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स्वर विज्ञानं से कैसे बनायें अपने जीवन को सुखद ? क्या बिना औषध के रोगनिवारण संभव हैं ?(केवल साधकों क


स्वर विज्ञानं से कैसे बनायें अपने जीवन को सुखद 23 FACTS;- 1-सवेरे नींद से जगते ही नासिका से स्वर देखें। जिस तिथि को जो स्वर होना चाहिए, वह हो तो बिस्तर पर उठकर स्वर वाले नासिका छिद्र की तरफ के हाथ की हथेली का चुम्बन ले लें और उसी दिशा में मुंह पर हाथ फिरा लें। 2-यदि बांये स्वर का दिन हो तो बिस्तर से उतरते समय बांया पैर जमीन पर रखकर नीचे उतरें, फिर दायां पैर बांये से मिला लें और इसके बाद दुबारा बांया पैर आगे निकल कर आगे बढ़ लें। यदि दांये स्वर का दिन हो और दांया स्वर ही निकल रहा हो तो बिस्तर पर उठकर दांयी हथेली का चुम्बन ले लें और फिर बिस्तर से जमीन पर पैर रखते समय पर पहले दांया पैर जमीन पर रखें और आगे बढ़ लें। 3-यदि जिस तिथि को स्वर हो, उसके विपरीत नासिका से स्वर निकल रहा हो तो बिस्तर से नीचे नहीं उतरें और जिस तिथि का स्वर होना चाहिए उसके विपरीत करवट लेट लें। इससे जो स्वर चाहिए, वह शुरू हो जाएगा और उसके बाद ही बिस्तर से नीचे उतरें। 4-स्नान, भोजन, शौच आदि के वक्त दाहिना स्वर रखें। 5-पानी, चाय, काफी आदि पेय पदार्थ पीने, पेशाब करने, अच्छे काम करने आदि में बांया स्वर होना चाहिए। 6-जब शरीर अत्यधिक गर्मी महसूस करे तब दाहिनी करवट लेट लें और बांया स्वर शुरू कर दें। इससे तत्काल शरीर ठण्ढक अनुभव करेगा। जब शरीर ज्यादा शीतलता महसूस करे तब बांयी करवट लेट लें, इससे दाहिना स्वर शुरू हो जाएगा और शरीर जल्दी गर्मी महसूस करेगा। 7-जिस किसी व्यक्ति से कोई काम हो, उसे अपने उस तरफ रखें जिस तरफ की नासिका का स्वर निकल रहा हो। इससे काम निकलने में आसानी रहेगी। 8-जब नाक से दोनों स्वर निकलें, तब किसी भी अच्छी बात का चिन्तन न करें अन्यथा वह बिगड़ जाएगी। इस समय यात्रा न करें अन्यथा अनिष्ट होगा। इस समय सिर्फ भगवान का चिन्तन ही करें। इस समय ध्यान करें तो ध्यान जल्दी लगेगा। 9-दक्षिणायन शुरू होने के दिन प्रातःकाल जगते ही यदि चन्द्र स्वर हो तो पूरे छह माह अच्छे गुजरते हैं। इसी प्रकार उत्तरायण शुरू होने के दिन प्रातः जगते ही सूर्य स्वर हो तो पूरे छह माह बढ़िया गुजरते हैं। कहा गया है - कर्के चन्द्रा, मकरे भानु। 10-रोजाना स्नान के बाद जब भी कपड़े पहनें, पहले स्वर देखें और जिस तरफ स्वर चल रहा हो उस तरफ से कपड़े पहनना शुरू करें और साथ में यह मंत्र बोलते जाएं - ॐ जीवं रक्ष। इससे दुर्घटनाओं का खतरा हमेशा के लिए टल जाता है। 11-आप घर में हो या आफिस में, कोई आपसे मिलने आए और आप चाहते हैं कि वह ज्यादा समय आपके पास नहीं बैठा रहे। ऎसे में जब भी सामने वाला व्यक्ति आपके कक्ष में प्रवेश करे उसी समय आप अपनी पूरी साँस को बाहर निकाल फेंकियें, इसके बाद वह व्यक्ति जब आपके करीब आकर हाथ मिलाये, तब हाथ मिलाते समय भी यही क्रिया गोपनीय रूप से दोहरा दें। आप देखेंगे कि वह व्यक्ति आपके पास ज्यादा बैठ नहीं पाएगा, कोई न कोई ऎसा कारण उपस्थित हो जाएगा कि उसे लौटना ही पड़ेगा। 12-इसके विपरीत आप किसी को अपने पास ज्यादा देर बिठाना चाहें तो कक्ष प्रवेश तथा हाथ मिलाने की क्रियाओं के वक्त सांस को अन्दर खींच लें। आपकी इच्छा होगी तभी वह व्यक्ति लौट पाएगा।

13-यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो जो स्वर नहीं चल रहा है, उस पैर को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए तथा अचलित स्वर की ओर उस पुरुष या महिला को लेकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करने से क्रोधी व्यक्ति के क्रोध को आपका अविचलित स्वर का शांत भाग शांत बना देगा और मनोरथ की सिद्धि होगी।

14-गुरु, मित्र, अधिकारी, राजा, मंत्री आदि से वाम स्वर से ही वार्ता करनी चाहिए। 15-कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है, लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है। ऐसे समय में स्वर की प्रतीक्षा करने पर उत्तम अवसर हाथों से निकल सकता है, अत: स्वर परिवर्तन के द्वारा अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए प्रस्थान करना चाहिए या कार्य प्रारंभ करना चाहिए।

16-यात्रा प्रारम्भ करते समय जिस नाक से साँस चल रही हो वही पैर घर से पहले निकाल कर यात्रा करनी चाहिए। इस प्रकार यात्रा निर्विघ्न सफल होती है।बाएँ स्वर के प्रवाह के समय घर से बाहर जाना शुभ होता है और दाहिने स्वर के प्रवाह काल में अपने घर में या किसी के घर में प्रवेश शुभ दायक होता है।

17- जब अपने गुरु, राजा, मित्र या मंत्री का सम्मान करना हो तो उन्हें अपने सक्रिय स्वर की ही ओर रखना चाहिए।

18 - जय, लाभ और सुख चाहने वाले को अपने शत्रु, चोर, साहूकार, अभियोग लगाने वाले को रोकने हेतु उन्हें अपने निष्क्रिय स्वर की ओर, अर्थात जिस नासिका से स्वर प्रवाहित न हो उस ओर रखना चाहिए।

19- लम्बी यात्रा का प्रारम्भ बाएँ स्वर के प्रवाह काल में करना चाहिए और कम दूरी की यात्रा दाहिने स्वर के प्रवाह काल में करनी चाहिए।

20– यदि किसी के सक्रिय स्वर की ओर कोई दुष्ट या धोखेबाज, शत्रु, ठग, नाराज स्वामी अथवा चोर दिखाई पड़ जाय, तो समझना चाहिये कि उसे खतरा है अर्थात वह सुरक्षित नहीं है।

21– लम्बी यात्रा का आरम्भ करते समय चन्द्र स्वर फलदायक है और किसी कार्यवश किसी के घर में प्रवेश करते समय सूर्य स्वर का सक्रिय होना फलप्रद होता है।

22-जब सूर्योदय के समय सूर्य स्वर और चन्द्रोदय के समय चन्द्र स्वर बहे, तो उस दिन किए गए सभी कार्य सफल होते हैं।

23- लेकिन जब सूर्योदय के समय चन्द्र नाड़ी और चन्द्रोदय के समय सूर्य नाड़ी प्रवाहित हो, तो उस दिन किए सारे कार्य संघर्षपूर्ण और निष्फल होते

हैं।विद्वान लोग कहते हैं कि सूर्य स्वर के प्रवाह काल में किए गए कार्यों में अभूतपूर्व सफलता मिलती है, जबकि चन्द्रस्वर के प्रवाह काल में किए गए कार्यों में ऐसा कुछ नहीं होता। स्वर विज्ञान का सम्यक ज्ञान आपको सदैव अनुकूल परिणाम प्रदान करवा सकता है।

रोगोत्पत्ति का पूर्ण ज्ञान ;- 03 FACTS;- 1-प्रतिपदा आदि तिथियों को यदि निश्चित नियम के विरुद्ध श्वास चले तो समझना चाहिये कि निस्संदेह कुछ अमङुल होगा । जैसे ,शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को सबेरे नींद टूटने पर सूर्योदय के समय पहले यदि दाहिनीं नाक से श्वास चलना आरम्भ हो तो उस दिन से पूर्णिमा तक के बीज गर्मी के कारण शरीर में कोई पीडा होगी । 2-कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि को सूर्योदय के समय पहले बायीं नाक से श्वास चलना आरम्भ हो तो उस दिन से अमावस्या तक के अंदर कफ या सर्दि के कारण कोई पीडा होगी , इसमें संदेह नहीं । 3-दो पखवाडों तक इसी प्रकार विपरीत ढंग से सूर्योदय के समय निःश्वास चलता रहे तो किसी आत्मीय स्वजन को भारी बीमारी होगी अथवा मृत्यु होगी या और किसी प्रकार की विपत्ति आयेगी । तीन पखवाडों से ऊपर लगातार गडबड होने पर निश्चय ही अपनी मृत्यु हो जायेगी । रोगोत्पत्ति का प्रतीकार;- 02 FACTS;- 1-शुक्ल अथवा कृष्णपक्ष की प्रतिपदा के दिन प्रातःकाल यदि इस प्रकार विपरीत ढंग से निःश्वास चलने का पता लग जाय तो उस नासिका को कई दिनों तक बंद रखने से रोग उत्पन्न होने की सम्भावना नहीं रहती । उस नासिका को इस तरह बंद रखना चाहिये , जिसमें उससे निःश्वास न चले । इस प्रकार कुछ दिनों तक दिन -रात निरन्तर (स्नान और भोजन का समय छोडकर ) नाक बंद रखने से उक्त तिथियों के भीतर बिलकुल ही कोई रोग नहीं होगा । 2-यदि असावधानी के कारण निःश्वास में गडबडी हो और कोई रोग उत्प्न्न हो जाय तो जब तक रोग दूर न हो जाय , तब तक ऐसा करना चाहिये कि जिससे शुक्लपक्ष में दाहिनी और कृष्णपक्ष में बायीं नासिका से श्वास न चले । ऐसा करने से रोग शीघ्र दूर हो जायगा और यदि कोई भारी रोग होने की सम्भावना होगी तो वह भारी न होकर बहुत सामान्य रुप में होगा और फिर थोडे ही दिनों में दूर हो जायगा । ऐसा करने से न तो रोगजनित कष्ट भोगना पडेगा और न चिकित्सक को धन ही देना पडेगा । नासिका बन्द करने का नियम ;- 02 FACTS;- 1-नाक के छेद में घुस सके इतनी -सी पुरानी रुई लेकर उसकी गोल पोटली -सी बना ले और उसे साफ बारीक कपडे से लपेटकर सी ले । फिर इस पोटली को नाक के छिद्र में घुसाकर छिद्र को इस प्रकार बन्द कर दे जिसमें उस नाम से श्वास -प्रश्वास का कार्य बिल्कुल ही न हों । जिन लोगों को कोई शिरो रोग है अथवा जिनका मस्तक दुर्बल हो , उन्हें रुई से नाक बंद न कर , सिर्फ साफ पतले कपडे की पोटली बनाकर उसी से नाक बंद करनी चाहिये । 2-किसी भी कारण से हो , जितने क्षण या जितने दिन नासिका बंद रखने की आवश्यकता हो उतने क्षण या उतने दिनों तक अधिक अरिश्रम का कार्य , धूम्रपान , जोर से चिल्लाना , दौडना आदि नहीं करना चाहिये । जब जिस -किसी कारण से नाक बन्द रखने की आवश्यकता हो , तभी इन नियमों का पालन अवश्य करना चाहिये । नयी अथवा बिना साफ की हुई मैली रुई नाक में कभी नहीं डालनी चाहिये । निःश्वास बदलने की विधि;- 04 FACTS;- 1-कार्यभेद से तथा अन्यान्य अनेक कारणों से एक नासिका से दूसरी नासिका में वायु की गति बदलने की भी आवश्यकता हुआ करती है । कार्य के अनुकूल नासिका से श्वास चलना आरम्भ होने तक , उस कार्य को न करके चुपचाप बैठे रहना किसी के लिये भी सम्भव नहीं । अतएव अपनी इच्छानुसार श्वास की गति बदलने की क्रिया सीख लेना नितान्त आवश्यक है । इसकी क्रिया अत्य्न्त सहज है , सामान्य चेष्टा से ही श्वास की गति बदली जा सकती है । 2-जिस नासिका से श्वास चलता हो , उसके विपरीत दूसरी नासिका को अँगूठे से दबा देना चाहिये और जिससे श्वास चलता हो उसके द्वारा वायु खींचना चाहिये । फिर उसको दबाकर दूसरी नासिका से वायु को निकालना चाहिये । कुछ देर तक इसी तरह एक से श्वास लेकर दूसरी से निकालते रहने से अवश्य श्वास की गति बदल जायगी । 3- जिस नासिका से श्वास चलता हो उसी करवट सोकर यह क्रिया करने से बहुत जल्द श्वास की गति बदल जाती है और दूसरी नासिका में श्वास प्रवाहित होने लगता है । इस क्रिया के बिना भी जिस नाक से श्वास चलता है , केवल उस करवट कुछ समय तक सोये रहने से भी श्वास की गति पलट जाती है ।घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना प्रारंभ हो जाता है। 4-इस प्रकार जो अपनी इच्छानुसार वायु को रोक सकता है और निकाल सकता है वही पवन पर विजय प्राप्त करता है । बिना औषध के रोगनिवारण;- 11 FACTS;- 1-अनियमित क्रिया के कारण जिस तरह मानव -देह में रोग उत्पन्न होते हैं , उसी तरह औषध के बिना ही भीतरी क्रियाओं के द्वारा नीरोग होने के उपाय भगवान् ‍ के बनाये हुए हैं । हमलोग उस भगवत्प्रदत्त सहज कौशल को नहीं जानते , इसी कारण दीर्घकाल तक रोग का दुःख भोगते रहते है । यहाँ रोगों के निदान के लिय स्वरशास्त्रोक्त कुछ यौगिक उपायों का उल्लेख किया गया है । इनके प्रयोग से विशेष लाभ हो सकता है — 1-ज्वर में स्वर परिवर्तन ... ज्वर का आक्रमण होने पर अथवा आक्रमण की आशङ्का होने पर जिस नासिका से श्वास चलता हो , उस नासिका को बंद कर देना चाहिये । जब तक ज्वर न उतरे और शरीर स्वस्थ न हो जाय , तब तक उस नासिका को बंद ही रखना चाहिये । ऐसा करने से दस -पंद्रह दिनों में उतरने वाला ज्वर पाँच ही सात दिनों में अवश्य ही उतर जायगा। 2-ज्वरकाल में मन -ही -मन सदा चाँदी के समान श्वेत वर्ण का ध्यान करने से और भी शीघ्र लाभ होता है । 3- सिरदर्द में स्वर परिवर्तन ..सिरदर्द होने पर दोनों हाथों की केहुने के ऊपर रस्सी से खूब कसकर बाँध देना चाहिये । इससे पाँच -सात मिनट में ही सिरदर्द जाता रहेगा । केहुनी पर इतने जोर से बाँधना चाहिये कि रोगी को हाथ में अत्यन्त दर्द मालूम हो । सिरदर्द अच्छा होते ही बाँहे खोल देनी चाहिये । 4-एक दूसरे प्रकार का सिरदर्द होता है , जिसे साधारणतः ‘अधकपाली ’ या ‘आधासीसी ’ कहते हैं । कपाल के मध्य से बायीं या दाहिने ओर आधे कपाल और मस्तक में अत्यन्त पीडा मालूम होती है । प्रायः यह पीडा सूर्योदय के समय आरम्भ होती है और दिन चढने के साथ -साथ यह भी बढती जाती है । दोपहर के बाद घटनी शुरु होती है और शाम तक प्रायः नहीं ही रहती । 5-इस रोग का आक्रमण होने पर जिस तरफ के कपाल में दर्द हो , ऊपर लिख -अनुसार उसी तरफ की केहुनी के ऊपर जोर से रस्सी बाँध देनी चाहिये । थोडी ही देर में दर्द शान्त हो जायगा और रोग जाता रहेगा । दूसरे दिन यदि फिर दर्द शुरु हो और रोज एक ही नासिका से श्वास चलते समय शुरु होता हो तो सिरदर्द मालूम होते ही उस नाक को बंद कर देना चाहिये और हाथ को भी बाँध रखना चाहिये । ‘अद्धकपाली ’ सिरदर्द में इस क्रिया से होने वाले आश्चर्यजनक फल को देखकर साधक चकित रह जाते है 6-उदरामय , अजीर्णादि में स्वर परिवर्तन ...भोजन , जलपान आदि जब जो कुछ खाना हो वह दाहिनी नाक से श्वास चलते समय खाना चाहिये । प्रतिदिन इस नियम से आहार करने से वह बहुत आसानी से पच जायगा और कभी अजीर्ण का रोग नहीं होगा । जो लोग इस रोग से कष्ट पा रहे हैं , वे भी यदि इस नियम के अनुसार रोज भोजन करें तो खाए पदार्थ पच जायेगें और धीरे -धीरे उनका रोग दूर हो जायगा । वैसे, स्वरोदय विज्ञान के अनुसार भोजन के लिए पिंगला नाड़ी सर्वोत्तम कहीं गयी है, लेकिन अधिक मसालेदार, वसायुक्त नमकीन या खट्टे भोजन के लिए इडा नाड़ी का प्रवाह काल उत्तम माना गया है, क्योंकि यह शरीर में चयापचय से उत्पन्न विष को उत्सर्जित करने में सक्षम है। 7-भोजन के बाद थोडी देर बायीं करवट सोना चाहिये । जिन्हें समय न हो उन्हें ऐसा उपाय करना चाहिये कि जिससे भोजन के बाद दस -पंद्रह मिनट तक दाहिनी नाक से श्वास चले अर्थात् ‍ पूर्वोक्त नियम के अनुसार रुई द्वारा बायीं नाक बंद कर देनी चाहिये । गुरुपाक (भारी ) भोजन होने पर भी इस नियम से वह शीघ्र पच जाता है ।

8-प्रेमपूर्वक, शांत मन से, पवित्र स्थान पर बैठ कर भोजन करो | जिस समय नासिका का दाहिना स्वर (सूर्य नाड़ी) चालू हो उस समय किया भोजन शीघ्र पच जाता है, क्योंकि उस समय जठराग्नि बड़ी प्रबल होती है | भोजन के समय यदि दाहिना स्वर चालू नहीं हो तो उसको चालू कर दो |

9- यदि पेय पदार्थ लेना हो तो जब चन्द्र (बाँया) स्वर चालू हो तभी लो | यदि सूर्य (दाहिना) स्वर चालू हो और आपने दूध, काफी, चाय, पानी या कोई भी पेय पदार्थ लिया तो ... सूर्य स्वर चल रहा हो तब कोई भी पेय पदार्थ न पियो | उस समय यदि पेय पदार्थ पीना पड़े तो दाहिना नथुना बन्द करके बाँये नथुने से श्वास लेते हुए ही पियो 10-रात्रि को बाँयी करवट लेटकर ही सोना चाहिए | दिन में सोना उचित नहीं किन्तु यदि सोना आवश्यक हो तो दाहिनी करवट ही लेटना चाहिए |

11-रात्रि को संभव हो तो फलाहार लो | अगर भोजन लेना पड़े तो अल्पाहार ही करो | बहुत रात गये भोजन या फलाहार करना हितावह नहीं है | कब्ज की शिकायत हो तो 50 ग्राम लाल फिटकरी तवे पर फुलाकर, कूटकर, कपड़े से छानकर बोतल में भर लो | रात्रि में 15 ग्राम सौंफ एक गिलास पानी में भिगो दो | सुबह उसे उबाल कर छान लो और ड़ेढ़ ग्राम फिटकरी का पाउडर मिलाकर पी लो | इससे कब्ज व बुखार भी दूर होता है | कब्ज तमाम बिमारियों की जड़ है | इसे दूर करना आवश्यक है | साधना और अश्विनी मुद्रा ;- 1-श्वास सामान्य चलना और गुदा द्वार को बार-बार संकुचित करके बंद करना व फिर छोड़ देना. या श्वास भीतर भरकर रोक लेना और गुदा द्वार को बंद कर लेना, जितनी देर सांस भीतर रुक सके रोकना और उतनी देर तक गुदा द्वार बंद रखना और फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए गुदा द्वार खोल देना इसे अश्विनी मुद्रा कहते हैं.| 2-कई साधक इसे अनजाने में करते रहते हैं और इसको करने से उन्हें दिव्य शक्ति या आनंद का अनुभव भी होता है, परन्तु वे ये नहीं जानते कि वे एक यौगिक क्रिया कर रहे हैं.| अश्विनी मुद्रा का अर्थ है "अश्व यानि घोड़े की तरह करना". घोडा अपने गुदा द्वार को खोलता बंद करता रहता है और इसी से अपने भीतर अन्य सभी प्राणियों से अधिक शक्ति उत्पन्न करता है.| इस अश्विनी मुद्रा को करने से कुण्डलिनी शक्ति शीघ्रातिशीघ्र जाग्रत होती है और ऊपर की और उठकर उच्च केन्द्रों को जाग्रत करती है.| 3-यह मुद्रा समस्त रोगों का नाश करती हैं.| विशेष रूप से शरीर के निचले हिस्सों के सब रोग शांत हो जाते हैं. |स्त्रियों को प्रसव पीड़ा का भी अनुभव नहीं होता. |प्रत्येक नए साधक को या जिनकी साधना रुक गई है उनको यह अश्विनी मुद्रा अवश्य करनी चाहिए. |इसको करने से शरीर में गरमी का अनुभव भी हो सकता है,| उस समय इसे कम करें या धीरे-धीरे करें व साथ में प्राणायाम भी करें.| 4-सर्दी में इसे करने से ठण्ड नहीं लगती.| मन एकाग्र होता है.| साधक को चाहिए कि वह सब अवस्थाओं में इस अश्विनी मुद्रा को अवश्य करता रहे.| जितना अधिक इसका अभ्यास किया जाता है उतनी ही शक्ति बदती जाती है.| इस क्रिया को करने से प्राण का क्षय नहीं होता और इस प्राण उर्जा का उपयोग साधना की उच्च अवस्थाओं की प्राप्ति के लिए या विशेष योग साधनों के लिए किया जा सकता है.| 5-मूल बांध इस अश्विनी मुद्रा से मिलती-जुलती प्रक्रिया है.| इसमें गुदा द्वार को सिकोड़कर बंद करके भीतर - ऊपर की और खींचा जाता है.| यह वीर्य को ऊपर की और भेजता है एवं इसके द्वारा वीर्य की रक्षा होती है.| यह भी कुंडलिनी जागरण व अपानवायु पर विजय का उत्तम साधन है.| इस प्रकार की दोनों क्रियाएं स्वतः हो सकती हैं. इन्हें अवश्य करें. ये साधना में प्रगति प्रदान करती हैं. | 6-साधना में अथवा ध्यान में अथवा आराधना में कुछ समय मन को एकाग्रकर इन क्रियाओं को करने से शक्ति प्राप्ति और उन्नति की मात्रा बढ़ जाती है |यही सब छोटी-छोटी तकनीकियाँ हैं जो गुरु लोग अपने शिष्यों को क्रमशः बताते हैं और उनकी सफलता को नियंत्रित और तीब्र करते रहते हैं | 7-सामान्य साधक जो बिना गुरु के साधना करते हैं उनमे से अधिकतर को इन छोटी -छोटी तकनीकियों की जानकारी नहीं होती और बहुत परिश्रम पर भी उपलब्धि की मात्रा कम होती है ,कभी कभी तो शून्य होती है ,क्योकि वह तकनीकियों को जानते ही नहीं की ऊर्जा कैसे बढायें ,कैसे उसे उर्ध्वमुखी करें ,कैसे आने वाली ऊर्जा को नियंत्रित करें ,कैसे प्राप्त ऊर्जा को अपने में समाहित करें |साधना -आराधना केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना करना ही नहीं है अथवा मंत्र जप नहीं है |यह ऊर्जा को नियंत्रित कर खुद में समायोजित कर उसका उपयोग साधना की उन्नति में करना है |

.....SHIVOHAM...

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