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सन्त रामकृष्ण परमहंस के उनके अनुसार तंत्र शक्ति का उपार्जन किए बगैर धर्म स्थापन का महान कार्य सम्भव


पंच मकारों /बलि का रहस्य क्या है ?-

13 FACTS;-

1-तंत्र उपासना की पद्धतियों का क्षेत्र व्यापक और विस्तृत होने के साथ इनमें भ्रान्तियाँ भी पनपती गई। जो तत्व अलंकारिक विवरण में अपने किसी गुह्य उद्देश्य और रहस्य को छुपाए थे उनके शब्दशः अर्थ लिये जाने लगे। तंत्र में पंचमकार (पांच बार म, म, म, म, म) 1. मद्य, 2. मांस, 3. मत्स्य, 4. मुद्रा और 5. मैथुन...सर्वाधिक भ्रम पंच मकारों के संदर्भ में हुआ है मद्य, माँस, मौन, मुद्रा, मैथुन के रहस्य को न जानकर-इसके यथावत् उपयोग में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली गई ।

2-साधना में पञ्च मकारों का बड़ा महत्व है| पर जितना अर्थ का अनर्थ इन शब्दों का किया गया है उतना अन्य किसी भी नहीं| इनका तात्विक

अर्थ कुछ और है व शाब्दिक कुछ और| इनके गहन अर्थ को अल्प शब्दों में व्यक्त करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया गया उनको लेकर दुर्भावनावश कुतर्कियों ने सनातन धर्म को बहुत बदनाम किया है|

3-मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन ये पञ्च मकार हैं जिन्हें मुक्तिदायक बताया गया है| कुलार्णव तन्त्र के अनुसार “ मद्यपान द्वारा यदि मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर ले तो फिर मद्यपायी पामर व्यक्ति भी सिद्धि प्राप्त कर ले| मांसभक्षण से ही यदि पुण्यगति हो तो सभी मांसाहारी ही पुण्य प्राप्त कर लें| हे देवेशि! स्त्री-सम्भोग द्वारा यदि मोक्ष प्राप्त होता है तो फिर सभी स्त्री-सेवा द्वारा मुक्त हो जाएँ''|

4- आगमसार के अनुसार मद्यपान किसे कहते हैं;- ''हे वरानने! ब्रह्मरंध्र यानि सहस्त्रार से जो अमृतधारा निकलती है उसका पान करने से जो आनंदित होते हैं उन्हें ही मद्यसाधक कहते हैं| ब्रह्मा का कमण्डलु तालुरंध्र है और हरि का चरण सहस्त्रार है| सहस्त्रार से जो अमृत की धारा तालुरन्ध्र में जिव्हाग्र पर (ऊर्ध्वजिव्हा) आकर गिरती है वही मद्यपान है| इसीलिए ध्यान साधना हमेशा खेचरी मुद्रा में ही करनी चाहिए''|

5-आगमसार के अनुसार ;- “ मा शब्द से रसना और रसना का अंश है वाक्य जो रसना को प्रिय है| जो व्यक्ति रसना का भक्षण करते हैं यानी वाक्य संयम करते हैं उन्हें ही मांस साधक कहते हैं| जिह्वा के संयम से वाक्य का संयम स्वत: ही खेचरी मुद्रा में होता है| तालू के मूल में जीभ का प्रवेश कराने से बात नहीं हो सकती और इस खेचरीमुद्रा का अभ्यास करते करते अनावश्यक बात करने की इच्छा समाप्त हो जय है इसे ही मांसभक्षण कहते हैं''|

6-आगमसार के अनुसार ;- ''गंगा यानि इड़ा, और यमुना यानि पिंगला; इन दो नाड़ियों के बीच सुषुम्ना में जो श्वास-प्रश्वास गतिशील है वही मत्स्य है| जो योगी आतंरिक प्राणायाम द्वारा सुषुम्ना में बह रहे प्राण तत्व को नियंत्रित कर लेते हैं वे ही मत्स्य साधक हैं|

7- आगमसार के अनुसार चौथा मकार “मुद्रा” है;- —

“ सहस्त्रार के महापद्म में कर्णिका के भीतर पारद की तरह स्वच्छ निर्मल करोड़ों सूर्य-चंद्रों की आभा से भी अधिक प्रकाशमान ज्योतिर्मय सुशीतल अत्यंत कमनीय महाकुंडलिनी से संयुक्त जो आत्मा विराजमान है उसे जिन्होंने जान लिया है वे मुद्रासाधक हैं| विजय तंत्र के अनुसार दुष्टो की संगती रूपी बंधन से बचे रहना ही मुद्रा है|

8- शास्त्र के अनुसार मैथुन किसे कहते हैं अब इस पर चर्चा करते हैं| आगमसार के अनुसार ;-

''मैथुन तत्व ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय का कारण है| मैथुन द्वारा सिद्धि और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है| नाभि (मणिपुर) चक्र के भीतर कुंकुमाभास तेजसतत्व ‘र’कार है| उसके साथ आकार रूप हंस यानि अजपा-जप द्वारा आज्ञाचक्र स्थित ब्रह्मयोनि के भीतर बिंदु स्वरुप ‘म’कार का मिलन होता है| ऊर्ध्व में स्थिति प्राप्त होने पर ब्रह्मज्ञान का उदय होता है, उस अवस्था में रमण करने का नाम ही “राम” है| इसका वर्णन मुंह से नहीं किया जा सकता| जो साधक सदा आत्मा में रमण करते हैं उनके लिए “राम” तारकमंत्र है| हे देवि, मृत्युकाल में राम नाम जिसके स्मरण में रहे वे स्वयं ही ब्रह्ममय हो जाते हैं|

9-यह आत्मतत्व में स्थित होना ही मैथुन तत्व है| अंतर्मुखी प्राणायाम आलिंगन है| स्थितिपद में मग्न हो जाने का नाम चुंबन है| केवल कुम्भक की स्थिति में जो आवाहन होता है वह सीत्कार है| खेचरी मुद्रा में जिस अमृत का क्षरण होता है वह नैवेद्य है| यामल तंत्र के अनुसार मूलाधार से उठकर कुंडलिनी रूपी महाशक्ति का सहस्त्रार स्थित परम ब्रह्म शिव से सायुज्य ही मैथुन है|

10--अजपा-जप ही रमण है| यह रमण करते करते जिस आनंद का उदय होता है वह दक्षिणा है| संक्षिप्त में आत्मा में यानि राम में सदैव रमण ही तंत्र शास्त्रों के अनुसार मैथुन है न कि शारीरिक सम्भोग| यह पंच मकार की साधना भगवान शिव द्वारा पार्वती जी को बताई गयी है|

11-पंच मकार की ही भाँति पशु भाव की बलि का अर्थ है ..महानिर्वाण तंत्र के अनुसार-''

काम और क्रोध विघ्नकारी दो पशु हैं । इनकी बलि देकर जप में तन्मय हो जाय। एक अन्य स्थान पर कहा है-’ इन्द्रिय रूप पशु का वध करें ''। इन्हीं भावों को ग्रहण करके अपने देश में महान तंत्र साधक होते हैं।

12-कितने दिव्य अर्थ हैं पंच मकार के इन्हें जानकार किसे तंत्र शास्त्र पर श्रद्धा न होगी। वास्तव में देखा जाये तो, यह पंच-मकार मनुष्य के अष्ट पाशों के बंधन से मुक्त होने में सहायक है,विषय भोगो को भोग करते हुए भी, विषय भोगो के प्रति अनासक्ति का भाव, इस मार्ग का परम उद्देश्य है। 13-जब तक मानव पाश-बद्ध, विषय-भोगो के प्रति आसक्त, देहाभिमानी है, वह केवल जीव कहलाता है, पाश-मुक्त होने पर वह स्वयं शिव के समान हो जाता है। वीर-साधना या शक्ति साधना का मुख्य उद्देश्य शिव तथा समस्त जीवों में ऐक्य प्राप्त करना है। यहाँ मानव देह देवालय है तथा आत्म स्वरूप में शिव इसी देवालय में विराजमान है, अष्ट पाशों से मुक्त हुए बिना देह में व्याप्त सदा-शिव का अनुभव संभव नहीं है।

NOTE;-

यह साधना उन को स्वतः ही समझ में आ जाती है जो नियमित ध्यान साधना करते हैं| योगी अपनी चेतना में साँस मेरुदंड में सुषुम्ना नाड़ी में लेते है| नाक या या मुंह से ली गई साँस तो एक प्रतिक्रया मात्र है उस प्राण तत्व की जो सुषुम्ना में प्रवाहित है| जब सुषुम्ना में प्राण तत्व का सञ्चलन बंद हो जाता है तब साँस रुक जाति है और मृत्यु हो जाती है| इसे ही प्राण निकलना कहते हैं| अतः अजपा-जप का अभ्यास नित्य करना चाहिए|

महान तंत्र साधक ;-

03 FACTS;-

1-तंत्र के प्रधान देव भगवान शिव और भगवति देवी हैं। अनेक योगी आचार्य तंत्राचार्य अथवा अधिकारी नाथ संप्रदाय अथवा “शैव‌ या शाक्त” भी तंत्रालोक के रहस्यों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता व कुछ सर्जनकार भी हुए हैं। इनमें गुरू मछन्दरनाथ, गुरू गोरक्षनाथ तथा अनेकानेक संस्थापक

मठाधीश व तंत्र सम्राट हैं, जिनका नाम आदर से लिया जाता है।

2-निर्विशेष ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाले आदि गुरु शंकराचार्य शक्तितत्त्व के रहस्यवेत्ता भी थे , उन्होंने तिब्बत के गुह्य स्थानों उरुंग मठ तवाँग मठ जाकर अनेकों तंत्र साधनाएँ सम्पन्न कीं। उनके द्वारा लिखा गया सौंदर्य लहरी नामक ग्रन्थ तंत्र ग्रन्थों में अपना अद्वितीय स्थान रखता है। इसकी पैंतीस टीकाएँ प्राप्त हैं जिसमें लक्ष्मीधर टीका उत्तम मानी गई है।

3-आदि गुरु शंकराचार्य की ही भाँति कीनाराम, वामाखेपा, कमलाकान्त, रामप्रसाद, दक्षिणेश्वर के सन्त रामकृष्ण परमहंस तंत्र की गुह्य प्रक्रियाओं में निष्णात् थे। श्री रामकृष्ण देव ने इस संदर्भ में एक ऐसे रहस्य का उद्घाटन किया है जिसे विचित्र किन्तु सत्य कहा जा सके। उनके अनुसार तंत्र शक्ति का उपार्जन किए बगैर धर्म स्थापन का महान कार्य सम्भव नहीं । इस कथन के पीछे उनकी स्वयं की अनुभूति थी ।

तांत्रिक साधना क्या है? :-

तंत्र शास्त्र के अंतर्गत सात प्रकार के साधना पद्धतियों का प्रचलन या वर्णन प्राप्त होता हैP;-

1–वेदाचार

2– वैष्णवाचार

3–शैवाचार

4–दक्षिणाचार

5–वामाचार

6–सिद्धान्ताचार

7–कुलाचार

तंत्र की साधनाएं ;- 07 FACTS;- 1-तंत्र में दो प्रकार की साधनाएं शास्त्र सम्मत हैं- 1-कुलाचार 2-समयाचार 2-कुलाचार साधना में बाह्य अनुष्ठान प्रधान है। इसका अभ्यास समहू बद्ध हाकेर किया जाता है | इसमें यज्ञाहुति, मंत्र-जप और कई प्रकार की पूजा-विधियों का प्रचलन है। 3-समयाचार आंतरिक साधना है। यह रुद्र कमल पर ध्यान लगाकार की जाती है। बौद्धों की महायान शाखा में वज्रयान साधना-पद्धति इसी से विकसित हुई है। इसमें अनिवार्य गुरु दीक्षा के बाद साधक गुरु आज्ञा से एकांत में रहकर ध्यानावस्थित होता है। इस साधना में मानस-दर्शन मुख्य है। किसके लिए कौन सी साधना उपयुक्त है इसका निर्णय गुरु करता है। 4-संप्रदाय भेद से तंत्र जगत के संबंध में अनेक प्रकार के मत प्रचलित हैं। इनमें वेदमार्गी, बौद्ध मार्गी, दक्षिणाचारी मंत्रमार्गी भक्तिमार्गी और ज्ञानमार्गी प्रमुख हैं। 5-शैवों की 28 और शाक्तों में 102 परंपराएं हैं। वैष्णवों के भी अनेक तंत्र ग्रंथ और तंत्र संप्रदाय मिलते हैं। 6-जैनों का तंत्र शास्त्र समृद्ध है पर प्रकाश में बहुत कम ही आया है। उसके प्रकाश में आने से जैन धर्म के वर्तमान स्वरूप पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का भी डर है। शायद इसीलिए जैन समाज में इस ओर प्रायः उदासीनता बरती गई है। 7-कौलों के आचार-विचार तथा अनुष्ठान प्रकार को कौलाचार के नाम से जाना जाता है। शाक्तमत के अनुसार साधनाक्षेत्र में तीन भावों तथा सात आचारों की विशिष्ट स्थिति होती है। पशुभाव, वीरभाव और दिव्यभाव – ये तो तीन भावों के संकेत हैं।

भाव त्रय ( पशु भाव , वीर भाव , दिव्य भाव) क्या है?- 06 FACTS;- 1-साधना पर चिंतन के समय भावना पर सोच-विचार करना परम आवश्यक है। वास्तव में भावना के बिना साधना संभव ही नहीं है। भावचूड़ामणि, समयाचार, कुमारीतंत्र, ज्ञानदीप, विश्वसार, सर्वोल्लास, कामाख्या तंत्र, कुब्जिका तंत्र तथा रुद्रयामल इत्यादि ग्रंथों में तीन प्रकार के भाव बताए गए हैं। 2-वास्तव में तंत्रशास्त्र भावना के अभ्यास का मार्ग है। न्यास, भूतशुद्धि, अंतर्याग, कुंडलिनी योग, मंत्रजप आदि भावना का ही तो अभ्यास है। दान, गुरु पूजा, देव पूजा, नाम संकीर्तन, श्रवण, ध्यान, समाधि, योग, जप, तप, स्वाध्याय, सबका लक्ष्य मन को ही तो वश में करना है। 3-तंत्र की यह विशेषता है कि वह भोग-प्रवण मन को बलपूर्वक अकस्मात धक्का देकर त्याग के मार्ग पर नहीं ठेलता, अपितु भोग के अंदर से ही मन को स्वाभाविक गति से मुख मोड़ देता है। अपने को जो व्यक्ति जैसा समझता है, वह वैसा ही बन जाता है। मन में बार-बार आने वाली बात विश्वास के रूप में बदल जाती है और अपने मन और शरीर के संबंध में जैसा जिसका विश्वास होता है, उसके लक्षण भी वैसे ही प्रकट होते हैं। जैसी जिसकी भावना होती है, वैसी ही सिद्धि होती है। 4-जो भी भावना हमारे मन में आती है, उसको यदि हमारे अंतर्मन की अवचेतन वृत्ति ग्रहण कर लेती है तो वह सत्वस्थ होकर हमारे जीवन की एक स्थायी वृत्ति हो जाती है। इसलिए भावना का महत्व बहुत अधिक होता है। भावना एक ठोस वास्तविकता है और उसका प्रभाव व परिणाम भी ठोस होता है। 5-भावना को छूकर नहीं देखा जा सकता या आंखों से प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता। इस कारण बहुत से लोगों के लिए भावना मात्र एहसास है। अवश्य ही भाव का उदय और लय मन में होता है। भाव के बिना यंत्र-तंत्र निष्फल हैं। लक्ष-लक्ष वीर-साधनाओं से क्या लाभ? भाव के बिना पीठ-पूजन का क्या मूल्य है? कन्या-भोजन आदि से क्या होने वाला है? जितेंद्रीय भाव और कुलाचार कर्म का महत्व ही क्या है? यदि कुल परायण व्यक्ति भाव-विशुद्ध नहीं है। ..भाव से ही उसे मुक्ति मिलती है। 6-शाक्तमत के अनुसार साधनाक्षेत्र में तीन भावों तथा सात आचारों की विशिष्ट स्थिति होती है। पशुभाव, वीरभाव और दिव्यभाव – ये तो तीन भावों के संकेत हैं .... दिव्य भाव;- प्रथम भाव है दिव्य भाव। इस भाव में स्थित साधक विश्व और देवता में भेद नहीं देखता। दिव्य भाव का साधक स्त्री जाति मात्र को महाशक्ति की मूर्ति समझता है। वह अपने को देवतात्मक समझता है। वेद, शास्त्र, गुरु, देवता और मंत्र में उसका दृढ़ ज्ञान है तथा शत्रु व मित्र में वह समान भाव वाला है।जो साधक द्वैतभावना का सर्वथा निराकरण कर देता है और उपास्य देवता की सत्ता में अपनी सत्ता डुबा कर अद्वैतानंद का आस्वादन करता है, वह तांत्रिक भाषा में दिव्य कहलाता है और उसकी मानसिक दशा दिव्यभाव कहलाती है। वीर भाव;- दूसरा भाव है वीर भाव। इस भाव में परिपूर्णता प्राप्त होने पर ही साधक दिव्य भाव में पहुंचते हैं। इसलिए वीर भाव दिव्य भाव का हेतु है। जो सब प्रकार के हिंसा कार्यों से रहित है, सर्वदा सब जीवों के हित में रत रहता है, जिसने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद पर विजय प्राप्त कर ली है, जो जितेंद्रीय है, वह वीर साधक है। पशु भाव;- तीसरा भाव पशु भाव है। इस भाव के साधक को अहिंसा-परायण तथा निरामिष भोजी होना होगा। ऋतुकाल के अलावा वह स्त्री का स्पर्श नहीं करता। यंत्रराज की साधना हो या पंचदशी की उपासना अथवा कुंडलिनी साधना, भावना की वहां मुख्य भूमिका है। इसलिए ‘पद्धति’ में सर्वत्र ‘भावयेत’ शब्द आता है। भावना के द्वारा ही भगवती सहज सुलभ हो सकती है। ‘भगवति भावना गम्या’, ललितासहस्रनाम का यह वचन है। भिन्न-भिन्न तंत्रों में दक्षिणा-चार, वीरा-चार तथा - सिद्धान्ताचार /कुला-चार, इन तीन प्रकार के पद्धति या आचारों से शक्ति साधना करने का वर्णन प्राप्त होता हैं। शैव तथा शक्ति संप्रदाय के क्रमानुसार साधन मार्ग निम्नलिखित हैं। भाव त्रय का वर्णन ;- 1-पश्वाचार (दक्षिणा-चार,पशु भाव) ; जिसके अंतर्गत, वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार के कर्म निहित हैं जैसे, दिन में पूजन, प्रातः स्नान, शुद्ध तथा सात्विक आचार-विचार तथा आहार, त्रि-संध्या जप तथा पूजन, रात्रि पूजन का पूर्ण रूप से त्याग, रुद्राक्ष माला का प्रयोग, ब्रह्मचर्य इत्यादि नियम सम्मिलित हैं, मांस-मत्स्यादी से पूजन निषिद्ध हैं। ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत आवश्यक हैं, अथवा अपनी ही स्त्री में ही रत रहना ब्रह्मचर्य पालन ही समझा जाता हैं। पंच-मकार से पूजन सर्वथा निषिद्ध हैं, यदि कही आवश्यकता पड़ जाये तो उनके प्रतिनिधि प्रयुक्त हो सकते हैं। साधना का आरंभ पशु भाव से शुरू होता हैं, तत्पश्चात शनै-शनै साधक सिद्धि की ओर बढ़ता हैं। 2- वीरा-चार (वामा-चार/वीर भाव) ; शारीरिक पवित्रता स्नान-शौच इत्यादि का कोई बंधन नहीं हैं, साधक सर्वदा, सर्व स्थान पर जप-पूजन इत्यादि करने का अधिकारी हैं। मध्य या अर्ध रात्रि में पूजन तय प्रशस्त हैं, मद्य-मांस-मतस्य से देव पूजन, भेद-भाव रहित, सर्व वर्णों के प्रति सम दृष्टि तथा सम्मान इत्यादि निहित हैं। साधक स्वयं को शक्ति या वामा कल्पना कर साधना करता हैं। 3- सिद्धान्ताचार /दिव्य भाव /(शुद्ध बुद्धि) इसी पद्धति या आचार के साधन काल में उदय होता हैं, अपने अन्दर साधक शिव तथा शक्ति का साक्षात् अनुभव कर पाने में समर्थ होता हैं। संसार की प्रत्येक वस्तु या तत्व, साधक को शुद्ध तथा परमेश्वर या परमशिव से युक्त या सम्बंधित लगी हैं, अहंकार, घृणा, लज्जा इत्यादि पाशों का पूर्ण रूप से त्याग कर देता हैं। अंतिम स्थान कौलाचार या राज-योग ही हैं, साधक साधना के सर्वोच्च स्थान को प्राप्त कर लेता हैं। इस स्तर तक पहुँचने पर साधक सोना और मिट्टी में, श्मशान तथा गृह में, प्रिय तथा शत्रु में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं रखता हैं, उनके निमित्त सब एक हैं, उसे अद्वैत ज्ञान की प्राप्ति हो जाती हैं। इन्हीं आचार-पद्धतियों को भाव त्रय ; पशु भाव ,वीर भाव , दिव्य भाव कहा जाता हैं। कौलाचार क्या है ?- 06 FACTS;- 1-वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, दक्षिणचार, वामाचार, सिद्धांताचार और कौलाचार ये पूर्वोल्लिखित भावत्रय से संबद्ध सात आचार हैं। इनमें दिव्यभाव के साधक का संबंध कौलाचार से है।जो साधक द्वैतभावना का सर्वथा निराकरण कर देता है और उपास्य देवता की सत्ता में अपनी सत्ता डुबा कर अद्वैतानंद का आस्वादन करता है, वह तांत्रिक भाषा में दिव्य कहलाता है और उसकी मानसिक दशा दिव्यभाव कहलाती है। 2-कौलाचार तांत्रिक आचारों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह पूर्ण अद्वैत भावना में रमनेवाले दिव्य साधक के द्वारा ही पूर्णत: गम्य और अनुसरणीय होता है। 3-कुल का अर्थ है कुण्डलिनी तथा अकुल का अर्थ है शिव. दोनों का सामरस्य कराने वाला कौल है.कौल मार्ग के साधक मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन नामक पंच मकारों का सेवन करते हैं. ब्रह्मरंध्र से स्रवित मधु मदिरा है, वासना रूपी पशु का वध माँस है, इडा-पिगला के बीच प्रवाहित श्वास-प्रश्वास मत्स्य है. प्राणायाम की प्रक्रिया से इनका प्रवाह मुद्रा है तथा सहस्रार में मौज़ूद शिव से शक्ति रूप कुण्डलिनी का मिलन मैथुन है। 4-सौंदर्य लहरी के भाष्यकार लक्ष्मीधर ने 41वें श्लोक की व्याख्या में कौलों के दो अवांतर भेदों का निर्देश किया है। उनके अनुसार पूर्वकौल श्री चक्र के भीतर स्थित योनि की पूजा करते हैं; उत्तरकौल प्रत्यक्ष योनि के पूजक हैं और अन्य मकारों का भी प्रत्यक्ष प्रयोग करते हैं। उत्तरकौलों के इन कुत्सापूर्ण अनुष्ठानों के कारण कौलाचार वामाचार के नाम से अभिहित होने लगा और जनसाधारण की विरक्ति तथा अवहेलना का भाजन बना। 5-शाक्तों में ही पूर्व कौल संप्रदाय के अनुयायी पंचमकार को प्रतीकात्मक मानते हैं। इनकी साधना विधियां भी अधिकतर सौम्य हैं | शक्तों के समयाचारी संप्रदाय में श्रीचक्र का पूजन होता है। उनकी आस्था षट्चक्रों में है। 6-कौलाचार के इस उत्तरकालीन रूप पर तिब्बती तंत्रों का प्रभाव बहुश: लक्षित होता है। गंधर्वतंत्र, तारातंत्र, रुद्रयामल तथा विष्णायामल के कथानानुसार इस पूजा प्रकार का प्रचार महाचीन (तिब्बत) से लाकर वसिष्ठ ने कामरूप में किया। प्राचीनकाल में असम तथा तिब्बत का परस्पर धार्मिक आदान प्रदान भी होता रहा। इससे इस मत की पुष्टि के लिये आधार प्राप्त होता है। समयाचार क्या है ?- 05 FACTS;- 1-किन्हीं आचार्यों की संमति में समयाचार ही श्रेष्ठ, विशुद्ध तांत्रिक आचार है तथा कौलाचार उससे भिन्न तांत्रिक मार्ग है। 2-शंकराचार्य तथा उनके अनुयायी समयाचार के अनुयायी थे। तो अभिनवगुप्त तथा गौडीयशाक्त कौलाचार के अनुवर्ती थे। समयमार्ग में अंतर्योग (हृदयस्थ उपासना) का महत्व है, तो कौल मत में बहिर्योग का। 3-पंच मकार- मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन दोनों में ही उपासना के मुख्य साधन हैं। अंतर केवल यह है कि समय मार्गी इन पदार्थों का प्रत्यक्ष प्रयोग न करके इनके स्थान पर इनके प्रतिनिधिभूत अन्य वस्तुओं (जिन्हें तांत्रिक ग्रथों में अनुकल्प कहा जाता है) का प्रयोग करता है; कौल इन वस्तुओं का ही अपनी पूजा में उपयोग करता है। 4-दक्षिण भारत में समयाचारी साधना का प्रचलन रहा है। आदि शंकराचार्य जैसे योगियों ने इसी प्रकार की साधना को अपनाया है और उसे आश्रय प्रदान किया है। 5- कौल सम्प्रदाय में दो मत हैं ~ उत्तर कौल मत और पूर्व कौल मत ! इनके अपने ~अपने आचार हैं उत्तर कौल मत के आचार को कौलाचार और पूर्व मत के आचार को समयाचार कहते हैं ! उत्तर कौल मत और उसका आचार कौलाचार रजोगुणी और तमोगुणी मिश्रित है , जबकि पूर्व कॉल और उसका आचार समयाचार पूर्णत: सात्विक है ।

पंचवक्त्र शिव जी;- महानिर्वाण तंत्र' के अनुसार कलियुग में प्राणी मेध्य (पवित्र) तथा अमेध्य (अपवित्र) के विचारों से बहुधा हीन होते हैं और इन्हीं के कल्याणार्थ महादेव ने आगमों का उपदेश पार्वती को स्वयं दिया। इसीलिए कलियुग में आगम की पूजापद्धति विशेष उपयोगी तथा लाभदायक मानी जाती है शैवागम बोध ग्रंथो के अनुसार शिव जी पंचवक्त्र हैं, अर्थात इन के पाँच मस्तक हैं;-

1-ईशान 2- तत्पुरुष 3-सद्योजात 4- वामदेव 5- अघोर पांच शैव सिद्धांत;- शिव जी के प्रत्येक मस्तक से शक्ति ,नंदी , वीरभद्र , स्कन्द , और दुर्वासा ऋषि जी ने पांच शैव सिद्धांत का प्रतिपादन शैवागम द्वारा किये है।कुछ शैवाचार्यों के अनुसार सभी शैवागमों के आचार्य दुर्वासा ऋषि हैं| पांच प्रमुख शैव दर्शन ;- 1-पाशुपत 2-वीरशैव 3-त्रिक दर्शन 4-सिद्धांत शैव 5-कापालिक तीन अवतार तथा तीन श्रेणिओ के आगम;- 02 POINTS;- 1-भगवान शिव मुख्यतः तीन अवतारों में अपने आप को प्रकट करते हैं ;- 1-1- शिव (शंकर ) 1-2- रुद्र 1-3-भैरव, 2-इन्हीं के अनुसार वे ३ श्रेणिओ के आगमों को प्रस्तुत करते हैं;- 2-1-शैवागम 2-2-रुद्रागम 2-3- भैरवागम 2-प्रत्येक आगम की श्रेणी स्वरूप तथा गुण के अनुसार हैं। शिवागम क्या है ?- भगवान शिव ने अपने ज्ञान को १० भागों में विभक्त कर दिया तथा उन से सम्बंधित 10 आगम शिवागम नाम से जाने जाते हैं। 1-कामिक 2- योगज 3-दीप्त 4- कारण 5-चिन्त्य 6-सूक्ष्म 7-अजित 8-सूक्ष्म 9-सहस्र 10-अंशुमान रुद्रागम क्या है ?- रुद्रागम १८ भागों में विभक्त हैं। 1-विजय रुद्रागम 2-. निश्वाश रुद्रागम 3-परमेश्वर रुद्रागम 4प्रोद्गीत रुद्रागम 5-मुखबिम्ब रुद्रागम 6-सिद्ध रुद्रागम 7-सुत्तान रुद्रागम 8-सर्वोत्तर रुद्रागम 9-चंद्रज्ञान रुद्रागम 10- वीर रुद्रागम 11- स्वयंभू रुद्रागम 12-अनल रुद्रागम 13- रौरव रुद्रागम 14- मुकुट रुद्रागम 15-किरण रुद्रागम 16-ललित रुद्रागम 17-. प्रोद्गीत 18-वतुल रुद्रागम। चौसठ भैरवागम क्या है ?- श्रीकंठ -सहिता के अनुसार चौसठ भैरवागम -अद्वैतागमों का उल्लेख किया है । वे निम्नलिखित आठ अष्टकों में विभक्त हैं - 1-भैरवाष्टक , 2-यामलाष्टक , 3-मताष्टक 4- मंगलाष्टक 5-चक्राष्टक 6-बहुरुपाष्टक 7-वागीशाष्टक 8-शिखाष्टक वीरशैव सम्प्रदाय;- 04 FACTS;- 1-इस सम्प्रदाय का नाम "वीरशैव", भगवन शिव के गण 'वीरभद्र' के नाम पर पड़ा है जिन्होंने रेणुकाचार्य के रूप में अवतृत होकर वीरपीठ की स्थापना की और इस मत को प्रतिपादित किया| 2-स्कन्द पुराण के अंतर्गत शंकर संहिता और माहेश्वर खंड के केदारखंड के सप्तम अध्याय में दिए हुए सिद्धांत और साधन मार्ग ही वीर शैव मत द्वारा स्वीकार्य हैं| 3-इस मत के अनुयायियों का मानना है कि --- वीरभद्र, नंदी, भृंगी, वृषभ और कार्तिकेय - इन पाँचों ने पांच आचार्यों के रूप में जन्म लेकर इस मत का प्रचार किया| इस मत के ये ही जगत्गुरू हैं| इन पांच आचार्यों ने भारत में पांच मठों की स्थापना की| (1) भगवान रेणुकाचार्य ने वीरपीठ की स्थापना कर्णाटक में भद्रा नदी के किनारे मलय पर्वत के निकट रम्भापुरी में की| (2) भगवान दारुकाचार्य ने सद्धर्मपीठ की स्थापना उज्जैन में महाकाल मन्दिर के निकट की| (3) भगवान एकोरामाराध्याचार्य ने वैराग्यपीठ की स्थापना हिमालय में केदारनाथ मंदिर के पास की| (4) भगवान पंडिताराध्य ने सूर्यपीठ की स्थापना श्रीशैलम में मल्लिकार्जुन मंदिर के पास की| (5) भगवान विश्वाराध्य ने ज्ञानपीठ की स्थापना वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर के पास की| इसे जंगमवाटिका या जंगमवाड़ी भी कहते हैं| 4-वीरशैव मत की तीन शाखाएँ हैं --- (1) लिंगायत, (2) लिंग्वंत, (३) जंगम| 4-वीरशैव के अतिरिक्त अन्य भी अनेक महान शैव परम्पराएँ हैं| सब के दर्शन अति गहन हैं| सब में गहन आध्यात्मिकता है अतः उन पर चर्चा करना असंभव है| कौन सी परंपरा किस के अनुकूल है इसका निर्णय तो स्वयं सृष्टिकर्ता परमात्मा या उनकी शक्ति माँ भगवती ही कर सकती है| प्रत्येक आगम के चार भाग;- 1-२८ शैवागम के एक एक आगम चार भाग में है जैसे वेदो के चार भाग है ;- 1-ब्राह्मण 2-आरण्यक 3- सहिंता , 4-वेदांत 2-वैसे ही तंत्र में भी चार पाद है।

1-चर्या पाद,

2-क्रिया पाद,

3-योग पाद

4-ज्ञान पाद

चर्या और क्रिया पूर्वार्ध तो योग और ज्ञान को उत्तरार्ध कहते हैं ;- 1)चर्या :-

'चर्या' का अर्थ आचरण या व्यवहार है। इन पदों में बतलाया गया है कि साधक के लिये क्या आचरणीय है और क्या अनाचरणीय है। इन पदों के संग्रह को 'चर्यापद' के नाम से अभिहित किया गया है। चर्यापदों के अर्थ को समझने के लिय सहजिया शैवों के दृष्टिकोण को समझ लेना आवश्यक है। साधना और दार्शनिक तत्व दोनों ही दृष्टियों से इन पदों का अध्ययन अपेक्षित है। चर्याकार सिद्धों के लिये साधना ही मुख्य वस्तु थी, वैसे वे दार्शनिक तत्व को भी आँखों से ओझल नहीं होने देते। उपासना पद्दति , नित्यकर्म , साधना मार्ग , रसायन शास्त्र , प्रमख है। 2)क्रिया :-

क्रिया के विषय में बहुसंख्यक प्रकरण ग्रंथ रचित हुए हैं। केवल इतना ही नहीं, तत्संबंधी उपासना, कर्मकांड और यहाँ तक कि लौकिक प्रयोग साधन और प्रयोग विज्ञान के विषय में अनेक ग्रंथ तंत्र साहित्य के अंतर्गत हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि परम अद्वय विज्ञान का सूक्षातिसूक्ष्म विश्लेषण और विवरण जैसा तंत्र ग्रंथों में है वैसा किसी शासत्र के ग्रंथों में नहीं है। साथ ही साथ यह भी सच है कि उच्चाटन, वशीकरण प्रभृति क्षुद्र विद्याओं का प्रयोग विषयक विवरण भी तंत्र में मिलता है। स्पष्टतं: वर्तमान हिंदू समाज वेदाश्रित होने पर भी व्यवहार- में विशेष रूप से तंत्र द्वारा ही नियंत्रित है। 3) योग :-

03 POINTS;-

1-तंत्र में भक्त के लिये सबसे आवश्यक शील है। अष्टांग योग और उसके अभ्यास अवश्यक है हठयोग के साधनों का विवेचन है। शिव दर्शन की महिमा को समझना अवश्यक है ,गुरु और शिव एक ही हैं .

2-अंगलिंग (इष्ट लंग ) , प्राण लिंग, भाव लिंग, आत्मलिंग, सदाशिव और शिवलिंग के छ: आधारों का ज्ञान, धर्माचरण, शिवोपासना, संतमहिमा, योगमुद्रा के साथ शरीररचना, शिव में लीन होने के लिये शरीर त्याग करने की पद्धति, पशु और पाश की व्याख्या आदि तंत्र में गुरु, गुरुमठ, गुरुदर्शन शिवानंद नृत्य, चिदंबर नृत्य, आश्चर्य नृत्य, ज्ञानोदय, शिवदर्शन और समाधिदशा आदि का विस्तृत ज्ञान जिसने लिया वही शैव है . 3-नियमित यम‍-नियम और योग के अनुशासन से जहां उड़ने की शक्ति प्राप्त ‍की जा सकती है वहीं दूसरों के मन की बातें भी जानी जा सकती है। परा और अपरा सिद्धियों को पाना उससे भी कठीन है जितना आज के वैज्ञानिक युग में डाक्टर और इंजीनियर बनना . -तंत्र भौतिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विषयों को समान महत्त्व देता है।

योगिनी कौल क्या है ?- 02 FACTS;- 1-उत्तर कौल मत के अनुयायिओं का प्रमुख साधना केंद्र कामख्या ( असम ) है और पूर्व कौल के मानने वालों का साधना केंद्र श्रीनगर है ! इन दोनों सिद्धांतों को मिलाकर बाद में एक नया सिद्धांत प्रकाश में आया जिसे ”योगिनी कौल ” कहते हैं ! 2-योगिनी कौल सम्प्रदाय के केंद्र की स्थापना कामख्या में हुई ! कहा भी गया है ~ कामरूप इदं शास्त्रं योगिनीनं गृहे गृहे ! यह वही प्रिय सम्प्रदाय है जिसके गर्भ से आगे चलकर ” हठयोग ” का सर्वाधिक प्रिय नाथ सम्प्रदाय प्रकाश में आया और सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ ! सुप्रसिद्ध चौरासी सिद्ध इस सम्प्रदाय से सम्बंधित थे ! नाथ संप्रदाय क्या है ? - 02 FACTS;- 1-इस देश में 8वीं से 11वीं सदी मध्य तक सिद्ध और नाथ नाम के मुख्य तांत्रिक संप्रदायों का बहुत प्रभाव रहा है। आज भी इन दोनों संप्रदायों के अनेक स्थानों पर बड़े-बड़े सिद्ध पीठ हैं। भारत के ग्राम्य समाज में सिद्ध एवं नाथ संप्रदाय के अनुयायियों की खासी बड़ी संख्या है। लोकभाषाओं में लिखे और बिखरे हुए इन संप्रदायों के विपुल साहित्य के विस्तृत अध्ययन के योजनाबद्ध कार्य की अपेक्षा है। 2- इन दोनों संप्रदायों में अनेक प्रकार की साधनाओं का प्रचलन है। सिद्धों में पंचमकार वर्जित नहीं है लेकिन नाथ संप्रदाय में वर्जित है। भारतीय साहित्य शिल्प और स्थापत्य पर इन संप्रदायों का गहरा प्रभाव पड़ा है। कुल का क्या अर्थ है ?- 06 FACTS;- 1-कौलिक की परिभाषा करते हुए कुलार्णव तन्त्र कहता है की ,कुल गोत्र को कहते हैं |यह शिव -शक्ति से उत्पन्न होता है |इसके ज्ञानवान को कौलिक कहते हैं |कुल शक्ति है ,अकुल शिव है |कुलाकुल का अनुसंधाता कौलिक कहलाता है | 2-कौल शास्त्र उर्ध्वाम्नाय ई