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प्रस्तावना


ॐ गुरवे आदि शंकराचार्य नमः ॐ गं गणपतये नमः ॐ सकारात्मक / नकारात्मक ऊर्जा नमः ॐ कामाख्या देव्यै नमः ॥ऊं ह्रीं दक्षिणामूर्तये नमः ॥

क्या है शिव स्वरोदय? ''शिव स्वरोदय' स्वरोदय विज्ञान पर अत्यन्त प्राचीन ग्रंथ है। इसमें कुल 395 श्लोक हैं। यह ग्रंथ शिव-पार्वती संवाद के रूप में लिखा गया है। शायद इसलिए कि सम्पूर्ण सृष्टि में समष्टि और व्यष्टि का अनवरत संवाद चलता रहता है और योगी अन्तर्मुखी होकर योग द्वारा इस संवाद को सुनता है, समझता है और आत्मसात करता हैं। इस ग्रंथ के रचयिता साक्षात् देवाधिदेव भगवान शिव को माना जाता है।स्वर विज्ञान की बातों को अपनाते हुए हम अपने जीवन में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण के लिए शिव स्वरोदय साधना जानने के बाद इन प्रमुख बातों का ध्यान रख हैं... 1-प्रातः उठकर विस्तर पर ही बैठकर आंख बंद किए हुए पता करें कि किस नाक से सांस चल रही है। यदि बायीं नाक से सांस चल रही हो, तो दक्षिण या पश्चिम की ओर मुंह कर लें। यदि दाहिनी नाक से सांस चल रही हो, तो उत्तर या पूर्व की ओर मुंह करके बैठ जाएं। फिर जिस नाक से सांस चल रही है, उस हाथ की हथेली से उस ओर का चेहरा स्पर्श करें। 2- उक्त कार्य करते समय दाहिने स्वर का प्रवाह हो, तो सूर्य का ध्यान करते हुए अनुभव करें कि सूर्य की किरणें आकर आपके हृदय में प्रवेश कर आपके शरीर को शक्ति प्रदान कर रही हैं। यदि बाएं स्वर का प्रवाह हो, तो पूर्णिमा के चन्द्रमा का ध्यान करें और अनुभव करें कि चन्द्रमा की किरणें आपके हृदय में प्रवेश कर रही हैं और अमृत उड़ेल रही हैं। 3- इसके बाद दोनों हथेलियों को आवाहनी मुद्रा में एक साथ मिलाकर आंखें खोलें और जिस नाक से स्वर चल रहा है, उस हाथ की हथेली की तर्जनी उंगली के मूल को ध्यान केंद्रित करें, फिर हाथ में निवास करने वाले देवी-देवताओं का दर्शन करने का प्रयास करें और साथ में निम्नलिखित श्लोक पढ़ते रहें- कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्द प्रभाते करदर्शनम्।। अर्थात कर (हाथ) के अग्र भाग में लक्ष्मी निवास करती हैं, हाथ के बीच में मां सरस्वती और हाथ के मूल में स्वयं गोविन्द निवास करते हैं। 4-तत्पश्चात् निम्नलिखित श्लोक का उच्चारण करते हुए मां पृथ्वी का स्मरण करें और साथ में तन्त्र और योग में पृथ्वी के बताए गए स्वरूप का ध्यान करें- समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।। फिर जो स्वर चल रहा हो, उस हाथ से माता पृथ्वी का स्पर्श करें और वही पैर जमीन पर रखकर विस्तर से नीचे उतरें।

5-तत्व से ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है, इसी से इसकी पालना होती है और इसी से इसका विनाश होता है। निराकार प्रभु महादेव से आकाश उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी उत्त्पन हुई है, इसी से ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है और अंत में सब तत्व में विलीन हो जाता है, फिर सूक्ष्म रूप में तत्व ही रमण करता है।

6-भगवान शिव आगे कहते हैं-''इन्ही पंच तत्वों की मनुष्य देह है और देह में सूक्ष्म रूप से ये पंच तत्व ही विद्यमान हैं। स्वर के उदय में ये पंच तत्व ही समाये हैं, स्वर का ज्ञान सारे ज्ञानो में उत्तम है। हे देवी स्वर में सम्पूर्ण वेद और शास्त्र है, स्वर में उत्तम गायन विद्या है स्वर में सम्पूर्ण त्रिलोकी है, स्वर ही आत्म स्वरुप है। ब्रह्माण्ड के खंड तथा पिंड, शरीर आदि स्वर से ही रचे हुए हैं। संसार की सृष्टि करने वाले महेश्वर भी साक्षात् स्वर रूप ही हैं। स्वर और तत्वों को जानने वाला मेरे अनुग्रह का भागी होता है। इससे उत्तम ज्ञान न देखा गया है न सुना गया है।

देवत्व का अवतरण ''का उद्देश्य पूरा हो सके इसके चलते ही प्रस्तुत पुस्तक को संकलित किया गया है यह एक भक्त का रचना संकलन है ,विद्वान का नहीं। इसलिए भगवान शिव और उनकी शक्ति को समर्पित है।अपनी त्रुटियों के लिए आपसे क्षमायाचना करती हूँ...यह एक भक्त की विनती है। ... शिवोहम...