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क्या है सात तालों की एक ही तालीऔर कैसे खुलते हैं ये ताले ? क्या है कुण्डलिनी जागरण ?-PART-01


क्या है कुण्डलिनी जागरण ?- 10 FACTS;- 1-मनुष्य का शरीर जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी तथा आकाश इन पांच तत्वों से निर्मित होता है। और इसमे कोई संदेह नही कि जो चीज जिस तत्व से बनी हो उसमे उस तत्व के सारे गुण समाहित होते हैं। इस लिए पंचतत्वों से निर्मित मनुष्यों के शरीर में जल की शीतलता, वायु का तीब्र वेग, अग्नि का तेज, पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण, ओर आकाश की विशालता समाहित होता है। इस तरह मनुष्य अनंत शक्तियों का स्वामी है तथा इस स्थुल शरीर के अंदर अलौकिक शक्तियाँ छुपी हुई है। 2-परंतु हमारे अज्ञानता के कारण हमारे अंदर की शक्तियाँ सुप्तावस्था में पड़ी हुई है। जिसे कोई भी व्यक्ति कुछ प्रयासों के द्वारा अपने अन्दर सोई हुई शक्तियों को जगाकर अनंत शक्तियों का स्वामी बन सकता है। मनुष्य के अन्दर की सोई हुई इसी शक्ति को ही कुण्डलिनी कहा गया है। 3-कुण्डलिनी मनुष्य के शरीर की अलौकिक संरचना है, जिसके अंदर ब्रह्मंड की समस्त शक्तियाँ समाहित है। अगर सही शब्दों मे कहा जाय तो मनुष्य के अंदर ही सारा ब्रह्मंड समाया हुआ है। आज से हजारों साल पहले गुरू शिष्य परंपरा के अनुसार गुरू अपने शिष्यों की कुण्डलिनी शक्ति को योगाभ्यास तथा शक्तिपात के माध्यम से जागृत किया करते थे और बाद में शिष्य अलौकिक शक्तियों का स्वामी बन कर समाज कल्याण जथा जनहित में इन शक्तियों का सद्उपयोग किया करते थे। 4-कुण्डलिनी जागरण के पश्चात मनुष्य के अन्दर अनेको अलौकिक एवं चमत्कारिक शक्तियों का प्रार्दुभाव होनेे लगता है और मनुष्य मनुष्यत्व से देवत्व की ओर अग्रसर होने लगता है। कुण्डलिनी जागरण के बाद अनेकों चमत्कारिक घटनायें घटने लगती हैं। किसी भी व्यक्ति को देखते हि उसका भूत, भविष्य, वर्तमान साधक के सामने स्पस्ट रूप से दिखाई देने लगता है। साथ ही सामने वाले व्यक्ति की मन की बातें भी स्पष्ट हो जाती हैं। 5-कुण्डलिनी जागृत साधक हजारों कि.मी. दुर घट रही घटनााओं को भी स्पष्ट रूप से देख सकता है और दुर बैठे हुए व्यक्ति की मन की बातें भी पढ़ सकता है। प्राचिन ग्रंथों मे ऐसे अनेकों उल्लेख मिलते है। यह सब कुण्डलिनी जागरण की शक्ति से ही संभव है। कुण्डलिनी जागरण के पश्चात कठिन से कठिन तथा असंभव से असंभव कार्य को भी संभव किया जा सकता है। 6-कुण्डलिनी क्या है मनुष्य के अन्दर छिपी हुई अलौकिक शक्ति को कुण्डलिनी कहा गया है। कुण्डलिनी वह दिव्य शक्ति है जिससे जगत मे जीव की श्रृष्टि होती है। कुण्डलिनी सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर मेरूदण्ड के सबसे निचले भाग में मुलाधार चक्र में सुषुप्त अवस्था में पड़ी हुई है। मुलाधार में सुषुप्त पड़ी हुई कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर सुषुम्ना में प्रवेश करती है तब यह शक्ति अपने स्पर्श से स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, तथा आज्ञा चक्र को जाग्रत करते हुए मस्तिष्क में स्थिति सहस्त्रार चक्र में पहुंच कर पुर्णंता प्रदान करती है इसी क्रिया को पुर्ण कुण्डलिनी जागरण कहा जाता है। 7-जब कुण्डलिनी जाग्रत होती है मुलाधार चक्र में स्पंदन होने लगती है उस समय ऐसा प्रतित होता है जैसे विद्युत की तरंगे रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ घुमते हुए उपर की ओर बढ़ रहा है। साधक के लिए यह एक अनोखा अनुभव होता है। जब मुलाधार से कुण्डलिनी जाग्रत होती है तब साधक को अनेको प्रकार के अलौकिक अनुभव स्वतः होने लगते हैं। जैसे अनेकों प्रकार के दृष्य दिखाई देना अजीबोगरीब आवाजें सुनाई देना, शरीर मे विद्युत के झटके आना, एक ही स्थान पर फुदकना, इत्यादि अनेकों प्रकार की हरकतें शरीर में होने लगती है। 8-कई बार साधक को गुरू अथवा इष्ट के दर्शन भी होते हैं। कुण्डलिनी शक्ति को जगाने के लिए प्रचिनतम् ग्रंथों मे अनेकों प्रकार की पद्धतियों का उल्लेख मिलता है। जिसमें हटयोग ध्यानयोग, राजयोग, मत्रंयोग तथा शक्तिपात आदि के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने के अनेकांे प्रयोग मिलते हैं। परंतु मात्र भस्रीका प्राणायाम के द्वारा भी साधक कुछ महिनों के अभ्यास के बाद कुण्डलिनी जागरण की क्रिया में पुर्ण सफलता प्राप्त कर सकता है। 9-जब मनुष्य की कुण्डलीनी जाग्रत होती है तब वह उपर की ओर उठने लगती है तथा सभी चक्रों का भेदन करते हुए सहस्त्रार चक्र तक पंहुचने के लिए बेताब होने लगती है। तब मनुष्य का मन संसारिक काम वासना से विरक्त होने लगता है और परम आनंद की अनुभुति होने लगती है। और मनुष्य के अंदर छुपे हुए रहस्य उजागर होने लगते हैं। 10-मनुष्यों के भीतर छुपे हुए असीम और अलौकिक शक्तियों को वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है। आज कल पश्चिमी वैज्ञानिकों के द्वारा शरीर में छुपे हुए रहस्यों को जानने के लिए अनेकों शोध किये जा रहे हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि जिस तरह पृथ्वी के उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों मे अपार आश्चर्य जनक शक्तियों का भंडार है ठीक उसी प्रकार मनुष्य के मुलाधार तथा सहस्त्रार चक्रों मे आश्चर्यजनक शक्तियों का भंडार है। कुण्डलिनी योग का ग्रन्थों में वर्णन ;- 06 FACTS;- 1-कुण्डलिनी योग का वर्णन अनेक ग्रन्थों में मिलता है। योग वशिष्ठ, तेज बिंदूपनिषद्, योग चूड़ामणि, शिव पुराण, देवी भागवत्, शाण्डिल्योपनिषद्, मुक्तिकोपनिषद्, हठयोग संहिता, कुलार्णव तन्त्र, योगिनी तन्त्र, घेरंड संहिता, कठ श्रुति ध्यान बिंदूपनिषद्, रुद्र- यामल तन्त्र, योग कुण्डलिनी उपनिषद् आदि ग्रन्थों में इस विद्या के विभिन्न पहलुओं पर प्रकार डाला गया है। फिर भी वह सर्वांगीण नहीं है। 2- ग्रन्थों में इस गूढ़ विद्या पर प्रायः संकेत ही किये गये हैं।इस ढंग से नहीं लिखा गया है कि उस उल्लेख के सहारे कोई अजनबी व्यक्ति साधना करके सफलता प्राप्त कर सके। पात्रता युक्त अधिकारी साधक और अनुभवी सुयोग्य मार्गदर्शक की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही ऐसा किया गया है। 3-तैत्तिरीय आरण्यक में चक्रों को देवलोक एवं देव संस्थान कहा गया है। शंकराचार्य कृत आनन्द लहरी के 17 वें श्लोक में भी ऐसा ही प्रतिपादन है। 4-योग दर्शन समाधिपाद का 36 वाँ सूत्र है- “विशोकाया ज्योतिष्मती” योग दर्शन समाधिपाद का 36 वां सूत्र है— ‘विशोकाया ज्योतिष्मती’ इसमें शोक सन्तापों का हरण करने वाली ज्योति शक्ति के रूप में कुण्डलिनी शक्ति की ओर संकेत है। 5-इस समस्त शरीर को—सम्पूर्ण जीव कोशों को—महाशक्ति की प्राण प्रक्रिया सम्भाले हुए है। उस प्रक्रिया के दो ध्रुव—दो खण्ड हैं। एक को चय प्रक्रिया एनाबॉलिक एक्शन तथा दूसरे को अपचय प्रक्रिया (कैटाबॉलिक एक्शन) कहते हैं। इसी को दार्शनिक भाषा में शिव एवं शक्ति भी कहा जाता है। शिव क्षेत्र सहस्रार तथा शक्ति क्षेत्र मूलाधार कहा गया है। इन्हें परस्पर जोड़ने वाली, परिभ्रमण शील शक्ति का नाम कुण्डलिनी है। 6-सहस्रार और मूलाधार का क्षेत्र विभाजन करते हुए मनीषियों ने मूलाधार से लेकर कण्ठ पर्यन्त का क्षेत्र एवं चक्र संस्थान ‘शक्ति’ भाग बताया है और कण्ठ से ऊपर का स्थान ‘शिव’ देश कहा है। वराहश्रुति के अनुसार ;- ''मूलाधार से कण्ठपर्यन्त शक्ति का स्थान है। कण्ठ के ऊपर से मस्तक तक शाम्भव स्थान है। ''

रुद्राभिषेक में कुण्डलिनी महाशक्ति का परिचय;-

08 FACTS;-

1-कुण्डलिनी महाशक्ति का परिचय, स्थान और स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वह मूसलाधार चक्र के अग्नि कुण्ड में निवास करती है। अग्नि स्वरूप है। सुप्त-सर्पिणी की तरह सोई पड़ी है। स्वयंभू महालिंग से ...शिव लिंग से लिपटी पड़ी है। इसी स्थिति की झांकी शिव प्रतिमाओं में कराई जाती है। योनि क्षेत्र में एक सर्पिणी शिवलिंग से लिपटी हुई प्रदर्शित की जाती है। शिवपूजा में इस प्रतिमा पर जल धार चढ़ाने का विधान है।

2-रुद्राभिषेक में जल कलश के पेंदे में छिद्र करके उसे तीन टांग की तिपाई पर स्थापित करते हैं और उसमें से एक-एक बूंद पानी शिव लिंग पर टपकता रहता है। यह कुण्डलिनी का ही समग्र स्वरूप है।

3-सहस्रार चक्र को अमृत कलश कहा गया है। उससे सोमरस टपकने का उल्लेख है। खेचरी मुद्रा में इसे ‘अमृत स्राव’ बताया गया है। यह स्राव अधोमुख है। नीचे की दशा में रिसता टपकता रहता है। कुण्डलिनी मूल तक जाता है।

4-कुण्डलिनी महाशक्ति की उर्ध्वगामी बनाने और अमृत सोम का आस्वादन कराने का लाभ ब्रह्मी एकता के माध्यम से ही सम्भव है। यही कुण्डलिनी जागरण का उद्देश्य है। सुप्त सर्पिणी अग्नि कुण्ड में पड़ी-पड़ी विष उगलती रहती है और उससे जलन ही जलन उत्पन्न होती है।

5- वासना की अग्नि शान्त नहीं हो सकती, वह शरीर और मन की दिव्य सम्पदाओं का विनाश ही करती रहती है। इसका समाधान अमृत रस को पान करने ;सोम सम्पर्क से ही सम्भव होता है।

6-यह तथ्य जन-साधारण को समझाने के लिए तीन टांग की तिपाई पर कलश स्थापित करके शिवलिंग पर अनवरत जल धार चढ़ाने की व्यवस्था की जाती है और इस आध्यात्मिक आवश्यकता का परिचय कराया जा सकता है कि जलन का समाधान मानसिक एवं आत्मिक अमृत रस पीने से ..बौद्धिक एवं भावनात्मक उत्कृष्टता का रसास्वादन करने से ही सम्भव हो सकता है।

7-रुद्राभिषेक में जल कलश के नीचे जो तीन टांग की तिपाई रखी जाती है, वह इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की प्रतीक है। इन्हीं तीन आधारों के सहारे कुण्डलिनी जागरण की पुण्य प्रक्रिया सम्पन्न होती है। अग्नि और सोम के मिलन की आवश्यकता और उसके फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले देवत्व का ही प्रत्यक्षीकरण रुद्राभिषेक के कर्मकाण्डों में किया जाता है।

8-हिमाचल प्रदेश में ज्वालामुखी पर्वत पर निकलने वाली अग्नि शिखा को देवस्थान की शक्ति पीठ माना गया है। वहां आराधना उपासना के लिए दूर दूर से भक्तजन जाते हैं। अग्नि ज्वाला को दैवी शक्ति मानने के पीछे यह कुण्डलिनी अग्नि का ही तारतम्य है। यज्ञाग्नि में अग्निहोत्र करने, धृतधारा चढ़ाने के पीछे भी अग्नि एवं सौम के संयोग की आवश्यकता का प्रतिपादन है। ब्रह्माग्नि के संयोग को कुण्डलिनी साधना कहा गया है।

अग्नि की उत्पत्ति और कुण्डलिनी जागरण ;-

05 FACTS;-

1-अग्नि की उत्पत्ति का स्कन्द पुराण में एक मनोरंजक उपाख्यान आता है। सनत्कुमार की अग्निजन्य जिज्ञासा का समाधान करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं ...प्रजापति ने सृष्टि के आदि में दिव्य शत वर्षों की अवधि तक महान तप किया। इसमें ‘भूः भुवः स्वः शब्द उत्पन्न हुआ। इसका मन के साथ समावेश होने से अग्नि उत्पन्न हुई। वह नीचे गिरा तो भूमि जलने लगी, ऊपर उठी तो आकाश जलने लगा। वह शब्द रूप स्फुल्लिंगों से युक्त, स्वर्णिम आभा वाला परम दिव्य था।

2-अग्नि ने ब्रह्माजी से कहा—‘मैं भूख से स्वयं जला जा रहा हूं। मुझे आहार दीजिए।’ ब्रह्माजी ने अपने शरीर के एक-एक करके सभी अवयव उसे खिला दिये। तो भी उसकी तृप्ति नहीं हुई और भूखा-भूखा ही चिल्लाता रहा। कोई और उपाय न देख कर ब्रह्माजी ने रुदन करते हुए अग्नि से कहा ;''जो व्यक्ति कामुकता से अभिभूत हो तू उनकी देह में घुस जा और उनकी समस्त धातुओं का भक्षण किया कर''।

3-अग्नि ऐसा ही करने लगा किन्तु तो भी उसकी तृप्ति न हुई। इस पर ब्रह्माजी ने उसे मुनियों और देवताओं के अन्तःकरण में प्रवेश करने के लिए कहा। तब कहीं अग्नि की तृप्ति हुई और शांति मिली।

4-तब ब्रह्माजी ने अग्नि से कहा ;''तू ऋषियों के आश्रम में रह। देवों के भीतर और बाहर निवार कर। इस आदेश को प्राप्त कर अग्नि प्रसन्न हुआ और सन्तोष पूर्वक रहने लगा।''

5-यही जीवन सत्ता में ओत-प्रोत प्राण शक्ति-कालाग्नि एवं कामाग्नि है। इसको अधोगामी बनाने से मनुष्य जलता और गलता है। किन्तु यदि उसे ऊर्ध्वगामी बना लिया जाय तो वही ब्रह्म तेजस् बनकर योगाग्नि एवं प्राणाग्नि बनकर प्रज्वलित होती है। जीव को परम तेजस्वी बनाती है और उसे लौकिक, भौतिक एवं आत्मिक विभूतियों से सुसम्पन्न बनाती है।

कुण्डलिनी जागरण का उद्देश्य;- 05 FACTS;- 1-मूलाधार से सहस्रार तक की, काम बीज से ब्रह्म बीज तक की यात्रा को ही महायात्रा कहते हैं। योगी इसी मार्ग को पूरा करते हुए परम लक्ष्य तक पहुंचते हैं। जीव सत्ता-प्राण शक्ति का निवास जननेन्द्रिय मूल में है। प्राण उसी भूमि में रहने वाले रज वीर्य से उत्पन्न होते हैं। ब्रह्म सत्ता का निवास ब्रह्मलोक में—ब्रह्म रन्ध्र में माना गया है यह द्युलोक-देवलोक स्वर्ग लोक है। आत्मज्ञान का ब्रह्म ज्ञान का सूर्य इसी लोक में निवास करता है। 2-कमल पुष्प पर विराजमान ब्रह्मा जी—कैलाशवासी शिव और शेषशायी विष्णु का निवास जिस मस्तिष्क मध्य केन्द्र में है—उसी नाभिक (न्यूक्लियस) को सहस्रार कहते हैं। आत्म साक्षात्कार की प्रक्रिया यहीं संपन्न होती है। पतन के—स्खलन के गर्त में पड़ी क्षत-विक्षत आत्म सत्ता जब ऊर्ध्वगामी होती है तो उसका लक्ष्य इसी ब्रह्मलोक तक सूर्यलोक तक पहुंचना होता है। योगाभ्यास का परम् पुरुषार्थ इसी निमित्त किया जाता है। कुण्डलिनी जागरण का उद्देश्य यही है। 3-कुण्डलिनी साधना मनुष्य के आतंरिक रूपांतरण और जागरण की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।कुण्डलिनी जागरण का एक मात्र उद्देश्य है कि मनुष्य अपने आपको पहचाने, अपने जीवन को गहराई से समझे। 4-यह एक आध्यात्मिक यात्रा है जो मनुष्य को स्वयं अपने ही अस्तित्व के साथ करनी पड़ती है।प्रत्येक मनुष्य के जानेंद्रिय के नीचे जहाँ से रीढ़ की हड्डी शुरू होती है, वहां एक चने के बराबर गड्ढा है ,जिसे कुण्ड कहते हैं। वही कुण्ड ऊर्जा का केंद्र है। इसकुण्ड का आकार त्रिकोण की तरह है । यहीं पर नाड़ियों का गुच्छा है जिसे योग में कंद कहते हैं। 5-इसी पर कुण्डलिनी सर्पिणी की तरह 3.5 चक्र की कुंडली मार कर , नीचे के ओर मुख करके, युगों-युगों से बेखबर होकर गहरी नींद में सो रही है। जबतक यह सोई हुई है अज्ञान का मूल बनी हुई है। कुण्ड में स्थित होने या कुण्डली रूप के कारण ही इसे कुण्डलिनी पुकारा जाता है।सर्प के रूप के कारण सर्पिणी या चिति भी कहते हैं।

इड़ा पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी क्या है ?- 07 FACTS;- 1-मनुष्य की रीढ़ की हड्डी भीतर से पोली है।उसके भीतर एक नाड़ी है जिसे योग मेंसुषुम्ना नाड़ी कहा जाता है।इसी के भीतर दो और नाड़ियाँ हैं--इड़ा और पिंगला, उसी प्रकार से जैसे बिजली के किसी मोटे तार के भीतर दो अलग अलग पतले तार होते हैं- जिनमें positive और negative विद्युत धाराएं प्रवाहित होती हैं। 2-सुषुम्ना नाड़ी बिलकुल खाली नहीं है , वहां शून्य है, इसीलिए उसे शून्य नाड़ी भी कहते है।शून्य अपने भीतर बहुत कुछ समेटे हुए होता है। 3-इड़ा और पिंगला नाड़ियों में क्रमशः मन और प्राण का प्रवाह है। इसलिये इड़ा को मनोवहा और पिंगला को प्राणवहा नाड़ी कहते हैं। 4-कुण्ड के एक कोने पर इड़ा,एक पर पिंगला और एक पर सुषुम्ना की ग्रन्थियाँ हैं। हमारे शरीर का यह एक महत्वपूर्ण स्थान है। जीवनी शक्ति का फैलाव सम्पूर्ण शरीर में इसी केंद्र से होता है। इसे मूलाधार चक्र कहते हैं। त्रिकोण योनि का प्रतीक है, इसलिए 5-तांत्रिक इसे योनि चक्र भी कहते हैं।यहीं से तीनो नाड़ियाँ एक साथ मिलकर मेरुदंड में से होकर ऊपर की ओर चली गई हैं। ऊपर जा कर तीनों अलग अलग हो गई हैं। 6-इड़ा बाई कनपटी और पिंगला दाई कनपटी से होकर आज्ञा चक्र में मिल कर और तीनों प्रकार के मस्तिष्कों को पार कर ब्रह्म रंध्र से मिल गई है। 7-इसी प्रकार सुषुम्ना नाड़ी भी खोपड़ी के पीछे से होकर ब्रह्म रंध्र से मिल गई है। विचार की तरंगें इसी ब्रह्मरंध्र के मार्ग से सुषुम्ना में प्रवेश कर तीसरे मस्तिष्क मेंदूला ablongata में पहुंचती हैं। मेरुदण्ड में अग्नि रूप, शब्द पद, तेजोमयी, सिद्धि प्रदान करने वाली, काम पद, सर्वव्यापक, चक्र संस्थानों की स्वामिनी, गुप्त योनि, काम शक्ति अनग मेखला, समस्त मन्त्रों की शक्ति युक्त समस्त द्वन्द्वों का क्षय करने वाली, आनन्दमयी, संरक्षक, महाशक्ति, रहस्यमयी, महानतम कुंडलिनी देवी, कन्द मूल में निवास करती है। उपरोक्त प्रतिपादन यह सुनिश्चित करते हैं कि कुण्डलिनी साधना एक प्रकार से शरीर में प्राण एवं संकल्प के आघात द्वारा परमाणु ऊर्जा उत्पन्न करने, उसे प्रखर बनाने और उसका नियंत्रण नियमन करने की विद्या का नाम है। कुण्डलिनी के षट चक्र और उनका वेधन;-

27 FACTS;- 1-कुण्डलिनी साधना को अनेक स्थानों पर षट्चक्र वेधन की साधना भी कहते हैं। पंचकोषी साधना या पंचाग्नि विद्या भी कुण्डलिनी साधना के ही रूप है। एम.ए. एक डिग्री है इसे हिंदी, अंग्रेजी, सिविक्स, इकॉनोमिक्स किसी भी विषय से प्राप्त किया जा सकता है। 2-उसी प्रकार आत्म-तत्व, आत्म शक्ति एक है उसे प्राप्त करने के लिए विवेचन विश्लेषण और साधना विधान भिन्न हो सकते हैं। इसमें किसी तरह का विरोधाभास नहीं है। 3-आत्मोत्कर्ष की महायात्रा जिस राज मार्ग से होती है उसे मेरुदण्ड या सुषुम्ना कहते हैं। उसका एक सिरा मस्तिष्क का—दूसरा काम केन्द्र का स्पर्श करता है। कुण्डलिनी साधना की समस्त गतिविधियां प्रायः इसी क्षेत्र को परिष्कृत एवं सरल बनाने के लिए हैं। 4-इड़ा पिंगला के प्राण प्रवाह इसी क्षेत्र को दुहराने के लिए नियोजित किये जाते हैं। साबुन पानी में कपड़े धोये जाते हैं। झाड़ी झाड़न से कमरे की सफाई होती है। इड़ा पिंगला के माध्यम से किये जाने वाले नाड़ी शोधन प्राणायाम मेरुदण्ड का संशोधन करने के लिए हैं। इन दोनों ऋणात्मक और धनात्मक शक्तियों का उपयोग सृजनात्मक उद्देश्य से भी होता है। 5-इमारतें बनाने वाले कारीगर कुछ समय नींव खोद कर गड्ढा करते हैं, इसके बाद वे ही दीवार चुनने के काम में लग जाते हैं। इसी प्रकार इड़ा पिंगला संशोधन और सृजन का दुहरा काम करते हैं। जो आवश्यक है उसे विकसित करने में वे कुशल माली की भूमिका निभाते हैं। 6- यों आरम्भ में जमीन जोतने जैसा ध्वंसात्मक कार्य भी उन्हीं को करना पड़ता है पर यह उत्खनन निश्चित रूप से उन्नयन के लिए होता है। माली भूमि खोदने, खर पतवार उखाड़ने, पौधे की काट छांट करने का काम करते समय ध्वंस में संलग्न प्रतीत होता है, पर खाद पानी देने रखवाली करने में उसकी उदार सृजनशीलता का भी उपयोग होता है। इड़ा पिंगला के माध्यम से सुषुम्ना क्षेत्र में काम करने वाली प्राण विद्युत का विशिष्ट संचार क्रम प्रस्तुत करके कुण्डलिनी जागरण की साधना सम्पन्न की जाती है। 7-मेरुदण्ड को राजमार्ग-महामार्ग कहते हैं। इसे धरती से स्वर्ग पहुंचने का देवयान मार्ग कहा गया है। इस यात्रा के मध्य में सात लोक हैं। इस्लाम धर्म के सातवें आसमान पर खुदा का निवास माना गया है। ईसाई धर्म में भी इससे मिलती जुलती मान्यता है। हिन्दू धर्म के भूः भुवः स्वः जनः तपः महः सत्यमः यह सात लोक प्रसिद्ध है। आत्मा और परमात्मा के मध्य इन्हें विराम स्थल माना गया है। लम्बी मंजिलें पूरा करने के लिए लगातार ही नहीं चला जाता। बीच-बीच में विराम भी लेने होते हैं। रेलगाड़ी गन्तव्य स्थान तक बीच के स्टेशनों पर रुकती—कोयला, पानी लेती चलती है। इन विराम स्थलों को ‘चक्र’ कहा गया है। चक्रों की व्याख्या दो रूपों में होती है, एक अवरोध के रूप में दूसरे अनुदान के रूप में। 8- पुराण कथा के अनुसार राजा बलि का राज्य तीनों लोकों में था। भगवान ने वामन रूप में उससे साढ़े तीन कदम भूमि की भिक्षा मांगी। बलि तैयार हो गया। तीन कदम में तीन लोक और आधे कदम में बलि का शरीर नाप कर विराट् ब्रह्म ने उस सबको अपना लिया। हमारा शरीर साढ़े तीन हाथ लम्बा है। चक्रों के जागरण में यदि उसे लघु से महान् अण्ड से विभु कर लिया जाय तो उसकी साढ़े तीन हाथ की लम्बाई साढ़े तीन एकड़ जमीन न रहकर लोक-लोकान्तरों तक विस्तृत हो सकती है। और उस उपलब्धि की याचना करने के लिए भगवान् वामन रूप धारण करके हमारे दरवाजे पर हाथ पसारे हुए उपस्थित हो सकते हैं। 9-महाभारत में चक्रव्यूह की कथा है। अभिमन्यु उसमें फंस गया था। वेधन कला की समुचित जानकारी न होने से वह मारा गया था। चक्रव्यूह में सात परकोटे होते हैं। इस अलंकारिक प्रसंग को आत्मा का सात चक्रों में फंसा होना कह सकते हैं। भौतिक आकर्षणों की, भ्रान्तियों की, विकृतियों की चहार दीवारी के रूप में भी चक्रों की गणना होती है। इसलिए उसके वेधन का विधान बताया गया है। 10-रामचन्द्रजी ने वाली को मार सकने की अपनी क्षमता का प्रमाण सुग्रीव को दिया था। उनने सात ताड़ वृक्षों को एक वाण से बेध कर दिखाया था। इसे चक्रवेधन की उपमा दी जा सकती है। भागवत माहात्म्य में धुन्धकाली प्रेत का वांस की सात गांठें फोड़ते हुए सातवें दिन कथा प्रभाव से देव देहधारी होने की कथा है। इसे चक्रवेधन का संकेत समझा जा सकता है। 11-चक्रों को अनुदान केन्द्र इसलिए कहा जाता है कि उनके अन्तराल में दिव्य सम्पदाएं भरी पड़ी हैं। उन्हें ईश्वर ने चक्रों की तिजोरियों में इसलिए बन्द करके छोड़ा है कि प्रौढ़ता, पात्रता की स्थिति आने पर ही उन्हें खोलने उपयोग करने का अवसर मिले। कुपात्रता अयोग्यता की स्थिति में बहुमूल्य साधन मिलने पर तो अनर्थ ही होता है। 12-कुसंस्कारी सन्तानें उत्तराधिकार में मिली बहुमूल्य सम्पदा से दुर्व्यसन अपनाती और विनाश पथ पर तेजी से बढ़ती हैं। छोटे बच्चों को बहुमूल्य जेवर पहना देने से उनकी जान जोखिम का खतरा उत्पन्न हो जाता है। 13-धातुओं की खदानें जमीन की ऊपरी परत पर बिखरी नहीं होती उन्हें प्राप्त करने के लिए गहरी खुदाई करनी पड़ती है। मोती प्राप्त करने के लिए समुद्र में गहरे गोते लगाने पड़ते हैं। यह अवरोध इसलिए है कि साहसी एवं सुयोग्य सत्पात्रों को ही विभूतियों का वैभव मिल सके। मेरुदण्ड में अवस्थित चक्रों को ऐसी सिद्धियों का केन्द्र माना गया है जिनकी भौतिक और आत्मिक प्रगति के लिए नितान्त आवश्यकता रहती है। 14-चक्रवेधन, चक्रशोधन, चक्र परिष्कार, चक्र जागरण आदि नामों से बताये गये विवेचनों एवं विधानों में कहा गया है कि इस प्रयास से अदक्षताओं एवं विकृतियों का निराकरण होता है। जो उपयुक्त है उसकी अभिवृद्धि का पथ प्रशस्त होता है। सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन दुष्प्रवृत्तियों के दमन में यह चक्रवेधन विधान उपयोगी एवं सहायक है। कहा गया है कि;- 14-(1) गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला ‘आधार चक्र’ है। वहां वीरता और आनन्द भाव का निवास है। 14-(2) इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है। उसकी छह पंखुरियां हैं। इसके जागृत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गुणों का नाश होता है। 14-(3) नाभि में दश दल वाला मणिपुर चक्र है। यह प्रसुप्त पड़ा रहे तो तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, आदि कषाय-कल्मष मन में जड़ जमाये पड़े रहते हैं। 14-(4) हृदय स्थान में अनाहत चक्र है। यह बारह पंखुरियों वाला है। यह सोता रहे तो लिप्सा, कपट, तोड़-फोड़, कुतर्क, चिन्ता, मोह, दम्भ, अविवेक अहंकार से भरा रहेगा। जागरण होने पर यह सब दुर्गुण हट जायेंगे। 14-(5) कण्ठ में विशुद्धाख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है। यह सोलह पंखुरियों वाला है। यहां सोलह कलाएं सोलह विभूतियां विद्यमान हैं। 14-(6) भ्रूमध्य में आज्ञा चक्र है, यहां ‘ॐ’ उद्गीय, हूं, फट, विषद्, स्वधा स्वाहा, अमृत, सप्त स्वर, आदि का निवास है। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से यह सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं। 15-प्रत्यक्ष शरीर में चक्रों की उपस्थिति का परिचय तन्तु गुच्छकों के रूप में देखा जा सकता है। अंतःदर्शियों का अनुभव इन्हें सूक्ष्म शरीर में उपस्थित दिव्य शक्तियों का केन्द्र संस्थान बताता है। कुण्डलिनी एक व्यापक चेतना शक्ति है। मनुष्य के मूलाधार चक्र में उसका सम्पर्क तन्तु है जो व्यक्ति सत्ता को विश्व सत्ता के साथ जोड़ता है। 16-कुण्डलिनी जागरण से चक्र संस्थानों में जागृति उत्पन्न होती है। उसके फलस्वरूप—पारभौतिक (सुपर फिजीकल) और भौतिक (फिजीकल) के बीच आदान-प्रदान का द्वार खुलता है। यही है वह स्थिति जिसके सहारे मानवी सत्ता में अन्तर्हित दिव्य शक्तियों का जागरण सम्भव हो सकता है।

17-चक्रों की जागृति मनुष्य के गुण कर्म स्वभाव को प्रभावित करती है। स्वाधिष्ठान की जागृति से मनुष्य अपने में नव शक्ति का संचार हुआ अनुभव करता है उसे बलिष्ठता बढ़ती प्रतीत होती है। श्रम में उत्साह और गति में स्फूर्ति की अभिवृद्धि का आभास मिलता है।

18- मणिपुर चक्र से साहस और उत्साह की मात्रा बढ़ जाती है। संकल्प दृढ़ होते हैं और पराक्रम करने के हौसले उठते हैं। मनोविकार स्वयंमेव घटते हैं और परमार्थ प्रयोजनों में अपेक्षाकृत अधिक रस मिलने लगता है।

19-अनाहत चक्र की महिमा हिन्दुओं से भी अधिक ईसाई धर्म के योगी बताते हैं। हृदय स्थान पर गुलाब के फूल की भावना करते हैं और उसे महाप्रभु ईसा का प्रतीक ‘आईचिन’ कनक कमल मानते हैं। भारतीय योगियों की दृष्टि से यह भाव संस्थान है। कलात्मक उमंगें—रसानुभूति एवं कोमल सम्वेदनाओं का उत्पादक स्रोत यही है। बुद्धि की वह परत जिसे विवेकशीलता कहते हैं। आत्मीयता का विस्तार सहानुभूति एवं उदार सेवा सहकारिता के तत्व इस अनाहत चक्र से ही उद्भूत होते हैं।

20-कंठ में विशुद्ध चक्र है। इसमें बहिरंग स्वच्छता और अन्तरंग पवित्रता के तत्व रहते हैं। दोष दुर्गुणों के निराकरण की प्रेरणा और तदनुरूप संघर्ष क्षमता यहीं से उत्पन्न होती है। शरीर शास्त्र में थाइराइड ग्रन्थि और उससे स्रवित होने वाले हारमोनों के सन्तुलन-असन्तुलन से उत्पन्न लाभ-हानि की चर्चा की जाती है। अध्यात्म शास्त्र द्वारा प्रतिपादित विशुद्ध चक्र का स्थान तो यहीं है, पर वह होता सूक्ष्म शरीर में है। उसमें अतीन्द्रिय क्षमताओं के आधार विद्यमान हैं। 21-लघु मस्तिष्क शिर के पिछले भाग में है। अचेतन की विशिष्ट क्षमताएं उसी स्थान पर मानी जाती हैं। मेरुदण्ड में कंठ की सीध पर अवस्थित विशुद्धचक्र इस चित्त संस्थान को प्रभावित करता है। तदनुसार चेतना की अति महत्वपूर्ण परतों पर नियन्त्रण करने और विकसित एवं परिष्कृत कर सकने के सूत्र हाथ में आ जाते हैं। नादयोग के माध्यम से दिव्य श्रवण जैसी कितनी ही परोक्षानुभूतियां विकसित होने लगती हैं।

22-सहस्रार मस्तिष्क के मध्य भाग में है। शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थियों से सम्बन्ध रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है। वहां से जैवीय विद्युत का स्वयं भू प्रवाह उभरता है। वे धारायें मस्तिष्क के अगणित केन्द्रों की ओर दौड़ती हैं। इसमें से छोटी-छोटी चिनगारियां तरंगों के रूप में उड़ती रहती हैं। उनकी संख्या की सही गणना तो नहीं हो सकती, पर वे हैं हजारों। इसलिये हजार या हजारों का उद्बोधक ‘सहस्र’ शब्द प्रयोग में लाया जाता है।

23-सहस्रार चक्र का नामकरण इसी आधार पर हुआ है। सहस्र फन वाले शेषनाग की परिकल्पना का यही आधार है। यह संस्थान ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क साधने में अग्रणी है इसलिये उसे ब्रह्म रन्ध्र या ब्रह्मलोक भी कहते हैं। रेडियो एरियल की तरह हिंदू धर्मानुयायी इस स्थान पर शिखा रखाते और उसे शिर रूपी दुर्ग पर आत्म सिद्धान्तों को स्वीकृति किये जाने की विजय पताका बताते हैं। आज्ञा चक्र को सहस्रार का उत्पादन केन्द्र कह सकते हैं।

24-सभी चक्र सुषुम्ना नाड़ी के अन्दर स्थित हैं तो भी वे समूचे नाड़ी मण्डल को प्रभावित करते हैं। स्वचालित और ऐच्छिक दोनों ही संचार प्रणालियों पर इनका प्रभाव पड़ता है। अस्तु शरीर संस्थान के अवयवों को चक्रों द्वारा निर्देश पहुंचाये जा सकते हैं। साधारणतया यह कार्य अचेतन मन करता है और उस पर सचेतन मस्तिष्क का कोई बस नहीं चलता है। रोकने की इच्छा करने पर भी रक्त संचार रुकता नहीं और तेज करने की इच्छा होने पर भी उसमें सफलता नहीं मिलती।

25-अचेतन बड़ा दुराग्राही है। सचेतन की बात सुनने की उसे फुर्सत नहीं। उसकी मन मर्जी ही चलती है। ऐसी दशा में मनुष्य हाथ-पैर चलाने जैसे छोटे-मोटे काम ही इच्छानुसार कर पाता है। शरीर की अनैच्छिक क्रिया पद्धति के सम्बन्ध में वह लाचार बना रहता है। इसी प्रकार अपनी आदत, प्रकृति, रुचि, दिशा को बदलने के मनसूबे भी एक कोने पर रखे रह जाते हैं। ढर्रा अपने क्रम से चलता रहता है। ऐसी दशा में व्यक्तित्व को परिष्कृत करने वाली और शरीर तथा मनःसंस्थान में अभीष्ट परिवर्तन करने वाली आकांक्षा प्रायः अपूर्ण एवं निष्फल बनी रहती है।

26-चक्र संस्थान को यदि जागृत तथा नियन्त्रित किया जा सके तो आत्म जगत पर अपना अधिकार हो जाता है। यह आत्म विजय अपने ढंग की अद्भुत सफलता है।

27-इसका महत्व तत्वदर्शियों ने विश्व विजय से भी अधिक महत्वपूर्ण बताया है। विश्व विजय कर लेने पर दूरवर्ती क्षेत्रों से समुचित लाभ उठाना सम्भव नहीं हो सकता, उसकी सम्पदा का उपभोग, उपयोग कर सकने की अपने में सामर्थ्य भी कहां है? किन्तु आत्म विजय के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। उसका पूरा-पूरा लाभ स्वयं ही उठाया जा सकता है। उस आधार पर बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्रों की सम्पदा का प्रचुर लाभ अपने आप को मिल सकता है।

कुण्डलिनी जागरण का -विज्ञान ;-

कुण्डलिनी जागरण का -विज्ञान ;- 12 FACTS;- 1-मेरुदण्ड को शरीर शास्त्री स्पाइनल कालम कहते हैं। स्पायनल एक्सिस एवं वर्टीब्रल कॉलम—शब्द भी उसी के लिए प्रयुक्त होते हैं। मोटे-तौर पर यह 33 अस्थि घटकों से मिलकर बनी हुई एक पोली दण्डी भर है। इन हड्डियों को पृष्ठ वंश—कशेरुका या ‘वर्टिब्री’ कहते हैं। स्थिति के अनुरूप इनका पांच भागों में विभाजन किया जा सकता है। (1) ग्रीवा प्रदेश ...सर्वाइकल रीजन ...7 अस्थि खण्ड, (2) वक्ष प्रदेश—...डार्सल रीजन ....12 अस्थि खण्ड, (3) कटि प्रदेश ...लम्बर रीजन ...5 अस्थि खण्ड, (4) त्रिक या वस्तिगह्वर—...सेक्रल रीजन... 5 अस्थि खण्ड, (5) चेचु प्रदेश ...काक्सीजियल रीजन ...4 अस्थि खण्ड। 2-मेरु दण्ड पोला है। उससे अस्थि खंडों के बीच में होता हुआ यह छिद्र नीचे से ऊपर तक चला गया है। इसी के भीतर सुषुम्ना नाड़ी विद्यमान है। मेरुदण्ड के उपर्युक्त पांच प्रदेश सुषुम्ना में अवस्थित पांच चक्रों से सम्बन्धित हैं। (1) मूलाधार चक्र—चेचु प्रदेश (2) स्वाधिष्ठान—त्रिक प्रदेश (3) मणिपूर—कटि प्रदेश (4) अनाहत—वक्ष प्रदेश (5) विशुद्धि—ग्रीवा प्रदेश 3-छठे आज्ञाचक्र का स्थान मेरु दण्ड में नहीं आता। सहस्रार का सम्बन्ध भी रीढ़ की हड्डी में सीधा नहीं है। इतने पर भी सूक्ष्म शरीर का सुषुम्ना मेरु दण्ड पांच रीढ़ वाले और दो बिना रीढ़ वाले सभी सातों चक्रों को एक ही शृंखला में बांधे हुए हैं। सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना में यह सातों चक्र जंजीर की कड़ियों की तरह परस्पर पूरी तरह सम्बद्ध हैं। 4-यहां यह तथ्य भली-भांति स्मरण रखा जाना चाहिए कि शरीर विज्ञान के अन्तर्गत वर्णित प्लेक्सस, नाड़ी गुच्छक और चक्र एक नहीं हैं। यद्यपि उनके साथ पारस्परिक तारतम्य जोड़ा जा सकता है। यों इन गुच्छकों की भी शरीर में विशेष स्थिति है और उनकी कायिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली प्रतिक्रिया होती रहती है। 5-शरीर शास्त्र के अनुसार प्रमुख नाड़ी गुच्छकों (प्लेक्सेज) में 13 प्रधान हैं। उनके नाम हैं। (1) हिपेटिक (2) सर्वाइकल (3) ब्रांकियल (4) काक्सीजियल (5) लम्बर (6) सेक्रल (7) कार्डियक (8) इपिगेस्ट्रिक (9) इसोफैजियल (10) फेरेन्जियल (11) पलमोनरी (12) लिंगुअल (13) प्रोस्टेटिक। 6-इन गुच्छकों में शरीर यात्रा में उपयोगी भूमिका सम्पन्न करते रहने के अतिरिक्त कुछ विलक्षण विशेषतायें भी पाई जाती हैं उनसे यह प्रतीत होता है कि उनके साथ कुछ रहस्यमय तथ्य भी जुड़े हुए हैं। यह सूक्ष्म शरीर के दिव्य चक्रों के सान्निध्य से उत्पन्न होने वाला प्रभाव ही कहा जा सकता है। 7-‘चक्र’ शक्ति संचरण के एक व्यवस्थित, सुनिश्चित क्रम को कहते हैं। वैज्ञानिक क्षेत्र में विद्युत, ध्वनि, प्रकाश सभी रूपों में शक्ति के संचार क्रम की व्याख्या चक्रों (साइकिल्स) के माध्यम से ही की जाती है। इन सभी रूपों में शक्ति का संचार, तरंगों के माध्यम से होता है। एक पूरी तरंग बनने के क्रम को एक चक्र (साइकिल) कहते हैं। एक के बाद एक तरंग, एक के बाद एक चक्र (साइकिल) बनने का क्रम चलता रहता है और शक्ति का संचरण होता रहता है। 8-शक्ति की प्रकृति (नेचर) का निर्धारण इन्हीं चक्रों के क्रम के आधार पर किया जाता है। औद्योगिक क्षेत्र में प्रयुक्त विद्युत के लिये अन्तर्राष्ट्रीय नियम है कि वह 50 साइकिल्स प्रति सैकिंड के चक्र क्रम की होनी चाहिये। विद्युत की मोटरों एवं अन्य यन्त्रों को उसी प्रकृति की बिजली के अनुरूप बनाया जाता है। इसीलिए उन पर हार्सपावर, वोल्टेज आदि के साथ 50 साइकिल्स भी लिखा रहता है। अस्तु शक्ति संचरण के साथ ‘चक्र’ प्रक्रिया जुड़ी ही रहती है वह चाहे स्थूल विद्युत शक्ति हो अथवा सूक्ष्म जैवीय विद्युत शक्ति। 9-नदी प्रवाह में कभी-कभी कहीं भंवर पड़ जाते हैं। उनकी शक्ति अद्भुत होती है। उनमें फंसकर नौकाएं अपना सन्तुलन खो बैठती हैं और एक ही झटके में उलटती डूबती दृष्टिगोचर होती हैं। सामान्य नदी प्रवाह की तुलना में इन भंवरों की प्रचण्डता सैकड़ों गुनी अधिक होती है। शरीरगत विद्युत प्रवाह को एक बहती हुई नदी के सदृश माना जा सकता है और उसमें जहां तहां पाये जाने वाले चक्रों की ‘भंवरों’ से तुलना की जा सकती है। 10-गर्मी की ऋतु में जब वायुमण्डल गरम हो जाता है तो जहां-तहां छोटे बड़े ‘चक्रवात’—साइक्लोन उठने लगते हैं वे नदी के भंवरों की तरह ही गरम हवा के कारण आकाश में उड़ते हैं। उनकी शक्ति देखते ही बनती है। पेड़ों को, छत्तों को छप्परों को उखाड़ते उछालते वे बवंडर की तरह जिधर तिधर भूत-बेताल की तरह नाचते-फिरते हैं। साधारण पवन प्रवाह की तुलना में इन टारनेडों (चक्रवातों) की शक्ति भी सैकड़ों गुनी अधिक होती है। 11-शरीरगत विद्युत शक्ति का सामान्य प्रवाह यों सन्तुलित ही रहता है पर कहीं-कहीं उसमें उग्रता एवं वक्रता भी देखी जाती है हवा कभी-कभी बांस आदि के झुरमुटों से टकरा कर कई तरह की विचित्र आवाजें उत्पन्न करती है। रेलगाड़ी, मोटर और द्रुतगामी वाहनों के पीछे दौड़ने वाली हवा को भी अन्धड़ की चाल चलते देखा जा सकता है। नदी का जल कई जगह ऊपर से नीचे गिरता है—चट्टानों से टकराता है तो वहां प्रवाह में व्यतिक्रम उछाल, गर्जन-तर्जन की भयंकरता दृष्टिगोचर होती है। शरीरगत सूक्ष्म चक्रों की विशेष स्थिति भी इसी प्रकार की है। 12-यों नाड़ी गुच्छकों—प्लेक्सस में भी विद्युत संचार और रक्त प्रवाह के गति क्रम में कुछ विशेषता पाई जाती हैं। किन्तु सूक्ष्म शरीर में तो वह व्यतिक्रम कहीं अधिक उग्र दिखाई पड़ता है। पवन प्रवाह पर नियन्त्रण करने के लिए नावों पर पतवार बांधे जाते हैं उनके सहारे नाव की दिशा और गति में अभीष्ट हेरफेर कर लिया जाता है। पन चक्की के पंखों को गति देकर आटा पीसने, जल कल चलाने आदि काम लिये जाते हैं। जल प्रपात जहां ऊपर से नीचे गिरता है वहां उस प्रपात तीव्रता के वेग को बिजली बनाने जैसे कार्यों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। समुद्री ज्वार भाटों से भी बिजली बनने का काम लिया जा रहा है। ठीक इसी प्रकार शरीर के विद्युत प्रवाह में जहां चक्र बनते हैं वहां उत्पन्न उग्रता को कितने ही अध्यात्म प्रयोजनों में काम लाया जाता है। चक्र कितने हैं?- 16 FACTS;- 1-चक्र कितने हैं? इनकी संख्या निर्धारण करने में मनीषियों का मतभेद स्पष्ट है। विलय तन्त्र में इड़ा और पिंगला की विद्युत गति से उत्पन्न उलझन गुच्छकों को चक्रों की संज्ञा दी गई है—और उनकी संख्या पांच बताई गई है। मेरुदण्ड में वे पांच की ही संख्या में हैं। मस्तिष्क के अग्र भाग में अवस्थित आज्ञा चक्र को भी उनमें सम्मिलित कर लेने पर वे छह हो जाते हैं और हठयोग की गणना के अनुसार छह की संख्या पूरी हो जाती है। 2-सातवां सहस्रार है। इसे चक्रों की बिरादरी में जोड़ने न जोड़ने पर विवाद है। सहस्रार—नाभिक है। उसे इसी बिरादरी में सम्मिलित रखने न रखने के दोनों ही पक्षों के साथ तर्क हैं। इसलिए जहां छह की गणना है वहां सात का भी उल्लेख बहुत स्थानों पर हुआ है। 3-चक्रों की संख्या सूक्ष्म शरीर में बहुत बड़ी है। इन्हें 108 तक गिन