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ॐ मन्त्र का क्या महत्व है?क्या रहस्य है ॐ के उच्चारण का ?


ॐ मन्त्र का रहस्य/महत्व;-

05 FACTS;-

1-मंत्र, यंत्र और तंत्र एक ही शक्ति के तीन रुप हैं। इनमें से मंत्र का संसार सबसे प्राचीनतम, विचित्र और प्रभावशाली है। सृष्टि से पहले जब कुछ भी नहीं था तब वहॉ एक ध्वनि मात्र ही सब जगह व्याप्त थी। वह ध्वनि, प्रतिध्वनि, नाद आदि एक शब्द था, एक स्वर था। वह शब्द एक स्वर-लय पर आधारित था। वह ध्वनि अथवा नाद आदि और कुछ नहीं वस्तुतः ओउम् था।

2-ओउम् में कुल तीन अक्षर हैं - अ, उ और म। आकार से विराट अग्नि, विष्णु आदि से अर्थ लिया जाता है। उकार से हिरण्य गर्भ, शंकर, तेजस आदि का अभिप्राय है। मकार ईश्वर की प्राप्ति , प्रकृति आदि का बोध करवाता है। शास्त्रों के अनुसार इसका स्थूल अर्थ इस प्रकार से समझा जा सकता है - अ से सृष्टि की उत्पत्ति, उ से स्थिति और म से प्रलय का अर्थ ध्वनित होता है।

3-स्वभाविक दृष्टिकोण से देखें तो अ उच्चारण करने से मॅुह खुल जाता है। उ से वह और भी अधिक विस्तार ले लेता है और म से वह स्वतः बंद हो जाता है। ऐसी ध्वनि और ऐसी मुद्रा अन्य सैकड़ों शब्दों से भी ध्वनित होती है। फिर ओउम् में ही ऐसी क्या विशेषता है?

4-यह प्रश्न अनेक जिज्ञासु मन में उत्पन्न हो सकता है। सटीक उत्तर के लिए इस शब्द की होने वाली ध्वनि, नाद, निनाद आदि में जाना पड़ेगा। क्योंकि इस प्रश्न का सार-सत शब्द के अर्थ, उसकी तदनुसार चर्चा और तर्क-कुतर्क में नहीें वरन उसकी ध्वनि और नाद में निहित है। समस्त ब्रह्माण्ड का प्रतीक चिन्ह ॐ अपने में अदभुत है।

5-असंख्य आकाश गंगाओं का विस्तार ब्रह्माण्ड में ॐ की तरह ही फैला हुआ है। ब्रह्म के शास्त्रोक्त अर्थ, विस्तार अथवा फैलाव की तरह ही ॐ का विस्तार भी अनन्तानन्त है। इसी लिए ॐ समस्त मंत्रों का सार कहा गया है। बौद्धिक अध्ययनों में ॐ के अनन्त अर्थ बताए हैं इसीलिए इसको अन्य शब्दों से अलग अनादि, अनंत तथा निर्वाण अवस्था का प्रतीक कहा गया है।

‘ॐ’ ओंकार क्या है?-

09 FACTS;-

1-ओंकार का अर्थ है, जिस दिन व्यक्ति अपने को विश्व के साथ एक अनुभव करता है, उस दिन जो ध्वनि बरसती है। जिस दिन व्यक्ति का आकार से बंध हुआ आकाश निराकार आकाश में गिरता है, जिस दिन व्यक्ति की छोटी-सी सीमित लहर असीम सागर में खो जाती है, उस दिन जो संगीत बरसता है, उस दिन जो ध्वनि का अनुभव होता है, उस दिन जो मूल-मंत्र गूंजता है, उस मूल-मंत्र का नाम ओंकार है। ओंकार जगत की परम शांति में गूंजने वाले संगीत का नाम है।

2-गीता में श्रीकृष्ण कहते है – “मैं जानने योग्य पवित्र ओंकार हूं”।ओंकार का अनुभव

इस जगत का आत्यंतिक, अंतिम अनुभव है , दि आल्टिमेट फ्रयूचर। जो आखिरी बात हो

सकती है, वह है ओंकार का अनुभव।ओंकार जगत की परम शांति में गूंजने वाले संगीत का नाम है। ओंकार का अर्थ है – “दि बेसिक रियलिटी” वह जो मूलभूत सत्य है, जो सदा रहता है। जब तक हम शोरगुल से भरे है, वह सूक्ष्मतम् ध्वनि नहीं सुन सकते।

3-संगीत दो तरह के हैं। एक संगीत जिसे पैदा करने के लिए हमें स्वर उठाने पड़ते हैं, शब्द जगाने पड़ते हैं, ध्वनि पैदा करनी पड़ती है। इसका अर्थ हुआ, क्योंकि ध्वनि पैदा करने का अर्थ होता है कि कहीं कोई चीज घर्षण करेगी, तो ध्वनि पैदा होगी। जैसे ताली बजाओ , तो आवाज पैदा होगी। यह दो हथेलियों के बीच जो घर्षण , संघर्ष होगा, उससे आवाज पैदा होगी।

तो हमारा जो संगीत है, जिससे हम परिचित हैं, वह संगीत संघर्ष का संगीत है। चाहे होंठ से होंठ टकराते हों, चाहे कंठ के भीतर की मांस-पेशियां टकराती हों, चाहे मुंह से निकलती हुई वायु का ध्क्का आगे की वायु से टकराता हो, लेकिन टकराहट से पैदा होता है संगीत। हमारी सभी ध्वनियां टकराहट से पैदा होती हैं। हम जो भी बोलते हैं, वह एक व्याघात है, एक डिस्टरबेंस है।

4-ओंकार उस ध्वनि का नाम है, जब सब व्याघात खो जाते हैं, सब तालियां बंद हो जाती हैं, सब संघर्ष सो जाता है, सारा जगत विराट शांति में लीन हो जाता है, तब भी उस सन्नाटे में एक ध्वनि सुनाई पड़ती है। वह सन्नाटे की ध्वनि है; “Voice of Silence” वह शून्य का स्वर है। उस क्षण सन्नाटे में जो ध्वनि गूंजती है, उस ध्वनि का, उस संगीत का नाम ओंकार है। अब तक हमने जो ध्वनियां जानी हैं, वे पैदा की हुई हैं। अकेली एक ध्वनि है, जो पैदा की हुई नहीं है; जो जगत का स्वभाव है; उस ध्वनि का नाम ओंकार है।

5-अनाहत का अर्थ है स्वयं से स्वयं उत्पन्न, अन्य ध्वनियों की तरह न की जाने वाली अर्थात् एक ऐसा नाद जो ब्रह्माड में भॅवरे की गुंजन की तरह सर्वदा और सदा से व्याप्त है। इस गुह्य तथा दिव्य सार-सत को केवल योग साधना, ध्यान, मनन आदि द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है।वैज्ञानिक

दृष्टिकोंण से देखें तो कोई भी ध्वनि जब की जाती है तो वह किसी पदार्थ के परस्पर टकराने से होती है, मानव प्रयासों से उत्पन्न की जाती है आदि। दूसरे ध्वनि हुई और नियमानुसार कुछ समय में स्वतः समाप्त हो गयी अथवा कहें कि ब्रह्माड में व्याप्त हो गयी। परन्तु ॐ समस्त शब्दों में से अलग अकेला एक ऐसा है जिसका कि प्रारम्भ तो है लेकिन अन्त नहीें है।

6-यह ध्वनि की नहीं जाती स्वयं में व्याप्त है। जितने भी शब्द, अक्षर, स्वर, व्यंजन, ध्वनि आदि हैं वह अनाहत नहीं हैं। मात्र ॐ ही उन सब में अकेला ऐसा है जिसकी ध्वनि अनाहत है।इस ओंकार को श्रीकृष्ण कहते हैं, यह अंतिम भी मैं हूं। जिस दिन सब खो जाएगा, जिस दिन कोई स्वर नहीं उठेगा, जिस दिन कोई अशांति की तरंग नहीं रहेगी, जिस दिन जरा-सा भी कंपन नहीं होगा, सब शून्य होगा, उस दिन जिसे तू सुनेगा, वह ध्वनि भी मैं ही हूं। सब के खो जाने पर भी जो शेष रह जाता है। जब कुछ भी नहीं बचता, तब भी मैं बच जाता हूं। मेरे खोने का कोई उपाय नहीं है, मैं मिट नहीं सकता हूं, क्योंकि मुझे कभी बनाया नहीं गया है। जो बनता है, वह मिट जाता है। जो जोड़ा जाता है, वह टूट जाताहै। जिसे हम संगठित करते हैं, वह बिखर जाता है। लेकिन जो सदा से है, वह सदा रहता है।

7-इस ओंकार का अर्थ है, दि बेसिक रियलिटी; वह जो मूलभूत सत्य है, जो सदा रहता है। उसके ऊपर रूप बनते हैं और मिटते हैं, संघात निर्मित होते हैं और बिखर जाते हैं, संगठन खड़े होते हैं और टूट जाते हैं, लेकिन वह बना रहता है। वह बना ही रहता है। यह जो सदा बना रहता है, इसकी जो ध्वनि है, इसका जो संगीत है, उसका नाम ओंकार है। यह मनुष्य के अनुभव की आत्यंतिक बात है। यह परम अनुभव है।

इसलिए आप यह मत सोचना की आप बैठकर ओम-ओम का उच्चार करते रहें, तो आपको 8-ओंकार का पता चल रहा है। जिस ओम का आप उच्चार कर रहे हैं, वह उच्चार ही है। वह

तोआपके द्वारा पैदा की गई ध्वनि है।इसलिए धीरे-धीरे होंठ को बंद करना पड़ेगा। होंठ का उपयोग नहीं करना पड़ेगा। फिर बिना होंठ के भीतर ही ओम का उच्चार करना। लेकिन वह भी असली ओंकार नहीं है। क्योंकि अभी भी भीतर मांस-पेशियां और हड्डियां काम में लाई जा रही हैं। उन्हें भी छोड़ देना पड़ेगा। भीतर मन में भी उच्चार नहीं करना होगा। तब एक उच्चार सुनाई पड़ना शुरू होगा, जो आपका किया हुआ नहीं है। जिसके आप साक्षी होते हैं, कर्ता नहीं होते हैं। जिसको आप बनाते नहीं, जो होता है, आप सिर्फ जानते हैं।

9-जिस दिन आप अपने भीतर ओंम की उस ध्वनि को सुन लेते हैं, जो आपने पैदा नहीं की, किसी और ने पैदा नहीं की; हो रही है, आप सिर्फ जान रहे हैं, वह प्रतिपल हो रही है, वह हर घड़ी हो रही है। लेकिन हम अपने मन में इतने शोरगुल से भरे हैं कि वह सूक्ष्मतम ध्वनि सुनी नहीं जा सकती। वह प्रतिपल मौजूद है। वह जगत का आधार है।

क्या है "प्रणव"?- 07 FACTS;- 1-ॐ यानी ओम, जिसे "ओंकार" या "प्रणव" भी कहा जाता है। देखें तो सिर्फ़ ढाई अक्षर हैं, समझें तो पूरे ब्रह्मांड का सार है। ओम धार्मिक नहीं है, लेकिन यह हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म जैसे कुछ धर्मों में एक पारंपरिक प्रतीक और पवित्र ध्वनि के रूप में प्रकट होता है। ओम किसी एक की संपत्ति नहीं है, ओम सबका है, यह सार्वभौमिक है, और इसमें पूरा ब्रह्मांड है।हिंदू धर्म में ओम सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रतीकों में से एक है। यह आत्मा (स्वयं के भीतर) और ब्रह्म (परम वास्तविकता, ब्रह्मांड, सर्वोच्च आत्मा) को संदर्भित करता है। ओम वेद, उपनिषद और अन्य ग्रंथों के अध्यायों की शुरुआत और अंत में पाया जाता है। 2-ओम को "प्रथम ध्वनि" माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि भ्रमंड में भौतिक निर्माण के अस्तित्व में आने से पहले जो प्राकृतिक ध्वनि थी, वह थी ओम की गूँज। इसलिए ओम को ब्रह्मांड की आवाज कहा जाता है। इसका क्या मतलब है?... किसी तरह प्राचीन योगियों को पता था जो आज वैज्ञानिक हमें बता रहें हैं: ब्रह्मांड स्थायी नहीं है। 3-कुछ भी हमेशा ठोस या स्थिर नहीं होता है। सब कुछ जो स्पंदित होता है, एक लयबद्ध कंपन का निर्माण करता है जिसे प्राचीन योगियों ने ओम की ध्वनि में क़ैद किया था। हमें अपने दैनिक जीवन में हमेशा इस ध्वनि के प्रति सचेत नहीं होते हैं, लेकिन हम ध्यान से सुने तो इसे शरद ऋतु के पत्तों में, सागर की लहरों में, या शंख के अंदर की आवाज़ में सुन सकते हैं। 4-ओम का जाप हमें पूरे ब्रह्माण्ड की इस चाल से जोड़ता है और उसका हिस्सा बनाता है - चाहे वो अस्त होता सूर्य हो, चढ़ता चंद्रमा हो, ज्वार का प्रवाह हो, हमारे दिल की धड़कन, या हमारे शरीर के भीतर हर परमाणु की आ 4-ओम का जाप एक कंपन उत्पन्न करता है जो पुर शरीर को एक सौम्य अनुभव देता है। ओम को जब श्रद्धालु दृश्यता से मन में देखा जाता है यह मान को स्थिरता और शांति प्रदान करता है। अगर आप ओम का मतलब समझ कर ओम का ध्यान करें तो यह प्रभाव अधिक होता है, किंतु इसके बिना भी आप ओम के जाप का ध्यान अवश्य पाएँगे।ओम का जाप निरंतर करना आपको शांति से भर देता है।

5-जब हम यह समझ कर ओम का ध्यान करते हैं कि ओम ईश्वर का प्रतीक है, तो यह हमें अपनी वास्तविक प्रकृति के करीब लाता है, हमें हमारे शुद्ध रूप से परिचित कराता है।ओम प्रथम ध्वनि है और यह सारी सृष्टि इस रहस्यवादी ध्वनि की एक अभिव्यक्ति है। इन विचारों पर ध्यान देने से हम अन्य मनुष्यों के करीब आ सकते हैं और आपसी दूरियाँ और ख़तम कर सकते है। ॐ मन्त्र का महत्व;- 17 FACTS;- 1-तस्य वाचकः प्रणवः" अर्थात् उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है। इस तरह प्रणव अथवा ॐ एवं ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। ॐ अक्षर है इसका क्षरण अथवा विनाश नहीं होता।अक्षरका अर्थ है;जिसका कभी क्षरण न हो। ऐसे तीन अक्षरों— अ उ और म से मिलकर बना है ॐ। माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डसे सदा ॐ की ध्वनी निसृत होती रहती है। हमारी और आपके हर श्वास से ॐ की ही ध्वनि निकलती है। यही हमारे-आपके श्वास की गति को नियंत्रित करता है। 2-माना गया है कि अत्यन्त पवित्र और शक्तिशाली है ॐ। किसी भी मंत्र से पहले यदि ॐ जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध और शक्ति-सम्पन्न हो जाता है। किसी देवी-देवता, ग्रह या ईश्वर के मंत्रों के पहले ॐ लगाना आवश्यक होता है, जैसे, ॐ विष्णवे नमः, ॐ नमः शिवाय। 3- कहा जाता है कि ॐ से रहित कोई मंत्र फलदायी नहीं होता, चाहे उसका कितना भी जाप हो। मंत्र के रूप में मात्र ॐ भी पर्याप्त है। माना जाता है कि एक बार ॐ का जाप हज़ार बार किसी मंत्र के जाप से महत्वपूर्ण है। ॐ का दूसरा नाम प्रणव (परमेश्वर) है। 4-श्री गीता में ॐ के महत्व को कई बार रेखांकित किया गया है। श्री गीता जी के आठवें अध्याय में उल्लेख मिलता है कि जो ॐ अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गति प्राप्त करता है। ॐ अर्थात् ओउम् तीन अक्षरों से बना है, जो सर्व विदित है। अ उ म्। "अ" का अर्थ है आर्विभाव या उत्पन्न होना, "उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, "म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना। ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है। 5-ॐ में प्रयुक्त "अ" तो सृष्टि के जन्म की ओर इंगित करता है, वहीं "उ" उड़ने का अर्थ देता है, जिसका मतलब है "ऊर्जा" सम्पन्न होना। किसी ऊर्जावान मंदिर या तीर्थस्थल जाने पर वहाँ की अगाध ऊर्जा ग्रहण करने के बाद व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को आकाश में उड़ता हुआ देखता है। मौन का महत्व ज्ञानियों ने बताया ही है। अंग्रजी में एक उक्ति है — "साइलेंस इज़ सिल्वर ऍण्ड ऍब्सल्यूट साइलेंस इज़ गोल्ड"। श्री गीता जी में परमेश्वर श्रीकृष्ण ने मौन के महत्व को प्रतिपादित करते हुए स्वयं को मौन का ही पर्याय बताया है। 6-कठोपनिषद के अनुसार ;- 'जो सर्वप्रथम ईश्वर को इहलोक और परलोक में अलग-अलग रूपों में देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात उसे बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में फँसना पड़ता है।' 7-ओमकार जिनका स्वरूप है, ओम जिसका नाम है उस ब्रह्म को ही ईश्‍वर, परमेश्वर, परमात्मा, प्रभु, सच्चिदानंद, विश्‍वात्मा, सर्व‍शक्तिमान, सर्वव्यापक, भर्ता, ग्रसिष्णु, प्रभविष्‍णु और शिव आदि नामों से जाना जाता है, वही इंद्र में, ब्रह्मा में, विष्‍णु में और रुद्रों में है। वहीं सर्वप्रथम प्रार्थनीय और जप योग्य है अन्य कोई नहीं। 8-श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के अनुसार ;- गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं- 'हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यासरूप से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्‍य परम प्रकाशरूप उस दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।' 9-ईशावास्योपनिषद के अनुसार ; 'वह परब्रह्म (ईश्वर) एकात्म भाव से और एक मन से तीव्र गति वाले हैं। वे सबके आदि (प्रारंभ) तथा सबके जानने वाले हैं। इन परमात्मा को देवगण भी नहीं जान सके। वे अन्य गतिवानों को स्वयं स्थिर रखते हुए भी अतिक्रमण करते हैं। उनकी शक्ति से ही वायु, जल वर्षण आदि क्रियाएँ होती हैं। वे चलते हैं, स्थिर भी हैं; वे दूर से दूर और निकट से निकट हैं। वे इस संपूर्ण विश्‍व के भीतर परिपूर्ण हैं तथा इस विश्‍व के बाहर भी हैं।' 10-अंतत: उस ईश्वर की सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि, ब्रह्मा, विष्‍णु, महेश, राम और कृष्ण आराधना करते हैं। हिंदू धर्म ग्रंथ वेद, स्मृति, गीता आदि सभी में इस बात के प्रमाण हैं। वेद और पुराण के अनुसार 'वह ईश्वर एक ही है' दूसरा कोई ईश्वर नहीं है। मत्स्य अवतार से लेकर कृष्ण तक सभी अवतारी पुरुष उस ईश्वर की शक्ति से ही ईश्‍वर के संदेश को पहुँचाते रहे हैं। 11-परमात्मा कौन है? - गीता में कहा गया है कि दो पुरुष हैं- क्षर एवं अक्षर । सभी प्राणी एवं पंचभूत आदि क्षर हैं तथा इनसे परे कूटस्थ अक्षर ब्रह्म कहे जाते हैं । इनसे भी परे जो उत्तम पुरुष अक्षरातीत हैं, एकमात्र वे ही परब्रह्म की शोभा को धारण करते हैं । 12-पूर्ण ब्रह्म का स्वरूप निराकार (मोहतत्व) से परे बेहद, उससे परे अक्षर से भी परे है । मुण्कोपनिषद् में कहा गया है कि उस अनादि, अविनाशी, कूटस्थ अक्षर ब्रह्म से परे जो चिदघन स्वरूप है, उन्हें ही अक्षरातीत कहते हैं । 13-अथर्ववेद के अनुसार ;-- उस तेजोमय कोश में तीन अरे (अक्षर ब्रह्म, पूर्ण ब्रह्म तथा आनन्द अंग) तीन (सत् चित् आनन्द) में प्रतिष्ठित हैं । उसमें जो परम पूज्यनीय तत्व, परमात्मस्वरूप हैं, उसका ही ब्रह्मज्ञानी लोग ज्ञान किया करते हैं । 14-उसका रूप क्या है?- अथर्ववेद में कहा है- उस धीर, अजर, अमर, नित्य तरुण परब्रह्म को ही जानकर विद्वान पुरुष मृत्यु से नहीं डरता है । इस मंत्र में अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म को नित्य तरुण ( युवा स्वरूप वाला ) कहा गया है, किन्तु उसका शरीर मनुष्यों के पंचभौतिक शरीर के लक्षणों से सर्वथा विपरीत है । ब्रह्म के युवा स्वरूप वाले शरीर में हड्डी, माँस, रस, रक्त तथा नस-नाड़ियाँ नहीं हैं । श्वास-प्रश्वास की क्रिया उनमें नहीं होती है और क्षुधा भी उसको नहीं सताती है । न उसमें रंच मात्र भी ह्रास होता है और न विकास । अनादि काल से उसका स्वरूप वैसा ही है और अनन्त काल तक रहेगा । 15-परमब्रम्ह परमेश्वर के परमधाम में सूर्य नहीं प्रकाशित होता। चन्द्रमा, तारा बिजली भी वहाँ नहीं चमकते फिर इस लौकिक अग्नि की तो बात ही क्या, क्योंकि प्राकृत जगत में जो कुछ भी प्रकाशशील है, सब उस परमब्रम्ह परमेश्वर की प्रकाश शक्ति के अंश को पाकर ही प्रकाशित है। 16-कठोपनिषद के अनुसार ;- 'जो सर्वप्रथम ईश्वर को इहलोक और परलोक में अलग-अलग रूपों में देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात उसे बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में फँसना पड़ता है।' 17-ऋग्वेद के अनुसार ;- ''जिसे लोग इन्द्र, मित्र, वरुण आदि कहते हैं, वह सत्ता केवल एक ही है; ऋषि लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं।'' ॐ के उच्चारण का रहस्य;- 13 FACTS;- 1-ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है। 2-तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम। 3-साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना। 4-ओ३म् (ॐ) नाम में हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई जैसी कोई बात नहीं है। यह सोचना कि ओ३म् किसी एक धर्म की निशानी है, ठीक बात नहीं, अपितु यह तो तब से चला आया है जब कोई अलग धर्म ही नहीं बना था। बल्कि ओ३म् तो किसी ना किसी रूप में सभी मुख्य संस्कृतियों का प्रमुख भाग है। यह तो अच्छाई, शक्ति, ईश्वर भक्ति और आदर का प्रतीक है। 5-उदाहरण के लिए अगर हिन्दू अपने सब मन्त्रों और भजनों में इसको शामिल करते हैं तो ईसाई और यहूदी भी इसके जैसे ही एक शब्द 'आमेन' का प्रयोग धार्मिक सहमति दिखाने के लिए करते हैं। मुस्लिम इसको 'आमीन' कह कर याद करते हैं, बौद्ध इसे 'ओं मणिपद्मे हूं' कह कर प्रयोग करते हैं। सिख मत भी 'इक ओंकार' अर्थात एक ओ३म के गुण गाता है। 6-अंग्रेज़ी का शब्द Omni, जिसके अर्थ अनंत और कभी ख़त्म न होने वाले तत्त्वों पर लगाए जाते हैं (जैसे ऑम्निप्रेज़ेंट, अम्निपियटेंट) भी वास्तव में इस ओ३म् शब्द से ही बना है। इतने से यह सिद्ध है कि ओ३म् किसी मत, मज़हब या सम्प्रदाय से न होकर पूरी इंसानियत का है। ठीक उसी तरह जैसे कि हवा, पानी, सूर्य, ईश्वर, वेद आदि सब पूरी इंसानियत के लिए हैं न कि केवल किसी एक सम्प्रदाय के लिए। 7-ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है। 8-बीमारी दूर भगाएँ;- 04 POINTS;- 1-तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं। 2-सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है। 3-रोजाना सुबह सूर्योदय से पहले उठा जाये और नहा लें इसके बाद एक शांत जगह पर जाकर बैठ जाएं, सुखासन या किसी और आसान में बैठकर Om का 108 बार उच्चारण करें | 9-उच्चारण की विधि;- 11 POINTS;- 1-प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। 2-ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।Om को बोलते समय पूरा ध्यान बोलने पर ही रखें इससे मस्तिष्क में मौन उतर जायेगा पूरा शरीर तनाव रहित और शांत मालूम होने लगेगा | 3-जब हम ओम का जाप करते हैं, यह हमें हमारे सांस, हमारी जागरूकता और हमारी शारीरिक ऊर्जा के माध्यम से इस सार्वभौमिक चाल की सवारी पर ले जाता है, और हम एक गहरा संबंध समझना शुरू करते हैं जो मन और आत्मा को शांति प्रदान करता है। 4-संस्कृत में ओम शब्द तीन अक्षरों से बना है: "अ", "उ", और "म"। जब "अ" और "उ" को जोड़ा जाता है, तो यह मिलकर "ओ" अक्षर बन जाते हैं। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है नहीं है, क्योंकि यदि आप क्रमशः "अ" और "उ" को बार-बार दोहराते हैं, तो आप पाएंगे कि इस मिश्रण का परिणामस्वरूप ध्वनि "ओ" स्वाभाविक रूप से आती है। 5-इसके बाद आखिरी पत्र "म" कहा जाता है। "अ" ध्वनि गले के पीछे से निकलती है। आम तौर पर, यह पहली ध्वनि है जो सभी मनुष्यों द्वारा मुंह खोलते ही निकलती है, और इसलिए अक्षर "अ" शुरुआत को दर्शाता है। इसके बाद ध्वनि "उ" आती है, जो तब निकलती है जब मुंह एक पूरी तरह से खुले होने से अगली स्थिति में आता है। इसलिए "उ" परिवर्तन के संयोजन को दर्शाता है। ध्वनि "म" का गठन होता है जब होठों को जोड़ते हैं और मुंह पूरी तरह बंद हो जाता है, इसलिए यह अंत का प्रतीक है। 6-जब इन ध्वनियों को एक साथ जोड़ दिया जाता है, ओम का अर्थ है "शुरुआत, मध्य और अंत।" संक्षेप में, कोई भी और सभी ध्वनियों, चाहे वे कितनी अलग हों या किसी भी भाषा में बोली जाती हों, ये सभी इन तीनों की सीमा के भीतर आती हैं। इतना ही नहीं, "शुरुआत, मध्य और अंत" के प्रतीक यह तीन अक्षर, स्वयं सृष्टि के सृजन का प्रतीक हैं। इसलिए सभी भाषाओं में सभी प्रकार की ध्वनियों को इस एकल शब्द, ओम, का उच्चारण अपने में लपेट लेता है। 7-और इसके अलावा, ओम के उच्चारण के द्वारा ईश्वर की पहचान करने में सहायता मिलती है, ईश्वर जो कि शुरुआत, मध्य और ब्रह्मांड के अंत का स्रोत है। ओम की कई अन्य व्याख्याएं भी हैं, जिनमें से कुछ हैं: 7-1-अ = तमस (अंधकार, अज्ञान), उ = रजस (जुनून, गतिशीलता), म = सत्व (शुद्धता, प्रकाश) 7-2-अ = ब्रह्मा (निर्माता), उ = विष्णु (परिरक्षक), म = शिव (विध्वंसक) 7-3-अ = वर्तमान, उ = भूत, म = भविष्य 7-4-अ = जगे होने की स्थिति, उ = स्वप्न देखने की स्थिति, म = गहरी नींद की स्थिति, 8-ओम का शब्द संभवतः अपने प्रतीक ॐ से ज़्यादा पहचाना जाता है, परंतु जब भी ओम के उपयोग की बात आती है, ओम का उच्चारण ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। 9-वैदिक परंपरा सिखाती है कि ध्वनियों को किसी उद्देश्य के साथ बनाया गया था, इसलिए उच्चारण के नियमों का पालन करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि अनुनाद अर्थ से जुड़ा हुआ है। रोज़मर्रा की जिंदगी में हम सभी जानते हैं और महसूस करते हैं कि संगीत चाहे वो कैसा भी हो, हमारी मनोस्थिति को प्रभावित करता है। इसी तरह, वैदिक ध्वनियों और ओम जैसे शब्दों का उच्चारण, पारंपरिक निर्देशों के अनुसार किया जाना चाहिए, ताकि नकारात्मक अनुनाद से बचने के साथ ही इच्छित परिणाम पा सकें। 10-दरअसल ओम का ध्यान करने से कोई भी मौजूदा मानसिक अशांति या परेशानी से राहत मिलती है। जैसा कि आगे भी समझाया जाएगा, जब ओम के अर्थ को दिमाग़ में रख कर इसका जाप किया जाता है, तो आपको अपने मानसिक और स्वाभाविक रूप के बारे में जागरूकता मिलती है, जो हर समय सभी प्रकार की सभी सीमाओं से मुक्त है। 11-पतंजलि के योग सूत्र के अनुसार, ओम का जाप या ध्यान इसका अर्थ और महत्व दिमाग़ में रखते हुए करना चाहिए। चूंकि ओम ईश्वर की प्रतिनिधि ध्वनि और प्रतीक है, इसलिए ओम का जाप करते हुए ईश्वर का ध्यान जरूरी है। ओम का जाप करने की विधि इस प्रकार है: SEVEN STEPS;- 1-किसी भी आरामदायक ध्यान करने के आसन में बैठ जायें, जैसे की पद्मासन, सुखासन, या सिद्धासन। रीढ़ की हड्डी, सिर, और गर्दन बिल्कुल सीधी रखें। 2-आंखों को बंद कर लें और एक गहरी साँस लें। अब साँस छोड़ते हुए ओम बोलना शुरू करें। 3-नाभि क्षेत्र में "ओ" आवाज़ से होने वाली कंपन को महसूस करें और इस कंपन को उपर की तरफ बढ़ते हुए महसूस करें। 4-जैसा आप मंत्र जारी रखते हैं, कंपन को गले की ओर बढ़ते हुए महसूस करें। 5-जैसे कंपन गले के क्षेत्र में पहुंचती हैं, ध्वनि को "म" की एक गहरी ध्वनि में परिवर्तित करें। 6-कंपन तब तक महसूस करें जब तक वह सिर के मुकुट तक ना पहुँचे। आप इस प्रक्रिया को दो या ज़्यादा बार दोहरा सकते हैं। 7-अंतिम मंत्र जाप के बाद भी बैठे रहें और पूरे शरीर में ओम की ध्वनि की कंपन को महसूस करें - शरीर के हर एक कोशिका में महसूस करें। ओम का जाप, जिसे "उद्गीत प्राणायाम" कहा जाता है। 10-A-ॐ मंत्र के उच्चारण के लाभ;- 06 POINTS;- 1-इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं। इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। 2-प्रातः उठकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्त संचार व्यवस्थित होगा। 3-ओम नमो - ओम के साथ नमो शब्द के जुड़ने से मन और मस्तिष्क में नम्रता के भाव पैदा होते हैं। इससे सकारात्मक ऊर्जा तेजी से प्रवाहित होती है। 4-ओम नमो गणेश - गणेश आदि देवता हैं जो नई शुरुआत और सफलता का प्रतीक हैं। अत: ओम गं गणपतये नम: का उच्चारण विशेष रूप से शरीर और मन पर नियंत्रण रखने में सहायक होता है। 5-ॐ का ओ; अ और उ से मिलकर बनता है। यह ध्वनि वक्ष पिंजर _ (Thoracic Cage )को कंपित करती है, जो हमारे फेफड़े में भरी हवा के साथ सम्पर्क में आता है जिससे ऐलवीलस की मेम्ब्रेन की कंपन करने लगती है। यह प्रक्रिया फेफड़े की कोशिकाओं ( Pulmonary Cells) को उत्तेजित करती है, जिससे फेफड़े में श्वास उचित मात्रा में आती जाती रहती है। 6- नई रिसर्च से यह भी सामने आया है कि यह कंपन अंत: स्रावी ग्रंथियों _ (Endocrine Glands )को प्रभावित करता है, जिससे चिकित्सा में इसका अद्भुत महत्व है। अउ की ध्वनि से विशेषकर पेट के अंगों और वक्ष पिंजर को आंतरिक मसाज ( Internal Massage) मिलता है, जबकि म के कंपन से हमारे कपाल की नसों में कंपन होता है। 10-B-ॐ मंत्र के चिकित्सीय लाभ;- 09 POINTS;- 1.ॐ हमारे जीवन को स्वस्थ बनाने का सबसे उत्तम मार्ग है। नियमित ॐ का मनन करने से पूरे शरीर को विश्राम मिलता है और हार्मोन तंत्र नियंत्रित होता है 2. ॐ के अतिरिक्त चिंता और क्रोध पर नियंत्रण पाने का इससे सरल मार्ग दूसरा नहीं है 3. ॐ का उच्चारण प्रदूषित वातावरण में यह पूरे शरीर को विष मुक्त करता है 4. ॐ का मनन हृदय और रक्त संचार प्रणाली को सुदृढ़ करता है 5. ॐ के उच्चारण से यौवन और चेहरे पर कांति आती है 6. ॐ के जप से पाचन तंत्र सुदृढ़ होता है 7. थकान के बाद ॐ का मनन आपको नई ऊर्जा से भर देता है 8. अनिद्रा रोग से छुटकारा पाने में ॐ का बहुत महत्व है। सोते समय इसका नियमित मनन करें। 9. थोड़े से प्रयास में ॐ की शक्ति आपके फेफड़ों और श्वसन तंत्र को सुदृढ़ बनाना है। 10-C-ॐ मंत्र के मनोवैज्ञानिक चिकित्सा में लाभ;- 06 POINTS;- 1. ॐ की शक्ति आपको दुनिया का सामना करने की शक्ति देती है। 2. ॐ का नियमित मनन करने से आप क्रोध और हताशा से बचे रहते हैं। 3. ॐ की गूंज आपको स्वयं को नियंत्रित करने में सक्षम बनाती है। आप स्वयं में नया उत्साह महसूस करते हैं। 4. ॐ की ध्वनि से आपके पारस्परिक सम्बंध सुधरते हैं। आपके व्यक्तित्व में आने वाला बदलाव लोगों को आकर्षित करता है और लोग आपसे ईष्या करना छोड़ देते हैं। 5. आप अपने जीवन के उद्देश्य और उसकी प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं और आपके चेहरे पर मुस्कान बनी रहती है। 6. नई उमंग और स्फूर्ति आती है। आप में सजगता और सर्तकता बढ़ती है। 10-D-ॐ मंत्र के मनन के अन्य लाभ;- 07 POINTS;- 1. ॐ मंत्र आपको सांसरिकता से अलगकर करके आपको स्वयं से जोड़ता है। 2. अवसाद के समय ॐ मंत्र का जाप करने से आपको मन की शांति मिलती है और शक्ति संचार होता है। इससे आप शुद्ध हो जाते हैं, साथ साथ आपमें सर्वव्यापी प्रकाश और चेतना का संचार होता है। 3. जो लोग ॐ का उच्चारण करते हैं उनकी वाणी मधुर होती है। आप टहलते हुए भी ॐ मंत्र का जाप कर सकते हैं। आप ॐ मंत्र को गा और गुनागुना भी सकते हैं। 4. ॐ मंत्र गुनगुनाने से आप मन शांत और एकाग्र रहता है, जो आध्यत्मिक रूप से आपको स्वयं से जोड़ता है। 5. जो लोग प्रतिदिन ॐ मंत्र का मेडिटेशन करते हैं, उनके चेहरे और आंखों में अनोखी चमक होती है। 6-ॐ मंत्र का जाप श्वास छो‌ड़ते समय किया जाता है, जिससे यह धीमी, सामान्य और सम्पूर्ण होती है। अउ ध्वनि का प्रसार मृत वायु को कम स्थान देता है, और धीमे सांस लेने के कई लाभ होते है, जिन्हें आप योगियों से जान सकते हैं। 7-ॐ मंत्र का जाप वह सीढ़ी है जो आपको समाधि और आध्यात्मिक ऊँचाइयों पर ले जाती है। 11-शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ाव प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक' पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि (ॐ )मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरह आल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है। 12-ॐ का वैज्ञानिक महत्त्व;- 06 POINTS;- 1-ओम्‌ के संबंध में यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या ओम्‌ शब्द की महिमा का कोई वैज्ञानिक आधार हैं? क्या इसके उच्चारण से इस असार संसार में भी कुछ लाभ है? इस संबंध में ब्रिटेन के एक साईटिस्ट जर्नल ने शोध परिणाम बताये हैं जो यहां प्रस्तुत हैं। रिसर्च एंड इंस्टीट्‌यूट ऑफ न्यूरो साइंस के प्रमुख प्रोफ़ेसर जे. मार्गन और उनके सहयोगियों ने सात वर्ष तक ‘ओ३म्‌’ के प्रभावों का अध्ययन किया। 2-इस दौरान उन्होंने मस्तिष्क और हृदय की विभिन्न बीमारियों से पीडि़त 2500 पुरुषो और 200 महिलाओं का परीक्षण किया। इनमें उन लोगों को भी शामिल किया गया जो अपनी बीमारी के अन्तिम चरण में पहुँच चुके थे। इन सारे मरीज़ों को केवल वे ही दवाईयां दी गई जो उनका जीवन बचाने के लिए आवश्यक थीं। शेष सब बंद कर दी गई। 3-सुबह 6 - 7 बजे तक यानी कि एक घंटा इन लोगों को साफ, स्वच्छ, खुले वातावरण में योग्य शिक्षकों द्वारा ‘ओ३म्‌’ का जप कराया गया। इन दिनों उन्हें विभिन्न ध्वनियों और आवृतियो में ‘ओ३म्‌’ का जप कराया गया। हर तीन माह में हृदय, मस्तिष्क के अलावा पूरे शरीर का ‘स्कैन’ कराया गया। चार साल तक ऐसा करने के बाद जो रिपोर्ट सामने आई वह आश्चर्यजनक थी। 4-70 प्रतिशत पुरुष और 85 प्रतिशत महिलाओं से ‘ओ३म्‌’ का जप शुरू करने के पहले बीमारियों की जो स्थिति थी उसमें 90 प्रतिशत कमी दर्ज की गई। कुछ लोगों पर मात्र 20 प्रतिशत ही असर हुआ। इसका कारण प्रोफ़ेसर मार्गन ने बताया कि उनकी बीमारी अंतिम अवस्था में पहुंच चुकी थी। इस प्रयास से यह परिणाम भी प्राप्त हुआ कि नशे से मुक्ति भी ‘ओ३म्‌’ के जप से प्राप्त की जा सकती है। इसका लाभ उठाकर जीवन भर स्वस्थ रहा जा सकता है। 5-ॐ को लेकर प्रोफ़ेसर मार्गन कहते हैं कि शोध में यह तथ्य पाया कि ॐ का जाप अलग अलग आवृत्तियों और ध्वनियों में दिल और दिमाग के रोगियों के लिए बेहद असर कारक है यहाँ एक बात बेहद गौर करने लायक़ यह है जब कोई मनुष्य ॐ का जाप करता है तो यह ध्वनि जुबां से न निकलकर पेट से निकलती है यही नहीं ॐ का उच्चारण पेट, सीने और मस्तिष्क में कम्पन पैदा करता है। 6-विभिन्न आवृतियो (तरंगों) और ‘ओ३म्‌’ ध्वनि के उतार चढ़ाव से पैदा होने वाली कम्पन क्रिया से मृत कोशिकाओं को पुनर्जीवित कर देता है तथा नई कोशिकाओं का निर्माण करता है रक्त विकार होने ही नहीं पाता। मस्तिष्क से लेकर नाक, गला, हृदय, पेट और पैर तक तीव्र तरंगों का संचार होता है। रक्त विकार दूर होता है और स्फुर्ती बनी रहती है। 13-ॐ मन्त्र की विशेषता;- "ध्यान बिन्दुपनिषद्" के अनुसार ॐ मन्त्र की विशेषता यह है कि पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इसका जप करता है, उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस तरह कमल-पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जप-कर्ता पर कोई कलुष नहीं लगता। NOTE;- ॐ ईश्वर के निर्गुण तत्त्व से संबंधित है ।ईश्वरके निर्गुण तत्त्व से ही पूरे सगुण ब्रह्मांड की निर्मित हुई है । इस कारण जब कोई ॐ का जप करता है, तब अत्यधिक शक्ति निर्मित होती है । यह ॐ का रहस्य है।यदि व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर कनिष्ठ हो, तो केवल ॐ का जप करने से दुष्प्रभाव हो सकता है; क्योंकि उसमें इस जप से निर्मित आध्यात्मिक शक्ति को सहन करने की क्षमता नहीं होती । .....SHIVOHAM....