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कौन है ब्रह्मांड की मूल शक्ति ?दस महाविद्या की साधना उपासना कैसे की जाती है?PART02


2-तारा माता;-

05 FACTS;-

मंत्र“ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट”

माता तारा स्तुति;-

मातर्तीलसरस्वती प्रणमतां सौभाग्य-सम्पत्प्रदे प्रत्यालीढ –पदस्थिते शवह्यदि स्मेराननाम्भारुदे । फुल्लेन्दीवरलोचने त्रिनयने कर्त्रो कपालोत्पले खड्गञ्चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये ॥ 1-द्वितीय महाविद्या भगवती तारा, ब्रह्मांड में उत्कृष्ट तथा सर्व ज्ञान से समृद्ध हैं, घोर संकट से मुक्त करने वाली महाशक्ति। जन्म तथा मृत्यु रूपी चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करने वाली महा-शक्ति! तारा। माँ तारा दस महाविद्या की दूसरी देवी है. इसे “तारिणी” माता भी कहा गया है। तारा माता के शरण मे जो साधक आता है उसका जीवन सफल हो जाता है. तारा माँ “फीडर’ है. मतलब जिसका स्नेहपूर्ण दूध कभी भी कम नही होता. साधक को एक दूध पीते बच्चे की तरह माँ अपनी गोद मे रखती है. उसे वात्सल्य का स्तनपान हर रोज कराती है.

2-तारा माँ भगवान शिवशंकर की भी माता है... तो तारा माँ की ताकत का अंदाजा लगाइये. जब देव और दानव समुदमंथन कर रहे थे तो विष निर्माण हुआ उस हलाहल से विश्व को बचाने के लिये शिव शंकर सामने आये उन्होने विष प्राषन किया. लेकिन गडबड यह हुई के उनके शरीर का दाह रुकने का नाम नही ले रहा थ. इसलिये माँ दुर्गा ने तारा माँ का रूप लिया और भगवान शिवजी ने शावक का रूप लिया.फिर तारा देवी उन्हे स्तन से लगाकार उन्हे स्तनोंका दूध पिलाने लगी. उस वात्सल्य पूर्ण स्तंनपान से शिवजी का दाह कम हुआ. लेकिन तारा माँ के शरीर पर हलाहल का असर हुआ जिसके कारण वह नीले वर्ण की हो गयी.महा-विद्या तारा जगत जननी माता के रूप में एवं घोर से घोर संकटो की मुक्ति हेतु प्रसिद्ध हुई। देवी के भैरव, हलाहल विष का पान करने वाले अक्षोभ्य शिव ही हैं।

3-जिस माँ ने शिवजी को स्तनपान किया है, वो अगर हमारी भी वात्सल्यसिंधू बन जायेगी तो हमारा जीवन धन्य हो जायेगा. तारा माता भी माँ काली जैसे सिर्फ कमर मे हाथोंकी माला पहनती है. उसके गले मे भी खोपडियोंकी मुंड माला है.महाविद्या तारा मोक्ष प्रदान करने तथा अपने भक्तों को समस्त प्रकार के घोर संकटों से मुक्ति प्रदान करने वाली महाशक्ति हैं।

देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध मुक्ति से हैं, फिर वह जीवन और मरण रूपी चक्र से हो या अन्य किसी प्रकार के संकट मुक्ति हेतु। 4-मुख्यतः देवी की आराधना, मोक्ष प्राप्त करने हेतु, तांत्रिक पद्धति से की जाती हैं। संपूर्ण ब्रह्माण्ड में जितना भी ज्ञान फैला हुआ हैं, वह सब इन्हीं देवी तारा या नील सरस्वती का स्वरूप ही हैं। देवी का निवास स्थान घोर महा-श्मशान हैं, देवी ज्वलित चिता में रखे हुए शव के ऊपर प्रत्यालीढ़ मुद्रा धारण किये नग्न अवस्था में खड़ी हैं, (कहीं-कहीं देवी बाघम्बर भी धारण करती हैं) नर खप्परों तथा हड्डियों की मालाओं से अलंकृत हैं तथा इनके आभूषण सर्प हैं। तीन नेत्रों वाली देवी उग्र तारा स्वरूप से अत्यंत भयानक प्रतीत होती हैं।

5-द्वितीय महाविद्या तारा की कृपा से सभी शास्त्रों का पांडित्य, कवित्व प्राप्त होता हैं, साधक बृहस्पति के समान ज्ञानी हो जाता हैं। वाक्-सिद्धि प्रदान करने से ये नील सरस्वती कही जाती हैं। सुख, मोक्ष प्रदान करने तथा उग्र आपत्ति हरण करने के कारण इन्हें तारणी भी कहा जाता हैं। देवी तारा के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा;-

04 FACTS;- 1-स्वतंत्र तंत्र के अनुसार, देवी तारा की उत्पत्ति मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में, चोलना नदी के तट पर हुई। हयग्रीव नाम के दैत्य के वध हेतु देवी महा-काली ने ही, नील वर्ण धारण किया था। महाकाल संहिता के अनुसार, चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि में 'देवी तारा' प्रकट हुई थीं, इस कारण यह तिथि, तारा-अष्टमी कहलाती हैं, चैत्र शुक्ल नवमी की रात्रि, तारा-रात्रि कहलाती हैं। देवी का वह उग्र स्वरूप उग्र तारा के नाम से विख्यात हुआ। देवी प्रकाश बिंदु रूप में आकाश के तारे के सामान विद्यमान हैं, फलस्वरूप वे तारा नाम से विख्यात हैं। 2-अन्य कथा 'तारा-रहस्य नमक तंत्र' ग्रन्थ से प्राप्त होती हैं; जो भगवान विष्णु के अवतार, श्री राम द्वारा लंका-पति दानव-राज रावण का वध के समय की हैं।देवी तारा, भगवान राम की विध्वंसक शक्ति हैं, जिन्होंने रावण का वध किया था।सर्वप्रथम स्वर्ग-लोक के रत्नद्वीप में वैदिक कल्पोक्त तथ्यों तथा वाक्यों को देवी काली के मुख से सुनकर, शिवजी अपनी पत्नी पर बहुत प्रसन्न हुए। शिवजी ने महाकाली से पूछा, आदि काल में अपने भयंकर मुख वाले रावण का विनाश किया, तब आश्चर्य से युक्त आपका वह स्वरूप 'तारा' नाम से विख्यात हुआ।

3-उस समय, समस्त देवताओं ने आपकी स्तुति की थी तथा आप अपने हाथों में खड़ग, नर मुंडमाल तथा अभय मुद्रा धारण की हुई थी, मुख से चंचल जिह्वा बाहर कर, आप भयंकर रुपवाली प्रतीत हो रही थी। आप का वह विकराल रूप देख सभी देवता भय से आतुर हो काँप रहे थे, आपके विकराल भयंकर रुद्र-रूप को देखकर, शांत करने के निमित्त ब्रह्माजी आप के पास आये थे।

4-समस्त देवताओं को ब्रह्माजी के साथ देखकर देवी, लज्जित हो आप खड़ग से लज्जा निवारण की चेष्टा करने लगी। रावण वध के समय आप अपने रुद्र रूप के कारण नग्न हो गई थी तथा स्वयं ब्रह्माजी ने आपकी लज्जा निवारण हेतु, आपको व्याघ्र चर्म प्रदान किया था। इसी रूप में देवी 'लम्बोदरी' के नाम से विख्यात हुई। तारा-रहस्य तंत्र के अनुसार, भगवान राम केवल निमित्त मात्र ही थे, वास्तव में भगवान राम की विध्वंसक शक्ति देवी तारा ही थी, जिन्होंने लंका पति रावण का वध किया। संक्षेप में देवी तारा से सम्बंधित मुख्य तथ्य;- मुख्य नाम : तारा। अन्य नाम : उग्र तारा, नील सरस्वती, एकजटा। भैरव : अक्षोभ्य शिव, बिना किसी क्षोभ के हलाहल विष का पान करने वाले। भगवान के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान राम। कुल : काली कुल। दिशा : ऊपर की ओर। स्वभाव : सौम्य उग्र, तामसी गुण सम्पन्न। वाहन : गीदड़। सम्बंधित तीर्थ स्थान या मंदिर : तारापीठ, रामपुरहाट, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, बिहार । , कार्य : मोक्ष दात्री, भव-सागर से तारने वाली, जन्म तथा मृत्यु रूपी चक्र से मुक्त करने वाली। शारीरिक वर्ण : नीला। देवी की साधना;-

05 FACTS;-

1-वाक सिद्धि, रचनात्मकता, काव्य गुण के लिए शिघ्र मदद करती है. साधक का रक्षण स्वयमं माँ करती है .साधना के लिये लाल मूंगा, स्फटिक या काला हकीक की माला का इस्तेमाल करे. 121 की 3 माला करे.इनके दो मंत्र है. एक मंत्र मे “त्रिं” और दूसरे मे “स्त्रीं” ऐसे उच्चारण है.शक्ति का यह तारा रूप शुद्दोक्त ऋषि द्वारा शापित है. इसिलिये उच्चारण का ध्यान रहे. 2-देवी की साधना एकलिंग शिव मंदिर (पाँच कोस क्षेत्र के मध्य एक शिव-लिंग), श्मशान भूमि, शून्य गृह, चौराहे, गले तक जल में खड़े हो कर, वन में करने का शास्त्रों में विधान हैं। इन स्थानों पर देवी की साधना शीघ्र फल प्रदायक होती हैं, विशेषकर सर्व शास्त्र वेत्ता होकर परलोक में ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करता हैं।लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कीर्ति, शांति, तुष्टि, पुष्टि रूपी आठ शक्तियां नील सरस्वती की पीठ शक्ति मानी जाती हैं, देवी का वाहन शव हैं। 3-मत्स्य सूक्त के अनुसार कम्बल का आसन, कुशासन अथवा विशुद्ध आसन पर बैठ कर ही देवी तारा की आराधना करना उचित हैं। 4-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव तथा परमशिव को षट्-शिव (६ शिव) कहा जाता हैं। तारा, उग्रा, महोग्रा, वज्रा, काली, सरस्वती, कामेश्वरी तथा चामुंडा ये अष्ट तारा नाम से विख्यात हैं। देवी के मस्तक में स्थित अक्षोभ्य शिव अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। 5-महा-शंख माला जो मनुष्य के ललाट के हड्डियों से निर्मित होती हैं तथा जिस में ५० मणियाँ होती हैं, से भी देवी की साधना करने का विधान हैं। कान तथा नेत्र के बीज के भाग को या ललाट का भाग महा-शंख कहलाता हैं, इस माला का स्पर्श तुलसी, गोबर, गंगा-जल तथा शाल-ग्राम से कभी नहीं करना चाहिये।

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05 FACTS;-

मंत्र –ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः(इस मंत्र के जाप के लिए रुद्राक्ष की माला का इस्तेमाल किया जा सकता है। कम से कम दस माला जप करें।

त्रिपुर सुंदरी माता स्तुति;;-

उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपपटीं विद्यामभीतिं वरम् । हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्दे समन्दस्मिताम् ॥

1-तीनों लोकों में सर्वाधिक सुन्दर तथा मनोरम, एक सोलह वर्षीय चिर-यौवन युवती, मह- त्रिपुरसुंदरी नामक तृतीय महाविद्या। सर्व मनोकामना पूर्ण करने वाली महाविद्या, श्रीकुल की अधिष्ठात्री! महा त्रिपुरसुंदरी।जिस काम मे देवता का चयन करने मे कोई दिक्कत हो तो देवी त्रिपुर सुन्दरी की उपासना कर सकते है। यह भोग और मोक्ष दोनो ही साथ-साथ प्रदान करती है। ऐसी इस दुनिया मे कोई साधना नही है जो भोग और मोक्ष एक साथ प्रदान करे। 2-महाविद्या महा-त्रिपुरसुंदरी स्वयं आद्या या आदि शक्ति हैं। इनके षोडशी, राज-राजेश्वरी, बाला, ललिता, मिनाक्षी, कामेश्वरी अन्य नाम भी विख्यात हैं। अपने नाम के अनुरूप देवी तीनों लोकों में सर्वाधिक सुंदरी हैं तथा चिर यौवन युक्त षोढसी युवती हैं, इनका स्वरूप तीनों लोकों को मोहित करने वाला हैं। देवी सोलह कलाओं से पूर्ण हैं और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं।

3-श्रीरूप में धन, संपत्ति, समृद्धि दात्री श्रीशक्ति के नाम से विख्यात हैं, इन्हीं महाविद्या की आराधना कर कमला नाम से विख्यात दसवी महाविद्या धन की अधिष्ठात्री हुई तथा श्री की उपाधि प्राप्त की। श्रीयंत्र जो यंत्र शिरोमणि हैं, साक्षात् देवी का स्वरूप हैं; देवी की आराधना-पूजा श्री यंत्र में की जाती हैं। कामाख्या पीठ महाविद्या त्रिपुरसुन्दरी से ही सम्बंधित तंत्र पीठ हैं, जहाँ सती की योनि पतित हुई थीं; योनि के रूप में यहाँ देवी की पूजा-आराधना होती हैं। 4-देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध पारलौकिक शक्तियों से हैं, समस्त प्रकार की दिव्य, अलौकिक तंत्र तथा मंत्र शक्तिओं (इंद्रजाल) की देवी अधिष्ठात्री हैं। तंत्र मैं उल्लेखित मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तम्भन इत्यादि (जादुई शक्ति), कर्म इनकी कृपा के बिना पूर्ण नहीं होते हैं। अपने भक्तों को हर प्रकार की शक्ति देने में समर्थ हैं। राज-राजेश्वरी रूप में देवी ही तीनों लोकों का शासन करने वाली हैं। 5-देवी शांत मुद्रा में लेटे हुए सदाशिव के नाभि से निर्गत कमल-आसन पर बैठी हुई हैं। चार भुजाएं हैं तथा भुजाओं में पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करती हैं। देवी के आसन को ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा यमराज अपने मस्तक पर धारण किये हुए हैं; देवी तीन नेत्रों से युक्त एवं मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण किये हुए अत्यंत मनोहर प्रतीत होती हैं। सहस्रों उगते सूर्य के समान कांति युक्त देवी का शारीरिक वर्ण हैं। श्री विद्या, महा त्रिपुरसुंदरी की प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा;-

06 FACTS;- 1-पौराणिक कथा के अनुसार सती वियोग के पश्चात भगवान शिव सर्वदा ध्यान मग्न रहते थे। उन्होंने अपने संपूर्ण कर्म का परित्याग कर दिया था, जिसके कारण तीनों लोकों के सञ्चालन में बाधा उत्पन्न होने लगी। उधर तारकासुर ब्रह्माजी से वर प्राप्त कर चूका था कि "उसकी मृत्यु शिव के पुत्र द्वारा ही होगी।" वह एक प्रकार से अमर हो गया था, चूंकि सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में देह त्याग कर दिया था जिस कारण शिव जी संसार से विरक्त हो घोर ध्यान में चले गए थे।

2-तारकासुर ने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर, समस्त देवताओं को प्रताड़ित कर स्वर्ग से निष्कासित कर दिया था। देवताओ के भोगो का उपभोक्ता बन चूका था। सती हिमालय राज के यहाँ पुनर्जन्म ले चुकी थी तथा भगवान शिव को पति रूप में पाने हेतु वे साधनारत थी। 3-भगवान शिव को समाधि से उठाने के लिए देवताओ ने कामदेव का सहारा लिया। कामदेव सदल वहन पहुचे जहाँ महादेव शिव समाधिस्थ थे। कामदेव ने कुसुम सर नामक मोहिनी वाण से भगवान शिव पर प्रहार किया, परिणामस्वरूप शिव जी का ध्यान भंग हो गया। देखते ही देखते भगवान शिव के तीसरे नेत्र से उत्पन्न क्रोध अग्नि ने कामदेव को जला कर भस्म कर दिया। कामदेव की पत्नी रति द्वारा अत्यंत दारुण विलाप करने पर भगवान शिव ने कामदेव को पुनः द्वापर युग में भगवान कृष्ण के पुत्र रूप में जन्म धारण करने का वरदान दिया तथा वहां से अंतर्ध्यान हो गए। 4-भगवान शिव के एक गण ने कामदेव के भस्म से मूर्ति निर्मित की। उस निर्मित मूर्ति से एक पुरुष का प्राकट्य हुआ। उस प्राकट्य पुरुष ने भगवान शिव की अति उत्तम स्तुति की, स्तुति से प्रसन्न हो भगवान शिव ने भांड (अच्छा)! भांड! कहा। तदनंतर, भगवान शिव द्वारा उस पुरुष का नाम भांड रखा गया तथा उसे ६० हजार वर्षों का राज दे दिया। शिव के क्रोध से दग्ध होने के कारण भांड, तमो गुण सम्पन्न था। वह धीरे-धीरे तीनों लोकों पर भयंकर उत्पात मचाने लगा। देवराज इंद्र के राज्य के समान ही, भाण्डासुर ने स्वर्ग जैसे राज्य का निर्माण किया तथा राज करने लगा।

5-तदनंतर, भाण्डासुर ने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर, देवराज इन्द्र तथा स्वर्ग राज्य को चारों ओर से घेर लिया। भयभीत इंद्र, नारद मुनि के शरण में गए तथा इस समस्या के निवारण हेतु उपाय पूछा। देवर्षि नारद ने, आद्या शक्ति की यथा विधि आराधना करने का परामर्श दिया। देवराज इंद्र ने देवर्षि नारद द्वारा बताये हुए साधना पथ का अनुसरण कर देवी की आराधना की और त्रिपुरसुंदरी स्वरूप में प्रकट हो देवी ने भाण्डासुर वध कर समस्त देवताओं को भय मुक्त किया। 6-कहा जाता हैं, कि भण्डासुर तथा देवी त्रिपुरसुंदरी ने अपने चार-चार अवतारी स्वरूपों को युद्ध करने हेतु अवतरित किया। भाण्डासुर ने हिरण्यकश्यप दैत्य का अवतार धारण किया और देवी-ललिता ने प्रह्लाद स्वरूप में प्रकट हो, हिरण्यकश्यप का अंत किया। भाण्डासुर ने महिषासुर का अवतार धारण किया तब देवी त्रिपुरा ने दुर्गा अवतार धारण कर महिषासुर का वध किया। भाण्डासुर द्वारा रावण का अवतार धारण करने पर देवी के नखों से अवतरित राम ने रावण का संहार किया। देवी श्रीविद्या त्रिपुरसुंदरी से सम्बंधित अन्य तथ्य। 06 FACTS;- 1-देवी काली के समान ही देवी त्रिपुरसुंदरी चेतना से सम्बंधित हैं। देवी त्रिपुरा, ब्रह्मा, शिव, रुद्र तथा विष्णु के शव पर आरूढ़ हैं, तात्पर्य, चेतना रहित देवताओं के देह पर देवी चेतना रूप से विराजमान हैं और ब्रह्मा, शिव, विष्णु, लक्ष्मी तथा सरस्वती द्वारा पूजिता हैं। कुछ शास्त्रों के अनुसार, देवी कमल के आसन पर भी विराजमान हैं, जो अचेत शिव के नाभि से निकला हैं शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा यम, चेतना रहित शिव सहित देवी को अपने मस्तक पर धारण किये हुए हैं। 2-यंत्रों में श्रेष्ठ श्रीयन्त्र साक्षात् देवी त्रिपुरा का ही स्वरूप हैं। देवी त्रिपुरा आदि शक्ति हैं, कश्मीर, दक्षिण भारत तथा बंगाल में आदि काल से ही, श्री संप्रदाय विद्यमान हैं जो देवी आराधक हैं। विशेषकर दक्षिण भारत में देवी श्रीविद्या नाम से विख्यात हैं। मदुरै में विद्यमान मीनाक्षी मंदिर, कांचीपुरम में विद्यमान कामाक्षी मंदिर, दक्षिण भारत में हैं तथा यहाँ देवी श्रीविद्या के रूप में पूजिता हैं। वाराणसी में विद्यमान राजराजेश्वरी मंदिर, देवी श्रीविद्या से ही सम्बंधित हैं। 3-देवी की उपासना श्रीचक्र में होती है, श्रीचक्र से सम्बंधित मुख्य शक्ति देवी त्रिपुरसुंदरी ही हैं। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध गुप्त और परा विद्याओं से हैं। देवी त्रिपुरसुंदरी श्रीकुल की अधिष्ठात्री देवी हैं।देवी में सभी वेदांतो का तात्पर्य-अर्थ समाहित हैं तथा चराचर जगत के समस्त कार्य इन्हीं देवी में प्रतिष्ठित हैं। देवी में न शिव की प्रधानता हैं और न ही शक्ति की, अपितु शिव तथा शक्ति ('अर्धनारीश्वर') दोनों की समानता हैं। समस्त तत्वों के रूप में विद्यमान होते हुए भी, देवी सबसे अतीत हैं, परिणामस्वरूप इन्हें ‘तात्वातीत’ कहा जाता हैं। 4-देवी जगत के प्रत्येक तत्व में व्याप्त भी हैं और पृथक भी हैं, परिणामस्वरूप इन्हें ‘विश्वोत्तीर्ण’ भी कहा जाता हैं। देवी ही परा ( जिसे हम देख नहीं सकते ) विद्या भी कही गई हैं, ये दृश्यमान प्रपंच इनका केवल उन्मेष मात्र हैं , देवी चर तथा अचर दोनों तत्वों के निर्माण करने में समर्थ हैं तथा निर्गुण तथा सगुण दोनों रूप में अवस्थित हैं। ऐसे ही परा शक्ति, नाम रहित होते हुए भी अपने साधकों पर कृपा कर, सगुण रूप धारण करती हैं। 5-भंडासुर की संहारिका, त्रिपुरसुंदरी, सागर के मध्य में स्थित मणिद्वीप का निर्माण कर चित्कला के रूप में विद्यमान हैं। तत्वानुसार अपने त्रिविध रूप को व्यक्त करती हैं, १. आत्म-तत्व, २. विद्या-तत्व, ३. शिव-तत्व, इन्हीं तत्व-त्रय के कारण ही देवी १. शाम्भवी २. श्यामा तथा ३. विद्या के रूप में त्रिविधता प्राप्त करती हैं। इन तीनों शक्तिओं के भैरव क्रमशः परमशिव, सदाशिव तथा रुद्र हैं। 6-देवी त्रिपुरसुन्दरी के पूर्व भाग में श्यामा और उत्तर भाग में शाम्भवी विराजित हैं तथा इन्हीं तीन विद्याओं के द्वारा अन्य अनेक विद्याओं का प्राकट्य या प्रादुर्भाव हुआ है। संक्षेप में देवी श्री विद्या त्रिपुरसुंदरी से सम्बंधित मुख्य तथ्य;- मुख्य नाम : महा त्रिपुरसुंदरी। अन्य नाम : श्री विद्या, त्रिपुरा, श्री सुंदरी, राजराजेश्वरी, ललित, षोडशी, कामेश्वरी, मीनाक्षी। भैरव : कामेश्वर। तिथि : मार्गशीर्ष पूर्णिमा। भगवान के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान परशुराम। कुल : श्रीकुल ( इन्हीं के नाम से संबंधित )। दिशा : नैऋत्य कोण। स्वभाव : सौम्य। सम्बंधित तीर्थ स्थान या मंदिर : कामाख्या मंदिर, ५१ शक्ति पीठों में सर्वश्रेष्ठ, योनि पीठ गुवहाटी, आसाम। कार्य : सम्पूर्ण या सभी प्रकार के कामनाओं को पूर्ण करने वाली। शारीरिक वर्ण : उगते हुए सूर्य के समान।

..... SHIVOHAM........