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आज्ञा-चक्र क्या है ?आज्ञा-चक्र जाग्रत करने की विधि क्या है ?आज्ञाचक्र के जागरण की सूर्य / सविता साधन


आज्ञा-चक्र क्या है ?- 19 FACTS;- 1-आज्ञा चक्र मनुष्य के शरीर का छठा मूल चक्र है। आज्ञा का अर्थ होता है आदेश | आज्ञा चक्र मस्तिष्क के मध्य में, भौंहों के बीच स्थित है। इस कारण इसे तीसरा नेत्र भी कहा जाता है।छ: चक्रों में से दोनो भौहों के बीच के आज्ञा चक्र का विशेष महत्व है। त्रिकुटि कहलाने वाला यह चक्र'आंतरिक गुरू' का आसन है। इस चक्र के दोनों ओर दो पंखुड़ियां, दो योग नाड़ियां हैं और इन सूक्ष्म नाड़ियों में से जो आध्यात्मिक कंपन निकलता है वह संस्कृत के उन अक्षरों के सदृश होता है जिसका अर्थ है सोहम् – मैं वह हूं। 2-आज्ञा चक्र स्पष्टता और बुद्धि का केन्द्र है। यह ३ प्रमुख नाडिय़ों, इडा (चंद्र नाड़ी) पिंगला (सूर्य नाड़ी) और सुषुम्ना (केन्द्रीय, मध्य नाड़ी) के मिलने का स्थान है। जब इन तीनों नाडिय़ों की ऊर्जा यहां मिलती है और आगे उठती है, तब हमें समाधि, सर्वोच्च चेतना प्राप्त होती है। 3-आज्ञा चक्र दो पंखुडिय़ों वाला एक कमल है जो इस बात को दर्शाता है कि चेतना के इस स्तर पर ‘केवल दो’, आत्मा और परमात्मा ही हैं। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इसे ही बौद्धिक सिद्धि कहा जाता हैं। 4-अगर आपकी ऊर्जा आज्ञा में सक्रिय है, या आप आज्ञा तक पहुंच गये हैं, तो इसका मतलब है कि बौद्धिक स्तर पर आपने सिद्धि पा ली है। बौद्धिक सिद्धि आपको शांति देती है। आपके अनुभव में यह भले ही वास्तविक न हो, लेकिन जो बौद्धिक सिद्धि आपको हासिल हुई है, वह आपमें एक स्थिरता और शांति लाती है। आपके आस पास चाहे कुछ भी हो रहा हो, या कैसी भी परिस्थितियां हों, उस से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। 5-इस चक्र के गुण हैं - एकता, शून्य, सत, चित्त और आनंद। 'ज्ञान नेत्र' भीतर खुलता है और हम आत्मा की वास्तविकता देखते हैं - इसलिए 'तीसरा नेत्र' का प्रयोग किया गया है जो भगवान शिव का द्योतक है। 6-आज्ञा चक्र 'आंतरिक गुरू' की पीठ (स्थान) है। यह द्योतक है बुद्धि और ज्ञान का, जो सभी कार्यों में अनुभव किया जा सकता है। उच्चतर, नैतिक विवेक के तर्कयुक्त शक्ति के समक्ष अहंकार आधारित प्रतिभा समर्पण कर चुकी है। तथापि, इस चक्र में एक रुकावट का उल्टा प्रभाव है जो व्यक्ति की परिकल्पना और विवेक की शक्ति को कम करता है, जिसका परिणाम भ्रम होता है। 7-आज्ञाचक्र की संगति शरीरशास्त्री आप्टिकल कायजमा, पिट्यूटरी एवं पीनियल ग्रन्थियों के साथ बिठाते है। यह ग्रन्थियाँ भ्रूमध्य की सीध में मस्तिष्क में है। इनसे स्रवित होने वाले हारमोन स्राव समस्त शरीर के अति महत्वपूर्ण मर्मस्थलों को प्रभावित करते है, अन्यान्य ग्रन्थियों के स्रावों पर भी नियंत्रण करते है। इनकी विकसित एवं अविकसित स्थिति का पूरे व्यक्तित्व पर भला-बुरा प्रभाव पड़ता है। 8-सामान्यतया इन रहस्यमयी ग्रन्थियों और उनके उत्पादनों को अतिमहत्त्वपूर्ण मानते हुए भी मानवी नियंत्रण के बाहर समझा जाता है। ऐसा कोई उपाय अभी हाथ नहीं लगा है कि इन ग्रन्थियों की स्थिति को सँभाला-सुधारा जा सके। यदि वैसा उपाय हाथ लगा होता, तो सचमुच ही मनुष्य को अपने हाथों, अपना व्यक्तित्व, भाग्य और भविष्य बनाने की कुँजी हाथ लग जाती। 9-कुछ अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार पीनियल और पिट्यूटरी ग्रन्थियाँ चक्र संस्थान के दो अलग-अलग चक्रों का प्रतिनिधित्व करती है। उनका कहना है। कि आज्ञाचक्र और पीनियल ग्रन्थि दोनों एक ही है, जबकि पिट्यूटरी ग्रंथि सहस्रार है। पीनियल और पिट्यूटरी ग्रन्थियों की ही तरह आज्ञाचक्र और शून्यचक्र (सहस्रार) में भी निकट का संबंध है। ऐसा समझा जाता है कि आज्ञाचक्र शून्यचक्र तक पहुँचने का एक मार्ग है। 10-इस मार्ग में यदि किसी प्रकार की कोई अड़चन न आई तो सहस्रार का जागरण सरल हो जाता है और इस मार्ग में यदि किसी प्रकार की कोई अड़चन न आई तो सहस्रार का जागरण सरल हो जाता है और इस उन्नयन से होने वाली अनुभूतियों को सँभाल पाना आज्ञाचक्र जागरण के बाद सुगम होता है। 11-पीनियल ग्रन्थि को अंतःस्रावी संस्थान का नियन्ता (मास्टर ग्लैण्ड) कहा गया है। अन्य ग्रन्थियों के साथ-साथ पिट्यूटरी पर भी वह बन्ध की तरह चढ़ा होता है एवं उसकी बागडोर अपने हाथ रखता है। ऐसा देखा गया है कि 10-12 वर्ष की आयु से पीनियल का रस-स्राव आरंभ हो जाता है। इसके पश्चात् पिट्यूटरी क्रियाशील हो जाती है, जिसमें शेष अन्य ग्रन्थियों का क्षरण प्रारम्भ हो जाता है और रक्त में विभिन्न प्रकार के हारमोन आ-आकर मिलने लगते है। 12-इससे आदमी में यौन भावना, क्रूरता, कठोरता, करुणा, उदारता, दया, प्रेम, घृणा, द्वेष जैसी भली-बुरी भाव−संवेदनाओं का उदय होने लगता है और व्यक्तित्व में साँसारिकता हावी होती जाती है, मनुष्य आध्यात्मिक अनुशासनों की अवहेलना करने लगता है एवं आध्यात्मिक जीवन से शनैः-शनैः दूर होता जाता है। 13-तत्त्ववेत्ताओं के अनुसार आज्ञाचक्र का मन से गहरा संबंध है। हमें अंतः दर्शन, स्वप्न या आध्यात्मिक अनुभूतियों के दौरान जो कुछ भी दिखलाई पड़ता है, उसका आधार यही है। मानसिक सजगता के लिए भी यहीं जिम्मेदार है। उठते, बैठते कार्य करते समय यदि व्यक्ति सजग नहीं है। तो इसका तात्पर्य यह है कि उसका आज्ञाचक्र निष्क्रिय दशा में है। उसकी क्रियाशीलता के साथ-साथ आदमी की तत्परता और जागरूकता बढ़ने लगती है। 14-लौकिक ज्ञान के लिए सामान्यता इन्द्रियों की सहायता देनी पड़ती है, लेकिन असाधारण दशा में इनके बिना भी जानकारी संभव है। ऐसा दिव्य चक्षु के जागरण से होता है। ज्ञान के भौतिक तरीके में इन्द्रियों द्वारा जो कुछ संदेश ग्रहण किया जाता है, उसे सीधे मस्तिष्क में सम्प्रेषित कर दिया जाता है। वहाँ उसका अध्ययन, वर्गीकरण और विश्लेषण होता है, तब हूँ यह विदित हो पाता है कि जो कुछ देखा जा सुना गया वह क्या था। दूसरा तरीका अतीन्द्रिय है। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। 15-आकाश मेघमालाओं से घिरा हुआ हो और बीच-बीच में बिजली कौंध रही हो, तो कोई भी व्यक्ति आसानी से यह अनुमान लगा सकता है कि वर्षा होने वाली है। यह इन्द्रिय ज्ञान हुआ। इसके विपरीत यदि बिलकुल आसमान साफ हो फिर भी कोई यह कहे कि बरसात अवश्य होगी और तीन घंटे बाद होगी, तो इसका एक ही अर्थ है कि उसकी अन्तःप्रज्ञा विकसित है। और आज्ञाचक्र उद्बुद्ध स्थिति में है। 16-यह एक ऐसा केन्द्र है, जिसके विकास के बाद व्यक्ति मन और शरीर स्तर पर घटने वाली घटनाओं एवं साँसारिक प्रसंगों के द्रष्टा भाव से देखा रहता है और जिन घटनाक्रमों से सर्वसाधारण लोग विचलित हो उठते है, वैसे प्रसंगों में भी वह तटस्थ बना रहता है। 17- इस स्थिति में चित की चंचलता समाप्त हो जाती है, बुद्धि में पवित्रता और शुचिता का उदय होता है, आसक्ति का अवशेष तक नहीं रहता, संकल्पशक्ति अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है तथा सत्संकल्प पूरे होने लगते है, व्यक्ति में अतीन्द्रिय अनुभूतियों और सिद्धियों का चमत्कार प्रकट होने लगता है, उसके शाप-वरदान फलित होने लगते है; वाणी में ओज, मुखमण्डल पर तेज और आँखों में चमक विराजने लगती है। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार की विशेषताएँ साधक में प्रकट और प्रत्यक्ष होती दिखाई पड़ती है। 18-तन्त्रशास्त्र में आज्ञाचक्र को ‘शिव ग्रन्थि’ कहा गया है। यह आत्मविकास के मार्ग में प्रकट होने वाली आत्मिक विभूतियों पर तिजोरी के ताले की तरह है। साधक सिद्धियों के प्रति जब तक मोह भंग नहीं होता, तब तक यह ग्रन्थि प्रगति के आगे के पथ को अवरुद्ध बनाये रहती है, इसलिए आज्ञाचक्र से शून्यचक्र (सहस्रार) तक की विकास-यात्रा काफी कठिन होती है। 19- जो साधक सिद्धियों के भ्रम-जंजाल में उलझ जाते है, उनके लिए चेतना के सर्वोच्च शिखर तक पहुँच पाना संभव नहीं होता, इसीलिए साधनाकाल के आरंभिक दिनों से ही योगाभ्यासियों को आकर्षणों के प्रति तीव्र वैराग्य, अनासक्ति और निर्लिप्तता का परिचय देते हुए कठोर आत्मसंयम का अभ्यास करना पड़ता है। आज्ञा-चक्र का मंत्र :- 05 FACTS;- 1-इस चक्र को जाग्रत करने के लिए आपको ऊं मंत्र का जाप करते हुए ध्यान लगाना होता है |इसका मंत्र है ॐ। 2-आज्ञा चक्र का रंग सफेद है। इसका तत्व मन का तत्व, अनुपद तत्त्व है। इसका चिह्न एक श्वेत शिवलिंगम्, सृजनात्मक चेतना का प्रतीक है। इसमें और बाद के सभी चक्रों में कोई पशु चिह्न नहीं है। इस स्तर पर केवल शुद्ध मानव और दैवी गुण होते हैं। 3-शिवलिंगम् के ऊपर बीजमंत्र ‘ॐ’ है। शिव आज्ञाचक्र के देवता है। इसकी अधिष्ठात्री देवी ‘हाकिनी’ है। इसके छह मुख हैं, जो चन्द्रमाओं की तरह शीतल-स्निग्ध प्रतीत होते है। आज्ञाचक्र की यह सूक्ष्म संरचना और आकृति मनगढ़न्त अनुभव की गई सच्चाई है। 4-आज्ञाचक्र का प्रतीक दो पंखुड़ियों वाला कमल है। साधना ग्रन्थों में इसके पीला, हल्का भूरा तथा स्लेटी कई रंग बताये गए है। इसके बीजमंत्र ‘हं’ और ‘क्षं’ है, जो क्रमशः बायीं एवं दायीं पंखुड़ियों पर अंकित है। ये चमकीले श्वेत रंग के होते है। इनमें से एक चन्द्रमा अथवा इड़ा नाड़ी का एवं दूसरा सूर्य या पिंगला नाड़ी का प्रतीक है। 5-प्रत्येक चक्र की पृथक् -पृथक् तन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ होती है। आज्ञाचक्र के लिए मन ही इन तीनों भूमिकाओं को निबाहता है। यहाँ मन को सूक्ष्म आधारों से ज्ञान और संकेत प्राप्त होते है। यह आधार वह इन्द्रियों नहीं होती, जो अन्य चक्रों के लिए सूचनाओं के स्रोत है। आज्ञा-चक्र का स्थान :- 12 FACTS;- 1-आज्ञा-चक्र हमारी दोनों भौहों के मध्य में स्थित होता है |आज्ञा चक्र मस्तक के मध्य में, भौंहों के बीच स्थित है। इस कारण इसे "तीसरा नेत्र” भी कहते हैं। 2-आज्ञा चक्र स्पष्टता और बुद्धि का केन्द्र है। यह मानव और दैवी चेतना के मध्य सीमा निर्धारित करता है। यह ३ प्रमुख नाडिय़ों, इडा (चंद्र नाड़ी) पिंगला (सूर्य नाड़ी) और सुषुम्ना (केन्द्रीय, मध्य नाड़ी) के मिलने का स्थान है। जब इन तीनों नाडिय़ों की ऊर्जा यहां मिलती है और आगे उठती है, तब हमें समाधि, सर्वोच्च चेतना प्राप्त होती है। 3-आज्ञा चक्र के प्रतीक चित्र में दो पंखुडिय़ों वाला एक कमल है जो इस बात का द्योतक है कि चेतना के इस स्तर पर 'केवल दो', आत्मा और परमात्मा (स्व और ईश्वर) ही हैं। 4-आज्ञा चक्र की देव मूर्तियों में शिव और शक्ति एक ही रूप में संयुक्त हैं। इसका अर्थ है कि आज्ञा चक्र में चेतना और प्रकृति पहले ही संयुक्त है, किन्तु अभी भी वे पूर्ण ऐक्य में समाए नहीं हैं। 5- आज्ञाचक्र का जो स्थान है, वहाँ इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नामक तीन प्रमुख नाड़ियाँ मिलती है तथा एक प्रवाह के रूप में चेतना के सर्वोच्च केन्द्र सहस्रार तक पहुँचती है। यह मिलन त्रिवेणी संगम की तरह है। संगम की महिमा का बखान करते हुए शास्त्रों में कहा गया है। कि जो इसमें अवगाहन करते है, उनका कायाकल्प हो जाता है, वे बाहर से भले ही ज्यों-के-त्यों दीखें, उनका अन्तर्गत पूरी तरह परिवर्तित होता है। 6-आज्ञाचक्र में जब ध्यान को एकाग्र किया जाता है, तो तीन बड़ी शक्तियों के मिलन के फलस्वरूप व्यक्तिगत चेतना का रूपान्तरण विश्वचेतना में हो जाता है। 7-यह सच है कि अन्य चक्रों के उद्दीपन और जागरण से भी उच्चस्तरीय अनुभूतियाँ होती है, किन्तु विश्वचेतना में व्यष्टिचेतना का विलय-विसर्जन नहीं होता। तब हमेशा अनुभूतियों के साथ-साथ साधक को अपने आपे का भान बना रहता है। यह प्रगति-मार्ग में बहुत बड़ा अवरोध है। जब तक इसे गला नहीं लिया जाता, तब तक इड़ा,पिंगला, सुषुम्ना का पारस्परिक मिलन संभव नहीं। 8-दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि जब इनका संगम होता है, तो अहंभाव का लोप हो जाता है, वैयक्तिक चेतना व्यापक और विस्तृत बनती तथा वह विश्वव्यापी चेतना के साथ तदाकार हो जाती है। ऐसी स्थिति में साधक का अस्तित्व-बोध पूर्णतया समाप्त हो जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि व्यक्ति संज्ञाशून्य हो जाता है। केवल इतना होता है कि जो चेतना पहले एक सीमित दायरे में सीमाबद्ध थी, वह उस परिधि को तोड़ देती और द्वैत दशा से अद्वैत भाव में अवस्थान करने लगती है। यही है व्यक्तिगत चेतना का विलुप्त होना। आज्ञाचक्र के जागरण के बिना यह शक्य नहीं। 9-आज्ञाचक्र का स्थान यों तो भ्रूमध्य माना गया है; पर इसकी वास्तविक स्थिति दोनों भौंहों के मध्यवर्ती स्थान के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी के एकदम ऊपर मेरुरज्जु और मस्तिष्क के संधि स्थल के करीब है। शुरू में इसके यथार्थ स्थान का पता लगा पाना मुश्किल होता है। इसलिए प्रारंभिक साधक उसके क्षेत्रम् पर ध्यान केन्द्रित करते है। यह ‘क्षेत्रम्’ और कुछ नहीं वरन् चक्रों को निरूपित करने वाले प्रतीक-प्रतिनिधि है। इन्हें चक्रों के उद्दीपन-बिन्दु का प्रतिबिम्ब कहा जा सकता है। 10-मूलाधार को छोड़कर प्रायः हर चक्र का अपना एक चक्र क्षेत्रम् होता है। ये दोनों केन्द्र (वास्तविक चक्र एवं चक्र क्षेत्रम्) एक -दूसरे के एकदम सीध में तथा नाड़ियों के माध्यम से परस्पर सम्बद्ध होते है। अन्तर सिर्फ इतना होता है कि क्षेत्रम् शरीर के सामने वाले हिस्से में स्थित होते है। जबकि चक्रों की अवस्थिति शरीर के पृष्ठ में मेरुरज्जु एवं मस्तिष्क में है। द्वक्षेत्रम् पर ध्यान करने से एक संवेदनात्मक अनुभूति होती है, जो नाड़ियों के माध्यम से चक्रों तक पहुँचती और फिर मस्तिष्क की ओर आगे बढ़ जाती है। 11-आज्ञाचक्र का क्षेत्रम् मस्तक में उस स्थान पर है, जहाँ लोग तिलक, चन्दन या कुमकुम लगाते तथा स्त्रियाँ जहाँ बिन्दी अथवा सिन्दूर का टीका प्रयोग करती है। वास्तव में इस परम्परा के पीछे भी आज्ञाचक्र को उत्तेजित-जाग्रत करने का ही प्रयोजन निहित है।सिन्दूर पारे का उत्पाद है। उसे जब बिन्दी के रूप में माथे पर लगाया जाता है, तो भ्रूमध्य स्थित नाड़ी में उत्तेजना होने लगती है। 12-यह ठीक उसी प्रकार की होती है, जैसी आज्ञाचक्र पर ध्यान के दौरान तिलक, चन्दन द्वारा चेतन-अचेतन रूप से आज्ञाचक्र के प्रति सजगता बनाये रखी जाती है, इसलिए इन्हें केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक चिन्ह ही नहीं माना जाना चाहिए, अपितु आत्मसत्ता के विज्ञानवेत्ता, सूक्ष्मदर्शी योगियों द्वारा अन्वेषित ऐसा आधार समझा जाना चाहिए, जो अपेक्षणीय प्रयोजन पूरे करते हों। आज्ञा-चक्र जाग्रत करने की विधि :- 09 FACTS;- 1-भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत होने का लक्षण है | 2-इससे भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्षा दीखने लगते है और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं| साथ ही हमारे मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे हम असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेते हैं | 3-कमल के भीतर एक वृत होता है, जो शून्य का प्रतीक है। वृत्त के अन्दर एक त्रिकोण है, जो शक्ति की सृजनात्मकता तथा प्रकटीकरण का प्रतिनिधित्व करता है। त्रिकोण के एक सिरे पर एक काला शिवलिंगम् है। यह साधक के सूक्ष्मशरीर को निरूपित करता है। लिंगम् का रंग साधक के विकास और पवित्रता भेद के हिसाब से भिन्न-भिन्न हो सकता है। 4-विकास की प्रारंभिक अवस्था में लिंगम् धूम्रवर्णी होता है। यह बार-बार ध्यान में आता और जाता रहता है। गहरे ध्यान में जब मन की चंचलता एकदम शान्त हो जाती है, तो लिंगम् का रंग काला दिखाई देता है। इस पर ध्यान एकाग्र करने से प्रकाशमान ज्योतिर्लिंगम् प्रकट होता है। 5-आज्ञाचक्र के जागरण के समय का अनुभव बताते हुए तत्त्वदर्शी आत्मवेत्ता कहते है कि यह लगभग वैसा ही होता है, जैसा चरस, गाँजा, भाँग या एल.एस.डी. जैसे रसायनों के सेवन से प्राप्त होता है, पूर्ण जाग्रत स्थिति में जब भ्रूमध्य पर ध्यान एकाग्र किया जाता है, तो वहाँ दीपशिखा की भाँति एक ज्योति दिखाई पड़ती है। 6-गहरे ध्यान में उतरने पर दो पंखुड़ियों वाली उसकी वास्तविक आकृति उभरने लगती है। इस चक्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अलग-अलग चक्रों पर ध्यान करने जो पृथक्-पृथक् अनुभूतियाँ होती है, वह सब इस एक ही चक्र पर ध्यान के अभ्यास द्वारा अनुभव की जा सकती है। 7-आज्ञाचक्र के जागरण के बाद शेष चक्रों के उन्नयन के लिए दो प्रकार के क्रम अपनाये जाते है। एक में आज्ञाक्रम के उपरान्त विशुद्धि, अनाहत, मणिपूरित -इस क्रम में बढ़ते हुए मूलाधार तक पहुँचना पड़ता है, जबकि दूसरे में आज्ञाचक्र के बाद मूलाधार से शुरुआत कर ऊपर की ओर बढ़ते हुए स्वाधिष्ठान, मणिपूरित, अनाहत होकर विशुद्धि तक पहुँचते है। इन दोनों में से किसी को भी रुचि और सुविधा के अनुसार अपनाया जा सकता है, पर दोनों ही क्रमों में आज्ञाचक्र का प्रथम जागरण अनिवार्य है, अन्यथा दूसरे चक्रों के विकास से उत्पन्न हुई शक्ति को सँभाल पाना कठिन होगा। 8-आज्ञाचक्र जगाने के यों तो त्राटक शाम्भवी, मुद्रा अनुलोम-विलोम प्राणायाम आदि कितने ही तरीके है; पर पवित्र जीवन और शुद्ध आचरण के बिना यह सब साधना-उपचार समयक्षेप करने वाले कवायद भर बनकर रह जाते है। ऐश्वर्य को पाने के लिए स्वयं को अनश्वर के समकक्ष साबित करना पड़ता है। इससे कम में आत्मिक विभूतियाँ न तो किसी को मिली है, न मिलने वाली है। 9-साधकों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं.नए साधक अपनी साधना में यदि उन अनुभवों को अनुभव करते हों तो वे अपनी साधना की प्रगति, स्थिति व बाधाओं को ठीक प्रकार से जान ले और स्थिति व परिस्थिति के अनुरूप निर्णय ले सकें..... A-भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर पहले काला और फिर नीला रंग दिखाई देता है. फिर पीले रंग की परिधि वाले नीला रंग भरे हुए गोले एक के अन्दर एक विलीन होते हुए दिखाई देते हैं. एक पीली परिधि वाला नीला गोला घूमता हुआ धीरे-धीरे छोटा होता हुआ अदृश्य हो जाता है और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है. इस प्रकार यह क्रम बहुत देर तक चलता रहता है. साधक यह सोचता है इक यह क्या है, इसका अर्थ क्या है ? इस प्रकार दिखने वाला नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं जीवात्मा का रंग है. नीले रंग के रूप में जीवात्मा ही दिखाई पड़ती है. पीला रंग आत्मा का प्रकाश है जो जीवात्मा के आत्मा के भीतर होने का संकेत है. B-इस प्रकार के गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत होने का लक्षण है. इससे भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्षा दीखने लगते है और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं. साथ ही हमारे मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे हम असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेते हैं. आज्ञा-चक्र के प्रभाव :- 06 FACTS;- 1-जब मनुष्य के अन्दर आज्ञा चक्र जागृत हो जाता है तब मनुष्य के अंदर अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से मनुष्य के अन्दर सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और मनुष्य एक सिद्धपुरुष बन जाता है। अतः जब इस चक्र का हम ध्यान करते हैं तो हमारे शरीर में एक विशेष चुम्बकीय उर्जा का निर्माण होने लगता है उस उर्जा से हमारे अन्दर के दुर्गुण ख़त्म होकर, आपार एकाग्रता की प्राप्ति होने लगती है। 2- विचारों में दृढ़ता और दृष्टि में चमक पैदा होने लगती है।आज्ञा चक्र ध्यान प्रतिदिन करें,,,यदि आप ठीक ध्यान कर रहे हैं .. यहाँ पर ध्यान करने से आप भोजन न भी करे तब भी आप अपने भीतर अत्यधिक ऊर्जा अनुभव करेंगें,, आप जो भी कार्य करेंगे पूरी शक्ति से कर पाएंगे,, यहाँ पर ध्यान करने से संकल्प शक्ति अत्यधिक मजबूत हो जाती है | 3-परिणामस्वरूप आपके कठिन कार्य भी आसानी से पूर्ण होने लगते है हर कठिन से कठिन कार्य भी आसान लगने लगता है,, यही चक्र ऐसा है जिसपर ध्यान करने से जीवन परिवर्तन सम्भव है,,जीवन मे अलौकिक शक्तिया अनुभव होने लगती हैं |, 4-आज्ञा चक्र ही मात्र एक मात्र चक्र है जिसके जाग्रत होने पर आप ब्रह्मांड की अनन्त ऊर्जा से एक हो सकते है इसे हम परमात्मा की पारलौकिक संसार का प्रवेश द्वार कह सकते है,,यहाँ जो आपके अनुभव होंगे वे अनुभव बाकि नीचे के चक्रो में कभी नही हो सकते,,यहाँ इस चक्र पर जब ऊर्जा पहुचती है तभी आप गहरे ध्यान में व समाधि में उतर सकते है और अनन्त आनन्द,, अनन्त ऊर्जा का अनुभव कर सकते है | 5- आज्ञा चक्र पर पहुचे बगैर परमात्मा के पारलौकिक जगत में प्रवेश नही हो सकता,,जिस किसी की भी साधना,,खोज परमात्मा को अनुभव करने की है उसे महसूस करने की है,,जो उसकी अनन्त ऊर्जा ,,को अनुभव करना चाहता है या उस ऊर्जा में जीना चाहता है उसे आज्ञा चक्र को सक्रिय करना चाहिये,, आज्ञा चक्र से नीचे के चक्रो में भौतिक संसार है और आज्ञा चक्र से आगे परमात्मा का पारलौकिक जगत है | 6-चेतनात्मक विकास में आज्ञाचक्र को सहस्रार से पूर्व का महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया हैं उसकी महत्ता और उपयोगिता इसलिए भी बढ़ जाती है कि उसे चरम विकास का द्वार कहते है। योगविद्या के अनुभवियों ने आज्ञाचक्र को हिमालय कहा है, तो सहस्रार को सुमेरु की संज्ञा दी है हिमालय गए बिना सुमेरु तक पहुँचने की कल्पना करना निरर्थक ही नहीं, निरुद्देश्य भी है। ऐसे में चक्रसंस्थान के अंतर्गत आज्ञाचक्र को सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति-केन्द्र की उपमा देना अनुचित नहीं, उचित ही है।

आज्ञाचक्र के जागरण की यह सूर्य / सविता साधना ;- 16 FACTS;- 1-सृष्टि का मूल आधार सविता अर्थात् सूर्य है। वेदों, उपनिषदों आदि में सूर्य को ही इस सृष्टि की आत्मा माना गया है। यदि वह बुझ जाय या प्रकाश बखेरना बन्द कर दे तो यह सृष्टि और सम्पूर्ण सौरमण्डल निर्जीव हो जायेगा। प्रत्यक्ष सूर्य सविता देवता का स्थूल प्रतीक है, इसलिए उसे ही सविता कह दिया जाता है। वस्तुतः सविता, उस मूल चेतना शक्ति का नाम है जिससे कि शक्ति ग्रहण कर सूर्य सम्पूर्ण सृष्टि को सतत् जीवन चेतना प्रदान करता रहता है। 2-सविता देवता की शक्ति को समझ लेने पर तथा श्रद्धा−भावना की प्रगाढ़ता के साथ उससे अपना संपर्क जोड़ लेने पर मनुष्य के लिए कुछ भी असंभव अथवा अज्ञात नहीं रह जाता। मानवी सत्ता इतनी रहस्यमय है कि उसके तीन शरीरों, पंचकोशों, षट्चक्रों आदि सूक्ष्म परतों में सन्निहित एक से बढ़कर एक उच्चस्तरीय चेतनात्मक शक्ति रहस्यों का अनावरण सविता देवता से प्राप्त शक्ति के आधार पर ही होता है। उस शक्ति-स्रोत से प्रत्यक्ष संपर्क जोड़ने की साधना सर्वोत्तम एवं सर्वाधिक सहज कुण्डलिनी-साधना विधान है। 3-मूलाधार में यह कुण्डलिनी शक्ति प्रसुप्त अवस्था में पड़ रहती है। सविता की शक्ति से जब यह जाग्रत होकर सहस्रार स्थित परम शिव से जा मिलती है तो साधक स्वयं उस महाज्योति के साथ तद्रूप हो जाता है। शक्ति जागरण की यह प्रक्रिया क्रमशः जिन चेतना-स्तरों को पार करती जाती है, उन्हीं को साधना विज्ञान में ‘चक्र’ या ‘प्लेक्सस’ कहा जाता है। 4-मूलाधार तथा सहस्रार के बीच मेरुदण्ड में ऐसे पाँच प्रमुख चक्र संस्थित हैं। ये हैं -स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि और आज्ञाचक्र। मूलाधार और सहस्रार को मिलाकर ये सप्त चक्र हो जाते हैं। इन्हें ही सप्त लोक, सप्तऋषि, सप्तद्वीप, सप्तसागर आदि कहा जाता है। बीच में स्थित पाँच चक्र पंचतत्व, पंच प्राण के प्रतीक हैं। इनकी उपासना ही वास्तविक पंचोपचार है। कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में इसे ही पंचाग्नि विधा कहा गया है। 5-वस्तुतः यह सातों चक्र सूक्ष्म आध्यात्मिक केन्द्र हैं। ब्रह्मांड में जो चेतन-शक्ति की धारायें अविराम द्रुत गति से दौड़ रही हैं उनके कुछ निश्चित आवर्त केन्द्र हैं जो ब्रह्माण्ड स्थित चेतन संस्थानों के प्रतिनिधि हैं। ये चक्र भिन्न-भिन्न प्रकार के शक्ति-प्रवाहों के उद्गम केन्द्र माने जा सकते है। यद्यपि इन सभी का मूल उद्गम केन्द्र तो सविता देवता ही है। जो चक्र-संस्थान अविज्ञात चेतना प्रवाह के जिस केन्द्र से विशेष रूप से जुड़ा रहता है उसका जागरण उसी प्रकार की अनुभूतियों और विभूतियों को जन्म देता है। 6-प्रत्येक चक्र का अपना तत्व-बीज, अपना वाहन, अपना आधि देवता, अयन दल, यंत्र शब्द एवं रंग होता है। इन्हीं विशेषताओं की भिन्नता से उनके भेद किये गये हैं। जिस प्रकार ज्वालामुखी के छिद्र आग, धुआँ तथा दूसरी वस्तुयें उगलते रहते हैं, उसी प्रकार ये चक्र संस्थान जाग्रत होने पर भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्तियाँ-विभूतियाँ उगलते हैं। 7-जिसका ‘आज्ञा चक्र’ जग गया,जिसे दिव्य दृष्टि मिल गयी, उसका साधनापथ आलोकित हो जाता है और लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है। उस साधना-पथ पर चलते हुए साधक सुगमता से लक्ष्य को पा लेता है। इस आज्ञाचक्र को जाग्रत करने के लिए सविता के ज्योति पुँज के अवतरण की साधना करनी होती है। 8-आज्ञाचक्र मनुष्य के मस्तिष्क की दोनों भवों के मध्य में अवस्थित होता है। भृकुटी के नीचे अस्थियों का जो आवरण है उसके भीतर एक बेर की गुठली जैसी ग्रन्थि होती है। वही आज्ञाचक्र संस्थान है। इसके जागरण के लिए साधक कम्बल बिछा कर मेरुदण्ड को सीधा रखते हुए पद्मासन या सुखासन में पालथी मारकर ध्यान मुद्रा में बैठता है। शरीर पर न्यूनतम वस्त्र ही रखे जाते हैं। 9-प्रारंभिक अभ्यास के लिए सूर्य पर त्राटक आवश्यक हो जाता है। अतः अरुणोदय के समय कोई ऐसा स्थान निश्चित करना पड़ता है जहाँ मकानों, पेड़ों आदि की आड़ न हो और ऊपर उभरता बाल-सूर्य स्पष्ट दिखाई दे सके। इस प्रकार स्थान चयन के बाद साधक ध्यानावस्था में सुदूर अन्तरिक्ष में उदित प्रभात-कालीन स्वर्णिम बाल-सूर्य को देखता है। 10-खुली आँखों से सर्वप्रथम एक या दो सेकेंड बाल सूर्य को देख कर आँखें बन्द कर ली जाती हैं। तीस सेकेंड तक बन्द आँखों से उसी प्रकार सूर्य को देखने की भावना-कल्पना की जाती है। यह क्रम तभी तक चलता है जब तक सूर्य की स्वर्णिम आभा समाप्त न हो जाय। 11-दस-पन्द्रह मिनट के भीतर ही सूर्य श्वेत वर्ण होने लगता है। तब यह त्राटक सर्वथा निषिद्ध है। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि सूर्य का स्वर्णिम प्रकाश भी तीन सेकेंड से अधिक देर तक देखने से आँखों को हानि पहुँचती है। अति उत्साह में आकर सूर्य को देर तक देखने की भूल किसी को भी नहीं करनी चाहिए। 12-प्रारंभिक बीस दिन तक इस प्रातःकालीन सूर्य-त्राटक का नियमित रूप से अभ्यास करने से वह कल्पना में- भावना में गहराई तक बैठ जाता है। इसके बाद इस प्रारंभिक अभ्यास की आवश्यकता नहीं रह जाती। इसके उपरान्त अभ्यास, सिद्धि, कल्पना और आस्था पुष्ट भावना के सम्मिश्रण से सविता के ज्योति बिन्दु का ध्यान आगे बढ़ाया जाय। 13-उपासना अवधि में साधक ‘ॐ' महामंत्र के जप के साथ ही अपने ‘आज्ञाचक्र’ संस्थान में वैसे ही स्वर्णिम सविता का ध्यान करता है। अगले चरण के इस ध्यान में यह प्रगाढ़ भावना करनी पड़ती है कि ईश्वरीय दिव्य प्रकाश की प्रेरणापूर्ण किरणें जो अपने ऊपर बरस रही हैं उनसे सम्पूर्ण स्थूल,सूक्ष्म एवं कारण शरीर जगमग हो गया है। 14-आज्ञाचक्र स्थित आत्म-ज्योति जाग्रत हो गयी है। वहाँ एक्स-रेज जैसी प्रचण्ड किरणें निकल रही है जो वस्तुओं, व्यक्तियों को ही नहीं,विचारों भावनाओं, शास्त्रों और सैद्धान्तिक प्रतिपादनों तक के मर्म-वेधन में समर्थ हैं। जो अन्तर्निहित दिव्य दृष्टि को प्रखर बना रही है। अपने भीतर के कषाय-कल्मष, दोष−दुर्गुण भी स्पष्ट दिख रहे हैं और उन्हें दूर करने-फेंक देने, समाप्त कर देने की प्रक्रिया भी सामने स्पष्ट है। साथ ही अपनी आन्तरिक उत्कृष्टताओं, प्रसुप्त क्षमताओं को उभारने का मार्ग भी पूर्णतः प्रकाशित हो उठा है। 15-जितनी गहरी श्रद्धा भावना के साथ अन्तःक्षेत्र को दिव्य बनाने वाली यह सविता-साधना की जायेगी, आज्ञाचक्र के जागरण का उद्देश्य उतना ही मात्रा में पूरा होता जायेगा।आज्ञाचक्र के जागरण की यह सविता-साधना नियमित रूप से लम्बे समय तक करने पर साधक के भीतर की उत्कृष्टतायें उभरती चली जाती हैं और वह गीतोक्त संजय की तरह दिव्य दर्शन की शक्ति-दिव्य दृष्टि भी प्राप्त कर लेता है। 16-भूगर्भ में या सृष्टि के अन्तराल में छिपी दूरवर्ती वस्तुओं का ज्ञान आज्ञाचक्र से निकलने वाली अद्भुत सूक्ष्म किरणों द्वारा सहज ही हो जाता है। अविज्ञात के गर्भ में पक रही संभावनायें, भविष्य में घटित होने वाली घटनायें भी उसे दिख जाती हैं। आज्ञाचक्र के जागरण से ही साधक आत्म ज्योति के अनावरण में सफल होता और आप्तकाम बनता है। आज्ञाचक्र के जागरण की यह सविता साधना सरल भी है और बिना जोखिम की सर्वोपयोगी भी। इसे हर कोई सरलतापूर्वक सम्पन्न कर सकता हैं।

....SHIVOHAM...