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प्राचीन उज्जैन के मुख्य मंदिर कौन- कौन से है?


''है प्रयलंकर,हर अभयंकर,तेरे तांडव में भी सृष्टि है।

जीवन की संरचना में,साश्वत प्रेम की सदादृष्टि है।

अभयंकर है,घोर भी है तू, प्रत्यंचा है शोर भी है ।

तू महा निशा है भोर भी है, तू विनाश ध्वनि घनघोर भी है।

तू हृदय कोण अनुकोण में ,तू है रक्त श्वेद प्रतिशोण में ।

तू है संघर्षमय प्रतिपल,जीवन मरु सम कठोर है।

हर दर्शन में तेरे,आशीर्वाद की महावृष्टि है।।''

शिव स्व भी है संसार भी

सृजन भी है संहार भी

शिव शाश्वत है और सत्य भी

शिव शांत है और रौद्र भी

शिव सीमित भी है अनंत भी

शरुआत है और अंत भी

शिव मोह है और माया भी

शिव धूप है और छाया भी

शिव प्रेम भी है वैराग भी

संगीत है और राग भी

शिव वर्तमान है और अतीत भी

शिव से ही है सबका भविष्य भी

शिव शिवाप्रिय भी है और योगी भी

गंभीरता के साथ शिव के नेत्रों में है ज्वाला भी

शिव गले में पहने सर्प और रुद्राक्ष की माला भी

बस ऐसे ही हैहमारे शिव

हमारे देश भारत में तंत्र क्रिया सदियों से लोगों के जिज्ञासा का विषय रही है। हमारे यहां कई ऐसे स्थान हैं जो तंत्र क्रिया के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं। मध्य प्रदेश में ऐसा ही एक शहर है उज्जैन, जिसे तंत्र क्रिया के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। उज्जैन एक पौराणिक शहर है। इसके वर्णन अनेक धर्म ग्रंथों में मिलता है। यहां 12 ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर विराजमान हैं। महाकाल को उज्जैन का राजा भी कहा जाता है। यहां..... 1-कालभैरव;- ये हैं भगवान कालभैरव। यहां की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां स्थापित भगवान कालभैरव की मूर्ति शराब पीती है। जब किसी पात्र में शराब लेकर मूर्ति के मुख से लगाया जाता है तो शराब स्वत: ही पात्र में से मूर्ति के मुख में चली जाती है 2-विक्रांत भैरव;- ये हैं विक्रांत भैरव। तंत्र साधना के लिए ये स्थान बहुत प्रसिद्ध है। दूर-दूर से तांत्रिक यहां तंत्र क्रिया के लिए आते हैं। 3-चौबीस खंबा माता;- शहर के मध्य स्थित ये है चौबीस खंबा माता। यहां देवी महालया व महामाया की मूर्ति स्थापित हैं। शारदीय नवरात्रि में यहां शासकीय पूजा की जाती है जिसमें देवी को शराब का भोग लगाया जाता है। 4-भूखी माता;- शिप्रा नदी के दूसरी ओर स्थित ये है भूखी माता। ये स्थान तंत्र क्रिया तथा पशु बलि के लिए जाना जाता है। 5-गढ़कालिका माता;- ये हैं महाकवि कालिदास की आराध्य देवी माता गढ़कालिका। ये स्थान भी तंत्र क्रिया के लिए प्रसिद्ध है। 6-भर्तहरी गुफा;- ये है भर्तहरि गुफा की तस्वीर। ये स्थान नाथ संप्रदाय का साधना स्थल है। ऐसी किवदंती है कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के भाई भर्तहरि ने इसी स्थान पर साधना की थी।ये प्रमुख स्थान है जो तंत्र क्रिया के लिए प्रसिद्ध हैं। 7-श्री विक्रांत महाभैरव मंदिर;- 06 FACTS;- 1-यहां शिप्रा नदी के तट पर स्थित चक्रतीर्थ (शमशान घाट) पर दूर-दूर से तांत्रिक तंत्र क्रिया के लिए आते हैं। उज्जैन नगर से पांच किलोमीटर की दूरी पर प्राचीन बस्ती भैरवगढ़ या भैरूगढ़ में श्री कालभैरव मंदिर के सामने कुछ कदम चलने पर शिप्रा नदी के तट पर स्थित है प्राचीन श्री विक्रांत महाभैरव मंदिर। 2-जनश्रुति है कि यह मंदिर तीन-चार सहस्राब्दियों पूर्व एक विशाल भैरव मंदिर था। इसकी प्राचीनता स्वत: सिद्ध है। प्राचीन मन्दिर के भग्रावशेष, कंगूरेदार शिखर, टूटे हुए स्तम्भ व पाषाण पर नक्काशीदार खंडित मूत्तियाँ शिप्रा से प्राप्त हुई हैं जो इसके प्रमाण हैं। 3-कहते हैं यह अतीत में तंत्र साधकों की तपस्थली रहा है। मन्दिर के आसपास विद्यमान अति प्राचीन मूत्तियां स्वयं अपनी कहानी कहती हैं। स्कन्दपुराण में उल्लेख है कि एक बार पार्वतीजी ने भगवान् शिव से अवन्ती क्षेत्र के प्रमुख देवताओं व तीर्थों का वर्णन करने का निवेदन किया। सनत्कुमारजी के अनुसार तब महादेवजी ने कहा कि यहां शिप्रा सहित मेरी चार प्रिय नदियां हैं। यहाँ चौरासी लिंगों के रूप में उतने ही शिव निवास करते हैं, आठ भैरव रहते हैं, ग्यारह रुद्र, बाहर आदित्य और छ: गणेश हैं तथा चौबीस देवियां हैं। 4-महादेवजी ने जिन आठ भैरवों के नाम बताएं वे हैं— 1. दण्डपाणि, 2 विक्रांत 3. महाभैरव 4. बटुक 5. बालक 6. बन्दी 7. षट्पंचाशतक व 8. अपरकालभैरव। 5-विक्रांत का अर्थ है जिनकी अंगकांति तपाये हुए स्वर्ण के समान है और नाम के अनुरूप ही तेजस्विता और आलोक विक्रान्त भैरवजी की सिन्दूरचर्चित मूर्ति पर दर्शनीय है। यह स्थल नीरव, एकांत व प्रकृति की मनोहारी नैसर्गिक छटा से युक्त है। यहां दक्षिणवर्ती भैरव की चैतन्य मूर्ति है, जाग्रत श्मशान भूमि है। शिप्रा पूर्ववाहिनी है, प्राचीन शिव मन्दिर है, सती माता के पूज्य चरण हैं, कृत्याओं और मातृकाओं की खंडित पाषाण प्रतिमाएं हैं। ऊँचे घने वृक्ष हैं और सूर्यास्त के उपरांत अंधकार की चादर से ढंका विस्मयकारी वातावरण। 6-ओखरेश्वर शमशान भूमि से चमत्कारों की अनेक गाथाएं जुड़ी हुई हैं। स्कन्दपुराण के अनुसार इस भैरवतीर्थ में एक उत्तम स्वभाववाली काली नामक योगिनी रहा करती थी जिसने भैरवजी को अपने पुत्र की भांति पाला था। वे भैरवजी शिप्रा नदी के उत्तरी तट पर सदा स्थित रहते हैं। इसी पुराण में आगे लिखा है— सुंदर चंद्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं, जिन्होंने मस्तक पर मुकुट और गले में मोतियों की माला धारण कर रखी है तथा जो मनुष्य मात्र के लिए कल्याणस्वरूप हैं, उन विशालकाय भगवान् भूतनाथ भैरव का है मन, तू भजन कर— भज जन शिवरूपम् भैरवं भूतनाथम्। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; 8-हरसिद्धि माता;- 12 FACTS;- 1-उज्जैन स्थित भव्य श्री हरसिद्धि मंदिर भारत के प्राचीन स्थानों में से एक है जो कि माता सती के ५१ शक्तिपीठों में १३वा शक्तिपीठ है । हरसिद्धि मंदिर में उज्जैन के राजा रहे विक्रमादित्य की आराध्य देवी का वास है।शिवपुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति के हवन कुंड में माता के सती हो जाने के बाद भगवान भोलेनाथ सती को उठाकर ब्रह्मांड में ले गए थे। 2-इस दौरान माता सती के अंग जिन स्थानों पर गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गए। कहा जाता है इस स्थान पर माता के दाहिने हाथ की कोहनी गिरी थी और इसी कारण से यह स्थान भी एक शक्तिपीठ बन गया है। 3-स्कंद पुराण के अनुसार, देवी को चंड एवं मुंड नामक राक्षस के वध के लिए भगवान शिव से सिद्धि मिली थी, इसीलिए वह हरसिद्धि कहलाईं। गर्भगृह में एक शिला पर श्रीयंत्र उत्कीर्ण है, जो शक्ति का प्रतीक है। यहां माता लक्ष्मी, महासरस्वती के साथ ही अन्नपूर्णा माता विराजमान हैं। यह स्थान उज्जैन के प्राचीन देवी स्थानों में अपना विशेष महत्व रखता है। 4-श्री हरसिद्धि मंदिर के गर्भगृह के सामने सभाग्रह में श्री यन्त्र निर्मित है । कहा जाता है कि यह सिद्ध श्री यन्त्र है और इस महान यन्त्र के दर्शन मात्र से ही पुण्य का लाभ होता है । 5-कर्कोटकेश्वर महादेव -कालसर्प दोष;- शुभफल प्रदायिनी इस मंदिर के प्रांगण में शिवजी का कर्कोटकेश्वर महादेव मंदिर भी है जो कि चौरासी महादेव में से एक है जहां कालसर्प दोष का निवारण होता है ऐसा लोगों का विश्वास है । 6-मंदिर प्रांगण के बीचोंबीच दो अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है जिनका दर्शन भक्तों के लिए शांतिदायक रहता है । प्रांगण के चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार है एवं मुख्य प्रवेश द्वार के भीतर हरसिद्धि सभाग्रह के सामने दो दीपमालाएँ बनी हुई है जिनके आकाश की और मुख किये हुए काले स्तम्भ प्रांगण के भीतर रहस्यमयी वैभव का वातावरण स्थापित करते हैं । यह दीपमालिकाएं मराठाकालीन हैं । 7-ज्योतिषियों के अनुसार इसका शक्तिपीठ नामकरण किया गया है । ये नामकरण इस प्रकार है- स्थान का नाम १३ उज्जैन, शक्ति का नाम मांगलचाण्डिकी और भैरव का नाम कपिलाम्बर है । इस प्राचीन मंदिर के केंद्र में हल्दी और सिन्दूर कि परत चढ़ा हुआ पवित्र पत्थर है जो कि लोगों कि आस्था का केंद्र है । 8-गर्भगृह में सबसे ऊपर विराजमान हैं मां अन्नपूर्णा, जिनकी वजह से उज्जैनी में हमेशा भंडारे चलते रहते हैं। कहा जाता है कि उनकी कृपा से उज्जैन में कोई भूखा नहीं सोता है। बीच में मां लक्ष्मी के स्वरुप में है, जिनकी वजह से किसी को भी लक्ष्मी की कमी नहीं आती। सबसे नीचे विराजित हैं महाकाली। 9-इस मंदिर में माँ काली की मूरत के दाये बांये माँ लक्ष्मी और देवी सरस्वती की मुर्तिया है | महा काली की मूरत गहरे लाल रंग में रंगी हुई है | माँ का श्री यन्त्र भी मंदिर परिसर में लगा हुआ है | 10-कहा जाता है है सती माँ का बांया हाथ या उपरी होठ या दोनों इस जगह गिरे थे और इस शक्ति पीठ की स्थापना हुई थी | इसी जगह महान कवी कालीदास ने माँ के प्रशंसा में काव्य रचना की थी | 11-यह माता राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी थी | ये वो देवी हैं जो राजा विक्रमादित्य की पूजनीय थीं और राजा अमावस की रात को विशेष पूजा अनुष्ठान कर अपना सिर अलग करके चढ़ाते थे। लेकिन, हर बार देवी उनके सिर को जोड़ देती थीं। कहा जाता है की राजा विक्रमादित्य ने अपना 11 बार शीश दान माँ के सामने किया और हर बार माँ ने फिर से उनके शीश को जोड़ दिया। 12-किवदंती है कि माता हरसिद्धि सुबह गुजरात के हरसद गांव स्थित हरसिद्धि मंदिर जाती हैं और रात्रि विश्राम के लिए शाम को उज्जैन स्थित मंदिर आती हैं। इसी कारण यहां की संध्या आरती का विशेष महत्व है। माता हरसिद्धि की साधना से सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं, इसलिए नवरात्रि में यहां साधक साधना करने आते हैं।उज्जैन में हरसिद्धि देवी की आराधना करने से शिव और शक्ति दोनों की पूजा हो जाती है। ऐसा इसलिए कि ये ऐसा स्थान है, जहां महाकाल और मां हरसिद्धि के दरबार हैं। उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की कुछ रोचक जानकारियाँ (भूखी और चौबीस खंभा माता का रहस्य);- भूखी माता और चौबीस खंभा देवी का महत्व इसलिए है क्योंकि इससे जुड़ी है राजा विक्रमादित्य के राजा बनने और सिंहासन बत्तीसी की कहानी। जानते हैं कि क्या है इन दोनों मंदिरों की स्थापना का रहस्य। भूखी माता मंदिर :- 1-इस मंदिर से राजा विक्रमादित्य के राजा बनने की किंवदंती जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भूखी माता को प्रतिदिन एक युवक की बलि दी जाती थी। तब जवान लड़के को उज्जैन का राजा घोषित किया जाता था, उसके बाद भूखी माता उसे खा जाती थी। एक दुखी मां का विलाप देख नौजवान विक्रमादित्य ने उसे वचन दिया कि उसके बेटे की जगह वह नगर का राजा और भूखी माता का भोग बनेगा 2-राजा बनते ही विक्रमादित्य ने पूरे शहर को सुगंधित भोजन से सजाने का आदेश दिया। जगह-जगह छप्पन भोज सजा दिए गए। भूखी माता की भूख विक्रमादित्य को अपना आहार बनाने से पहले ही खत्म हो गई और उन्होंने विक्रमादित्य को प्रजापालक चक्रवर्ती सम्राट होने का आशीर्वाद दिया। तब विक्रमादित्य ने उनके सम्मान में इस मंदिर का निर्माण करवाया।यह स्थान दत्त अखाडे के पास है। चौबीस खंभा देवी : - 1-यह है उज्जैन नगर में प्रवेश करने का प्राचीन द्वार। पहले इसके आसपास परकोटा या नगर दीवाल हुआ करती थी। अब वे सभी लुप्त हो गई हैं, सिर्फ प्रवेश द्वार और उसका मंदिर ही बचा है। 2-यहां पर दो देवियां विराजमान हैं- एक महामाया और महानाया। इसके अलावा विराजमान हैं बत्तीस पु‍तलियां। यहां पर रोज एक राजा बनता था और उससे ये प्रश्न पूछती थीं। राजा इतना घबरा जाता था कि डर के मारे मर जाता था। 3-जब राजा विक्रमादित्य का नंबर आया तो उन्होंने अष्टमी के दिन नगर पूजा चढ़ाई। नगर पूजा में राजा को वरदान मिला था कि बत्तीस पुतली जब तुमसे जवाब मांगेंगी तो तुम उन्हें जवाब दे पाओगे। जब राजा ने सभी पुतलियों को जवाब दे दिया तो पुतलियों ने भी वरदान दिया कि राजा जब भी तू न्याय करेगा तब तेरा न्याय डिगने नहीं दिया जाएगा। 4-अवंतिका नगरी के प्राचीन द्वार पर विराजमान हैं दो देवियां जिन्हें नगर की सुरक्षा करने वाली देवियां कहा जाता है। इस प्राचीन मंदिर में सिंहासनारूढ राजा विक्रमादित्य की मूर्ति के अलावा बत्तीस पुतलियों की मूर्तियां भी विराजमान हैं। पुजारी ने कहा कि'' ये सब परियां हैं जो आकाश-पाताल की खबर लाकर देती हैं। इंद्र के नाती गंधर्व सेन गंधर्वपुरी से आए थे, जो विक्रमादित्य के पिता थे''।

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महाकालेश्‍वर मंदिर;-

1-मध्‍यप्रदेश राज्‍य के उज्जैन शहर में महाकालेश्‍वर मंदिर स्थित है। इसे भारत के 12 प्रमुख ज्‍योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। पुण्यसलिला क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित उज्जैन प्राचीनकाल में उज्जयिनी के नाम से विख्यात था, इसे अवंतिकापुरी भी कहते थे। यह स्थान हिंदू धर्म की 7 पवित्र पुरियों में से एक है। माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2-पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, ऐसी मान्यता है। महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की है। 1235 ई. में इल्तुत्मिश के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंस किए जाने के बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया,

3-महाकालेश्वर मंदिर एक विशाल परिसर में स्थित है। यहां कई देवी-देवताओं के छोटे-बड़े मंदिर हैं। मंदिर में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार से गर्भगृह तक की दूरी तय करनी पड़ती है। इस मार्ग में कई सारे पक्के चढ़ाव उतरने पड़ते हैं परंतु चौड़ा मार्ग होने से यात्रियों को अधिक ‍परेशानियां नहीं आती है। गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए पक्की सीढ़ियां बनी हैं। मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुंड है।

4-वर्तमान में जो महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है वह तीन खंडों में विभाजित है। निचले खंड में महाकालेश्वर, मध्य के खंड में ओंकारेश्वर तथा ऊपरी खंड में श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर स्थित है। गर्भगृह में विराजित भगवान महाकालेश्वर का विशाल दक्षिणमुखी शिवलिंग है। ज्योतिष में जिसका विशेष महत्व है। इसी के साथ ही गर्भगृह में माता पार्वती, भगवान गणेश व कार्तिकेय की मोहक प्रतिमाएं हैं। गर्भगृह में नंदी दीप स्थापित है, जो सदैव प्रज्ज्वलित होता रहता है। गर्भगृह के सामने विशाल कक्ष में नंदी की प्रतिमा विराजित है। इस कक्ष में बैठकर हजारों श्रद्धालु शिव आराधना का पुण्य लाभ लेते हैं। 5-महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना से संबंधित भारतीय पुराणों में अलग-अलग कथाअों का वर्णन मिलता है। एक कथा के अनुसार अवंतिका नाम के राज्य में वृषभसेन नाम के राजा राज्य करते थे। वे अपना अधिकतर समय शिव पूजा में लगाते रहते थे। एक बार पड़ोसी राजा ने वृषभसेन के राज्य पर हमला बोल दिया। वृषभसेन ने पूरे साहस के साथ इस युद्ध का सामना किया और जीत हासिल की। अपनी हार का बदला लेने के लिए पड़ोसी राजा ने कोई और उपाय सोचा। इसके लिए उसने एक असुर की सहायता ली। उस दैत्य को अदृश्य होने का वर प्रदान था। पड़ोसी राजा ने उस दैत्य की मदद से अवंतिका राज्य पर हमला बोल दिया। राजा वृषभसेन ने इन हमलों से बचने के लिए भगवान शिव की शरण ली। भक्त की पुकार सुन कर भगवान साक्षात अवंतिका राज्य मं प्रकट हुए। उन्होंने असुरों औरअौर पड़ोसी राजाअों से प्रजा की रक्षा की। इस पर राजा वृषभसेन और प्रजा ने भगवान शिव से अवंतिका राज्य में ही रहने का आग्रह किया। जिससे भविष्य में अन्य आक्रमण से बचा जा सके। भक्तों के आग्रह के कारण भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रुप में वहां पर प्रकट हुए।

6-कहा जाता है कि आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग और पृथ्वी पर महाकालेश्वर से बढ़कर अन्य कोई ज्योतिर्लिंग नहीं है। इसलिए महाकालेश्वर को पृथ्वी का अधिपति भी माना जाता है । यह एक दक्षिणमुखी ज्‍योतिर्लिंग है। शास्त्रों के अनुसार दक्षिण दिशा के स्वामी यमराज जी है। कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति मंदिर में आकर सच्चे मन से भगवान शिव की प्रार्थना करता है उसे मृत्यु के बाद मिलने वाली यातनाअों से मुक्ति मिलती है। कहा जाता है कि यहां आकर भगवान शिव के दर्शन करने से अकाल मृत्यु टल जाती है और व्यक्ति को सीधा मोक्ष प्राप्त होता है।

7-यहां आने से भगवान शिव धन, धान्य, निरोगी काया, लंबी आयु, संतान आदि इच्छाें पूर्ण करते हैं। यहां पहले महाकाल की भस्म आरती में ताजा मुर्दे की भस्म का ही प्रयोग होता था परंतु महात्मा गांधी के आग्रह के उपरांत शास्त्रीय विधि से निर्मित उपल-भस्म से भस्मार्ती होने लगी।

.....SHIVOHAM....