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प्रश्‍न;- हिन्दू धर्म की ऐसी कौन सी 14 परंपराएं हैं, जो अन्य सभी धर्मों में भी मिल जाएंगी?


उत्‍तर;- 03 FACTS;- 1-माना जाता है कि दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म सनातन हिन्दू धर्म और जैन धर्म से दुनिया के अन्य धर्मों ने बहुत कुछ सीखा या लिया है। यदि हम यहूदी परंपरा की बात करें तो यह भी दुनिया के प्राचीन धर्मों में से एक है। हजरत इब्राहीम ईसा से लगभग 1800 वर्ष पूर्व हुए थे। मूसा लगभग 1300 वर्ष पूर्व हुए थे। लेकिन शोधानुसार उनसे भी पूर्व नूह हुए थे और सबसे प्रथम आदम हुए। शोधकर्ता यही मानते हैं कि मानव की उत्पत्ति भारत में हुई थी। इस तरह हमने जाना कि हिन्दू और यहूदी परंपरा सबसे प्राचीन है। उक्त तीनों ही तरह की परंपरा के तार एक-दूसरे में मिले हुए हैं। 2-यदि हम प्रारंभिक काल की बात करें तो शोध बताते हैं कि राजा मनु ही नूह थे और हजरत इब्राहीम भारत से ही जाकर ऊर में बस गए थे। कहा जाता है कि 1900 ईसा पूर्व धरती पर मूसलधार बारिश हुई थी। उसी दौरान एक जबरदस्त भूकंप भी आया था। इस बारिश और भूकंप के कारण एक ओर जहां सिंधु नदी ने अपनी दिशा बदल दी तो दूसरी ओर सरस्वती नदी में जोरदार लहरें और तूफान उठने लगे। सरस्वती नदी का आधा पानी सिंधु में मिल गया तो आधा पानी यमुना में। इस प्राकृतिक आपदा के कारण सिंधु सरस्वती सभ्यता नष्ट हो गई। माना जाता है कि अरब के प्रवासियों में पहले थे अब्राहम, जिनको इस्लामिक परंपरा में हजरत इब्राहीम कहा जाता है। 3-प्राप्त शोधानुसार सिंधु और सरस्वती नदी के बीच जो सभ्यता बसी थी वह दुनिया की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यता थी। यह वर्तमान में अफगानिस्तान से भारत तक फैली थी। प्राचीनकाल में जितनी विशाल नदी सिंधु थी उससे कई ज्यादा विशाल नदी सरस्वती थी। इसी सभ्यता के लोगों ने दुनियाभर में धर्म, समाज, नगर, व्यापार, विज्ञान आदि की स्थापना की थी। खैर... यह तो शोध का विषय है फिर भी कहा जाता है कि भारत के संबंध प्राचीनकाल से ही अरब, यूनान और रोम से रहे हैं। तीनों क्षेत्रों में धर्म, संस्कृ‍ति, ज्ञान और विज्ञान का आदान-प्रदान होता रहा है। हिन्दू धर्म की ऐसी 14 परंपराएं हैं, जो अन्य धर्मों में भी मिल जाएंगी;- 14 FACTS;- 1-प्रायश्चित करना :- A-प्राचीनकाल से ही हिन्दु्ओं में मंदिर में जाकर अपने पापों के लिए प्रायश्चित करने की परंपरा रही है। प्रायश्‍चित करने के महत्व को स्मृति और पुराणों में विस्तार से समझाया गया है। गुरु और शिष्य परंपरा में गुरु अपने शिष्य को प्रायश्चित करने के अलग-अलग तरीके बताते हैं। B-दुष्कर्म के लिए प्रायश्चित करना , तपस्या का एक दूसरा रूप है। यह मंदिर में देवता के समक्ष 108 बार साष्टांग प्रणाम , मंदिर के इर्दगिर्द चलते हुए साष्टांग प्रणाम और कावडी अर्थात वह तपस्या जो भगवान मुरुगन को अर्पित की जाती है, जैसे कृत्यों के माध्यम से की जाती है। मूलत: अपने पापों की क्षमा भगवान शिव और वरूणदेव से मांगी जाती है, क्योंकि क्षमा का अधिकार उनको ही है। C-जैन धर्म में 'क्षमा पर्व' प्रायश्चित करने का दिन है। दोनों ही धर्मों के इस नियम या परंपरा को ईसाई और मुस्लिम धर्म में भी शामिल किया गया है। ईसाई धर्म में इसे 'कंफेसस' और इस्लाम में 'कफ्फारा' कहा जाता है। 2-दीक्षा देना :- A-दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं। B-यह दीक्षा देने की परंपरा जैन धर्म में भी प्राचीनकाल से रही है, हालांकि दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। बौद्ध धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। अलग-अलग धर्मों में दीक्षा देने के भिन्न-भिन्न तरीके हैं। यहूदी धर्म में खतना करके दीक्षा दी जाती है। 3-मुंडन संस्कार :- हिन्दू और जैन धर्म में मुंडन संस्कार 3 वक्तों पर किया जाता है : पहला- बचपन में, दूसरा- गायत्री मंत्र या दीक्षा लेते वक्त और तीसरा- किसी स्वजन की मृत्यु होने पर। इसके अलावा यज्ञादि विशेष कर्म और तीर्थ में जाकर भी मुंडन किया जाता है। यह संस्कार लगभग सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में मिल जाएगा। एक ओर जहां मुसलमान मक्का में हज के दौरान मुंडन या हजामत करवाता है तो दूसरी ओर बौद्ध धर्म में दीक्षा लेते वक्त मुंडन किया जाता है।

4-परिक्रमा करना : - A-भारत में मंदिरों, तीर्थों और यज्ञादि की परिक्रमा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही रहा है। भगवान गणेश ने अपने माता-पिता की परिक्रमा करके दुनिया को यह संदेश दिया था कि सबसे बड़ा तीर्थ तो माता-पिता ही हैं। मंदिर की 7 बार (सप्तपदी) परिक्रमा करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह 7 परिक्रमा विवाह के समय अग्नि के समक्ष भी की जाती है। प्रदक्षिणा को इस्लाम में तवाफ कहते हैं। B-हिन्दू धर्म में परिक्रमा का बड़ा महत्त्व है। परिक्रमा से अभिप्राय है कि सामान्य स्थान या किसी व्यक्ति के चा