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क्या रहस्य है सहस्रार-चक्र का? दशम द्वार /ब्रह्मरंध्र क्या है?


सहस्रार-चक्र क्या है :- 19 FACTS;- 1-मानवी सत्ता का मौलिक केन्द्र-स्रोत ब्राह्मी चेतना है। पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिण ध्रुव के समान ही मानवी सत्ता के भी दो ध्रुव है-सहस्रार और मूलाधार। सहस्रार को उत्तरी ध्रुव के समतुल्य समझा जा सकता है।जिस प्रकार सूर्य के अनुदान उत्तरी ध्रुव पर बरसते है और सम्पूर्ण पृथ्वी इस केन्द्र से आवश्यकता के अनुरूप शक्ति प्राप्त करती है। उसी प्रकार ब्राह्मी चेतना का चैतन्य प्रवाह अन्तरिक्ष में सतत् प्रवाहित होता रहता है। मनुष्य के शरीर में वह सहस्रार के माध्यम से अवतरित होता है तथा दक्षिणी ध्रुव मूलाधार तक पहुँचता है। 2-सहस्रार चक्र मस्तिष्क मध्य में अवस्थित बताया गया है। सिर के मध्य में एक हजार पंखुड़ियों वाला कमल हैं उसे ही ‘सहस्रार चक्र’ कहते है। उसी में ब्राह्मी शक्ति या शिव का वास बताया गया है। यहीं आकार कुण्डलिनी महाशक्ति शिव से मिलती है। यही से सारे शरीर की गतिविधियों का उसी प्रकार संचालन होता है जिस प्रकार पर्दे के पीछे बैठा हुआ कलाकार उँगलियों को गति देकर कठपुतलियों को नचाता है। इसे आत्मा की अधिष्ठात्री स्थली भी कहते है। विराट् ब्रह्म में हलचल पैदा करने वाली सारी सूत्र शक्ति और विभाग इसी सहस्रार के आस पास फैले पड़े है। 3-सहस्रार का शाब्दिक अर्थ है-हजार पंखुड़ियों वाला। शास्त्रों में इसी का अलंकारिक वर्णन रूपों में किया गया है। सहस्र दल कमल, कैलाश पर्वत, शेषनाग, क्षीरसागर जैसे दिव्य सम्बोधन इसी के लिए प्रयोग किये गये है। उपाख्यान आता है कि क्षीर सागर में शेष नाग पर भगवान विष्णु शयन करते है। इस अलंकारिक वर्णन मे