Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

सन्त रामकृष्ण परमहंस के उनके अनुसार तंत्र शक्ति का उपार्जन किए बगैर धर्म स्थापन का महान कार्य सम्भव


तन्त्र/तन्त्र-शास्त्र / 'आगम शास्त्र'/निगम आदि का क्या अर्थ है?

14 FACTS;-

1-व्याकरण शास्त्र के अनुसार 'तन्त्र' शब्द ‘तन्’ धातु से बना है जिसका अर्थ है 'विस्तार'। शैव सिद्धान्त के ‘कायिक आगम’ में इसका अर्थ किया गया है, तन्यते विस्तार्यते ज्ञानम् अनेन्, इति तन्त्रम् (वह शास्त्र जिसके द्वारा ज्ञान का विस्तार किया जाता है)। तन्त्र की निरुक्ति ‘तन’ (विस्तार करना) और ‘त्रै’ (रक्षा करना), इन दोनों धातुओं के योग से सिद्ध होती है। इसका तात्पर्य यह है कि तन्त्र अपने समग्र अर्थ में ज्ञान का विस्तार करने के साथ उस पर आचरण करने वालों का त्राण (रक्षा) भी करता है। 2-वैसे तो तन्त्र ग्रन्थों की संख्या हजारों में है, किन्तु मुख्य-मुख्य तन्त्र 64 कहे गये हैं। तन्त्र का प्रभाव विश्व स्तर पर है। इसका प्रमाण हिन्दू, बौद्ध, जैन, तिब्बती आदि धर्मों की तन्त्र-साधना के ग्रन्थ हैं। भारत में प्राचीन काल से ही बंगाल, बिहार और राजस्थान तन्त्र के गढ़ रहे हैं। 3-तन्त्र-शास्त्र का एक नाम 'आगम शास्त्र' भी है। इसके विषय में कहा गया है- जिससे अभ्युदय (लौकिक कल्याण) और निःश्रेयस (मोक्ष) के उपाय बुद्धि में आते हैं, वह 'आगम' कहलाता है।शास्त्रों के एक अन्य स्वरूप को 'निगम' कहा जाता है। 4-निगम के अन्तर्गत वेद, पुराण, उपनिषद आदि आते हैं। इसमें ज्ञान, कर्म और उपासना आदि के विषय में बताया गया है। इसीलिए वेद-शास्त्रों को निगम कहते हैं। उस स्वरूप को व्यवहार (आचरण) में उतारने वाले उपायों का रूप जो शास्त्र बतलाता है, उसे 'आगम' कहते हैं। तन्त्र अथवा आगम में व्यवहार पक्ष ही मुख्य है। 5-तन्त्र, परम्परा से जुड़े हुए आगम ग्रन्थ हैं। तन्त्र शब्द के अर्थ बहुत विस्तृत है। तन्त्र-परम्परा एक हिन्दू एवं बौद्ध परम्परा तो है ही, जैन धर्म, सिख धर्म, तिब्बत की बोन परम्परा, दाओ-परम्परा तथा जापान की शिन्तो परम्परा में पायी जाती है। भारतीय परम्परा में किसी भी व्यवस्थित ग्रन्थ, सिद्धान्त, विधि, उपकरण, तकनीक या कार्यप्रणाली को भी तन्त्र कहते हैं। 6-हिन्दू परम्परा में तन्त्र मुख्यतः शाक्त सम्प्रदाय से जुड़ा हुआ है, उसके बाद शैव सम्प्रदाय से, और कुछ सीमा तक वैष्णव परम्परा से भी। शैव परम्परा में तन्त्र ग्रन्थों के वक्ता साधारणतयः शिवजी होते हैं। बौद्ध धर्म का वज्रयान सम्प्रदाय अपने तन्त्र-सम्बन्धी विचारों, कर्मकाण्डों और साहित्य के लिये प्रसिद्ध है। 7-तन्त्र का शाब्दिक उद्भव इस प्रकार माना जाता है - “तनोति त्रायति तन्त्र”। जिससे अभिप्राय है – तनना, विस्तार, फैलाव इस प्रकार इससे त्राण होना तन्त्र है। हिन्दू, बौद्ध तथा जैन दर्शनों में तन्त्र परम्परायें मिलती हैं। यहाँ पर तन्त्र साधना से अभिप्राय "गुह्य या गूढ़ साधनाओं" से किया जाता रहा है। 8-तन्त्रों को वेदों के काल के बाद की रचना माना जाता है जिसका विकास प्रथम सहस्राब्दी के मध्य के आसपास हुआ। साहित्यक रूप में जिस प्रकार पुराण ग्रन्थ मध्ययुग की दार्शनिक-धार्मिक रचनायें माने जाते हैं उसी प्रकार तन्त्रों में प्राचीन-अख्यान, कथानक आदि का समावेश होता है। अपनी विषयवस्तु की दृष्टि से ये धर्म, दर्शन, सृष्टिरचना शास्त्र, प्राचीन विज्ञान आदि के इनसाक्लोपीडिया भी कहे जा सकते हैं। 9-तन्त्र का सामान्य अर्थ है 'विधि' या 'उपाय'। विधि या उपाय कोई सिद्धान्त नहीं है। सिद्धान्तों को लेकर मतभेद हो सकते हैं। विग्रह और विवाद भी हो सकते हैं, लेकिन विधि के सम्बन्ध में कोई मतभेद नहीं है। डूबने से बचने के लिए तैरकर ही आना पड़ेगा। बिजली चाहिए तो कोयले, पानी का अणु का रूपान्तरण करना ही पड़ेगा। दौड़ने के लिए पाँव आगे बढ़ाने ही होंगे। पर्वत पर चढ़ना है तो ऊँचाई की तरफ कदम बढ़ाये बिना कोई चारा नहीं है। यह क्रियाएँ 'विधि' कहलाती हैं। 10-तन्त्र अथवा आगम में व्यवहार पक्ष ही मुख्य है। तन्त्र की दृष्टि में शरीर प्रधान निमित्त है। उसके बिना चेतना के उच्च शिखरों तक पहुँचा ही नहीं जा सकता। इसी कारण से तन्त्र का तात्पर्य ‘तन’ के माध्यम से आत्मा का ’त्राण’ या अपने आपका उद्धार भी कहा जाता है। यह अर्थ एक सीमा तक ही सही है। वास्तव में तन्त्र साधना में शरीर, मन और काय कलेवर के सूक्ष्मतम स्तरों का समन्वित उपयोग होता है। यह अवश्य सत्य है कि तन्त्र शरीर को भी उतना ही महत्त्व देता है जितना कि मन, बुद्घि और चित को। 11-कर्मकाण्ड और पूजा-उपासना के तरीके सभी धर्मों में अलग-अलग हैं, पर तन्त्र के सम्बन्ध में सभी एकमत हैं। सभी धर्मों का मानना है मानव के भीतर अनन्त ऊर्जा छिपी हुई है, उसका पाँच-सात प्रतिशत हिस्सा ही कार्य में आता है, शेष भाग बिना उपयोग के ही पड़ा रहता है। सभी धर्म–सम्प्रदाय इस बात को एक मत से स्वीकार करते हैं व अपने हिसाब से उस भाग का मार्ग भी बताते हैं। 12-उन धर्म-सम्प्रदायों के अनुयायी अपनी छिपी हुई शक्तियों को जगाने के लिए प्रायः एक समान विधियां ही काम में लाते हैं। उनमें जप, ध्यान, एकाग्रता का अभ्यास और शरीरगत ऊर्जा का सघन उपयोग शामिल होता है। यही तन्त्र का प्रतिपाद्य है। तन्त्रोक्त मतानुसार मन्त्रों के द्वारा यन्त्र के माध्यम से भगवान की उपासना की जाती है। 13-विषय को स्पष्ट करने के लिए तन्त्र-शास्त्र भले ही कहीं सिद्धान्त की बात करते हों, अन्यथा आगम-शास्त्रों का तीन चौथाई भाग विधियों का ही उपदेश करता है। तन्त्र के सभी ग्रन्थ शिव और पार्वती के संवाद के अन्तर्गत ही प्रकट हैं। देवी पार्वती प्रश्न करती हैं और शिव उनका उत्तर देते हुए एक विधि का उपदेश करते हैं। अधिकांश प्रश्न समस्याप्रधान ही हैं। 14-सिद्धान्त के सम्बन्ध में भी कोई प्रश्न पूछा गया हो तो भी शिव उसका उत्तर कुछ शब्दों में देने के उपरान्त विधि का ही वर्णन करते हैं। आगम शास्त्र के अनुसार 'करना' ही जानना है, अन्य कोई 'जानना' ज्ञान की परिभाषा में नहीं आता। जब तक कुछ किया नहीं जाता, साधना में प्रवेश नहीं होता, तब तक कोई उत्तर या समाधान नहीं है।

‘तंत्र-विज्ञान की क्या विशेषता है?-

18 FACTS;-

1-साँस्कृतिक विभूतियों-उपलब्धियों की गौरव कथा ‘तंत्र-विज्ञान’ के विवेचन-विश्लेषण के बिना आधी-अधूरी ही कही जायेगी। इस देश के ऋषियों ने अन्तः प्रकृति व बाह्य प्रकृति के क्षेत्र में जो कुछ बहुमूल्य प्रयोग किए-प्रक्रियाएँ विकसित की, तंत्र को उन सब में बेशकीमती ठहराया जा सकता है। 2-इसे हतभाग्य के सिवा और क्या कहें-कि इस समर्थ विज्ञान को सदियों से अगणित भ्रान्तियों में जकड़े रहना पड़ा। भारतीय और पश्चिमी विद्वानों ने बिना समझे बूझे इसकी ..संस्कृति की एक उपेक्षित सम्पदा-तंत्र विद्या 1-साँस्कृतिक विभूतियों-उपलब्धियों की गौरव कथा ‘तंत्र-विज्ञान’ के विवेचन-विश्लेषण के बिना आधी-अधूरी ही कही जायेगी। इस देश के ऋषियों ने अन्तः प्रकृति व बाह्य प्रकृति के क्षेत्र में जो कुछ बहुमूल्य प्रयोग किए-प्रक्रियाएँ विकसित की, तंत्र को उन सब में बेशकीमती ठहराया जा सकता है। 2-इसे हतभाग्य के सिवा और क्या कहें-कि इस समर्थ विज्ञान को सदियों से अगणित भ्रान्तियों में जकड़े रहना पड़ा। भारतीय और पश्चिमी विद्वानों ने बिना समझे बूझे इसकी निन्दा के पुल बाँध दिये । उन्होंने यह भी इच्छा व्यक्त की कि जनसाधारण को कुमार्ग की ओर प्रवृत्त करने वाले इस साहित्य का लोप होना ही जनहित में है। विद्वान इसके अध्ययन से दूर रहे, जनसामान्य का इधर ध्यान नहीं गया । परिणाम स्वरूप इसका धीरे-धीरे लोप होता गया। 3-जनसाधारण में इसके व्यापक प्रचार न होने का एक कारण यह भी रहा कि तंत्रों के कुछ अंश समझने में इतने कठिन और गहन थे जो योग्य गुरु के बिना समझें नहीं जा सकते थे। अतः जनता का इनके प्रति अन्धकार में रहना स्वाभाविक था। तंत्र ज्ञान का अभाव ही भ्रम और शंकाओं का कारण बना। 4-इसी का जिक्र करते हुए अँग्रेज मनीषी हर्बर्ट वी. गैन्थर ने अपने ग्रन्थ ‘युग-नाथा’ में लिखा है-संसार में शायद ही कोई अन्य साहित्य होगा। जिसकी इतनी अधिक निन्दा की गई हो। वह भी ऐसे लोगों के द्वारा जिन्होंने न तो उसकी एक भी पंक्ति पढ़ी और न उस पर गम्भीरतापूर्वक मनन किया । इसके महत्व को बताते हुए वह आगे कहते हैं-’वास्तविक तथ्य यह है कि तंत्रों में जीवन सम्बन्धी बड़े गम्भीर और स्वस्थ विचारों का समावेश है। 5-पर जिस प्रकार हम अपने शरीर में स्थित गुर्दे की उपयोगिता तब तक नहीं समझ पाते जब तक कि जीवित शरीर की संचालन क्रिया में अन्य भागों के साथ उसके सम्बन्ध को न जान लें। उसी प्रकार समस्त मानव जीवन की महत्वपूर्ण क्रियाओं पर विचार किए बिना हम इसकी वास्तविकता नहीं जान सकते। जिनमें वास्तविकता जानने की ललक है वे तंत्र का मूल वेदों में खोज लेते हैं। 6-हरित ऋषि के अनुसार ''श्रुति के दो प्रकार हैं- वैदिकी और तान्त्रिकी । ऋग्वेद का देवी सूक्त, वैदिक ऋषि विश्वामित्र द्वारा किए गए बला-अतिबला महाविद्या के प्रयोग इन ऋषियों की ताँत्रिक समर्थता और वेदों से इनकी अविच्छिन्नता का परिचय देने के लिए पर्याप्त है। 7-अथर्ववेद के प्रवर्तक महा अथर्वण की परम्परा तो इसका भरा-पूरा भण्डार है। तंत्र ग्रन्थों से अथर्ववेद में वर्णित प्रक्रियाएँ इतना अधिक साम्य उपस्थित करती हैं कि किसी भी अध्येयता को चकित रहना पड़ सकता है। इसे न समझ पाने के कारण कुछ विद्वान वेदों और तंत्रों को अलग-अलग ही नहीं परस्पर विरोधी मान बैठते हैं। जबकि यथार्थ में इस साहित्य में जो ज्ञान और योग का वर्णन है वह वैदिक सिद्धांतों से भिन्न नहीं, उनका विकास मात्र है। 8-उदाहरण के लिए अंतर्जगत का विस्तृत विज्ञान वैदिक वाङ्मय में दस भागों में बँटा हुआ है। (1) उद्गीय विद्या (2) संवर्ण विद्या (3) मधुविद्या (4) पंचाग्नि विद्या (5) उपकोशल विद्या (6) शाँडिल्य विद्या (7) दहर विद्या (8) भूमा विद्या (9) गंध विद्या (10) दीर्घायुष्य विद्या। यह विद्याएँ ही ऋषियों की सम्पत्ति थीं। इन्हीं के द्वारा वे अपरिग्रही व निर्धन रहते हुए भी इस भूलोक में कुबेर भण्डारी बने हुए थे। 9-तंत्र मार्ग में यही दस विद्याएँ अन्य नामों से उपलब्ध हैं। यद्यपि तंत्रोक्त विधान वैदिक से भिन्न है। फिर भी उनके द्वारा भी उन्हीं सिद्धियों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। तंत्र मार्ग में (1) इन्द्राणी (2) वैष्णवी (3) ब्रह्माणी (4) कौमारी (5) नरसिंही (6) बाराही (7) माहेश्वरी (8) भैरवी (9) चण्डी (10) आग्नेयी- इन दस नामों से दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। 10-इसके विकास और विस्तार क्रम में नेपाल, कम्बोडिया, बाली, लाओस, थाईलैण्ड, वर्मा, हिन्द’-चीन, वियतनाम, जावा’-मंगोलिया शैव तंत्र से प्रभावित हुए। चीन, जापान, इंडोनेशिया तिब्बत में शाक्त तंत्र का प्रभाव पहुँचा। अन्वेषकों ने अरब में काफी संख्या में शिवलिंग पाए हैं। ऐसा कहा जाता है कि मक्का शरीफ में संग ए असबद नामक शिवलिंग को हज पर जाने वाले यात्री बड़ी श्रद्धा से चूमते हैं। 11-दक्षिण अमेरिका के पेरु राज्य में शिवलिंग मिले हैं। ब्राजील के खण्डहरों से शिव प्रतिमाएँ मिली हैं । मिश्र में असिरिस और आइसिस नामक शिवलिंग की पूजा की प्रथा है। शिव की तरह असिरिस व्याघ्र चर्म ओढ़े गले में सर्प लपेटे हैं। उनका वाहन एपिस नाम का बैल है यूनान में बेकस और प्रियसस नाम से लिंग उपासना का भी कुछ ऐसा ही विस्तार हुआ। 12- “मिथ आँव चाइना एण्ड जापान” में लिखा है चीन देवताओं की माता चुनी थीं। जो आदिम जल राशि अपस की देवी मानी जाती है। ‘इजिन्शियन मिथ एण्ड आई एजेण्ड ‘ में लिखा है मिश्र में आकाश की देवी का नाम नटु था जो अपने शरीर से ही समस्त प्राणियों को पैदा करती थी। यूरोप की आदिम जातियों में दसु को धर्म में शिव-शक्ति का प्रतिपादन इन शब्दों में किया है कि आकाश पिता है। पृथ्वी माता है। तिब्बत में शक्ति उपासना की देवी संसर्गिया सस्पियनमा है।

15-तंत्र का सर्वप्रथम अर्थ ऋग्-वेद से प्राप्त होता हैं, जिसके अनुसार यह एक ऐसा करघा हैं जो ज्ञान को बढ़ता हैं। जिसके अंतर्गत, भिन्न-भिन्न प्रकार से ज्ञान प्राप्त कर, बुद्धि तथा शक्ति दोनों को बढ़ाया जाता हैं। तंत्र के सिद्धांत आध्यात्मिक साधनाओं, रीति-रिवाजों के पालन, भैषज्य विज्ञान, अलौकिक तथा पारलौकिक शक्तिओं की प्राप्ति हेतु, काल जादू-इंद्र जाल, अपने विभिन्न कामनाओं के पूर्ति हेतु, योग द्वारा निरोग रहने, ब्रह्मत्व या मोक्ष प्राप्ति हेतु, वनस्पति विज्ञान, सौर्य-मण्डल, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष विज्ञान, शारीरिक संरचना विज्ञान इत्यादि से सम्बद्ध हैं या कहे तो ये सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्ति का भंडार हैं।

16-हिन्दू धर्मों के अनुसार हजारों तंत्र ग्रन्थ हैं, परन्तु काल के दुष्प्रभाव के परिणामस्वरूप कुछ ग्रन्थ लुप्त हो गए हैं। 1-तंत्र का एक अंधकार युक्त भाग भी हैं, जिसके अनुसार हानि से संबंधित क्रियाओं का प्रतिपादन होता हैं। परन्तु यह संपूर्ण रूप से साधक के ऊपर ही निर्भर हैं की वह तंत्र पद्धति से प्राप्त ज्ञान का किस प्रकार से उपयोग करता हैं।

17-कामिका तंत्र के अनुसार, तंत्र शब्द दो शब्दों के मेल से बना हैं पहला 'तन' तथा दूसरा 'त्र'। 'तन' शब्द बड़े पैमाने पर प्रचुर मात्रा में गहरे ज्ञान से हैं तथा 'त्र' शब्द का अर्थ सत्य से हैं। अर्थात प्रचुर मात्र में वह ज्ञान जिसका सम्बन्ध सत्य से है वही तंत्र हैं।

18- तंत्र संप्रदाय अनुसार वर्गीकृत हैं, भगवान विष्णु के अनुयायी जो वैष्णव कहलाते हैं, इनका सम्बन्ध 'संहिताओं' से हैं तथा शैव तथा शक्ति के अनुयायी जिन्हें शैव या शक्ति संप्रदाय के नाम से जाना जाता हैं, इनका सम्बन्ध क्रमशः आगम तथा तंत्र से हैं। आगम तथा तंत्र शास्त्र, भगवान शिव तथा पार्वती के परस्पर वार्तालाप से अस्तित्व में आये हैं तथा इनके गणो द्वारा लिपि-बद्ध किये गए हैं। ब्रह्मा जी से सम्बंधित तंत्रों को 'वैखानख' कहा जाता हैं।

तंत्र शास्त्र के भाग;-

04 POINTS;-

1- दार्शनिक दृष्टि से तंत्र तीन भागों में विभाजित हैं;-

1- द्वैत

2-अद्वैत

3-द्वैता-द्वैत।

2-वैचारिक मत से तंत्र शास्त्र चार भागों में विभक्त है;-

1- आगम

2-यामल

3- डामर

4-तंत्र।

3-प्रथम तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आगम ग्रन्थ माने जाते हैं। आगम वे ग्रन्थ हैं जो भगवान शिव तथा पार्वती के परस्पर वार्तालाप के कारण अस्तित्व में आये हैं तथा भगवान विष्णु द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। भगवान शिव द्वारा कहा गया तथा पार्वती द्वारा सुना गया आगम नाम से जाना जाता हैं; इसके विपरीत पार्वती द्वारा बोला गया तथा शिव जी के द्वारा सुना गया निगम के नाम से जाना जाता हैं।

4-इन्हें सर्वप्रथम भगवान विष्णु द्वारा सुना गया हैं तथा उन्होंने ही आगम-निगमो को मान्यता प्रदान की हैं। भगवान विष्णु के द्वारा गणेश, गणेश द्वारा नंदी तथा नंदी द्वारा अन्य गणो को इन ग्रंथों का उपदेश दिया गया हैं।

शिव जी के पाँच मस्तक अर्थात पाँच शक्ति ;-

आगम ग्रंथों के अनुसार शिव जी पंच-वक्त्र हैं, अर्थात इनके पाँच मस्तक हैं; 1-ईशान 2-तत्पुरुष 3-सद्योजात 4- वामदेव 5- अघोर। शिव जी के प्रत्येक मस्तक भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्तिओं के प्रतीक हैं; क्रमशः सिद्धि, आनंद, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया हैं।

आगम श्रेणी क्या है ? -

02 POINTS;-

1-भगवान शिव मुख्यतः तीन अवतारों में अपने आपको प्रकट करते हैं १. शिव २. रुद्र तथा ३. भैरव, इन्हीं के अनुसार वे ३ श्रेणिओ के आगमों को प्रस्तुत करते हैं १. शैवागम २. रुद्रागम ३. भैरवागम। प्रत्येक आगम श्रेणी, स्वरूप तथा गुण के अनुसार हैं।

2-शैवागम : भगवान शिव ने अपने ज्ञान को १० भागों में विभक्त कर दिया तथा उन से सम्बंधित 10 आगम शैवागम नाम से जाने जाते हैं।

रुद्रागम १८ भागों में विभक्त हैं।भैरवागम के रूप में,

यह ६४ भागों में विभाजित किया गया है।

तन्त्रशास्त्र के सात लक्षण क्या है ? - 07 POINTS;- तन्त्र, क्रियाओं और अनुष्ठान पर बल देता है। ‘वाराही तन्त्र’ में इस शास्त्र के जो सात लक्षण बताए हैं, उनमें व्यवहार ही मुख्य है। ये सात लक्षण हैं- 1-सृष्टि, 2-प्रत्यय, 3-देवार्चन, 4-सर्वसाधन (सिद्धियां प्राप्त करने के उपाय), 5-पुरश्चरण (मारण, मोहन, उच्चाटन आदि क्रियाएं), 6-षट्कर्म (शान्ति, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण के साधन), 7-ध्यान (ईष्ट के स्वरूप का एकाग्र तल्लीन मन से चिन्तन)। तन्त्रों की विषय वस्तु क्या है ? - 05 POINTS;- तन्त्रों की विषय वस्तु को मोटे तौर पर निम्न तौर पर बतलाया जा सकता है;- 1-ज्ञान, या दर्शन, 2-योग, 3-कर्मकाण्ड, 4-विशिष्ट-साधनायें, पद्धतियाँ तथा समाजिक आचार-विचार के नियम। 5-सांख्य तथा वेदान्त के अद्वैत विचार दोनों का प्रभाव तन्त्र ग्रन्थों में दिखलायी पड़ता है। तन्त्र में प्रकृति के साथ शिव, अद्वैत दोनों की बात की गयी है। परन्तु तन्त्र दर्शन में ‘शक्ति’ (ईश्वर की शक्ति) पर विशेष बल दिया गया है। तन्त्र की तीन परम्परायें क्या है ? - ;- 05 POINTS;- तन्त्र की तीन परम्परायें मानी जाती हैं – 1-शैव आगम या शैव तन्त्र, 2-वैष्णव संहितायें 3-शाक्त तन्त्र 1-शैव आगम ;- शैव आगमों की चार विचारधारायें हैं – (१) शैव सिद्धांत, (२) तमिल शैव, (३) कश्मीरी शैवदर्शन (४) वीरशैव या लिंगायत शैव दर्शन भारतीय परम्परा में आगमों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन मन्दिरों, प्रतिमाओं, भवनों, एवं धार्मिक-आध्यात्मिक विधियों का निर्धारण इनके द्वारा हुआ है। शैव सिद्धान्त क्या है ? - 02 POINTS;- 1-प्राचीन तौर पर शैव सिद्धान्त के अन्तर्गत 28 आगम तथा 150 उपागमों को माना गया है। 2-शैव सिद्धान्त के अनुसार सैद्धान्तिक रूप से शिव ही केवल चेतन तत्त्व हैं तथा प्रकृति जड़ तत्त्व है। शिव का मूलाधार शक्ति ही है। शक्ति के द्वारा ही बन्धन एवं मोक्ष प्राप्त होता है। कश्मीरी शैवदर्शन क्या है ? - 02 POINTS;- 1-प्रमुख ग्रन्थ शिवसूत्र है। इसमें शिव की प्रत्यभिज्ञा के द्वारा ही ज्ञान प्राप्ति को कहा गया है। जगत् शिव की अभिव्यक्ति है तथा शिव की ही शक्ति से उत्पन्न या संभव है। 2- इस दर्शन को ‘त्रिक’ दर्शन भी कहा जाता है क्योंकि यह – शिव, शक्ति तथा जीव (पशु) तीनों के अस्तित्व को स्वीकार करता है। वीरशैव दर्शन क्या है ? -;- 02 POINTS;- 1-इस दर्शन का महत्पूर्ण ग्रन्थ “वाचनम्” है जिससे अभिप्राय है ‘शिव की उक्ति’। 2-यह दर्शन पारम्परिक तथा शिव को ही पूर्णतया समस्त कारक, संहारक, सर्जक मानता है। इसमें जातिगत भेदभाव को भी नहीं माना गया है। इस दर्शन के अन्तर्गत गुरु परम्परा का विशेष महत्व है। आगम का मुख्य लक्ष्य क्या है ? - 02 POINTS;- 1-आगम का मुख्य लक्ष्य 'क्रिया' के ऊपर है, तथापि ज्ञान का भी विवरण यहाँ कम नहीं है। 'वाराहीतंत्र' के अनुसार आगम इन सात लक्षणों से समवित होता है : सृष्टि, स्थिति , प्रलय, देवतार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरण, षट्कर्म, (=शांति, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन तथा मारण) साधन तथा ध्यानयोग। 2-'महानिर्वाण' तंत्र के अनुसार कलियुग में प्राणी मेध्य (पवित्र) तथा अमेध्य (अपवित्र) के विचारों से बहुधा हीन होते हैं और इन्हीं के कल्याणार्थ भगवान महेश्वर ने आगमों का उपदेश पार्वती को स्वयं दिया। शैव आगम (पाशुपत, वीरशैव सिद्धांत, त्रिक आदि) द्वैत, शक्तिविशिष्टद्वैत तथा अद्वैत की दृष्टि से भी इनमें तीन भेद माने जाते हैं। आगमिक पूजा विशुद्ध तथा पवित्र भारतीय है। मूल शिवागम की संख्या क्या है ? - 03 POINTS;- 1-२८ शैवागम सिद्धांत के रूप में विख्यात हैं। 'भैरव आगम' संख्या में चौंसठ सभी मूलत: शैवागम हैं। इनमें द्वैत भाव से लेकर परम अद्वैत भाव तक की चर्चा है। 2-किरणागम, में लिखा है कि, विश्वसृष्टि के अनंतर परमेश्वर ने सबसे पहले महाज्ञान का संचार करने के लिये दस शैवो का प्रकट करके उनमें से प्रत्येक को उनके अविभक्त महाज्ञान का एक एक अंश प्रदान किया। इस अविभक्त महाज्ञान को ही शैवागम कहा जाता है। 3-वेद जैसे वास्तव में एक है और अखंड महाज्ञान स्वरूप है, परंतु विभक्त होकर तीन अथवा चार रूपों में प्रकट हुआ है, उसी प्रकार मूल शिवागम भी वस्तुत: एक होने पर भी विभक्त होकर २८ आगमों के रूप में प्रसिद्व हुआ है। इन समस्त आगमधाराओं में प्रत्येक की परंपरा है। वैष्णव संहिता क्या है?- 04 POINTS;- 1-वैष्णव संहिता की दो विचारधारायें मिलती हैं – वैखानस संहिता, तथा पंचरात्र संहिता। 2-वैखानस संहिता क्या है?- यह वैष्णव परम्परा के वैखानस विचारधारा है। वैखानस परम्परा प्राथमिक तौर पर तपस् एवं साधन परक परम्परा रही है। 3-पंचरात्र संहिता क्या है?-– पंचरात्र से अभिप्राय है – ‘पंचनिशाओं का तन्त्र’। पंचरात्र परम्परा प्रचीनतौर पर विश्व के उद्भव, सृष्टि रचना आदि के विवेचन को समाहित करती है। इसमें सांख्य तथा योग दर्शनों की मान्यताओं का समावेश दिखायी देता है। 4-वैखानस परम्परा की अपेक्षा पंचरात्र परम्परा अधिक लोकप्रचलन में रही है। इसके 108 ग्रन्थों के होने को कहा गया है। वैष्णव परम्परा में भक्ति वादी विचारधारा के अतिरिक्त शक्ति का सिद्धान्त भी समाहित है।

शाक्त तन्त्र क्या है?-

07 FACTS;-

1-शाक्त सम्प्रदाय' हिन्दू धर्म के तीन प्रमुख सम्प्रदायों में से एक है। इस सम्प्रदाय में सर्वशक्तिमान को देवी (पुरुष नहीं, स्त्री) माना जाता है। कई देवियों की मान्यता है जो सभी एक ही देवी के विभिन्न रूप हैं। शाक्त मत के अन्तर्गत भी कई परम्पराएँ मिलतीं हैं जिसमें लक्ष्मी से लेकर भयावह काली तक हैं। कुछ शाक्त सम्प्रदाय अपनी देवी का सम्बन्ध शिव या विष्णु से बताते हैं।

2-हिन्दुओं के श्रुति तथा स्मृति ग्रन्थ, शाक्त परम्परा का प्रधान ऐतिहासिक आधार बनाते हुए दिखते हैं। इसके अलावा शाक्त लोग देवीमाहात्म्य, देवीभागवत पुराण तथा शाक्त उपनिषदों (जैसे, देवी उपनिषद) पर आस्था रखते हैं।

3-'शक्ति की पूजा' शक्ति के अनुयायियों को अक्सर 'शाक्त' कहा जाता है। शाक्त न केवल शक्ति की पूजा करते हैं, बल्कि उसके शक्ति–आविर्भाव को मानव शरीर एवं जीवित ब्रह्माण्ड की शक्ति या ऊर्जा में संवर्धित, नियंत्रित एवं रूपान्तरित करने का प्रयास भी करते हैं। विशेष रूप से माना जाता है कि शक्ति, कुंडलिनी के रूप में मानव शरीर के गुदा आधार तक स्थित होती है। जटिल ध्यान एवं यौन–यौगिक अनुष्ठानों के ज़रिये यह कुंडलिनी शक्ति जागृत की जा सकती है।

4-धर्म ग्रंथ' शाक्त सम्प्रदाय में देवी दुर्गा के संबंध में 'श्रीदुर्गा भागवत पुराण' एक प्रमुख ग्रंथ है, जिसमें 108 देवी पीठों का वर्णन किया गया है। उनमें से भी 51-52 शक्ति पीठों का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसी में दुर्गा सप्तशति भी है।

5-'दर्शन' शाक्तों का यह मानना है कि दुनिया की सर्वोच्च शक्ति स्त्रेण है। इसीलिए वे देवी दुर्गा को ही ईश्वर रूप में पूजते हैं। दुनिया के सभी धर्मों में ईश्वर की जो कल्पना की गई है, वह पुरुष के समान की गई है। अर्थात ईश्वर पुरुष जैसा हो सकता है, किंतु शाक्त धर्म दुनिया का एकमात्र ऐसा धर्म है, जो सृष्टि रचनाकार को जननी या स्त्रेण मानता है। सही मायने में यही एकमात्र धर्म स्त्रियों का धर्म है। शिव तो शव है, शक्ति परम प्रकाश है। हालाँकि शाक्त दर्शन की सांख्य समान ही है।

6-प्राचीनता' सिंधु घाटी सभ्यता में भी मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। शाक्त सम्प्रदाय प्राचीन सम्प्रदाय है। गुप्त काल में यह उत्तर-पूर्वी भारत, कम्बोडिया, जावा, बोर्निया और मलाया प्राय:द्वीपों के देशों में लोकप्रिय था। बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद इसका प्रभाव कम हुआ।

7-तंत्र में शाक्त शाखा के अनुसार ६४ तंत्र और ३२७ उप तंत्र, यमल, डामर और संहिताये हैं।

उद्देश्य;-

02 POINTS;-

1-सभी सम्प्रदायों के समान ही शाक्त सम्प्रदाय का उद्देश्य भी मोक्ष है। फिर भी शक्ति का संचय करो, शक्ति की उपासना करो, शक्ति ही जीवन है, शक्ति ही धर्म है, शक्ति ही सत्य है, शक्ति ही सर्वत्र व्याप्त है और शक्ति की सभी को आवश्यकता है। बलवान बनो, वीर बनो, निर्भय बनो, स्वतंत्र बनो और शक्तिशाली बनो।2-इसीलिए नाथ और शाक्त सम्प्रदाय के साधक शक्तिमान बनने के लिए तरह-तरह के योग और साधना करते रहते हैं। सिद्धियाँ प्राप्त करते रहते हैं। शक्ति से ही मोक्ष पाया जा सकता है। शक्ति नहीं है तो सिद्ध, बुद्धि और समृद्धि का कोई मतलब नहीं है। ...CONTD..

....SHIVOHAM...


 
 
</