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AFTER DEATH


मरने का 47 दिन बाद आत्मा पहुंच रहा है यमलोक

गरुड़ पुराण के अनुसार शव को जलाए जाने के बाद शरीर की उत्पत्ति हुई है। वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूढ़ता (सिर), दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चार दिन के अंश से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे के भाग, आठवें दिन से पैर, नववें दसवें दिन से भूख-प्यास उत्पन्न होता है। यह वस्तु शरीर धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरुप में ग्यारहहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है .-

यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ा जाता है। उसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है। उस मार्ग पर प्रेथ प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है। इस तरह 47 दिन लगातार चलकर वह ये लोक पहुंचता है। मार्ग में सोलह पुरिओं को पार कर पापी जीव यमराज का घर जाता है। - इन सोलह पुरि के नाम इस प्रकार है - सौम्य, सौरिपुर, नगदेभरण, गंधर्व, शेलगाम, क्रॉंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बहवापाद, दु: खद, नानाक्रांदपुर, सुट्टम्भवन, रौद्र, पियोवर्धन, शीतधय, बहुभक्ति। ये सोलह पुरि को पार करने के बाद यमराजपुरी आती है पापी प्राणी यमपाश में बन्धा मार्ग में हहकार करते हुए यमराज पुरी जाता है

After 47 days of death the spirit is reaching yamālōka

According to garud puran, the body has originated after being burnt to the body. It is the good-unlucky fruit of the yamālōka. On the first day of the piṇḍadāna (head), the second day of the neck and shoulders, from the third day of the heart, from the th day, the navel, the sixth and the seventh day, the waist and the bottom, from the eighth day to the feet, th tenth From the day, hunger is produced. This object makes the body of a-day-and-a-day meal with hunger-thirst in a puzzled manner, and is caught like a monkey on the thirteenth day by the angels. After that, the demon is suffering from hunger and thirst. The way to reach yamālōka is a thousand yojana except river river. On that way, each day is two hundred yojana. In this way 47 days continuously he reaches the yella. In the way, the sinner's house goes to the house of yamraj. - the name of these sixteen puri is this type - soumya, Saurabh, nagadēbharaṇa, gandharva, śēlagāma, krŏn̄ca, krūrapura, vicitrabhavana, bahavāpāda, suṭṭambhavana, while, while, while, bahubhakti, bahubhakti. After crossing the sixteen puri, the sinner comes in the way of being tied to the path of the sinner. ·

.....SHIVOHAM....