और अल्प - ज्ञानी साधारण कौल साधक को बुद्धिमान् सदा छोड़ दें । सिद्धि की कामना रखनेवाला विशेषकर विरक्त साधक का सहयोग न लें क्योंकि हे प्रिये ! विरक्त के मुख से ली गई दीक्षा उसी प्रकार निष्फल होती है, जिस प्रकार बाँझ स्त्री । हे देवी ! अज्ञानवश या मोह में पड़कर जो विरक्त साधक से अभिषिक्त होता है, उसके मार्ग में पग - पग पर बाधाएँ आती हैं । उसके जप - पूजन, ध्यान और भक्ति सभी निष्फल होते हैं और अन्त में वह नरक में जाता है । हे देवी ! करोड़ों - सैकड़ों कल्पों तक वह सदा नरकभोग करता है । तब अनेक जन्मों के बाद देवी का मन्त्र प्राप्त करता है । अतः विधिसम्मत शुद्ध गृहस्थ गुरुदेव को प्राप्त करना चाहिए । फिर प्रयत्न करके अभिषेक - कर्म कराना चाहिए । तब उसके कर्म निश्चय ही सदा सफल होंगे । हे प्रिये ! विद्या अर्थात् कुलसाधना भी माँ के समान है । उसका पालन - पोषण निरन्तर करना चाहिए । जिस प्रकार पशु - साधक का त्याग कर कौलिक गुरु को प्राप्त करना चाहिए, उसी प्रकार विरक्त साधक को छोड़कर लोकहित में तत्पर कौल साधक से अभिषेक कराना ही विधि - सम्मत है । अभिषिकित साधक साक्षात् शिवस्वरुप होता है ।दीक्षा - प्राप्त ही अभिषिक्त होता है तथा वही देवी और देवीक्त ब्राह्मण धन्य कहा जाता है । हे पार्वति ! सुनो उसी अभिषिक्त साधक का धर्म सफल होता है । उसी की कामनाएँ पूर्ण होती हैं और उसका मन्त्र फलदायक होता है । हे देवी ! उसी की दीक्षा सफल होती है और तब उसकी क्रिया भी फलवती होती है । हे गिरिजे ! अधिक कहने से क्या, उसके सभी कार्य सफल होते हैं । जिस स्थान में वह निवास करता हैं, वह वाराणसी के समान तीर्थ बन जाता है । निश्चय ही यहाँ उसकी गोद में सभी तीर्थ रहते हैं । हे महामाये ! यह कथन सर्वथा सत्य है । हे पार्वति ! यहाँ जो - जो अभिषेक - वचन कहे हैं, सभी तन्त्रों में वे सब पूर्णाभिषेक के हैं और उनके बिना सोलह कलाओं में से एक भी कला का ज्ञान नहीं हो पाता । इस पद्धति के बिना योग्य गुरु और वैसे ही शिष्य का होना सम्भव नहीं होता । हे देव - देवेशि ! मेरे यह कथन सर्वथा सत्य हैं । हे देवी ! यह अभिषेक विधि तीनों लोकों में दुर्लभ है । हे पार्वती ! गणेश और कार्तिकेय जैसे व्यक्ति की पात्रता इसमें है । मेरे समान, या ब्रह्मा और विष्णु के समान व्यक्ति की इसमें योग्यता है । हे परमेश्वरी ! पाँच मुखों से भी इसकी महिमा का वर्णन करना सम्भव नहीं है । इस प्रकार मैंने अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गुप्त अभिषेक का वर्णन तुमसे किया है । इसे प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए । जिस प्रकार रतिक्रीड़ा और योनि गोपनीया हैं, उसी प्रकार श्रेष्ठ अभिषेक को गुप्त रखना चाहिए । जैसे भूगर्भ में धन रखकर उसे अति गुप्त रखा जाता है, उसी प्रकार हे महामाये ! इसे मेरी आज्ञा से गुप्त रखना चाहिए । श्री देवी ने कहा - हे दयासागर महादेव ! मुझे मुक्तितत्त्व बताइए, जिसके समक्ष छः दर्शनों का ज्ञान भी इस संसार में हँसी की बात बन जाता हैं । श्री शिव ने कहा - हे कल्याणि, विशेष जाननेवाली देवी ! श्रेष्ठतत्त्व को सुनो । इस रहस्य को तुम जानती हो या मैं और विष्णु ही जानते हैं । जिस प्रकार लोग लङ्डू देकर बच्चों को बहलाते हैं या जैसे हे देवी ! दुष